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><channel><title>Nishtha Rai - निष्ठा राय</title> <atom:link href="https://hindipath.com/author/nishtharai/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" /><link>https://hindipath.com/author/nishtharai/</link> <description>हिंदी का संसार</description> <lastBuildDate>Thu, 14 Sep 2023 07:29:48 +0000</lastBuildDate> <language>en-US</language> <sy:updatePeriod> hourly </sy:updatePeriod> <sy:updateFrequency> 1 </sy:updateFrequency> <generator>https://wordpress.org/?v=6.3.9</generator><image> <url>https://hindipath.com/wp-content/uploads/2019/09/HindiPath-Site-Icon-New.png</url><title>Nishtha Rai - निष्ठा राय</title><link>https://hindipath.com/author/nishtharai/</link> <width>32</width> <height>32</height> </image> <item><title>खाटू श्याम मंदिर – Khatu Shyam Ji Temple</title><link>https://hindipath.com/khatu-shyam-ji-temple-time-booking/</link> <comments>https://hindipath.com/khatu-shyam-ji-temple-time-booking/#comments</comments> <dc:creator><![CDATA[निष्ठा राय]]></dc:creator> <pubDate>Sat, 30 Jul 2022 13:08:22 +0000</pubDate> <category><![CDATA[धर्म]]></category> <category><![CDATA[Khatu Shyam]]></category> <category><![CDATA[Mandir]]></category> <category><![CDATA[Temple]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=15293</guid><description><![CDATA[<p>खाटू श्याम मंदिर राजस्थान के सीकर जिले में खाटू या खाटूश्यामजी शहर में स्थित है। भगवान कृष्ण को समर्पित, यह</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/khatu-shyam-ji-temple-time-booking/">खाटू श्याम मंदिर – Khatu Shyam Ji Temple</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>खाटू श्याम मंदिर राजस्थान के सीकर जिले में खाटू या खाटूश्यामजी शहर में स्थित है। <a
href="/krishna-aarti/">भगवान कृष्ण</a> को समर्पित, यह इस क्षेत्र के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। श्री खाटू श्याम जी का मंदिर भगवान कृष्ण के भक्तों के लिए प्रमुख पूजा स्थल माना जाता है। साल के 365 दिन दुनिया भर से भक्ति के उत्साह से भरे लाखों लोग इस मंदिर में खाटू श्याम बाबा के दर्शन करने आते हैं।</p><p>खाटू श्याम मंदिर उत्तर भारत के सबसे प्रमुख मंदिरों में से एक है। मंदिर के मूल संस्थापकों के वंशज तब से आज तक मंदिर की सेवा करते आ रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि श्री खाटू श्याम मंदिर में हर साल श्री खाटू श्याम बाबा के दर्शन करने के लिए लगभग एक लाख श्रद्धालु आते हैं। मंदिर का प्रबंधन और देखरेख मंदिर की सात सदस्यीय समिति द्वारा किया जाता है।</p><p>अगर आप राजस्थान के इस पवित्र तीर्थ जिसको हारे हुए का सहारा भी कहा जाता है, के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं, जैसे: खाटू श्याम कौन हैं, खाटू श्याम जी मंदिर का निर्माण, वास्तुकला, मंदिर कब कैसे पहुँचे, पट खुलने एवं आरती का समय, इत्यादि, तो इस लेख को अंत तक अवश्य पढ़ें।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">खाटू श्याम मंदिर की विशेषता (Significance of Khatu Shyam Mandir)</h2><p>राजस्थान के अलौकिक रूप से सुंदर राज्य में स्थित, श्री खाटू श्याम मंदिर को नवविवाहित जोड़ों, धागा समारोहों, और नवजात शिशुओं के मुंडन समारोह के लिए भी एक शुभ स्थान माना जाता है। यहाँ के लोगों का मानना ​​है कि श्री खाटू श्याम मंदिर परिसर में श्यामा कुंड में स्नान करने से उन्हें सभी रोगों और संक्रमण से मुक्ति मिल जाएगी।</p><p>हिन्दू मान्यता के मुताबिक खाटू श्याम बाबा को कलयुग के देवता और <a
href="/krishn-chalisa-in-hindi/">श्री कृष्ण</a> का अवतार माना जाता है। भक्तों का मानना है की श्याम बाबा से जो भी मांगो वो उसको लाखों करोड़ों गुना देते हैं। और यही कारण है कि उनका एक नाम “लखदातार” भी है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">खाटू श्याम कौन हैं (Who Is Khatu Shyam)</h2><p>खाटू श्याम या बर्बरीक महाभारत काल के <a
href="/bheem-mahabharat-jivan-parichay/">दूसरे पांडव भीम</a> के पोते हैं। उनके माता-पिता घटोत्कच और मौरवी हैं। घटोत्कच भीम और आदिवासी राजकुमारी हिडिम्बा का पुत्र थे।</p><p>किंवदंती है कि बर्बरीक एक बहादुर योद्धा थे। उनके पास एक अनोखा तिहरा बाण या तीन बाणों वाला धनुष था। तीन तीर किसी भी युद्ध को एक मिनट में ख़त्म कर सकते थे। पहला तीर उन लोगों को चिह्नित करेगा जिन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है। दूसरा तीर लोगों को मारने के लिए चिह्नित करेगा और तीसरा तीर जाकर उन लोगों को मार देगा।</p><p>बर्बरीक का पालन-पोषण उनकी माँ मौरवी ने किया था। उन्होंने हमेशा बर्बरीक को ये सिखाया था कि हारे हुए का साथ देना। इसलिए उन्होंने हमेशा उनकी सलाह का पालन किया और हार हुए का पक्ष लिया।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">खाटू श्याम मंदिर का इतिहास (History of Khatu Shyam Ji Temple)</h2><p>श्री खाटू श्याम राजस्थान के खाटू शहर में एक सदियों पुराना <a
href="/prem-mandir-timing-night/">कृष्ण जी का मंदिर</a> है। यह राज्य के सबसे प्रमुख पूजा स्थलों में से एक है। खाटू श्याम नाम का एक ऐसा ही मंदिर इलाहाबाद शहर में मौजूद है। इस बेहद खूबसूरत मंदिर के कारण ही शहर की लोकप्रियता बढ़ी है।</p><p>खाटू श्याम मंदिर की कहानी हिन्दुओं के सबसे <a
href="/mahabharat-katha-in-hindi/">महत्वपूर्ण महाकाव्य महाभारत</a> की है। पांडवों में से एक, <a
href="https://hindipath.com/bheem-mahabharat-jivan-parichay/">भीम</a> के पड़पोते वीर बर्बरीक को भगवान कृष्ण का बहुत बड़ा भक्त माना जाता है। उन्होंने <a
href="/gopal-chalisa-hindi/">श्रीकृष्ण</a> के प्रति अपने प्रेम के प्रतीक के रूप में अपना सिर बलिदान कर दिया था। बर्बरीक के इस महान बलिदान की वजह से उन्हें &#8220;शीश का दानी&#8221; नाम दिया गया। इस महान बलिदान से प्रभावित होकर भगवान ने वीर बर्बरीक को आशीर्वाद के रूप में वरदान दिया था। वरदान यह था कि कलयुग में श्याम के रूप में उनकी पूजा की जाएगी। श्री खाटू श्याम में श्याम के रूप में पूजे जाने वाले वीर बर्बरीक अपने भक्तों में &#8216;हारे का सहारा&#8217; के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। भगवान कृष्ण के भक्तों का मानना ​​है कि भगवान हमेशा पवित्र हृदय वाले निष्कपट भावना से मनोकामनाएं मांगने वाले लोगों के सभी मनोरथ पूर्ण करते हैं।</p><h2 class="wp-block-heading">खाटू श्याम मंदिर का निर्माण एवं वास्तुकला (Construction and Architecture of Khatu Shyam Temple)</h2><p>माना जाता है की खाटू श्याम मंदिर का निर्माण खाटू श्याम के शासक राजा रूपसिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कँवर ने करवाया था। एक बार रूप सिंह को एक सपना आया था जिसमें उन्हें खाटू के एक कुंड से श्याम का शीश निकालकर मंदिर बनाने के लिए कहा गया था। उन्होंने अपने सपने में मिले आदेश का पालन किया।&nbsp;</p><p>उसी कुंड को बाद में &#8216;श्यामा कुंड&#8217; के नाम से जाना जाने लगा। भक्त इस पवित्र कुंड में इस विश्वास के साथ डुबकी लगाते हैं कि इससे उन्हें किसी भी प्रकार की बीमारी या छूत से छुटकारा मिल जायेगा।</p><p>खाटू श्याम जी मंदिर की वर्तमान वास्तुकला को दीवान अभय सिंह द्वारा 1720 के आसपास पुनर्निर्मित किया गया था। भगवान बर्बरीक, जिन्हें वर्तमान समय (कलयुग) का देवता माना जाता है, की यहाँ भगवान कृष्ण के रूप में पूजा की जाती है। इनकी मूर्ति एक पत्थर द्वारा निर्मित है। सफ़ेद पत्थर से निर्मित इस मंदिर की वस्तुलकला आश्चर्यचकित और भावविभोर करने वाली है। लोग दूर-दूर से मंदिर की वास्तुकला और सुन्दर संरचना देखने आते हैं। यहाँ पर एक विशाल प्रार्थना कक्ष है, जिसका नाम जगमोहन है। इस कमरे में विस्तृत रूप से पौराणिक दृश्यों को चित्रित किया गया है। मंदिर का प्रवेश एवं निकास द्वार संगमरमर से निर्मित किये गए हैं। गर्भगृह का शटर सुन्दर चांदी की चादर से ढँका हुआ है, जो मंदिर की भव्यता को कई गुना बढ़ाता है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">खाटू श्याम जी मंदिर कब जाना चाहिए (When to Visit Khatu Shyam Mandir)</h2><p>वैसे तो खाटू श्याम मंदिर की यात्रा के लिए साल का कोई भी दिन उचित होता है। 365 दिन मंदिर में लोगों का भारी जमावड़ा रहता है। लोग देश-विदेश से भगवान के दर्शन करने और अपने मनोरथ की पूर्ति के लिए आते हैं। परन्तु कुछ महत्वपूर्ण दिनों में मंदिर का नज़ारा और भी अधिक भाव विभोर कर देता है। यहाँ पर कुछ महत्वपूर्ण त्योहारों को उत्सव के रूप में मनाया जाता है। और इस समय लाखों की संख्या में भक्त मंदिर और भगवान की एक झलक पाने के लिए आते हैं। आइये जानते हैं कि कौन-कौन से महत्वपूर्ण त्यौहार इस <a
href="/category/dharma/">धार्मिक</a> स्थल पर मनाये जाते हैं।&nbsp;</p><p><a
href="/janmashtami-puja-vidhi/">श्री कृष्ण जन्माष्टमी</a>: यह शुभ त्योहार अगस्त के महीने में आता है। इस त्योहार के दौरान मंदिर को भिन्न-भिन्न तरीकों से सजाया जाता है और भगवान खाटू श्याम जी के भजनों से मंदिर का कोना-कोना गूँज उठता है। दुनिया भर से हज़ारों भक्त इस समय मंदिर में आते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे उन पर अपना आशीर्वाद बरसायें।</p><p>वार्षिक खाटू श्याम (फाल्गुन उत्सव) मेला: हर साल मंदिर में यह मेला फाल्गुन मास के 10 वे दिन से 12 वे दिन तक लगाया जाता है। इस समय मंदिर में भव्य उत्सव का आयोजन होता है जो बड़ी संख्या में भक्तों को आकर्षित करता है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">खाटू श्याम मंदिर में की जाने वाली आरती (Aartis Performed in Khatu Shyam Mandir)</h2><p>खाटू श्याम जी मंदिर में प्रतिदिन 5 आरती की जाती है। जप और आरती से उत्पन्न भक्तिमय वातावरण अतुलनीय होता है। यदि आप इस खूबसूरत मंदिर की यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो आपको इनमें से किसी एक आरती में शामिल होने का प्रयास करना चाहिए। यहाँ पर रोज़ होने वाली आरती इस प्रकार से हैं:</p><p><strong>मंगला आरती:</strong> यह सुबह जल्दी तब की जाती है जब मंदिर का द्वार भक्तों के लिए खोला जाता है। <br><strong>शृंगार आरती:</strong> जैसा की नाम से पता चलता है, यह वह समय है जब <a
href="/khatu-shyam-chalisa/">खाटू श्याम जी</a> की मूर्ति को भव्य रूप से श्रृंगार के साथ अलंकृत किया जाता है, साथ में आरती भी की जाती है।<br><strong>भोग आरती:</strong> दिन की तीसरी आरती दोपहर में की जाती है जब भगवान को भोग या प्रसाद अर्पित किया जाता है।<br><strong>संध्या आरती:</strong> यह आरती शाम को <a
href="/surya-dev-mantra-katha-upay/">सूर्यास्त</a> के समय की जाती है।<br><strong>शयन आरती:</strong> रात में मंदिर बंद होने से पहले, शयन आरती की जाती है।</p><p>इन सभी आरती के समय दो विशेष मंत्रों का उच्चारण किया जाता है: <a
href="/shyam-baba-ki-aarti/">श्री श्याम आरती</a> और श्री श्याम विनती।</p><h2 class="wp-block-heading">मंदिर का समय (Timings of Khatu Shyam Ji Temple)</h2><p><strong>सर्दियों में:</strong> मंदिर के द्वार भक्तों के लिए सुबह 5.30 बजे से दोपहर 1.00 बजे तक और शाम को 5.00 बजे से रात 9 बजे तक खुले रहते हैं।&nbsp;<br><strong>गर्मियों में: </strong>मंदिर के द्वार भक्तों के लिए सुबह 4.30 बजे से दोपहर 12.30 बजे तक और शाम को 4.00 बजे से रात 10.00 बजे तक खुले रहते हैं।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">श्यामा कुंड में डुबकी का महत्व (Importance of Dip in Shyama Kund)</h2><p>श्यामा कुंड मंदिर के पास का वह पवित्र स्थान है जहाँ से मूर्ति को पुनः प्राप्त किया गया था। ऐसा माना जाता है कि इस कुंड में डुबकी लगाने से व्यक्ति के रोग दूर हो जाते हैं और अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त होता है। भक्तिमय उत्साह और पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ लोग श्यामा कुंड में डुबकी लगाते हैं। वार्षिक फाल्गुन मेला उत्सव के दौरान स्नान करना विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है।</p><h2 class="wp-block-heading">खाटू श्याम मंदिर राजस्थान कैसे पहुँचे (How to Reach Khatu Shyam Mandir Rajasthan)</h2><p>खाटू श्याम का मंदिर सड़क और ट्रेन द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है। मंदिर का निकटतम रेलवे स्टेशन रिंगस जंक्शन (आरजीएस) है, जो मंदिर से लगभग 17 किलोमीटर दूर है। आपको स्टेशन से मंदिर जाने के लिए कैब या जीप आसानी से मिल जायेंगी। ऐसी कई ट्रेनें हैं जो दिल्ली और जयपुर से रिंगस की ओर चलती हैं, जिन्हें आप अपनी सुविधानुसार चुन सकते हैं।&nbsp;</p><p>निकटतम हवाई अड्डा जयपुर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जो मंदिर से लगभग 80 किमी दूर है, जहाँ से आप सड़क मार्ग से मंदिर तक जा सकते हैं। सबसे अच्छा मार्ग सवाई जय सिंह हाईवे से जयपुर-सीकर रोड से आगरा-बीकानेर रोड तक है, जिसे NH 11 के नाम से भी जाना जाता है। जयपुर और खाटू के बीच कई निजी और सरकारी बसें भी चलती हैं। हालांकि, इन बसों में कोई आरक्षित सीट उपलब्ध नहीं है। खाटू बस स्टॉप से आप ऑटो रिक्शा से मंदिर जा सकते हैं।</p><h2 class="wp-block-heading">श्री खाटू श्याम का मंदिर क्यों जायें (Why to Visit Shri Khatu Shyam Temple)</h2><p>श्री खाटू श्याम मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित देश के सबसे प्रतिष्ठित मंदिरों में से एक है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर पौराणिक दृश्यों को बहुत खूबसूरती से चित्रित किया गया है। ऐसा माना जाता है कि इस दिव्य स्थान पर भक्तों की सभी मनोकामनायें पूरी होती हैं। भक्त मानसिक शांति प्राप्त करने के लिए भी इस मंदिर में जाते हैं। यह मंदिर यहाँ आने वालों को शांति और सुख की अनुभूति प्रदान करने के लिए जाना जाता है। यही कारण है की श्री खाटू भगवान के सैंकड़ों भक्त इस मंदिर में अक्सर आते हैं।</p><p>मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथायें कई इतिहासकारों को इसके परिसर में लाती हैं। श्री खाटू श्याम का मंदिर का एक महान धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। यह वर्षों से हिंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल रहा है।</p><p>मूल संस्थापकों के वंशज मंदिर को अपनी सेवायें प्रदान करते आ रहे हैं। इससे ये साबित होता है कि श्री खाटू श्याम मंदिर से जुड़ी भक्तों की <a
href="/bhakti-yog-swami-vivekananda-hindi/">आस्था और भक्ति</a> अद्वितीय है। और इसे देश में सबसे अधिक पूजे वाले स्थानों में से एक बनाता है। आकर्षक वास्तुकला वाले इस रमणीय मंदिर की यात्रा उपासकों के लिए एक आश्चर्यजनक और रोमांचक अनुभव साबित होता है।</p><p>खाटू श्याम जी मंदिर में त्यौहार बड़े उत्साह के साथ मनाए जाते हैं। परिसर के साथ-साथ खाटू के पूरे शहर को भव्य रूप से सजाया गया है। और प्रार्थनाओं और भजनों की गूंज पूरे क्षेत्र में अलौकिक एवं पवित्र वातावरण पैदा करती है।</p><h2 class="wp-block-heading">निकटवर्ती दर्शनीय स्थान (Nearby Places of Attraction)</h2><p><strong>गौरीशंकर मंदिर – </strong>श्याम जी के मंदिर के पास स्थित प्रसिद्ध <a
href="/shiv-chalisa-lyrics-in-hindi-pdf/">शिव मंदिर</a> है। यह एक किंवदंती है कि मुगल सम्राट औरंगज़ेब के सैनिक इस मंदिर को नष्ट करना चाहते थे। और इस उद्देश्य से उन्होंने शिवलिंग पर भाले से हमला किया था। तब शिवलिंग से रक्त के फव्वारे दिखने पर सैनिक भयभीत होकर भाग गए। इस <a
href="/12-jyotirling-name-list-hindi/">मंदिर में शिवलिंग पर भाले</a> का निशान आज भी देखे जा सकते हैं।</p><p><strong>श्याम बगीचा –</strong> मंदिर के पास एक विशाल उद्यान है जहाँ से भगवान को अर्पित करने के लिए फूल लिये जाते हैं। खाटू श्याम के महान भक्त लेफ्टिनेंट आलू सिंह जी की समाधि भी परिसर में स्थित है।</p><p><strong>गणेश्वर गाँव –</strong> गणेश्वर गाँव सीकर में नीम का थाना शहर के करीब स्थित है। गर्म गंधक के झरने इसका प्रमुख आकर्षण हैं और ऐसा माना जाता है कि झरने के पानी में डुबकी लगाने से त्वचा के रोग ठीक हो जाते हैं। गणेश्वर के आसपास की गई खुदाई में 4000 साल पुरानी सभ्यता के अवशेष मिले हैं। गणेश्वर के पास बालेश्वर शहर, एक प्राचीन शिव मंदिर के लिए लोकप्रिय है।</p><p><strong>जीनमाता मंदिर –</strong> जीनमाता <a
href="/tag/jeen-mata/">गाँव में देवी जीण माता</a> को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है। ऐसा माना जाता है कि इसका निर्माण लगभग 1,000 साल पहले राजपूतों ने प्रतिहार और चौहान की स्थापत्य शैली में किया गया था। मंदिर में चौबीस स्तंभ हैं, जिन्हें अत्यधिक सुंदरता से निर्मित किया गया है। मंदिर में विराजमान देवी जीण माता की मूर्ति की आठ भुजायें हैं। चैत्र और अश्विन के महीनों में नवरात्रि के अवसर पर यहाँ पर एक वार्षिक मेला का आयोजन किया जाता है।</p><p><strong>हर्षनाथ मंदिर –</strong> 10वीं शताब्दी का हर्षनाथ मंदिर सीकर के पास अरावली पहाड़ियों पर स्थित है। इस स्थल पर प्राचीन शिव मंदिर के अवशेष देखे जा सकते हैं। हर्षनाथ मंदिर के पास एक और शिव मंदिर स्थित है जिसका निर्माण 18वी शताब्दी में सीकर के शिव सिंह द्वारा करवाया गया था।&nbsp;</p><p>तो दोस्तो आशा है कि इस लेख को पढ़कर आपको <a
href="https://www.youtube.com/watch?v=J5PTYQannu8" target="_blank" rel="noreferrer noopener">खाटूश्याम धाम से सम्बंधित संपूर्ण जानकारी</a> प्राप्त हो गई होगी। अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति और भगवान खाटू श्याम का आशीर्वाद पाने के लिए आपको एक बार इस धाम की यात्रा अवश्य करनी चाहिए।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">यह भी पढ़ें</h2><p>● <a
href="/main-fir-se-khatu-aa-gaya-lyrics-in-hindi/">मैं फिर से खाटू आ गया</a> ● <a
href="/main-ladala-khatu-wale-ka-lyrics-in-hindi/">मैं लाड़ला खाटू वाले</a> ● <a
href="/gajab-mere-khatu-wale-lyrics-in-hindi/">गजब मेरे खाटू वाले</a> ● <a
href="/bheegi-palko-ne-shyam-pukara-hai-lyrics-in-hindi/">भीगी पलकों ने श्याम पुकारा है</a> ● <a
href="/reengus-ke-mod-pe-lyrics-in-hindi/">रींगस के मोड़ पे पर तुझपे भरोसा है</a> ● <a
href="/hara-hu-baba-lyrics-in-hindi/">हारा हूँ बाबा पर तुझपे भरोसा है</a> ● <a
href="/shyama-sang-preet-lyrics-in-hindi/">श्याम संग प्रीत</a> ● <a
href="/teen-ban-ke-dhari-lyrics-in-hindi/">तीन बाण के धारी</a> ● <a
href="https://hindipath.com/shyam-baba-ki-aarti/">श्याम बाबा की आरती</a> ● <a
href="https://hindipath.com/jay-shri-shyam-bolo-lyrics-in-hindi/">जय श्री श्याम बोलो</a> ● <a
href="https://hindipath.com/shyam-chorasi-lyrics/">श्याम चौरासी</a> ● <a
href="https://hindipath.com/khatu-shyam-chalisa/">खाटू श्याम चालीसा</a> ● <a
href="https://hindipath.com/khajrana-ganesh-mandir-indore/">खजराना गणेश मंदिर</a> ● <a
href="https://hindipath.com/shri-amarnath-cave-temple/">अमरनाथ मंदिर</a> ● <a
href="https://hindipath.com/gangotri-dham-temple-history-story/">गंगोत्री धाम</a> ● <a
href="https://hindipath.com/kedarnath-temple-uttarakhand/">केदारनाथ मंदिर</a> ● <a
href="https://hindipath.com/kalkaji-mandir-timing-delhi/">कालकाजी मंदिर</a> ● <a
href="https://hindipath.com/prem-mandir-timing-night/">प्रेम मंदिर</a> ● <a
href="https://hindipath.com/kela-devi-mandir-krishna-se-sambandh/">कैला देवी मंदिर</a> ● <a
href="https://hindipath.com/karni-mata-mandir-chuhe-wala-mandir/">करणी माता मंदिर</a> ● <a
href="https://hindipath.com/kamakhya-mandir-devi-ki-yoni-puja-ka-rahasya/">कामाख्या मंदिर</a> ● <a
href="https://hindipath.com/12-jyotirling-name-list-hindi/">12 ज्योतिर्लिंग</a></p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=13346</guid><description><![CDATA[<p>दोस्तो, आइए इस लेख में जानते हैं कि ईमेल आईडी कैसे बनाएं (Email id kaise banaye)। ईमेल से हम सब</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/email-id-kaise-banaye/">ईमेल आईडी कैसे बनाएं</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>दोस्तो, आइए इस लेख में जानते हैं कि ईमेल आईडी कैसे बनाएं (Email id kaise banaye)। ईमेल से हम सब किसी न किसी तरीके से परिचित होंगे। हम में से कुछ की ज़िन्दगी का यह महत्वपूर्ण हिस्सा है, तो कुछ को एक ईमेल आईडी बनाने में ही कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अगर आप उनमें से एक हैं जिन्हें अपनी ईमेल आईडी बनाने के लिए किसी और की सहायता की आवश्यकता होती है तो इस आर्टिकल को पढ़ने के बाद आप स्वयं को इस चीज़ में निपुण समझने लगेंगे।&nbsp;</p><p>जब व्यावसायिक रूप से किसी से जानकारियों के आदान प्रदान की बात आती है, तो ईमेल ही सबसे सुलभ और सुरक्षित तरीका होता है। इसका उपयोग कई दशकों से हो रहा है, जब हमारे पास इंटरनेट का अच्छा साधन भी नहीं था।&nbsp;</p><p>अगर हम आज की बात करें तो ईमेल का इस्तेमाल व्यावसायिक आदान प्रदान ही नहीं बल्कि कई अन्य रूपों में भी होता है। अगर आपके पास एक एंड्राइड या एप्पल मोबाइल फ़ोन है तो आप बिना ईमेल आई.डी. के उसको उपयोग नहीं कर पाएंगे। और तो और आज के टेक्नोलॉजी से ओतप्रोत वातावरण में हर एक एप्लीकेशन, सॉफ्टवेयर, या कोई भी गेम खेलने के लिए भी ईमेल आई. डी. की ज़रूरत पड़ती ही है।&nbsp;</p><p>ऐसे में भारत की आबादी का एक वर्ग ऐसा भी है, जो इन सब चीज़ों का इस्तेमाल इसीलिए नहीं कर पाता क्यूँकि उन्हें ईमेल आई.डी. बनानी नहीं आती है। या फिर इसके लिए उन्हें किसी और पर निर्भर रहना पड़ता है। जिससे उनकी सिक्योरिटी और सेफ्टी पर बहुत बड़ा ख़तरा होता है। इस लेख के माध्यम से हम ऐसे ही लोगों की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं। हम आपको अपनी ईमेल आईडी स्वयं निर्मित करना सिखाएंगे, जिससे आपका डिवाइस और जानकारियाँ सुरक्षित रह पाएंगी। और यह बहुत आसान भी है, आप बहुत सरलता से इसे सीख कर और बना सकते हैं।&nbsp;</p><p>वैसे तो आप ईमेल आई. डी. बनाने के लिए Gmail, Yahoo, Rediff, और भी कई प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर सकते हैं। परन्तु गूगल में इसे बनाना अधिक प्रचलन में होने के साथ-साथ अधिक उपयोगी भी है। इसलिए यहाँ&nbsp; पर हम जीमेल पर स्टेप बाई स्टेप ईमेल बनाना सिखाएंगे। तो इस लेख को पढ़कर आप अपनी ईमेल आई.डी स्वयं बनाने में सक्षम होंगे और आपके मोबाइल की सेफ्टी को भी कोई ख़तरा नहीं होगा। तो आइये शुरू करते हैं। सबसे पहले इस प्रक्रिया में हम जानते हैं कि एक ईमेल आई. डी. आखिर होता क्या है और इसे बनाने के लिए हमें किन-किन चीज़ों की आवश्यकता पड़ती है। इसके साथ ही जानेंगे अन्य महत्वपूर्ण जानकारी।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">ईमेल आईडी क्या है (What Is Email ID)</h2><p><a
href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%88%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B2">ईमेल आईडी</a> कैसे बनाएं – यह जानने से पहले समझना ज़रूरी है कि आख़िर ईमेल है क्या। Email WhatsApp की तरह ही एक मैसेजिंग सर्विस है जिसके ज़रिये हम जानकारियों का आदान प्रदान करते हैं। परन्तु इस मैसेजिंग चैनल को काफी सिक्योर और सेफ प्लेटफॉर्म माना जाता है। इसे अधिकतम प्रोफेशनल कन्वर्सेशन के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके ज़रिये टेक्स्ट मैसेज, इमेज, वीडियोस, डाक्यूमेंट्स, लिंक्स, आदि जैसी चीज़ों को भेजा एवं प्राप्त किया जा सकता है। आज की डिजिटल दुनिया में हर किसी व्यक्ति के लिए एक email id होना अत्यंत आवश्यक होता है। यह id आपके किसी शॉपिंग एप से लेकर बैंक अकाउंट तक से लिंक होती है और उनसे सम्बंधित कोई भी जानकारी आपको ईमेल में ही भेजी जाती है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">ईमेल एड्रेस क्या होता है (What Is Email Address)</h2><p>Email address आपके मोबाइल की पहचान होता है, जैसे कि आपका नाम आपकी पहचान है, आपका मोबाइल नंबर आपके मोबाइल की पहचान है। उसी तरह से एक ईमेल एड्रेस आपके ईमेल की पहचान है, इससे ये पता चलता है कि ये किस व्यक्ति का ईमेल है। आशा है कि आप समझ गए होंगे। चलिए इसे एक example से समझते हैं।&nbsp;</p><p>Danielabraham@gmail.com&nbsp;</p><p>यह एक व्यक्ति का email एड्रेस है जिसका नाम Daniel और Surname Abraham है। कोई भी ईमेल एड्रेस तीन भागों में विभाजित होता है, यूजरनेम (username), at the rate (@), और डोमेन नाम (domain name), जहाँ username व्यक्ति के द्वारा चुना जाता है। यह प्रायः व्यक्ति का नाम और उसकी DOB को मिलाकर बनाया जाता है। ये पूर्णतः ईमेल आईडी बनाने वाले व्यक्ति पर ही निर्भर है।&nbsp; Domain name, डोमेन देने वाली कंपनी होती है जो इस केस में Gmail है। Domain name प्रोवाइडर Gmail के अतिरिक्त अन्य कंपनियाँ भी हैं, जैसे Yahoo, Hotmail, Aol Mail, Outlook Mail इत्यादि। @, username और domain name को विभाजित करने वाला चिन्ह होता है। यह बोलने में एक चिन्ह मात्र है, परन्तु इसके बिना एक email address पूर्ण नहीं हो सकता है।&nbsp;&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">ईमेल का मतलब क्या होता है (What Is the Meaning of Email)</h2><p>Email का फुल फॉर्म यानी पूरा नाम Electronic Mail होता है। यह एक आधुनिक पत्र है। यदि कोई व्यक्ति इंटरनेट के माध्यम से किसी को सूचना या जानकारी के रूप में कोई पत्र भेजता है, तो उसे Email कहते हैं। जहाँ एक पत्र किसी कागज़ पर पेन के माध्यम से लिखा जाता है, वहीं ईमेल को कंप्यूटर या फिर मोबाइल फ़ोन पर टाइप करके लिखा जाता है।&nbsp;</p><p>जिस प्रकार जब हम एक चिट्ठी लिखते थे तो उसमें भेजने वाले और प्राप्त करने वाले का नाम लिखते थे, उसी प्रकार Email में किया जाता है। ईमेल में भी भेजने वाले का नाम, प्राप्त करने वाले का नाम, ईमेल एड्रेस, आदि लिखा जाता है।&nbsp;&nbsp;</p><p>अगर आप भेजने वाले का नाम नहीं भी लिखते हैं तो भी ऑटोमेटिक आपकी ईमेल id प्राप्त करने वाले को मिल जाती है। Subject में ईमेल का विषय या प्रयोजन लिखा जाता है, तो वहीं बॉडी में मुख्य सन्देश लिखा जाता है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">ईमेल आईडी बनाने के लिए किन चीज़ों की आवश्यकता होती है (What Are the Requirements to Create an Email ID)</h2><p>हमारा मुख्य प्रश्न “ईमेल आईडी कैसे बनाएं” है लेकिन इससे भी पहले कुछ वस्तुएँ अनिवार्य हैं। किसी भी व्यक्ति को एक email ID बनाने से पहले ये पता होना चाहिए कि उसे किन-किन चीज़ों की आवश्यकता होगी। ईमेल ID बनाने और उसे इस्तेमाल करने में आपको किसी अतिरिक्त खर्चे की आवश्यकता नहीं होती है। परन्तु इसके लिए आपको कुछ आवश्यक चीज़ों की ज़रूरत होती है जैसे:&nbsp;</p><ul><li>कंप्यूटर, लैपटॉप या स्मार्टफोन&nbsp;</li><li>इंटरनेट कनेक्शन&nbsp;</li><li>ईमेल प्रोवाइडर&nbsp;</li><li>न्यूनतम डिजिटल साक्षरता&nbsp;</li></ul><h2 class="wp-block-heading">जानिए ईमेल आईडी कैसे बनाएं – Janiye Email id kaise banaye</h2><h3 class="wp-block-heading">1. वेब ब्राउज़र में gmail.com टाइप करें (Type gmail.com in Web Browser)</h3><p>सबसे पहले अपना कंप्यूटर खोलें और अपने पसंदीदा वेब ब्राउज़र जैसे Google Chrome, Firefox, Internet Explorer में जाये। अब ब्राउज़र में&nbsp; gmail.com टाइप करें।</p><p><img
decoding="async" fetchpriority="high" src="https://lh5.googleusercontent.com/SxgohOg90-4JvLZYT6qCcL__c7ThXB4Pg8j4JDU0GPlu2Pw6U7CJIeFLQoO4wz-y5vcj_VeRnAjWiM2hnhB-E47E1PEgYfwKDjcTtIgCOXgBCeTSV8BvjjHhJWdqiUpUIjMBTqbqoI5icuCvaQ" width="602" height="336"></p><h3 class="wp-block-heading">2. Create an account पर क्लिक करें (Click on Create an Account)</h3><p>अब आपके कम्प्यूटर के विंडो में Gmail की वेबसाइट खुल जाएगी। आपके सामने दो विकल्प आ जायेंगे Sign In और Create an account का। आपको नई आई. डी. बनाने के लिए Create an account पर क्लिक करना है। फिर क्यूँकि आप अपने पर्सनल यूज़ के लिए अकाउंट बना रहे हैं तो “Myself” की बटन दबाएँ।</p><p><img
decoding="async" src="https://lh5.googleusercontent.com/cAqJHw4VvA1RVyB3Z-sfrDxJYjgXXwbfb8o919Q0OYBUjOTBW3Nr18SVv3BJbQUablKt6ACmvAiY31srEnzMwKzX1swqs7nKqNMmBa7l-_5dvNT9SpCfRJvzuYQG8N85CDX5yJRQtDcZDVJAWg" width="602" height="319"></p><h3 class="wp-block-heading">3. पूछी हुई जानकारियाँ लिखें (Fill the Asked Information)</h3><p>ईमेल आईडी कैसे बनाएं – अब इस प्रक्रिया के तीसरे चरण पर आते हैं। अब आपके सामने जो विंडो आएगी उसमें आपको पूछी हुई जानकारियाँ लिखनी पड़ेगी। पहले आपको फर्स्ट नेम में अपना नाम लिखना है, फिर लास्ट नेम में surname लिखना है। फिर नीचे के बॉक्स में आपका यूजरनेम (username) लिखने के लिए बोलेगा, जहाँ आप अपना नाम लिख सकते हैं। अगर Already taken का मैसेज आया तो नाम के साथ नंबर भी डाल सकते हैं जैसे की बर्थ डेट वगैरह, जैसे नीचे इमेज में लिखा है। अपना यूजरनाम ऐसा रखें जो यूनिक भी हो और साथ ही आप उसको आसानी से याद रख पाए। इसके बाद अपना पासवर्ड डिसाइड करें और पासवर्ड वाले कॉलम में उसे डालें। Password और Confirm password वाले कॉलम में एक ही पासवर्ड डालें। आखरी में Next बटन पर क्लिक करें।&nbsp;</p><p><img
decoding="async" src="https://lh4.googleusercontent.com/O4_NgbS9WGRbbwCLkonwSUlnzKfUeU_QFH0KfZz3zoFqEu9tWBHB41DAvN9Sc9mUoUpkqpURpdWeizLDSdPa3IvFJeJQL9TYWcHiHw_8MAi0z1GrwdW6TeEfs1jzLA7N6VfaXMxvzCCY9VeQ0g" width="602" height="324"></p><h2 class="wp-block-heading">4. मोबाइल नंबर verify करें (Verify the Mobile Number)</h2><p>अगले पेज पर आपको मोबाइल नंबर verify करना होगा। जिसके लिए phone number वाले कॉलम में अपना मोबाइल नंबर डालें और Next बटन पर क्लिक करें। जो मोबाइल नंबर आप यहाँ डालेंगे वो आपकी Gmail ID से लिंक हो जायेगा।&nbsp;</p><h3 class="wp-block-heading">5. OTP लिखें और verify करें (Write OTP and Click on Verify)</h3><p>आपके दिए हुए मोबाइल नंबर पर एक कोड आएगा जिसको OTP बोलते हैं। “Enter Verification Code” वाले कॉलम में उस OTP को लिखें और “Verify” के विकल्प पर क्लिक करें।&nbsp;</p><p><img
decoding="async" src="https://lh5.googleusercontent.com/w013WMKgPfo-Y_lmJ8MqNuruHiz2k2kKWUWU1Winl4nS02bqVtYRcQF243dMdkYhAytAm4l_qyDCd1oM2B0NFRk8BJfIBJso-GMFKlKlzKCWfewVmKSbOnBe3mwpaIfcUhpv9_0zVXm7MLQdcw" width="602" height="325"></p><h2 class="wp-block-heading">6. डेट ऑफ़ बर्थ और जेंडर लिखें (Write Date of Birth and Gender)</h2><p>अब अगले पेज पर date of birth और gender पूछेगा। Optional वाले columns में कुछ लिखने की ज़रूरत नहीं है। Date of birth वाले कॉलम में अपने जन्म का दिन, महीना, और साल लिखें और Gender वाले कॉलम में आप male हैं या female ये डालें। फिर “Next” बटन पर क्लिक करें। </p><p><img
decoding="async" src="https://lh5.googleusercontent.com/8v49vi4ayuOVEyqBzXm-rB4kVaZfBngGSJq8fjcSQzndNNhQas-ygAeeRyy74D5sc0lGgm1erB6V3HxRq2YzzXWa8hjLfecki8AGCOLIUiMNPuWPO-v_QtCsUnqu76w9r9QkTRo8I_dcMKnPBQ" width="602" height="325"></p><h3 class="wp-block-heading">7. Yes I Am In या Skip पर क्लिक करें (Click on Yes I Am in or Skip)</h3><p>अगले पेज पर Google आपसे पूछेगा कि क्या आप अपने मोबाइल नंबर को गूगल की दूसरी सर्विसेज के साथ लिंक करना चाहते हैं। अगर आप लिंक करना चाहते हैं तो “Yes I Am In” के विकल्प पर क्लिक करें, वरना “Skip” के विकल्प पर क्लिक करें।</p><p><img
decoding="async" src="https://lh3.googleusercontent.com/DfqTgieo9Ih5d1ekzdsI2wIwvJG2WBekENibMKpBCwyv2AohYuGqSt3_YljqYwfp-kUSAfBi7HqyPv8QDRh8HpzeporV0-Ku_FEY5NSG308dfK9GsSWFUG1ksiYiEaYCZxieN7mQbwuejFmU0w" width="602" height="321"></p><h3 class="wp-block-heading">8. प्राइवेसी पॉलिसी को पढ़ें (Read the Privacy Policy)</h3><p>अगले पेज पर Google आपके लिए प्राइवेसी पॉलिसी प्रस्तुत करेगा। उसे ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद “I Agree” के विकल्प पर क्लिक करें।&nbsp;</p><p><img
decoding="async" src="https://lh3.googleusercontent.com/_A54klxnu2AxJnPO1yMxLfKcluJ6xvBUaKM2xlRxsjS2APz9wHAp_f5KavlGH2l4JtvfdI30b1eP2ZUMs6JwXg2p8F8p2YqeXLUOm_S9B2SCgZI-hPqBcmlmvz83lkq0FteUI9_2i55dAHyQGg" width="602" height="325"></p><p>9. जीमेल के डैशबोर्ड का इंटरफ़ेस देखें (See the Interface of Gmail’s Dashboard)</p><p>जैसे ही आप “I Agree” पर क्लिक करेंगे, आपके सामने Gmail का डैशबोर्ड खुल जाएगा। यहीं पर आप अपने भविष्य में आने वाले सभी mails को देख पाएंगे। और यहीं से “Compose” विकल्प में जाकर आप किसी भी व्यक्ति को मेल भेज भी पाएंगे। अब आपकी email ID बनकर तैयार हो चुकी है। हमें आशा है कि इस लेख के ज़रिए आपको आपके प्रश्न “ईमेल आईडी कैसे बनाएं” का उत्तर मिल गया होगा।&nbsp;</p><p
class="has-text-align-left"><img
decoding="async" width="602" height="325" src="https://lh4.googleusercontent.com/r0ck7EC1dTWLay_PExc0pt0hDQa9tfZFTPg-YZAp-JmaB0qaDCuJPjAOKhoJLUGqHT_rjmWlKT84x3d5VqwJcv3HDyl4i_0tv7b6VZhCSjWXZardkZV24WbimYzGvk4IstrhZJnxN2kVThYKvA"></p><h2 class="wp-block-heading">ईमेल कैसे भेजा जाता है (How to Send an Email)</h2><p>ईमेल भेजना बहुत आसान होता है। बस आपको प्राप्त करने वाले का ईमेल एड्रेस पता होना चाहिए। फिर आपको अपना संदेश टाइप करके प्राप्तकर्ता का ईमेल id लिखकर सेंड बटन पर क्लिक करना होता है। और आपका मैसेज तुरंत 2 से 3 सेकंड में प्राप्तकर्ता के पास पहुँच जाता है। इसके लिए आपको कोई पैसे खर्च नहीं करने पड़ते, यह सेवा, ईमेल सर्विस प्रोवाइडर द्वारा मुफ्त में दी जाती है। परन्तु इसके लिए आपके पास इंटरनेट कनेक्शन का होना अति आवश्यक है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">बेस्ट ईमेल प्रोवाइडर (Best Email Providers )</h2><p><strong>Gmail: </strong>ईमेल ID बनाने के लिए Gmail दुनिया का सबसे अधिक लोकप्रिय ईमेल प्रोवाइडर माना जाता है। यह सर्विस गूगल द्वारा दी जाती है। बड़े-बड़े व्यापारिक और नौकरी आदि के उपयोग के लिए भी अधिकतर जीमेल का ही उपयोग किया जाता है।&nbsp;</p><p><strong>Yahoo! Mail:</strong> इसका उपयोग आजकल बहुत कम हो गया है और ज़रूरत के अनुसार ही इसे उपयोग में लाया जाता है। परन्तु यह आज भी ईमेल बनाने और सन्देश के आदान प्रदान के लिए एक टूल के रूप में उपलब्ध है और काम कर रहा है।&nbsp;</p><p><strong>Outlook: </strong>यह सर्विस दुनिया की जानी मानी कंपनी Microsoft द्वारा दी जाती है। इसका उपयोग अधिकतर बिज़नेस और पेशेवर रूप में किया जाता है। परन्तु आप अपने पर्सनल इस्तेमाल के लिए भी इसमें मुफ्त में ईमेल ID बना सकते हैं।&nbsp;&nbsp;</p><p><strong>Rediffmail:</strong> रेडिफमेल भी बाकी के ईमेल प्रोवाइडर्स की तरह ही सर्विसेज प्रोवाइड करता है। बस प्रोवाइडर का नाम अलग है।&nbsp;<strong>Zoho Mail:</strong> ज़ोहो मेल को भी ईमेल ID बनाने के लिए व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है।</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/email-id-kaise-banaye/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>कालकाजी मंदिर</title><link>https://hindipath.com/kalkaji-mandir-timing-delhi/</link> <comments>https://hindipath.com/kalkaji-mandir-timing-delhi/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[निष्ठा राय]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 21 Apr 2022 14:47:31 +0000</pubDate> <category><![CDATA[धर्म]]></category> <category><![CDATA[Delhi]]></category> <category><![CDATA[Kali]]></category> <category><![CDATA[Mandir]]></category> <category><![CDATA[Temple]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=13098</guid><description><![CDATA[<p>कालकाजी मंदिर भारत की राजधानी दिल्ली में स्थित एक लोकप्रिय और अत्यधिक पूजनीय मंदिर है। ऐसा माना जाता है कि</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/kalkaji-mandir-timing-delhi/">कालकाजी मंदिर</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>कालकाजी मंदिर भारत की राजधानी दिल्ली में स्थित एक लोकप्रिय और अत्यधिक पूजनीय मंदिर है। ऐसा माना जाता है कि यह दुनिया का सबसे प्राचीन काली मंदिर है। यह मंदिर <a
href="/bhadrakali-mata-ki-aarti/">माँ काली</a> देवी को समर्पित है, जो कि <a
href="/durga-chalisa-in-hindi/">देवी दुर्गा</a> का अवतार हैं। यहाँ पर <a
href="/kali-kavach/">देवी काली</a> की छवि को व्यापक रूप से स्वयं प्रकट माना जाता है। कहा जाता है कि ये देवी अपने भक्तों की सभी इच्छाओं को पूरी करतीं हैं।</p><p>कालकाजी मंदिर को &#8220;जयंती पीठ&#8221; या &#8220;मनोकामना सिद्ध पीठ&#8221; के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ आने वाले भक्तों की इच्छापूर्ति की लोकप्रिय धारणा के कारण इस स्थान को ये नाम मिले हैं। इसके अलावा, मंदिर के सतयुग के समय से यहाँ होने की बात कही गई है।</p><p>मंदिर धार्मिक अवसरों पर उत्साहपूर्ण गतिविधियों का गवाह बनता है, जब लोग देवी माँ के दर्शन करने और उनका आशीर्वाद लेने आते हैं। यह एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण है और देश भर से आने वाले श्रद्धालु इस तीर्थ स्थल पर बार-बार आते हैं। बहुत से लोग सिर्फ ध्यान करने और <a
href="/kali-mata-das-mahavidya/">काली माता</a> की पूजा करने के लिए मंदिर में आते हैं।</p><h2 class="wp-block-heading">कालकाजी मंदिर खुला है या बंद है? (Kalkaji Temple Open or Closed?)</h2><p>इस मंदिर का <a
href="/category/itihaas-history/">इतिहास सदियों पुराना</a> है। ऐसी मान्यता है कि यह मंदिर सतयुग, त्रेता, द्वापर, हर युग में मौजूद था। बहुत से लोग जानना चाहते हैं कि कालकाजी मंदिर खुला है या बंद है। कालकाजी मंदिर साल के 365 दिन ही भक्तों के लिए खुला रहता है। बस रोज़ाना किसी विशेष निश्चित समय के दौरान यह बंद होता है। साथ ही <a
href="https://hindipath.com/nadi-ki-atmakatha-in-hindi/">कोरोना (कोविड 19)</a> के कारण भी पिछले समय में यह मंदिर बन्द रहा है। तो आइये जानते हैं मंदिर के रोचक इतिहास के साथ-साथ, इससे जुड़े अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों को।</p><h2 class="wp-block-heading">कालिका देवी मंदिर की भौगोलिक स्थिति (Geographical Location of Kalika Devi Temple)</h2><p>कालकाजी मंदिर दक्षिण दिल्ली के कालकाजी नामक स्थान में स्थित है। कहा जाता है कि मंदिर की वजह से ही इस स्थान का नाम कालकाजी पड़ा। यह मंदिर लोकप्रिय लोटस टेम्पल के करीब स्थित है, जिसे दक्षिण दिल्ली के नेहरू प्लेस इलाके में बहाई मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। दिल्ली का इस्कॉन टेम्पल भी इस मंदिर के नज़दीक ही स्थित है। भक्त स्थानीय बसों, ऑटो, या दिल्ली मेट्रो रेल सेवा (निकटतम कालकाजी मंदिर मेट्रो स्टेशन) द्वारा आसानी से मंदिर तक पहुँच सकते हैं।&nbsp;</p><p>यह मंदिर नेहरू प्लेस के वाणिज्यिक परिसर के बाहरी छोर पर स्थित है। इस मंदिर में साल भर कई धार्मिक अवसरों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। फिर मंदिर को छोटे लाल झंडों से सजाया जाता है और अक्सर यह पाया जाता है कि महिला भक्तों की संख्या पुरुष भक्तों से अधिक है। कालकाजी मंदिर की कहानियों के साथ कई लोक कथाएँ प्रचलित हैं। आइये जानते हैं, उनमें से कुछ किंवदंतियों का विवरण-</p><h2 class="wp-block-heading">कालकाजी मंदिर के पीछे की पौराणिक कथा (Mythology Behind Kalkaji Temple)</h2><h3 class="wp-block-heading">देवी काली की कथा (Story of Goddess Kali)</h3><p>ऐसा माना जाता है कि माँ काली ने दो राक्षसों के संहार के लिए अवतार लिया था, जो आसपास रहने वाले देवताओं को परेशान कर रहे थे। <a
href="/brahma-chalisa-in-hindi/">भगवान ब्रह्मा</a> ने देवताओं को इन दो राक्षसों के चंगुल से छुड़ाने के लिए <a
href="/solah-somvar-vrat-katha/">भगवान शिव</a> की <a
href="/parvati-ji-ki-aarti/">पत्नी पार्वती जी</a> के पास भेजा। <a
href="/parvati-chalisa-in-hindi-lyrics/">देवी पार्वती</a> ने राक्षसों से छुटकारा दिलाने के लिए कौशिकी देवी की रचना की। लेकिन जैसे ही राक्षसों का ख़ून ज़मीन पर गिरता, कई और राक्षस जन्म ले लेते थे। तब <a
href="/kali-chalisa-in-hindi/">देवी काली</a> कौशिकी देवी की भौहों से प्रकट हुईं और उन्होंने राक्षसों का गिरा हुआ ख़ून पी लिया। इस प्रकार उन्होंने उन राक्षसों को गुणा होने से रोका। इस प्रकार देवी काली को भयानक राक्षस रक्तबीज का वध करने के रूप में चित्रित किया गया है। तब से, माँ काली को इस जगह की देवी के रूप में पूजा जाता है और उनकी उपस्थिति इस क्षेत्र में अपनी दिव्यता के साथ व्याप्त है।</p><h2 class="wp-block-heading">एक पराजित राजा की कथा (The Story of a Defeated King)</h2><p>एक और कहानी एक पराजित राजा के बारे में है। वह एक अज्ञात आक्रमणकारी से कई लड़ाइयाँ हार चुका था। एक बार लड़ाई हारने पर उन्होंने उस स्थान पर विश्राम किया था। और तभी देवी काली उनके सपने में आईं और उन्हें फिर से लड़ने के लिए प्रेरित किया।</p><p>देवी के प्रोत्साहन से उस राजा ने दुश्मनों को कड़ी टक्कर देकर जीत हासिल किया। अपना राज्य पुनः प्राप्त करने के बाद भी, वह देवी के बारे में नहीं भूले। और इस मंदिर का निर्माण देवी काली को समर्पण के रूप में करवाया।</p><h2 class="wp-block-heading">मंदिर का इतिहास (History of Temple)</h2><p>कालकाजी मंदिर पिछले 3,000 वर्षों से मौज़ूद है। इसकी उत्पत्ति के बारे में कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। हालांकि, लोक कथाओं के अनुसार, मंदिर का सबसे पुराना हिस्सा 1764 ईस्वी में बनाया गया था। कहा जाता है कि कालका मंदिर का निर्माण 18 वीं शताब्दी के अंत में मराठा शासकों द्वारा किया गया था। ऐसी मान्यता है कि कालकाजी मंदिर <a
href="https://hindipath.com/dwarkadhish-ki-aarti/">महाभारत के समय</a> से बना हुआ है।</p><p>लोक कथाओं के अनुसार, पांडवों और कौरवों ने <a
href="/yudhishthir-mahabharat-jivan-parichay/">युधिष्ठिर</a> के शासनकाल में कालका देवी की पूजा की थी। लौरा साइक्स के शब्दों में, 1738 की तालकटोरा में मुगलों के साथ की लड़ाई में &#8220;मराठों ने ओखला के पास कालका देवी के मेले को लूट लिया था&#8221;। 1816 ईस्वी में, राजा केदारनाथ (सम्राट अकबर द्वितीय के पेशकर) ने कालकाजी मंदिर की मूल संरचना में कुछ बदलाव और परिवर्धन किए, और पिछले 50 वर्षों से हिंदू बैंकरों और व्यापारियों द्वारा आसपास के क्षेत्र में काफी संख्या में धर्मशालाएँ बनाई गईं हैं।&nbsp;</p><p>यह भी माना जाता है कि देवी कालकाजी, भगवान ब्रह्मा की सलाह पर देवताओं द्वारा की गई प्रार्थनाओं और अनुष्ठानों से प्रसन्न होकर, इस पर्वत पर प्रकट हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया। यह पर्वत <a
href="/surya-dev-mantra-katha-upay/">सूर्य</a> कूट पर्वत के नाम से प्रसिद्ध है। तब से, देवी ने इस पवित्र स्थान को अपने निवास के रूप में अपना लिया और अपने भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी कर रही हैं।</p><p><strong>यह भी पढ़े –</strong> <a
href="/karni-mata-mandir-chuhe-wala-mandir/">करणी माता मंदिर</a></p><h2 class="wp-block-heading">कालका मंदिर का निर्माण एवं वास्तुकला (Construction and Architecture of Kalka Temple)</h2><p>यह मंदिर अरावली पर्वत श्रृंखलाओं के सूर्य कूट पर्वत पर स्थित है। इसलिए हम माँ कालिका देवी (देवी कालिका) को &#8216;सूर्य कूट निवासिनी&#8217; कहते हैं अर्थात जो सूर्य कूट में निवास करतीं हैं।</p><p>कालकाजी मंदिर एक 12-पक्षीय संरचना, पूरी तरह से संगमरमर और काले झांवा से निर्मित किया गया है। काला रंग काली देवी का प्रतीक है, इसलिए मंदिर का निर्माण काले पत्थर से किया गया है।</p><p>पिरामिड, टॉवर मंदिर को घेरते हैं। मंदिर में ईंटों और सीमेंट के साथ सामान्य निर्माण के अलावा, पत्थर भी जोड़े गए हैं। केंद्रीय कक्ष में 12 भुजाएँ होती हैं। साथ ही मंदिर में 36 धनुषाकार द्वार हैं।</p><p>प्रत्येक तरफ एक द्वार एक बरामदे से ढ़का हुआ है। बरामदा 8&#8217;9 ”चौड़ा है और इसमें 36 धनुषाकार उद्घाटन हैं। हालांकि, सेंट्रल चैंबर ने बरामदे को चारों तरफ से घेर लिया है।</p><p>संगमरमर की चौकी पर दो लाल बलुआ पत्थर के बाघ पूर्वी द्वार के सामने खड़े हैं। इस चौकी पर उर्दू में लेख लिखे हुए हैं। बाघों के बीच कालिका देवी की मूर्ति है जिस पर हिंदी में नाम अंकित है।</p><p>मंदिर के बाहर स्टॉलों की लंबी लाइन है। ये भक्तों को विभिन्न प्रकार के प्रसाद पैकेज प्रदान करते हैं। छोटी से लेकर विशेष थाली तक सभी की उपलब्धता है।</p><p>मंदिर परिसर में भगवान शिव, <a
href="/tag/hanuman/">श्री हनुमान</a>, <a
href="/aaj-budhwar-hai-bhajan-lyrics/">प्रथमपूज्य श्री गणेश</a>, <a
href="/aadi-lakshmi-ashtottara-shatanamavali/">लक्ष्मी</a>&#8211;<a
href="/satyanarayan-bhagwan-ki-aarti/">नारायण</a>, <a
href="/bhairav-aarti/">भैरव</a>, सीता-राम, और <a
href="/navgrah-photo-chitra-yantra-mantra-katha/">नौ ग्रहों</a> जैसे अन्य देवताओं के छोटे-छोटे मंदिर हैं। मंदिर के प्रांगण में एक हवन शाला, एक पवित्र नीम का पेड़, और एक <a
href="/tulsi-ji-ki-aarti/">तुलसी</a> का पौधा भी है।</p><p><strong>यह भी पढ़ें &#8211;</strong> <a
href="/tantroktam-devi-suktam-lyrics/">तन्त्रोक्तं देवी सूक्तम्</a></p><h2 class="wp-block-heading">कालकाजी मंदिर में मनाये जाने वाले त्योहार (Festivals Celebrated in Kalkaji Temple)</h2><p><strong>वसंत नवरात्रि &#8211;</strong> यह शरद ऋतु का त्योहार है, इसलिए इसे वसंत नवरात्रि कहा जाता है। यह आमतौर पर अप्रैल के महीने में पड़ता है, हालांकि हिंदू कैलेंडर के अनुसार परिवर्तन के अधीन है। इसे राम नवरात्रि या चैत्र नवरात्रि भी कहा जाता है। इस समय यहाँ पर भव्य मेले का आयोजन होता है।&nbsp;</p><p><strong>महा नवरात्रि &#8211; </strong><a
href="/navgrah-photo-chitra-yantra-mantra-katha/">महा नवरात्रि</a>, सभी भारतीय राज्यों में समान उत्साह के साथ मनाई जाती है। यह आमतौर पर हिंदू कैलेंडर के आधार पर अक्टूबर में पड़ता है। इस त्यौहार पर मंदिर में भारी भीड़ उमड़ती है। इसके अलावा, त्योहार के दौरान भक्त सोने के रूप में भारी प्रसाद चढ़ाते हैं।</p><p>माँ काली की एक झलक पाने के लिए <a
href="/category/dharma/">धार्मिक</a> अवसरों पर भक्तों की भीड़ मंदिर में आती है। नौ दिवसीय नवरात्रि के दौरान एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है, और इस स्थान पर देश भर से भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। इस अवधि के लिए पूरे मंदिर परिसर को धूमधाम और भव्यता से सजाया जाता है और मंदिर के चारों ओर का वातावरण रात के दौरान भी उत्सव का उत्साह प्रदर्शित करता है। भक्त मूर्ति (माता स्नानम) को दूध से स्नान करने की प्रक्रिया को देखने के लिए आते हैं और उसके बाद हर सुबह और शाम आरती करते हैं। इस अनुष्ठान में भाग लेना एक महान तांत्रिक अनुभव माना जाता है, जिसमें कई लोग भाग लेने के लिए आते हैं, जो समारोह को घेरने वाली आध्यात्मिकता को भिगोते हैं। देवी की स्तुति में <a
href="/tag/bhajan/">धार्मिक भजन</a> भी गाए जाते हैं और भक्तों को इस अवसर की भावना को ध्यान में रखते हुए एक धार्मिक उन्माद में प्रेरित किया जाता है।</p><p>लगभग हर हिंदू त्यौहार कालकाजी मंदिर में उत्सव मनाने का आह्वान करता है। हालांकि, दोनों नवरात्रि के अपने-अपने विशेष स्थान हैं। इस मौके पर अच्छा ख़ासा उत्साह रहता है।</p><h2 class="wp-block-heading">कालकाजी मंदिर कैसे पहुँचे (How to Reach Kalkaji Temple)</h2><p><strong>हवाई मार्ग से &#8211;</strong> इंदिरा गाँधी हवाई अड्डा, नई दिल्ली कालकाजी मंदिर से 15 किमी की दूरी पर है। देश के प्रत्येक बड़े हवाई अड्डों से यह कनेक्ट होता है। यहाँ से मंदिर पहुँचने के लिए आप टैक्सी या कैब का इस्तेमाल कर सकते हैं।&nbsp;</p><p><strong>रेल मार्ग द्वारा &#8211; </strong>एच निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन, मंदिर से 4 किमी दूर है। इसलिए, मंदिर इसके सबसे नज़दीक है। स्टेशन से मंदिर पहुँचने के लिए आप रिक्शा, टैक्सी, या कैब का इस्तेमाल कर सकते हैं।&nbsp;</p><p><strong>सड़क मार्ग से &#8211;</strong> यह मंदिर प्रमुख शहरों के सड़क मार्गों द्वारा अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। दिल्ली परिवहन निगम के स्वामित्व वाली बसें शहर में चलती हैं। बसें कई राष्ट्रीय राजमार्गों के माध्यम से पूरे देश के साथ संपर्क भी प्रदान करती हैं। बस द्वारा आप दिल्ली के राजीव चौक या कालकाजी मंदिर मेट्रो स्टेशन तक पहुँच सकते हैं।</p><p><strong>मेट्रो द्वारा &#8211;</strong> दिल्ली में एक अच्छी तरह से सुसज्जित मेट्रो रेल भी है, जो राज्य के लगभग सभी प्रमुख हिस्सों को जोड़ती है। इसलिए, आप मंदिर तक पहुँचने के लिए कहीं से भी निकटतम स्टेशन यानी कालकाजी मेट्रो स्टेशन तक यात्रा कर सकते हैं।</p><h2 class="wp-block-heading">मंदिर में आरती एवं अन्य महत्वपूर्ण समय (Kalkaji Mandir Timings)</h2><p>प्रत्येक दिन आरती के बाद देवी की मूर्ति को दुग्ध स्नान करवाया जाता है। हालांकि, आरती दिन में दो बार की जाती है, एक बार सुबह और दूसरी शाम को। शाम की आरती को तांत्रिक आरती के नाम से भी जाना जाता है।</p><p>हालांकि, आरती के समय में सर्दी और गर्मी के आधार पर बदलाव हो सकता है। साथ ही पुजारी अपनी बारी के अनुसार ही आरती करते हैं।</p><h3 class="wp-block-heading">आरती का समय (Aarti Timing)</h3><p><strong>सर्दियों के मौसम में:</strong></p><ul><li>सुबह 6:00 से 7:30 बजे तक।</li><li>शाम 6:30 बजे से रात 8:00 बजे तक।</li><li>गर्मियों के मौसम में:</li><li>सुबह 5:00 से 6:30 बजे तक।</li><li>शाम 7:00 से 8:30 बजे तक।</li></ul><h3 class="wp-block-heading">विशेष पूजा का समय (Special Worship Timings)</h3><ul><li>गणेश वंदना- प्रातः 5:00 बजे&nbsp;</li><li>शृंगार समय- 5:30 से 6:30&nbsp;</li><li>भोग का समय- 11:45 से 12:15 (मंदिर इस समय बंद रहता है)</li><li>रखरखाव के लिए मंदिर बंद रहता है- 3:00 से 4:00&nbsp;</li><li>गणेश वंदना- शाम 7:00 बजे&nbsp;</li><li>सज्जा प्रसाद- रात 11:30 बजे&nbsp;</li></ul><p>शक्ति के सभी उपासकों को एक बार इस मंदिर में जाकर चमत्कारों और प्रकृति के अनुपम दृश्यों का आनंद ज़रूर उठाना चाहिए। जय कालका माता!</p><h2 class="wp-block-heading">यह भी पढ़ें</h2><ul><li><a
href="/khajrana-ganesh-mandir-indore/">खजराना गणेश मंदिर</a></li><li><a
href="/shri-amarnath-cave-temple/">अमरनाथ मंदिर</a></li><li><a
href="/gangotri-dham-temple-history-story/">गंगोत्री धाम</a></li><li><a
href="/khatu-shyam-ji-temple-time-booking/">खाटू श्याम मंदिर</a></li><li><a
href="/kedarnath-temple-uttarakhand/">केदारनाथ मंदिर</a></li><li><a
href="/prem-mandir-timing-night/">प्रेम मंदिर</a></li><li><a
href="/kela-devi-mandir-krishna-se-sambandh/">कैला देवी मंदिर</a></li><li><a
href="/karni-mata-mandir-chuhe-wala-mandir/">करणी माता मंदिर</a></li><li><a
href="/kamakhya-mandir-devi-ki-yoni-puja-ka-rahasya/">कामाख्या मंदिर</a></li><li><a
href="/12-jyotirling-name-list-hindi/">12 ज्योतिर्लिंग</a></li></ul><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/kalkaji-mandir-timing-delhi/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>प्रेम मंदिर, वृंदावन</title><link>https://hindipath.com/prem-mandir-timing-night/</link> <comments>https://hindipath.com/prem-mandir-timing-night/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[निष्ठा राय]]></dc:creator> <pubDate>Wed, 13 Apr 2022 12:29:56 +0000</pubDate> <category><![CDATA[धर्म]]></category> <category><![CDATA[Krishna]]></category> <category><![CDATA[Mandir]]></category> <category><![CDATA[Radha]]></category> <category><![CDATA[Temple]]></category> <category><![CDATA[Vrindavan]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=12877</guid><description><![CDATA[<p>प्रेम मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित धार्मिक और बेहद ही सुन्दर नगरी वृंदावन का एक हिंदू मंदिर</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/prem-mandir-timing-night/">प्रेम मंदिर, वृंदावन</a> appeared first on <a
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href="/shree-radha-braj-bhasha-naval-singh-bhadauria/">श्री राधा</a>&#8211;<a
href="/krishna-aarti/">कृष्ण</a> और <a
href="/sita-ji-ki-aarti/">श्री सीता</a>&#8211;<a
href="/ram-chalisa/">राम भगवान</a> को समर्पित है। इस मंदिर की देखरेख जगद्गुरु कृपालु परिषद, जो की एक अंतरराष्ट्रीय गैर लाभकारी ट्रस्ट है, के द्वारा की जाती है। इसका निर्माण भी जगद्गुरु कृपालु महाराज द्वारा ही करवाया गया था।</p><p>प्रेम मंदिर के दर्शन आपको भगवद्भक्ति में डुबो देंगे। यह भगवान के प्रेम का एक स्मारक है। यह एक चुंबक की तरह है, जो हर सच्चे साधक और ईश्वर के प्रेम का अनुभव करने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति के दिल और दिमाग को आकर्षित करता है। इस मंदिर ने <a
href="/bhakti-yog-bhakti-ke-lakshan-swami-vivekanand/">भक्ति</a> के सच्चे रूप को दृढ़ता से स्थापित किया है। उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के पवित्र शहर वृंदावन में स्थित यह मंदिर पवित्रता और शांति से आच्छादित है। यह नवनिर्मित मंदिर पूरे बृज क्षेत्र में सबसे सुंदर है और <a
href="/aarti-in-hindi/">आरती</a> के समय यहाँ भक्तों की भीड़ रहती है।</p><iframe
sandbox="allow-popups allow-scripts allow-modals allow-forms allow-same-origin" style="width:120px;height:240px;" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" frameborder="0" src="//ws-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?ServiceVersion=20070822&#038;OneJS=1&#038;Operation=GetAdHtml&#038;MarketPlace=IN&#038;source=ss&#038;ref=as_ss_li_til&#038;ad_type=product_link&#038;tracking_id=hindpath-21&#038;language=en_IN&#038;marketplace=amazon&#038;region=IN&#038;placement=B0CH763N4M&#038;asins=B0CH763N4M&#038;linkId=5f82b427c11fe51719a8cc10d0a61728&#038;show_border=true&#038;link_opens_in_new_window=true"></iframe><p>तो आइये जानते हैं क्यों जगद्गुरु कृपालु जी ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था और साथ ही जानेंगे मंदिर से जुड़े कुछ अन्य प्रमुछ तथ्य।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">प्रेम मंदिर का इतिहास (History of Prem Mandir)</h2><p>प्रेम मंदिर की आधारशिला पांचवे जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने 14 जनवरी 2001 को हज़ारों भक्तों की उपस्थिति में रखी थी। प्रेम मंदिर श्री वृंदावन धाम को समर्पित है और जगद्गुरु कृपालु परिषद (जेकेपी) के प्रयोजन के तहत बनाया गया है। इस संगठन की स्थापना स्वयं जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने की थी।&nbsp;</p><p>मंदिर को बनने में करीब 11 से 12 साल का समय लगा। 15 से 17 फरवरी 2012 तक उद्घाटन समारोह के बाद आखिरकार उसी साल 17 फरवरी को मंदिर को जनता के लिए खोल दिया गया।</p><h2 class="wp-block-heading">क्यों बनवाया कृपालु महाराज ने यह मंदिर (Why Kripalu Maharaj Built This Temple)</h2><p>कृपालु महाराज श्री राधा कृष्ण के परम भक्त थे। उन्होंने प्रेम मंदिर के रूप में पूरी दुनिया को एक अद्भुत तोहफा दिया है। ये मंदिर बनवाने का उनका उद्देश्य, राधा कृष्ण की भक्ति को विश्व भर में जन-जन तक पहुँचाना है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">प्रेम मंदिर का निर्माण (Construction of Prem Mandir)</h2><p>इस भव्य मंदिर की संरचना को पूरा करने के लिए एक हज़ार कारीगरों ने दिन-रात काम किया और निर्माताओं ने 150 करोड़ रुपये ख़र्च किए। प्रेम मंदिर की वास्तुकला बेहद लुभावनी और मंत्रमुग्ध करने वाली है।&nbsp;</p><p>राजस्थानी सोमनाथ गुजराती स्थापत्य शैली में निर्मित, प्रेम मंदिर वृंदावन के बाहरी इलाके में 54 एकड़ की जगह पर स्थित है। पूरी संरचना का निर्माण उच्चतम गुणवत्ता के इटालियन संगमरमर का उपयोग करके किया गया है और यह &#8216;प्राचीन भारतीय कला और वास्तुकला में पुनर्जागरण&#8217; का प्रतिनिधित्व करता है। पूरी संरचना 125x122x115 है।</p><p>पूरा मंदिर सुंदर झूमरों की कोमल रोशनी से खूबसूरती से जगमगाता है और वास्तव में देखने लायक है। प्रेम मंदिर की रोशनी हर पांच मिनट में रंग बदलती है और इसका रणनीतिक रूप से उपयोग किया जाता है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">मंदिर की वास्तुकला (Architecture of Temple)</h2><h3 class="wp-block-heading">प्रवेश (Entrance)</h3><p>जब आप ख़ूबसूरती से बनाये गए प्रवेश द्वार से मंदिर परिसर में प्रवेश करते हैं, तो भव्य मंदिर की उत्कृष्ट सुंदरता, सुंदर उद्यान, और जीवंत डियोराम देखते हैं, जो सभी देखने वाले को अत्यधिक मानसिक शांति प्रदान करते हैं।</p><h3 class="wp-block-heading">मुख्य मंदिर (Main Temple)</h3><p>बेदाग सफेद संगमरमर वाला प्रेम मंदिर विशाल परिसर के केंद्र में मोती की तरह है। मंदिर के सभी प्रवेश द्वारों को ख़ूबसूरतीसे उकेरा गया है। खंभों पर किंकरी सखियों और मंजरी सखियों की सुंदर प्रतिमाएँ बनाई गई हैं, जो श्री राधा कृष्ण की सेवा में लीन हैं। पूरा मंदिर आकर्षक झूमरों से जगमगाता है। सभी दरवाज़े और खिड़कियाँ भी ख़ूबसूरती से बनाई गईं हैं।</p><p>फ़र्श और दीवारों को रंगीन अर्ध-कीमती पत्थरों से सजाया गया है, जिसमें फूलों और कलियों के साथ लताओं को दर्शाया गया है। मुख्य गर्भगृह और उसकी छत पर नक़्क़ाशी असाधारण और आकर्षक है। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज द्वारा लिखित &#8216;प्रेम रास मदिरा&#8217; और &#8216;राधा गोविंद गीत&#8217; से निकाले गए चुनिंदा छंदों के साथ मंदिर की भीतरी दीवारों को अर्ध-कीमती पत्थरों का उपयोग करके जड़ा गया है।</p><h3 class="wp-block-heading">पहली मंज़िल- श्री सीताराम (First Floor- Shri Sita Ram)</h3><p>पहली मंज़िल पर गर्भगृह में जनक नंदिनी <a
href="/sita-ramayan-story-hindi/">श्री सीता जी</a> और <a
href="/raja-dashrath-ki-kahani-in-hindi/">दशरथ</a> नंदन <a
href="/aarti-raghuvar-lala-ki/">श्री रामचंद्र जी</a> के साथ उनके प्रिय भक्त <a
href="/hanuman-sathika-hindi/">श्री हनुमान जी</a> विराजमान हैं। उसी मंज़िल पर श्री गौरांग महाप्रभु के जीवन के कुछ महत्वपूर्ण समय भी देखे जा सकते हैं। पिछले मूल जगद्गुरुओं और ब्रज के रसिक संतों की भव्य प्रतिमा भी यहाँ प्रदर्शित हैं। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने पिछले मूल जगद्गुरुओं की प्रतिमा प्रेम मंदिर में स्थापित कर उन्हें सम्मान एवं श्रद्धांजलि दी है।</p><h2 class="wp-block-heading">भूतल- श्री राधा कृष्ण (Ground Floor- Shri Radha Krishna)</h2><p>भूतल में वृषभानु नंदिनी <a
href="/radha-chalisa/">श्री राधा रानी</a> और <a
href="/krishna-ji-ki-aarti/">नंदनंदन श्री कृष्ण</a> की सुन्दर प्रतिमा विराजमान है। साथ ही आठ महासखी हैं, जो कि उनकी सबसे प्रिय सहयोगी हैं। गर्भगृह के दरवाज़े शुद्ध चंदन के बने हैं। गर्भगृह के द्वार के दोनों ओर अर्द्ध कीमती पत्थरों पर दोहे लिखे हुए हैं। उसी फ़्लोर पर जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की सुंदर प्रतिमा और <a
href="/bhagwat-geeta-ki-aarti/">श्रीमद्भागवत गीता</a> के प्रतिष्ठित वक्ता, श्री सुखदेव परमहंस की सुंदर प्रतिमा है। मंदिर की भीतरी दीवारें श्री राधा और कृष्ण की विभिन्न लीलाओं को दर्शाती हैं।</p><h3 class="wp-block-heading">परिक्रमा (Circumambulation)</h3><iframe
sandbox="allow-popups allow-scripts allow-modals allow-forms allow-same-origin" style="width:120px;height:240px;" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" frameborder="0" src="//ws-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?ServiceVersion=20070822&#038;OneJS=1&#038;Operation=GetAdHtml&#038;MarketPlace=IN&#038;source=ss&#038;ref=as_ss_li_til&#038;ad_type=product_link&#038;tracking_id=hindpath-21&#038;language=en_IN&#038;marketplace=amazon&#038;region=IN&#038;placement=B0BPJL3SLH&#038;asins=B0BPJL3SLH&#038;linkId=50de245731064d9a1cf98f093c73e849&#038;show_border=true&#038;link_opens_in_new_window=true"></iframe><p>परिक्रमा मार्ग, जो 40 फीट चौड़ा है, मंदिर के मुख्य द्वार से शुरू होता है। इस मार्ग में ख़ूबसूरत खंभे, 8 जालीदार खिड़कियाँ, भूतल पर 48 पैनल और पहली मंज़िल पर 32 पैनल प्रदर्शित हैं। इन सभी 80 पैनलों में, श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित श्री कृष्ण की विभिन्न लीलाओं को कालक्रम के अनुसार त्रि-आयामी स्वरूपों में प्रदर्शित किया गया है।</p><h2 class="wp-block-heading">दर्शन एवं आरती का समय (Timings of Aarti and Darshan)</h2><figure
class="wp-block-table"><table><tbody><tr><td><strong>समय&nbsp;</strong></td><td><strong>दर्शन एवं आरती&nbsp;</strong></td></tr><tr><td>5:00&nbsp;</td><td>आरती और परिक्रमा&nbsp;</td></tr><tr><td>6:30&nbsp;</td><td>भोग, द्वार बंद&nbsp;</td></tr><tr><td>8:30&nbsp;</td><td>दर्शन और आरती&nbsp;</td></tr><tr><td>11:30</td><td>भोग&nbsp;</td></tr><tr><td>12:00</td><td>शयन आरती, द्वार बंद&nbsp;</td></tr><tr><td>16:30</td><td>आरती और दर्शन&nbsp;</td></tr><tr><td>17:30</td><td>भोग&nbsp;</td></tr><tr><td>19:00</td><td>परिक्रमा&nbsp;</td></tr><tr><td>20:10</td><td>शयन आरती&nbsp;</td></tr><tr><td>20:30</td><td>द्वार बंद&nbsp;</td></tr></tbody></table></figure><h2 class="wp-block-heading">प्रेम मंदिर के दर्शन का उचित समय (Ideal Time to Visit Prem Mandir)</h2><p>पवित्र नगरी वृन्दावन में बसे प्रेम मंदिर के दर्शन का सबसे उचित समय फरवरी से अप्रैल और अक्टूबर से दिसंबर महीने के दौरान रहता है। इस समय में यहाँ का मौसम बहुत ही सुहावना एवं प्रकृति के अनुकूल होता है।</p><p></p><h2 class="wp-block-heading">कैसे पहुँचे प्रेम मंदिर (How to Reach Prem Mandir)</h2><p>प्रेम मंदिर की यात्रा के लिए आप अपनी आवश्यकता के अनुसार हवाई, रेल, या सड़क मार्ग का चुनाव कर सकते हैं।&nbsp;</p><p><strong>हवाई मार्ग से:</strong> अगर आप वायु मार्ग से वृन्दावन पहुँचना चाहते हैं, तो यहाँ का सबसे निकटतम हवाई अड्डा आगरा है। ये वृन्दावन से 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ से मंदिर पहुँचने के लिए आपको बस, टैक्सी, या&nbsp; कैब उपलब्ध हो जाएगी।&nbsp;</p><p><strong>रेल मार्ग से:</strong> यहाँ से निकटतम रेलवे जंक्शन मथुरा है। इस जंक्शन से मंदिर की दूरी 8 किलोमीटर की है। स्टेशन से मंदिर जाने के लिया आपको बाहर ही बस, टैक्सी, कैब, या ऑटो-रिक्शा उपलब्ध हो जायेंगे।&nbsp;</p><p><strong>सड़क मार्ग से: </strong>सड़क मार्ग से प्रेम मंदिर की यात्रा के लिए आप अपनी प्राइवेट गाड़ी, बस, या किसी भी व्हीकल से आसानी से पहुँच सकते हैं। यह मंदिर आसपास के मुख्य शहरों से कनेक्ट होता है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">मंदिर में अन्य आकर्षण के केंद्र (Other Attractions in The Temple)</h2><p>प्रेम मंदिर ईश्वरीय प्रेम के उत्सव का प्रतीक है। श्री राधे-कृष्ण और श्री सीता-राम के शाश्वत प्रेम की पूजा करने के लिए लाखों भक्त इस भव्य मंदिर में आते हैं।</p><p>मंदिर की कुछ प्रमुख विशेषताएँ जिनका आप आनंद ले सकते हैं, वे इस प्रकार हैं:</p><p>1. संगीतमय फव्वारा (Musical Fountain): मंदिर की सबसे प्रभावशाली विशेषताओं में से एक म्यूज़िकल फाउंटेन शो है, जो हर शाम 7.30 बजे से 8 बजे तक और सर्दियों के दौरान शाम 7.00 बजे से 7.30 बजे तक आयोजित किया जाता है। यह हर दिन हज़ारों लोगों को आकर्षित करता है।</p><p>2. ईवनिंग लाईटिंग (Evening Lighting): शाम के समय शानदार लाईटिंग से मंदिर की शोभा निखरती है। <a
href="/surya-dev-mantra-katha-upay/">सूर्यास्त</a> के बाद, पूरा मंदिर जीवंत रंगों में जगमगाता है। चाहे बच्चे हों या बूढ़े, सभी को यह दृश्य लुभाता है। </p><p>3. जीवन आकार मॉडल (Life Size Models): कोई भी <a
href="/giriraj-chalisa/">भगवान कृष्ण</a> की विभिन्न लीलाओं के जीवन आकार के चित्रण का आनंद ले सकता है। मंदिर परिसर, उनकी झूलन लीला, गोवर्धन लीला, रास लीला और कालिया नाग लीला का प्रतिनिधित्व करता है।</p><p>4. त्योहार (Festivals): <a
href="/janmashtami-puja-vidhi/">श्री कृष्ण जन्माष्टमी</a> और श्री राधाष्टमी के त्योहार हर साल प्रेम मंदिर में बहुत उत्साह के साथ मनाए जाते हैं। इन उत्सवों के दौरान मंदिर को बहुत अच्छे से सजाया जाता है और देश भर से लोग भव्य समारोह में भाग लेने के लिए यहाँ आते हैं।</p><p>5. राजसी वास्तुकला (Majestic Architecture): प्रेम मंदिर विशिष्ट कारीगरी के सर्वोत्तम उदाहरणों में से एक है। जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की दृष्टि को वास्तविकता में लाने के लिए लगभग 1000 कारीगरों के प्रयासों के साथ 11 साल का समय लगा। इस मंदिर ने अलौकिक प्रेम के शुद्धतम रूप को प्रकट, पुनर्परिभाषित और मज़बूती से स्थापित किया है।</p><p>भक्त मंदिर के शांतिपूर्ण वातावरण में <a
href="/ghanshyam-ki-aankhein-braj-bhasha-naval-singh-bhadauria/">भगवान कृष्ण</a> और श्री राधा रानी का ध्यान करते हुए एकांत में समय बिताना पसंद करते हैं।</p><h2 class="wp-block-heading">जगद्गुरु कृपालु चिकित्सालय (Jagadguru Kripalu Hospital)</h2><p>प्रेम मंदिर परिसर के एक हिस्से में स्थित ब्रजवासियों के लिए एक अस्पताल है, जिसका नाम जगद्गुरु कृपालु चिकित्सालय है। चिकित्सा के लिए आस-पास के गांवों के बहुत से भक्त और स्थानीय लोग भी यहाँ आते हैं। यहाँ पर लोगों का या तो मुफ़्त में या तो बहुत कम पैसों में इलाज़ हो जाता है। मुंबई और नई दिल्ली जैसे शहरों के बहुत सारे अच्छे डॉक्टर भी इस अस्पताल में स्वयंसेवा करते हैं।</p><h2 class="wp-block-heading">प्रेम मंदिर जाते समय ध्यान रखने योग्य बातें (Things to Remember While Visiting Prem Mandir)</h2><ul><li>मंदिर की पवित्रता और मर्यादा बनाए रखें।</li><li>कृपया अपने जूते बाहर न छोड़ें, मंदिर परिसर के भीतर एक निःशुल्क सेवा उपलब्ध है।</li><li>दोपहिया और चार पहिया वाहनों के लिए पार्किंग की सुविधा उपलब्ध है। यदि आपके साथ कोई बुज़ुर्ग यात्रा कर रहे हैं, तो यह सलाह दी जाती है कि अपना वाहन पार्क करने से पहले उन्हें प्रवेश द्वार पर छोड़ दें।</li><li>कृपया अपने आसपास गंदगी फैलाने से बचें।</li><li>मंदिर परिसर में साफ पानी के डिस्पेंसर आसानी से मिल जाते हैं।</li><li>आप कैंटीन में भी ताज़ा जलपान प्राप्त कर सकते हैं।</li></ul><p>ब्रजभूमि में स्थित प्रेम मंदिर में एक शांत और ईश्वरीय आभा है। प्रेम मंदिर की यात्रा हर किसी के दिल और दिमाग को भगवान कृष्ण और राधा रानी के लिए प्यार से भर देती है। यह नवनिर्मित मंदिर वृंदावन के सबसे ख़ूबसूरत और राजसी मंदिरों में से एक है और आने वाली पीढ़ियों के लिए भगवान कृष्ण की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है। इस स्थान के आस-पास रहस्यवाद और आध्यात्मिक ग़र्मजोशी इस दिव्य प्रेम के निवास पर जाने वाले किसी को भी प्रभावित करने में कभी विफल नहीं होती है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading"><strong>यह भी पढ़ें</strong></h2><ul><li><a
href="/khajrana-ganesh-mandir-indore/">खजराना गणेश मंदिर</a></li><li><a
href="/shri-amarnath-cave-temple/">अमरनाथ मंदिर</a></li><li><a
href="/gangotri-dham-temple-history-story/">गंगोत्री धाम</a></li><li><a
href="/khatu-shyam-ji-temple-time-booking/">खाटू श्याम मंदिर</a></li><li><a
href="/kalkaji-mandir-timing-delhi/">कालकाजी मंदिर</a></li><li><a
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href="/karni-mata-mandir-chuhe-wala-mandir/">करणी माता मंदिर</a></li><li><a
href="/kamakhya-mandir-devi-ki-yoni-puja-ka-rahasya/">कामाख्या मंदिर</a></li><li><a
href="/12-jyotirling-name-list-hindi/">12 ज्योतिर्लिंग</a></li></ul><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/prem-mandir-timing-night/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>कैला देवी मंदिर – जानें केला माता का कृष्ण से संबंध</title><link>https://hindipath.com/kela-devi-mandir-krishna-se-sambandh/</link> <comments>https://hindipath.com/kela-devi-mandir-krishna-se-sambandh/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[निष्ठा राय]]></dc:creator> <pubDate>Tue, 12 Apr 2022 12:43:00 +0000</pubDate> <category><![CDATA[धर्म]]></category> <category><![CDATA[Kaila Devi]]></category> <category><![CDATA[Kela Devi]]></category> <category><![CDATA[Mandir]]></category> <category><![CDATA[Temple]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=12868</guid><description><![CDATA[<p>कैला देवी मंदिर राजस्थान राज्य का सुप्रसिद्ध मंदिर है। यह हिंदुओं का धार्मिक मंदिर है। भारतवर्ष के मुख्य शक्तिपीठों में</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/kela-devi-mandir-krishna-se-sambandh/">कैला देवी मंदिर – जानें केला माता का कृष्ण से संबंध</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>कैला देवी मंदिर राजस्थान राज्य का सुप्रसिद्ध मंदिर है। यह हिंदुओं का धार्मिक मंदिर है। भारतवर्ष के मुख्य शक्तिपीठों में इसकी गिनती की जाती है। इस मंदिर के चमत्कारों, <a
href="/category/itihaas-history/">इतिहास</a>, और रहस्यों की अलग ही कथाएं प्रचलित है। वर्ष के बारह महीने ही यहाँ भक्तों का जमावड़ा लगा रहता है। परन्तु चैत्र मास के नवरात्रों में यहां एक विशाल जन सैलाब उमड़ पड़ता है। ऐसा माना जाता है कि जो भी भक्त इस मंदिर में कैला देवी के दर्शन करने आता है, वह कभी खाली हाथ नहीं लौटता।</p><p>भारत में <a
href="/kaila-devi-chalisa/">कैला देवी</a> के 2 बड़े मंदिर हैं। उनमें से राजस्थान स्थित यह मंदिर अधिक ख्याति प्राप्त किये हुए&nbsp; है। यह मंदिर उत्तर भारत के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। कैला देवी का इतिहास लगभग 100 वर्ष पुराना है। यह मंदिर कैला माता को समर्पित हैं, जिनका सम्बन्ध <a
href="/krishna-aarti/">भगवान कृष्ण</a> से बताया जाता है। तो इस ब्लॉग के माध्यम से जानते हैं, कैला माता का <a
href="/santan-gopal-stotra-hindi-pdf/">श्री कृष्ण</a> से क्या सम्बन्ध है और उसके पीछे की कहानी। साथ ही हम इस मंदिर से जुड़े अन्य तथ्यों से भी आपको अवगत कराएंगे।</p><p><strong>यह भी पढ़ें &#8211;</strong> <a
href="/tantroktam-devi-suktam-lyrics/">तन्त्रोक्तं देवी सूक्तम्</a></p><h2 class="wp-block-heading">कैला देवी मंदिर की भौगोलिक स्थिति (Geographical Location of Kaila Devi Temple)</h2><p>केला देवी का मंदिर राजस्थान राज्य के करौली जिला मुख्यालय के अंतर्गत आता है। करौली से दक्षिण दिशा की ओर 24 किलोमीटर दूर कैला ग्राम में यह मंदिर स्थित है। कैला ग्राम उत्तर पूर्वी राजस्थान में चम्बल नदी के बीहड़ों में बसा हुआ है। यह मंदिर त्रिकूट पर्वत शृंखला पर स्थित है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">केला देवी कथा (Whole Story of Goddess Kaila)</h2><p>कैला माता को <a
href="https://hindipath.com/navdurga-hindi/">माँ दुर्गा</a> का ही स्वरूप माना जाता है। पूरे राजस्थान में यही एक ऐसा मंदिर है, जहाँ पशुओं की बलि नहीं दी जाती है। आइए, जानते हैं कैला देवी का इतिहास विस्तार से–</p><p>कैला देवी के बारे में यह पौराणिक कथा प्रचलित है कि: एक बार त्रिकूट पर्वत के घने जंगलों में नरकासुर नामक राक्षस का आतंक फैला हुआ था। राक्षस के आतंक से सामान्य जनजीवन को बचाने के लिए केदारगिरी नाम के साधु ने माँ दुर्गा की तपस्या की। देवी ने केदारगिरी की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे मनचाहा वरदान मांगने के लिए कहा। तब उन्होंने माता से दुष्ट नरकासुर राक्षस से सभी को मुक्ति दिलाने की याचना की। तत्पश्चात माँ ने कैला देवी के रूप में अवतार लेकर उस राक्षस का वध कर दिया। आज भी कैला देवी मंदिर से लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर कालीसिल नदी के तट पर माता के पदचिन्ह विराजमान हैं।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">कैला देवी का भगवान कृष्ण से सम्बन्ध (Relationship of Kaila Devi With Lord Shri Krishna)</h2><p>कैला देवी का इतिहास व पौराणिक कथाएँ बताती हैं कि केला देवी को यदुवंशी <a
href="/laddu-gopal-ki-aarti/">भगवान श्री कृष्ण</a> की बहन कहा जाता है। जब नारद मुनि ने भविष्यवाणी की थी कि देवकी की आठवीं संतान ही कंस की मृत्यु का कारण बनेगी, तो भयवश कंस ने अपनी बहन देवकी और बहनोई वसुदेव जी को बंदी बना लिया था। तत्पश्चात वह देवकी के सभी संतानों को एक के बाद एक मारता ही जा रहा था।&nbsp;&nbsp;</p><p>जब <a
href="/vishnu-bhagwan-ki-aarti/">भगवान श्री हरी विष्णु ने श्री कृष्ण</a> के अवतार में देवकी की आठवीं संतान के रूप में जन्म लिया, उसी वक़्त गोकुल में नन्द बाबा और यशोदा के घर बेटी ने जन्म लिया था। यह विधि का विधान था कि वसुदेव जी कृष्ण को गोकुल में छोड़कर यशोदा माँ की बेटी को मथुरा ले आये थे। यह बेटी कोई और नहीं, बल्कि देवी योगमाया थीं।&nbsp;</p><p>जब कंस योगमाया को मारने लगा तो वे छुटक कर आकाश में चली गईं। <a
href="/shri-bhagwat-bhagwan-ki-aarti/">भागवत</a> कथा के अनुसार वो विंध्य पर्वत पर विंध्यवासिनी के रूप में निवास करने लगीं। बल्कि यहाँ के लोगों का मानना है कि कंस के हाथ से छूटकर वो देवी राजस्थान के त्रिकूट पर्वत पर कैला देवी के रूप में विराजमान हो गईं। लोग उन्हें यदुवंशी मानकर और कृष्ण की बहन के रूप में पूजते हैं।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">मंदिर का निर्माण एवं वास्तुकला (Construction and Architecture of Temple)</h2><p>ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण मध्यकाल में राजा भोमपाल ने करवाया था। राजा भोमपाल जो की त्रिकूट पर्वत पर रहते थे, ने कैला देवी मंदिर का निर्माण 1600 ईसवी में करवाया था।&nbsp;</p><p>मंदिर का निर्माण नागर शैली में हुआ है। राजस्थान के करौली ज़िले में ही भारी मात्रा में पाए जाने वाले लाल पत्थर का इस्तेमाल मंदिर बनाने में किया गया है। लाल रंग से निर्मित होने के कारण यह मंदिर हलके लाल रंग का दिखाई देता है। रात में लाइटिंग की वजह से मंदिर का दृश्य और भी लुभावना होता है।</p><p>गर्भगृह में बाईं तरफ कैला माता और दाईं तरफ <a
href="/chamunda-devi-chalisa/">चामुंडा देवी</a> की मूर्ति विराजमान है। दोनों मूर्तियां सोने की छत्र के नीचे स्थापित हैं।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">माँ की मूर्ति का मुख टेढ़ा होने का रहस्य (The Secret of Crooked Face of Devi)</h2><p>जैसा कि हमने बताया की मंदिर में मुख्य दो मूर्तियां मौजूद हैं। उनमें से कैला देवी का मुँह हल्का सा तिरछा है। उनके टेढ़े मुँह का यह प्रचलित रहस्य है कि–</p><p>एक बार माता का एक परम भक्त देवी के दर्शन के लिए आया था। वापस जाते समय उसने माँ से वादा किया था कि वो जल्द ही देवी के दर्शन करने फिर से ज़रूर आएगा।&nbsp;</p><p>किसी ना किसी वजह से वह भक्त माता के दर्शन के लिए दोबारा नहीं आ सका। ऐसा माना जाता है कि उस भक्त के इंतज़ार में ही माँ का मुख आज भी टेढ़ा है। उनका तिरछा मुँह इस बात का सूचक है कि माता अपने उसी भक्त के वापस आने का इंतज़ार कर रहीं हैं।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">चमत्कारिक है कालीसिल नदी (Miraculous Kalisil River)</h2><p>देवी के मंदिर के पास से ही कालीसिल नदी बह रही है। यह नदी अपने चमत्कारों के लिए विश्व भर में ख्याति प्राप्त किये हुए है। मान्यता अनुसार जो भी भक्त कैला देवी मंदिर के दर्शन करने आता है, वह सबसे पहले कालीसिल नदी में स्नान करके शुद्ध होता है, तभी मंदिर में प्रवेश करता है। ऐसा करने से ही उसका दर्शन पूर्ण माना जाता है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">बच्चों का मुंडन संस्कार करवाने की परंपरा (Tradition of Mundan Ritual of Children)</h2><p>कैला देवी यादव वंश की कुलदेवी मानी जाती हैं। यहां के लोग इस मंदिर में अपने बच्चों का पहला मुंडन संस्कार करवाने आते हैं। यह उनके लिए शुभता का प्रतीक होता है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">त्यौहार और मेले (Festivals and Fairs)</h2><p>कैला देवी मंदिर समिति की ओर से प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल पक्ष की नवरात्रि की अष्टमी को मेला लगाया जाता है। इस मेले को लक्खी मेला बोला जाता है। मेले का आयोजन 15 दिनों के लिए किया जाता है।&nbsp;</p><p>इस समय लाखों की संख्या में भक्तगण माता के दर्शन करने और मेले का आनंद उठाने आते हैं। राजस्थान समेत पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों से भी लोग मेले और माता के दर्शन करने आते हैं।&nbsp;</p><p>कहते हैं कि जो भी भक्त यहाँ पर आता है, वह समीप में स्थित कालीसिल नदी में स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहन कर, देवी के दर्शन करके ही मेले का लुत्फ़ उठाता है।&nbsp;</p><p>दूर-दूर से लोग अपनी मन्नतें लेकर मेले में आते हैं। लोग अपने बच्चों का मुंडन करवाने भी यहाँ पर आते हैं। इस मेले में मीणा और गुर्जर जाति के लोग लांगुरिया/ घुटकन नृत्य करते हैं। <a
href="https://hindipath.com/kela-maiya-lokgeet-braj-bhasha-naval-singh-bhadauria/">लोकगीत</a> का आयोजन होता है। राजस्थान की ऐतिहासिक चीज़ों की बिक्री इस मेले में होती है और कई तरह के स्टॉल लोगों के द्वारा लगाए जाते हैं।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">कैसे पहुंचे कैला देवी मंदिर (How to Reach Kaila Devi Temple)</h2><p>कैला देवी मंदिर तक पहुँचने के लिए आप अपनी आवश्यकता अनुसार हवाई, रेल, या सड़क मार्ग का चयन कर सकते हैं।&nbsp;&nbsp;</p><p>हवाई मार्ग से मंदिर पहुँचने के लिए आप नज़दीकी हवाई अड्डा जयपुर तक आ सकते हैं। ये देश के सभी बड़े हवाई अड्डों से कनेक्ट होता है। इस एयरपोर्ट से मंदिर की दूरी लगभग 165 किलोमीटर है, जिसे तय करने के लिए आप बस, टैक्सी, या कैब का इस्तेमाल कर सकते हैं।&nbsp;</p><p>अगर आप ट्रैन के सफर का लुत्फ़ उठाते हुए मंदिर पहुँचना चाहते हैं तो वहाँ से निकटतम रेलवे स्टेशन नारायणपुर तटवारा है। कथित रेलवे स्टेशन की मंदिर से दूरी लगभग 37 किलोमीटर की है। स्टेशन से मंदिर पहुँचने के लिए आपको बस, कैब, या टैक्सी आसानी से उपलब्ध हो जाएगी।&nbsp;</p><p>वहीं अगर आप बस से मंदिर पहुँचने की फ़िराक में हैं तो कैला देवी मंदिर के मोड़ पर ही नज़दीकी बस स्टैंड स्थित है। आप वहाँ से पद यात्रा करके ही मंदिर पहुंच सकते हैं।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">दर्शन एवं आरती का समय (Darshan and Aarti Timings)</h2><p>माता के भक्तों के लिए यह मंदिर प्रातः 4 बजे से रात के 9 बजे तक खुला रहता है। मंदिर में <a
href="/kela-maiya-ki-aarti/">केला मैया की आरती </a>का समय इस प्रकार से है:</p><ul><li>प्रातः आरती- सुबह 7 बजे&nbsp;</li><li>दोपहर आरती- 12 बजे&nbsp;</li><li>सर्दी सायं आरती- शाम 6 बजे&nbsp;</li><li>गर्मी सायं आरती- शाम 7 बजे&nbsp;</li><li>सर्दी शयन आरती- रात 8 बजे&nbsp;</li><li>गर्मी शयन आरती- रात 9 बजे&nbsp;</li></ul><h2 class="wp-block-heading">कैला देवी मंदिर के दर्शन का उचित समय (Best Time to Visit Kaila Devi Temple)</h2><p>वैसे तो माता के दर्शन के लिए उचित और अनुचित नहीं होता है। जब भी माँ अपने भक्तों को पुकारती हैं, भक्त खुद ब खुद उनके दर्शन को चले जाते हैं। परन्तु अगर आप राजस्थान के करौली ज़िले में स्थित कैला देवी मंदिर के दर्शन की बात करें, तो इसके लिए अक्टूबर महीने से मार्च तक का समय उचित माना जाता है। क्यूँकि बाकी के समय में यहाँ भीषण गर्मी होती है, जन जीवन का बुरा हाल हो जाता है। अक्टूबर से मार्च महीने के बीच यहाँ का वातावरण और मौसम अत्यंत सुहावना होता है।&nbsp;</p><p>शक्ति के सभी उपासकों को एक बार इस मंदिर में जाकर चमत्कारों और प्रकृति के अनुपम दृश्यों का आनंद ज़रूर उठाना चाहिए। जय कैला माता!</p><h2 class="wp-block-heading">यह भी पढ़ें</h2><ul><li><a
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href="/12-jyotirling-name-list-hindi/">12 ज्योतिर्लिंग</a></li></ul><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=12710</guid><description><![CDATA[<p>करणी माता मंदिर एक सिद्ध मंदिर है। यूँ तो संपूर्ण भारत अपने विविध मंदिरों एवं उनकी ऐतिहासिकता के लिए सदैव</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/karni-mata-mandir-chuhe-wala-mandir/">करणी माता मंदिर &#8211; चूहों वाला मंदिर</a> appeared first on <a
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href="/tag/mandir-2/">विविध मंदिरों</a> एवं उनकी <a
href="/category/itihaas-history/">ऐतिहासिकता</a> के लिए सदैव ही चर्चा में रहता है। इन मंदिरों के रहस्यों की भी विविध गाथाएँ प्रसिद्ध हैं। देश-विदेश के वैज्ञानिक आदि इन मंदिरों के रहस्यमय चमत्कारों से अवगत होने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं। दुनिया भर के लोगों का जमावड़ा यहाँ दिन-प्रतिदिन लगा ही रहता है।&nbsp;</p><p>इसी क्रम में आज हम बात करेंगे राजस्थान के प्रसिद्ध करणी माता मंदिर की। इस मंदिर के रहस्यों और चमत्कारों की भी अलग ही कहानी प्रचलित है। क्या आप जानते हैं यह मंदिर यहाँ पर मौजूद चूहों के लिए अधिक प्रसिद्ध है? मान्यता है कि यहाँ पाए जाने वाले मूषक भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। क्या आप भी जानना चाहेंगे इन चूहों के पीछे के रहस्य की कहानी? तो आइये जानते हैं विस्तार में इस मंदिर से जुड़े मूषकों के रहस्य और अन्य तथ्यों के बारे में।</p><p><strong>यह भी</strong> <strong>पढ़ें –</strong> <a
href="/tantroktam-devi-suktam-lyrics/">तन्त्रोक्तं देवी सूक्तम्</a></p><h2 class="wp-block-heading">करणी माता मंदिर की विशेषता (Importance of Karni Mata Temple)</h2><p>करणी माता का मंदिर राजस्थान के बीकानेर ज़िले से लगभग 30 कि. मी. दूर देशनोक ज़िले में स्थित है। यह मंदिर करणी देवी को समर्पित है। इसे “चूहों का मंदिर” भी कहा जाता है। दुनिया भर में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ आपको मंदिर के प्रांगण में बहुत अधिक तादाद में चूहे नज़र आएंगे।&nbsp;</p><p>देश-विदेश से श्रद्धालुगण यहाँ माता के दर्शन करने और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु आते हैं। मंदिर में दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं को अपने पैरों को घसीटकर चलने का परामर्श दिया जाता है ताकि कोई भी चूहा पैरों के नीचे ना आये। इस मंदिर में किसी भी मूषक का पैरों के नीचे आना शुभ नहीं माना जाता है।&nbsp;</p><p>मान्यता अनुसार करणी माता को बीकानेर राजघराने की कुलदेवी माना जाता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इन्हीं के आशीर्वाद के फलस्वरूप&nbsp; जोधपुर और बीकानेर राजघरानों की स्थापना हुई थी।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">जानें मंदिर में चूहों के पीछे की कहानी (Story of Mice In The Temple)</h2><p>वर्तमान समय में इस मंदिर में 25,000 से 30,000 चूहे हैं जो <a
href="https://hindipath.com/karni-mata-ki-aarti/">करणी माता</a> की संतान माने जाते हैं। इन चूहों को “काबा” कहा जाता है। मंदिर में बड़ी संख्या में चूहों की मौजूदगी के पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है, जो इस प्रकार है–&nbsp;</p><p>करणी माता का लक्ष्मण नामक एक पुत्र था। एक बार लक्ष्मण कोलायत तहसील में स्थित कपिल सरोवर में पानी पी रहा था। तब पैर फिसलकर डूबने की वजह से उसकी मृत्यु हो गई।&nbsp;</p><p>माता करणी पुत्र को जीवित करने की विनती करने <a
href="/yamraj-ki-aarti/">यमराज</a> के पास गईं। <a
href="/dharmraj-ji-ki-aarti/">यम देव</a> को मृत इंसान को पुनर्जीवित करने की अनुमति ना होने की वजह से उन्होंने करणी जी के पुत्र को चूहे के रूप में जीवनदान दिया। इसलिए आज भी ये चूहे उनके पुत्र के वारिस के रूप में इस मंदिर में चहलक़दमी करते हैं।&nbsp;</p><p>मंदिर परिसर में काले और सफ़ेद दोनों रंग के चूहे हैं। मान्यता है की जो भी व्यक्ति सफ़ेद मूषक के दर्शन कर लेता है उसकी सभी मनोकामनाएँ अवश्य पूर्ण होती हैं। आरती के वक़्त इन चूहों को भोग लगाया जाता है और वही प्रसाद मंदिर में आने वाले भक्तों में वितरित किया जाता है।&nbsp;</p><p>चूहों को किसी भी प्रकार के नुक़सान या दूसरे जानवरों के घात से बचाने के लिए मंदिर परिसर के चारों तरफ़ बारीक़ जाली लगाई गई है, ताकि कोई भी जानवर मंदिर में प्रवेश ना कर पाए।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">माता करणी की कहानी (Story of Karni Mata)</h2><p>स्थानीय लोगों में मान्यता है कि करणी माता साक्षात माँ जगदम्बा का अवतार हैं।&nbsp; इनका जन्म 1387 ई. में जोधपुर ज़िले के सुआप में मेहाजी किनिया के घर में हुआ था। उन्हें रिधुबाई नाम दिया गया। जब वो विवाह योग्य हो गईं तो साथिया गाँव के किपोजी चारण से उनका विवाह करवाया गया।&nbsp;</p><p>किन्तु जीवन में उतार-चढ़ाव के चलते उन्होंने सांसारिक जीवन को त्याग कर सेवा और <a
href="/bhakti-yog-swami-vivekananda-hindi/">भक्ति का मार्ग</a> अपनाने का फ़ैसला कर लिया। इसी के चलते उन्होंने अपनी छोटी बहन का विवाह अपने पति से करवा दिया और स्वयं का जीवन ईश्वर भक्ति और जनहित के लिए समर्पित कर दिया। जन कल्याण के उद्देश्य से किए हुए चमत्कारों की वजह से लोग उन्हें करणी माता कहकर पुकारने लगे। तत्कालीन जांगल प्रदेश को उन्होंने अपनी कार्यस्थली बना लिया था।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">चूहों वाला मंदिर और उसका निर्माण (Construction of Temple)</h2><p>स्थानीय लोगों द्वारा बताया जाता है कि माता करणी वहाँ मौजूद एक गुफा में रहकर ईश्वर भक्ति में लीन हो गई थीं। मान्यता है कि 15वीं शताब्दी में 151 वर्ष की उम्र में देवी करणी एकाएक विलुप्त हो गईं। जिस गुफा में करणी माता ईश्वर की आराधना किया करती थीं, वह आज भी मंदिर परिसर में उपस्थित है। करणी जी की अंतिम इच्छा थी कि उनके देह त्याग के पश्चात् उसी गुफा में उनकी मूर्ति की स्थापना करवाई जाये। उनकी इच्छा का पालन किया गया।&nbsp;</p><p>माता करणी देवी मंदिर का निर्माण 20वीं शताब्दी में बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह द्वारा करवाया गया था। 1999 में हैदराबाद के कुंदन लाल वर्मा द्वारा मंदिर का विस्तार करवाया गया था।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">मंदिर की वास्तुकला (Architecture of Temple)</h2><p>मंदिर के इतिहास और चमत्कारों के अतिरिक्त इसकी वास्तुकला भी पर्यटकों को आकर्षित करती है। इसकी संरचना राजपूत और मुग़ल शैली को ध्यान में रखते हुए की गई है। बलुआ पत्थर द्वारा मंदिर का निर्माण कार्य किया गया है। मंदिर परिसर में चारों तरफ़ सुंदर नक़्क़ाशी की हुई दीवारें, गलियारे और कई द्वारों का निर्माण हुआ है। मुख्य द्वार को संगमरमर की नक़्क़ाशियों से सजाया गया है। मंदिर के द्वारों में देवी की विभिन्न किंवदंतियों को दर्शाने वाले पैनल हैं।&nbsp;</p><p>गर्भगृह में माता की प्रतिमा स्थापित है जिसमें उन्होंने हाथों में त्रिशूल पकड़ा हुआ है। उसी के साथ गर्भगृह में कुछ विशेष आकर्षण के केंद्र हैं जैसे सोने का छत्र, चांदी का किवाड़ और चांदी की एक बड़ी परात जिसमें चूहों को भोग लगाया जाता है।</p><h2 class="wp-block-heading">मंदिर के चमत्कारी चूहे (Miraculous Mice of the Temple)</h2><p>ये तो हम पहले ही समझ चुके हैं कि इस मंदिर में हज़ारों की तादाद में चूहे हैं, जिस वजह से इसे चूहों वाला मंदिर या मूषक मंदिर भी कहा जाता है। परन्तु इसे साक्षात् माँ आदिशक्ति का अवतार मानी जाने वाली माता करणी का चमत्कार बोलें या चूहों की दिव्य शक्ति कि इतने चूहों के बावजूद भी मंदिर प्रांगण से बिल्कुल बदबू नहीं आती है।&nbsp;</p><p>और तो और चूहे और उनके द्वारा झूठा किया हुआ भोजन आम जनता के लिए ख़तरनाक माना जाता है। परंतु यहाँ पर भक्तजनों को जो प्रसाद दिया जाता है, वह पहले इन चूहों को भोग लगाया जाता है। फिर भी यहाँ से प्रसाद ग्रहण करने वाले भक्त को कभी भी प्लेग या चूहे द्वारा होने वाली अन्य बीमारी का सामना नहीं करना पड़ा है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">करणी माता मेला (Karni Mata Fair)</h2><p>करणी माता मेला राजस्थान के देशनोक ज़िले में प्रतिवर्ष दो बार लगता है।</p><ul><li>पहला और सबसे बड़ा मेला मार्च-अप्रैल के महीने में चैत्र शुक्ल पक्ष की <a
href="/navdurga-hindi/">नवरात्रि</a> के समय लगता है। यह मेला प्रतिपदा तिथि से शुरू होकर दशमी तिथि तक चलता है।</li></ul><ul><li>दूसरा मेला सितंबर-अक्टूबर के महीने में शरद नवरात्रि के समय ही लगता है। यह मेला आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से दशमी तिथि तक चलता है।</li></ul><p>नवरात्री के दौरान हज़ारों श्रद्धालुगण पैदल ही मंदिर के दर्शन करने आते हैं।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">करणी माता मंदिर में आरती का समय (Aarti Timings at Karni Mata Temple)</h2><p>यह मंदिर सुबह 5 बजे खुलता है और भक्तों को रात 10 बजे तक प्रवेश की अनुमति रहती है। सुबह के समय <a
href="/karni-mata-ki-aarti/">करणी माता की आरती</a> हर रोज़ प्रातः 5 बजे और शाम की आरती हर रोज़ सायं 7 बजे होती है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">मंदिर कैसे पहुंचे (How to Reach This Temple)</h2><p>करणी माता मंदिर पहुंचने के लिए आप अपनी आवश्यकता अनुसार फ़्लाइट, ट्रेन, या बस का चुनाव कर सकते हैं।&nbsp;</p><p>अगर आप हवाई मार्ग द्वारा इस मंदिर तक पहुँचना चाहते हैं तो आपको नज़दीकी रेलवे स्टेशन जोधपुर पहुँचना पड़ेगा। यह मंदिर से लगभग 220 कि. मी. की दूरी पर स्थित है। जोधपुर हवाई अड्डे की गिनती देश के बड़े हवाई अड्डों में आती है और देश के किसी भी कोने से आप यहाँ पहुँच सकते हैं। हवाई अड्डे से मंदिर पहुँचने के लिए आप बस, टैक्सी, या फिर कैब का इस्तेमाल कर सकते हैं।&nbsp;</p><p>रेल मार्ग द्वारा मंदिर पहुँचने के लिए आप बीकानेर रेलवे स्टेशन पहुँच सकते हैं। यह देश के बड़े-बड़े शहरों को कनेक्ट करता है। मंदिर का नज़दीकी रेलवे स्टेशन देशनोक में है, जो मंदिर से कुछ ही क़दम की दूरी पर स्थित है। पैदल चलकर ही यहाँ से मंदिर पहुँचा जा सकता है। यह रेलवे स्टेशन बीकानेर-जोधपुर रेल मार्ग पर स्थित है। अतएव आप बीकानेर स्टेशन से भी मंदिर पहुँच सकते हैं। इसके लिए आपको आसानी से बस, टैक्सी और जीप उपलब्ध हो जाएंगी।&nbsp;</p><p>सड़क मार्ग से करणी मंदिर पहुँचने के लिए आप बीकानेर तक लक्ज़री क्लास बस से आ सकते हैं। फिर वहाँ से लोकल बस, टैक्सी या कैब के माध्यम से मंदिर पहुँचा जा सकता है।&nbsp;</p><p>श्रद्धालु और भक्तों के विश्राम और ठहरने के लिए मंदिर के समीप ही धर्मशालाएँ भी मौजूद हैं।</p><h2 class="wp-block-heading">करणी माता मंदिर की यात्रा कब करनी चाहिए (When to Visit Karni Mata Temple)</h2><p>वैसे तो साल भर में किसी भी दिन यह मंदिर जाया जा सकता है और वह शुभ ही होता है। परन्तु अगर आप मार्च-अप्रैल या सितम्बर-अक्टूबर के महीने में यहाँ जाते हैं तो आपको अलग ही रौनक और चहल-पहल दिखाई देगी। इस समय पर यहाँ विशेष मेलों का आयोजन होता है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">करणी माता मंदिर का स्थानीय भोजन एवं समीप के पर्यटन स्थल (Local Food and Nearby Tourist Places of Karni Mata Temple)</h2><p>मंदिर का दर्शन करने आने वाले पर्यटक यहाँ के मुख्य एवं प्रसिद्ध भोजन जैसे नमकीन, भुजिया, पापड़, कचोरी, समोसा आदि का लुत्फ़ उठा सकते हैं। और तो और, यहाँ के स्थानीय लोगों का पसंदीदा भोजन जैसे गट्टे की सब्ज़ी, दाल बाटी चूरमा, रबड़ी, पकोड़ी के साथ घेवर, खट्टा आदि के स्वाद का आनंद भी ज़रूर लेना चाहिए।</p><p>अगर आप करणी माता मंदिर के दर्शन का प्लान बना रहे हैं तो अपनी लिस्ट में आसपास के पर्यटन स्थल को भी जोड़ सकते हैं। मंदिर के कुछ कि. मी. की दूरी पर मुख्य पर्यटन स्थल इस प्रकार हैं–रामपुरिया हवेली, देवीकुंड सागर, लालगढ़ पैलेस, गजनेर पैलेस और जूनागढ़ का किला आदि।&nbsp;</p><p>शक्ति के सभी उपासकों को एक बार इस मंदिर में जाकर चमत्कारों और प्रकृति के अनुपम दृश्यों का आनंद ज़रूर उठाना चाहिए। जय करणी माता!</p><h2 class="wp-block-heading"><strong>यह भी पढ़ें </strong></h2><ul><li><a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=12277</guid><description><![CDATA[<p>असम का माँ कामाख्या मंदिर अपनी विभिन्नता और चमत्कारों के लिए जग प्रसिद्ध है। इस मंदिर की मुख्य विशेषता यह</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/kamakhya-mandir-devi-ki-yoni-puja-ka-rahasya/">कामाख्या मंदिर – जानें क्यों होती है यहाँ देवी की योनी की पूजा</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>असम का माँ कामाख्या मंदिर अपनी विभिन्नता और चमत्कारों के लिए जग प्रसिद्ध है। इस मंदिर की मुख्य विशेषता यह है कि यहां देवी की प्रतिमा की नहीं बल्कि उनकी योनि की पूजा की जाती है। मंदिर की विभिन्नता और रहस्य से अवगत होने के लिए लोगों की उत्सुकता देखते ही बनती है। लोग देश और विश्व के कोने-कोने से माँ का आशीर्वाद पाने और चमत्कारों की अनुभूति करने आते हैं। तो आइये आज इस जग विख्यात मंदिर के रहस्यों और मंदिर से जुड़े अन्य तथ्यों को आप सभी के साथ साझा करते हैं। यह स्थान अघोरियों और तंत्र मन्त्र की साधना करने वाले जातकों का गढ़ माना जाता है</p><p><strong>यह भी</strong> <strong>पढ़ें –</strong> <a
href="/kamakhya-chalisa/">कामाख्या चालीसा</a></p><h2 class="wp-block-heading">कामाख्या मंदिर की भौगोलिक स्थिति&nbsp;</h2><p>कामाख्या देवी मंदिर भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में स्थित है। यह मंदिर गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से 10 कि.मी. की दूरी पर है। इस मंदिर का निर्माण नीलांचल नामक पहाड़ी पर हुआ है। हवाई मार्ग द्वारा भी यहां पहुंचा जा सकता है। यहां का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा कामाख्या से केवल 19 कि. मी. की दूरी पर स्थित है। मंदिर के निचले स्तर पर ब्रह्मपुत्र नदी प्रवाहित है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">कामाख्या मंदिर की विशेषता&nbsp;</h2><p>यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक और प्राचीनतम शक्तिपीठ है। इसे महाशक्तिपीठ भी कहा जाता है। यहां पर देवी की मूर्ति नहीं है, बल्कि शक्ति की पूजा योनि रूप में होती है। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में योनि का आकार का एक शिलाखंड है। इस शिलाखंड को कुंड कहा जाता है जो हमेशा फूलो से ढंका हुआ रहता है। ऐसी प्रचलन है कि इस शिलाखंड के ऊपर लाल रंग के गेरू के घोल की धारा गिरायी जाती है।</p><p>क्यूंकि यहाँ देवी माँ का योनि भाग स्थापित है इसलिए यहां माता रजस्वला भी होती हैं। देश-विदेश से भक्तगण माता के दर्शन करने आते हैं और उनका यहाँ के इतिहास और शक्ति पर आस्था और अधिक बढ़ जाती है। ऐसी मान्यता है कि जो भी इस मंदिर का तीन बार दर्शन कर लेता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति अवश्य होती है।&nbsp;</p><p>इस मंदिर का तांत्रिक महत्व भी बहुत अधिक है। यह स्थान अघोरियों और तंत्र मन्त्र की साधना करने वाले जातकों का गढ़ माना जाता है। महाकुम्भ कहे जाने वाले अम्बुवाची मेले के दौरान सैकड़ों तांत्रिक अपने एकांतवास से निकलकर यहां पर विशेष पूजा अर्चना करके अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हैं।&nbsp;</p><p>कामाख्या मंदिर विश्व का सर्वोच्च कौमारी तीर्थ भी माना जाता है। यहां बिना किसी जाति, धर्म, और वर्ण के भेदभाव के कौमारी पूजा एवं अनुष्ठान किया जाता है।&nbsp;</p><p>कामाख्या देवी मंदिर धार्मिक, चमत्कारिक, तांत्रिक और शक्तियों के अलावा प्राकृतिक रूप से भी अत्यंत आकर्षक है। यहाँ यात्रियों का प्रकृति के अनुपम दृश्यों से साक्षात्कार होता है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">कामाख्या देवी की उत्पत्ति की कहानी&nbsp;</h2><p>पुराणों में कामाख्या देवी की उत्पत्ति की एक कहानी प्रचलित है जो इस प्रकार है:</p><p>माना जाता है कि प्रजापति दक्ष अपनी पुत्री सती और शिव के विवाह से बिल्कुल भी प्रसन्न नहीं थे। इसलिए उन्होंने ईर्ष्या वश एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में दक्ष ने देवी सती और भगवान शंकर के अलावा बाकी सभी देवी देवताओं को आमंत्रित किया। परन्तु फिर भी देवी सती, भगवान <a
href="https://hindipath.com/shiv-stuti-in-hindi/">शिव </a>से यज्ञ में जाने का हठ करने लगीं। तब भोलेनाथ को हार मान कर अपनी पत्नी को यज्ञ में जाने की अनुमति देनी पड़ी।&nbsp;</p><p>जैसे ही देवी सती यज्ञ में पहुंची, उन्होंने अपने पिता से आमंत्रण ना भेजने का कारण पूछा। बदले में प्रजापति दक्ष क्रोध करने लगे और <a
href="/shivratri-ki-aarti/">शंकर भगवान</a> के लिए अपशब्द बोलने लगे। देवी सती अपमान की विशाल अग्नि सह नहीं पाईं और उसी यज्ञ कुंड में कूद गई। भगवान शिव को जैसे ही इसका आभास हुआ, उनकी तीसरी नेत्र खुल गई।&nbsp;</p><p><a
href="https://hindipath.com/shiv-chalisa-lyrics-in-hindi-pdf/">शिव</a> यथाशीघ्र यज्ञ स्थल पर पहुंच गए और देवी सती के पार्थिव शरीर को अपने हाथों में उठा कर वहाँ से चले गए। भगवान <a
href="/kedarnath-ji-ki-aarti/">भोलेनाथ</a> दुःख में विलाप करते हुए देवी सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे। यह देखकर भगवान विष्णु को भयंकर प्रलय का आभास हुआ। तब विष्णु ने सृष्टि को प्रलय से बचाने हेतु अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर के टुकड़े कर दिए। इस प्रकार माता सती के शरीर के 52 टुकड़े धरती पर भिन्न-भिन्न स्थान पर गिरे, जो आज 52 शक्तिपीठों के नाम से जाने जाते हैं। कहते हैं कामाख्या में सती का योनि अंग गिरा था, इसलिए यह 52 शक्तिपीठों में से एक है और यहाँ <a
href="https://www.youtube.com/watch?v=JOcdc19JL9M">देवी की योनि की पूजा</a> की जाती है।&nbsp;&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">मंदिर का इतिहास&nbsp;</h2><p>कहते हैं एक बार नरकासुर नामक राक्षस देवी कामाख्या की सुंदरता पर अत्यंत मोहित हो गया था। उसने देवी के सामने विवाह का प्रस्ताव प्रस्तुत कर दिया। इस पर माता ने उस राक्षस के सामने एक शर्त रखी। देवी ने राक्षस से कहा कि अगर तुम एक ही रात में नील पर्वत के चारों ओर चार सोपान पथों का निर्माण कर दो तो मैं तुमसे विवाह कर लूंगी। और अगर तुम ऐसा करने में असमर्थ हुए तो तुम्हारी मृत्यु निश्चित ही होगी। माता के कहे अनुसार नरक ने प्रातः होने से पूर्व ही चार सोपान का निर्माण कार्य लगभग पूरा कर लिया था। तभी माता के एक मायावी कुक्कुट (मुर्गे) ने रात्रि समाप्ति के लिए बांग देना शुरू कर दिया। क्रोधित नरकासुर ने मुर्गे का पीछा किया और ब्रह्मपुत्र के दूसरे छोर पर जाकर उसका वध कर दिया। इस स्थान को आज भी कुक्टाचकि के नाम से जाना जाता है। बाद में <a
href="/tag/vishnu/">भगवान विष्णु</a> ने विधि के विधान के अनुसार नरकासुर को उसके पापों की सजा देते हुए उसका वध कर दिया।</p><p><strong>यह भी पढ़ें &#8211;</strong> <a
href="/tantroktam-devi-suktam-lyrics/">तन्त्रोक्तं देवी सूक्तम्</a></p><h2 class="wp-block-heading">मंदिर का निर्माण&nbsp;</h2><p>ऐतिहासिक तथ्यों के मुताबिक असम के कामाख्या मंदिर का निर्माण सातवीं और आठवीं शताब्दी के बीच किया गया था। 16वी सदी में सम्राट विश्वसिंह ने इसका निर्माण करवाया था, जिसे 1564 में मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा तोड़ दिया गया था। तत्पश्चात सत्रहवीं शताब्दी में बिहार के म्लेच्छ वंश के राजा और विश्वसिंह के पुत्र राजा नर नारायण ने पुनः इसका निर्माण करवाया था जो वर्तमान में भी मौज़ूद है। मंदिर के गर्भगृह में देवी सती अथवा भगवती की महामुद्रा का निर्माण किया गया है।&nbsp;</p><p>कहते हैं कोई भी देवी मंदिर <a
href="/kaal-bhairav-ke-108-naam/">भैरव बाबा</a> के बिना अधूरा होता है। इसी क्रम में देवी कामाख्या के मंदिर से कुछ दूर पर उमानंद <a
href="/nakoda-bhairav-dev-aarti/">भैरव</a> मंदिर स्थित है। यही कामाख्या शक्तिपीठ का भैरव है। उमानंद भैरव बाबा मंदिर के दर्शन के बिना देवी कामाख्या का दर्शन अधूरा माना जाता है। कामाख्या मंदिर में आपको मां कामाख्या के 10 महाविद्या के स्वरूप एक साथ देखने को मिलेंगे, जो इस प्रकार हैं: <a
href="/kali-chalisa-in-hindi/">काली</a>, <a
href="/maa-tara-das-mahavidya/">तारा</a>, <a
href="/tripur-bhairavi-devi-das-mahavidya/">त्रिपुर सुंदरी</a>, <a
href="/bhuvneshwari-maa-das-mahavidya/">भुवनेश्वरी</a>, <a
href="/bhuvneshwari-maa-das-mahavidya/">भैरवी</a>, <a
href="/chinnamasta-devi-das-mahavidya/">छिन्नमस्ता</a>, <a
href="/dhoomavati-mata-das-mahavidya/">धूमावती</a>, <a
href="/tag/maa-baglamukhi/">बगलामुखी</a>, <a
href="/matangi-devi-das-mahavidya/">मातंगी</a>, और कमलात्मिका।</p><p><strong>यह भी</strong> <strong>पढ़ें –</strong> <a
href="/saptashloki-durga-pdf-download-hindi/">सप्तश्लोकी दुर्गा पाठ अर्थ सहित व फायदे</a></p><h2 class="wp-block-heading">कामाख्या मंदिर का रहस्य&nbsp;</h2><p>कामाख्या देवी को ‘बहते रक्त की देवी’ भी कहा जाता है। कहते हैं कि प्रतिवर्ष जून (आषाढ़ महीने के सातवे दिन) के महीने में माँ कामाख्या ऋतुमती होती हैं। यह वह समय है जब तीन दिन के लिए देवी अपने मासिक धर्म के वार्षिक चक्र से गुज़रती हैं। जैसे ही माँ अपने मासिक <a
href="/category/dharma/">धर्म</a> में प्रवेश करती हैं, एक अद्भुत दैवीय घटना देखने को मिलती है। मंदिर के गर्भगृह के कपाट अपने आप ही बंद हो जाते हैं। तीन दिन तक कपाट बंद ही रहते हैं और जन मानुष को माता के दर्शन की अनुमति भी नहीं होती है। चौथे दिन माँ की लिंग प्रतिमा को स्नान एवं अतिरिक्त अनुष्ठान आदि करवाए जाते हैं। इसके बाद ही माता के भक्तों को मंदिर में प्रवेश करके माँ के दर्शन की अनुमति होती है। यह विश्व का एकमात्र मंदिर है जहां पर मासिक धर्म आने पर पूजा की जाती है। यहां पर यह समय अत्यधिक पवित्र माना जाता है और स्त्रीत्व का उत्सव मनाया जाता है।&nbsp;</p><p><strong>यह भी</strong> <strong>पढ़ें –</strong> <a
href="/kamakhya-kavach/">कामाख्या कवच</a></p><h2 class="wp-block-heading">विशेष पूजा एवं आयोजन&nbsp;</h2><p>असम के कामाख्या मंदिर में रोज़ाना की पूजा में <a
href="/kamakhya-chalisa/">कामाख्या मंदिर की चालीसा</a> एवं <a
href="/kamakhya-mata-ki-aarti/">आरती</a> भी की जाती है। इसके अतिरिक्त भी साल भर में कुछ विशेष पूजा एवं समारोह का आयोजन होता है। आइये जानते हैं इसके बारे में:</p><h3 class="wp-block-heading">ऋतुमती होने पर उत्सव (अम्बुवाची मेला)</h3><p>इस मंदिर स्थल पर हर वर्ष माँ के ऋतुमती होने पर तीन दिनों के लिए मेला आयोजित किया जाता है एवं उत्सव मनाया जाता है। इस मेले को अम्बुवाची मेला कहते हैं। इस दौरान निकट में स्थित ब्रह्मपुत्र नदी का जल तीन दिनों के लिए लाल हो जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह प्रक्रिया माँ कामाख्या के मासिक धर्म की वजह से होता है। कहते हैं कि इन दिनों में नदी में स्नान नहीं करना चाहिए।&nbsp;</p><p>पौराणिक मान्यता है कि सतयुग में यह उत्सव 16 वर्ष में एक बार, द्वापर युग में 12 वर्ष में एक बार, त्रेता युग में 7 वर्ष में एक बार और अब कलयुग में प्रतिवर्ष मनाया जाता है।&nbsp;</p><h3 class="wp-block-heading">दुर्गा पूजा</h3><p>प्रतिवर्ष सितम्बर-अक्टूबर महीने में <a
href="/navdurga-hindi/">नवरात्रि</a> के दौरान विशेष पूजा का आयोजन होता है।&nbsp;</p><h3 class="wp-block-heading">पोहन बिया</h3><p>प्रतिवर्ष पूसा मास के दौरान इस पूजा का आयोजन होता है। इस पूजा में भगवान कामेश्वर और देवी कामेश्वरी के बीच प्रतीकात्मक शादी करवाई जाती है।&nbsp;</p><p>मडानडियूल पूजा</p><p>यह पूजा चैत्र महीने में की जाती है। इसमें भगवान कामदेव और देवी कामेश्वरी की विशेष पूजा की जाती है।&nbsp;</p><h3 class="wp-block-heading">वसंती पूजा</h3><p>वसंती पूजा भी कामाख्या मंदिर में विशेष रूप से आयोजित की जाती है। यह पूजा चैत्र के महीने में की जाती है।&nbsp;</p><h3 class="wp-block-heading">दुर्गाडियूल पूजा</h3><p>यह विशेष पूजा कामाख्या मंदिर में फाल्गुन के महीने में आयोजित की जाती है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">भक्तों को मिलता है विशेष प्रसाद</h2><p>अन्य मंदिरों की तरह, इस मंदिर में भक्तों को प्रसाद के रूप में खाद्य पदार्थ नहीं बल्कि कुछ विशिष्ट प्रसाद मिलता है। यहाँ पर भक्तों को प्रसाद के रूप में लाल रंग का गीला कपड़ा दिया जाता है। कहते हैं कि यह कपड़ा देवी के मासिक धर्म का प्रतीक होता है। माता के रजस्वला होने के पूर्व सफ़ेद रंग का विशाल वस्त्र गर्भगृह की महामुद्रा के आसपास बिछा दिया जाता है। तत्पश्चात तीन दिन बाद जब मंदिर के पट खोले जाते हैं तो माँ के रज से यह वस्त्र लाल रंग का हो जाता है। स्थानीय लोग इस कपड़े को अम्बुवाची वस्त्र कहते हैं। इसी वस्त्र को भक्तों में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। मान्यता है कि जो भी जातक इस वस्त्र को धारण कर उपासना करता है, उसके सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">कामाख्या मंदिर कब जाना चाहिए</h2><p>वैसे तो कभी भी एवं किसी भी समय में असम के कामाख्या मंदिर में जाना शुभ होता है। परन्तु अगर नवरात्र के समय यहाँ पर जाया जाए तो आप देवी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त करने के पात्र बन सकते हैं। यही नहीं, कामाख्या मंदिर देश का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां महिलाएं अपने मासिक धर्म के दौरान भी जा सकती हैं।</p><p><strong>यह भी</strong> <strong>पढ़ें –</strong> <a
href="/kamakhya-mata-ki-aarti/">कामाख्या देवी की आरती</a></p><h2 class="wp-block-heading">कामाख्या मंदिर दर्शन का समय</h2><p>देवी कामाख्या के दर्शन करने हेतु भक्तों के लिए निश्चित समय का निर्धारण किया गया है, जो इस प्रकार है:</p><figure
class="wp-block-table"><table><tbody><tr><td
class="has-text-align-center" data-align="center"><strong>प्रातः</strong></td><td
class="has-text-align-center" data-align="center"><strong>दोपहर</strong></td></tr><tr><td
class="has-text-align-center" data-align="center">8:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक&nbsp;</td><td
class="has-text-align-center" data-align="center">2:30 बजे से शाम 5:30 बजे तक&nbsp;</td></tr></tbody></table></figure><p>अगर आप सामान्य रूप से दर्शन करना चाहते हैं तो आप कतार में लगकर अपनी बारी की प्रतीक्षा कर सकते हैं। इसमें लगभग 3 से 4 घंटे का समय लग सकता है।&nbsp;</p><p>परन्तु अगर आपके पास समय का अभाव है तो आप 501 रुपए का भुगतान करके वीआईपी टिकट खरीद सकते हैं। इससे अतिशीघ्र गर्भगृह में प्रवेश मिल जाता है और 10 मिनट के अंदर ही देवी के दर्शन हो जाते हैं।&nbsp;</p><p>यहां हमने साझा की असम के माँ कामाख्या मंदिर से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारियां। माता के हर एक भक्त को माँ के दर्शन ज़रूर करना चाहिए। करुणामयी माँ आप सब पर अपनी कृपा बनाये रखें।</p><h2 class="wp-block-heading">यह भी पढ़ें</h2><ul><li><a
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href="/karni-mata-mandir-chuhe-wala-mandir/">करणी माता मंदिर</a></li><li><a
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href="/12-jyotirling-name-list-hindi/">12 ज्योतिर्लिंग</a></li></ul><p> &nbsp;</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=12012</guid><description><![CDATA[<p>खजराना गणेश मंदिर (Khajrana Ganesh Mandir) भारत का दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेश की सबसे प्रसिद्ध नगरी इंदौर में</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/khajrana-ganesh-mandir-indore/">खजराना गणेश मंदिर – Khajrana Ganesh Mandir</a> appeared first on <a
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href="/siddhivinayak-aarti-jai-dev/">गणेश</a> मंदिर इसकी लोकप्रियता का सबसे प्रमुख कारण है। यह मंदिर केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व भर में ख्याति प्राप्त किये हुए है। यहां की मंदिर व्यवस्था बहुत उच्च कोटि की है। खजराना का यह गणेश मंदिर अपने चमत्कारों के लिए भी अत्यधिक लोकप्रियता घेरे हुए है। आइये जानते है मंदिर से जुड़े चमत्कारिक रहस्यों और कुछ अन्य तथ्यों के बारे में।</p><h2 class="wp-block-heading">खजराना गणेश मंदिर का इतिहास<br>History of Khajrana Ganesh Mandir</h2><p>इस मंदिर का निर्माण होल्कर वंश की महारानी अहिल्या बाई होल्कर के द्वारा सन 1735 में करवाया गया था। खजराना गणेश मंदिर में स्थापित मुख्य प्रतिमा <a
href="/ganesh-chalisa-in-hindi/">भगवान श्री गणेश जी</a> की है, जिसके बारे में यह कहानी और मान्यता प्रचलित है कि-</p><p>मुग़ल शाषक औरंगज़ेब के काल में जब उसका आतंक अत्यधिक बढ़ गया था, तो गणेश प्रतिमा को उसके विध्वंश से बचाने के लिए ज़मीन पर छुपा दिया गया था। जब सब शांत हो गया और छुपाने वाले लोग खुद इस बात को भूल गए तो स्वयं स्वयंभू गणपति जी ने, उस समय के एक स्थानीय पंडित श्री मंगल भट्ट को स्वप्न में आकर इसकी जानकारी दी थी। मंगल भट्ट ने उस वक़्त शाषन कर रहीं महारानी अहिल्या बाई होल्कर को अपने स्वप्न के बारे में बताया। पंडित की बात को गंभीरता से लेते हुए महारानी ने बताई हुई जगह पर खुदाई करवाई तो वहाँ से सचमुच में पाषाण युग की यह गणेश प्रतिमा प्राप्त हुई। मूर्ति स्थापना के पीछे भी एक कहानी प्रचलित, आइये जानते हैं, वह क्या है। </p><p><strong>यह भी पढ़ें &#8211;</strong> <a
href="https://hindipath.com/ganesh-ji-ke-bhajan-lyrics/">गणेश जी के भजन</a></p><h2 class="wp-block-heading">कैसे हुई मूर्ति की स्थापना<br>How the Statue was Installed</h2><p>महारानी अहिल्या एक बहुत बड़ी शिवभक्त थीं। वे गणपति बाप्पा की मूर्ति पाकर अत्यधिक प्रसन्न थीं और उसकी स्थापना राजवाड़ा में करवाना चाहती थीं। इसी प्रयोजन से उन्होंने सैंकड़ों मजदूरों को प्रतिमा को खजराना से राजवाड़ा लाने का आदेश दिया था। परन्तु इतने मजदूर मिलकर भी मूर्ति को हिला नहीं सके। इसके बाद श्री भट्ट ने महारानी से गणेश जी के स्वप्न में दिए हुए आदेशानुसार प्रतिमा को खजराना में ही स्थापित करवाने का आग्रह किया। महारानी ने पंडित की बात को तवज्जो देकर गणेश प्रतिमा की स्थापना उस जगह करवा दी, जो आज खजराना के गणेश मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। और जहां से मूर्ति प्राप्त हुई थी, उस जगह में एक जलकुंड बनवा दिया गया है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">खजराना गणेश मंदिर का निर्माण<br>Construction of Khajrana Mandir</h2><p>छोटी सी झोपडी से लेकर एक भव्य और अद्भुत इमारत तक यह मंदिर बहुत ज़्यादा विस्तृत हुआ है। देश विदेश से श्रद्धालु मंदिर में पैसे, सोना, बहुमूल्य हीरे, जवाहरात आदि दान करते हैं, और इसके निर्माण कार्य में सहयोग करते हैं।&nbsp;</p><p>मंदिर के गर्भगृह&nbsp; के बाहरी गेट और दीवार का निर्माण चांदी से हुआ है और इसमें अलग-अलग त्योहारों की झांकियां प्रस्तुत की गई हैं। भगवान की प्रतिमा की आँख हीरे से बनी हुई है, जिसको इंदौर के एक व्यवसायी द्वारा दान किया गया था।&nbsp;</p><p>इस मंदिर को सरकार ने अपने कब्ज़े में ले लिया है और इसे इंदौर के डीएम के द्वारा संचालित और नियंत्रित किया जाता है। उन्हीं मंगल भट्ट (जिनके स्वप्न में गणेश प्रतिमा दिखी थी) के वंशज इस मंदिर में पंडित के रूप में पदस्थ रहते हैं। पुजारी को मासिक तनख्वाह पर रखा जाता है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">मंदिर में हैं मुख्य मूर्ति के साथ अन्य प्रतिमाएं<br>Other Statues in the Temple</h2><p>खजराना गणेश मंदिर में मुख्य मूर्ति जो कि <a
href="/ganesh-ji-ki-aarti/">गणपति जी</a> की है, वह सिन्दूरी रंग से रंगी हुई है। इसके अतिरिक्त मंदिर परिसर में अन्य 33 देवी देवताओं की मूर्ति भी स्थापित हैं। इनमें <a
href="/tag/shiva/">भगवान शिव</a>, <a
href="/tag/durga/">देवी दुर्गा</a>, <a
href="/tag/ram/">श्री राम</a>, <a
href="/tag/hanuman/">हनुमान जी</a>, और <a
href="/sai-baba-108-names-in-hindi/">साईं बाबा</a> सहित अन्य देवी देवताओं की प्रतिमाएं हैं। परिसर में एक अत्यंत प्राचीन पीपल का पेड़ भी हैं, जिससे जुड़ी भी कई मान्यताएं प्रचलित हैं।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">खजराना गणेश मंदिर की महत्ता<br>Importance of Khajrana Ganesh Mandir</h2><p>वैसे तो देश में निर्मित सभी गणेश मंदिरों की अपनी विशेषता है। परन्तु इंदौर में स्थित खजराना गणेश मंदिर का&nbsp; अलग ही महत्व है। देश विदेश से श्रद्धालु मंदिर में गणेश जी के दर्शन के लिए आते हैं। मान्यता है कि, जो भी किसी विशिष्ट मनोकामना के साथ मंदिर में आता है, वह कभी खाली हाथ नहीं लौटता। आंकड़ों की माने तो प्रत्येक दिन लगभग दस हज़ार लोग मंदिर में आकर माथा टेकते हैं।&nbsp;</p><p>दूर-दूर से लोग मंदिर में आकर तीन परिक्रमा लगाते हैं और दीवार पर मन्नत का धागा बांधते हैं। ये प्रक्रिया भी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए भक्तों द्वारा की जाती है। मन्नत पूरी हो जाने के बाद भक्त वापस धागा खोलने के लिए जाते हैं।&nbsp;</p><p>वैसे तो हर दिन ही खजराना गणेश मंदिर में भक्तों का जमावड़ा रहता है, परन्तु <a
href="/aaj-budhwar-hai-bhajan-lyrics/">बुधवार</a> और <a
href="/aaj-ravivar-hai-bhajan-lyrics/">रविवार</a> को विशेष आयोजन एवं पूजा आरती होती है, जिसमे शामिल होने के लिए श्रद्धालुओं का बड़ा जमावड़ा रहता है।&nbsp;</p><p>इंदौर और उसके आसपास के लोग किसी भी शुभ कार्य का प्रथम निमंत्रण मंदिर में भेजकर भगवान श्री गणेश को आमंत्रित करते हैं। लोगों का मानना है कि इससे शुभ कार्य में कोई बाधा, विघ्न, या अड़चने नहीं आती हैं।&nbsp;</p><p>गणेश जी के महत्वपूर्ण त्यौहार जैसे विनायक चतुर्थी, तिल चौथ इत्यादि में यहाँ पर विशेष आयोजन होता है, मेला लगता है, और बहुत भव्य रूप में इसे मनाया जाता है।</p><p>यहां पर गणेश भक्तों को प्रतिदिन निःशुल्क भोजन कराया जाता है। जैसा कि हम जानते हैं कि यह मंदिर भक्तों की मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए भी प्रसिद्ध है। उसी क्रम में यह मान्यता भी प्रचलित है कि जिस भी भक्त की इच्छा पूर्ण हो जाती है, वह अपने वज़न के तुल्य लड्डुओं का दान करता है। </p><iframe
sandbox="allow-popups allow-scripts allow-modals allow-forms allow-same-origin" style="width:120px;height:240px;" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" frameborder="0" src="//ws-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?ServiceVersion=20070822&#038;OneJS=1&#038;Operation=GetAdHtml&#038;MarketPlace=IN&#038;source=ss&#038;ref=as_ss_li_til&#038;ad_type=product_link&#038;tracking_id=hindpath-21&#038;language=en_IN&#038;marketplace=amazon&#038;region=IN&#038;placement=B00MXT5Z10&#038;asins=B00MXT5Z10&#038;linkId=98ed31a595b89124710860635daf6bcd&#038;show_border=true&#038;link_opens_in_new_window=true"></iframe><h2 class="wp-block-heading">उल्टा स्वास्तिक बनाने का विधान<br>The Tradition of Inverted Swastik</h2><p>मंदिर के बारे में उल्टे स्वास्तिक के आधार पर इच्छा पूर्ति की एक अलग महिमा है। इसके अनुसार जो भी भक्तगण गणेश जी की पीठ पर उल्टा स्वास्तिक (सातिया) बनाकर अपनी मन्नत बोलता है, कुछ ही समय में उसके मनोरथ पूर्ण होते हैं। फिर मनोकामना पूर्ति के बाद वह भक्त वापस मंदिर में जाकर उल्टा स्वास्तिक को सीधा बना देता है। मान्यता है कि उल्टा स्वास्तिक बनाने से लोगों की मनचाही इच्छा जल्द ही पूर्ण हो जाती है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">सबसे धनी मंदिरों में है नाम शामिल<br>One of the Richest Temple</h2><p><a
href="/sai-baba-vrat-katha/">शिरडी के साईं बाबा</a> मंदिर और तिरुपति के वेंकटेश्वर मंदिर की ही तरह खजराना मंदिर का नाम भी सबसे धनी हिन्दू मंदिरों में शुमार है। यहां पर देश विदेश से बहुमूल्य चढ़ावा आता है, जिसके वजह से मंदिर की कुल संपत्ति का कोई हिसाब नहीं है। मंदिर के ख़ज़ानों में विदेशी मुद्राओं की भी बहुतायत में गणना होती है। भक्तगण और श्रद्धालुजन ऑनलाइन माध्यम से भी मंदिर में भेंट चढ़ाते हैं।&nbsp;</p><p>यह थी इंदौर के खजराना स्थित गणेश मंदिर की अपरंपार महिमा। हिंदीपथ के माध्यम से हमने मंदिर के बारे में सारी उचित और महत्वपूर्ण जानकारी आप सभी के साथ साझा की है।</p><pre class="wp-block-code"><code><iframe sandbox="allow-popups allow-scripts allow-modals allow-forms allow-same-origin" style="width:120px;height:240px;" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" frameborder="0" src="//ws-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?ServiceVersion=20070822&amp;OneJS=1&amp;Operation=GetAdHtml&amp;MarketPlace=IN&amp;source=ss&amp;ref=as_ss_li_til&amp;ad_type=product_link&amp;tracking_id=hindpath-21&amp;language=en_IN&amp;marketplace=amazon&amp;region=IN&amp;placement=B09GZSQB6B&amp;asins=B09GZSQB6B&amp;linkId=94196166a5e4d5816393313fa66e2231&amp;show_border=true&amp;link_opens_in_new_window=true"></iframe></code></pre><h2 class="wp-block-heading"><strong>यह भी पढ़ें</strong></h2><ul><li><a
href="https://hindipath.com/prem-mandir-timing-night/">प्रेम मंदिर</a></li><li><a
href="https://hindipath.com/khatu-shyam-ji-temple-time-booking/">खाटू श्याम मंदिर</a></li><li><a
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href="/12-jyotirling-name-list-hindi/">12 ज्योतिर्लिंग</a></li></ul><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=10990</guid><description><![CDATA[<p>दशा माता की कहानी (दशा माता की कथा) का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस व्रत</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/dasha-mata-ki-kahani/">दशा माता की कहानी व व्रत कथा – Dasha Mata Ki Kahani</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>दशा माता की कहानी (दशा माता की कथा) का हिन्दू<a
href="/category/dharma/"> धर्म</a> में विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति का बुरा समय जल्दी दूर चला जाता है और अच्छा समय वापस आ जाता है। कहा जाता है कि जब किसी व्यक्ति की दशा ख़राब चल रही होती है तो उसके सभी कार्य में रुकावट और बाधाएं आने लगती हैं।&nbsp; इसीलिए दशा माता का व्रत करके मां दशा को बुरे समय को शीघ्र दूर करने के लिए मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार प्रत्येक सुहागन या विधवा स्त्री को घर की दशा सुधारने एवं सुख समृद्धि लाने के लिए दशा माता का व्रत (दशा माता की कहानी) एवं पूजन करना चाहिए।</p><p><strong>यह भी पढ़ें &#8211;</strong> <a
href="/dasha-mata-ki-aarti/">दशा माता की आरती</a></p><h2 class="wp-block-heading">दशा माता की व्रत विधि&nbsp;</h2><p>दशा माता का व्रत एवं पूजन चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को किया जाता है। व्रत और पूजन के साथ-साथ दशा माता की कहानी पढ़ने और सुनने का भी अत्यधिक महत्व है। इस व्रत में होली के दूसरे दिन से पूजन प्रारंभ करके दसवे दिन समापन किया जाता है। व्रत करने वाली स्त्री प्रातः स्नानादि करके पूजन सामग्री एकत्रित करके पूजा करती है और दशा माता की कथा पढ़ती है।&nbsp;&nbsp;</p><p>पूजन विधि कुछ इस प्रकार है: सबसे पहले घर की कोई स्वच्छ दीवार चुनकर उस पर स्वास्तिक बनाएं। तत्पश्चात स्वस्तिक के पास मेहँदी एवं कुमकुम से १०-१० बिंदियां बनाएं। स्वस्तिक की <a
href="/ganesh-ji-ki-aarti/">गणेश जी</a> एवं १० बिंदिओं की दशा माता के रूप में धूप, दीप, नैवेद्य, अगरबत्ती, चावल, सुपारी, मौली, रोली इत्यादि से पूजन करें। तत्पश्चात १ सफ़ेद धागा लेकर उसको <a
href="/haldi-ke-fayde/">हल्दी</a> से रंग लें और उसमे १० गठान बना लें। इसे दशा माता की बेल कहते हैं, जिसका पूजन करके गले में धारण किया जाता है। इस धागे को पूरे साल गले में धारण करने का विधान है। अगले वर्ष पूजन करके ही धागा उतारते हैं और दूसरा धागा पहनते हैं। पूजन के अंत में दशा माता की कहानी पढ़ी जाती है। व्रत करने वाली स्त्रियां दिन में एक समय ही भोजन करती हैं।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">जानें दशा माता की कहानी&nbsp;</h2><p>दशा माता की कहानी में बहुत सी कथाएं प्रचलित हैं, परन्तु राजा नल और रानी दमयंती की कहानी मुख्य्तः पढ़ी जाती है।&nbsp; यहाँ हम राजा नल और दमयंती की प्रचलित कहानी का विवेचन करेंगे।&nbsp;</p><p>दशा माता की कथा कुछ इस प्रकार है: एक समय की बात है, नरवलकोट नामक राज्य में राजा नल और रानी दमयंती अपने २ पुत्रों, पुत्रवधुओं और पौत्रों के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे। उनके राज्य में प्रजा भी धन धान्य से संपन्न और सुखी थी। एक दिन राजमहल में एक ब्राह्मणी आई और रानी से बोली- हे रानी! दशा का डोरा ले लो, इसकी पूजा करके अपने गले में बाँध लेना जिससे आपके घर में सुख समृद्धि बनी रहेगी। ऐसा सुनकर रानी ने डोरा ले लिया और विधि अनुसार पूजन करके अपने गले में बांध लिया। एक दिन राजा का ध्यान रानी के गले में बंधे उस डोरे पर गया और उन्होंने आश्चर्य से पूछा- रानी आपने इतने हीरे जवाहरात के बीच में ये मामूली सा धागा क्यों पहन रखा है। और रानी के कुछ बोलने से पहले ही राजा ने धागे को तोड़कर ज़मीन पर फेंक दिया। रानी ने दौड़कर धागे को उठाया और उसे पानी में घोलकर पी गई। उन्होंने रुष्ट होकर राजा से कहा- हे राजा! ये दशा माता का धागा था, आपको इसका अपमान नहीं करना चाहिए था। राजा ने इस पर कुछ ध्यान नहीं दिया।&nbsp;&nbsp;</p><p>एक दिन जब राजा नल सो रहे थे, तो उन्होंने स्वप्न में एक बूढ़ी माता को महल में आते हुए और <a
href="/lakshmi-ji-ki-aarti/">माता लक्ष्मी</a> को महल से जाते हुए देखा। राजा ने प्रातः होते ही सारा स्वप्न रानी दमयंती को कह सुनाया। रानी बोलीं महाराज आपने हमारी अच्छी दशा को जाते हुए और बुरी दशा को आते हुए देखा है, इसीलिए हे महाराज! अब हमें यहां नहीं रुकना चाहिए। दोनों ने फैसला करके अपनी बहुओं को पीहर भेज दिया और पुत्रों को राजा भील के पास छोड़कर १ पौत्र को लेकर देश छोड़कर चले गए।&nbsp;</p><p>कुछ समय चलने के पश्चात राजा नल के सेठ मित्र का गांव आया। दूतों ने राजा नल के आगमन की खबर सेठ को सुनाई और बताया की राजा, रानी और उनका पोता सब फटेहाल पैदल आ रहे हैं। यह सुनकर सेठ ने दूतों से कहा- हवेली में सेठानी और बहुएं क्या सोचेंगी कि कैसा दोस्त है मेरा, इसीलिए उनको बाहर वाले कमरे में ठहरा दो। जिस कमरे में राजा नल और रानी दमयंती को ठहराया गया था, वहाँ मोर की तस्वीर की खूंटी पर सेठानी का नौलक्खा हार टंगा था। देखते ही देखते वह तस्वीर का मोर, हार को निगल गया। यह देखकर रानी दमयंती ने राजा से कहा- महाराज! यहाँ से तुरंत चलिए, नहीं तो सेठानी हम पर चोरी का इलज़ाम लगा देंगी। राजा रानी अपने पोते के साथ, किसी को बिना बताये आधी रात को ही वहाँ से चले गए।&nbsp;</p><p>फिर कुछ दूर चलने के बाद राजा नल की बहन का गाँव आया। राजा ने अपनी बहन तक अपने आने की ख़बर&nbsp; पहुंचाई। बहन के पूछने पर ख़बरी ने बताया- राजा रानी और उनका १ पोता खराब हालत में पैदल आ रहे हैं। ऐसा सुनकर बहन ने यह कहकर कि ‘घर में सास और देवरानी क्या सोचेंगे’, उनको पीपल के पेड़ के नीचे ठहराने बोल दिया। कुछ देर बाद, बहन १ थाली में मूंग और चावल लेकर अपने भाई से मिलने आई। राजा नल के हाथ लगाते ही मूंग और चावल कीड़े में बदल गए। यह देखकर रानी दमयंती आगे बढ़ीं और ज़मीन पर गड्ढा खोदकर उस कीड़े से भरी थाली को उसमे गाड़ दिया। फिर राजा, रानी और उनका पोता वहां से चले गए।&nbsp;</p><p>आगे चले तो उनको १ नदी मिली और उन्होंने वहाँ रुकने का फैसला किया। राजा नल ने तीतर मारकर रानी को दिया और कहा- हे रानी! मैं पोते के साथ नदी से स्नान करके आता हूँ, तब तक आप तीतर पका देना। जब राजा वापस आये तो रानी ने बड़े आश्चर्य से कहा कि पके हुए तीतर भी हांडी में से उड़ गये और राजा ने भी दुखी स्वर में रानी को बताया कि मुझसे पोता नदी में बह गया। दोनों दुखी होकर विलाप करते हुए वहाँ से भी चले गए।&nbsp;&nbsp;</p><p>आगे चलकर १ गाँव में उनको सूना बाग दिखा और उन्होंने वहाँ विश्राम करने का फैसला किया। जब बाग की मालिन वहाँ आई, तो उसने देखा कि सूखे बंजर बाग़ में कोंपले फूट रही हैं। मालिन की नज़र राजा और रानी पर पड़ी और पूछने लगी- तुम लोग कौन हो। राजा ने उत्तर दिया, कि हम मुसाफिर हैं और रहने की जगह ढूंढ रहे हैं। यह सुनकर मालिन ने उनको वहीं रहकर बाग़ की रक्षा करने के लिए कहा। राजा और रानी वहाँ अपने दिन व्यतीत करने लगे। दिन बीतते गए और होली का दिन आ गया। उस दिन जब राजा नल कुएं से पानी भर रहे थे तो बार- बार उनकी बाल्टी में सूत की कोकड़ी और हल्दी की गाँठ आ रही थी और वो बार- बार उसको वापस कुएं में फेंकते जा रहे थे। रानी ने जब राजा को ऐसे करते हुए देखा तो पूछा- हे स्वामी! आप ये क्या कर रहे हैं, तब राजा ने रानी को उसका कारण बताया। राजा की बात सुनकर रानी ने कहा कि अगली बार जब आपकी बाल्टी में सूत की कोकड़ी और हल्दी की गाँठ आए तो उसको मुझे दे दीजिये। राजा यह सुनकर नाराज़ हुए और बोले- रानी आपकी ही वजह से आज हमारी ये दशा हुई है और आप फिर से वही सब करना चाहती हैं। परन्तु जब बाल्टी में वापस वही वस्तुएं आईं तो राजा ने उन्हें रानी को सौंप दिया। रानी ने होलिका दहन के दिन होली को झाल दिखाकर अगले दिन दशा माता का व्रत किया और डोरा लिया। </p><p><strong>यह भी पढ़ें &#8211; </strong><a
href="/tantroktam-devi-suktam-lyrics/">तन्त्रोक्तं देवी सूक्तम्</a></p><p>दशा माता की कथा के अनुसार फिर समय बीतता गया, एक दिन राजा रानी के पास गए और बोले हे रानी! नगर के राजा ने स्वयंवर रखा है, मैं वहां जाऊंगा, इसीलिए आप मेरे कपडे धो दीजिये। राजा की बात सुनकर रानी बोलीं- महाराज! इस दशा में भी आप वहाँ जाना चाहते हैं। इस पर राजा ने उत्तर दिया कि रानी, मेरी दशा ख़राब है परन्तु दिल तो राजाओं का ही है। राजा नल स्वयंवर में पहुंचे और राजकुमारी ने सभी राजाओं और राजकुमारों को छोड़कर राजा नल के गले में वरमाला डाल दिया। वहाँ मौजूद सभी लोग हैरान रह गए, तब विद्वानों की सलाह से राजकुमारी को १ बार फिर अपना वर चुनने को कहा गया। परन्तु इस बार फिर राजकुमारी ने राजा नल को ही अपना वर चुना। यह देख नगर के राजा क्रोधित होकर बोले- मैं इस माली से अपनी पुत्री का विवाह नहीं करूंगा। तब सभी ने विचार विमर्श कर १ प्रतियोगिता रखी, जिसमें सभी राजाओं और राजकुमारों को शिकार करना होगा और जिसका शिकार सबसे अच्छा होगा, उसका विवाह राजकुमारी से हो जायेगा।&nbsp;</p><p>सभी राजा और राजकुमार प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए तैयार हो गए। राजा नल को बूढ़ा घोड़ा और जंग लगी तलवार दी गई। उन्होंने घोड़े को १ थपकी मारी और कहा कि अगर मैं असली राजपूत हूँ तो धारदार तलवार हो जाये और जवान घोडा हो जाये और ऐसा ही हुआ। कुछ समय पश्चात् सारे राजा और राजकुमार अपने-अपने शिकार के साथ राजमहल पहुंचे। किसी के भी शिकार से नगर के राजा संतुष्ट नहीं हुए और सिपाहियों को उस माली को ढूँढ़के लाने को कहा। राजा की आज्ञा से सिपाही जंगल में पहुंचे तो देखा की राजा नल पेड़ के नीचे सो रहे थे, शिकारियों ने उन्हें जगाकर शिकार के बारे में पूछा। राजा नल ने शिकारियों को उत्तर दिया- मेरा शिकार (शेर की खाल) पेड़ पर टंगा है, ले जाओ।&nbsp;</p><p>शिकार देखकर नगर के राजा खुश हो गए और बोले- ये है असल राजपूत का शिकार। फिर नगर के राजा ने ख़ुशी-ख़ुशी अपनी पुत्री का विवाह माली (राजा नल) के साथ कर दिया। राजा नल अपनी नई रानी को लेकर बाग़ में आ गए, रानी दमयंती ने छोटी रानी का स्वागत किया।&nbsp;</p><p>एक दिन जब दोनों रानी बाग़ में बैठी हुईं थीं, तो रानी दमयंती छोटी रानी से बोलीं- रानी आज तो अपने नगर में बिजली चमक रही है। रानी दमयंती की बात सुनकर छोटी रानी आश्चर्य से बोलीं- दीदी, अपना नगर भी है? रानी दमयंती ने उत्तर स्वरूप छोटी रानी को सारा हाल कह सुनाया। छोटी रानी ने अपने पिता के पास जाकर सारी बात बताई। नगर के राजा ने यह वृत्तांत सुनकर राजा नल से क्षमा मांगी और बहुत से हीरे, जवाहरात, और घोड़े इत्यादि देकर उनको अपने नगर के लिए रवाना किया।&nbsp;</p><p>चलते-चलते रास्ते में नदी के किनारे उनको १ धोबन मिली, जिसके पास राजा नल का पोता था। धोबन ने राजा रानी को पोता सौंपते हुए कहा कि, ये मुझे नदी के किनारे मिला था। राजा ने ख़ुश होकर धोबन को बहुत से हीरे जवाहरात दिए और पोते को लेकर वहाँ से चले गए।&nbsp;</p><p>कुछ दूर आगे चले तो राजा की बहन का गाँव आया, राजा ने बहन तक अपने आने की खबर पहुंचाई। बहन ने दूत से पूछा कि, वे लोग कैसे आ रहे हैं, तो दूत बोला- इस बार बहुत से हीरे जवाहरात लेकर धन धान्य के साथ आ रहे हैं। इस पर बहन बोली कि उन्हें मेरे महल में ले लाओ। जब रानी दमयंती को ये ख़बर मिली तो वो बहन से बोलीं- नहीं बाई जी, हम तो उसी पीपल के पेड़ के नीचे ही रुकेंगे। कुछ देर बाद बहन बहुत से पकवान और मिष्ठान आदि बनाकर ले आई। यह देखकर रानी दमयंती ने आगे बढ़कर ज़मीन पर जो चावल और मूंग गड़ाए थे, वो निकाल लिए, उन्होंने देखा कि वो हीरे <a
href="/pearl-stone-price-benefits/">मोती</a> में बदल चुके हैं। रानी दमयंती ने सारे हीरे जवाहरात अपनी ननद को दे दिये और बोलीं, ये लो बाईजी आपकी अमानत, और बहन को हीरे जवाहरात देकर वहाँ से चले गए।&nbsp;</p><p>कुछ दूर चलने पर राजा के मित्र सेठ का गाँव आया। सेठ को जब इसकी सूचना मिली तो सेठ ने दूत से पूछा कि, वे लोग कैसे आ रहे हैं। दूत बोला- इस बार बहुत से हीरे जवाहरात और धन धान्य के साथ आ रहे हैं। दूत की बात सुनकर सेठ बोला कि, उन्हें हवेली में ले आओ। राजा नल को इसकी खबर मिली तो बोले हम तो बाहर वाले कमरे में ही रुकेंगे। सेठानी फ़ौरन उनके लिए हलवा बनाकर ले आई। रानी दमयंती ने हलवा उठाकर मोर की तस्वीर के मुँह में डाल दिया और मोर ने सेठानी का नौलक्खा हार वापस बाहर फेंक दिया। रानी दमयंती ने सेठानी को हार देते हुए कहा कि हमारी दशा ख़राब थी, परन्तु नीयत ख़राब नहीं थी। ऐसा कहकर राजा-रानी, छोटी रानी और पोते के साथ वहाँ से चले गए।&nbsp;</p><p>रास्ते में उन्होंने भील राजा के पास से अपने पुत्रों को लिया और अपने नगर की ओर आगे बढ़ने लगे। जब नगरवासियों ने राजा नल को अपने परिवार सहित नगर में प्रवेश करते देखा तो बहुत खुश हुए, और गाजे बाजे और ढोल नगाड़ों के साथ उनका स्वागत किया। राजा रानी अपने पूरे परिवार के साथ पहले की तरह रहने लगे और सुखी जीवन व्यतीत करने लगे।&nbsp;</p><p>जैसे दशा माता ने राजा नल और रानी दमयंती की बुरी दशा को अच्छी दशा में बदल दिया, वैसे ही इस दशा माता की कहानी पढ़ने और सुनने वाले हर व्यक्ति पर माँ अपनी कृपा बनाये रखें।</p><h2 class="wp-block-heading">यह भी पढ़ें</h2><ul><li><a
href="https://hindipath.com/dasha-mata-ki-aarti/">दशा माता की आरती</a></li><li><a
href="/durga-hai-meri-maa-ambe-hai-meri-maa/">दुर्गा है मेरी मां</a></li><li><a
href="/sher-pe-sawar-hoke-aaja-sherawaliye-lyrics/">शेर पे सवार होके आजा शेरावालिये</a></li><li><a
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href="/meri-jholi-chhoti-pad-gayi-re-lyrics-in-hindi/">माँ शेरावालिये तेरा शेर आ गया</a></li><li><a
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href="https://hindipath.com/maa-ka-dil-lyrics-in-hindi/">माँ का दिल</a></li><li><a
href="/tune-mujhe-bulaya-sherawaliye-lyrics/">तूने मुझे बुलाया</a></li><li><a
href="/main-balak-tu-mata-sherawaliye-lyrics/">मैं बालक तू माता शेरावालिए</a></li><li><a
href="/durga-amritwani-lyrics/">दुर्गा अमृतवाणी भजन</a></li></ul><p>The post <a
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