<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss
version="2.0"
xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
><channel><title>पुस्तक चर्चा Archives - हिंदी पथ</title> <atom:link href="https://hindipath.com/category/books/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" /><link>https://hindipath.com/category/books/</link> <description>हिंदी का संसार</description> <lastBuildDate>Mon, 13 Feb 2023 09:16:39 +0000</lastBuildDate> <language>en-US</language> <sy:updatePeriod> hourly </sy:updatePeriod> <sy:updateFrequency> 1 </sy:updateFrequency> <generator>https://wordpress.org/?v=6.3.12</generator><image> <url>https://hindipath.com/wp-content/uploads/2019/09/HindiPath-Site-Icon-New.png</url><title>पुस्तक चर्चा Archives - हिंदी पथ</title><link>https://hindipath.com/category/books/</link> <width>32</width> <height>32</height> </image> <item><title>बेटी को गुर्जिएफ की सलाह – Gurdjieff′s Advices to his Daughter in Hindi</title><link>https://hindipath.com/gurdjieff-advices-his-daughter-hindi/</link> <comments>https://hindipath.com/gurdjieff-advices-his-daughter-hindi/#comments</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Sat, 11 Feb 2023 12:27:39 +0000</pubDate> <category><![CDATA[पुस्तक चर्चा]]></category> <category><![CDATA[Dushka Howarth]]></category> <category><![CDATA[GI Gurdjieff]]></category> <category><![CDATA[The Work]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=21534</guid><description><![CDATA[<p>“बेटी को गुर्जिएफ की सलाह” बहुत ही रोचक दस्तावेज़ है। दरअस्ल, आज-कल गुर्जिएफ को पढ़ रहा हूँ। पढ़ते-पढ़ते महसूस हुआ</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/gurdjieff-advices-his-daughter-hindi/">बेटी को गुर्जिएफ की सलाह – Gurdjieff′s Advices to his Daughter in Hindi</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>“बेटी को गुर्जिएफ की सलाह” बहुत ही रोचक दस्तावेज़ है। दरअस्ल, आज-कल गुर्जिएफ को पढ़ रहा हूँ। पढ़ते-पढ़ते महसूस हुआ कि फिर से लिखना भी शुरू किया जाए। सालों से नियमित तौर पर नहीं लिखा है। कुछ वर्ष पहले अन्तिम लेख लिखा था – <a
href="/book-that-changed-my-life-swami-vivekananda-complete-works-hindi/">एक पुस्तक जिसने मेरा जीवन बदल दिया</a>। यह भी वर्षों बाद लिखा था और उसके बाद फिर न लिख सका। हिन्दी चिट्ठाकारी के शुरुआती दिनों में ही नियमित लेखन किया था। उसके बाद से लिखना ही छूट गया। फिर हिन्दी में लिखना-पढ़ना तो बिल्कुल ही छूट-सा गया है। काश कि <a
href="https://gyandutt.com/">ज्ञानदत्त पाण्डे जी की तरह</a> मेरी लेखनी भी हलचलायमान रहे। लेकिन गुर्जिएफ़ (GI Gurdjieff) को पढ़ते-पढ़ते न जाने कहाँ से यह प्रेरणा जागृत हुई कि फिर हिंदी में लिखना चाहिए। तो लीजिए, हाज़िर हूँ आपके सामने।</p><p>गुर्जिएफ़ का नाम मैंने पहली बार <a
href="https://www.osho.com/hi">आचार्य रजनीश उर्फ़ ओशो</a> के मुख से सुना था। मुझे लगता है कि मेरी ही तरह अधिकांश हिंदीभाषियों ने ओशो के माध्यम से ही गुर्जीएफ का परिचय प्राप्त किया होगा। कुछ दिनों पहले न जाने कहाँ से यह अन्तः-प्रेरणा हुई की गुर्जिएफ को स्वतंत्र रूप से पढ़ा जाए, बिना ओशो के चश्मे के। सो पढ़ना शुरू किया। आँखें खोलने वाला साहित्य है। या दूसरे शब्दों में कहा जाए–गुर्जिएफ के नज़रिए से–तो आँखें खोलना, नींद से जागना इतना आसान भी नहीं है।</p><p>ख़ैर, <a
href="https://www.holybooks.com/beelzebubs-tales-grandson-gurdjieff/">गुर्जिएफ साहित्य</a> पर विस्तार से चर्चा और कभी। गुर्जिएफ़ ने अपनी बेटी के लिए कुछ सुझाव लिखे थे। बेटी का नाम था दश्का होवार्थ (Dushka Howarth)। ये सुझाव एक तरह से गुर्जिएफ की सारी शिक्षाओं (The Work) का सार हैं। इन 83 सुझावों में उनके दर्शन का क्रियात्मक रूप अन्तर्निहित है। या यूँ कहा जाए कि दर्शन तो है सिद्धान्त और ये 83 सूत्र बताते हैं कि उन सिद्धान्तों को व्यावहारिक धरातल पर कैसे उतारना है। इन सूत्रों या सुझावों का हिंदी में अनुवाद करने का प्रयास मैंने किया है। पढ़िए अपनी बेटी को गुर्जिएफ की सलाह–</p><p>1. अपना ध्यान स्वयं पर केन्द्रित रखो। हर पल सजग रहो कि तुम क्या सोचती हो, अनुभव करती हो, चाहती हो और करती हो।<br>2. जो आरम्भ किया है, उसे सदैव समाप्त करो।<br>3. जो भी कर रही हो उसे अपना सर्वश्रेष्ठ करने की कोशिश करो।<br>4. किसी भी ऐसी चीज़ से बन्धी मत रहो जो लम्बे समय में तुम्हें बर्बाद कर दे।<br>5. बिना प्रत्यक्षदर्शी के अपनी उदारता को विकसित करो।</p><p>6. प्रत्येक व्यक्ति से ऐसे पेश आओ जैसे वह निकट संबंधी हो।<br>7. जो अव्यवस्थित है उसे व्यवस्थित करो।<br>8.प्रत्येक भेंट स्वीकारना और उसके लिए आभारी होना सीखो।<br>9. स्वयं को परिभाषित करना बन्द करो।<br>10. असत्य मत बोलो, चोरी मत करो। क्योंकि अगर तुमने ऐसा किया तो तुमने स्वयं से झूठ बोला और स्वयं से ही चोरी की है।</p><p>11. अपने पड़ोसी को स्वयं पर निर्भर बनाए बिना उसकी मदद करो।<br>12. अन्यों द्वारा अपनी नक़ल किए जाने की इच्छा नहीं करो।<br>13. योजनाएँ बनाओ और उन्हें पूरा होते हुए देखो।<br>14. बहुत ज़्यादा जगह मत घेरो।<br>15. ग़ैरज़रूरी आवाज़ें और भाव-भंगिमाएँ मत करो।</p><p>16. यदि तुममें आस्था नहीं है, तो आस्ठावान होने का अभिनय करो।<br>17. सशक्त व्यक्तित्व वाले लोगों से प्रभावित मत होओ।<br>18. बिना उसकी अनुमति के किसी वस्तु या व्यक्ति का उपयोग मत करो।<br>19. बराबर-बराबर बाँटो।<br>20. किसी को अपनी तरफ़ कामुक तौर पर आकर्षित मत करो (Do not seduce.)।</p><p>21. जितना आवश्यक हो उतना ही खाओ और सोओ।<br>22. अपनी निजी समस्याओं पर चर्चा मत करो।<br>23. जब तक सारे तथ्य न मालूम हों तब तक कोई निर्णय या आलोचना मत करो।<br>24. बेमतलब की दोस्ती मत रखो।<br>25. तात्कालिक चलन के पीछे मत दौड़ो।</p><p>26. ख़ुद को मत बेचो।<br>27. जिन अनुबंधों/समझौतों पर हस्ताक्षर किया है उनका सम्मान करो।<br>28. समय का पालन करो।<br>29. दूसरे की सम्पत्ति या वस्तुओं से ईर्ष्या मत करो।<br>30. उतना ही बोलो जितना ज़रूरी हो।</p><p>31. अपने कार्य से जो लाभ प्राप्त होगा उसके बारे में मत सोचो।<br>32. कभी धमकाओ मत।<br>33. अपने वादों को निभाओ।<br>34. वाद-विवाद के दौरान स्वयं को दूसरे की जगह रखकर देखो।<br>35. जब कोई ख़ुद से बेहतर हो तो इसे स्वीकार करो।</p><p>36. मिटाओ मत, रूपान्तरित करो।<br>37. अपने डरों को हराओ; इनमें से हर एक भेष बदले हुए इच्छा ही है।<br>38. दूसरों को ख़ुद उनकी मदद करने में मदद करो।<br>39. अपने द्वेष को समाप्त करो और उन लोगों के क़रीब जाओ जिन्हें तुम ख़ारिज करना चाहती हो।<br>40. जब वो तुम्हारी निन्दा या प्रशंसा करें तो प्रतिक्रिया मत दो।</p><p>41. अपने गर्व को आत्म-सम्मान में परिवर्तित करो।<br>42. अपने क्रोध को रचनात्मकता में परिवर्तित करो।<br>43. अपने लोभ को सौन्दर्य के प्रति सम्मान में रूपान्तरित करो।<br>44. अपनी ईर्ष्या को दूसरों की ख़ूबियों की तारीफ़ में बदलो।<br>45. अपनी घृणा को परोपकार में परिवर्तित करो।</p><p>46. ख़ुद की न तो तारीफ़ करो और न ही बेइज़्ज़ती।<br>47. जो चीज़ें तुम्हारी नहीं हैं उन्हें ऐसे उपयोग करो जैसे तुम्हारी ही हों।<br>48. शिकायत मत करो।<br>49. अपनी कल्पना विकसित करो।<br>50. दूसरे आज्ञा-पालन करेंगे इसका मज़ा लेना के लिए आदेश मत दो।</p><p>51. उन सेवाओं के लिए भुगतान करो जो आपको दी गई हों।<br>52. अपने कार्य या विचारों की शेखी मत बघारो।<br>53. दूसरों में दया, प्रशंसा, सहानुभूति और ग़लत काम में सहभागिता जैसी भावनाओं को जगाने की कोशिश मत करो।<br>54. अपने रूप या पहनावे से दूसरों से अलग दिखने की चेष्टा मत करो।<br>55. बात मत काटो, केवल शान्त हो जाओ।</p><p>56. ऋण के चक्कर में मत पड़ो। तत्क्षण भुगतान करो।<br>57. अगर किसी को ठेस पहुँचाई हो तो माफ़ी मांग लो।<br>58. यदि सार्वजनिक रूप से ठेस पहुँचाई हो तो क्षमा भी सार्वजनिक तौर पर मांगो।<br>59. अगर तुम्हें महसूस हो कि तुमने कुछ ग़लत कह दिया है, अपनी ग़लती मानो और तुरंत वह काम रोक दो।<br>60. अपने पुराने विचारों का केवल इसलिए बचाव मत करो क्योंकि वो तुम थीं जिसने उन्हें कहा था।</p><p>61. बेकार चीज़ें मत रखो।<br>62. स्वयं को दूसरों के विचारों से मत सजाओ।<br>63. मश्हूर हस्तियों के साथ तस्वीरें मत खिंचवाओ।<br>64. अपना मूल्यांकन करने वाली स्वयं बनो।<br>65. तुम्हारे पास जो है उससे स्वयं को परिभाषित मत करो।</p><p>66. ख़ुद को परिवर्तित होने की संभावना की इजाज़त दिए बग़ैर अपने बारे में कभी बातचीत मत करो।<br>67. स्वीकार करो कि कुछ भी तुम्हारा नहीं है।<br>68. जब पूछा जाए कि तुम किसी चीज़ या व्यक्ति के बारे में क्या सोचती हो, केवल विशेषताओं के बारे में ही बताओ।<br>69. जब कभी बीमार पड़ो, इस शैतान से नफ़रत करने की बजाय इसे अपना शिक्षक मानो।<br>70. आँखें चुराकर मत देखो, स्थिर भाव से देखो।</p><p>71. मृत लोगों को मत भूलो, लेकिन उन्हें सीमित जगह ही दो ताकि वे तुम्हारे जीवन पर अधिकार न कर लें।<br>72. जहाँ तुम रहती हो, वहाँ सदैव एक पवित्र स्थान निर्मित करो।<br>73. जब किसी की सहायता करो, तो अपने प्रयासों को दूसरों की दृष्टि में आने से बचाओ।<br>74. यदि तुम दूसरों के लिए कार्य करना तय करो, तो वह ख़ुशी से करो।<br>75. जब “करने” और “न करने” के बीच असमंजस हो, तो जोख़िम उठाओ और “करो”।</p><p>76. अपने सहभागी को सब कुछ देने की कोशिश मत करो। स्वीकार करो कि जो तुम उसे नहीं दे सकती हो, वह उसे दूसरों में ढूंढेगा।<br>77. जब किसी के पास दर्शक/श्रोता हों, तो उन्हें चुराने की मंशा से उनके काम में खलल मत डालो।<br>78. जो धन अर्जित किया है उसीके साथ रहो।<br>79. अपने प्रेम प्रसंगों की शेखी मत बघारो।<br>80. अपनी कमज़ोरियों पर फ़क़्र मत करो।</p><p>81. केवल समय बिताने के लिए किसी से मत मिलो।<br>82. बाँटने की मंशा से चीज़ें हासिल करो।<br>83. यदि तुम ध्यान कर रही हो और शैतान आ जाए, तो शैतान से भी ध्यान कराओ।</p><p>अंग्रेज़ी भाषा में आप “अपनी बेटी को गुर्जिएफ की सलाह” यहाँ पढ़ सकते हैं – <a
href="https://www.satrakshita.com/gurdjieff_advices_to_his_daughter.htm">Gurdjieff′s Advices to his Daughter</a>.</p><p>मैंने कोशिश तो की है, फिर भी इस अनुवाद में मुझे सुधार की बहुत गुंजाइश नज़र आती है। इसलिए यदि आपका कुछ सुझाव हो, तो बेझिझक टिप्पणी करके मुझे अवश्य अवगत कराएँ। उम्मीद है कि “अपनी बेटी को गुर्जिएफ की सलाह” का हिन्दी अनुवाद आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगा।</p><p><strong>– प्रतीक पाण्डे</strong></p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/gurdjieff-advices-his-daughter-hindi/">बेटी को गुर्जिएफ की सलाह – Gurdjieff′s Advices to his Daughter in Hindi</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/gurdjieff-advices-his-daughter-hindi/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>2</slash:comments> </item> <item><title>सफलता के लिए जीवनदृष्टि व संबंधों की कला सिखाने वाली सर्वश्रेष्ठ पुस्तक</title><link>https://hindipath.com/how-to-win-friends-influence-people-hindi-bhuvnesh-sharma/</link> <comments>https://hindipath.com/how-to-win-friends-influence-people-hindi-bhuvnesh-sharma/#comments</comments> <dc:creator><![CDATA[HindiPath]]></dc:creator> <pubDate>Mon, 26 Nov 2018 09:52:40 +0000</pubDate> <category><![CDATA[पुस्तक चर्चा]]></category> <category><![CDATA[Bhuvnesh Sharma]]></category> <category><![CDATA[Dale Carnegie]]></category> <category><![CDATA[Hindi Books]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=488</guid><description><![CDATA[<p>यूं तो किताबें पढ़ना पिछले कुछ समय में कम हुआ है, पहले जहां कुछ भी जो उपलब्&#x200d;ध हुआ पढ़ लेते</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/how-to-win-friends-influence-people-hindi-bhuvnesh-sharma/">सफलता के लिए जीवनदृष्टि व संबंधों की कला सिखाने वाली सर्वश्रेष्ठ पुस्तक</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><em>यूं तो किताबें पढ़ना पिछले कुछ समय में कम हुआ है, पहले जहां कुछ भी जो उपलब्&#x200d;ध हुआ पढ़ लेते थे वहीं अब चुनिंदा पुस्&#x200d;तकें ही पढ़ता हूं। चुनिंदा पुस्&#x200d;तकें मैं उन्&#x200d;हें मानता हूं जिन्&#x200d;होंने वाकई जीवन को, सोचने के तरीके को गहरे तौर पर प्रभावित किया है और जिनमें लिखी बातों की प्रासंगिकता समय गुजरने के बावजूद कायम रहती है, जब भी उनको पलटें तब पढ़ते पढ़ते कितना समय बीत गया पता ही नहीं लगता।</em></p><p>आज मैं उन्&#x200d;हीं चुनिंदा पुस्&#x200d;तकों में से अपनी एक पसंदीदा पुस्&#x200d;तक के बारे में लिखूंगा। वैसे तो मैंने बहुत सी बेस्&#x200d;टसेलर श्रेणी में आने वाली पुस्&#x200d;तकें पढ़ी हैं पर जब इस पुस्&#x200d;तक को पढ़ा तो समझ में आया कि क्&#x200d;यों ये पुस्&#x200d;तक प्रकाशित होने के लगभग अस्&#x200d;सी वर्ष बाद भी सर्वाधिक पढ़े जाने वाली और बिकने वाली पुस्&#x200d;तकों में गिनी जाती है। विदेशी लेखकों की श्रेणी में मैं इन्&#x200d;हें अपना पसंदीदा लेखक मानता हूं। हालांकि विदेशी शब्&#x200d;द का यहां प्रयोग करना ठीक तो नहीं है क्&#x200d;योंकि कोई भी लेखक किसी देश-विशेष या भाषा-विशेष भर से ही संबंध नहीं रखता। उसकी कही बातें सभी सीमाओं से परे और सबके लिए उपयोगी होती हैं।</p><p>चलिए बात करते हैं उस पुस्&#x200d;तक की जिसका नाम है- ‘हाउ टू विन फ्रेंड्स एण्&#x200d;ड इनफ्लुएंस पीपुल’ और इसके लेखक हैं डेल कारनेगी। इस पुस्&#x200d;तक के हिन्&#x200d;दी अनुवाद की प्रति मेरे पास सबसे पहले एक मित्र के माध्&#x200d;यम से पहुंची। वह मित्र मार्केटिंग की नौकरी किया करते थे और खास बात कि उनकी पुस्&#x200d;तकें या साहित्&#x200d;य पढ़ने में कोई रुचि मैंने नहीं देखी। जब उनके यहां इस पुस्&#x200d;तक को मैंने देखा तो मुझे आश्&#x200d;चर्य हुआ। उन्&#x200d;होंने इस पुस्&#x200d;तक की प्रशंसा की और मुझे भी इसे पढ़ने को दिया। उसके बाद से उनसे मुलाकातें बहुत कम हुईं और पुस्&#x200d;तक मेरे पास ही रखी रही। वे मित्र कहीं बाहर रहने लगे परंतु उनकी पुस्&#x200d;तक अब तक एक अनमोल तोहफे के रूप में रखी है जो कि अनजाने में ही मेरे पास रह गई। बाद में इस पुस्&#x200d;तक की मूलभाषा अंग्रेजी में भी मैंने ये पुस्&#x200d;तक खरीदी हालांकि आज भी मैं इसे हिन्&#x200d;दी में ही पढ़ता हूं।</p><p>इस पुस्&#x200d;तक का हिन्&#x200d;दी अनुवाद ‘लोक व्&#x200d;यवहार’ के नाम से उपलब्&#x200d;ध है। हालांकि हिन्&#x200d;दी में पढ़ते हुए कहीं से ये नहीं लगता कि इसे मूलत: किसी और भाषा में लिखा गया है। इतनी सरल भाषा और इतनी आसानी से समझ में आने वाली यह पुस्&#x200d;तक उन लोगों को भी आकर्षित करती है जो पढ़ने के शौकीन नहीं जैसा कि मेरे मित्र के साथ भी हुआ। इस पुस्&#x200d;तक की असल खासियत है इसकी उपयोगिता। इस पुस्&#x200d;तक को पढ़ने का सुझाव मेरे कार्यक्षेत्र में बहुत ही उम्रदराज मेरे सीनियर ने भी दिया था जिन्&#x200d;होंने लगभग आधी सदी पहले इसे पढ़ा होगा। इसी बात से अंदाजा लग जाता है कि इसमें कुछ तो खास है जो इतना समय गुजरने के बावजूद ये पुरानी नहीं लगती।</p><p>हम अपने जीवन में किस तरह लोगों से व्&#x200d;यवहार करते हैं, उनसे बातचीत करते हैं ये ऐसा विषय है जो हमारे संबंधों, कार्यक्षेत्र, हमारे पारिवारिक और सामाजिक जीवन को बहुत हद तक प्रभावित करता है। अमेरिका के सबसे सफल उद्योगपतियों में से एक जॉन डी. रॉकफेलर ने कहा था कि लोगों से व्&#x200d;यवहार करने की कला भी उसी तरह खरीदी जाने वाली एक वस्&#x200d;तु है जैसे कि शक्&#x200d;कर या कॉफी और मैं इस कला के लिए दुनिया की किसी भी चीज से ज्&#x200d;यादा कीमत देने को तैयार हूं।</p><p>डेल कारनेगी ने कहा है कि जो कला दुनिया की किसी भी चीज से ज्&#x200d;यादा कीमती है, उसे सिखाने के लिए दुनिया के हर कॉलेज में कोर्स चलने चाहिए परंतु मैंने ऐसे किसी कोर्स या कॉलेज का नाम नहीं सुना और जब उन्&#x200d;होंने स्&#x200d;वयं इस पर एक कोर्स बनाने के लिए पुस्&#x200d;तकों की खोज शुरू की तो उन्&#x200d;हें एक भी पुस्&#x200d;तक नहीं मिली और तभी इस विषय पर लिखने की जरूरत उन्&#x200d;हें महसूस हुई।</p><p>हमारे जीवन की सफलता और समृद्धि इस बात पर निर्भर करती है कि लोगों से हम किस तरह से व्&#x200d;यवहार कर रहे हैं। लोग सफल बनना चाहते हैं, लोकप्रिय बनना चाहते हैं, लोगों का चहेता बनना चाहते हैं, उनसे अपनी बात मनवाना चाहते हैं तो ऐसी कौन सी बातें हैं जो हमें अमल में लानी चाहिए इस विषय पर लिखी गई ये सबसे प्रेक्&#x200d;टीकल और सबसे बेहतरीन पुस्&#x200d;तक है। हम अक्&#x200d;सर बहस करते हैं, दूसरों की गलतियां निकालते हैं, उनकी आलोचना करते हैं पर फिर भी बात बनने की बजाय और बिगड़ती जाती है। ऐसे में दूसरे किस तरीके से सोचते हैं और क्&#x200d;या चाहते हैं ये हमें जानना बहुत जरूरी है बजाय इसके कि हम उनके बारे में क्&#x200d;या सोचते हैं।</p><p>मानवीय संबंधों के मनोविज्ञान को समझाने वाली इस आसान सी पुस्&#x200d;तक को पढ़ने का मैं सभी को सुझाव दूंगा। आप चाहे सार्वजनिक जीवन में हो, किसी भी व्&#x200d;यवसाय या क्षेत्र में काम करते हों, आप इसे पढ़कर अपने जीवन को निश्चित तौर पर बेहतर बनाने के गुर सीखेंगे और आपके संबंध चाहे निजी हों, पारिवारिक हों या सामाजिक पहले से अधिक प्रगाढ़ और मधुर होंगे।</p><figure
class="wp-block-image alignright size-full wp-image-490 is-style-rounded"><img
decoding="async" width="100" height="100" src="https://hindipath.com/wp-content/uploads/2018/11/bhuvnesh-sharma.jpg?cde07f&amp;cde07f" alt="भुवनेश शर्मा" class="wp-image-490"/><figcaption><strong>भुवनेश शर्मा</strong></figcaption></figure><blockquote
class="wp-block-quote has-white-color has-text-color"><p>भुवनेश शर्मा हिन्दी के पुराने ब्लॉगर्स में से एक हैं। वे पेशे से अधिवक्ता हैं और पठन-पाठन में गहरी रुचि रखते हैं। भुवनेश ने हिन्दी की कई चर्चित ई-पुस्तकों को एकत्रित कर इंटरनेट पर जन-सामान्य के लिए उपलब्ध कराने का काम किया है। वे अपने विचारों को <a
href="http://hindipanna.blogspot.com/">हिन्दी पन्ना</a> पर लिपिबद्ध करते हैं, हालाँकि अब लंबे अरसे से यहाँ सन्नाटा छाया हुआ है। इस लेख में भुवनेश अपनी प्रिय हिंदी पुस्तक के बारे में चर्चा कर रहे हैं।</p></blockquote><p><strong>&#8212; भुवनेश शर्मा</strong></p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/how-to-win-friends-influence-people-hindi-bhuvnesh-sharma/">सफलता के लिए जीवनदृष्टि व संबंधों की कला सिखाने वाली सर्वश्रेष्ठ पुस्तक</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/how-to-win-friends-influence-people-hindi-bhuvnesh-sharma/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>2</slash:comments> </item> <item><title>एक पुस्तक जिसने मेरा जीवन बदल दिया</title><link>https://hindipath.com/book-that-changed-my-life-swami-vivekananda-complete-works-hindi/</link> <comments>https://hindipath.com/book-that-changed-my-life-swami-vivekananda-complete-works-hindi/#comments</comments> <dc:creator><![CDATA[HindiPath]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 18 Oct 2018 01:58:35 +0000</pubDate> <category><![CDATA[पुस्तक चर्चा]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=481</guid><description><![CDATA[<p>यहाँ चर्चा उस किताब की, जिसने मुझे गहराई से प्रभावित किया और मेरा जीवन परिवर्तित कर दिया। पढ़ें और आप भी उस पुस्तक से प्रेरित हों।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/book-that-changed-my-life-swami-vivekananda-complete-works-hindi/">एक पुस्तक जिसने मेरा जीवन बदल दिया</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><em>अब एक अरसे के बाद लिख रहा हूँ–ख़ास तौर पर हिन्दी में। लिखने की शुरुआत तो <a
href="https://astrocamp.com/hindiblog/">२००४ में हिंदी ब्लॉगिंग</a> से की थी और काफ़ी समय लिखते हुए बिताया। तरह-तरह के ब्लॉग विभिन्न विषयों पर बनाए। फिर लिखने की गति सुस्त होती गई और अन्ततः लिखाई थम ही गई।</em></p><p>इस बार प्रयास है पुस्तकों को लेकर। किताबें… पन्नों की महक… साथ में चाय की चुस्कियाँ&#8230; सब अजीब-सा नॉस्टेल्जिया रचते हैं।</p><p>सबसे पहले बात करते हैं कि पुस्तकें ही क्यों–इस विषय को चुनने का क्या कारण है?</p><p>दरअस्ल, हिन्दीपथ.कॉम के पीछे वजह ही किताबें हैं। इस वेबसाइट को बनाने का सबसे बड़ा उद्देश्य ही है अधिकाधिक लोगों तक हिन्दी भाषा की पुस्तकें पहुँचाना और लोगों को हिंदी में पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना।</p><p>यह विचार आया ही एक पुस्तक को पढ़कर कि इसे ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों तक पहुँचना चाहिए। वह पुस्तक है <a
href="/category/dharma/swami-vivekananda/">स्वामी विवेकानंद</a> का सम्पूर्ण साहित्य। जब यह विचार मैंने <a
href="/author/surbhibhadauria/">अपनी धर्मपत्नी सुरभि</a> को बताया, तो उन्होंने तुरंत इस वेबसाइट को शुरू कर दिया। वैसे तो स्वामी जी के संपूर्ण साहित्य में दस खण्ड हैं यानी कि दस किताबें हैं, लेकिन मेरे लिए तो यह एक पुस्तक की ही तरह है। क्योंकि प्रत्येक खंड आपस में कहीं-न-कहीं जुड़ा हुआ है।</p><p>मैं शायद कक्षा ११ में रहा हूंगा जब सबसे पहली बार स्वामी विवेकानन्द की एक पुस्तक हाथ लगी थी। जहाँ तक मुझे याद है उसका नाम था “उत्तिष्ठत् जाग्रत्”, जिसे एकनाथ रानाडे ने संकलित किया था।</p><p>इस किताब का मेरे ऊपर कुछ यूँ असर हुआ कि फिर पहली बार स्वयं ही <a
href="http://www.advaitaashrama.org/" target="_blank" rel="noopener noreferrer">अद्वैत आश्रम, मायावती की वेबसाइट</a> से स्वामी विवेकानंद संपूर्ण साहित्य वीपीपी से ऑर्डर कर दिया। अच्छी बात यह थी कि विवेकानन्द साहित्य का अनुदानित संस्करण उपलब्ध था। दसों खण्ड मात्र ₹२०० में मिल गए।</p><p>उस समय अपन ठन-ठन गोपाल थे। २०० रुपये भी बड़ी चीज़ थी। सो पिताजी से लेकर डाकिए को दिए। मन में थोड़ा भय भी था कि जाने क्या कहेंगे, पैसे देंगे भी या नहीं। लेकिन न उन्होंने कोई सवाल किया और न ही ना-नुकर। तुरन्त पैसे निकालकर दे दिए।</p><p>हाथ में स्वामी विवेकानंद का संपूर्ण साहित्य आते ही मानो सारी दुनिया बदल गई। वेदान्त की गहराइयों से परिचय प्राप्त हुआ, अद्वैत के ऐश्वर्य को निहारा, प्रचण्ड कर्म के मध्य शान्ति के आदर्श को जाना और स्वामी जी के तेजस्वी विचारों से स्वयं को ओत-प्रोत पाया।</p><p>तबसे लेकर आज-तक बहुत-सी किताबें पढ़ीं। कई ने मन पर गहरी छाप भी छोड़ी। फिर भी जो जादू-सा असर विवेकानंद साहित्य को पढ़कर हुआ, उसे ही मैं गंभीरतम महसूस करता हूँ। आज भी कभी ज़रूरत होती है तो विवेकानंद साहित्य की गहराइयों में गोता लगाकर कुछ मोती चुन लाता हूँ, जिनमें सारी समस्याओं के समाधान छुपे होते हैं।</p><p>स्वामी जी के विचारों की सबसे बड़ी विशेषता है उनमें अन्तर्निहित तेजस्विता। वे हमारे सामने केवल और केवल एक ही आदर्श रखते हैं–शक्ति का, आत्मविश्वास का। विवेकानंद अपनी ओजस्वी वाणी में कहते हैं–</p><blockquote><p>संसार का इतिहास उन थोड़े से व्&#x200d;यक्&#x200d;तियों का इतिहास है, जिनमें आत्&#x200d;मविश्&#x200d;वास था। यह विश्&#x200d;वास अन्&#x200d;तःस्&#x200d;थित देवत्&#x200d;व को ललकार कर प्रकट कर देता है। तब व्&#x200d;यक्&#x200d;ति कुछ भी कर सकता है, सर्व समर्थ हो जाता है। असफलता तभी होती है, जब तुम अन्&#x200d;तःस्&#x200d;थ अमोघ शक्&#x200d;ति को व्&#x200d;यक्&#x200d;त करने का यथेष्&#x200d;ट प्रयत्&#x200d;न नहीं करते। जिस क्षण व्&#x200d;यक्&#x200d;ति अथवा राष्&#x200d;ट्र आत्&#x200d;मविश्&#x200d;वास खो देता है, उसी क्षण उसकी मृत्&#x200d;यु हो जाती है।</p></blockquote><p>वेदांत के सिद्धान्तों को आम जीवन में कैसे उपयोग में लाया जाए, इसकी कुंजी भी स्वामी जी के साहित्य से हमें मिलती है। वे इसे “<a
href="/swami-vivekananda-vyavharik-vedant-hindi/">व्यावहारिक वेदान्त</a>” कहा करते थे। स्वामी विवेकानंद का मानना था कि केवल मत-वाद या सिद्धान्त व्यर्थ हैं, जब तक कि उन्हें व्यावहारिकता के धरातल पर नहीं उतारा जाता। वेदान्त को व्यावहारिक जीवन में कैसे इस्तेमाल किया जाए, इसका सूत्र देते हुए वे बतलाते हैं–</p><blockquote><p>यह कभी न सोचना कि आत्&#x200d;मा &#x200d;के लिये कुछ असम्&#x200d;भव है। ऐसा कहना ही भयानक नास्&#x200d;तिकता है। यदि पाप नामक कोई वस्&#x200d;तु है तो यह कहना ही एकमात्र पाप है कि मैं दुर्बल हूं अथवा अन्&#x200d;य कोई दुर्बल है।</p></blockquote><p>आत्म-शक्ति की अभिव्यक्ति को प्रकाशित करते हुए स्वामी जी कहते हैं–</p><blockquote><p>हे मेरे युवक बन्&#x200d;धुगण! बलवान बनो – यही तुम्&#x200d;हारे लिए मेरा उपदेश है। गीता पाठ करने की अपेक्षा फुटबॉल खेलने से तुम स्&#x200d;वर्ग के अधिक समीप पहुंचोगे। मैंने अत्&#x200d;यन्&#x200d;त साहसपूर्वक ये बातें कहीं हैं और इनको कहना अत्&#x200d;यावश्&#x200d;यक है, कारण मैं तुमको प्&#x200d;यार करता हूं। मैं जानता हूं कि कंकड़ कहां चुभता है। मैंने कुछ अनुभव प्राप्&#x200d;त किया है। बलवान शरीर से और मज़बूत पुट्ठों से तुम गीता को अधिक समझ सकोगे।</p></blockquote><p>विवेकानन्द साहित्य पढ़ते-पढ़ते रक्त-प्रवाह तीव्र हो जाता है, मन-मस्तिष्क सकारात्मक विचारों से भर जाता है, आत्म-श्रद्धा अन्तःकरण से प्रस्फुटित हो पड़ती है और जीवन में जो कुछ सृजनात्मक है स्वयमेव घटित होता महसूस होता है। क्या इन शब्दों को पढ़ते ही साहस अपने आप मन में पैदा न हो जाएगा? –</p><blockquote><p>जिसका जो जी चाहे कहे, आपे में मस्&#x200d;त रहो – दुनिया तुम्&#x200d;हारे पैरों तले आ जाएगी, चिन्&#x200d;ता मत करो। लोग कहते हैं – इस पर विश्&#x200d;वास करो, उस पर विश्&#x200d;वास करो; मैं कहता हूं – पहले अपने आप पर विश्&#x200d;वास करो। अपने पर विश्&#x200d;वास करो – सब शक्&#x200d;ति तुम में है – इसकी धारणा करो और शक्&#x200d;ति जगाओ – कहो हम सब कुछ कर सकते हैं। ‘‘नहीं-नहीं कहने से सांप का विष भी असर नहीं करता।’’</p></blockquote><p>मैंने स्वामी विवेकानंद के विचारों से स्वयं के जीवन को रूपान्तरित पाया। साथ ही यह अन्तःप्रेरणा भी हुई कि स्वामी जी के संपूर्ण साहित्य को जन-जन तक पहुँचाया जाए।</p><p>इंटरनेट पर खोजा तो पाया कि अंग्रेज़ी भाषा में तो The Complete Works Of Swami Vivekananda उपलब्ध है, लेकिन हिंदी भाषियों के लिए इसका सर्वथा अभाव है। यह भी महसूस हुआ कि न केवल स्वामी जी का सत्साहित्य, बल्कि हिंदी से जुड़ी सामग्री अभी भी इंटरनेट पर बहुत कम उपलब्ध है।</p><p>इसी विचार के साथ हिन्दीपथ.कॉम की शुरुआत की कि हिंदी की अधिकाधिक सामग्री को आधुनिक तकनीक के माध्यम से जनसामान्य तक पहुँचाया जा सके।</p><p>कार्य के पहले चरण में <a
href="/swami-vivekananda-karma-yoga-hindi-free-download-pdf/">स्वामी विवेकानंद की पुस्तक कर्मयोग</a> को यहाँ प्रस्तुत किया जा चुका है। उनकी एक अन्य पुस्तक <a
href="/swami-vivekananda-raj-yog-hindi-free-download-pdf/">राजयोग</a> पर भी काम चल रहा है। जल्दी ही यह पुस्तक भी यहाँ आपको मिल जाएगी।</p><p>(यह लेख जब लिखा था, तब राजयोग पर काम चल रहा था। अब स्वामी जी की कई पुस्तकें हिंदीपथ पर आ चुकी हैं, यहाँ देखें – <a
href="/download-the-complete-works-of-swami-vivekananda-in-hindi-free/">स्वामी विवेकानंद का संपूर्ण साहित्य</a>। तेज़ी-से काम जारी है। उम्मीद है कि स्वामी विवेकानन्द के संपूर्ण साहित्य को शीघ्र ही जनसुलभ करा सकूंगा।)</p><p>मेरा सभी पाठकों से यही निवेदन है कि स्वामी विवेकानंद का संपूर्ण साहित्य अवश्य पढ़ें। शायद आपके जीवन में भी मेरी ही तरह जादू का सा असर हो और कुछ करने की प्रेरणा प्राप्त हो।</p><p><strong>– प्रतीक पाण्डे</strong></p><p></p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/book-that-changed-my-life-swami-vivekananda-complete-works-hindi/">एक पुस्तक जिसने मेरा जीवन बदल दिया</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/book-that-changed-my-life-swami-vivekananda-complete-works-hindi/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>8</slash:comments> </item> </channel> </rss>