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><channel><title>स्वामी विवेकानंद Archives - हिंदी पथ</title> <atom:link href="https://hindipath.com/category/dharma/swami-vivekananda/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" /><link>https://hindipath.com/category/dharma/swami-vivekananda/</link> <description>हिंदी का संसार</description> <lastBuildDate>Mon, 18 Nov 2024 06:13:04 +0000</lastBuildDate> <language>en-US</language> <sy:updatePeriod> hourly </sy:updatePeriod> <sy:updateFrequency> 1 </sy:updateFrequency> <generator>https://wordpress.org/?v=6.3.8</generator><image> <url>https://hindipath.com/wp-content/uploads/2019/09/HindiPath-Site-Icon-New.png</url><title>स्वामी विवेकानंद Archives - हिंदी पथ</title><link>https://hindipath.com/category/dharma/swami-vivekananda/</link> <width>32</width> <height>32</height> </image> <item><title>गुरु गोविंद सिंह जी शिष्यों को किस प्रकार की दीक्षा देते थे</title><link>https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-12/</link> <comments>https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-12/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सुरभि भदौरिया]]></dc:creator> <pubDate>Mon, 18 Nov 2024 06:13:02 +0000</pubDate> <category><![CDATA[धर्म]]></category> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=6286</guid><description><![CDATA[<p>गुरु गोविंदसिंहजी शिष्यों को किस प्रकार की दीक्षा देते थे -उस समय पंजाब के सर्वसाधारण के मन में उन्होंने एक ही प्रकार की प्रेरणाको जगाया आदि।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-12/">गुरु गोविंद सिंह जी शिष्यों को किस प्रकार की दीक्षा देते थे</a> appeared first on <a
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href="/category/dharma/">धर्म</a> में दीक्षित लोगों को भी दीक्षा दी और हिन्दू बनाकर सिक्ख जाति में मिला लिया तथा किस प्रकार उन्होंने नर्मदा के तट पर अपनी मानवलीला समाप्त की। गुरु गोविन्दसिंह द्वारा दीक्षित जनों में उस समय कैसी एक महान् शक्ति का संचार होता था, उसका उल्लेख कर स्वामीजी ने सिक्ख जातियों में प्रचलित एक दोहा सुनाया &#8211;</p><p>सवा लाख पर एक चढ़ाऊँ। जब गुरु गोविन्द नाम सुनाऊँ॥</p><p>अर्थात् गुरु गोविन्दसिंह से नाम (दीक्षा) सुनकर प्रत्येक मनुष्य में सवा लाख मनुष्य से अधिक शक्ति संचारित होती थी। अर्थात् उनसे दीक्षाग्रहण करने पर उनकी शक्ति से यथार्थ धर्मप्राणता उपस्थित होती थी और प्रत्येक शिष्य का हृदय ऐसे वीरभाव से पूरित हो जाता था कि वह उस समय सवा लाख विधर्मियों को पराजित कर सकता था। धर्म की महिमा बखानेवाली बातों को कहते कहते उनके उत्साहपूर्ण नेत्रों से मानो तेज निकल रहा था। श्रोतागण निःस्तब्ध होकर स्वामीजी के मुख की ओर टकटकी लगाकर देखने लगे। स्वामीजी में कैसा अद्भुत उत्साह और शक्ति थी। जब जिस विषय का प्रसंग करते थे, तब उसी में ऐसे तन्मय हो जाते थे कि यह अनुमान होता था मानो उन्होंने उसी विषय को अन्य सब विषयों से बड़ा निश्चित किया है और उसे लाभ करना ही मनुष्य जीवन का एकमात्र लक्ष्य है।</p><p>कुछ देर बाद शिष्य ने कहा, “महाराज, गुरु गोविन्दसिंहजी ने हिन्दू और मुसलमान दोनों को अपने धर्म में दीक्षित करके एक ही उद्देश्य पर चलाया था, वह बड़ी अद्भुत घटना है। भारत के <a
href="/category/itihaas-history/">इतिहास</a> में ऐसा दूसरा दृष्टान्त नहीं पाया जाता।”</p><p>स्वामीजी &#8211; जब तक लोग अपने में एक ही प्रकार के ध्येय का अनुभव नहीं करेंगे, तब तक कभी एक सूत्र से आबद्ध नहीं हो सकते। जब तक उनका ध्येय एक न हो, तब तक सभा, समिति और वक्तृता से साधारण लोगों को एक नहीं किया जा सकता। गुरु गोविन्दसिंहजी ने उस समय क्या हिन्दू क्या मुसलमान सभी को समझा दिया था कि वे सब लोग कैसे घोर अत्याचार तथा अविचार के राज्य में बस रहे हैं। गुरु गोविन्दसिंहजी ने किसी प्रकार के नये ध्येय की सृष्टि नहीं की। केवल सर्वसाधारण जनता में इसे समझा ही दिया था। इसीलिए हिन्दू-मुसलमान सब उनको मानते हैं। वे शक्ति के साधक थे। भारत-इतिहास में उनके समान बिरला ही दृष्टान्त मिलेगा।</p><p>इसके बाद रात्रि होने पर स्वामीजी सब के साथ नीचे की बैठक में उतर आये। उनके आसन ग्रहण करने पर सब उन्हें फिर घेरकर बैठ गये। अब सिद्धाई के विषय पर प्रसंग आरम्भ हुआ। स्वामीजी बोले, “सिद्धाई या विभूति मन के थोड़े ही संयम से प्राप्त हो जाती है।” शिष्य को लक्ष्य करके बोले, “क्या तू औरों के मन की बात जानने की विद्या सीखेगा? चार पाँच ही दिन में तुझे यह सिखला सकता हूँ।”</p><p>शिष्य &#8211; इससे क्या उपकार होगा?</p><p>स्वामीजी &#8211; क्यों? औरों के मन की बात जान सकेगा।</p><p>शिष्य &#8211; क्या इससे ब्रह्मविद्या लाभ करने में कोई सहायता मिलेगी?</p><p>स्वामीजी &#8211; कुछ भी नहीं।</p><p>शिष्य &#8211; तब वह विद्या सीखने से मेरा कोई प्रयोजन नहीं। परन्तु आपने सिद्धाई के विषय में जो कुछ प्रत्यक्ष किया है या देखा है, उसको सुनने की इच्छा है।</p><p>स्वामीजी &#8211; एक बार मैं हिमालय में भ्रमण करते समय किसी पहाड़ी गाँव में एक रात्रि के लिए ठहर गया था। सायंकाल होने पर गाँव में ढोल का शब्द सुना तो घरवाले से पूछने पर मालूम हुआ कि गाँव में किसी मनुष्य पर ‘देवता चढ़ा’ है। घरवाले के आग्रह से और अपना कौतुक निवारण करने के लिए मैं देखने को गया। जाकर देखा कि बड़ी भीड़ लगी है। उसने लम्बे घूंघर बाल वाले एक पहाड़ी को दिखाकर कहा कि इसी पर देवता चढ़ा है। मैंने देखा कि उसके पास ही एक कुल्हाडी को आग में लाल कर रहे थे; फिर देखा कि उस लाल कुल्हाड़ी से उस देवताविष्ट मनुष्य के शरीर को स्थान स्थान पर जला रहे हैं तथा बालों पर भी उसे छुआ रहे हैं। परन्तु आश्चर्य यह था कि न तो उसका कोई अंग या बाल जलता था, न उसके चेहरे से कोई कष्ट का चिह्न प्रकट होता था। मैं तो देखते ही निर्वाक् रह गया। इसी समय गाँव के मुखिया ने मेरे पास आकर हाथ जोड़कर कहा, ‘महाराज, आप कृपया इसका भूत उतार दीजिये।’ मैं तो यह बात सुनकर घबड़ा गया। पर क्या करता, सब के कहने पर मुझे उस देवताविष्ट मनुष्य के पास जाना पड़ा। परन्तु जाकर उस कुल्हाड़ी की परीक्षा करने की इच्छा हुई। उसमें हाथ लगाते ही मेरा हाथ झुलस गया। तब तो कुल्हाड़ी तनिक काली भी पड़ गयी थी तो भी मारे जलन के मैं बेचैन हो गया। जो कुछ मेरी तर्क युक्ति थी वह सब लोप हो गयी। क्या करूं, जलन के मारे व्याकुल होकर भी उस मनुष्य के सिर पर अपना हाथ रखकर कुछ देर जप किया। परन्तु आश्चर्य यह कि ऐसा करने से दस-बारह मिनट में ही वह अच्छा हो गया। तब गाँववालों की मेरे प्रति भक्ति का क्या ठिकाना था! वे तो मुझे भगवान् ही समझने लगे! परन्तु मैं इस घटना को कुछ भी नहीं समझ सका। बाद में भी कुछ नहीं जान सका। अन्त में और कुछ न कहकर घरवाले के साथ झोपड़ी में लौट आया। तब रात के कोई बारह बजे होंगे। आते ही लेट गया, परन्तु जलन के मारे और इस घटना का कोई भेद न निकाल सकने के कारण नींद नहीं आयी। जलती हुई कुल्हाड़ी से मनुष्य का शरीर दग्ध नहीं हुआ यह सोचकर चिन्ता करने लगा, “There are more things in heaven and earth than dreamt of in your philosophy” &#8211; पृथ्वी और स्वर्ग में ऐसी अनेक घटनाएँ हैं, जिनका सन्धान दर्शनशास्त्रों ने स्वप्न में भी नहीं पाया।</p><p>शिष्य &#8211; बाद में क्या आप इस विषय का रहस्य जान सके थे?</p><p>स्वामीजी &#8211; नहीं, आज ही बातों बातों में वह घटना स्मरण हो आयी, इसलिए तुझसे कह दिया।</p><p>फिर स्वामीजी कहने लगे, “<a
href="/ramkrishna-paramhans-biography-in-hindi/">श्रीरामकृष्ण</a> सिद्धाइयों की बड़ी निन्दा किया करते थे। वे कहा करते थे कि इन शक्तियों के प्रकाश की ओर मन लगाये रखने से कोई परमार्थ-तत्त्वों को नहीं पहुँचता; परन्तु मनुष्य का मन ऐसा दुर्बल है कि गृहस्थों का तो कहना ही क्या है, साधुओं में भी चौदह आने लोग सिद्धाई के उपासक होते हैं। पाश्चात्य देशों में लोग इन जादुओं को देखकर निर्वाक् हो जाते हैं। सिद्धाई लाभ करना बुरा है और वह धर्मपथ में विघ्न डालता है। यह बात श्रीरामकृष्ण के कृपा कर समझाने के कारण ही मैं समझ सका हूँ। इसी हेतु क्या तुमने देखा नहीं कि श्रीगुरुदेव की सन्तानों में से कोई उधर ध्यान नहीं देता?”</p><p>इतने में स्वामी योगानन्दजी ने स्वामीजी से कहा, “मद्रास में एक ओझा से जो तुम्हारी भेंट हुई थी वह कहानी इस गँवार को सुनाओ।”</p><p>शिष्य ने इस विषय को पहले नहीं सुना था। इसलिए उसे कहने के लिए स्वामीजी से आग्रह करने लगा; तब स्वामीजी ने उससे कहा, “मद्रास मे मैं जब मन्मथबाबू के भवन में था, तब एक दिन रात में स्वप्न में देखा कि हमारी माताजी का देहान्त हो गया है। मन में बड़ा दुःख हुआ। उस समय मठ को ही बहुत कम पत्र आदि भेजा करता था, तो घर की तो बात दूर रही। स्वप्न की बात मन्मथबाबू से कहने पर उन्होंने उसकी जाँच करने के लिए कलकत्ते को तार भेजा; क्योंकि स्वप्न देखकर मन बहुत ही घबड़ा रहा था। इधर मद्रास के मित्रगण मेरे अमरीका जाने का सब प्रबन्ध करके जल्दी मचा रहे थे। परन्तु माताजी की कुशल क्षेम का संवाद न मिलने से मेरा मन जाने को नहीं चाहता था। मेरे मन की अवस्था देखकर मन्मथबाबू मुझसे बोले, ‘देखो, नगर से कुछ दूर पर एक पिशाच-सिद्ध मनुष्य है, वह जीव के भूत-भविष्यत्, शुभ-अशुभ सब संवाद बतला सकता है।’ मन्मथबाबू की प्रार्थना से और अपने मानसिक उद्वेग को दूर करने के निमित्त मैं उसके पास जाने को राजी हुआ। मन्मथबाबू, मैं, आलासिंगा तथा एक और सज्जन कुछ दूर तक रेल से गये; फिर पैदल चलकर वहाँ पहुँचे। पहुँचकर क्या देखा कि श्मशान के पास विकट आकार का मृतक-सा, सूखा, बहुत काले रंग का एक मनुष्य बैठा है। उसके अनुचरगण ने ‘किडीं-मिडीं’ कर मद्रासी भाषा में समझा दिया कि वही पिशाचसिद्ध पुरुष है। प्रथम तो उसने हम लोगों पर कोई ध्यान नहीं दिया। फिर जब हम लौटने को हुए, तब हम लोगों से ठहरने के लिये विनय की। हमारे साथी आलासिंगा ने ही उसकी भाषा हमें, तथा हमारी भाषा उसे समझाने का कार्य किया। उससे ही हम लोगों से ठहरने को कहा। फिर एक पेंसिल लेकर वह पिशाच-सिद्ध मनुष्य कुछ समय तक न जाने क्या लिखता रहा। फिर देखा कि वह मन को एकाग्र करके बिलकुल स्थिर हो गया, उसके बाद मेरा नाम, गोत्र इत्यादि चौदह पीढ़ी तक की बातें बतलायीं और कहा कि <a
href="/my-master-ramakrishna-paramhamsa-vivekananda-hindi/">श्रीरामकृष्णजी</a> मेरे साथ सर्वदा फिर रहे हैं। माताजी का मंगल समाचार भी बतलाया। और यह भी कहा कि धर्मप्रचार के लिए मुझे शीघ्र ही बहुत दूर जाना पड़ेगा। इस प्रकार माताजी का कुशल मंगल मिल जाने पर मन्मथबाबू के साथ शहर लौटा। यहाँ पहुँचकर कलकत्ते से तार के जवाब में भी माताजी का कुशल मंगल मिल गया।”</p><p>स्वामी योगानन्द को लक्ष्य करके स्वामीजी बोले, “परन्तु उस पुरुष ने जो कुछ बतलाया था वह सब पूरा हुआ। यह ‘काकतालीय’ के समान ही हो या और किसी प्रकार से हो गया हो।”</p><p>इसके उत्तर में स्वामी योगानन्द बोले, “तुम पहले इन सब बातों पर विश्वास नहीं करते थे, इसलिए तुम्हे यह सब दिखलाने की आवश्यकता उत्पन्न हुई थी।”</p><p>स्वामीजी &#8211; मैं क्या बिना देखे-भाले किसी पर विश्वास करता? मैं तो ऐसा मनुष्य ही नहीं हूँ। महामाया के राज्य में आकर जगत्रूपी जादू के साथ साथ और कितने ही जादू देखने में आये। माया! माया!! अब <a
href="/ram-chalisa/">राम</a> कहो, राम कहो! आज कैसा फजूल बातें हुई। भूत प्रेत की चिन्ता करने से लोग भूत प्रेत ही बन जाते हैं, और जो रात-दिन जानकर या न जानकर भी कहते हैं, ‘मैं नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त आत्मा हूँ’ वे ही ब्रह्मज्ञ होते हैं।</p><p>यह कहकर स्वामीजी शिष्य को स्नेह से लक्ष्य करके बोले, “इन सब व्यर्थ की बातों को मन में तिल मात्र भी स्थान न दो। सदैव सत् और असत् का ही विचार करो; आत्मा को प्रत्यक्ष करने के निमित्त प्राणपण से यत्न करो। आत्मज्ञान से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है। और जो कुछ है वह सभी माया है &#8211; जादू है। एक प्रत्यगात्मा ही अबाधित सत्य है। इस बात की यथार्थता में ठीक ठीक समझ गया हूँ, इसीलिए तुम सब को समझाने की चेष्टा भी करता हूँ। ‘ऐकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन।’ ”</p><p>बात करते करते रात के ग्यारह बज गये। इसके बाद स्वामीजी भोजन कर विश्राम करने चले। शिष्य भी स्वामीजी के चरणकमलों में दण्डवत् कर बिदा हुआ। स्वामीजी ने पूछा, “कल फिर आयगा न?”</p><p>शिष्य &#8211; जी महाराज, अवश्य आऊँगा। प्रतिदिन आपके दर्शन न होने से चित्त व्याकुल हो जाता है।</p><p>स्वामीजी &#8211; अच्छा तो जाओ। रात अधिक हो गयी है।</p><p>शिष्य स्वामीजी की बातों पर विचार करता हुआ रात के बारह बजे घर लौटा।</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=6292</guid><description><![CDATA[<p>नये मठ की भूमि पर श्रीरामकृष्ण की प्रतिष्ठा - आचार्य शंकरकी अनुदारता - बौद्ध धर्म का पतन, कारण-निर्देश - तीर्थमाहात्म्य आदि।</p><p>The post <a
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href="/ramkrishna-paramhans-biography-in-hindi/">श्रीरामकृष्ण</a> की प्रतिष्ठा &#8211; आचार्य शंकरकी अनुदारता &#8211; बौद्ध <a
href="/category/dharma/">धर्म</a> का पतन, कारण-निर्देश &#8211; तीर्थमाहात्म्य &#8211; ‘रथेतु वामनं दृष्ट्वा’ इत्यादि श्लोक का अर्थ &#8211; भावाभाव के अतीत ईश्वर स्वरूप की उपासना।</p><p>आज स्वामीजी नये मठ की भूमि पर यज्ञ करके श्रीरामकृष्ण की प्रतिष्ठा करेंगे। प्रतिष्ठा दर्शन करने की इच्छा से शिष्य पिछली रात से ही मठ में उपस्थित है।</p><p>प्रातःकाल गंगास्नान कर स्वामीजी ने पूजाघर में प्रवेश किया। फिर पूजन के आसन पर बैठकर पुष्पपात्र में जो कुछ फूल और बिल्वपत्र थे, दोनों हाथ में सब एक साथ उठा लिये और श्रीरामकृष्णदेव की पादुकाओं पर अर्पित कर ध्यानस्थ हो गये &#8211; कैसा अपूर्व दर्शन था! उनकी धर्म प्रभाविभासित स्निग्धोज्ज्वलकान्ति से पूजागृह मानो एक अद्भुत ज्योति से पूर्ण हो गया! स्वामी प्रेमानन्द तथा अन्य स्वामीगण पूजागृह के द्वार पर खड़े रहे।</p><p>ध्यान तथा पूजा समाप्त होने के बाद नये मठ की भूमि में जाने का आयोजन होने लगा। ताँबे के जिस डिब्बे में <a
href="/my-master-ramakrishna-paramhamsa-vivekananda-hindi/">श्रीरामकृष्णदेव</a> की भस्मास्थि रक्षित थी, स्वामीजी स्वयं उसको अपने कन्धे पर रखकर आगे चलने लगे। शिष्य अन्य संन्यासियों के साथ पीछे पीछे चला। शंख-घण्टों की ध्वनि चारों ओर गूँज उठी। भागीरथी <a
href="/ganga-chalisa/">गंगाजी</a> अपनी लहरों से मानो हाव-भाव के साथ नृत्य करने लगीं। मार्ग से जाते समय स्वामीजी शिष्य से बोले, ‘श्रीगुरुदेव ने मुझसे कहा था कि तू मुझे कन्धे पर चढ़ाकर जहाँ ले जायगा, मैं वहीं जाऊँगा और रहूँगा, चाहे वह स्थान वृक्ष के तले हो या कुटी हो।’ इसीलिए मैं स्वयं उनको कन्धे पर उठाकर नयी मठभूमि पर ले जा रहा हूँ। निश्चय जान लेना कि श्रीगुरुदेव ‘बहुजनहिताय’ यहाँ दीर्घ काल रहेंगे।</p><p>शिष्य &#8211; श्रीरामकृष्ण ने आपसे यह बात कब कही थी?</p><p>स्वामीजी &#8211; (मठ के साधुओं को दिखाकर) क्या इनसे कभी यह बात नहीं सुनी? काशीपुर के बाग में उन्होंने यह कहा था!</p><p>शिष्य &#8211; जी हाँ, हाँ। उसी समय सेवाधिकार के बारे में श्रीरामकृष्ण के गृहस्थ तथा संन्यासी भक्तों में कुछ फूट-सी पड़ गयी थी।</p><p>स्वामीजी &#8211; ‘हाँ, फूट तो नहीं कह सकते, पर मन में कुछ मैलसा जरूर आ गया था। स्मरण रखना कि जो श्रीरामकृष्ण के भक्त है, जिन्होने उनकी कृपा यथार्थ पायी है, वे गृहस्थ हो या <a
href="/swami-vivekananda-sanyasi-meaning-hindi/">संन्यासी</a>, उनमें कभी कोई फूट नहीं हो सकती और न रही है। फिर भी उस थोड़ेसे मनोमालिन्य का कारण क्या था, सुनेगा? सुन, प्रत्येक भक्त अपने अपने रंग से श्रीरामकृष्ण को रँगता है और इसीलिए वह उन्हें भिन्न भिन्न भाव से देखता है तथा समझता है। मानो वे एक सूर्य है और हम लोग भिन्न भिन्न रंगों के कांच अपनी आँखों के सामने लगाकर उस एक ही सूर्य को भिन्न भिन्न रंगों का अनुमान करते हैं। इसी प्रकार से भविष्य में भिन्न भिन्न मतों का सृजन होता है; परन्तु जो सौभाग्य से अवतारी पुरुषों का साक्षात् सत्संग करते हैं, उनके जीवन-काल में ऐसे दलों का प्रायः सृजन नहीं होता। आत्माराम पुरुष की ज्योति से वे चकाचौंध हो जाते हैं; अहंकार, अभिमान, क्षुद्र बुद्धि आदि सब मिट जाते हैं। अतएव दल बनाने का कोई अवसर उनको नहीं मिलता। वे अपने अपने भावानुसार उनकी हृदय से पूजा करते हैं।</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, तब क्या श्रीरामकृष्ण के सब भक्त उनको भगवान जानकर भी उसी एक भगवान के रूप को भिन्न भिन्न भावों से देखते हैं और इसी कारण क्या उनके शिष्य एवं प्रशिष्य छोटी छोटी सीमाओं में बद्ध होकर छोटे छोटे दल या सम्प्रदायो का सृजन कर बैठते हैं?</p><p>स्वामीजी &#8211; हाँ, इसी कारण से कुछ समय में सम्प्रदाय बन ही जायेंगे। देखो न, चैतन्यदेव के वर्तमान समय के अनुयायिओं में दो तीन सौ सम्प्रदाय हैं, ईसा के भी हजारों मत निकले है, परन्तु बात यह है कि वे सब सम्प्रदाय चैतन्यदेव और ईसा को ही मानते हैं।</p><p>शिष्य &#8211; तो ऐसा अनुमान होता है कि श्रीरामकृष्ण के भक्तों में भी कुछ समय के पश्चात् अनेक सम्प्रदाय निकल पड़ेंगे।</p><p>स्वामीजी &#8211; अवश्य निकलेंगे; परन्तु जो मठ हम यहाँ बनाते हैं उसमें सभी मतों और भावों का सामंजस्य रहेगा। श्रीगुरुदेव का जो उदार मत था उसी का यह केन्द्र होगा। महासमन्वयरूपी किरण जो यहाँ से प्रकाशित होगी, उससे सारा जगत् प्रकाशित हो जायगा।</p><p>इसी प्रकार का वार्तालाप करते हुए वे सब मठ भूमि पर पहुँचे। स्वामीजी ने कन्धे पर से डिब्बे को जमीन पर बिछे हुए आसन पर उतारा और भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया। अन्य सभी ने भी प्रणाम किया।</p><p>इसके बाद स्वामीजी पूजा के लिए बैठ गये। पूजा के अन्त में यज्ञाग्नि प्रज्वलित करके हवन किया और संन्यासी गुरुभाइयों की सहायता से स्वयं क्षीर पकाकर श्रीरामकृष्ण को भोग चढ़ाया। ऐसा स्मरण होता है कि उस दिन स्वामीजी ने कुछ गृहस्थों को दीक्षा भी दी थी। जो कुछ भी हो, फिर पूजा सम्पन्न होने पर स्वामीजी ने समागतों को आदर से बुलाकर कहा, “आज आप लोग तन-मन-वाक्य द्वारा श्रीगुरुदेव से ऐसी प्रार्थना कीजिये जिससे महायुगावतार श्रीरामकृष्ण ‘बहुजनहिताय बहुजनसुखाय’ इस पुण्यक्षेत्र पर अधिष्ठित रहें और इसे सब धर्मों का अपूर्व समन्वय-केन्द्र बनाये रखें।” हाथ जोड़कर सभी ने प्रार्थना की। पूजा सम्पूर्ण होने पर स्वामीजी ने शिष्य से कहा, “श्रीगुरुदेव के इस डिब्बे को लौटा ले जाने का अधिकार हम लोगों (संन्यासियों) में से किसी को नहीं है; क्योंकि हमने ही यहाँ श्रीगुरुदेव की स्थापना की है। अतएव तू इस डिब्बे को अपने मस्तक पर रखकर मठ (नीलाम्बर बाबू की वाटिका) को ले चल।” शिष्य को डिब्बे का स्पर्श करने में हिचकिचाते देख स्वामीजी बोले, “डरो मत, उठा लो, मेरी आज्ञा है।” तब शिष्य ने बड़े आनन्द से स्वामीजी की आज्ञा को शिरोधार्य कर डिब्बे को अपने सिर पर उठा लिया। अपने गुरु की आज्ञा से उस डिब्बे को स्पर्श करने का अधिकार पाने पर उसने अपने को कृतार्थ माना। आगे आगे शिष्य, उसके पीछे स्वामीजी और उनके पीछे बाकी सब चलने लगे। रास्ते में स्वामीजी उससे बोले, “श्रीगुरुदेव तेरे सिर पर सवार होकर तुझे आशीर्वाद दे रहे हैं। आज से सावधान रहना, किसी अनित्य विषय में अपना मन न लगाना।” एक छोटासा पुल पार करते समय स्वामीजी शिष्य से फिर बोले, “देखो, यहाँ खूब सावधानी और सतकर्ता से चलना।”</p><p>इस प्रकार सब लोग निर्विघ्न मठ में पहुँचकर हर्ष मनाने लगे। स्वामीजी अब शिष्य से कथा-प्रसंग करने लगे, “श्रीगुरुदेव की इच्छा से आज उनके धर्मक्षेत्र की प्रतिष्ठा हो गयी। बारह वर्ष की चिन्ता का बोझ आज सिर से उतर गया। अब मेरे मन में क्या क्या भाव उदय हो रहे हैं, सुनेगा? यह मठ विद्या एवं साधना का एक केन्द्र-स्थान होगा। तुम्हारे समान सब धार्मिक गृहस्थ इस भूमि के चारों ओर अपने घर-बार बसाकर बसेंगे और बीच में त्यागी संन्यासी लोग रहेंगे। मठ के दक्षिण की ओर इंग्लैंड तथा अमरीका के भक्तों के लिए गृह बनाये जायेंगे। यदि ऐसा बन जाय तो कैसा होगा?</p><p>शिष्य &#8211; आपकी यह कल्पना बड़ी अद्भुत है।</p><p>स्वामीजी &#8211; कल्पना क्यों? समय आने पर यह सब अवश्य हो जायगा। मैं तो इसकी नींव मात्र डाल रहा हूँ। बाद में और न जाने क्या क्या होगा? कुछ तो मैं कर जाऊँगा और कुछ विचार (ideas) तुम लोगों को दे जाऊँगा! भविष्य में तुम उन सब को कार्य रूप में परिणत करोगे। बड़ी बड़ी मीमांसा (principles) को सुनकर रखने से क्या होगा? प्रतिदिन उनको कार्यान्वित करना चाहिए। शास्त्रों की लम्बी लम्बी बातों को केवल पढ़ने से क्या होगा? पहले उन्हें समझना चाहिए। फिर अपने जीवन में उनकों परिणत करना चाहिए। समझे? इसी को कहते हैं (practical religion) व्यावहारिक धर्म।</p><p>इस प्रकार अनेक प्रसंग होते-होते श्रीशंकराचार्य का प्रसंग आरम्भ हुआ। शिष्य आचार्य शंकर का बड़ा ही पक्षपाती था; यहाँ तक कि उसको उन पर दीवाना कहा जा सकता था। वह सब दर्शनों में शंकरप्रतिष्ठित अद्वैत मत को मुकुटमणि समझता था। और यदि कोई श्रीशंकराचार्य के उपदेशों में कुछ दोष निकालता था तो उसके हृदय में सर्पदंश की सी पीड़ा होने लगती थी। स्वामीजी यह जानते थे और उनको यह पसन्द नहीं था कि कोई किसी मत का दीवाना बन जाय। वे जब भी किसी को किसी विषय का दीवाना देखते थे, तभी उस विषय के विरुद्ध पक्ष में सहस्रों अमोघ युक्तियों से उस दीवानेपनरूपी बांध को चूर्ण चूर्ण कर देते थे।</p><p>स्वामीजी &#8211; शंकर की बुद्धि क्षुर-धार के समान तीव्र थी। वे विचारक थे और पण्डित भी, परन्तु उनमें उदार भावों की गम्भीरता अधिक नहीं थी और ऐसा अनुमान होता है कि उनका हृदय भी उसी प्रकार था। इसके अतिरिक्त उनमें ब्राह्मणत्व का अभिमान बहुत था। एक दक्षिणी ब्राह्मण थे, और क्या? अपने <a
href="/vedanta-bharat-mein-vivekananda-3/">वेदान्त</a> भाष्य में कैसी बहादुरी से समर्थन किया है कि ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य जातियों को ब्रह्मज्ञान नहीं हो सकता। उनके विचार की क्या प्रशंसा करूँ! विदुरजी का उल्लेख कर उन्होंने कहा है कि पूर्व जन्म में ब्राह्मण शरीर होने के कारण वह (विदुर) ब्रह्मज्ञ हुए थे। अच्छा, यदि आजकल किसी शूद्र को ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो तो क्या शंकर के मतानुसार कहना होगा कि वह पूर्वजन्म में ब्राह्मण था? क्यों ब्राह्मणत्व को लेकर ऐसी खींचातानी करने का क्या प्रयोजन है। वेद ने तो प्रत्येक त्रैवर्णिक को ही वेदपाठ और ब्रह्मज्ञान का अधिकारी बताया है। तो फिर इस विषय के निमित्त वेद के भाष्य में ऐसी अद्भुत विद्या का प्रकाश करने का कोई प्रयोजन न था। फिर उनके हृदय के भाव का विचार करो। उन्होंने कितने बौद्ध श्रमणकों को आग में झोंक मार डाला! इन बौद्ध लोगों की भी कैसी बुद्धि थी कि तर्क में हारकर आग में जल मरे। शंकराचार्य के ये कार्य, संकीर्ण दीवानेपन से निकले हुए पागलपन के अतिरिक्त और क्या हो सकते हैं; दूसरी ओर बुद्धदेव के हृदय का विचार करो। ‘बहुजनहिताय बहुजनसुखाय’ का तो कहना ही क्या, वे एक बकरी के बच्चे की जीवनरक्षा के लिए अपना जीवन-दान देने को सदा प्रस्तुत रहते थे। कैसा उदार भाव, कैसी दया! &#8211; एक बार सोचो तो। शिष्य &#8211; क्यों महाराज, क्या बुद्धदेव के इस भाव को भी और एक प्रकार का पागलपन नहीं कह सकते? एक पशु के निमित्त अपने प्राण देने को तैयार हो गये!</p><p>स्वामीजी &#8211; परन्तु उनके उस दीवानेपन से इस संसार के कितने जीवों का कल्याण हुआ यह भी तो देखो। कितने आश्रम बने, कितने विद्यालय खुले, कितनी पशुशालाएँ स्थापित हुई, स्थापत्य विद्या का कितना विकास हुआ, यह सब भी तो सोचो! बुद्धदेव के जन्म होने के पूर्व इस देश में क्या था? तालपत्र की पोथियों में कुछ धर्मतत्त्व था, सो भी बिरले ही मनुष्य उनको जानते थे। लोग इसको कैसे नित्य कार्य में परिणत करें यह बुद्धदेव ने ही सिखलाया। वे ही वास्तव में वेदान्त के स्फूर्ति-देवता थे।</p><p>शिष्य &#8211; परन्तु महाराज, यह भी है कि वर्णाश्रमधर्म को तोड़कर भारत में हिन्दू धर्म के विप्लव की सृष्टि वे ही कर गये हैं और इसीलिए कुछ ही दिनों में उनका धर्म भारत से निकाल दिया गया। यह बात भी सत्य प्रतीत होती है।</p><p>स्वामीजी &#8211; बौद्ध धर्म की ऐसी दुर्दशा उनकी शिक्षा के कारण नहीं हुई, पर हुई उनके शिष्यों के दोष से। दर्शनशास्त्रों की अत्यधिक चर्चा से उनके हृदय की उदारता कम हो गयी। तत्पश्चात् क्रमशः वामाचारियों के व्यभिचार से बौद्ध धर्म मर गया। ऐसी बीभत्स वामाचार-प्रथा का उल्लेख वर्तमान समय के किसी तन्त्र में भी नहीं है! बौद्ध धर्म का एक प्रधान केन्द्र ‘जगन्नाथ क्षेत्र’ था। वहाँ के मन्दिर पर जो बीभत्स मूर्तियाँ खुदी हुई हैं, उनको देखने से ही इन बातों को जान जाओगे। श्रीरामानुजाचार्य तथा महाप्रभु चैतन्यदेव के समय से यह पुरुषोत्तम क्षेत्र वैष्णवों के अधिकार में आया है। वर्तमान समय में महापुरुषों की शक्ति से इस स्थान ने एक और नया रूप धारण किया है।</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, शास्त्रों से तीर्थस्थानों की विशेष महिमा जान पड़ती है। यह कहाँ तक सत्य है?</p><p>स्वामीजी &#8211; समस्त ब्रह्माण्ड जब नित्य आत्मा ईश्वर का ही विराट शरीर है, तब विशेष विशेष स्थानों के माहात्म्य में आश्चर्य की क्या बात है? विशेष स्थानों पर उनका विशेष विकास है। कहीं पर आप ही से प्रकट होते हैं और कहीं कहीं शुद्धसत्त्व मनुष्य के व्याकुल आग्रह से प्रकट होते हैं। साधारण मनुष्य जिज्ञासु होकर वहाँ पहुँचने पर सहज में फल प्राप्त करते हैं। इसलिए तीर्थादि का आश्रय लेने से समय पर आत्मा का विकास होना सम्भव है।</p><p>फिर भी यह तुम निश्चय जानो कि इस मानव-शरीर की अपेक्षा और कोई बड़ा तीर्थ नहीं है। इस शरीर में जितना आत्मा का विकास हो सकता है उतना और कहीं नहीं। श्रीजगन्नाथजी का जो रथ है वह भी मान इसी शरीररूपी रथ का एक स्थूल रूप है। इसी शरीररूपी रथ में हमें आत्मा का दर्शन करना होगा। तूने तो पढ़ा ही है कि ‘आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु’। ‘मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते’ में जो वामनरूपी आत्मा के दर्शन का वर्णन किया है, वही ठीक जगन्नाथ दर्शन है। इसी प्रकार ‘रथे च वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते’ का भी अर्थ यही है कि तेरे शरीर में जो आत्मा है उसका दर्शन यदि तू कर लेगा तो फिर तेरा पुनर्जन्म नहीं होगा। परन्तु अभी तो तू इस आत्मा की उपेक्षा करके अपने इस विचित्र जड़ शरीर को ही सर्वदा ‘मैं’ समझा करता है। यदि लकड़ी के रथ में भगवान को देखकर ही जीव की मुक्ति हो जाती तब तो प्रत्येक वर्ष करोड़ों मनुष्यों को ही मुक्तिलाभ हो जाता &#8211; और फिर आजकल तो जगन्नाथजी पहुँचने के लिए रेल की भी सुविधा हो गयी है! फिर भी जगन्नाथजी के सम्बन्ध में साधारण भक्तों का जो विश्वास है उसके बारे में मैं यह नहीं कहता हूँ कि वह कुछ भी नहीं अथवा मिथ्या है और सचमुच एक श्रेणी के लोग ऐसे हैं भी जो इसी मूर्ति का अवलम्बन लेकर धीरे धीरे उच्च तत्त्व को प्राप्त हो जाते हैं; अतएव इस मूर्ति का आश्रय लेकर भगवान की विशेष शक्ति जो प्रकाशित हो रही है इसमें भी किसी प्रकार का सन्देह नहीं है।</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, फिर, क्या मूर्ख और बुद्धिमान का धर्म अलग अलग है?</p><p>स्वामीजी &#8211; हाँ, यदि ऐसा न होता तो शास्त्रों में अधिकार के बारे में जो इतनी चर्चा, इतना निर्देश तथा वर्णन आदि किया गया है वह फिर क्यों होता? सब कुछ सत्य ही है। फिर भी आपेक्षिक सत्य भिन्न भिन्न मात्राओं का होता है। मनुष्य जिसे सत्य कहता है वह सब इसी प्रकार का है &#8211; कोई अल्प मात्रा में सत्य होता है, कोई अधिक मात्रा में। नित्य सत्य तो केवल एकमात्र भगवान ही हैं। यही आत्मा जड़ वस्तुओं में भी व्याप्त है &#8211; यद्यपि नितान्त सुप्तावस्था में। यही जीव-नामधारी मनुष्य में किसी अंश में जागृत (Conscious) हो जाती है। फिर श्रीकृष्ण, बुद्धदेव, भगवान शंकराचार्य आदि में वही पूर्ण भाव से जागृत (Superconscious) हो जाती है। इसके परे और एक अवस्था है जिसको भाव या भाषा द्वारा प्रकट नहीं कर सकते &#8211; ‘अवाङ्मनसगोचरम्’।</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, किसी किसी भक्त-सम्प्रदाय का ऐसा मत है कि भगवान के साथ कोई एक भाव या सम्बन्ध स्थापित करके साधना करनी चाहिए। वे लोग आत्मा की महिमा आदि पर कोई ध्यान नहीं देते। और जब इस सम्बन्ध में कोई चर्चा होती है तो वे कहते हैं कि ‘यह सब चर्चा छोड़कर सर्वदा भाव में ही रहो’।</p><p>स्वामीजी &#8211; हाँ, उनके लिए उनका यह कहना भी ठीक है। ऐसा ही करते करते एक दिन उनमें भी ब्रह्म जागृत हो उठेगा। हम संन्यासी भी जो कुछ करते हैं वह भी एक प्रकार का ‘भाव’ ही हैं। हमने संसार का त्याग किया है; अतएव माँ, बाप, स्त्री, पुत्र इत्यादि जो सांसारिक सम्बन्ध हैं उनमें से किसी एक का भाव ईश्वर पर आरोपित कर साधना करना हमारे लिए कैसे सम्भव हो सकता है? हमारी दृष्टि से ये सब संकीर्ण बातें हैं। सचमुच, सब भावों से अतीत भगवान की उपासना करना बड़ा कठिन है। परन्तु बताओ तो सही यदि हम अमृत नहीं पा सकते तो क्या विषपान करने लगें? इसी आत्मा के सम्बन्ध में तू सदैव चर्चा कर, श्रवण कर, मनन कर। इस प्रकार अभ्यास करते करते कुछ समय के बाद देखेगा कि तुझमें ब्रह्मरूपी सिंह जागृत हो उठेगा। तू इन सब भावकल्पनाओं से परे चला जा। सुन, कठोपनिषद् में यम ने क्या कहा है &#8211;</p><p>‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’ &#8211; उठो, जागो और श्रेष्ठ पुरुषों के पास जाकर ज्ञान प्राप्त कर लो।</p><p>इस प्रकार यह प्रकरण समाप्त हुआ। मठ में प्रसाद पाने की घण्टी हो गयी और स्वामीजी के साथ शिष्य भी प्रसाद ग्रहण करने के लिए चला गया।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-14/">नये मठ की भूमि पर श्रीरामकृष्ण की प्रतिष्ठा</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-14/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद की बाल्य व यौवन अवस्था की कुछ घटनाएँ तथादर्शन</title><link>https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-15/</link> <comments>https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-15/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सुरभि भदौरिया]]></dc:creator> <pubDate>Mon, 18 Nov 2024 06:11:28 +0000</pubDate> <category><![CDATA[धर्म]]></category> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=6313</guid><description><![CDATA[<p>स्वामीजी की बाल्य व यौवन अवस्था की कुछ घटनाएँ तथादर्शन - भीतर से मानो कोईवत्तृताराशि को बढ़ाता है ऐसी अनुभूति आदि।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-15/">स्वामी विवेकानंद की बाल्य व यौवन अवस्था की कुछ घटनाएँ तथादर्शन</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><br><strong>स्थान &#8211;</strong> बेलुड़ &#8211; किराये का मठ<br><br><strong>वर्ष &#8211;</strong> १८९८ ईसवी (फरवरी मास)<br><br><strong>विषय &#8211; </strong>स्वामीजी की बाल्य व यौवन अवस्था की कुछ घटनाएँ तथादर्शन &#8211; अमरिका में प्रकाशित विभूतियों का वर्णन &#8211; भीतर से मानो कोईवत्तृताराशि को बढ़ाता है ऐसी अनुभूति &#8211; अमरीका के स्त्रीपुरुषों का गुणावगुण &#8211; ईर्ष्या के मारे पादरियों का अत्याचार &#8211; जगत् में कोई महत्कार्य कपट सेनहीं बनता &#8211; ईश्वर पर निर्भरता &#8211; नाग महाशय के विषय में कुछ कथन।<br></p><p>स्वामीजी मठ को बेलुड़ में, श्रीयुत नीलाम्बर बाबू के बाग में ले आये हैं। आलमबाजार में से यहाँ आने पर अभी तक सब वस्तुओं को ठीक से लगाया नहीं गया है। चारों ओर सब बिखरी पड़ी हैं। स्वामीजी नये भवन में आकर बड़े प्रसन्न हो रहे हैं. शिष्य के यहाँ उपस्थित होने पर बोले, “अहा! देखो कैसी <a
href="/ganga-chalisa/">गंगाजी</a> है। कैसा भवन है! ऐसे स्थान पर मठ न बनने से क्या कभी चित्त प्रसन्न होता।” अब अपराह्न का समय था।</p><p>सन्ध्या के पश्चात् दुमंजिले पर स्वामीजी से शिष्य का साक्षात् होने से अनेक प्रकार की चर्चा होने लगी। उस गृह में उस समय और कोई भी नहीं था। शिष्य बीच बीच में बातचीत के सिलसिले में अनेक प्रकार के प्रश्न करने लगा। अन्त में उसने उनकी बाल्यावस्था के विषय में सुनने की अभिलाषा प्रकट की। स्वामीजी कहने लगे, “छोटी अवस्था से ही मैं बड़ा साहसी था। यदि ऐसा न होता तो निःसम्बल संसार में फिरना क्या मेरे लिए कभी सम्भव होता?”</p><p><a
href="/valmiki-ramayan-ka-paath-kaise-karein/">रामायण</a> की कथा सुनने की इच्छा उन्हें बचपन से ही थी। पड़ोस में यहाँ भी <a
href="/ramayan-hindi/">रामायणगान</a> होता था, वहीं स्वामीजी अपना खेलकूद छोड़कर पहुँच जाते थे। उन्होंने कहा कि कथा सुनते सुनते किसी दिन उसमें ऐसे लीन हो जाते थे कि अपना घरबार तक भूल जाते थे। ‘रात बढ़ गयी है’ या ‘घर जाना है’ इत्यादि विषयों का स्मरण भी नहीं रहता था। किसी दिन कथा में सुना कि <a
href="/hanuman-chalisa-in-hindi/">हनुमानजी</a> कदली बन में रहते हैं। सुनते ही उनके मन में इतना विश्वास हो गया कि वे कथा समाप्त होने पर उस दिन रात में घर नहीं लौटे और घर के निकट किसी एक उद्यान में केले के पेड़ के नीचे बहुत रात तक <a
href="/hanuman-bahuk-in-hindi-free-pdf-download/">भगवान हनुमानजी</a> के दर्शन पाने की इच्छा से बैठे रहे।</p><p>रामायण के नायक नायिकाओं में से हनुमानजी पर स्वामीजी की अगाध भक्ति थी। <a
href="/swami-vivekananda-sanyasi-meaning-hindi/">संन्यासी</a> होने पर भी कभी कभी <a
href="/tirthankar-mahaveer-chalisa/">महावीरजी</a> के प्रसंग में मतवाले हो जाते थे और अनेक बार मठ में <strong><a
href="/mahaveer-bhagwan-ki-aarti/">महावीर</a></strong> की एक प्रस्तर मूर्ति रखने का संकल्प करते थे।</p><p>छात्रजीवन में दिन भर अपने साथियों के साथ आमोदप्रमोद में ही रहते थे। रात को घर के द्वार बन्द कर अपना अध्ययन करते थे। दूसरे किसी को यह नहीं जान पड़ता था कि वे कब अपना अध्ययन कर लेते हैं।</p><p>शिष्य ने पूछा, “महाराज, स्कूल में पढ़ते समय क्या कभी आपको किसी प्रकार का दिव्यदर्शन (Vision) हुआ था?”</p><p>स्वामीजी &#8211; स्कूल में पढ़ते समय एक दिन रात में द्वार बन्द कर ध्यान करते करते मन भलीभाँति तन्मय हो गया। कितनी देर ऐसे भाव से ध्यान किया था, यह कह नहीं सकता। ध्यान भंग हो गया। तब भी बैठा हूँ। इतने में ही देखता हूँ कि दक्षिण दीवाल को भेदकर एक ज्योतिर्मय मूर्ति निकल आयी और मेरे सामने खड़ी हो गयी। उसके मुख पर एक अद्भुत ज्योति थी पर भाव मानो कोई भी न था &#8211; प्रशान्त संन्यासी मूर्ति। मस्तक मुण्डित था और हाथों में दन्ड-कमण्डल था। मेरे ऊपर टकटकी लगाकर कुछ समय तक देखती रही। मानो मुझसे कुछ कहेगी। मैं भी अवाक् होकर उसकी ओर देखने लगा। तत्पश्चात् मन कुछ ऐसा भयभीत हो गया कि मैं शीघ्र ही द्वार खोलकर बाहर निकल आया। फिर मैं सोचने लगा क्यों मैं इस प्रकार मूर्ख के समान भाग आया, सम्भव था कि वह कुछ मुझसे कहती। परन्तु फिर कभी उस मूर्ति के दर्शन नहीं हुए। कितने ही दिन चिन्ता की कि यदि फिर उसके दर्शन मिलें तो उससे डरूँगा नहीं वरन् वार्तालाप करूँगा; किन्तु फिर दर्शन हुआ ही नहीं।</p><p>शिष्य &#8211; फिर इस विषय पर आपने कुछ चिन्ता भी की?</p><p>स्वामीजी &#8211; चिन्ता अवश्य की, किन्तु ओर-छोर नहीं मिला। अब ऐसा अनुमान होता है कि मैंने तब भगवान बुद्धदेव को देखा था।</p><p>कुछ देर बाद स्वामीजी बोले, “मन के शुद्ध होने पर अर्थात् मन से काम और कांचन की लालसा शान्त हो जाने पर, कितने ही दिव्य दर्शन होते हैं। वे दर्शन बड़े ही अद्भुत होते हैं, परन्तु उन पर ध्यान रखना उचित नहीं है। रात दिन उनमें ही मन रहने से साधक और आगे नहीं बढ़ सकते हैं। तुमने भी तो सुना है कि श्रीगुरुदेव कहा करते थे, ‘मेरे चिन्तामणि की ड्योढ़ी पर कितने ही मणि पड़े हुए हैं’। आत्मा का साक्षात्कार करना ही उचित है। उन सब पर ध्यान देने से क्या होगा?”</p><p>इन कथाओं को कहते ही स्वामीजी तन्मय होकर किसी विषय की चिन्ता करते हुए कुछ समय तक मौन भाव से बैठे रहे। फिर कहने लगे, “देखो, जब मैं अमरीका में था, तब मुझमें अद्भुत शक्तियों का स्फुरण हुआ था। क्षण मात्र में मैं मनुष्य की आँखों से उसके मन के सब भावों को जान जाता था। किसी के मन में कोई कैसी ही बात क्यों न हो, वह सब मेरे सामने ‘हस्तामलकवत्’ प्रत्यक्ष हो जाती थी। कभी किसी किसी से कह भी दिया करता था। जिन जिन से मैं ऐसा कहा करता था उनमें से अनेक मेरे चेले बन जाते थे &#8211; और यदि कोई किसी बुरे अभिप्राय से मुझसे मिलने आता था, तो वह इस शक्ति का परिचय पाकर फिर कभी मेरे पास नहीं आता था।</p><p>“जब मैंने शिकागो आदि शहरों में वक्तृता देना आरम्भ किया तब सप्ताह मे बारह बारह, तेरह तेरह, और कभी इससे भी अधिक वक्तृताएँ देनी पड़ती थीं। शारीरिक और मानसिक परिश्रम बहुत अधिक होने के कारण मैं बहुत थक जाता था और अनुमान होता था कि मानो वत्तृताओं के सब विषय समाप्त होने वाले ही हैं। ‘अब मैं क्या करूँगा, कल फिर नयी बातें क्या कहूँगा’ बस ऐसी ही चिन्ता मन में आया करती थी। ऐसा अनुमान होता था कि कोई नया भाव नहीं उठेगा। एक दिन वक्तृता देने के बाद अन्त में लेटे हुए चिन्ता कर रहा था, ‘बस, अब तो सब कह दिया, अब क्या उपाय करूँ?’ ऐसी चिन्ता करते करते कुछ तन्द्रासी आ गयी। उसी अवस्था में सुनने में आया कि मानो कोई मेरे पास खड़े होकर वक्तृता दे रहे हैं, उसमें कितने ही नये भाव तथा नयी कथाओं के वर्णन हैं &#8211; मानों वे सब इस जन्म में कभी मेरे सुनने में या ध्यान में आये ही नहीं। सोकर उठते ही उन सब बातों का स्मरण रखता था और वत्तृताओं में वे ही बातें कहा करता था। ऐसा कितनी ही बार हुआ है, कहाँ तक गिनाऊ? सोते सोते ऐसी वक्तृताएँ कितनी ही बार सुनी! कभी कभी तो वक्तृताएँ इतने जोर से दी जाती थीं कि दूसरे कमरों में भी औरों को शब्द सुनायी पड़ता था। दूसरे दिन वे लोग पूछते थे, ‘स्वामीजी, कल रात में आप किससे इतनी जोर से वार्तालाप कर रहे थे?’ उनके इस प्रश्न को किसी प्रकार टाल दिया करता था। वह बड़ी ही अद्भुत घटना थी।”</p><p>शिष्य स्वामीजी की बातों को सुन निर्वाक् होकर चिन्ता करते हुए बोला, “महाराज, ऐसा अनुमान होता है कि आप ही सूक्ष्म शरीर में वक्तृताएँ दिया करते थे और स्थूल शरीर से कभी कभी प्रतिध्वनि निकलती थी।”</p><p>यह सुनकर स्वामीजी बोले, “सम्भव है।”</p><p>इसके बाद अमरीका की बात फिर छिड़ी। स्वामीजी बोले, “उस देश में पुरुषों से स्त्रियाँ अधिक शिक्षिता होती हैं। विज्ञान और दर्शन में बड़ी पण्डिता हैं, इसीलिए वे मेरा इतना मान करती थीं। वहाँ पुरुष रात दिन परिश्रम करते हैं, तनिक भी विश्राम लेने का अवसर नहीं पाते। स्त्रियाँ स्कूलों में पढ़कर और पढ़ाकर विदुषी बन गयी हैं। अमरीका में जिस ओर भी दृष्टि डालो, स्त्रियों का ही साम्राज्य दिखायी देता है।”</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, ईसाइयों में से जो संकीर्ण हृदय के (कट्टर) थे, वे क्या आपके विरुद्ध नहीं हुए?</p><p>स्वामीजी &#8211; हाँ, हुए कैसे नहीं? फिर जब लोग मेरा बहुत मान करने लगे, तब वे पादरी लोग मेरे बड़े पीछे पड़े। मेरे नाम पर कितनी ही निन्दा समाचार पत्रों में लिखने लगे। कितने ही लोग उनका प्रतिवाद करने को मुझसे कहते थे, परन्तु मैं उन पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया करता था। मेरा यह दृढ़ विश्वास था कि कपट से जगत् में कोई महान् कार्य नहीं होता, इसीलिए उन अश्लील निन्दाओं पर ध्यान न देकर मैं धीरे धीरे अपना कार्य किये जाता था। अनेक बार यह भी देखने में आता था कि जिसने मेरी व्यर्थ निन्दा की वही फिर अनुतप्त होकर मेरी शरण में आता था और स्वयं ही समाचार पत्रों में प्रतिवाद कर मुझसे क्षमा माँगता था। कभी कभी ऐसा भी हुआ कि यह सुनकर कि किसी घर में मेरा निमन्त्रण है, वहाँ कोई जा पहुँचा और मेरे बारे में घरवालों से मिथ्या निन्दा कर आया और घरवाले भी यह सुनकर द्वार बन्द करके कहीं चल दिये। मैं निमन्त्रण पालन कर वहाँ गया, देखा सब सुनसान, कोई भी वहाँ नहीं है। फिर कुछ दिन पीछे वे ही लोग सत्य समाचार को जानकर बड़े दुःखित हो मेरे पास शिष्य होने को आये। बच्चा, जानते तो हो कि इस संसार में निरी दुनियादारी है। जो यथार्थ साहसी और ज्ञानी है, वह क्या ऐसी दुनियादारी से कभी घबड़ाता है? ‘जगत् चाहे जो कहे, क्या परवाह है, मैं अपना कर्तव्य पालन करता चला जाऊँगा’ यही वीरों की बाते हैं। यदि ‘वह क्या कहता है, क्या लिखता है’, ऐसी ही बातों पर रात दिन ध्यान रहे तो जगत् में कोई महान् कार्य हो ही नहीं सकता। क्या तुमने यह श्लोक नहीं सुना &#8211;</p><p>निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु।<br>लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्॥</p><p>अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा।<br>न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥</p><p>लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपावती हों या न हो, तुम्हारा देहान्त आज हो या युग भर बाद, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो। कितने ही तूफान पार करने पर मनुष्य शान्ति के राज्य में पहुँचता है। जो जितना बड़ा हुआ है, उसके लिए उतनी ही कठिन परीक्षा रखी गयी है। परीक्षारूपी कसौटी पर उसके जीवन के घिसने के पश्चात् जगत् ने उसको बड़ा कहकर स्वीकार किया है। जो भीरु कापुरुष होते हैं, वे ही समुद्र की लहरों को देखकर किनारे पर ही नाव रखते हैं। जो महावीर होते हैं वे क्या किसी बात पर ध्यान देते हैं? ‘जो कुछ होना है सो हो, मैं अपना इष्टलाभ अवश्य करके रहूँगा’ यही यथार्थ पुरुषकार है। इस पुरुषकार के हुए बिना सैकड़ों दैव भी तुम्हारे जडत्व को दूर नहीं कर सकते।</p><p>शिष्य &#8211; तो दैव पर निर्भर होना क्या दुर्बलता का चिह्न है?</p><p>स्वामीजी &#8211; शास्त्र में निर्भरता को पंचम पुरुषार्थ कहकर निर्देश किया है; परन्तु हमारे देश में लोग जिस प्रकार दैव पर निर्भर रहते हैं, वह मृत्यु का चिह्न है, महाकापुरुषता की चरम अवस्था है। ईश्वर की एक अद्भुत कल्पना कर उसके माथे अपने दोषों को थापने की चेष्टा मात्र है। श्रीरामकृष्ण द्वारा कथित गोहत्यापाप की कहानी<sup>1</sup> तो तुमने सुनी होगी; अन्त में वह पाप उद्यानस्वामी को ही भोगना पड़ा। आजकल सभी ‘यथा नियुक्त्तोऽस्मि तथा करोमि’ कहकर पाप तथा पुण्य दोनों को ईश्वर के माथे मढ़ते हैं। मानो आप जल के कमलपत्रों के समान निर्लिप्त हैं! यदि वे लोग ऐसे ही भाव पर सर्वदा जमे रह सकें तो वे मुक्त हैं; किन्तु अच्छे कार्य के समय ‘मैं’ और बुरे के समय ‘तुम’ इस प्रकार की दैव पर निर्भरता का क्या कहना है। जब तक पूर्ण प्रेम या ज्ञान नहीं होता, तब तक निर्भरता की अवस्था हो ही नहीं सकती। जो ठीक ठीक निर्भर हो गये हैं, उनमें भले-बुरे की भेदबुद्धि नहीं रहती। हममें (<a
href="/ramkrishna-paramhans-biography-in-hindi/">श्रीरामकृष्ण</a> के शिष्यों में) नागमहाशय ही ऐसी अवस्था के उज्ज्वल दृष्टान्त हैं।</p><p>अब बात बात में नागमहाशय का प्रसंग चल पड़ा। स्वामीजी बोले, “ऐसा अनुरागी भक्त और भी दूसरा कोई है? अहा! फिर कब उनसे मिल सकूँगा?”</p><p>शिष्य &#8211; माताजी (नागमहाशय की पत्नी) ने मुझे लिखा है कि आपके दर्शन-निमित्त वे शीघ्र ही कलकत्ता आयेंगे।</p><p>स्वामीजी &#8211; <a
href="/my-master-ramakrishna-paramhamsa-vivekananda-hindi/">श्रीरामकृष्णजी</a> राजा जनक से उनकी तुलना किया करते थे। ऐसे जितेन्द्रिय पुरुष का दर्शन होना तो बड़े भाग्य की बात है। ऐसे लोगों की कथा सुनने में भी नहीं आती। तुम उनका सत्संग सर्वदा करना। वे श्रीरामकृष्ण के अन्तरंग भक्तों में से एक हैं।</p><p>शिष्य &#8211; उस देश में अनेक लोग उनको पागल समझते हैं, परन्तु मैंने तो पहले से ही उनको एक महापुरुष समझा है। वे मुझसे बहुत प्रेम करते हैं और मुझ पर उनकी कृपा भी बहुत है।</p><p>स्वामीजी &#8211; तुमने ऐसे महापुरुष का सत्संग किया है फिर तुम्हें क्या चिन्ता है? अनेक जन्मों की तपस्या से ऐसे महापुरुषों का सत्संग मिलता है। श्री नागमहाशय घर में किस प्रकार से रहते हैं?</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, उन्हें तो मैंने कभी कोई काम-काज करते नहीं पाया। केवल अतिथि-सेवा में लगे रहते हैं। पाल बाबू आदि जो कुछ रुपया दे देते हैं उसके अतिरिक्त उनके खाने पीने का और कोई सहारा नहीं है। परन्तु धनिकों के भवन में जैसी धूम-धाम रहती है वैसी ही उनके घर भी देखी। परन्तु वे अपने भोग के निमित्त एक भी पैसा व्यय नहीं करते। जो कुछ व्यय करते हैं केवल परसेवार्थ। सेवा &#8211; सेवा &#8211; यही उनके जीवन का महाव्रत मालूम होता है। ऐसा अनुमान होता है कि प्रत्येक जीव में, प्रत्येक वस्तु में आत्मदर्शन करके वे अभिन्न ज्ञान से जगत् की सेवा करने को व्याकुल हैं। सेवा के लिए अपने शरीर को शरीर नहीं समझते। वास्तव में मुझे भी सन्देह होता था कि उन्हें शरीर ज्ञान है या नहीं। आप जिस अवस्था को ज्ञानातीत अवस्था (superconscious state) कहते हैं, मेरा अनुमान है कि वे सर्वदा उसी अवस्था में रहते हैं।</p><p>स्वामीजी &#8211; ऐसा क्यों न हो? श्रीगुरुदेव उनसे कितना प्रेम करते थे। वे ही उनके एक साथी हैं जिन्होंने पूर्व वंग में जन्म लिया था। उन्हीं के प्रकाश से पूर्व वंग प्रकाशित हुआ है।</p><hr
class="wp-block-separator has-css-opacity"/><ol><li>एक दिन किसी मनुष्य के बगीचे में एक गाय घुस गयी और उसने उसका एक बड़ा सुन्दर पौधा रौंदकर नष्ट कर डाला। इससे वह मनुष्य बहुत ही क्रुद्ध हुआ और उसने उस गाय को इतना मारा कि वह मर गयी। यह खबर सारे गाँव भर में फैल गयी। वह मनुष्य यह देखकर कि उस पर गोहत्या लग रही है कहने लगा, “अरे, ‘मैंने गाय को कब मारा है? इसका दोषी तो मेरा हाथ है और चूँकि हाथ इन्द्र के अधीन है इसलिए सारा दोष इन्द्र का है।” इन्द्र ने जब यह सुना तो उसने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर उस मनुष्य के पास जाकर पूछा, “क्यों भाई, यह सुन्दर बगीचा किसने बनाया है?” वह मनुष्य बोला, “मैंने”। इन्द्र ने फिर पूछा, “और भाई, ये सब बड़िढया बड़िढया पेड़, फल-फूल के पौधे आदि किसने लगाये हैं?” वह मनुष्य बोला, “मैंने ही।” फिर इन्द्र ने मरी हुई गाय की ओर दिखाकर पूछा, “और इस गाय को किसने मारा?” वह मनुष्य बोला, “इन्द्र ने!” यह सुनकर इन्द्र हँसे और बोले, “बगीचा तुमने लगाया, फल-फूल के पौधे तुमने लगाये और गाय मारी बेचारे इन्द्र ने! &#8211; क्यों यही बात है न?”</li></ol><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=6316</guid><description><![CDATA[<p>काश्मीर में अमरनाथजी का दर्शन - क्षीरभवानी के मन्दिर मेंदेवीजी की वाणी का श्रवण और मन से सकल संकल्प का त्याग - प्रेतयोनिका अस्तित्व आदि।</p><p>The post <a
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href="/category/health-fitness/">स्वस्थ</a> नहीं है। शिष्य के मठ में आते ही <a
href="/swami-vivekananda-ke-patra-swami-brahmananda-1-august-1898/">स्वामी ब्रह्मानन्दजी</a> महाराज बोले, “जब से काश्मीर से लौटे हैं, स्वामीजी किसी से कुछ वार्तालाप नहीं करते, मौन होकर स्तब्ध बैठे रहते हैं, तुम स्वामीजी से कुछ वार्तालाप करके उनके मन को नीचे (अर्थात् जगत् के कार्यों पर) लाने का प्रयत्न करो।”</p><p>शिष्य ने ऊपर स्वामीजी के कमरे में जाकर देखा कि स्वामीजी मुक्तपद्मासन होकर पूर्व की ओर मुँह फेरे बैठे हैं, मानो गम्भीर ध्यान में मग्न हैं। मुँह पर हँसी नहीं, उज्ज्वल नेत्रों की दृष्टि बाहर की ओर नहीं, मानो अपने भीतर कुछ देख रहे हैं। शिष्य को देखते ही बोले, “बच्चा, आ गये; बैठो।” बस, इतनी ही बात की। स्वामीजी के बायें नेत्र को रक्त्तवर्ण देखकर शिष्य ने पूछा, “आपकी यह आँख लाल कैसे हो रही है?” “कुछ नहीं” कहकर स्वामीजी फिर स्तब्ध हो गये। बहुत समय तक बैठे रहने पर भी जब स्वामीजी ने कुछ भी वार्तालाप नहीं किया तब शिष्य व्याकुल होकर स्वामीजी के चरणकमलों को स्पर्श कर बोला, “श्रीअमरनाथजी में आपने जो कुछ प्रत्यक्ष किया है क्या वह सब मुझे नहीं बतलाइयेगा?” पादस्पर्श से स्वामीजी कुछ चौंक से उठे, दृष्टि भी बाहर की ओर खुली और बोले, “जब से अमरनाथजी का दर्शन किया है, चौबीसों घण्टे मानो श्रीशिवजी मेरे मस्तक में बैठे रहते हैं; किसी प्रकार भी नहीं हटते।” शिष्य इन बातों को सुनकर अवाक् हो गया।</p><p>स्वामीजी &#8211; अमरनाथ पर और फिर क्षीरभवानीजी के मन्दिर में मैंने बहुत तपस्या की थी।</p><p>स्वामीजी फिर कहने लगे, “अमरनाथ को जाते समय पहाड़ की एक खड़ी चढ़ाई से होकर गया था। उस पगडण्डी से पहाड़ी लोग ही चढ़ाई-उतराई करते हैं, कोई यात्री उधर से नहीं जाता; परन्तु इसी मार्ग से होकर जाने की मुझे जिद-सी हो गयी थी; उसी परिश्रम से शरीर कुछ थका हुआ है। वहाँ ऐसा कड़ा जाड़ा पड़ता है कि शरीर में सुई-सी चुभती है।”</p><p>शिष्य &#8211; मैंने सुना है कि लोग नग्न होकर अमरनाथजी का दर्शन करते हैं। क्या यह सत्य है?</p><p>स्वामीजी &#8211; मैंने भी कौपीन मात्र धारण कर और भस्म लगाकर गुफा में प्रवेश किया था; तब ठण्डक या गरमी कुछ नहीं मालूम होती थी, परन्तु मन्दिर से निकलते ही ठण्ड से अकड़ गया।</p><p>शिष्य &#8211; क्या वहाँ कभी कबूतर भी देखने में आया था? सुना है कि ठण्ड के मारे वहाँ कोई जीवन-जन्तु नहीं बसता है, केवल सफेद कबूतरों की एक टुकड़ी कहीं से कभी कभी आ जाती है।</p><p>स्वामीजी &#8211; हाँ, तीन-चार सफेद कबूतरों को देखा था। वे उसी गुफा में या आसपास के किसी पहाड़ में रहते हैं, ठीक अनुमान नहीं कर सका।</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, लोगों से सुना है कि यदि कोई गुफा से बाहर निकलकर सफेद कबूतरों को देखे तो समझते हैं कि यथार्थ<a
href="/shiv-chalisa-lyrics-in-hindi-pdf/"> शिव</a> के दर्शन हुए।</p><p>स्वामीजी बोले, “सुना है कि कबूतर देखने से जिसके मन मैं जैसी कामना रहती है, वही सिद्ध होती है।”</p><p>अब स्वामीजी फिर कहने लगे कि लौटते समय जिस मार्ग से सब यात्री आते हैं, उसी मार्ग से वे भी श्रीनगर को आये थे। श्रीनगर पहुँचने के कुछ दिन बाद क्षीरभवानीजी के दर्शन को गये और सात दिन वहाँ ठहरकर देवी को क्षीर चढ़ायी और पूजा तथा हवन किया था। प्रतिदन वहाँ एक मन दूध की क्षीर का भोग चढ़ाते थे और हवन करते थे। एक दिन पूजा करते समय मन में यह विचार उदित हुआ, “माता भवानीजी यहाँ सचमुच कितने समय से प्रकाशित हैं? प्राचीन काल में यवनों ने यहाँ आकर उनके मन्दिर को विध्वंस कर दिया था और यहाँ के लोग कुछ कर नहीं सके। हाय! यदि मैं उस समय होता, तो चुपचाप यह कभी नहीं देखता।” इस विचार से जब उनका मन दुःख और क्षोभ से अत्यन्त व्याकुल हो गया था, तब उनके सुनने में यह स्पष्ट आया था कि माताजी कह रही हैं &#8211; “मेरी इच्छा से ही यवनों ने मन्दिर का विध्वंस किया है, जीर्ण मन्दिर में रहने की मेरी इच्छा है। क्या मेरी इच्छा से अभी यहाँ सातमंजिला सोने का मन्दिर नहीं बन सकता है? तू क्या कर सकता है, मैं तेरी रक्षा करूँगी या तू मेरी रक्षा करेगा?” स्वामीजी बोले, “उस देववाणी को सुनने के समय से मेरे मन में और कोई संकल्प नहीं है। मठ-वठ बनाने का संकल्प छोड़ दिया है। माताजी की जो इच्छा है वही होगा।” शिष्य अवाक् होकर सोचने लगा कि इन्होंने ही तो एक दिन कहा था, “जो कुछ देखता है या सुनता है वह केवल तेरे भीतर अवस्थित आत्मा की प्रतिध्वनि मात्र है! बाहर कुछ भी नहीं है।” अब स्वामीजी से उसने स्पष्ट पूछा, “महाराज, आपने तो कहा था कि यह सब देववाणी हमारे भीतर के भावों की बाह्य प्रतिध्वनि मात्र है।” स्वामीजी ने बड़ी गम्भीरता से उत्तर दिया, “भीतर हो या बाहर, इससे क्या? यदि तुम अपने कानों से मेरे समान ऐसी अशरीरी वाणी को सुनो, तो क्या उसे मिथ्या कह सकते हो? देववाणी सचमुच सुनायी देती है, हम लोग जैसे वार्तालाप कर रहे हैं, ठीक इसी प्रकार से।”</p><p>शिष्य ने बिना कोई द्विरुक्त्ति किये स्वामीजी के वाक्यों को शिरोधार्य कर लिया, क्योंकि स्वामीजी की बातों में एक ऐसी अद्भुत शक्ति थी कि उन्हें बिना माने नहीं रहा जाता था &#8211; युक्ति तर्क सब धरे रह जाते थे।</p><p>शिष्य ने अब प्रेतात्माओं की बात छेड़ी। “महाराज, जो सब भूत-प्रेतादि योनियों की बात सुनी जाती है, शास्त्रों ने भी जिसका बार बार समर्थन किया है, क्या वह सब सत्य है?”</p><p>स्वामीजी &#8211; अवश्य सत्य है। क्या जिसको तुम नहीं देखते, वह सत्य नहीं हो सकता? तेरी दृष्टि से बाहर दूर दूर पर कितने ही सहस्रों ब्रह्माण्ड घूम रहे हैंं, तुझे नहीं दीख पड़ते तो क्या उनका अस्तित्व भी नहीं है? भूत-प्रेत हैं तो होने दे, परन्तु इनके झगड़े में अपना मन न लगा। इस शरीर में जो आत्मा है, उसको प्रत्यक्ष करना ही तेरा कार्य है। उसको प्रत्यक्ष करने से भूत-प्रेत सब तेरे दासों के दास हो जायेंगे।</p><p>शिष्य &#8211; परन्तु महाराज, ऐसा अनुमान होता है कि उनको देखने से पुनर्जन्म पर विश्वास बहुत दृढ़ होता है और परलोक पर कुछ अविश्वास नहीं रहता।</p><p>स्वामीजी &#8211; तुम सब तो <a
href="/mahaveer-bhagwan-ki-aarti/">महावीर</a> हो, क्या तुम्हें भी परलोक पर विश्वास करने के लिए भूत-प्रेतों का दर्शन आवश्यक है? कितने शास्त्र पढ़े कितने विज्ञान पढ़े, इस विराट विश्व के कितने गूढ़ तत्त्व जाने, इतने पर भी आत्मज्ञान लाभ करने के लिए क्या भूत-प्रेतों का दर्शन करना ही पड़ेगा? छिः! छिः!!</p><p>शिष्य &#8211; अच्छा, महाराज, आपने स्वयं कभी भूत-प्रेतों को देखा है?</p><p>स्वामीजी &#8211; स्वजनों में से कोई व्यक्ति प्रेत होकर कभी कभी मुझको दर्शन देता था। कभी दूर दूर के समाचार भी लाता था। परन्तु परीक्षा करके देखा कि उसकी सब बातें सदा ठीक नहीं होती थीं। पर किसी एक विशेष तीर्थ पर जाकर ‘वह मुक्त हो जाय’ ऐसी प्रार्थना करने पर उसका दर्शन फिर मुझे नहीं हुआ।</p><p>‘श्राद्धादिकों से प्रेतात्माओं की तृप्ति होती है या नहीं?’ &#8211; अब शिष्य के इस प्रश्न को पूछने पर स्वामीजी बोले, “यह कुछ असम्भव नहीं है।” शिष्य के इस विषय की युक्ति या प्रमाण माँगने पर स्वामीजी ने कहा, “और किसी दिन इस प्रसंग को भलीभाँति समझा दूँगा। श्राद्धादि से प्रेतात्माओं की तृप्ति होती है, इस विषय की अखण्डनीय युक्तियाँ हैं। आज मेरा शरीर कुछ अस्वस्थ है, फिर किसी और दिन इसको समझाऊँगा।” परन्तु फिर शिष्य को स्वामीजी से यह प्रश्न करने का अवसर उसके जीवन भर में नहीं मिला।</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=6319</guid><description><![CDATA[<p>स्वामीजी की संस्कृत रचना - श्रीरामकृष्णदेव के आगमन सेभाव व भाषा में प्राण का संचार - भाषा में किस प्रकार से ओजस्विता लानीहोगी आदि।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-17/">स्वामी विवेकानंद की संस्कृत रचना</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><strong>स्थान &#8211; </strong>बेलुड़ &#8211; किराये का मठ<br><br><strong>वर्ष &#8211;</strong> १८९८ ईसवी (नवम्बर)<br><br><strong>विषय &#8211;</strong> स्वामीजी की संस्कृत रचना &#8211; <a
href="/ramkrishna-paramhans-biography-in-hindi/">श्रीरामकृष्णदेव</a> के आगमन सेभाव व भाषा में प्राण का संचार &#8211; भाषा में किस प्रकार से ओजस्विता लानीहोगी &#8211; भय को त्याग देना होगा &#8211; भय से ही दुर्बलता व पाप की वृद्धि -सब अवस्थाओं में अविचल रहना &#8211; शास्त्रपाठ करने की उपकारिता &#8211; स्वामीजीका पाणिनि की अष्टाध्यायी का पठन &#8211; ज्ञान के उदय से किसी विषय का अद्भुत प्रतीत न होना।</p><p>मठ अभी तक बेलुड़ में नीलाम्बर बाबू के बगीचे में ही है! अब अगहन महीने का अन्त है। इस समय स्वामीजी बहुधा संस्कृत शास्त्रादि की आलोचना में तत्पर हैं। उन्होंने ‘आचण्डालाप्रतिहतरयः’<sup>1 </sup>इत्यादि श्लोकों की रचना इसी समय की थी। आज स्वामीजी ने “ॐ ह्रीं ऋतम्” इत्यादि स्तोत्र की रचना की और शिष्य को देकर कहा, ‘देखना इसमें छन्दोभंगादि कोई दोष तो नहीं है?” शिष्य ने उसे ले लिया और उसकी एक नकल उतार ली।</p><p>जिस दिन स्वामीजी ने इस स्तोत्र की रचना की थी उस दिन मानो स्वामीजी की जिह्वा पर <a
href="/saraswati-chalisa-in-hindi/">सरस्वती</a> विराजमान थीं। लगभग दो घण्टे तक स्वामीजी ने शिष्य से सुन्दर और सुललित संस्कृत भाषा में वार्तालाप किया। ऐसा सुन्दर वाक्यविन्यास, शिष्य ने बड़े बड़े पण्डितों के मुँह से भी कभी नहीं सुना था।</p><p>जो हो, शिष्य के स्तोत्र की नकल उतार लेने पर स्वामीजी उससे बोले, “देखो, किसी भाव में तन्मय होकर लिखते लिखते कभी कभी मेरी व्याकरण की भूल होती है, इसलिये तुम लोगों से देख लेने को कहता हूँ।”</p><p>शिष्य &#8211; वे भाषादोष नहीं हैं, वे आर्ष प्रयोग हैं।</p><p>स्वामीजी &#8211; तुमने तो ऐसा कह दिया, परन्तु साधारण लोग ऐसा क्यों समझेंगे? उस दिन मैंने ‘हिन्दू <a
href="/category/dharma/">धर्म</a> क्या है’ इस विषय पर बंगला भाषा में एक लेख लिखा, तो तुम्हीं में से किसी किसी ने कहा कि इसकी भाषा तो टूटी-फूटी है। मेरा अनुमान है कि सब वस्तुओं की तरह कुछ समय के बाद भाषा और भाव भी फीके पड़ जाते हैं। आजकल इस देश में यही हुआ है, ऐसा जान पड़ता है। श्रीगुरुदेव के आगमन से भाव और भाषा में फिर नवीन प्रवाह आया है। अब सब को नवीन साँचे में ढालना है, नवीन प्रतिमा की मुहर लगाकर सब विषयों का प्रचार करना पड़ेगा। देखो न, प्राचीन समय के <a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-mrs-ole-bull-14-june-1902/">संन्यासियों</a> की चाल ढाल टूटकर अब कैसी एक नवीन परिपाटी बन रही है। इसके विरुद्ध समाज में भी बहुत कुछ प्रतिवाद हो रहा है; परन्तु इससे क्या हुआ और क्या हम ही उससे डरें? आजकल इन संन्यासियों को प्रचार कार्य के निमित्त दूर दूर जाना है। यदि प्राचीन संन्यासियों का वेश धारण कर अर्थात् भस्म लगाकर और अर्धनग्न होकर वे कहीं विदेश को जाना चाहें, तो पहले तो जहाज पर ही उनको सवार नहीं होने देंगे। और यदि किसी प्रकार विदेश पहुँच भी जायँ, तो उनको कारागृह में अवस्थान करना होगा। देश, सभ्यता और समयोपयोगी कुछ कुछ परिवर्तन सभी विषयों में कर लेना पड़ेगा। अब मैं बंगला भाषा में लेख लिखने की सोच रहा हूँ। सम्भव है कि साहित्यसेवक उसको पढ़कर निन्दा करें। करने दो &#8211; मैं बंगला भाषा को नवीन साँचे में ढालने का प्रयत्न अवश्य करूँगा। आजकल के लेखक जब लिखने बैठते हैं, तब क्रियापद का बहुत प्रयोग करते हैं। इससे भाषा में शक्ति नहीं आती। विशेषण द्वारा क्रियापदों का भाव प्रकट करने से भाषा की ओजस्विता अधिक बढ़ती है। अब से इस प्रकार लिखने की चेष्टा करो तो। ‘उद्बोधन’ में ऐसी ही भाषा में लेख लिखने का प्रयत्न करना। भाषा में क्रियापद प्रयोग करने का क्या तात्पर्य है जानते हो? इस प्रकार से भावों को विराम मिलता है। इसलिए अधिक क्रियापदों का प्रयोग करना शीघ्र शीघ्र स्वास लेने के समान दुर्बलता का चिह्न मात्र है। यही कारण है कि बंगला भाषा में अच्छी वक्तृताएँ नहीं दी जा सकतीं। जिनका किसी भाषा पर अच्छा अधिकार है, वे शीघ्रता से भावों को रोक नहीं देते। दाल भात का भोजन करके तेरा शरीर जैसे दुर्बल हो गया है, भाषा भी ठीक वैसी ही हो गयी है। खान-पान, चाल-चलन, भाव भाषा सब में तेजस्विता लानी होगी। चारों ओर प्राण का संचार करना होगा। नस नस में रक्त्त का प्रवाह प्रेरित करना होगा, जिससे सब विषयों में एक प्राण का स्पन्दन अनुभव हो; तभी इस घोर जीवन-संग्राम में देश के लोग बच सकेंगे। नहीं तो शीघ्र ही यह देश और जाति मृत्यु की छाया में लय हो जायेंगे।</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, बहुत दिनों से इस देश के लोगों का स्वभाव एक विशेष प्रकार का हो गया है। क्या उसके शीघ्र परिवर्तन की सम्भावना है?</p><p>स्वामीजी &#8211; यदि तुम प्राचीन चाल को बुरी समझते हो, तो मैंने जैसा बतलाया उस नवीन भाव को सीख क्यों नहीं लेते? तुम्हें देखकर और भी दस-पांच लोग वैसा ही करेंगे। फिर उनसे और पचास लोग सीखेंगे। इस प्रकार आगे चलकर जाति में वह नवीन भाव जाग उठेगा। यदि तुम जान बुझ कर भी ऐसा कार्य न करो तो मैं समझूँगा कि तुम केवल बातों में ही पण्डित हो और कार्य में मूर्ख।</p><p>शिष्य &#8211; आपके वचन से तो बड़े साहस का संचार होता है। उत्साह, बल और तेज से हृदय पूर्ण होता है।</p><p>स्वामीजी &#8211; हृदय में धीरे धीरे बल को लाना होगा। यदि एक भी यथार्थ ‘मनुष्य’ बन जाय तो लाख वत्तृताओं का फल होगा। मन और मुँह को एक करके भावों को जीवन में कार्यान्वित करना होगा। इसीको श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, ‘भाव के घर में किसी प्रकार की चोरी न होने पाये।’ सब विषयों में व्यावहारिक बनना होगा अर्थात् अपने अपने कार्य द्वारा मत या भाव का विकास करना होगा। केवल मतों के प्रादुर्भाव से ही देश दबा पड़ा है। <a
href="/my-master-ramakrishna-paramhamsa-vivekananda-hindi/">श्रीरामकृष्ण</a> के जो यथार्थ सन्तान होंगे, वे सब धर्मभावों को कार्यरूप में परिणत करने का उपाय दिखायेंगे। लोग या समाज की बातों पर ध्यान न देकर वे एकाग्र मन से अपना कार्य करते रहेंगे। तुलसीदसजी के दोहे में जो है, सो क्या तूने नहीं सुना?</p><p>हाथी चले बजार में, कुत्ता भुके हजार।<br>साधुन को दुर्भाव नहिं, जो निन्दे संसार॥</p><p>इसी भाव से चलना है। जनसाधारण को सामान्य कीड़ामकोड़ा समझना होगा। उसकी भली बुरी बातों को सुनने से जीवन भर में कोई किसी प्रकार का महत्-कार्य नहीं कर सकता। ‘नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः’ अर्थात् शरीर और मन में दृढ़ता न रहने से कोई भी इस आत्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। प्रथम पुष्टिकर उत्तम भोजन से शरीर को बलिष्ठ करना होगा तभी तो मन का बल बढ़ेगा। मन तो शरीर का ही सूक्ष्म अंश है। मन और मुख में खूब दृढ़ता होनी चाहिए। ‘मैं हीन हूँ’ ‘मैं दीन हूँ’ ऐसा कहते कहते मनुष्य वैसा ही हो जाता है। इसीलिए शास्त्रकार ने कहा है &#8211;</p><p>मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि।<br>किंवदन्तीति सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत्॥</p><p>(अष्टावक्र संहिता –१।११)</p><p>जिसके हृदय में मुक्ताभिमान सर्वदा जागृत है वह मुक्त हो जाता है और जो ‘मैं बद्ध हूँ’ ऐसी भावना रखता है, समझ लो कि उसकी जन्मजन्मान्तर तक बद्ध दशा ही रहेगी। ऐहिक और पारमार्थिक दोनों पक्षों में ही इस बात को सत्य जानना। इस जीवन में जो सर्वदा हताशचित्त रहते हैं, उनसे कोई भी कार्य नहीं हो सकता। वे जन्म जन्म ‘हाय, हाय’ करते हुए चले आते हैं और चले जाते हैं। ‘वीरभोग्या वसुन्धरा’, अर्थात् वीर लोग ही वसुन्धरा का भोग करते हैं &#8211; यह वचन नितान्त सत्य है। वीर बनो, सर्वदा कहो ‘अभीः’ ‘अभीः’ &#8211; मैं भयशून्य हूँ, मैं भयशून्य हूँ। सब को सुनाओ, ‘माभैः’ ‘माभैः’ भय न करो, भय न करो। भय ही मृत्यु है, भय ही पाप, भय ही नरक, भय ही अधर्म तथा भय ही व्यभिचार है। जगत् में जो कुछ असत् या मिथ्याभाव (negative thoughts) है, वह सब इस भयरूप शैतान से उत्पन्न हुआ है। इस भय ने ही <a
href="/surya-chalisa-in-hindi/">सूर्य</a> के सूर्यत्व को, वायु के वायुत्व को, यम के यमत्व को अपने अपने स्थान पर रख छोड़ा है, अपनी अपनी सीमा से किसी को बाहर नहीं जाने देता। इसलिए श्रुति कहती है &#8211;</p><p>भयादस्याग्निस्तपति भयात् तपति सूर्यः।<br>भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः॥</p><p>(कठोपनिषद् – २।३।३)</p><p>जिस दिन इन्द्र, <a
href="/chandra-dev-mantra-katha-upay/">चन्द्र</a>, वायु, वरुण भयशून्य होंगे, उसी दिन सब ब्रह्म में लीन हो जायेंगे -सृष्टिरूप अध्यास का लय साधित होगा। इसीलिए कहता हूँ, ‘अभीः’ ‘अभीः’।</p><p>बोलते बोलते स्वामीजी के वे नीलोत्पल नेत्र मानो अरुण रंग से रंजित हो गये। मानो “अभीः” मूर्तिमान होकर स्वामीरूप से शिष्य के सामने सदेह अवस्थान कर रहा था। शिष्य उस अभयमूर्ति का दर्शन कर मन में सोचने लगा, “आश्चर्य! इन महापुरुष के पास रहने से और इनकी बातें सुनने से मानो मृत्युभय भी कहीं भाग जाता है।”</p><p>स्वामीजी फिर कहने लगे, “यह शरीर धारण कर तुम कितने ही सुख-दुःख तथा सम्पद-विपद की तरंगों में हिलाये जाओ, परन्तु ध्यान रखना वे सब केवल मुहूर्तस्थायी हैं। इन सब को अपने ध्यान में भी नहीं लाना। मैं अजर, अमर, चिन्मय आत्मा हूँ, इस भाव को दृढ़ता के साथ धारण कर जीवन बिताना होगा। ‘मेरा जन्म नहीं है, मेरी मृत्यु नहीं है, मैं निर्लेप आत्मा हूँ’ ऐसी धारणा में एकदम तन्मय हो जाओ। एक बार लीन हो जाने से दुःख या कष्ट के समय यह भाव अपने आप ही में उदय होगा, इसके लिए फिर चेष्टा करने की कुछ आवश्यकता नहीं रहेगी। कुछ ही दिन हुए मैं वैद्यनाथ देवघर में प्रियनाथ मुकर्जी के घर गया था। वहाँ ऐसी साँस उठी कि दम निकलने ही लगा परन्तु प्रत्येक श्वास के साथ भीतर से “सोऽहं सोऽहं” गम्भीर ध्वनि उठने लगी। तकिये का सहारा लेकर प्राणवायु निकलने की अपेक्षा कर रहा था और सुन रहा था कि भीतर केवल “सोऽहं सोऽहं” ध्वनि हो रही है; केवल यह सुनने लगा, “एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन।”</p><p>शिष्य स्तम्भित होकर बोला, “आपके साथ वार्तालाप करने से और आपकी सब अनुभूतियों को सुनने से शास्त्र पढ़ने की फिर आवश्यकता नहीं रहती।”</p><p>स्वामीजी &#8211; अरे नहीं, शास्त्रों को पढ़ना बहुत ही आवश्यक है। ज्ञान लाभ करने के लिए शास्त्र पढ़ने की बहुत जरूरत है। मैं मठ में शीघ्र ही शास्त्रादि पढ़ाने का आयोजन करूँगा। वेद, उपनिषद, <a
href="/garbh-geeta-in-hindi/" rel="sponsored nofollow">गीता</a>, भागवत पढ़ायी जायगी। अष्टाध्यायी पढ़ाऊँगा।</p><p>शिष्य &#8211; क्या आपने पाणिनि की अष्टाध्यायी पढ़ी है?</p><p>स्वामीजी &#8211; जब जयपुर में था, तब एक बड़े भारी वैयाकरण के साथ साक्षात्कार हुआ। फिर उनसे व्याकरण पढ़ने की इच्छा हुई। व्याकरण के बड़े विद्वान होने पर भी, उनमें पढ़ाने की शक्ति बहुत नहीं थी। उन्होंने मुझे तीन दिन तक प्रथम सूत्र का भाष्य समझाया, फिर भी मैं उसकी धारणा नहीं कर सका। चौथे दिन अध्यापकजी विरक्त्त होकर बोले, ‘स्वामीजी, जब तीन दिन में भी मैं प्रथम सूत्र का मर्म आपको नहीं समझा सका, तो अनुमान होता है कि मेरे पढ़ाने से आपको कोई लाभ नहीं होगा।’ यह सुनकर मेरे मन में बड़ी भर्त्सना उठी। भोजन और निद्रा को त्यागकर प्रथम सूत्र का भाष्य अपने आप ही पढ़ने लगा। तीन घण्टे में उस सूत्रभाष्य का अर्थ मानो ‘करामलकवत्’ प्रत्यक्ष हो गया। तत्पश्चात् अध्यापकजी के पास जाकर सब व्याख्याओं का तात्पर्य बातों मे समझा दिया। अध्यापकजी सुनकर बोले, ‘मैं तीन दिन से समझाकर जो न कर सका उसकी आपने तीन घण्टे में ऐसी चमत्कारपूर्ण व्याख्या कैसे सीख ली?’ उस दिन से प्रतिदिन शीघ्र गति से अध्याय पर अध्याय पढ़ता चला गया। मन की एकाग्रता होने से सब सिद्ध हो जाता है &#8211; सुमेरु पर्वत को भी चूर्ण करना सम्भव है।</p><p>शिष्य &#8211; आपकी सभी बातें अद्भुत है।</p><p>स्वामीजी &#8211; ‘अद्भुत’ स्वयं कोई विशेष बात नहीं है, अज्ञता ही अन्धकार है। इसमें सब कुछ ढके रहने के कारण अद्भुत जान पड़ता है। ज्ञानालोक से प्रकाशित होने पर फिर किसी में अद्भुतता नहीं रहती। अघटनघटन-पटीयसी जो माया है, वह भी छिप जाती है। जिसको जानने से सब कुछ जाना जाता है, उसको जानो; उसके विषय पर चिन्तन करो। उस आत्मा के प्रत्यक्ष होने से शास्त्रों के अर्थ ‘करामलकवत्’ प्रत्यक्ष होंगे। जब प्राचीन ऋषियों को ऐसा हुआ था, तब हम लोगों को क्यों न होगा? हम भी तो मनुष्य हैं। एक व्यक्ति के जीवन में जो एक बार हुआ है, चेष्टा करने से वह अवश्य ही औरों के जीवन में फिर सिद्ध होगा। History repeats itself अर्थात् जो एक बार हुआ है, वही बार बार होता है। यह आत्मा सर्व भूत में समान है, केवल प्रत्येक भूत में उसके विकास का तारतम्य मात्र है। इस आत्मा का विकास करने की चेष्टा करो। देखोगे कि बुद्धि सब विषयों में प्रवेश करेगी। अनात्मज्ञ पुरुषों की बुद्धि एकदेश-दर्शिनी होती है। आत्मज्ञ पुरुषों की बुद्धि सर्वग्रासिनी होती है। आत्मप्रकाश होने से, देखोगे कि दर्शन, विज्ञान सब तुम्हारे अधीन हो जायेंगे। सिंहगर्जन से आत्मा की महिमा की घोषणा करो। जीव को अभय देकर कहो, ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।’</p><p>‘Arise, awake and stop not till the goal is reached.’</p><hr
class="wp-block-separator has-css-opacity"/><ol><li>स्वामीजी कृत ‘कवितावली’ देखिये।</li></ol><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=6322</guid><description><![CDATA[<p>निर्विकल्प समाधि पर स्वामीजी का व्याख्यान - इस समाधि से कौन लोग फिर संसार में लौटकर आ सकते हैं- शिष्य द्वारा स्वामीजी की पूजा आदि।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-18/">निर्विकल्प समाधि पर स्वामी विवेकानंद का व्याख्यान</a> appeared first on <a
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href="/my-master-ramakrishna-paramhamsa-vivekananda-hindi/">श्रीरामकृष्ण</a> की सेवा का भार ग्रहण किया है। मठ में पूजा और प्रसाद के लिए बड़ा आयोजन है। समागत सज्जनों के लिए प्रसाद सर्वदा तैयार है।</p><p>आज स्वामीजी ने शिष्य को अपने कमरे में रात को रहने की आज्ञा दी है। स्वामीजी की सेवा करने का अधिकार पाकर शिष्य का हृदय आज आनन्द से परिपूर्ण है। प्रसाद पाकर वह स्वामीजी की चरणसेवा कर रहा है। इतने में स्वामीजी बोले, “ऐसे स्थान को छोड़कर तुम कलकत्ता जाना जाहते हो? यहाँ कैसा पवित्र भाव, कैसी गंगाजी की वायु, कैसा सब साधुओं का समागम है! ऐसा स्थान क्या और कहीं ढूँढ़ने से मिलेगा?”</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, बहुत जन्मों की तपस्या से आपका सत्संग मुझे मिला है। अब कृपया ऐसा उपाय कीजिये जिससे मैं फिर मायामोह में न पँसू। अब प्रत्यक्ष अनुभूति के लिए मन कभी कभी बड़ा व्याकुल हो उठता है।</p><p>स्वामीजी &#8211; मेरी भी अवस्था ऐसी हुई थी। काशीपुर के उद्यान में एक दिन श्रीगुरुदेव से बड़ी व्याकुलता से अपनी प्रार्थना प्रकट की थी। उस दिन सन्ध्या के समय ध्यान करते करते अपने शरीर को खोजा, तो नहीं पाया। ऐसा प्रतीत हुआ कि शरीर बिलकुल है ही नहीं। <a
href="/chandra-dev-mantra-katha-upay/">चन्द्र</a>, <a
href="/surya-dev-mantra-katha-upay/">सूर्य</a>, देश, काल, आकाश सब मानो एकाकार होकर कहीं लय हो गये हैं। देहादि बुद्धि का प्रायः अभाव हो गया था और ‘मैं’ भी बस लय-सा ही हो रहा था! परन्तु कुछ ‘अहं’ था, इसीलिए उस समाधि-अवस्था से लौट आया था। इस प्रकार समाधिकाल में ही ‘मैं’ और ‘ब्रह्म’ में भेद नहीं रहता, सब एक हो जाता है; मानो महासमुद्र &#8211; जल ही जल और कुछ नहीं है; भाव और भाषा का अन्त हो जाता है। ‘अवाङ्मनसोगोचरम्’ जो शास्त्र-वाक्य है, उसकी उपलब्धि इसी समय होती है। नहीं तो जब साधक ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ऐसा विचार करता है या कहता है तब भी ‘मैं’ और ‘ब्रह्म’ ये दो पदार्थ पृथक् रहते हैं अर्थात् द्वैतबोध रहता है। उसी अवस्था को फिर प्राप्त करने की मैने बारम्बार चेष्टा की, परन्तु पा न सका। श्रीगुरुदेव से कहने पर वे बोले, ‘उस अवस्था में दिनरात रहने से माता भगवती का कार्य तुमसे नहीं होगा। इसलिए उस अवस्था को फिर प्राप्त न कर सकोगे, कार्य का अन्त होने पर वह अवस्था फिर आ जायगी।’</p><p>शिष्य &#8211; तो क्या निःशेष समाधि या ठीक ठीक निर्विकल्प समाधि होने पर, कोई फिर अहंज्ञान का आश्रय लेकर द्वैतभाव के राज्य में &#8211; इस संसार में &#8211; नहीं लौट सकता?</p><p>स्वामीजी &#8211; <a
href="/my-master-ramakrishna-paramhamsa-vivekananda-hindi/">श्रीरामकृष्णजी</a> कहा करते थे कि एकमात्र अवतारी पुरुष ही जीव की मंगल कामना कर ऐसी समाधि से लौट सकते हैं। साधारण जीवों का फिर व्युत्थान नहीं होता; केवल इक्कीस दिन तक जीवित अवस्था में रहने के बाद उनके शरीर सूखे पत्ते के समान संसाररूपी वृक्ष से झड़कर गिर पड़ते हैं।</p><p>शिष्य &#8211; मन के विलुप्त होने पर जब समाधि होती है, मन की जब कोई लहर नहीं रह जाती, तब फिर विक्षेप अर्थात् अहंज्ञान का आश्रय लेकर संसार में लौटने की क्या सम्भावना है? जब मन ही नहीं रहा तब कौन या किसलिए समाधि अवस्था को छोड़कर द्वैतराज्य में उतरकर आयेगा?</p><p>स्वामीजी &#8211; वेदान्तशास्त्रों का अभिप्राय यह है कि निःशेष निरोधसमाधि से पुनरावृत्ति नहीं होती; यथा &#8211; ‘अनावृत्तिः शब्दात्।’ परन्तु अवतारी लोग जीवों के मंगल के निमित्त एकआध सामान्य वासना रख लेते हैं। उसी आश्रय से ज्ञानातीत अद्वैतभूमि (superconscious state) से ‘मैं-तुम’ की ज्ञानमूलक द्वैतभूमि (conscious state) में आते हैं।</p><p>शिष्य &#8211; किन्तु महाराज, यदि एकआध वासना भी रह जाय, तो उसे निःशेष निरोध समाधि अवस्था कैसे कह सकते हैं? क्योंकि शास्त्र में कहा है कि निःशेष निर्विकल्प समाधि में मन की सब वृत्तियाँ, सब वासनाएँ निरुद्ध या ध्वंस हो जाती हैं।</p><p>स्वामीजी &#8211; महाप्रलय के पश्चात् तो फिर सृष्टि ही कैसे होती है? महाप्रलय में भी तो सब कुछ ब्रह्म में लय हो जाता है। परन्तु लय होने पर भी शास्त्र में सृष्टिप्रसंग सुनने में आता है &#8211; सृष्टि और लय प्रवाहाकार से पुनः चलते रहते हैं। महाप्रलय के पश्चात् सृष्टि और लय के पुनरावर्तन के समान अवतारी पुरुषों का निरोध और व्युत्थान भी अप्रासंगिक क्यों होगा?</p><p>शिष्य &#8211; क्या यह नहीं हो सकता है कि लयकाल में पुनः सृष्टि का बीज ब्रह्म में लीनप्राय रहता है और वह महाप्रलय या निरोध समाधि नहीं है, वरन् वह केवल सृष्टि का बीज तथा शक्ति का (आप जैसा कहते हैं) एक अव्यक्त्त (potential) आकार मात्र धारण करना है।</p><p>स्वामीजी &#8211; इसके उत्तर में मैं कहूँगा कि जिस ब्रह्म में किसी गुण का अस्तित्व नहीं है, जो निर्लेप और निर्गुण है, उसके द्वारा इस सृष्टि का बहिर्गत (projected) होना कैसे सम्भव है। शिष्य &#8211; यह बहिर्गमन (projection) तो यथार्थ नहीं। आपके वचन के उत्तर में शास्त्र ने कहा है कि ब्रह्म से सृष्टि का विकास मरुस्थल में मृगजल के समान दिखायी देता है, परन्तु वास्तव में सृष्टि आदि कुछ भी नहीं है। भाव-वस्तु ब्रह्म में अभाव-मिथ्या-रूप माया के कारण ऐसा भ्रम दिखायी देता है।</p><p>स्वामीजी &#8211; यदि सृष्टि ही मिथ्या है, तो तुम जीव की निर्विकल्प समाधि और समाधि से व्युत्थान को भी मिथ्या कहकर मान सकते हो। जीव स्वतः ही ब्रह्मस्वरूप है। उसके फिर बन्धन की अनुभूति कैसी? ‘मैं आत्मा हूँ’ ऐसा जो तुम अनुभव करना चाहते हो, वह भी तो भ्रम ही हुआ, क्योंकि शास्त्र कहते हैं कि तुम तो पहले से ही ब्रह्म हो। अतएव ‘अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठसि’ &#8211; समाधिलाभ करना जो तुम चाहते हो, वही तुम्हारा बन्धन है।</p><p>शिष्य &#8211; यह तो बड़ी कठिन बात हैं। यदि मैं ब्रह्म ही हूँ, तो सर्वदा इस विषय की अनुभूति क्यो नहीं होती?</p><p>स्वामीजी &#8211; यदि ‘मैं-तुम’ के राज्य द्वैत-भूमि (conscious plane) में इस बात का अनुभव करना हो, तो एक करण या जिससे अनुभव हो सके, ऐसे एक पदार्थ (some instrumentality) की आवश्यकता है। मन ही हमारा वह करण है, परन्तु मन पदार्थ तो जड़ है। उसके पीछे जो आत्मा है उसकी प्रभा से मन चैतन्यवत् केवल प्रतीत होता है। इसलिए पंचदशीकार ने कहा है, ‘चिच्छायावेशतः शक्तिश्चेतनेव विभाति सा’ अर्थात् चित्स्वरूप आत्मा की परछाई या प्रतिबिम्ब के आदेश से शक्ति को चैतन्यमयी कहकर अनुमान करते हैं और इसीलिए मन को भी चेतन पदार्थ कहकर मानते हैं। अतएव यह निश्चित है कि मन के द्वारा शुद्ध चैतन्यस्वरूप आत्मा को नहीं जान सकते। मन के परे पहुँचना है। मन के परे तो कोई करण नहीं है &#8211; एक आत्मा ही है। अतएव जिसको जानना चाहते हो, वही फिर करणस्थानीय हो जाता है। कर्ता, कर्म, करण सब एक हो जाता है। इसीलिए श्रुति कहती है, ‘विज्ञातारमरे केन विजानीयात्’। इसका निचोड़ यह है कि द्वैतभूमि (conscious plane) के ऊपर ऐसी एक अवस्था है जहाँ कर्ता, कर्म, करणादि में कोई द्वैतभाव नहीं है। मन के निरोध होने से वह प्रत्यक्ष होती है। और कोई उचित भाषा न होने के कारण इस अवस्था को ‘प्रत्यक्ष करना’ कह रहा हूँ; नहीं तो इस अनुभव को प्रकाशित करने के लिए कोई भाषा नहीं है। श्रीशंकराचार्य इसको ‘अपरोक्षानुभूति’ कह गये हैं। ऐसी प्रत्यक्षनुभूति या अपरोक्षानुभूति होने पर भी अवतारी लोग नीचे द्वैतभूमि पर उतरकर उसकी कुछ कुछ झलक दिखा देते हैं। इसीलिए कहते हैं कि आप्तपुरुषों के अनुभव से ही वेदादि शास्त्रों की उत्पत्ति हुई है। साधारण जीवों की अवस्था उस नमक के पुतले के समान है, जो समुद्र को नापने गया था और स्वयं ही उसमें घुल गया, समझे न? तात्पर्य यह है कि तुम्हें इतना ही जानना होगा कि तुम वही नित्य ब्रह्म हो। तुम तो पहले से ही वह हो, केवल एक जड़ मन (जिसको शास्त्र ने माया कहा है) बीच में पड़कर तुम्हें इसको समझने नहीं देता। सूक्ष्म जड़रूप उपादानों द्वारा निर्मित मन नामक पदार्थ के प्रशमित होने पर आत्मा अपनी प्रभा से आप ही उद्भासित होती है। यह माया और मन मिथ्या है, इसका एक प्रमाण यह है कि मन स्वयं जड़ और अन्धकारस्वरूप है जो इसके पीछे विद्यमान आत्मा की प्रभा से चैतन्यवत् प्रतीत होता है। जब इसको समझ जाओगे तो एक अखण्ड चैतन्य में मन लय हो जायगा; तभी ‘अयमात्मा ब्रह्म’ की अनुभूति होगी।</p><p>यहाँ पर स्वामीजी बोले, “क्या तुझे नींद आ रही है? तो जा सो जा।” शिष्य स्वामीजी के पास के ही बिछौने पर सो गया। रात में स्वामीजी नींद अच्छी न आने के कारण बीच बीच में उठकर बैठने लगे। शिष्य भी उठकर उनकी आवश्यक सेवा करने लगा। इस प्रकार रात बीत गयी, पर रात्रि के अन्तिम प्रहर में एक अद्भुत-सा स्वप्न देखकर निद्रा भंग होने पर वह बड़े आनन्द से उठा। प्रातःकाल <a
href="/ganga-chalisa/">गंगास्नान</a> करके जब शिष्य आया, तो देखा कि स्वामीजी मठ के निचले मंजिल में एक बेंच पर पूर्व की ओर मुँह किये बैठे हैं। रात्रि के स्वप्न को स्मरण कर स्वामीजी के चरणकमलों के पूजन के लिए उसका मन व्याकुल हुआ और उसने अपना अभिप्राय प्रकट कर उनकी अनुमति के लिए प्रार्थना की। उसकी व्याकुलता को देख स्वामीजी सम्मत हो गये; फिर शिष्य ने कुछ धतूरे के फूल संग्रह किये और स्वामीजी के शरीर में महाशिव के अधिष्ठान ध्यान करके विधिपूर्वक उनकी पूजा की।</p><p>पूजा के अन्त में स्वामीजी शिष्य से बोले, “तूने तो पूजा कर ली, परन्तु बाबूराम (स्वामी प्रेमानन्दजी) आकर तुझे खा जायेगा! तूने कैसे श्रीरामकृष्ण के पूजापात्र में मेरे पाँव को रखकर पूजा की?” ये बातें हो ही रही थीं कि स्वामी प्रेमानन्दजी वहाँ आ पहुँचे और स्वामीजी उनसे बोले, “देखो, आज इसने कैसा एक काण्ड रचा है! श्रीरामकृष्ण के पूजापात्र में फूलचन्दन लेकर इसने मेरी पूजा की।” स्वामी प्रेमानन्दजी हँसने लगे और बोले, “बहुत अच्छा किया, तुम और श्रीरामकृष्ण क्या अलग अलग हो?” यह बात सुनकर शिष्य निर्भय हो गया।</p><p>शिष्य एक कट्टर हिन्दू था। अखाद्य का तो कहना ही क्या, किसी का छुआ हुआ द्रव्य तक भी ग्रहण नहीं करता था, इसलिए स्वामीजी उसको कभी कभी ‘पण्डितजी’ कहकर पुकारते थे। प्रातःकालीन जलपान के समय विलायती बिस्कुट इत्यादि खाते खाते स्वामीजी स्वामी सदानन्द से बोले, “जाओ, ‘पण्डितजी’ को तो पकड़ लाओ।” आदेश पाकर शिष्य के वहाँ पहुँचते ही स्वामीजी ने शिष्य को इन द्रव्यों में से थोड़ा थोड़ा प्रसादरूप से खाने को दिया। बिना दुविधा में पड़े शिष्य को वह सब ग्रहण करते देखकर स्वामीजी हँसते हुए बोले, “आज तुमने क्या खाया जानते हो? ये सब मुर्गी के अण्डे से बनी हुई हैं।” इसके उत्तर में उसने कहा, “जो भी हो मुझे जानने की कोई आवश्यकता नहीं, आपके प्रसादरूप अमृत को खाकर मैं तो अमर हो गया।” यह सुनकर स्वामीजी बोले, “मैं आशीर्वाद देता हूँ कि आज से तुम्हारी जाति, वर्ण, आभिजात्य, पाप, पुण्यादि अभिमान सदा के लिए दूर हो जायँ।”</p><p>स्वामीजी की उस दिन की अयाचित अपार दया को स्मरण कर शिष्य समझता है कि उसका मानवजन्म सार्थक हो गया।</p><p>तीसरे पहर अकाउन्टन्ट जनरल बाबू मन्मथनाथ भट्टाचार्य स्वामीजी के पास आये। अमरीका जाने से पहले स्वामीजी मद्रास में इन्हीं के भवन में अतिथि होकर बहुत दिन रहे थे और तभी से वे स्वामीजी के प्रति बहुत श्रद्धा-भक्ति रखते थे। भट्टाचार्य महाशय पाश्चात्य देश और भारतवर्ष के सम्बन्ध में अनेक प्रश्न करने लगे। स्वामीजी ने उन सब प्रश्नों के उत्तर देकर और अनेक प्रकार से सत्कार करके कहा, “एक दिन तो यहाँ ठहर ही जाइये।” मन्मथ बाबू यह कहकर कि “और किसी दिन आकर ठहरूँगा” बिदा हुए और सीढ़ियों से नीचे उतरते समय किसी एक मित्र से कहने लगे, “हम यह मद्रास में पहले ही जान गये थे कि वे पृथ्वी पर एक महान् कार्य किये बिना न रहेंगे। ऐसी सर्वतोमुखी प्रतिभा मनुष्य में तो पायी नहीं जाती।”</p><p>स्वामीजी ने मन्मथ बाबू के साथ <a
href="/ganga-maiya-ki-aarti/">गंगा</a> के किनारे तक जाकर उनको अभिवादन करके बिदा किया और कुछ देर तक मैदान में टहलकर अपने कमरे में विश्राम करने के लिए चले गये।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-18/">निर्विकल्प समाधि पर स्वामी विवेकानंद का व्याख्यान</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-18/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद द्वारा शिष्य को व्यापार वाणिज्य करने के लिए प्रोत्साहित करना</title><link>https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-19/</link> <comments>https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-19/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सुरभि भदौरिया]]></dc:creator> <pubDate>Mon, 18 Nov 2024 06:08:21 +0000</pubDate> <category><![CDATA[धर्म]]></category> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=6325</guid><description><![CDATA[<p>स्वामीजी द्वारा शिष्य को व्यापार वाणिज्य करने के लिएप्रोत्साहित करना - वास्तविक शिक्षा किसे कहते हैं - वास्तविक शिक्षा किसे कहते हैं आदि।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-19/">स्वामी विवेकानंद द्वारा शिष्य को व्यापार वाणिज्य करने के लिए प्रोत्साहित करना</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><strong>स्थल &#8211;</strong> बेलुड़; किराये का मठ-भवन<br><br><strong>वर्ष &#8211;</strong> १८९८ ईसवी<br><br><strong>विषय &#8211;</strong> स्वामीजी द्वारा शिष्य को व्यापार वाणिज्य करने के लिए प्रोत्साहित करना &#8211; श्रद्धा व आत्मविश्वास न होने के कारण ही इस देश केमध्यम श्रेणी के लोगों की दुर्दशा &#8211; इंग्लैण्ड में नौकरीपेशा लोगों को छोटामानकर उनके प्रति जनता की घृणा &#8211; भारत में शिक्षा के अभिमानी व्यक्त्तियोंकी निष्क्रियता &#8211; वास्तविक शिक्षा किसे कहते हैं &#8211; दुसरे देशों के निवासियोंकी क्रियाशीलता और आत्मविश्वास &#8211; भारत के उच्च जातीय लोगों की तुलनामें निम्नजातीय लोगों की जागृति तथा उनका उच्च जाति के लोगों से अपनेअधिकार प्राप्त करने का प्रयत्न &#8211; उच्च जाति के लोग इस विषय में यदि उनकीसहायता करें तो भविष्य में दोनों जातियों का लाभ &#8211; निम्नजातियों के व्यक्त्तियों को यदि गीता के उपदेश के अनुसार शिक्षा दी जाय तो वे अपने अपने जातीयकर्मों का त्याग न करके उन्हें और भी गौरव के साथ करते रहेंगे &#8211; यदिउच्चवर्गीय व्यक्ति इस समय इस प्रकार निम्नजातियों की सहायता न करेंगेतो उनके भविष्य के निश्चय ही अन्धकारपूर्ण होने की सम्भावना।</p><p>शिष्य आज प्रातःकाल मठ में आया है। स्वामीजी के चरणकमलों की वन्दना करके खड़े होते ही स्वामीजी बोले, “नौकरी ही करते रहने से क्या होगा। कोई व्यापार क्यों नहीं करते?” शिष्य उस समय एक स्थान पर एक गृहशिक्षक का कार्य करता था। उस समय तक उसके सिर पर परिवार का भार न था। आनन्द से दिन बीतते थे। शिक्षक के कार्य के सम्बन्ध में शिष्य ने पूछा तब स्वामीजी ने कहा, “बहुत दिनों तक मास्टरी करने से बुद्धि बिगड़ जाती है। ज्ञान का विकास नहीं होता। दिनरात लड़कों के बीच रहने से धीरे धीरे जड़ता आ जाती है; इसलिए आगे अब अधिक मास्टरी न कर।”</p><p>शिष्य &#8211; तो क्या करू?</p><p>स्वामीजी &#8211; क्यों? यदि तुझे गृहस्थी ही करनी है और यदि धन कमाने की आकांक्षा है, तो जा अमरीका में चला जा। मैं व्यापार का उपाय बता दूँगा। देखना पाँच वर्षों में कितना धन कमा लेगा।</p><p>शिष्य &#8211; कौनसा व्यापार करूँगा? और उसके लिए धन कहाँ से आयगा?</p><p>स्वामीजी &#8211; पागल की तरह क्या बकता है? तेरे भीतर अदम्य शक्ति है। तू तो ‘मैं कुछ नहीं’ सोच सोच कर वीर्यविहीन बना जा रहा है। तू ही क्यों? &#8211; सारी जाति ही ऐसी बन गयी है। जा एक बार घूम आ; देखेगा भारतवर्ष के बाहर लोगों का जीवनप्रवाह कैसे आनन्द से, सरलता से, प्रबल वेग के साथ बहता जा रहा है। और तुम लोग क्या कर रहे हो? इतनी विद्या सीख कर दुसरों के दरवाजे पर भिखारी की तरह ‘नौकरी दो, नौकरी दो’ कहकर चिल्ला रहे हो। दूसरों की ठोकरें खाते हुए &#8211; गुलामी करके भी तुम लोग क्या अभी मनुष्य रह गये हो? तुम लोगों का मूल्य एक फूटी कौड़ी भी नहीं है। ऐसी सुजला सुफला भूमि, जहाँ पर प्रकृति अन्य सभी देशों से करोड़ों गुना अधिक धनधान्य पैदा कर रही है, वहाँ पर जन्म लेकर भी तुम लोगों के पेट में अन्न नहीं, तन पर वस्त्र नहीं! जिस देश के धनधान्य ने पृथ्वी के अन्य सभी देशों में सभ्यता का विस्तार किया है, उसी अन्नपूर्णा के देश में तुम लोगों की ऐसी दुर्दशा! तुम लोग घृणित कुत्तों से भी बदतर हो गये हो! और फिर भी अपने वेद <a
href="/vedanta-bharat-mein-vivekananda-2/">वेदान्त</a> की डींग हाँकते हो! जो राष्ट्र आवश्यक अन्न-वस्त्र का भी प्रबन्ध नहीं कर सकता और दूसरों के मुँह की ओर ताक कर ही जीवन व्यतीत कर रहा है उस राष्ट्र का यह गर्व! <a
href="/category/dharma/">धर्म</a> कर्मों को तिलांजलि देकर पहले जीवनसंग्राम में कूद पड़ो। भारत में कितनी चीजें पैदा होती हैं। विदेशी लोग उसी कच्चे माल के द्वारा ‘सोना’ पैदा कर रहे हैं। और तुम लोग बोझ ढोनेवाले गधों की तरह उनके सामानों को उठाते उठाते मरे जा रहे हो। भारत में जो चीजें उत्पन्न होती हैं, विदेशी उन्हीं को ले जाकर अपनी बुद्धि से अनेक प्रकार की चीजें बनाकर सम्पत्तिशाली बन गये; और तुम लोग! अपनी बुद्धि सन्दूक में बन्द करके घर का धन दूसरों को देकर ‘हा अन्न’ ‘हा अन्न’ करके भटक रहे हो!</p><p>शिष्य &#8211; अन्न-समस्या कैसे हल हो सकती है, महाराज?</p><p>स्वामीजी &#8211; उपाय तुम्हारे ही हाथों में है। आँखों पर पट्टी बाँधकर कह रहे हो, “मैं अन्धा हूँ, कुछ देख नहीं सकता!’ आँख पर की पट्टी अलग कर दो, देखोगे &#8211; दोपहर सूर्य की किरणों से जगत् आलोकित हो रहा है। रुपया इकट्ठा नहीं कर सकता, तो जहाज का मजदूर बनकर विदेश में चला जा। देशी वस्त्र, गमछा, सूप, झाडू सिर पर रखकर अमरीका और युरोप की सड़कों और गलियों में घूम-घूम कर बेच। देखेगा, भारत में उत्पन्न चीजों का आज भी वहाँ कितना मूल्य है। हुगली जिले के कुछ मुसलमान अमरीका में ऐसा ही व्यापार कर धनवान बन गये हैं। क्या तुम लोगों की विद्या बुद्धि उनसे भी कम है? देखना, इस देश में जो बनारसी साड़ी बनती है, उसके समान बड़िढया कपड़ा पृथ्वी भर में और कहीं नहीं बनता इस कपड़े को लेकर अमरीका में चला जा। उस देश में इस कपड़े से स्त्रियों के गाऊन तैयार करने लग जा, फिर देख कितने रुपये आते हैं।</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, वे लोग क्या बनारसी साड़ी का गाऊन पहनेंगी? सुना है, रंगबिरंगे कपड़े उनके देश की औरतें पसन्द नहीं करतीं।</p><p>स्वामीजी &#8211; लेंगे या नहीं, यह मैं देखूँगा। हिम्मत करके चला तो जा! उस देश में मेरे अनेक मित्र हैं। मैं उनसे तेरा परिचय करा दूँगा। आरम्भ में कह सुनकर उनमें उन चीजों का प्रचार करा दूँगा। उसके बाद देखेगा, कितने लोग उनकी नकल करते हैं। तब तो तू उनकी माँग की पूर्ति करने में भी अपने को असमर्थ पायगा।</p><p>शिष्य &#8211; पर व्यापार करने के लिए मूलधन कहाँ से आयगा?</p><p>स्वामीजी &#8211; मैं किसी न किसी तरह तेरा काम शुरू करा दूँगा। परन्तु उसके बाद तुझे अपने ही प्रयत्न पर निर्भर रहना होगा। ‘हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्’ &#8211; इस प्रयत्न में यदि तू मर भी जायगा तो भी बुरा नहीं। तुझे देखकर और दूसरे दस व्यक्ति आगे बढेंगे। और यदि सफलता प्राप्त हो गयी, तो फिर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करेगा।</p><p>शिष्य &#8211; परन्तु महाराज, साहस नहीं होता।</p><p>स्वामीजी &#8211; इसीलिए तो मैं कहता हूँ कि भाई, तुममें श्रद्धा नहीं है &#8211; आत्मविश्वास भी नहीं। क्या होगा तुम लोगों का? न तो तुमसे गृहस्थी होगी और न धर्म ही। या तो इस प्रकार के उद्योगधन्धे करके संसार में यशस्वी, सम्पत्तिशाली बन, या सब कुछ छोड़-छाड़ कर हमारे पथ का अनुसरण करके लोगों को धर्म का उपदेश देकर उनका उपकार कर; तभी तू हमारी तरह भिक्षा पा सकेगा। लेन-देन न रहने पर कोई किसी की ओर नहीं ताकता। देख तो रहा है; हम धर्म की दो बातें सुनाते हैं, इसीलिए गृहस्थ लोग हमें अन्न के दो दाने दे रहे हैं। तुम लोग कुछ भी न करोगे, तो लोग तुम्हें अन्न भी क्यों देंगे? नौकरी में, गुलामी में इतना दुःख देखकर भी तुम लोग सचेत नहीं हो रहे हो! इसलिए दुःख भी दूर नहीं हो रहा है। यह अवश्य ही दैवी माया का छल है। उस देश में मैंने देखा, जो लोग नौकरी करते हैं उनका स्थान पार्लमेंट (राष्ट्रीय सभा) में बहुत पीछे होता है। पर जो लोग प्रयत्न करके विद्या-बुद्धि द्वारा स्वनामधन्य हो गये हैं उनके बैठने के लिए सामने की सीटें रहती हैं। उन सब देशों में जाति-भेद का झंझट नहीं है। उद्यम व परिश्रम द्वारा जिन पर भाग्य-लक्ष्मी प्रसन्न है, वे ही देश के नेता और नियन्ता माने जाते हैं। और तुम्हारे देश में जातिपाँति का मिथ्याभिमान है, इसीलिए तुम्हे अन्न तक नसीब नहीं। तुममें एक सुई तक तैयार करने की योग्यता नहीं है और फिर तुम लोग अंग्रेजों के गुणदोषों की आलोचना करने को उद्यत होते हो! मूर्ख! जा उनके पैरो पड़; जीवनसंग्राम के उपयुक्त विद्या, शिल्पविज्ञान और क्रियाशीलता सीख, तभी तू योग्य बनेगा और तभी तुम लोगों का सम्मान होगा। वे भी उस समय तुम्हारी बात मानेंगे। केवल काँग्रेस बनाकर चिल्लाने से क्या होगा?</p><p>शिष्य &#8211; परन्तु महाराज, देश के सभी शिक्षित लोग उसमें सम्मिलित हो रहे हैं।</p><p>स्वामीजी &#8211; कुछ उपाधियाँ प्राप्त करने या अच्छा भाषण दे सकने से ही क्या तुम्हारी दृष्टि में वे शिक्षित हो गये! जो शिक्षा साधारण व्यक्ति को जीवनसंग्राम में समर्थ नहीं बना सकती, जो मनुष्य में चरित्र-बल, परहित-भावना तथा सिंह के समान साहस नहीं ला सकती, वह भी कोई शिक्षा है? जिस शिक्षा के द्वारा जीवन में अपने पैरों पर खड़ा हुआ जाता है, वही है शिक्षा। आजकल के इन सब स्कूल-कालेजों में पढ़कर तुम लोग न जाने कैसी एक प्रकार के अजीर्ण के रोगियों की जमात तैयार कर रहे हो। केवल मशीन की तरह परिश्रम कर रहे हो और ‘जायस्व म्रियस्व’ इस वाक्य के साक्षी रूप में खड़े हो! ये जो किसान, मजदूर, मोची, मेहतर आदि हैं इनकी कर्मशीलता और आत्मनिष्ठा तुममें से कई लोगों से काफी अधिक है। ये लोग चिरकाल से चुपचाप काम किये जा रहे हैं, देश का धन-धान्य उत्पन्न कर रहे हैं, पर अपने मुँह से कभी आवाज नहीं निकालते। ये लोग शीघ्र ही तुम लोगों से ऊपर उठ जायेंगे। धन उनके हाथ में चला जा रहा है &#8211; तुम्हारी तरह उनमें कमी नहीं है। वर्तमान शिक्षा से तुम्हारा सिर्फ बाहरी परिवर्तन होता जा रहा है। &#8211; परन्तु नयी नयी उद्भावनी शक्ति के अभाव के कारण तुम लोगों को धन कमाने का उपाय उपलब्ध नहीं हो रहा है। तुम लोगों ने इतने दिन इन सब सहनशील निम्नजातियों पर अत्याचार किया है। अब ये लोग उसका बदला लेंगे और तुम लोग ‘हा! नौकरी’ ‘हा! नौकरी’ करके लुप्त हो जाओगे।</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, दूसरे देशों की तुलना में हमारी उद्भावनी शक्ति कम होने पर भी भारत की अन्य सभी जातियाँ तो हमारी बुद्धि द्वारा ही संचालित हो रही हैं। अतः ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि उच्च जातियों को जीवनसंग्राम में पराजित कर सकने की शक्ति और शिक्षा अन्य जातियाँ कहाँ से पायेंगी?</p><p>स्वामीजी &#8211; माना कि उन्होंने तुम लोगों की तरह पुस्तके नहीं पढ़ी हैं, तुम्हारी तरह कोट कमीज पहनकर सभ्य बनना उन्होंने नहीं सीखा, पर इससे क्या होता है? वास्तव में वे ही राष्ट्र की रीढ़ हैं। यदि ये निम्नश्रेणियों के लोग अपना अपना काम बन्द कर दे तो तुम लोगों को अन्न-वस्त्र मिलना कठिन हो जाय! कलकत्ते में यदि मेहतर लोग एक दिन के लिए काम बन्द कर देते हैं तो ‘हाय तोबा’ मच जाती है; यदि तीन दिन वे काम बन्द कर दें तो सांक्रमिक रोग से शहर बर्बाद हो जाय! श्रमिकों के काम बन्द करने पर तुम्हें अन्न-वस्त्र नहीं मिल सकते। इन्हें ही तुम लोग नीच समझ रहे हो और अपने को शिक्षित मानकर अभिमान कर रहे हो।</p><p>जीवनसंग्राम में सदा लगे रहने के कारण निम्न श्रेणी के लोगों में अभी तक ज्ञान का विकास नहीं हुआ। ये लोग अभी तक मानवबुद्धि द्वारा परिचालित यन्त्र की तरह एक ही भाव से काम करते आये हैं, और बुद्धिमान चतुर व्यक्ति इनके परिश्रम तथा कार्य का सार तथा निचोड़ लेते रहें हैं। सभी देशों में इसी प्रकार हुआ है। परन्तु अब वे दिन नहीं रहे। निम्न श्रेणी के लोग धीरे धीरे यह बात समझ रहे हैं और इसके विरुद्ध सब सम्मिलित रूप से खड़े होकर अपने समुचित अधिकार प्राप्त करने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हो गये हैं। यूरोप और अमरीका में निम्न जातीय लोगों ने जागृत होकर इस दिशा में प्रयत्न भी प्रारम्भ कर दिया है, और आज भारत में भी इसके लक्षण दृष्टिगोचर हो रहे हैं। निम्न श्रेणी के व्यक्तियों द्वारा आजकल जो इतनी हडताले हो रही है, वह इनकी इसी जागृति का प्रमाण है। अब हजार प्रयत्न करके भी उच्च जाति के लोग निम्न श्रेणियों को अधिक दबाकर नहीं रख सकेंगे। अब निम्न श्रेणियों के न्यायसंगत अधिकार की प्राप्ति में सहायता करने में ही उच्च श्रेणियों का भला है।</p><p>इसीलिए कहता हूँ कि तुम लोग ऐसे काम में लग जाओ, जिससे साधारण श्रेणी के लोगों में विद्या का विकास हो। इन्हें जाकर समझा कर कहो &#8211; ‘तुम हमारे भाई हो &#8211; हमारे शरीर के अंग हो &#8211; हम तुमसे प्रेम करते हैं &#8211; घृणा नहीं।’ तुम लोगों की यह सहानुभूति पाने पर ये लोग सौ गुने उत्साह के साथ काम करने लगेंगे। आधुनिक विज्ञान की सहायता से इनमें ज्ञान का विकास कर दो। इतिहास, भूगोल, विज्ञान, साहित्य और साथ ही साथ धर्म के गम्भीर तत्त्व इन्हें सिखा दो। उससे शिक्षकों की भी दरिद्रता मिट जायगी और लेन-देन से दोनों आपस में मित्र जैसे बन जायेंगे।</p><p>शिष्य &#8211; परन्तु महाराज, इनमें शिक्षा का प्रचार होने पर ये लोग भी तो फिर समय जाने पर हमारी ही तरह बुद्धिमान किन्तु निश्चेष्ट तथा आलसी बनकर अपने से निम्न श्रेणी के लोगों के परिश्रम से लाभ उठाने लग जायेंगे।</p><p>स्वामीजी &#8211; ऐसा क्यों होगा? ज्ञान का विकास होने पर भी कुम्हार कुम्हार ही रहेगा &#8211; मछुआ मछुआ ही बना रहेगा &#8211; किसान खेती का ही काम करेगा। कोई अपना जातीय धन्धा क्यों छोड़ेगा? ‘सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्’ &#8211; इस भाव से शिक्षा पाने पर वे लोग अपने अपने व्यवसाय क्यों छोडेंगे? विद्या के बल से अपनी जाति के कर्म को और भी अच्छी तरह से करने का प्रयत्न करेंगे। समय पर उनमें से दस-पाँच प्रतिभाशाली व्यक्ति अवश्य उठ खड़े होंगे। उन्हें तुम अपनी उच्च श्रेणी में सम्मिलित कर लोगे। तेजस्वी विश्वामित्र को जो ब्राह्मणों ने ब्राह्मण मान लिया था इससे क्षत्रिय जाति ब्राह्मणों के प्रति कितनी कृतज्ञ हुई थी &#8211; कहो तो? उसी प्रकार सहानुभूति और सहायता प्राप्त करने पर मनुष्य तो दूर रहा, पशु पक्षी भी अपने बन जाते हैं।</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, आप जो कुछ कह रहे हैं वह सत्य तो है, परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि अभी भी उच्च तथा निम्न श्रेणी के लोगों में बड़ा अन्तर है। भारतवर्ष की निम्न जातियों के प्रति उच्च श्रेणी के लोगों में सहानुभूति की भावना लाना बड़ा ही कठिन काम ज्ञात होता हैं।</p><p>स्वामीजी &#8211; परन्तु ऐसा न होने से तुम्हारा (उच्च जातियों का) भला नहीं है। तुम लोग हमेशा से जो कुछ करते आ रहे हो, वह तुम्हारा पृथकता का प्रयत्न रहा है। आपस की मारकाट ही करते हुए मर मिटोगे! ये निम्न श्रेणी के लोग जब जाग उठेंगे और अपने ऊपर होनेवाले तुम लोगों के अत्याचारों को समझ लेंगे, तब उनकी फूक से ही तुम लोग उड़ जाओगे! उन्होंने तुम्हें सभ्य बनाया है, उस समय वे ही सब कुछ मिटा देंगे। सोचकर देखो न &#8211; रोमन सभ्यता गाल जाति के पंजे में पड़कर कहाँ चली गयी। इसीलिए कहता हूँ, इन सब निम्नजाति के लोगों को विद्यादान, ज्ञानदान देकर उन्हें नींद से जगाने के लिए सचेष्ट हो जाओ! जब वे लोग जागेंगे &#8211; और एक दिन वे अवश्य जागेंगे &#8211; तब वे भी तुम लोगों के किये उपकारों को नहीं भूलेंगे और तुम लोगों के प्रति कृतज्ञ रहेंगे।</p><p>इस प्रकार वार्तालाप के बाद स्वामीजी ने शिष्य से कहा &#8211; ये सब बातें अब रहने दे, तूने अब क्या निश्चय किया, कह। मैं तो कहता हूँ, जो कुछ भी हो, तू कुछ कर अवश्य। या तो किसी व्यापार के लिए चेष्टा कर, नहीं तो हम लोगों की तरह ‘आत्मनो मोक्षार्थं जगधिताय च’ &#8211; यथार्थ <a
href="/sanyas-aur-uska-adarsh-tatha-sadhan-bharat-mein-vivekananda/">संन्यास</a> के पथ का अनुसरण कर। यह अन्तिम पथ ही निस्सन्देह श्रेष्ठ पथ है, व्यर्थ ही गृहस्थ बनने से क्या होगा? समझा न, सभी क्षणिक है &#8211; ‘नलिनीदलगतजलमतितरलं, तद्वज्जीवनमतिशयचपलम्।’ अतः यदि इसी आत्मविश्रास को प्राप्त करने को उत्कण्ठित है, तो फिर समय न गँवा! आगे बढ़। ‘यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्।’ दूसरों के लिए अपने जीवन का बलिदान देकर लोगों के द्वार द्वार पर जाकर यह अभय वाणी सुना – <strong>“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।”</strong></p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-19/">स्वामी विवेकानंद द्वारा शिष्य को व्यापार वाणिज्य करने के लिए प्रोत्साहित करना</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-19/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>“उद्बोधन” पत्र की स्थापना &#8211; इस पत्र के लिए स्वामी त्रिगुणातीतानन्दजी का अमित कष्ट तथा त्याग</title><link>https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-20/</link> <comments>https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-20/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सुरभि भदौरिया]]></dc:creator> <pubDate>Mon, 18 Nov 2024 06:06:51 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=6328</guid><description><![CDATA[<p>स्थान &#8211; बेलुड़, किराये का मठ वर्ष &#8211; १८९८ ईसवी विषय &#8211; “उद्बोधन” पत्र की स्थापना &#8211; इस पत्र के</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-20/">“उद्बोधन” पत्र की स्थापना &#8211; इस पत्र के लिए स्वामी त्रिगुणातीतानन्दजी का अमित कष्ट तथा त्याग</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><strong>स्थान &#8211; </strong>बेलुड़, किराये का मठ<br><br><strong>वर्ष &#8211;</strong> १८९८ ईसवी<br><br><strong>विषय &#8211;</strong> “उद्बोधन” पत्र की स्थापना &#8211; इस पत्र के लिए <a
href="/swami-vivekananda-ke-patra-swami-tigunatitananda-17-january-1896/">स्वामी त्रिगुणातीतानन्दजी</a> का अमित कष्ट तथा त्याग &#8211; स्वामीजी का इस पत्र कोप्रकाशित करने का उद्देश &#8211; <a
href="/ramkrishna-paramhans-biography-in-hindi/">श्रीरामकृष्ण</a> की <a
href="/swami-vivekananda-sanyasi-meaning-hindi/">संन्यासी</a> सन्तानों का त्याग तथाअध्यवसाय &#8211; गृहस्थों के कल्याण के लिए ही पत्र का प्रचार आदि &#8211; “उद्बोधन”पत्र का संचालन &#8211; जीवन को उच्च भाव से गढ़ने के लिए उपायों का निर्देश &#8211; किसी से घृणा करना या किसी को डराना निन्दनीय &#8211; भारत में अवसन्नताका कारण &#8211; शरीर को सबल बनाना आवश्यक।</p><p>जिस समय मठ आलम बाजार से लाकर बेलुड़ मे नीलाम्बर बाबू के बगीचे में स्थापित किया गया, उसके थोड़े दिन बाद स्वामीजी ने अपने गुरुभाइयों के सामने जनसाधारण में <a
href="/my-master-ramakrishna-paramhamsa-vivekananda-hindi/">श्रीरामकृष्णजी</a> के भावों के प्रचार के लिए बंगला भाषा में एक समाचार-पत्र निकालने का प्रस्ताव रखा। स्वामीजी ने पहले एक दैनिक समाचार-पत्र निकालने का प्रस्ताव किया था। परन्तु उसमें काफी धन की आवश्यकता होने के कारण एक पाक्षिक पत्र प्रकाशित करने का प्रस्ताव ही सर्वसम्मति से निश्चित हुआ और स्वामी त्रिगुणातीतानन्दजी को उसके संचालन का भार सौंपा गया। स्वामीजी के पास एक हजार रुपये थे; श्रीरामकृष्म के गृहस्थ भक्त<sup>1</sup> ने और एक हजार रुपये ऋण के रूप में दिये, उसी धन से काम शुरू हुआ। एक छापाखाना<sup>2</sup> खरीदा गया और श्यामबाजार के ‘रामचन्द्र मैत्र लेन’ में श्रीगिरीन्द्रनाथ बसक के घर पर वह प्रेस रखा गया। स्वामी त्रिगुणातीतानन्दजी ने इस प्रकार कार्यभार ग्रहण करके बंगला सन १३०५, माघ के प्रथम दिन उक्त ‘पत्र’ का प्रथम अंक प्रकाशित किया। स्वामीजी ने उस पत्र का नाम ‘उद्बोधन’ रखा और उसकी उन्नति के लिए स्वामी त्रिगुणातीतानन्दजी को अनेकानेक आशीर्वाद दिये। अथक परिश्रमी स्वामी त्रिगुणातीतानन्दजी ने स्वामीजी के निर्देश पर उसके मुद्रण तथा प्रचार के लिए जो परिश्रम किया था वह अवर्णनीय है। कभी भक्त-गृहस्थ के भिक्षान्न पर निर्वाह कर, कभी अभुक्त्त रहकर, कभी प्रेस तथा पत्र सम्बन्धी कार्य के लिए दस दस मील तक पैदल चलकर स्वामी त्रिगुणातीतानन्दजी उक्त पत्र की उन्नति तथा प्रचार के लिए प्राणपण से प्रयत्न में लग गये। उस समय पैसा देकर कर्मचारी रखना सम्भव न था और स्वामीजी का आदेश था कि पत्र के लिए एकत्रित धन में से एक पैसा भी पत्र के अतिरिक्त अन्य किसी कार्य में खर्च न किया जाय; इसीलिए स्वामी त्रिगुणातीतानन्दजी ने भक्तों के घर भिक्षा माँगकर जैसे तैसे अपने भोजन और वस्त्र का प्रबन्ध करते हुए उक्त निर्देश का अक्षरशः पालन किया था।</p><p>पत्र की प्रस्तावना स्वामीजी ने स्वयं लिख दी थी और निश्चय हुआ कि श्रीरामकृष्ण के <a
href="/swami-vivekananda-sanyasi-meaning-hindi/">संन्यासी</a> तथा गृहस्थ भक्तगण ही इस पत्र में लेख आदि लिखेंगे तथा किसी भी प्रकार के अश्लील विज्ञापन आदि इस पत्र में प्रकाशित न होंगे। श्रीरामकृष्ण मिशन एक संघ का रूप धारण कर चुका था। स्वामीजी ने मिशन के सदस्यों से इस पत्र में लेख आदि लिखने तथा श्रीरामकृष्ण के <a
href="/category/dharma/">धर्म</a> सम्बन्धी मतों का पत्र की सहायता से जनसाधारण में प्रचार करने के लिए अनुरोध किया। पत्र का प्रथम अंक प्रकाशित होने पर एक दिन शिष्य मठ में उपस्थित हुआ। प्रणाम करके बैठ जाने पर उससे स्वामीजी ने उद्बोधन पत्र के सम्बन्ध में वार्तालाप प्रारम्भ किया &#8211;</p><p>स्वामीजी &#8211; (पत्र के नाम को हँसी हँसी में विकृत करके) &#8211; ‘उद्वन्धन’<sup>3</sup>देखा है?</p><p>शिष्य &#8211; जी, हाँ! सुन्दर है!</p><p>स्वामीजी &#8211; इस पत्र भाव भाषा सभी कुछ नये ढाँचे में गढ़ने होंगे!</p><p>शिष्य &#8211; कैसे?</p><p>स्वामीजी &#8211; श्रीरामकृष्ण का भाव तो सब को देना होगा ही; साथ ही बंगला भाषा में नया जोश लाना होगा। उदाहरणार्थ बार बार केवल क्रियापद का प्रयोग करने से भाषा की शक्ति घट जाती है; विशेषण देकर क्रियापदों का प्रयोग घटा देना होगा। तू ऐसी भाषा में निबन्ध लिखना शुरू कर दे। पहले मुझे दिखाकर फिर उद्बोधन में प्रकाशित होने के लिए भेजते जाना।</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, स्वामी त्रिगुणातीतानन्दजी इस पत्र के लिए जितना परिश्रम कर रहे हैं, वह दूसरों के लिए असम्भव है।</p><p>स्वामीजी &#8211; तो क्या तू समझता है कि श्रीरामकृष्ण की ये सब संन्यासी सन्तान केवल पेड़ के नीचे धूनी लगाकर बैठे रहने के लिए ही पैदा हुई है? इनमें से जो जिस समय जिस कार्यक्षेत्र में अवतीर्ण होगा, उस समय उसका उद्यम देखकर लोग दंग रह जायेंगे। इससे सीख, काम कैसे करना चाहिए। यह देख, मेरे आदेश का पालन करने के लिए त्रिगुणातीत साधन-भजन, ध्यानधारणा तक छोड़कर कर्तव्यक्षेत्र में उतर पड़ा है। क्या यह कम त्याग की बात है? मेरे प्रति कितने प्रेम से कर्म की यह प्रेरणा उसमें आयी है देख तो, काम पूर्ण होने पर ही वह उसे छोड़ेगा! क्या तुम लोगों में है ऐसी दृढ़ता?</p><p>शिष्य &#8211; परन्तु महाराज, गेरुआ वस्त्र पहने संन्यासी का गृहस्थों के द्वार द्वार पर इस प्रकार घूमना फिरना हमारी दृष्टि में उचित नहीं है।</p><p>स्वामीजी &#8211; क्यों! पत्र का प्रचार तो गृहस्थों के ही कल्याण के लिए है। देश में नवीन भाव के प्रचार से जनसाधारण का कल्याण होगा। क्या तू इस फलाकांक्षारहित कर्म को साधन-भजन से कम महत्वपूर्ण समझता है? हमारा उद्देश्य है जीवों का कल्याण करना। इस पत्र की आमदनी से हमारा इरादा पैसा कमाने का नहीं है। हम सर्वत्यागी संन्यासी हैं &#8211; हमारे स्त्री-पुत्र नहीं हैं जो उनके लिए कुछ छोड़ जायेंगे। यदि काम सफल हो तथा आमदनी बढ़े तो इसकी सारी आमदनी जीवसेवा के उद्देश्य से खर्च होगी। स्थान स्थान पर संघ और सेवाश्रम स्थापित करने तथा अन्यान्य कल्याणकारी कार्यों में इससे बचे हुए धन का सदुपयोग हो सकेगा। हम लोग गृहस्थों की तरह धन संग्रह के उद्देश्य से यह काम नहीं कर रहे हैं। केवल परहित के लिए ही हमारे सभी काम है, यह जान लेना।</p><p>शिष्य &#8211; फिर भी सभी लोग इस भाव को समझ नहीं सकते।</p><p>स्वामीजी &#8211; न सही! इसमें हमारा क्या बनेगा या बिगड़ेगा? हम निन्दा या प्रशंसा की परवाह करके कार्य में अग्रसर नहीं हुए हैं।</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, यह पत्र हर पन्द्रह दिनों के बाद प्रकाशित होगा; हमारी इच्छा है कि वह साप्ताहिक हो।</p><p>स्वामीजी &#8211; यह तो ठीक है, परन्तु उतना धन कहाँ है? श्रीरामकृष्ण की इच्छा से यदि रुपये की व्यवस्था हो जायगी तो कुछ समय के पश्चात् इसे दैनिक भी किया जा सकता है और प्रतिदिन इसकी लाखों प्रतियाँ छापकर कलकत्ते की गली गली में बिना मूल्य बाँटी जा सकती हैं।</p><p>शिष्य &#8211; आपका यह संकल्प बहुत ही उत्तम है।</p><p>स्वामीजी &#8211; मेरी इच्छा है कि इस पत्र को स्वावलम्बी बनाकर तुझे सम्पादक बना दूँ। किसी चीज को पहलेपहल खड़ा करने की शक्ति तो तुम लोगों में अभी नहीं आयी है। इसमें तो ये सब सर्वत्यागी साधु ही समर्थ हैं। ये लोग काम करते करते मर जायँगे, फिर भी हटनेवाले नहीं है। तुम लोग थोड़ी बाधा आते ही, थोड़ी निन्दा सुनते ही चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार देखने लगते हो।</p><p>शिष्य &#8211; हाँ, उस दिन हमने देखा भी था कि स्वामी त्रिगुणातीतानन्दजी ने पहले श्रीरामकृष्ण के चित्र की प्रेस में पूजा कर ली और तब काम प्रारम्भ किया। साथ ही काम की सफलता के लिए आपकी कृपा की प्रार्थना की।</p><p>स्वामीजी &#8211; हमारा केन्द्र तो श्रीरामकृष्ण ही हैं। हम एक एक व्यक्ति उसी प्रकाश-केन्द्र की एक एक किरण मात्र हैं। श्रीरामकृष्म की पूजा करके काम का आरम्भ किया, यह अच्छा किया। परन्तु उसने पूजा की बात तो मुझसे कुछ भी नहीं कही?</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, वे आपसे डरते हैं। उन्होंने मुझसे कल कहा, “तू पहले स्वामीजी के पास जाकर जान आ कि पत्र के प्रथम अंक के बारे में उनकी क्या राय है, फिर मैं उनसे मिलूँगा।”</p><p>स्वामीजी &#8211; तू जाकर कह दे, मैं उसके काम से बहुत प्रसन्न हुआ हूँ। उसे मेरा आशीर्वाद भी कहना और तुम लोग सब जहाँ तक हो सके उसकी सहायता करना। यह तो श्रीरामकृष्ण का ही काम है।</p><p>इतनी बातें कहकर स्वामीजी ने ब्रह्मानन्द स्वामीजी को पास बुलाया और आवश्यकतानुसार भविष्य में उद्बोधन के लिए त्रिगुणातीतानन्दजी को और अधिक धन देने का आदेश दिया। उस दिन रात को भोजन के पश्चात् स्वामीजी ने फिर शिष्य के साथ उद्बोधन पत्र के सम्बन्ध में चर्चा की।</p><p>स्वामीजी &#8211; उद्बोधन द्वारा जनसाधारण के सामने विधायक आदर्श रखना होगा। ‘नहीं, नहीं’ की भावना मनुष्य को दुर्बल बना डालती है। देखता नहीं, जो माता पिता दिन रात बच्चों के लिखने पढ़ने पर जोर देते रहते हैं, कहते हैं, ‘इसका कुछ सुधार नहीं होगा’, ‘यह मूर्ख है, गधा है’ आदि आदि &#8211; उनके बच्चे अधिकांश वैसे ही बन जाते हैं। बच्चों को अच्छा कहने से और प्रोत्साहत देने से, समय आने पर वे स्वयं ही अच्छे बन जाते हैं। जो नियम बच्चों के लिए हैं वे ही उन लोगों के लिए भी हैं जो भावराज्य के उच्च अधिकार की तुलना में उन शिशुओं की तरह हैं यदि जीवन को संगठित करनेवाले भाव उत्पन्न किये जा सके तो साधारण व्यक्ति भी मनुष्य बन जायगा और अपने पैरों पर खड़ा होना सीख सकेगा। मनुष्य भाषा साहित्य, दर्शन, <a
href="/category/hindi-poetry/">कविता</a>, शिल्प आदि अनेकानेक क्षेत्रों में जो प्रयत्न कर रहा है उसमें वह अनेकों गलतियाँ करता है। आवश्यक यह है कि हम उसे उन गलतियों को न बतलाकर उसे प्रगति के मार्ग पर धीरे धीरे अग्रसर होने के लिए सहायता दें। गलतियाँ दिखा देने से लोगों के मन में दुःख होता है तथा वे हतोत्साह हो जाते हैं। श्रीरामकृष्ण को हमने देखा है &#8211; जिन्हें हम त्याज्य मानते थे उन्हें भी वे प्रोत्साहित करके उनके जीवन की गति को लौटा देते थे। शिक्षा देने का उनका ढंग ही बड़ा अद्भुत था।</p><p>इसके पश्चात् स्वामीजी थोड़ा चुप हो गये। थोड़ी देर बाद फिर कहने लगे, “धर्म प्रचार के काम को बात-बात में किसी पर भी नाक भौं सिकोड़ने का काम न समझ लेना। शरीर, मन और आत्मा से सम्बद्ध सभी बातों में मनुष्य को विधायक भाव देना होगा, परन्तु घृणा के साथ नहीं। आपस में एक दूसरे से घृणा करते करते ही तुम लोगों का अधःपतन हो गया है। अब केवल सबल होने तथा जीवन को संगठित करने का भाव फैलाकर लोगों को उठाना होगा &#8211; उसके बाद दुनिया को उठाना होगा। असल में श्रीरामकृष्ण के अवतीर्ण होने का उद्देश्य यही था। उन्होंने जगत् में किसी के भाव को नष्ट नहीं किया। उन्होंने महापतित मनुष्य को भी अभय और उत्साह देकर उठा लिया है। हमें भी उनके चरणचिन्हों का अनुसरण कर सभी को उठाना होगा &#8211; जगाना होगा &#8211; समझा?</p><p>“तुम्हारे इतिहास, साहित्य, पुराण आदि सभी शास्त्र मनुष्य को केवल डराने का ही कार्य करते हैं। मनुष्य से केवल कह रहे हैं &#8211; ‘तू नरक में जायगा, तेरी रक्षा का कोई उपाय नहीं है।’ इसलिए भारत की नस नस में इतनी अवसन्नता प्रविष्ट हो गयी है। अतः वेद-वेदान्त के उच्च भावों को सरल भाषा में लोगों को समझा देना होगा। सदाचार, सद्व्यवहार और शिक्षा का प्रचार कर ब्राह्मण और चाण्डाल को एक ही भूमि पर खड़ा करना होगा। उद्बोधन पत्र में इन्हीं विषयों को लिखकर बालक, वृद्ध, स्त्री, पुरुष सभी को उठा दे तो देखूँ। तब जानूँगा तेरा वे-वेदान्त पढ़ना सफल हुआ है। क्या कहता है बोल &#8211; कर सकेगा?”</p><p>शिष्य &#8211; मन कहता है, आपका आशीर्वाद और आदेश होने पर सभी विषयों में सफल हो सकूँगा।</p><p>स्वामीजी &#8211; एक बात और, तुम्हें शरीर को दृढ़ बनाना सीखना होगा और यही दूसरों को भी सिखाना होगा। देखता नहीं मैं अभी भी प्रतिदिन डम्बेल करता हूँ। रोज सबेरे शाम घूमना; शारीरिक परिश्रम करना &#8211; शरीर और मन साथ ही साथ उन्नत होने चाहिए। सभी बातों में दूसरों पर निर्भर रहने से कैसे काम चलेगा। शरीर को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता समझने पर तू स्वयं ही उस विषय में चेष्टा करेगा। इस आवश्यकता को समझने के ही लिए तो शिक्षा की जरूरत है।</p><hr
class="wp-block-separator has-css-opacity"/><ol><li>स्वर्गीय हरमोहन मित्र।</li><li>यह छापाखाना स्वामीजी के जीवनकाल में ही कई कारणों से बेच दिया गया था।</li><li>इस शब्द का अर्थ है &#8211; गले में फाँसी लगवाकर आत्मघात कर लेना।</li></ol><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-20/">“उद्बोधन” पत्र की स्थापना &#8211; इस पत्र के लिए स्वामी त्रिगुणातीतानन्दजी का अमित कष्ट तथा त्याग</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-20/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>भगिनी निवेदिता आदि के साथ स्वामी विवेकानंद का अलीपुर पशुशालादेखने जाना</title><link>https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-21/</link> <comments>https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-21/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सुरभि भदौरिया]]></dc:creator> <pubDate>Sun, 10 Nov 2024 14:08:46 +0000</pubDate> <category><![CDATA[धर्म]]></category> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=6330</guid><description><![CDATA[<p>भगिनी निवेदिता आदि के साथ स्वामीजी का अलीपुर पशुशालादेखने जाना - पशुशाला देखते समय वार्तालाप तथा हँसी -  सम्बन्ध में महामुनि पतंजलि का मत आदि।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-21/">भगिनी निवेदिता आदि के साथ स्वामी विवेकानंद का अलीपुर पशुशालादेखने जाना</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><strong>स्थान &#8211;</strong> कलकत्ता<br><br><strong>विषय &#8211;</strong> <a
href="/swami-vivekananda-ke-patra-sister-nivedita-2-may-1900/">भगिनी निवेदिता</a> आदि के साथ स्वामीजी का अलीपुर पशुशालादेखने जाना &#8211; पशुशाला देखते समय वार्तालाप तथा हँसी &#8211; दर्शन के बादपशुशाला के सुपरिण्टेण्डेण्ट रायबहादुर बाबू रामब्रह्म संन्याल के मकान परचाय पीना तथा क्रमविकास के सम्बन्ध में वार्तालाप &#8211; क्रमविकास का कारणबताकर पाश्चात्य विद्वानों ने जो कुछ कहा है वह अन्तिम निर्णय नहीं है &#8211; उस विषय में कारण के सम्बन्ध में महामुनि पतंजलि का मत &#8211; बागबाजार मेंलौटकर स्वामीजी का फिर से क्रमविकास के बारे में वार्तालाप &#8211; पाश्चात्यविद्वानों द्वारा बताये हुए क्रमविकास के कारण मानवेतर अन्य प्राणियों में सत्यहोने पर भी मानवजाति में संयम तथा त्याग ही सर्वोच्च परिणति के कारणहैं &#8211; स्वामीजी ने सर्वसाधारण को सब से पहले शरीर को सुदृढ़ बनाने के लिए क्यों कहा</p><p>आज तीन दिन से स्वामीजी बागबाजार के स्व. बलराम बसु के मकान पर निवास कर रहे हैं। प्रतिदिन अगणित लोगों की भीड़ है। <a
href="/swami-vivekananda-ke-patra-swami-yogananda-24-january-1896/">स्वामी योगानन्दजी</a> भी स्वामीजी के साथ ही निवास कर रहे हैं। आज भगिनी निवेदिता को साथ लेकर स्वामीजी अलीपुर का ‘जू’ (पशुशाला) देखने जायँगे। शिष्य के उपस्थित होने पर उससे तथा स्वामी योगानन्दजी से कहा, “तुम लोग पहले चले जाओ &#8211; मैं निवेदिता को लेकर गाड़ी पर थोड़ी देर में आ रहा हूँ।”</p><p>स्वामी योगानन्दजी शिष्य को साथ लेकर ट्राम द्वारा करीब ढाई बजे रवाना हो गये। उस समय घोड़े की ट्राम चलती थी। दिन के करीब चार बजे पशुशाला में पहुँचकर उन्होंने बगीचे के सुपरिण्टेण्डेण्ट रायबहादुर बाबू रामब्रह्म सन्याल से भेंट की। स्वामीजी आ रहे हैं यह जानकर रामब्रह्म बाबू बहुत ही प्रसन्न हुए और स्वामीजी का स्वागत करने के लिए स्वयं बगीचे के फाटक पर खड़े रहे। करीब साढ़े चार बजे स्वामीजी भगिनी निवेदिता को साथ लेकर वहाँ पहुँचे। रामब्रह्म बाबू भी बड़े आदर सत्कार के साथ स्वामीजी तथा निवेदिता का स्वगत कर उन्हें पशुशाला के भीतर ले गये और करीब डेढ़ घण्टे तक उनके साथ साथ घूमते हुए बगीचे के विभिन्न स्थानों को दिखाते रहे। स्वामी योगानन्दजी भी शिष्य के साथ उनके पीछे पीछे चले।</p><p>रामब्रह्म बाबू वनस्पतिशास्त्र के अच्छे पण्डित थे। बगीचे के नाना प्रकार के वृक्षों को दिखाते हुए वनस्पतिशास्त्र के मतानुसार कालक्रम में वृक्षादि की किस प्रकार क्रम-परिणति हुई है, यह बतलाते हुए आगे बढ़ने लगे। तरह तरह के जानवरों को देखते हुए स्वामीजी भी बीच बीच में जीव की क्रम-परिणति के सम्बन्ध में डारविन के मत की आलोचना करने लगे। शिष्य को स्मरण है, साँपों के घर में जाकर उन्होंने बदन पर चक्र जैसे दागवाले एक बृहत् साँप को दिखाकर कहा, “देखो, इसीसे कालक्रम में कछुआ पैदा हुआ है। उसी साँप के बहुत दिनों तक एक स्थान पर बैठने रहने के कारण धीरे धीरे उसकी पीठ कड़ी हो गयी है।” इतना कहकर स्वामीजी ने शिष्य से हँसी हँसी में पूछा, “तुम लोग कछुआ खाते हो न? डारविन के मत में यह साँप ही कालक्रम के अनुसार कछुआ बन गया है; &#8211; तो बात यह हुई कि तुम लोग साँप भी खाते हो!” शिष्य ने सुनकर मुँह फेरकर कहा &#8211; “महाराज, कोई चीज क्रमविकास के द्वारा दूसरी चीज बन जाने पर जब उसका पहले का आकार और प्रकृति नहीं रहती तो फिर कछुआ खाने से साँप खाना कैसे हुआ? यह आप कैसे कह रहे हैं?”</p><p>शिष्य की बात सुनकर स्वामीजी तथा रामब्रह्म बाबू हँस पड़े और भगिनी निवेदिता को यह बात समझा देने पर वे भी हँसने लगीं। धीरे धीरे सभी लोग उस कटघरे की ओर बढ़ने लगे जिसमें शेर, बाघ आदि रहते थे।</p><p>रामब्रह्म बाबू की आज्ञानुसार वहाँ के चपरासी लोग शेरों तथा बाघों के लिए अधिक परिमाण में माँस लाकर हमारे सामने ही उन्हें खिलाने लगे। उनकी सानन्द गर्जना सुनकर तथा आग्रहपूर्वक भोजन माँगना देखकर हम लोग बड़े प्रसन्न हुए। इसके थोड़ी देर बाद हम सभी बगीचे में स्थित रामब्रह्म बाबू के मकान में आये। वहाँ पर चाय तथा जलपान आदि की व्यवस्था हुई। स्वामीजी ने थोड़ीसी चाय पी। निवेदिता ने भी चाय पी। एक ही मेज पर बैठकर भगिनी निवेदिता की छुई हुई मिठाई तथा चाय लेने में संकोच होते देख स्वामीजी ने शिष्य से कई बार अनुरोध करके उसे वह खिलायी और स्वयं जल पीकर उसका बाकी बचा हुआ जल शिष्य को पीने के लिए दे दिया। इसके बाद डारविन के क्रमविकासवाद के सम्बन्ध में थोड़ी देर तक चर्चा होती रही।</p><p>रामब्रह्म बाबू &#8211; डारविन के क्रमविकासवाद तथा उसके कारण को जिस भाव से समझाया है, उसके बारे में आपकी क्या राय है?</p><p>स्वामीजी &#8211; डारविन का कहना ठीक होने पर भी मैं ऐसा नहीं मान सकता कि क्रमविकास के कारण के सम्बन्ध में वही अन्तिम निर्णय है।</p><p>रामब्रह्म बाबू &#8211; क्या इस विषय पर हमारे देश के प्राचीन विद्वानों ने किसी प्रकार का विचार नहीं किया?</p><p>स्वामीजी सांख्य दर्शन में इस विषय पर पर्याप्त विचार किया गया है। मेरी सम्मति में क्रमविकास के कारण के बारे में भारतवर्ष के प्राचीन दार्शनिकों का सिद्धान्त ही अन्तिम निर्णय है।</p><p>रामब्रह्म बाबू &#8211; यदि संक्षेप में उस सिद्धान्त को समझाना सम्भव हो तो सुनने की इच्छा है।</p><p>स्वामीजी &#8211; निम्नजाति को उच्चजाति में परिणत करने में पाश्चात्यों की राय में ‘जीवनसंग्राम’ (struggle for existence), ‘योग्यतम का उद्वर्तन’ (survival of the fittest). ‘प्राकृतिक निर्वाचन’ (natural selection) आदि जिन सब नियमों को कारण माना गया है, आप उन्हें अवश्य ही जानते होंगे। परन्तु पातंजलदर्शन में उनमें से एक को भी उनका कारण नहीं माना गया है। पतंजलि की राय है कि, ‘प्रकृत्यापूरात्’ &#8211; अर्थात् प्रकृति की पूर्तिक्रिया द्वारा एक जाति दूसरी जाति में परिणत हो जाती है। विघ्नों के साथ दिनरात संघर्ष करके वैसा नहीं होता है। मैं समझता हूँ कि संघर्ष और प्रतिद्वन्द्विता तो बहुधा जीव की पूर्णता प्राप्ति में रुकावटें बन जाती हैं। यदि हजार जीवों का विनाश करके एक जीव की क्रमोन्नति होती है (जिसका पाश्चात्य दर्शन समर्थन करता है) तो फिर कहना होगा कि क्रमविकास द्वारा जगत् की कोई विशेष उन्नति की बात यदि मान भी ली जाय तो भी यह बात माननी ही पड़ेगी कि आध्यात्मिक विकास के लिए वह विशेष विघ्नकारक है। हमारे दार्शनिकों का कहना है कि सभी जीव पूर्ण आत्मा हैं। इस आत्मा के प्रकाश के कम-ज्यादा होने के कारण ही प्रकृति की अभिव्यक्ति तथा विकास में विभिन्नता दिखायी देती हैं। प्रकृति की अभिव्यक्ति एवं विकास में जो विघ्न हैं, वे जब सम्पूर्ण रूप से दूर हो जाते हैं तब पूर्ण भाव से आत्मप्रकाश होता है। प्रकृति की अभिव्यक्ति के निम्नस्तरों में चाहे जो हो परन्तु उच्चस्तरों में उन्हें दूर करने के लिए इन विघ्नों के साथ दिनरात संघर्ष करना आवश्यक नहीं है। देखा जाता है, वहाँ पर शिक्षा-दीक्षा, ध्यान-धारणा एवं प्रधानतया त्याग के ही द्वारा विघ्न दूर हो जाते हैं अथवा अधिकतर आत्मप्रकाश प्रकट होता है। अत: विघ्नों को आत्मप्रकाश का कार्य न कहकर कारण कहना तथा प्रकृति को इस विचित्र अभिव्यक्ति के सहायक कहना ठीक नहीं है। हजार पापियों के प्राणों का नाश करके जगत् से पाप को दूर करने की चेष्टा करने से जगत् में पाप की वृद्धि ही होती है। परन्तु यदि उपदेश देकर जीव को पाप से निवृत्त किया जा सके तो जगत् में फिर पाप नहीं रहेगा। अब देखिये, पाश्चात्यों के संघर्ष-मतवाद (Struggle Theory) अर्थात् जीवों का आपस में संघर्ष व प्रतिद्वन्द्विता द्वारा उन्नति करने का मतवाद कितना भयानक मालूम होता है।</p><p>रामब्रह्म बाबू स्वामीजी की बातों को सुनकर दंग रह गये। अन्त में बोले, “इस समय भारतवर्ष में आप जैसे प्राच्य और पाश्चात्य दर्शनों में पारंगत विद्वानों की ही आवश्यकता है। ऐसे ही विद्वान् व्यक्ति एकदेशदर्शी शिक्षित जनसमुदाय की भूलों को साफ साफ दिखा दे सकते हैं। आपकी क्रमविकासवाद की नवीन व्याख्या सुनकर मैं विशेष आनन्दित हुआ हूँ।”</p><p>चलते समय रामब्रह्म बाबू ने बगीचे के फाटक तक आकर स्वामीजी को बिदा किया और वचन दिया कि किसी अन्य दिन उपयुक्त अवसर देखकर फिर एकान्त में स्वामीजी से भेंट करेंगे। मैं कह नहीं सकता कि रामब्रह्म बाबू ने उसके बाद फिर स्वामीजी के पास जाने का अवसर प्राप्त किया या नहीं, क्योंकि इस घटना के थोड़े दिन बाद उनकी मृत्यु हो गयी।</p><p>शिष्य स्वामी योगानन्दजी के साथ ट्राम पर सवार होकर रात के करीब आठ बजे बागबाजार लौटा। स्वामीजी उससे करीब पन्द्रह मिनट पहले लौटकर आराम कर रहे थे। लगभग आध घण्टा विश्राम करने के बाद वे बैठकघर में हमारे पास उपस्थित हुए। उस समय वहाँ पर स्वामी योगानन्दजी, स्व. शरच्चन्द्र सरकार, शशिभूषण घोष (डाक्टर), बिपिन बिहारी घोष (डाक्टर), शान्तिराम घोष आदि परिचित मित्रगण तथा स्वामीजी के दर्शन की इच्छा से आये हुए पाँच छः अन्य सज्जन भी उपस्थित थे। यह जानकर कि आज स्वामीजी ने पशुशाला देखने के लिए जाकर रामब्रह्म बाबू के पास क्रमविकासवाद की अपूर्व व्याख्या की है, सभी लोग उक्त प्रसंग को विशेष रूप से सुनने के लिए पहले से ही उत्सुक थे, अतः उनके आते ही सभी की इच्छा को देखकर शिष्य ने उसी प्रसंग को उठाया।</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, पशुशाला में आपने क्रमविकास के सम्बन्ध में जो कुछ कहा था, उसे मैं अच्छी तरह समझ न सका। कृपा उसे सरल भाषा में फिर कहिये।</p><p>स्वामीजी &#8211; क्यों, क्या नहीं समझा?</p><p>शिष्य &#8211; यही कि आपने पहले अनेक बार हमसे कहा है कि बाहरी शक्तियों के साथ संघर्ष करने की क्षमता ही जीवन का चिह्न है और वही उन्नति की सीढ़ी है। इसलिए आपने आज जो बतलाया वह कुछ उलटासा लगा।</p><p>स्वामीजी &#8211; उलटा क्यों बताऊँगा? तू ही समझ न सका। निम्न-प्राणीजगत् में हम वास्तव में जीवित रहने के लिए संघर्ष, सब से अधिक सामर्थ्यवान् का उद्वर्तन आदि नियम प्रत्यक्ष देखते हैं। इसीलिए डारविन का मतवाद कुछ कुछ सत्य ज्ञात होता है। परन्तु मनुष्य-जगत् में जहाँ ज्ञान-बुद्धि का विकास है वहाँ हम उक्त नियम से विपरीत ही देखते हैं। उदाहरणार्थ, जिन्हें हम वास्तव में महान् पुरुष या आदर्श पुरुष समझते हैं उनका बाह्य जगत् से संघर्ष बिलकुल नहीं दिखायी देता। पशुजगत् में संस्कार अथवा स्वाभाविक ज्ञान की प्रबलता है। परन्तु मनुष्य ज्यों ज्यों उन्नत होता जाता है त्यों त्यों उसमें बुद्धि का विकास होता जाता है। इसीलिए मनुष्येत्तर प्राणी-जगत् की तरह बुद्धियुक्त्त मनुष्यजगत् में दूसरों का नाश करके उन्नति नहीं हो सकती। मानव का सर्वश्रेष्ठ पूर्ण विकास एकमात्र त्याग के ही द्वारा सम्पन्न होता है। जो दूसरे के लिए जितना त्याग कर सके, मनुष्य में वह उतना बड़ा है। और निम्न स्तर के पशुओं में जो जितना ध्वंस कर सकता है, वह उतना ही बलवान समझा जाता है। अतः जीवनसंघर्ष-तत्त्व इन दोनों क्षेत्रों में एकसा उपयोगी नहीं हो सकता। मनुष्य का संघर्ष है मन में। मन को जो जितना वशीभूत कर सका, वह उतना बड़ा बना है। मन के सम्पूर्ण रूप से वृत्तिविहीन बनने से आत्मा का विकास होता है। मनुष्य से भिन्न प्राणी-जगत् में स्थूल देह के संरक्षण के लिए जो संघर्ष होते देखे जाते हैं, वे ही मानवजीवन में मन पर प्रभुता स्थापित करने के लिए अथवा सत्त्ववृत्ति-सम्पन्न बनने के लिए होते रहते हैं। जीवित वृक्ष तथा तालाब के जल में पड़ी हुई वृक्ष-छाया की तरह मनुष्येतर प्राणियों का संघर्ष मनुष्य-जगत् के संघर्ष से विपरीत देखा जाता है।</p><p>शिष्य &#8211; तो फिर आप हमें शारीरिक उन्नति करने के लिए इतना क्यों कहा करते हैं?</p><p>स्वामीजी &#8211; क्या तुम लोग मनुष्य हो? हाँ, इतना ही कि तुममें थोड़ी बुद्धि है। यदि शरीर स्वस्थ न हो तो मन के साथ संग्राम कैसे कर सकोगे? तुम लोग क्या जगत् के परिपूर्ण विकासरूपी मनुष्य कहलाने योग्य रह गये हो? आहार, निद्रा, मैथुन के अतिरिक्त तुम लोगों में और है ही क्या? गनीमत यही है कि अब तक चतुष्पाद नहीं बन गये। श्रीरामकृष्ण कहा करते थे &#8211; ‘वही मनुष्य है, जिसे अपने सम्मान का ध्यान है।’ तुम लोग तो ‘जायस्व म्रियस्व’ वाक्य के साक्षी बनकर स्वदेश-वासियों के द्वेष के और विदेशियों की घृणा के पात्र बने हुए हो। इस तरह तुम लोग मानवेतर प्राणियों की श्रेणी में आ गये हो, इसीलिए मैं तुम्हें संघर्ष करने को कहता हूँ। मतवाद का झमेला छोड़ो। अपने प्रतिदिन के कार्य एवं व्यवहार का स्थिर चित्त से विचार करके देख लो कि तुम लोग मनुष्य और मनुष्येतर स्तर के बीच के जीवविशेष हो या नहीं। शरीर को पहले सुसंगठित कर लो। फिर मन पर धीरे धीरे अधिकार प्राप्त होगा &#8211; ‘नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः’ &#8211; समझा?</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, ‘बलहीनेन’ शब्द के अर्थ में भाष्यकार ने तो ‘ब्रह्मचर्यहीनेन’ कहा है!</p><p>स्वामीजी &#8211; सो कहें, मैं कहता हूँ &#8211; The physically weak are unfit for the realisation of the Self. (जो लोग शरीर से दुर्बल हैं, वे आत्म-साक्षात्कार के अयोग्य हैं।)</p><p>शिष्य &#8211; परन्तु सबल शरीर में कई जड़-बुद्धि भी तो देखने में आते हैं।</p><p>स्वामीजी &#8211; यदि तुम कोशिश करके उन्हें सद्विचार एक बार दे सको, तो वे जितने शीघ्र उसे कार्यरूप में परिणत कर सकेंगे, उतने शीघ्र दुर्बल व्यक्ति नहीं कर सकते। देखता नहीं, क्षीण व्यक्ति कामक्रोधादि के वेग को सम्भाल नहीं सकता। कमजोर व्यक्ति थोड़े ही में क्रोध में आ जाते हैं &#8211; काम द्वारा भी शीघ्र मोहित हो जाते हैं।</p><p>शिष्य &#8211; परन्तु इस नियम का व्यतिक्रम भी देखा जाता है।</p><p>स्वामीजी &#8211; कौन कहता है कि व्यतिक्रिम नहीं है। मन पर एक बार अधिकार प्राप्त हो जाने पर देह सबल रहे या सूख जाय, इससे कुछ नहीं होता। वास्तविक यह है कि शरीर के स्वस्थ न रहने पर कोई आत्मज्ञान का अधिकारी ही नहीं बन सकता; <a
href="/talks-with-swami-vivekananda-hindi-1/">श्रीरामकृष्ण</a> कहा करते थे &#8211; ‘शरीर में जरा भी त्रुटि रहने पर जीव सिद्ध नहीं बन सकता।’</p><p>इन बातों को कहते कहते स्वामीजी को उत्तेजित होते देखकर शिष्य साहस करके और कोई बात न कर सका। वह स्वामीजी के सिद्धान्त को ग्रहण कर चुप हो गया। कुछ समय के पश्चात् स्वामीजी हँसी हँसी में उपस्थित व्यक्तियों से कहने लगे &#8211; “और एक बात सुनी है आप लोगों ने? आज एक भट्टाचार्य ब्राह्मण निवेदिता का जूठा खा आया है। उसकी छुई हुई मिठाई खायी तो खैर, उससे उतनी हानि नहीं! &#8211; परन्तु उसका छुआ हुआ जल कैसे पी गया?”</p><p>शिष्य &#8211; सो आप ही ने तो आदेश दिया था। गुरु के आदेश पर मैं सब कुछ कर सकता हूँ। जल पीने को तो मैं सहमत न था &#8211; आपने पीकर दिया, इसलिए प्रसाद मानकर पी गया।</p><p>स्वामीजी &#8211; तेरी जाति की जड़ कट गयी है &#8211; अब फिर तुझे कोई भट्टाचार्य ब्राह्मण नहीं कहेगा।</p><p>शिष्य &#8211; न कहे, मैं आपकी आज्ञा पर चाण्डाल का भात भी खा सकता हूँ।</p><p>यह बात सुनकर स्वामीजी तथा उपस्थित सभी लोग जोर से हँस पड़े।</p><p>बातचीत में रात्रि के करीब साढ़े बारह बज गये। शिष्य ने निवासगृह में लौटकर देखा, फाटक बन्द हो गया है। पुकारकर किसी को जगाने में असमर्थ होकर वह विवश हो बाहर के बरामदे में ही सो गया।</p><p>कालचक्र के निर्मम परिवर्तन के अनुसार आज स्वामीजी, स्वामी योगानन्दजी व भगिनी निवेदिता इस संसार में नहीं हैं &#8211; रह गयी है उनके जीवन की केवल पवित्र स्मृति। उनके वार्तालाप को थोड़ाबहुत लिखने में समर्थ होकर शिष्य अपने को धन्य मान रहा है।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-21/">भगिनी निवेदिता आदि के साथ स्वामी विवेकानंद का अलीपुर पशुशालादेखने जाना</a> appeared first on <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=6333</guid><description><![CDATA[<p>श्रीरामकृष्ण मठ को अद्वितीय धर्मक्षेत्र बना लेने की स्वामीजी की इच्छा - मठ में ब्रह्मचारियों को किस प्रकार शिक्षा देने का संकल्प था आदि।</p><p>The post <a
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href="/ramkrishna-paramhans-biography-in-hindi/">श्रीरामकृष्ण</a> मठ को अद्वितीय धर्मक्षेत्र बना लेने की स्वामीजी की इच्छा &#8211; मठ में ब्रह्मचारियों को किस प्रकार शिक्षा देने का संकल्प था &#8211; ब्रह्मचर्याश्रम, अन्नक्षेत्र व सेवाश्रम की स्थापना करके ब्रह्मचारियों का संन्यासव ब्रह्मविद्या प्राप्त करने के योग्य बनाने की इच्छा &#8211; उससे जनसाधारण काक्या भला होगा &#8211; परार्थ-कर्म बन्धन का कारण नहीं होता &#8211; माया का आवरणहट जाने पर ही सभी जीवों का विकास होता है &#8211; उस प्रकार के विकास द्वारासत्यसंकल्पत्व प्राप्त होता है &#8211; मठ को सर्व-धर्म-समन्वय-क्षेत्र बनाने कीयोजना &#8211; शुद्धाद्वैत का आचरण संसार की प्रायः सभी प्रकार की स्थितियों मेंकिया जा सकता है; इस संसार में स्वामीजी का आगमन यही दिखाने के लिए है &#8211; एक श्रेणी के वेदान्तवादियों का मत कि संसार में जब तक सब मुक्त न होंगे, तब तक तुम्हारी मुक्ति असम्भव है &#8211; ब्रह्मज्ञान के उपरान्त इस बात की अनुभूति कि स्थावरजंगम समग्र जगत् तथा सभी जीव अपनी ही सत्ता हैं &#8211; अज्ञान के सहारे ही संसार में सब प्रकार के कामकाज चल रहे हैं &#8211; अज्ञानका आदि व अन्त &#8211; इस विषय में शास्त्रोक्त्ति &#8211; ‘अज्ञान प्रवाह के रूप में नित्य जैसा लगता है, परन्तु उसका अन्त होता है’ &#8211; समस्त ब्रह्माण्ड ब्रह्म में अध्यस्तहो रहा है &#8211; जिसे पहले कभी नहीं देखा, उसके सम्बन्ध में अध्यास होता हैया नहीं &#8211; ब्रह्मतत्त्व का स्वाद गूँगे के स्वाद जैसा होता है (मूकास्वादनवत्)</p><p>आज दिन के करीब दो बजे के समय शिष्य पैदल चलकर मठ में आया है। अब मठ को स्थानान्तरित कर नीलाम्बर बाबू के बगीचेवाले मकान में लाया गया है। और इस मठ की जमीन भी थोड़े दिन हुए खरीदी गयी है। स्वामीजी शिष्य को साथ लेकर दिन के करीब चार बजे मठ की नयी जमीन में घूमने निकले हैं। मठ की जमीन उस समय भी जंगलों से पूर्ण थी। उस समय उस जमीन के उत्तर भाग में एक मंजिले का एक पक्का मकान था। उसी की मरम्मत करके वर्तमान मठ-भवन निर्मित हुआ है। जिन सज्जन ने मठ की जमीन खरीद दी थी, उन्होंने भी स्वामीजी के साथ थोड़ी दूर तक आकर विदा ली। स्वामीजी शिष्य के साथ मठ की भूमि पर भ्रमण करने लगे और वार्तालाप के सिलसिले में भावी मठ की रूपरेखा तथा नियम आदि की चर्चा करने लगे।</p><p>धीरे धीरे एक मंजिले मकान के पूर्व दिशावाले बरामदे में पहुँचकर घूमते घूमते स्वामीजी बोले, “यहीं पर साधुओं के रहने का स्थान होगा। यह मठ साधनभजन एवं ज्ञानचर्चा का प्रधान केन्द्र होगा &#8211; यही मेरी इच्छा है। यहाँ से जिस शक्ति की उत्पत्ति होगी वह पृथ्वी भर मैं फैल जायगी और वह मनुष्य के जीवन की गति को परिवर्तित कर देगी। ज्ञान, भक्ति, योग, कर्म के समन्वयस्वरूप मानव-हितकर उच्च आदर्श यहाँ से प्रसृत होंगे। इस मठ के पुरुषों के इशारे पर एक समय दिग्-दिगन्त में प्राण का संचार होगा। समय पर यथार्थ धर्म के सब प्रेमी यहाँ आकर एकत्रित होंगे &#8211; मन में इसी प्रकार की कितनी ही कल्पनाएँ उठ रही हैं।”</p><p>“मठ के वह जो दक्षिण-भाग की जमीन देख रहा है, वहाँ पर विद्या का केन्द्र बनेगा। व्याकरण, दर्शन, विज्ञान, काव्य, अलंकार, स्मृति, भक्तिशास्त्र और राजभाषा की शिक्षा उसी स्थान में दी जायगी। प्राचीन काल की पाठशाला के अनुकरण में वह विद्यामन्दिर स्थापित होगा। बालब्रह्मचारीगण उस स्थान पर रहकर शास्त्रों का अध्ययन करेंगे। उनके भोजन-वस्त्र का प्रबन्ध मठ की ओर से किया जायगा। ये सब ब्रह्मचारीगण पाँच वर्ष तक शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् यदि चाहेंगे तो घर लौटकर गृहस्थी कर सकेंगे। यदि इच्छा हो तो मठ के महापुरुषों की अनुमति लेकर संन्यास भी ले सकेंगे। इन ब्रह्मचारियों में जो उच्छृंखल या दुश्चरित्र पाये जायेंगे, उन्हें मठाधिपति उसी समय बाहर निकाल देंगे। यहाँ पर सभी जाति और वर्ण के शिक्षार्थियों को शिक्षा दी जायगी। इसमें जिन्हें आपत्ति होगी उन्हें नहीं लिया जायगा, परन्तु जो लोग अपनी जाति वर्णाश्रम के आचारों को मानकर चलना चाहेंगे, उन्हें अपने भोजन आदि का प्रबन्ध स्वयं कर लेना होगा। वे केवल अध्ययन ही दूसरों के साथ करेंगे। उनके भी चरित्र के सम्बन्ध में मठाधिपति सदा कड़ी दृष्टि रखेंगे। यहाँ पर शिक्षित न होने से कोई <a
href="/sanyas-aur-uska-adarsh-tatha-sadhan-bharat-mein-vivekananda/">संन्यास</a> का अधिकारी न बन सकेगा। धीरे धीरे जब इस प्रकार मठ का काम प्रारम्भ होगा उस समय कैसा होगा, बोल तो।”</p><p>शिष्य &#8211; तो क्या आप प्राचीन काल की तरह गुरुगृह में ब्रह्मचर्याश्रम की प्रथा को देश में फिर से प्रचलित करना चाहते हैं?</p><p>स्वामीजी &#8211; और नहीं तो क्या? इस समय देश में जिस प्रकार की शिक्षा दी जा रही है, उसमें ब्रह्मविद्या के विकास का जरा भी स्थान नहीं है। पहले के समान ब्रह्मचर्याश्रम स्थापित करने होंगे। परन्तु इस समय उनकी नींव व्यापक भावसमूह पर डालनी होगी, अर्थात, समयानुसार उसमें अनेक उपयुक्त परिवर्तन करने होंगे। वह सब बाद में बतलाऊँगा।</p><p>स्वामीजी फिर कहने लगे &#8211; “मठ के दक्षिण में वह जो जमीन है, उसे भी किसी दिन खरीद लेना होगा। वहाँ पर मठ का लंगरखाना रहेगा। वहाँ पर वास्तविक गरीब दुःखियों को नारायण मानकर सेवा करने की व्यवस्था रहेगी। वह लंगरखाना <a
href="/my-master-ramakrishna-paramhamsa-vivekananda-hindi/">श्रीरामकृष्णजी</a> के नाम पर स्थापित होगा। जैसा धन जुटेगा उसी के अनुसार लंगरखाना पहलेपहल खोलना होगा। ऐसा भी हो सकता है कि पहलेपहल दो-तीन ही व्यक्तियों को लेकर काम प्रारम्भ किया जाय। उत्साही ब्रह्मचारियों को इस लंगरखाने का संचालन सिखाना होगा। उन्हें कहीं से प्रबन्ध करके, आवश्यक हो तो भीख माँगकर भी इस लंगरखाने को चलाना होगा। इस विषय में मठ किसी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं कर सकेगा। ब्रह्मचारियों को ही उनके लिए धन संग्रह करके लाना पड़ेगा। इस प्रकार धर्मार्थ लंगर में पाँच वर्ष की शिक्षा समाप्त होने पर वे विद्यामन्दिर शाखा में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त कर सकेंगे। लंगरखाने में पाँच वर्ष और विद्यामन्दिर में पाँच वर्ष, कुल दस वर्ष शिक्षा ग्रहण के बाद मठ के स्वामियों द्वारा दीक्षित होकर वे संन्यास आश्रम में प्रविष्ट हो सकेंगे &#8211; बशर्ते कि वे <a
href="/swami-vivekananda-sanyasi-meaning-hindi/">संन्यासी</a> बनना चाहें और मठ के अध्यक्षगण उन्हें योग्य अधिकारी समझकर संन्यास देना चाहें। परन्तु मठाध्यक्ष किसी किसी विशेष सद्गुणी ब्रह्मचारी के सम्बन्ध में उस नियम का उल्लंघन भी करके उन्हें जब इच्छा हो संन्यास की दीक्षा दे सकेंगे। परन्तु साधारण ब्रह्मचारियों को, जैसा मैंने पहले कहा है, उसी प्रकार क्रमशः संन्यासाश्रम में प्रवेश करना होगा। मेरे मस्तिष्क में ये सब भाव मौजूद हैं।”</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, मठ में इस प्रकार तीन शाखाओं की स्थापना का क्या उद्देश्य होगा?</p><p>स्वामीजी &#8211; समझा नहीं? पहले अन्नदान, उसके बाद विद्यादान और सर्वोपरि ज्ञानदान। इन तीन भावों का समन्वय इस मठ से करना होगा। अन्नदान करने की चेष्टा करते करते ब्रह्मचारियों के मन में परार्थ कर्म में तत्परता तथा <a
href="/shiv-chalisa-lyrics-in-hindi-pdf/">शिव</a> मानकर जीवसेवा का भाव दृढ़ होगा। उससे उनका चित्त धीरे धीरे निर्मल होकर उसमें सात्त्विक भाव का स्फुरण होगा। तभी ब्रह्मचारीगण समय पर ब्रह्मविद्या प्राप्त करने की योग्यता एवं संन्यासाश्रम में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त कर सकेंगे।</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, ज्ञानदान ही यदि श्रेष्ठ है, फिर अन्नदान और विद्यादान की शाखाएँ स्थापित करने की क्या आवश्यकता है?</p><p>स्वामीजी &#8211; तू अभी तक मेरी बात नहीं समझा! सुन &#8211; इस अन्नाभाव के युग में यदि तू दूसरों के लिए सेवा के उद्देश्य से गरीब दुःखियों को, भिक्षा माँगकर या जैसे भी हो, दो ग्रास अन्न दे सका, तो जीव जगत् तथा तेरा तो कल्याण होगा ही &#8211; साथ ही साथ तू इस सत्कार्य के लिए सभी की सहानुभूति भी प्राप्त कर सकेगा। इस सत्कार्य के लिए तुझ पर विश्वास करके कामकांचन में बंधे हुए गृहस्थ लोग भी तेरी सहायता करने के लिए अग्रसर होंगे। तू विद्यादान या ज्ञानदान करके जितने लोगों को आकर्षित कर सकेगा, उसके हजार गुने लोग तेरे इस अयाचित अन्नदान द्वारा आकृष्ट होंगे। इस कार्य में तुझे साधारण जनों की जितनी सहानुभूति प्राप्त होगी उतनी अन्य किसी कार्य में प्राप्त नहीं हो सकती। यथार्थ सत्कार्य में मनुष्य को भगवान भी सहायक होते हैं। इसी तरह लोगों के आकृष्ट होने पर ही तू उनमें विद्या व ज्ञान प्राप्त करने की आकांक्षा को उद्दीप्त कर सकेगा। इसीलिए पहले अन्नदान ही आवश्यक है।</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, धर्मार्थ लंगरखाना खोलने के लिए पहले स्थान चाहिए; उसके बाद उसके लिए मकान आदि बनवाना पड़ेगा, फिर काम चलाने के लिए धन चाहिए; इतना रुपया कहाँ से आयगा?</p><p>स्वामीजी &#8211; मठ का दक्षिण भाग मैं अभी छोड़ देता हूँ और उस बेल के पेड़ के नीचे एक झोपड़ा खड़ा कर देता हूँ। तू एक या दो अन्धेलूले खोज कर ले आ और कल से ही उनकी सेवा में लग जा। स्वयं उनके लिए भिक्षा माँगकर ला। स्वयं पकाकर उन्हें खिला। इस प्रकार कुछ दिन करने से ही देखेगा &#8211; तेरे इस कार्य में सहायता करने के लिए कितने ही लोग अग्रसर होंगे, कितने ही लोग धन देंगे! ‘न हि कल्याणकृत् कश्चित् दुर्गतिं तात गच्छति।’</p><p>शिष्य &#8211; हाँ, ठीक है। परन्तु इस प्रकार लगातार कर्म करते करते समय पर <a
href="/swami-vivekananda-karma-yoga-hindi-free-download-pdf/">कर्म</a> बंधन भी तो आ सकता है?</p><p>स्वामीजी &#8211; कर्म के परिणाम के प्रति यदि तेरी दृष्टि न रहे और सभी प्रकार की कामना तथा वासनाओं के परे जाने के लिए यदि तुझमें एकान्त आग्रह रहे, तो वे सब सत्कार्य तेरे कर्मबन्धन काट डालने में ही सहायता करेंगे। ऐसे कर्म से कहीं बन्धन आयेगा? &#8211; यह तू कैसी बात कह रहा है? इस प्रकार से दूसरों के लिए किये हुए कर्म ही कर्मबन्धनों की जड़ को काटने के लिए एकमात्र उपाय हैं! ‘नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’।</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, अब तो मैं धर्मार्थ लंगर और सेवाश्रम के सम्बन्ध में आपके मनोभाव को विशेष रूप से सुनने के लिए और भी उत्कण्ठित हो रहा हूँ।</p><p>स्वामीजी &#8211; गरीब दुःखियों के लिए ऐसे छोटे छोटे कमरे बनवाने होंगे, जिसमें हवा आने-जाने की अच्छी व्यवस्था रहे। एक एक कमरे में दो या तीन व्यक्ति रहेंगे। उन्हें अच्छे बिछौने और साफ कपड़े देने होंगे। उनके लिए डाक्टर रहेंगे। सप्ताह में एक या दो बार सुविधानुसार वे उन्हें देख जायेंगे। धर्मार्थ लंगरखाने के भीतर सेवाश्रम एक विभाग की तरह रहेगा, इसमे रोगियों की सेवा-शुश्रूषा की जायगी। धीरे धीरे जैसे धन आता जायेगा, वैसे वैसे एक बड़ा रसोईघर बनाना होगा। लंगरखाने में केवल ‘दीयता भुज्यताम्’ &#8211; यही ध्वनि उठेगी। भात का पानी गंगाजी में पड़कर गंगाजी का जल सफेद हो जायगा। इस प्रकार धर्मार्थ लंगरखाना बना देखकर मेरे प्राणों को शान्ति मिलेगी।</p><p>शिष्य ने कहा, “आपकी जब इस प्रकार इच्छा है, तो सम्भव है समय पर वास्तव में ऐसा ही हो।” शिष्य की यह बात सुनकर स्वामीजी गंगाजी की ओर थोड़ी देर ताकते हुए मौन रहे। फिर प्रसन्न मुख से शिष्य से सस्नेह बोले &#8211; “तुममें से कब किसके भीतर से सिंह जाग उठेगा, यह कौन जानता है? तुममें से एक एक में यदि माँ शक्ति जगा दें तो पृथ्वी भर में वैसे कितने ही लंगरखाने बन जायेंगे। क्या जानता है &#8211; ज्ञान, भक्ति, शक्ति सभी जीवों में पूर्ण भाव से विद्यमान हैं पर उनके विकास की न्यूनाधिकता को ही केवल हम देखते हैं और इस कारण इसे बड़ा और उसे छोटा मानने लगते हैं। जीव के मन में मानो एक प्रकार का पर्दा बीच में पड़कर सम्पूर्ण विकास को रोक कर खड़ा है। वह हट जाने पर बस सब कुछ हो जायगा! उस समय जो चाहेगा, जो इच्छा करेगा वही होगा।”</p><p>स्वामीजी की बात सुनकर शिष्य सोचने लगा कि उसके स्वयं के मन के भीतर का वह पर्दा कब हटकर उसे ईश्वरदर्शन प्राप्त होगा!</p><p>स्वामीजी फिर कहने लगे &#8211; “यदि ईश्वर चाहेगा तो इस मठ को समन्वय का महान क्षेत्र बना डालना होगा। हमारे श्रीरामकृष्ण सर्व भावों की साक्षात् समन्वय-मूर्ति हैं। उस समन्वय के भाव को यहाँ पर जगाकर रखने से श्रीरामकृष्ण संसार में प्रतिष्ठित रहेंगे। सर्व मत, सर्व पन्थ, ब्राह्मण-चाण्डाल सभी लोग जिससे यहाँ पर आकर अपने अपने आदर्श को देख सके, यही करना होगा। उस दिन जब मठभूमि पर श्रीरामकृष्ण की प्राणप्रतिष्ठा की, उस समय ऐसा लगा मानो यहाँ से उनके भावों का विकास होकर चराचर विश्व भर में छा गया है। मैं तो जहाँ तक हो सके कर रहा हूँ और करूँगा &#8211; तुम लोग भी श्रीरामकृष्ण के उदार भाव लोगों को समझा दो; केवल <a
href="/vedanta-bharat-mein-vivekananda-3/">वेदान्त</a> पढ़ने से कोई लाभ न होगा। असल में प्रतिदिन के व्यावहारिक जीवन में शुद्धाद्वैत की सत्यता को प्रमाणित करना होगा। श्रीशंकर इस अद्वैतवाद को जंगलों और पहाड़ों में रख गये हैं; मैं अब उसे वहाँ से लाकर संसार और समाज में प्रचारित करने के लिए आया हूँ। घर घर में, घाट मैदान में, जंगल पहाड़ों में इस अद्वैतवाद का गम्भीर नाद उठाना होगा। तुम लोग सहायक बनकर काम में लग जाओ।”</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, ध्यान की सहायता से उस भाव का अनुभव करने में ही मानो अच्छा लगता है। उछलकूद करने की इच्छा नहीं होती।</p><p>स्वामीजी &#8211; यह तो नशा करके बेहोश पड़े रहने की तरह हुआ। केवल ऐसे कहकर क्या होगा? अद्वैतवाद की प्रेरणा से कभी ताण्डव नृत्य कर, तो कभी स्थिर होकर रह। अच्छी चीज पाने पर क्या उसे अकेले खाकर ही सुख होता है? दस आदमियों को देकर खाना चाहिए। आत्मानुभूति प्राप्त करके यदि तू मुक्त हो गया तो इससे दुनिया को क्या लाभ होगा? त्रिजगत् को मुक्त करना होगा। महामाया के राज्य में आग लगा देनी होगी; तभी नित्यसत्य में प्रतिष्ठित होगा। उस आनन्द की क्या कोई तुलना है? &#8211; निरवधिगगनाभम्’ &#8211; आकाशकल्प भूमानन्द में प्रतिष्ठित होगा, जीव जगत् में सर्वत्र तेरी अपनी सत्ता देखकर दंग रह जायगा! स्थावर और जंगम सभी तेरी अपनी सत्ता ज्ञात होंगे। उस समय सभी की आत्मौपम्य भाव से सेवा किये बिना तू रह नहीं सकेगा। ऐसी ही स्थिति को <a
href="/swami-vivekananda-vyavharik-vedant-hindi/">व्यावहारिक जीवन में वेदान्त</a> कहते हैं &#8211; समझा? वह ब्रह्म एक होकर भी व्यावहारिक रूप में अनेक रूपों में सामने विद्यमान है। नाम व रूप व्यवहार के मूल में मौजूद हैं। जिस प्रकार घड़े का नाम-रूप छोड़ देने से क्या देखता है &#8211; केवल मिट्टी, जो उसकी वास्तविक सत्ता है। इसी प्रकार भ्रम द्वारा घट, पट इत्यादि का भी तू विचार करता है तथा उन्हें देखता है। ज्ञान-प्रतिबन्धक यह जो अज्ञान है, जिसकी वास्तविक कोई सत्ता नहीं है, उसी को लेकर व्यवहार चल रहा है। स्त्री-पुत्र, देह-मन जो कुछ है &#8211; सभी नाम-रूप की सहायता से अज्ञान की सृष्टि में देखने में आते हैं &#8211; ज्यों ही अज्ञान हट जायगा त्यों ही ब्रह्मसत्ता की अनुभूति हो जायगी।</p><p>शिष्य &#8211; यह अज्ञान आया कहाँ से?</p><p>स्वामीजी &#8211; कहाँ से आया यह बाद में बताऊँगा। तू जब रस्सी को साँप मानकर भय से भागने लगा, तब क्या रस्सी साँप बन गयी थी? या तेरी अज्ञता ने ही तुझे उस प्रकार भगाया था?</p><p>शिष्य &#8211; अज्ञता ने ही वैसा किया था।</p><p>स्वामीजी &#8211; तो फिर सोचकर देख &#8211; तू जब फिर रस्सी को रस्सी जान सकेगा, उस समय अपनी पहलेवाली अज्ञता का चिन्तन कर तुझे हँसी आयगी या नहीं? उस समय नाम-रूप मिथ्या जान पड़ेंगे या नहीं?</p><p>शिष्य &#8211; जी हाँ।</p><p>स्वामीजी &#8211; यदि ऐसा है, तो नाम-रूप मिथ्या हुए या नहीं? इसी प्रकार ब्रह्मसत्ता ही एकमात्र सत्य बन गयी। इस अनन्त सृष्टि की विचित्रताओं से भी उनके स्वरूप में जरा भी परिवर्तन नहीं हुआ, केवल तू इस अज्ञान के धीमे अन्धकार में यह स्त्री, यह पुत्र, यह अपना, यह पराया, ऐसा मानता हुआ इस सर्वविभासक आत्मा की सत्ता को समझ नहीं सकता! जिस समय गुरु के उपदेश और अपने विश्वास के द्वारा इस नामरूपात्मक जगत् को न देखकर इसकी मूल सत्ता का ही अनुभव करेगा, उस समय आब्रह्मस्तम्ब तक सभी पदार्तों में तेरी आत्मानुभूति होगी। उसी समय ‘भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः’ की स्थिति होगी।</p><p>शिष्य &#8211; महाराज, इस अज्ञान के आदि-अन्त की बातें जानने की मेरी इच्छा है।</p><p>स्वामीजी &#8211; जो चीज बाद में नहीं रहती है वह चीज झूठी है, यह तो समझ गया? जिसने वास्तव में ब्रह्म को जान लिया है, वह कहेगा, ‘अज्ञान फिर कहाँ है?’ वह रस्सी को रस्सी ही देखता है &#8211; साँप नहीं। जो लोग रस्सी को साँप के रूप में देखते हैं, उन्हें भयभीत देखकर उसे हँसी आती है! इसलिए अज्ञान का वास्तव में कोई स्वरूप नहीं है। अज्ञान को ‘सत्’ भी नहीं कहा जा सकता, ‘असत्’ भी नहीं कहा जा सकता। ‘संन्नाप्यसन्नाप्युभयात्मिका नो।’ जो चीज इस प्रकार असत्य ज्ञात हो रही है उसके सम्बन्ध में क्या प्रश्न है और क्या उत्तर है? उस विषय में प्रश्न करना उचित भी नहीं हो सकता। क्यों, यही सुन &#8211; यह प्रश्नोत्तर भी तो उसी नाम-रूप या देश-काल की भावना से किया जा रहा है। ब्रह्मवस्तु नामरूप, देश-काल से परे है, उसे प्रश्नोत्तर द्वारा कैसे समझा जा सकता है? इसीलिए शास्त्र, मन्त्र आदि व्यावहारिक रूप से सत्य हैं &#8211; पारमार्थिक रूप से नहीं। अज्ञान का स्वरूप ही नहीं है, उसे फिर क्या समझेगा? जब ब्रह्म का प्रकाश होगा उस समय फिर इस प्रकार का प्रश्न करने का अवसर ही न रहेगा। श्रीरामकृष्ण की ‘मोची-मुटिया’ वाली कहानी<sup>1</sup> सुनी है न? &#8211; बस, ठीक वही! अज्ञान को ज्यों ही पहचाना जाता है, त्यों ही वह भाग जाता है।</p><p>शिष्य &#8211; परन्तु महाराज, यह अज्ञान आया कहाँ से?</p><p>स्वामीजी &#8211; जो चीज है ही नहीं, वह फिर आयगी कैसे? हो तब तो आयगी?</p><p>शिष्य &#8211; तो फिर इस जीव जगत् की उत्पत्ति क्योंकर हुई?</p><p>स्वामीजी &#8211; एक ब्रह्मसत्ता ही तो मौजूद है! तू मिथ्या नाम-रूप देकर उसे नाना रूपों और नामों में देख रहा है।</p><p>शिष्य &#8211; यह मिथ्या नाम-रूप भी क्यों और वह कहाँ से आया?</p><p>स्वामीजी &#8211; शास्त्रों में इस नामरूपात्मक संस्कार या अज्ञता को प्रवाह के रूप में नित्यप्राय कहा गया है! परन्तु उसका अन्त है। और ब्रह्मसत्ता तो सदा रस्सी की तरह अपने स्वरूप में ही वर्तमान है। इसीलिए वेदान्त शास्त्र का सिद्धान्त है कि यह निखिल ब्रह्माण्ड ब्रह्म में अध्यस्त, इन्द्रजालवत् प्रतीत हो रहा है। इससे ब्रह्म के स्वरूप में किंचित् भी परिवर्तन नहीं हुआ। समझा?</p><p>शिष्य &#8211; एक बात अभी भी नहीं समझ सका।</p><p>स्वामीजी &#8211; वह क्या?</p><p>शिष्य &#8211; यह जो आपने कहा कि यह सृष्टि-स्थिति-लय आदि ब्रह्म में अध्यस्त हैं उनकी कोई स्वरूप-सत्ता नहीं है &#8211; यह कैसे हो सकता है? जिसने जिस चीज को पहले कभी नहीं देखा, उस चीज का भ्रम उसे हो ही नहीं सकता। जिसने कभी साँप नहीं देखा, उसे रस्सी में सर्प का भ्रम नहीं होता। इसी प्रकार जिसने इस सृष्टि को नहीं देखा, उसका ब्रह्म में सृष्टि का भ्रम क्यों होगा? अतः सृष्टि थी या है, इसीलिए सृष्टि का भ्रम हो रहा है; इसीसे द्वैत की आपत्ति उठ रही है।</p><p>स्वामीजी &#8211; ब्रह्मज्ञ व्यक्ति तेरे प्रश्न का इस रूप में पहले ही प्रत्याख्यान करेंगे कि उनकी दृष्टि में सृष्टि आदि बिलकुल दिखायी नहीं दे रही है। वे एकमात्र ब्रह्मसत्ता को ही देख रहे हैं। रस्सी ही देख रहे हैं; साँप नहीं देख रहे है। यदि तू कहेगा, ‘मैं तो यह सृष्टि या साँप देख रहा हूँ’ &#8211; तो तेरी दृष्टि के दोष को दूर करने के लिए वे तुझे रस्सी का स्वरूप समझा देने की चेष्टा करेंगे। जब उनके उपदेश और अपनी स्वयं की विचारशक्ति इन दोनों के बल पर तू रज्जुसत्ता या ब्रह्मसत्ता को समझ सकेगा, उस समय यह भ्रमात्मक सर्प-ज्ञान या सृष्टि-ज्ञान नष्ट हो जायगा। उस समय इस सृष्टिस्थिति-प्रलय रूपी भ्रमात्मक ज्ञान को ब्रह्म में आरोपित कहने के अतिरिक्त और तू क्या कह सकता है? अनादि प्रवाह के रूप में सृष्टि की यह प्रतीति यदि चली आयी है तो आती रहे, उसके निर्णय में लाभ-हानि कुछ भी नहीं है। ‘करामलक’ की तरह ब्रह्मतत्त्व का प्रत्यक्ष न होने पर इस प्रश्न की पूरी मीमांसा नहीं हो सकती; और इस समय फिर प्रश्न भी नहीं उठता, उत्तर की भी आवश्यकता नहीं होती! ब्रह्मतत्त्व का आस्वाद उस समय ‘मूकास्वादन’ की तरह होता है।</p><p>शिष्य &#8211; तो फिर इतना विचार करके क्या होगा?</p><p>स्वामीजी &#8211; उस विषय को समझने के लिए विचार है। परन्तु सत्य वस्तु विचार से परे है &#8211; ‘नैषा तर्केण मतिरापनेया।’</p><p>इस प्रकार वार्तालाप होते होते शिष्य स्वामीजी के साथ मठ में आकर उपस्थित हुआ। मठ में आकर स्वामीजी ने मठ के संन्यासी तथा ब्रह्मचारियों को आज के ब्रह्मविचार का संक्षिप्त सार समझा दिया और उठते उठते शिष्य से कहने लगे, ‘नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः’।</p><hr
class="wp-block-separator has-css-opacity"/><ol><li>एक पण्डितजी किसी गाँव को जा रहे थे। उन्हें कोई नौकर नहीं मिला, इसलिए उन्होंने रास्ते के एक चमार को ही अपने साथ ले लिया और उसे सिखा दिया कि वह अपनी जातपाँत गुप्त रखे और किसी से कुछ भी न बोले। गाँव पहुँचकर एक दिन पण्डितजी अपने नित्यक्रम के अनुसार सन्ध्यावन्दन कर रहे थे और वह नौकर भी उनके पास बैठा था। इतने में ही वहाँ एक दूसरे पण्डितजी आये। वह अपने जूते कहीं छोड़ आये थे और उन्होंने इस नौकर को हुक्म दिया, ‘अरे जा, वहाँ से मेरे जूते तो ले आ।’ पर नौकर नहीं उठा और न कुछ बोला ही। पण्डितजी ने फिर कहा, पर वह फिर भी नहीं उठा। इस पर उन्हें बड़ा क्रोध आया और उन्होंने उसे डाँटकर कहा, ‘तू बड़ा चमार है, कहने से भी नहीं उठता।’ अब तो नौकर बड़ा घबड़ाया, क्योंकि वह सचमुच चमार था। वह सोचने लगा, ‘अरे मेरी जात तो शायद इन्होंने जान ली।’ बस वह भागा, और ऐसा भागा कि उसका पता ही न चला। ठीक इसी प्रकार जब माया पहचान ली जाती है तो वह भी भाग जाती है, एक क्षण भी नहीं टिकती।</li></ol><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/talks-with-swami-vivekananda-hindi-22/">श्रीरामकृष्ण मठ को अद्वितीय धर्मक्षेत्र बना लेने की स्वामी विवेकानंद की इच्छा</a> appeared first on <a
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