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><channel><title>स्वास्थ्य Archives - हिंदी पथ</title> <atom:link href="https://hindipath.com/category/health-fitness/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" /><link>https://hindipath.com/category/health-fitness/</link> <description>हिंदी का संसार</description> <lastBuildDate>Wed, 22 Nov 2023 11:51:47 +0000</lastBuildDate> <language>en-US</language> <sy:updatePeriod> hourly </sy:updatePeriod> <sy:updateFrequency> 1 </sy:updateFrequency> <generator>https://wordpress.org/?v=6.3.8</generator><image> <url>https://hindipath.com/wp-content/uploads/2019/09/HindiPath-Site-Icon-New.png</url><title>स्वास्थ्य Archives - हिंदी पथ</title><link>https://hindipath.com/category/health-fitness/</link> <width>32</width> <height>32</height> </image> <item><title>शहद के फायदे – Shahad Khane ke Fayde</title><link>https://hindipath.com/shahad-khane-ke-fayde-in-hindi/</link> <comments>https://hindipath.com/shahad-khane-ke-fayde-in-hindi/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Wed, 22 Nov 2023 11:51:45 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वास्थ्य]]></category> <category><![CDATA[Honey]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=27222</guid><description><![CDATA[<p>शहद के फायदे (Honey Benefits) अनेक हैं। यह एक स्वादिष्ट और पौष्टिक खाद्य पदार्थ है जो कई स्वास्थ्य लाभ प्रदान</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/shahad-khane-ke-fayde-in-hindi/">शहद के फायदे – Shahad Khane ke Fayde</a> appeared first on <a
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href="/category/health-fitness/">स्वास्थ्य</a> लाभ प्रदान करता है। यह प्राकृतिक रूप से मीठा होता है और इसमें एंटीऑक्सिडेंट, एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-माइक्रोबियल गुण होते हैं। आज हम आपको बताएंगे की शहद खाने के फायदे (Honey Khane Ke Fayde) जिसमें शामिल हैं:</p><h2 class="wp-block-heading">शहद खाने के फायदे &#8211; Shahad ke Fayde</h2><ul><li>ढाई तोला शहद को 10 तोला जल में मिलाकर नित्य प्रति पीने से मोटापा दूर होकर रक्त शुद्ध व साफ हो जाता है।&nbsp;</li><li>&nbsp;मधु को नित्य रात्रि को आँख में डालने से नेत्रज्योति बढ़ती है। 1 तोला शहद और 2 तोला मवखन (ताजा) को मिलाकर खाने से शरीर पुष्ट होता है और धातुक्षय नष्ट होता है।</li><li>असली शहद वृश्चिक दंश पर लगाकर मलना अत्यन्त उपयोगी है।</li><li>सर्पदंश को छोड़कर प्रत्येक प्रकार का कीटदंश की पीड़ा शहद लगाने से मिट जाती है। हैं न कमाल के शहद के फायदे!</li><li>घाव पर शहद का फाया लगाते रहने से घाव ही शीघ्र भर जाता है।</li><li>शहद को बार-बार चाटते रहने से खाँसी का वेग कम हो जाता है।</li><li>शहद को पानी में घोलकर कान में टपकाने से कर्णनाद बन्द हो जाता है।</li><li>टूटी हुई हड्डी को तत्काल जोड़कर शहद से तर किया हुआ कपड़ा हड्डी पर लपेटना का प्रथम उपचार हेतु अतिशय उपयोगी है।</li><li>2-2 या 3-3 चम्मच शहद दिन भर में 3-4 बार प्रतिदिन खाते रहने से लम्बी आयु होती है। बुढ़ापों में भी जवानी का आनन्द लिया जा सकता है।&nbsp;</li><li>2-3 चम्मच शहद प्रतिदिन दिन में 3-4 बार सेवन करते रहने से हार्टफेल होने का भय दूर हो जाता है।</li><li>मधु का नियमित सेवन करने से नामर्द भी मर्द बन जाता है। शहद में दूध से 6 गुना अधिक शक्ति होती है और इसमें 1 मुर्गी के अण्डे के बराबर शक्ति होती है।</li><li>सर्दी की ऋतु में 1 पाव दूध में 1 मुर्गी के अण्डे की जर्दी और शहद मिलाकर कम से कम 21 या 40 दिन नियमित सेवन करने से शरीर हष्ट-पुष्ट मजबूत हो जाता है।</li><li>शहद को सेवन करते रहने से श्वासा-साधनाशक्ति बढ़ जाती है।</li><li>शहद प्रतिदिन सेवन करने से आमाशय व आन्त्र के व्रण ठीक होते हैं।&nbsp;</li><li>शहद सेवन करने से न्यूमोक्स सैप्टिक, व्रण, एमीबा, टाइकोसस इत्यादि बीमारी उत्पन्न करने वाले कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। पुराने घाव और कैन्सर भी मधु खाने और लगाने से ठीक हो जाते हैं</li><li>अग्न्दिग्ध स्थान पर शहद की पट्टी रखने से दर्द और जलन तुरन्त शान्त हो जाती है एवं व्रण भी ठीक हो जाता है।</li><li>छोटे बच्चों को शहद जनरल टानिक के स्थान पर सेवन करवाकर उन्हें हष्ट-पुष्ट और निरोग रखा जा सकता है।</li><li>12 वर्ष तक आयु के बच्चों को सोते समय 1-2 चम्मच शहद निरन्तर सेवन करवाते रहने से उनका बिस्तर पर मूतना बन्द हो जाता है।</li><li>खिलाड़ियों को नित्य शहद सेवन करने से थकावट नहीं आती है।</li><li>जब-जब सुरापान की इच्छा हो, तब-तब (2-4 चम्मच शहद) पीने से शराब पीने की लत छूट जाती है।</li><li>पक्षाघात, लकवा, ऐंठन और स्नायुरोग 2-4 चम्मच दिन में 2-4 बार सेवन करते रहने से ठीक हो जाते हैं। शहद कैल्शियम की मात्रा की पूर्ति करता है</li><li>टायफाइड ज्वर की कमजोरी में मधु सेवन अंग्रेजी टॉनिक जैसा काम करता है।</li><li>जोड़ों के दर्द और शोथ में मधु सेवन करते रहने से पोटाशियम की पूर्ति होकर रोग शान्त हो जाता है।</li><li>1-2 चम्मच शहद प्रतिदिन 1-2 बार निरन्तर 1-2 सप्ताह तक सेवन करते रहने से ही आँखें बार-बार झपकाने का रोग ठीक हो जाता 1-2 चम्मच शहद दिन में 3-4 बार खाने से आधासीसी का दर्द ठीक हो जाता है।</li><li>2-3 चम्मच शहद दिन में 1-2 बार तथा रात्रि को सोते समय सेवन करने से अनिद्रा रोग दूर होकर गाढ़ा (गहरी) निद्रा आने लगती है।</li><li>एक पक नीबू को 10 मिनट पानी में उबालकर तदुपरान्त इसका रस निकालकर इसमें दो चम्मच ग्लैसरीन और 4 औंस शहद मिलाकर रखलें। इसे 1-2 चम्मच की मात्रा में दिन में 3-4 बार चाटने से प्रत्येक प्रकार की खांसी नष्ट हो जाती है।</li><li>शरीर में झटके लगना, दांतों और अस्थियों के रोग, निर्बलता, सुस्ती, थकावट, चिन्ता, वजन गिर जाना (कमज़ोरी होना), गले के रोग, साहस की कमी, कुरूपता, कैन्सर, जल्द बुढ़ापा आ जाना, क्षय रोग और मधुमेह इत्यादि में मधु सेवन अमृत की भांति लाभ प्रदान करता है।</li><li>जिस प्रकार अंग्रेजी (ऐलोपैथी) चिकित्सा में विटामिन बी काम्पलैक्स और विटामिन सी की गोलियाँ पेयो या इन्जेक्शनों को महत्वपूर्ण माना जाता है, उसी प्रकार आयुर्वेद मनीषियों ने सदियों पूर्व से ही शहद को महत्व प्रदान किया है।</li><li>मधु में सर्वाधिक मात्रा में ग्लूकोज है जो तुरन्त ही शक्ति प्रदान करता है।</li><li>मोटापे में 1 गिलास ताजा पानी में आधा नीबू निचोड़कर चम्मच शहद मिलाकर सुबह-शाम पीने से लाभ होता है।</li><li>1 गिलास पानी में 6 रत्ती (पान में खाने वाला) चूना और तीन चम्मच शहद मिलाकर सुबह-शाम पीने से मोटापा कम हो जाता है। चर्बी, रक्त व अन्य धातुऐं शुद्ध हो जाती हैंतीन मास तक निरन्तर सेवन करें।</li><li>पित्त तथा रक्त विकार में शहद को दूध में मिलाकर सेवन करें।</li><li>आधासीसी के दर्द में सिर दर्द के विपरीत ओर की नासिका में शहद 1- 2 बूँद डालने से आराम मिलता है।</li><li>प्रतिश्याय में आधा नीबू का रस और 2-3 चम्मच शहद दिन में 2-3 बार सेवन करने से लाभ होता है अथवा 1 चम्मच अदरक को शहद के साथ सेवन करना भी लाभकारी है।</li><li>मुखपाक में मधु को मुख में धारण करने पर मुखपाक में लाभ होता है अथवा मधु को शुद्ध सुहागे में मिलाकर मुख के अन्दर घावों पर लगाना अत्यन्त गुणकारी है। इससे घाव शीघ्र ठीक हो जाते हैं।</li><li>कृमिदन्त में दाँत में दर्द होने पर दर्द वाले स्थान में रुई के फाहे में मधु को रखने से दाँत का दर्द मिट जाता है।</li><li>मधु को प्रतिदिन मंजन की भाँति मलने से दाँत साफ हो जाते हैं। मसूढ़े • मजबूत हो जाते हैं। मुख के अन्दर के घाव में भी आराम हो जाता है।</li><li>बच्चों के दाँत निकलने के समय मधु और शुद्ध फिटकरी को मिलाकर मसूढ़ों पर मलने से दाँत बगैर कष्ट के सरलता से निकल आते हैं।</li><li>दाँतों के हिलने पर शुद्ध फिटकरी, शहद और सिरका को सम मात्रा में मिलाकर सुबह-शाम दाँतों पर मलने से दाँतों का हिलना बन्द हो जाता है।</li><li>सोने के वर्क मधु के साथ सेवन करने से नेत्रज्योति बढ़ती है।</li><li>प्याज का रस और शहद सममात्रा में लेकर प्रतिदिन 2-3 बार आँखों में डालने से मोतिया बिन्दु में आराम पहुँचता है।</li><li>2-2 बूंद शहद दुखती आँखों में डालने से आँखें ठीक हो जाती हैं।</li><li>कलमी शोरा 1 भाग एवं शुद्ध मधु 3 भाग लेकर गरम जल में घोलकर कान में टपकाने से कर्णनाद (कान का बजना) दूर हो जाता है।</li><li>कान को साफ करके शहद डालने से कर्ण स्राव (मवाद बहना) और दर्द ठीक हो जाता है।</li><li>तुलसी के पत्तों का स्वरस और मधु सममात्रा में मिलाकर पीने से खांसी और प्रतिश्याय में लाभ होता है।</li><li>काली मिर्च, सौंठ, पीपल के चूर्ण को मधु के साथ सेवन करने से कफ जनित मल निकलकर श्वास कष्ट (श्वास रोग) में लाभ होता है।</li><li>उरःक्षत — मधु का आरम्भ से ही प्रयोग करने से यह उर में होने वाले क्षत को भरता है तथा रोग के उपसर्ग, ज्वर और कास में भी लाभ होता है।</li><li>शहद के फायदे गिलोय के साथ और भी बढ़ जाते हैं। गिलोय के क्वाथ में सममात्रा में शहद सेवन करने से वमन रुक जाती है।</li><li>मोरपंख के चन्दे की भस्म बनाकर शहद के साथ चाटने से हिचकियाँ रुक जाती हैं।</li><li>भोजनोपरान्त 1-2 तोला शहद चाट लेने से भोजन शीघ्र पचता है तथा पाचन शक्ति में वृद्धि भी होती है</li><li>पिसी हुई पीपल 6 माशा 2 तोला शहद के साथ सेवन करने से पेट दर्द दूर हो जाता है।</li><li>मधु को जल के साथ दिन में 2-3 बार पीने से तृष्णा शान्त हो जाती है। • मधु को आधा या सममात्रा एरन्ड तैल में मिलाकर बच्चों अजीर्ण रोग व मरोड़ दूर होती है पिलाने से गरम दूध के साथ 2 चम्मच शहद को पीने से मलावरोध रोग दूर हो जाता है।</li><li>लम्बे समय तक निरन्तर जल और मधु का सेवन करते रहना जलोदर रोग में उपयोगी है।</li><li>गाय के दूध में मधु मिलाकर सेवन करने से यकृत की निर्बलता मिटती है।</li><li>सुहागे को मधु मधु के साथ मिलाकर दिन में 2-3 बार चाट लेने से मूत्र की रुकावट दूर हो जाती है और अश्मरी गलकर बाहर निकल आती है।&nbsp;</li><li>शीतलचीनी के साथ मधु का शर्बत पीने से पेशाब की रुकावट दूर होकर मूत्र खुलकर आता है अथवा रुई की बत्ती को मधु में भिगोकर मूत्रमार्ग में रखने से मूत्र की रुकावट दूर हो जाती है।</li><li>शिलाजीत के साथ मधु सेवन करना मधुमेह रोग में परम लाभकारी है।</li><li>कुष्ठ रोग में बकरी के दूध के साथ 1 से 2 तोला तक मधु सेवन करें। नमक का सेवन बन्द करके क्रमशः दूध और मधु की मात्रा बढ़ाते जाऐं इस प्रकार के उपचार से रोग नष्ट होकर रोगी पूर्ण स्वस्थ हो जाता है।</li><li>दाद और झाइयों में शहद लगाना अतीव गुणकारी है।&nbsp;</li><li>गेहूँ के आटे के साथ शहद गूंथकर सूजन पर लगाने से सूजन दूर हो जाती है तथा फोड़े पर लगाने से फोड़ा पक जाता है।</li><li>सिरका और नमक के साथ शहद मिलाकर लगाने से शरीर के दाग-धब्बे दूर हो जाते हैं।</li><li>मधु को गरम पानी के साथ (प्रारम्भ में 1 तोला) सेवन करने से तदुपरान्त शहद की मात्रा बढ़ाते जाने से मोटापा दूर हो जाता है।</li><li>तिलों को पीसकर मधु में मिलाकर मरहम बनाकर घावों पर लगाने से घाव अति शीघ्र भर जाते हैं।</li><li>विष सेवन किये रोगी को मधु पिलाकर वमन द्वारा विष से मुक्त कर लिया जाता है। जब तक आमाशय में विष का प्रभाव अवशेष रहेगा तब तक निरन्तर वमन होकर विष निकलता रहेगा।</li><li>सफेद प्याज का रस और मधु मिलाकर सेवन करने से वीर्य की अधिक उत्पत्ति होती है और बाजीकरण शक्ति बढ़ती है अथवा भैंस के दूध में दो बड़े चम्मच मधु भली प्रकार मिलाकर पीने से शारीरिक बल और शक्ति में वृद्धि होती है।</li><li>मधु स्त्री के गुप्त रोगों के लिए अत्यन्त उपयोगी औषधि है। इसके सेवन से गर्भाशय मूत्र और आर्तव सम्बन्धी रोग नष्ट हो जाते हैं।</li><li>भैंस के मक्खन में शहद मिलाकर मसूढ़ों पर मलने से बच्चों के दाँत सरलता से निकलते हैं।</li><li>बच्चों को मधु चटाने से उनका गला साफ रहता है और अजीर्ण और ऐंठन दूर हो जाती है।</li></ul><p>-भाव प्रकाश निघन्ट में शहद आठ प्रकार का बतलाया गया है। जिसका यहाँ उल्लेख&nbsp;</p><p><strong>नोट- विस्तारमय से नहीं कर रहे हैं फिर भी शुद्ध शहद की पहचान की जानकारी हम अपने पाठकों को देना हम अपना कर्तव्य समझते हैं-1. मक्खी को पकड़कर जोर से शहद में डालें प्रबुद्धतो वह डब जाती है किन्तु फिर निकलकर वह साफ उड़ जाती है शहद में लिपटती नहीं है। 2. कुत्ता शुद्ध शहद को कभी चाटता नहीं है। 3. शहद आंखों में आंजने पर चिपकता नहीं है। 4. शहद जलाने पर जलने लगता है। 5. शुद्ध शहद ठण्डक में जमता नहीं है।&nbsp;</strong></p><p>यदि गुड़ की चासनी शुद्ध शहद में मिली होगी (शहद में मिलावट होना) तो ऊपर शुद्ध शहर रहता है और नीचे चासनी रहती है। प्रायः बेईमान शहद व्यवसायी शहद में गुड़ की चासनी (बख्खर) की मिलावट कर देते हैं। नीम और जामुन के पेड़ पर लगे हुए छत्ते का शहद औषधि में गुणवत्ता में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।&nbsp;</p><p><strong>मधु की सेवन मात्रा &#8211;</strong> पुरुषों में (व्यस्कों में) 1 से 2 तोला तक तथा बच्चों को और निर्बल स्त्री-पुरुषों को दिन भर में 4-6 माशा तक का विधान है। शुद्ध जाता है 1 शहद रूई में भिगोकर आग लगाये जाने पर सम्पूर्ण जल जाता है जबकि कृत्रिम (मिलावट) मधु होने पर उसका कोयला शेष रह जाता है।</p><p>हमें आशा है कि शहद के फायदे जानकर आप इसे उपयोग में लाएंगे और स्वास्थ्यलाभ करेंगे। यदि इनके अतिरिक्त आप और भी शहद के फायदे जानते हों या इन सुझावों को लेकर कुछ विचार व्यक्त करना चाहते हों, तो कृपया टिप्पणी करके हमें ज़रूर बताएँ।</p><h2 class="wp-block-heading">यह भी पढ़ें</h2><p>● <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=26951</guid><description><![CDATA[<p>हींग के फायदे (Hing Ke Fayde) अनेक हैं। वैसे तो हींग एक मसााला है जो भारतीय व्यंजनों में आमतौर पर</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/hing-ke-fayde-in-hindi/">हींग के फायदे – Hing Ke Fayde</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>हींग के फायदे (Hing Ke Fayde) अनेक हैं। वैसे तो हींग एक मसााला है जो भारतीय व्यंजनों में आमतौर पर इस्तेमाल किया जाता है। यह अपने तीखे स्वाद और सुगंध के लिए जाना जाता है। हींग के कई <a
href="/category/health-fitness/">स्वास्थ्य</a> लाभ भी हैं।</p><h2 class="wp-block-heading">हींग के फायदे जानें &#8211; Benefits of Hing In Hindi</h2><ul><li>कीड़ा खाये खोखले दांत दर्द में हींग भरने से तुरन्त लाभ होता है।</li><li>दाँत या दाढ़ के खोखले भाग में अफीम और नौसादर 1-1 मि.ग्रा. को आपस में खूब मिलाकर गोली बनाकर छिद्र में रखकर दबालें। इस प्रयोग से खोखला छेद भर जाएगा, जीवन भर को आराम हो जाएगा ।</li><li>हींग को गरम करके दाढ़ के नीचे दबा लेने से कृमि (कीड़ा) के कारण होने वाला दर्द शीघ्र ही शान्त हो जाता है।&nbsp;</li></ul><p><strong>पेचिश में &#8211;</strong> थोड़ी सी हींग दही में लपेटकर प्रयोग करें।</p><ul><li><a
href="/hastmaithun-karne-se-nuksan-in-hindi/">हस्तमैथुन</a> क्रिया आदि करने के कारण लिंग में विकार आ जाने पर रात्रि को सोते समय तीन ग्राम हींग को पानी में पीसकर लिंग पर 15-20 दिनों तक लेप करते रहने से तथा प्रात:काल को गरम पानी से लिंग धो डालने से अत्यन्त लाभ होता है। हानिरहित अमूल्य योग है।</li><li>हींग को पानी में पीसकर घुटनों पर लेप करने से घुटनों का दर्द रफू चक्कर हो जाता है। घुटनों का दर्द भगाने में भी हींग के फायदे बड़े हैं।</li><li>हींग को गरम पानी में घोलकर नाभि के आस-पास लेपकर तथा थोड़ी सी हींग भूनकर शहद के साथ चाट लेने से डकारें आना बन्द हो जाती हैं तथा भूख बढ़ जाती है।</li><li>दाँत दर्द में गरम पानी में हींग घोलकर कुल्ला करना उपयोगी है।&nbsp;</li><li>आक के दूध में हींग को घिसकर लेप करें। बिच्छू का विष नष्ट होगा।</li><li>&nbsp;हींग का चूर्ण 4 माशा 20 तोला दही में मिलाकर प्रात:काल पीने से तथा दोपहर में दही-भात खाने से (यह क्रिया तीन दिन करें) नारू रोग इस प्रयोग से जड़ से नष्ट हो जाता है।</li><li>यदि अफीम खाये अधिक समय न हुआ हो तो पहले राई या रीठे का जल पिलाकर वमन कराये और यदि अधिक समय हो गया हो तो हींग को मट्ठे में मिलाकर पिलायें। शर्तिया इलाज है।</li><li>घाव में कीड़े पड़ जाने और अत्यधिक दुर्गन्ध उत्पन्न हो जाने पर नीम के ताजे पत्ते दो तोला और हींग 1 माशा मिलाकर घी के साथ पीसकर पुल्टिस बनाकर घाव पर बांधने से कृमि भर जाते हैं तथा घाव शुद्ध हो जाता है।</li><li>अपतन्त्रक (हिस्टीरिया) रोग में कच्ची हींग और एलुआ समभाग मिलाकर जल के साथ खरलकर 2-2 रत्ती की गोलियाँ बनाकर सुरक्षित रखलें। 1-1 गोली दिन में 2-3 बार सेवन करते रहने से थोड़े ही दिनों में हिस्टीरिया रोग पीछा छोड़ देता है।</li><li>अतिसार होने पर हींग, कालीमिर्च, कपूर 4-4 तोला और अफीम 1 तोरला मिलाकर अदरक के रस में 6 घंटे तक खरल करके 1-1 रत्ती की गोलियां बनाकर सुरक्षित रखलें । मात्रा 1 से 2 गोली तक दिन में तीन बार प्रयोग करायें।</li><li>यदि मलेरिया ज्वर पीछा नहीं छोड़ रहा हो तो ज्वर आने से दो घंटा पहले 4 आना भर शुद्ध हींग 1 तोला लेकर जल में खौलाकर गाढ़ा (गरम करके) हाथ- पैर के सभी नाखूनों पर लेप चढ़ा दें। तीन दिन बाद यह क्रिया करने से मलेरिया ज्वर भाग जाता है। हैं न हींग के फायदे कमाल के!</li><li>पित्ती उछलने पर हींग को घी में मिलाकर मालिश करना अत्यन्त उपयोगी है।</li><li>हींग को पानी में घोलकर एनिमा करने से उदरकृमि निकल जाते हैं</li><li>भुनी हुई हीरा हींग 1 ग्राम, नीम की छाया शुष्क अथवा ताजी पत्तियाँ 15 ग्राम, भुना जीरा और कपूर 1-1 ग्राम को पानी के साथ खूब बारीक घोट लें तदुपरान्त चने के आकार की गोलियाँ बनालें रात्रि को सोते समय 1 से 4 गोलियाँ तक सेवन करने से पेट के रोग दूर होकर अर्श (बबासीर) का रोग नष्ट हो जाता है।</li><li>अफीम और हीरा हींग 5-5 ग्राम लेकर 50 ग्राम तिल के तैल में खूब पीसकर मिलालें इस तैल को शौच क्रिया करने से पूर्व तथा रात्रि को सोते समय बवासीर के मस्सों पर लगाते रहने से मस्से गिर जाते हैं।</li><li>100 ग्राम जैतून का तैल (आलिव आयल) में 10 ग्राम हींग उबालकर सुरक्षित रखलें । इस तैल को ड्रापर द्वारा कान में टपकाने से कान के समस्त प्रकार के रोगों में लाभ होता है।</li><li>फोड़े-फुन्सी होने पर 500 ग्राम सरसों का तैल लेकर खूब गरम कर लें। तदुपरान्त इसमें हीरा हींग 1 ग्राम, नमक 20 ग्राम, कार्बोलिक एसिड 20 ग्राम डालकर ठण्डा होने पर किसी साफ (डाटयुक्त बोतल में भरकर सुरक्षित रखलें। इस तैल को फोड़े-फुन्सियों पर दिन में कई बार लगाने से शीघ्र ही आराम हो जाता है) ।</li><li>सिर दर्द में हीरा हींग पीसकर लेप करना उपयोगी है। हीरा हींग की 1 छोटी सी डली जल में घिसकर नाक के द्वारा सूंघने से आधासीसी रोग में आराम हो जाता है ।</li><li>डिब्बा रोग बच्चों को डिब्बा रोग होने पर (पसली चलने पर) आधा रत्ती &#8211; हींग पानी में घोलकर देने से शीघ्र ही लाभ होता है ।</li><li>तिजारी व चौथिया ज्वर में हींग को पुराने घी में मिलाकर नस्य देने से ज्वर रुक जाता है ।</li></ul><p><strong>वत्सनाभ का विष &#8211;</strong> हींग आधा ग्राम को 100 ग्राम गोघृत में मिलाकर बार-बार पिलाने से वत्सनाभ का विष उतर जाता है।</p><ul><li>हींग को स्त्री के दूध में मिलाकर थोड़ा सा गरम करके बिच्छू दंश के स्थान पर लगा देने से बिच्छू का विष उतर जाता है।</li></ul><p><strong>नोट-बिच्छू दंशित व्यक्ति को गरम-गरम दुग्धपान कराना अतीव गुणकारी है।</strong></p><ul><li>हींग 245 मि.ग्रा. और छोटी इलायची का चूर्ण आधा ग्राम को 1-1 घंटे पर जल के साथ 3-4 बार सेवन करने से पेशाब साफ और खुलकर आ जाता है।</li><li>हिस्टीरिया के दौरा से बेहोश होने पर हींग को पानी में घोलकर नस्य देने से होश आ जाता है ।</li><li>मक्कल शूल (प्रसवोपरान्त जच्चा का अशुद्ध रक्त गिरना बन्द होना तथा पेट फूलने के कारण उदर और गर्भाशय प्रदेश में दर्द होना) हींग को पानी में मिलाकर थोड़ा गरम करके नाभि प्रदेश पर लेप करें तथा आधा ग्राम शुद्ध हींग को 25 ग्राम घी के साथ सेवन करायें । उपयोगी योग है ।</li><li>उदर शूल (पेट दर्द में) पेट में गैस भर गई हो, पाखाना नहीं हुआ हो, पेट में असहनीय पीड़ा हो तो हींग को पानी में घोटकर थोड़ा सा गरम करके नाभि प्रदेश पर लेप करें तथा हींग को घी में भूनकर ( 245 मि.ग्रा.) सेवन कराने से दर्द शान्त हो जाता है मलत्याग होकर अपानवायु छूट जाता है अथवा 6 ग्राम हींग पानी में घोलकर गुदा मार्ग द्वारा पिचकारी देने से दर्द शान्त हो जाता है। अथवा घोड़े की लीद का रस 12 ग्राम में आधा ग्राम शुद्ध हींग मिलाकर 2-3 बार देने से उदरशूल मिट जाता है ।</li><li>हींग और अफीम सममात्रा में पीसकर कीड़ा खाए दन्त के गड्डे (खोखले भाग) में भरकर ऊपर से रूई रखकर दबा देने से कृमि दन्तशूल नष्ट हो जाता है।</li></ul><p><strong>नोट- हींग अल्प मात्रा में ही सेवन करें। इसकी मात्रा चौथाई से पौन ग्राम तक है। प्रतिदिन लम्बे समय तक सेवन न करेंस्त्रियों को मासिक धर्म (रज:स्त्राव) अधिक होता हो तो हींग का सेवन बन्द कर दें । गर्भवती महिलायें इसका अल्प मात्रा में ही सेवन करें । पित्त प्रकृति के लोग हींग का औषधि के रूप में ही प्रयोग करें। शिशु को गरमी का विकार हो तो माता हींग का सेवन न करें। अधिक समय तक हींग का सेवन करते रहने से कमजोरी आ जाती है । छाती और मूत्र-मार्ग में जलन होती है । अफारा हो जाता है, हाजमा बिगड़ जाता है। मु &#8216;दुग्धपान&#8217; करानेवाली और पसीना दुर्गन्धित हो जाता है। हींग दिमाग को तथा यकृत को हानि पहुँचती है। कतीरा, बनफ्शा, नीलोफर, सेब, सन्दल हींग के दर्पनाशक है। सिकन्जबीम हींग की पूरक है।</strong></p><p>हमें उम्मीद है कि हींग के फायदे (Hing Khane Ke Fayde) जानकर आप इसका पूरा लाभ उठाएंगे। यदि आपको ऐसे हींग के फायदे मालूम हैं जिनका उल्लेख यहाँ नहीं किया गया है तो कृपया टिप्पणी करके हमें अवश्य बताएँ।</p><h2 class="wp-block-heading">यह भी पढ़ें</h2><p>● <a
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href="/ilaichi-ke-fayde/">इलायची के फायदे</a> ● <a
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href="https://hindipath.com/anda-khane-ke-fayde/">अंडे खाने के फायदे</a></p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=26928</guid><description><![CDATA[<p>प्याज खाने के फायदे (Pyaz Khane Ke Fayde) अनेक हैं, प्याज एक ऐसा खाद्य पदार्थ है जो अपने स्वाद और</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/pyaj-khane-ke-fayde-in-hindi/">प्याज खाने के फायदे – Pyaj Khane Ke Fayde</a> appeared first on <a
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सेवन से पेट और शरीर के किसी भी भाग का दर्द दूर हो जाता है। वायुगोला का दर्द में भी गुणकारी है। ज्वर, उदर, खाँसी, जिसमें बलगम एकत्र होता रहता है सूखी और तर खुजली, कर्णशूल तथा कीट-पतंग मधुमक्खी आदि के डंक मारने में लाभप्रद है।</li><li>लाल प्याज पेट की आग को तेज करने वाली और निद्राकारक है। यह क्षारयुक्त, तीक्ष्ण, मधुर, अत्यन्त ताकतवर, गला सूखने में लाभप्रद है और जठराग्नि वर्धक है। एक प्याज की गांठ के अन्दर दे अण्डों के बराबर लाभप्रद शक्ति समाहित रहती है। प्याज की तीखी दुर्गन्ध के ही कारण यह सस्ती वस्तु है अन्यथा इसमें इतने अधिक गुण हैं कि सेब, आम, अंगूर जैसी यदि इसमें गन्ध होती तो यह इन सभी की नानी होती, क्योंकि गुणों की दृष्टि से यह अनुपम वस्तु है।</li><li>प्याज के अन्दर प्रोटीन, वसा, खनिज लवण, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, . फास्फोरस, लोहा, विटामिन्स और कैलरीज सभी कुछ हैं। प्याज में उड़नशील इन भी हैं जिसमें गन्धक, एल्युमिना, चूने के सिट्रेट और प्रस्फुटक अम्ल इत्यादि मौजूद हैं।</li><li>प्राचीनतम आयुर्वेदीय ग्रन्थकारों के अनुसार प्याज के अभ्यासपूर्ण सेवन से रूखे-सूखे अंग स्निग्ध हो जाते हैं। रंग और कान्ति में चार चाँद लग जाते हैं पाचन शक्ति प्रदीप हो जाती है। त्वचा के समस्त विकार नष्ट हो जाते हैं। वृषत्व (सांड जैसी मर्दानगी) आ जाती है व्याधियों के उद्वेग शान्त होकर सुखमय जीवन और दीर्घायु प्राप्त होती है। महिलाओं को तो प्याज सुन्दरता के ढांचे में ढाल देता है उनकी गोराई, ललाई, भरे-भरे अंग और अनिंद्य सौन्दर्य का रहस्य ही प्याज है। यह चिकनी, स्वाद में मीठी, तीखी, चटपटी और तासीर में गरम होती है। नाड़ी संस्थान की यह विशेष रूप से प्रभावित करती है कुल मिलाकर प्याज बल-वीर्य, आयु और जीवन वर्धक है। यह रक्त का शोधन कर, उसकी कमी को दूर करती है ब्लडप्रेशर के लिए तो यह अद्भुत वरदान है। सिर ठण्डा, पेट नरम, पाँव गरम उत्तम स्वास्थ्य की निशानी होती है, जो प्याज सेवन करने से आसानी से प्राप्त हो जाती है।</li><li>प्याज अपने सेवनकर्त्ता को ओज और वीर्य से भरकर लबालब कर देती है। प्याज खाने के फायदे इस दिशा में भी आपकी काफी मदद कर सकते हैं। इसके सेवन से वीर्य की थैलियां कभी खाली नहीं होती हैं। सम्भोग में नर और नारी को पूर्ण तृप्ति की अवस्था तक कामकेलि की स्तम्भन शक्ति प्रदान करता है महिलाओं के मासिकधर्म और पुरुषों के शुक्र दोषों को दूर कर देता है। खाँसी, हैजा में लाभप्रद है दाँत पैने और उजले रखता है। मल-मूत्र के रास्ते शरीर के समस्त विकारों को निकाल बाहर फेंकता है। शरीर के अन्दरूनी घाव भर देता है। सूजन नष्ट करता हैखून को साफ करता है कफ का जानी दुश्मन है। शरीर से दूषित गर्मी को निकालकर संजीवनी ऊष्मा प्रदान करता है यदि संक्षेप में कहा जाए कि प्याज के सही विधि से सेवन से रोगी मृत्यु के द्वार से भी वापस आ जाता है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।</li><li>प्लेग या हैजा फैलने के समय कच्चे प्याज का रस पीने से और इसे हमेशा अपने पास रखने से इन बीमारियों के आक्रमण का भय नहीं रहता है।</li><li>भूख की कमी में प्याज को सिरके के साथ खाना अत्यन्त लाभप्रद है। • प्याज के रस में घी मिलाकर पीने से अत्यन्त ताकत प्राप्त होती है।</li><li>प्याज का ताजा रस शरीर में मलने से (लू) गर्मी की ऋतु में चलने वाली गर्म हवा का असर तुरन्त खत्म हो जाता है।</li><li>प्याज सेवन करने वालों को लू नहीं लगती है।</li><li>प्याज कीटाणु नाशक भी है। छूत के रोगों के फैलने के समय इसे घर में रखने से रोगों से बचाव होता है। ताजा रंगे हुए कमरे की दुर्गन्ध को दूर करने के लिए थोड़ा-सा प्याज काटकर कमरे में रखना चाहिए।</li><li>सफेद प्याज घर के अन्दर रखने से घर में साँप प्रवेश नहीं करता है।</li><li>प्याज काटकर बल्व अथवा लालटेन के पास टांग देने से कीड़े-मकोड़े नहीं आते हैं।</li><li>कच्चे प्याज के खाने से टायफाइड बुखार के कीटाणु मर जाते हैं। इसका सेवन क्षय जैसी भयंकर बीमारी में भी लाभप्रद है।</li><li>प्याज प्यास को कम करता है और दाँतों को मजबूत करता है प्याज का पूर्ण लाभ प्याज को कच्चा खाने से ही होता है। प्याज खाने के बाद खुश्क धनिया, पान, इलायची, लौंग, सौंफ इत्यादि खाने से प्याज की दुर्गन्ध दूर हो जाती है।</li><li>यदि आप कमजोरी महसूस करते हों और शरीर दुर्बल हो गया हो तो प्रतिदिन प्रात:काल कच्ची प्याज को शहद के साथ खायेंकुछ ही दिनों में कमजोरी दूर होकर शरीर स्वस्थ सुन्दर, और स्फूतिवान हो जायेगा</li><li>प्याज का रस सिर पर 1 मास तक निरन्तर मलने से बालों का झड़ना रुक जाता है</li><li>प्याज के सेवन से रक्त साफ रहता है, इसके फलस्वरूप शरीर में कोई रोग नजदीक ही नहीं आता है।</li><li>वायुमण्डल में फैलने वाले संक्रामक रोगों से बचाव हेतु प्याज की मालाऐं बनाकर घर के आंगन में लटकाना अत्यन्त ही लाभप्रद है। सम्भोग से पूर्व लिगेन्द्रिय अथवा स्त्री की योनि में प्याज का रस लगाकर सम्भोग करने से गर्भ धारण की सम्भावना नष्ट हो जाती है।</li><li>प्याज पीसकर बालों पर लेप करने से बाल काले रंग के उगने शुरू जाते हैं। प्याज का रस शहद में मिलाकर गंजे स्थान पर लगाते रहने से बाल पुन: उग आते हैं तथा सफेद बाल काले हो जाते हैं।</li><li>काले दागों पर प्याज का रस लगाते रहने से कालापन दूर हो जाता है।</li><li>लू लगने के उपरान्त सिर के दर्द में प्याज को बारीक पीसकर पैर के तलुवों पर लेप करना अत्यन्त लाभप्रद है।</li><li>प्याज के बीजों को दूध में पीसकर सिर पर लेप करने से बाल झड़ना बन्द हो हैं तथा कमजोर बाल मजबूत हो जाते हैं।</li><li>प्याज का रस शुद्ध शहद 250-250 ग्राम खाने का सोड़ा 50 प्राम तीनों को मिलाकर रखलें। यह अक्सीर-ए-दमा तैयार हो गया। दमा के रोगी सुबह-शाम 1-1 चम्मच प्रयोग कर ईश्वर के गुण गायें।</li><li>प्याज का रस 10 ग्राम और इतना ही शुद्ध शहद तथा भीमसैनी कपूर के ढाई ग्राम मिलाकर रात को सोते समय 2-2 सलाई आँखों में लगाते रहने से उतरता हुआ मोतियाबिन्द ही नहीं, बल्कि उतरा हुआ मोतियाबिन्द भी साफ हो जाता है।&nbsp;</li><li>60 ग्राम प्याज बारीक करके आधा किलो पानी में जोश दें। जब आधा शेष रह जाए तो छानकर ठण्डा होने पर पीने से मूत्र की जलन दूर हो जाती है।</li><li>प्याज को भूभल में दबाकर नरम कर निचोड़कर रस (पानी) निकालकर पुनः गुनगुना करके बच्चों के कान दर्द में 2-3 बूंद डालने से तुरन्त दर्द बन्द हो जाता है।</li><li>बच्चों की आँखें दुखने पर प्याज का रस और शहद 1-1 भाग अर्क गुलाब 2 भाग में मिलाकर 1-1 बूंद दोनों समय आँखों में डालें। तुरन्त लाभ होगा। <strong>नोट – इस औषधि को नित्य ताजा बनाकर प्रयोग करें</strong>।</li><li>प्याज का रस और नौशादर 1-1 तोला खरल में डालकर खूब खरल करें जब दोनों औषधियाँ खूब मिल-जुलकर एकजान हो जाऐं तो किसी साफ शीशी में भरकर सुरक्षित रखलें यह विषहर लोशन तैयार हो गया बिच्छू, बर्र, शहद की मक्खी, मच्छर, कुत्ता के कांट लेने पर इसकी कुछ बूँदें डालकर मल दें। तुरन्त ठण्डक पड़कर लाभ होगा।</li><li>प्याज का रस 20 से 30 ग्राम तक प्रत्येक आधा घन्टे के अन्तर पर हैजे में पिलाना लाभप्रद है</li><li>प्याज और पोदीना का रस 20-20 ग्राम प्रत्येक आधा घन्टे पर पिलाने से हैजा ठीक हो जाता है।</li><li>प्याज का रस 15 ग्राम, काली मिर्च 7 दानें दोनों को पत्थर के खरल या कूड़ी में खूब घोटकर इसमें 10-15 ग्राम मिश्री जलाकर पिलाने से कै, दस्त और हैजा की प्याज और बेचैनी दूर होकर हैजा अच्छा हो जाता है</li><li>हैजा के संक्रमण के समय रात्रि को भोजन से पूर्व 20 ग्राम प्याज के रस में 1 मि.ग्रा भुनी <a
href="/hing-ke-fayde-in-hindi/">हींग</a>, सौंफ और धनिया 1-1 ग्राम (सभी को मिलाकर) खाते रहने से हैजा के आक्रमण का खतरा समाप्त हो जाता है।</li><li>सफेद प्याज का रस, अदरक का रस 5-5 ग्राम गाय का घी 1 चम्मच भर सभी को मिलाकर चाटते रहने से स्मरणशक्तिहीनता नष्ट होकर याददाश्त इतनी अधिक तीव्र हो जाती है कि पुरानी यादों के सारे अध्याय खुल जाते हैं।</li><li>मुख पर झाई, मुँहासे, दाग, विवर्णता इत्यादि होने की स्थिति में ताजा प्याज के टुकड़े मुख पर मलने से खूब लाभ प्राप्त होता है।</li><li>मुँहासों में प्याज के रस में शहद मिलाकर लगाना या कच्चा प्याज का बादाम पीसकर लगाना भी अति लाभकारी है। रस और</li><li>मुखमण्डल की झाइयों में प्याज के बीजों को जल के साथ पीसकर शहद के साथ अथवा दूध मलाई के साथ लगाना भी अत्यन्त हितकर है।</li><li>नकसीर में प्याज का रस सूंघना लाभप्रद है। प्याज का नियमित सेवन रोग में अतीव गुणकारी है। कच्ची प्याज खाने से नाक के गिरने वाला रक्त इस रुक जाता है प्याज को पीसकर गले में बाधने से नकसीर में लाभ होता है। यह प्रयोग कण्ठ विकार और जुकाम में भी लाभप्रद है।</li><li>कण्ठ विकार के कारण गले में खराश हो जाने पर (जिसमें काँटे से पड़ जाते हैं और पानी पीना तक कठिन हो जाता है।) प्याज के रस में शहद मिलाकर इसको फुरैरी से लगाना अत्यन्त लाभप्रद है। प्याज को सिरके के साथ खाना भी लाभकारी है।</li><li>सिर के भारीपन में प्याज के रस को गाय अथवा भैंस आदि के सामान्य देशी घी में मिलाकर देते रहने से धीरे-धीरे लाभ हो जाता है। प्याज को काटकर सूंघना या प्याज को बारीक पीसकर पैर के तलुवों पर लेप लगाना भी उपयोगी है।</li><li>भोजन के साथ कच्चा प्याज खाते रहने से दुग्धपान कराने वाली स्त्री के स्तनों में भरपूर दूध उतरने लगता है। धीरे-धीरे इस प्रयोग से स्तन भरे-भरे दिखाई देने लगते हैं तथा शिशु के दुग्धपान छोड़ देने के बाद भी स्तन पिलपिले या लम्बोतरे नहीं होते हैं फलस्वरूप ऐसी स्त्री वृद्धावस्था में भी युवा स्त्री की भांति सौन्दर्यवान दीखती है।</li><li>रक्तस्राव होने, चोट आदि लग जाने अथवा में खून में उबाल आने या शरीर पित्त का प्रकोप हो जाने इत्यादि कारणों से रक्त बहना बन्द न हो तो सफेद प्याज को शाक-भाजी की भांति मट्ठे में पकाकर खाना अत्यधिक लाभप्रद यह &#8216;चरक&#8217; का अनुभूत योग है।</li><li>10 ग्राम प्याज के रस में 20 ग्राम शहद मिलाकर हल्की आग पर काढ़ा सा बनाकर भोजनोपरान्त चाटने से तेजहीन चेहरों पर कान्ति आकर वे दमक उठते हैं। पूरा परिवार सेवन कर सकता है। एक मास में ही चमत्कार दृष्टिगोचर होगा। युवा स्त्री व पुरुष 25 ग्राम प्याज का रस 50 ग्राम शहद में चाटें।&nbsp;</li><li>बुखार, खांसी, आँखों में जलन और जोड़ों में दर्द ये सब फ्लू (इन्फ्लूएन्जा) ज्वर के लक्षण हैं। ऐसी स्थिति में एक चम्मच प्याज का रस और दो चम्मच शहद मिलाकर दिन में 3-4 बार चाटने से एक ही दिन में तबियत सँभल जाती है।</li></ul><p><strong>नोट-प्याज और शहद गरम हैं अतः गर्भवती स्त्री को मात्र प्याज का रस ही दें।</strong></p><ul><li>यदि शरीर में बार-बार ऐंठन होती हो, चमक सी उठती हो तो प्याज का रस थोड़ा सा गरम करके रोगी के पैरों के तलुवों में मालिश करायें। हैं न प्याज खाने के फायदे कमाल के!</li></ul><p><strong>नोट- इस योग से महिलाओं को तुरन्त आराम होता है क्योंकि पुरुषों की तुलना में स्त्रियों के तलुवे अधिक संवेदनशील और सुकोमल होते हैं।</strong></p><ul><li>पेट में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी जैसे अफारा, अपचन, अग्निमांद्य, पेट दर्द, आध्मान इत्यादि की शिकायत उत्पन्न हो जाए तो प्याज, अदरक और लहसुन का रस 1-1 चम्मच तथा शहद तीन चम्मच मिलाकर भोजन से पूर्व चाटने से अत्यन्त लाभ होता है। सिरके के साथ प्याज खाना भी लाभकारी है। इसमें यदि अदरक का रस और कुछ काला नमक भी डाल लिया जाए तो और भी अधिक उपयोगी है। अग्निमांद्य और अपचन में यह योग अत्यन्त ही लाभकारी है।&nbsp;</li><li>कच्ची लाल प्याज या पकाई हुई प्याज़ अथवा गरम राख में प्याज पकाकर इसका 4 चम्मच रस पीने से अनिद्रा दूर होकर गहरी शान्तिपूर्वक नींद आती है।</li><li>आँख में जाला होने पर (आँखों की पुतली पर सफेदी उत्पन्न हो जाना ही जाला कहलाता है) रुई की बत्ती प्याज के रस में भिगोकर सुखा लें। तदुपरान्त इस बत्ती को तिल के तैल में जलाकर काजल बनाकर प्रयोग करें। इस योग के प्रयोग करने से जाला दूर हो जाता है।</li></ul><p><strong>मूत्र सम्बन्धी रोग &#8211; 1</strong> कि.ग्रा. पानी में 45 ग्राम प्याज काटकर उबाल लें। तदुपरान्त इसे छानकर शहद मिलाकर प्रतिदिन तीन बार पिलाने से मूत्र खुलकर बगैर कष्ट के आता है। इस योग के सेवन से बार-बार मूत्र आना बन्द हो जाता है तथा बन्द हुआ मूत्र आने लगता है। मूत्र की रूकावट दूर हो जाती है।</p><ul><li>जिनके हृदय की धड़कन बढ़ गई हो और वे हृदय सम्बन्धी रोगों से बचाव चाहते हों तो नित्य प्रति एक गाँठ प्याज की खाना खाते समय खायें। प्याज का रस शरीर में उचित मात्रा में पहुँचते रहने से रक्त प्रवाह सुचारू रूप से होने लग जाता है, फलस्वरूप हृदय सम्बन्धी बीमारियों से सुरक्षा प्राप्त हो जाती है।</li><li>रक्ताल्पता के रोगियों को प्याज का रस अथवा कच्चा प्याज अवश्य ही सेवन करते रहना चाहिए। प्याज में लोहा काफी मात्रा में होता है तथा विटामिन सी, गन्धक, तांबा, प्रोटीन, कैरोटिन, विटामिन बी, नायसिन, थायमिन, प्राकृतिक लवण, फास्फोरस, कैल्शियम, शर्करा, जल, ऊष्मांक आदि बहुमूल्य खनिज पर्याप्त मात्रा में होते हैं। फलस्वरूप प्याज पाचनांगों में उत्तेजना पैदा करके रक्तवृद्धि कर शारीरिक शक्ति बढ़ा देता है।</li><li>खूनी बबासीर में 100 ग्राम प्याज का रस और 50 ग्राम शक्कर मिलाकर पीने से लाभ होता है। गुदा द्वार पर बबासीर मस्सों के फूल जाने और उनमें दर्द होने पर दो प्याज गरम राख में भूनकर पीसकर उसे घी में सेंक कर गरम लुगदी से मस्सों को सेंक करके इसी लुगदी को मस्सों पर बांध दें। मस्सों का दर्द दूर हो जाएगा।</li></ul><p><strong>हार्टअटैक — </strong>प्याज खाने के फायदे हृदयाघात से भी आपकी रक्षा कर सकते हैं। प्रातः काल नाश्ते में एक प्लेट में टुकड़े-टुकड़े करके प्याज को तलकर या उबालकर नित्य प्रति सेवन करते रहने से मनुष्य को दिल के दौरे नहीं पड़ते हैं। रायल विक्टोरिया इन्फमरी संस्था बिटेन के अनुसार प्याज से हृदय धमनियों (कोरोनरी आट्रीज) में रक्त के थक्के नहीं बनते हैं फलस्वरूप हृदय सम्भावित क्षति से बचा रहता है।&nbsp;</p><ul><li>नाड़ी शूल में प्याज पीसकर फिर इसे तैल में भूनकर (स्नायुरोग में) बाँधने से आराम मिलता है। प्याज के रस को राई के तैल में मिलाकर मालिश करने से गठिया में आराम होता है। प्याज के रस को सरसों के तैल में मिलाकर गरम करके वात रोग से होने वाले दर्दों में लगाने (मालिश करने) से लाभ होता है।</li><li>सफेद प्याज का रस मृगी से पीड़ित रोगी की नाक में डालने से व आँख में लगाने से मृगी के रोगी को आराम मिलता है।</li><li>500 ग्राम प्याज को कूटकर 50 ग्राम शहद और 400 ग्राम शक्कर तथा एक लीटर पानी मिलाकर मन्दाग्नि पर उबालकर ठण्डा होने पर छानकर एक साफ स्वच्छ बोतल में भरकर रखलें। कष्टदायक खाँसी (जो काफी दवा कराने पर भी दूर न हुई हो) दिन में 4-5 बार एक बड़ा चम्मच भर पिलाते रहने से दूर हो जाती है। कफ की खाँसी में प्याज का रस शहद के साथ देने से कफ आसानी से निकल जाता है। गले की खरखराहट व जुकाम में प्याज को भूनकर खाने से आराम मिलता है।&nbsp;</li><li>जुकाम में प्याज काटकर सूघना अत्यन्त हितकर है। जुकाम में एक आध प्याज की गाँठ खा लेने से भी लाभ मिलता है। रात्रि को सोते समय प्याज की 1 गाँठ खा लेने से जुकाम में बहुत लाभ होता है।</li><li>आँवले के आकार वाली प्याज की गांठें लेकर आवश्यकतानुसार कम या अधिक गाँठें ले लें इनके 4 ऐसे टुकड़े (प्रत्येक गाँठ के) करें कि टुकड़े सभी। आपस में जुड़े रहें। तदुपरान्त इन्हें किसी कांच या चीनी मिट्टी के पात्र में रखकर ऊपर से इतना सिरका डालें कि प्याज खूब भली भांति डूब जाए उसके बाद सिरके में थोड़ा सा नमक और काली मिर्च पीसकर मिलायें। इसे प्रतिदिन सुबह-शाम को खाते रहने से पीलिया (पान्डु रोग) होने का भय नहीं रहता है तथा पाचन शक्ति भी ठीक बनी रहती है।</li><li>पान्डु रोग से पीड़ित व्यक्ति को प्याज का रस व शहद सममात्रा में मिलाकर 2-3 चम्मच प्रात:काल सेवन करना अत्यन्त लाभकारी है।</li><li>प्याज में सिरका मिलाकर खाने से बढ़ी हुई तिल्ली में लाभ होता है।</li><li>प्याज के बीजों को सिरके में पीसकर दाद पर लगाने से जल्दी ही दाद नष्ट हो जाता है।</li><li>खुजली के स्थान पर प्याज का रस लगाना लाभकारी है।</li><li>शरीर में कहीं भी जलन होने पर प्याज काटकर रगड़ने से लाभ होता है। प्याज पर चूना लगाकर मस्से पर रगड़ने से तुरन्त जलकर निकल जाता है।</li><li>प्याज को कुचलकर बिबाई पर कुछ दिनों तक लगातार लगाते रहने से लाभ हो जाता है।</li><li>जब स्त्री के स्तनों का वरम फूटकर घाव बन जाए तो 100 ग्राम मीठा तैल लेकर 15 ग्राम प्याज और फिर नीम के पत्ते जला लें। तदुपरान्त थोड़ा सा मोम मिलाकर मरहम बनालें। इस मरहम को रोगिणी अपने स्तनों के घाव पर लगाये। अत्यन्त असरकारक और शीघ्र फलदायी मरहम है।&nbsp;</li></ul><p><strong>गूंगापन &#8211; </strong>मूकता के उपचार में भी प्याज खाने के फायदे हैं।<strong> </strong>प्याज के रस को थोड़े से पानी में मिलाकर बच्चों को पिलाते रहने से उनके बोलने की शक्ति में वृद्धि हो जाती है। इसमें यदि अल्पमात्रा में अकरकरा का चूर्ण और मिला लिया जाए तो अधिक लाभप्रद बन जाता है।</p><ul><li>बच्चों को दस्त या हैजा हो जाने पर 5 से 15 ग्राम तक प्याज का रस चूने के निथरे और छने हुए पानी के साथ सेवन कराने से तुरन्त लाभ होता है। • 4-6 बूँद प्याज का रस चटा देने से बच्चों की बदहज्मी दूर हो जाती है। आवश्यकतानुसार इसे कई बार चटाया जा सकता है।</li><li>प्याज के रस की 2-4 बूँदें शहद के साथ मिलाकर बच्चों को चटाने से पेटदर्द दूर हो जाता है।</li><li>छोटे बच्चों को प्याज का रस शक्कर में मिलाकर चटाने से वात-पित्त और कफ तीनों ही प्रकार के विकार नष्ट हो जाते हैं।.</li><li>यदि बालक को शीघ्र बढ़ाना हो तो प्याज और गुड़ मिलाकर कुछ दिनों तक खिलाने से लाभ होता है।</li><li>शिशुओं के दाँत निकलते समय दस्त लग जाते हैं, आँखें आ जाती हैं उनका शारीरिक विकास रुक जाता है। प्याज का रस सेवन कराते रहने से समस्त प्रकार के विकार नष्ट होकर कैल्शियम की भरपूर पूर्ति हो जाती है।</li><li>बच्चों के पेट में कीड़े होने पर एक चम्मच प्याज का रस में आधा चम्मच पानी मिलाकर पिलानी अत्यधिक लाभप्रद है।</li><li>प्याज के आधा किलो रस में 50 ग्राम रैक्टीफाइड स्प्रिट मिलाकर 15 दिनों तक रखा रहने दें तदुपरान्त इस अर्क को छानकर किसी दूसरी बोतल में 15 ग्राम तक सुरक्षित रखलें। आयु व अवस्थानुसार 5 से 15 ग्राम तक यह दवा दिन में 2- 3 बार सेवन कराने से बच्चों का सूखा रोग नष्ट हो जाता है।</li><li>थोड़ा-सा सफेद प्याज का रस, सरसों के तैल में पका करके बच्चों की छाती पर मलने से सर्दी, जुकाम और खाँसी (छाती पर जमा हुआ कफ निकल कर) नष्ट हो जाती है सरसों के तेल के स्थान पर पुराना घी प्रयोग कर सकते हैं।</li><li>बच्चों के तालुकन्टक रोग में (इस रोग में बच्चे के सिर में तालु का भाग नीचा हो जाता है और उसमें गड्ढा सा हो जाता है।) प्याज को आग में पकाकर बारीक पीसकर उसमें थोड़ा सा गाय का घी मिलाकर टिकिया बनाकर बालक के तालु पर रखकर उस पर रेंडी का पत्ता नरम करके रखकर ऊपर से (प्रतिदिन प्रात:काल पट्टी बाँधे तथा सन्ध्या समय पट्टी खोलकर सिर को धो- पोंछकर तालु पर गोघृत लगाये। साथ ही सफेद प्याज के रस में 1 ग्राम सफेद जीरा का चूर्ण तथा खान्ड मिलाकर बालक को पिलायें। मात्र 3-4 दिन के इस रोग ठीक हो जाता है।</li><li>7 छोटी-छोटी प्याज की गाठों की माला बनाकर बालक के गले में पहिना हो तो 5-10 बूँद प्याज का रस पानी में मिलाकर थोड़ी-थोड़ी देर में पिलाने से तथा प्याज का रस शरीर पर मलने से लू का असर नष्ट हो जाता है</li><li>कच्चा प्याज बार-बार खाने से मूत्र अधिक होता है। अतः जलोदर के लिए यह लाभप्रद है।</li><li>किसी भी प्रकार का नशा किए हुए व्यक्ति को 1 कप भर प्याज का रस पिला देने से नशा शर्तिया कम अथवा नष्ट हो जाता है।</li><li>यदि 40 दिनों तक निरन्तर प्रातः काल में दो चम्मच सफेद प्याज के रस में समभाग शहद मिलाकर सेवन कर लिया जाए तो पुश्तैनी दमा (मां-बाप से विरासत में मिला) भी नष्ट हो जाता है। इस योग से पुरानी कहावत दमा दम के साथ जाता है भी शर्तिया फेल हो जाती है। अनुभूत है।</li><li>दो प्याज की गाँठों का रस शहद में मिलाकर प्रातः काल (नित्यकर्मों से निवृत होकर) चाटते रहने से मात्र एक सप्ताह में ही रक्त बढ़ने के लक्षण दृष्टिगोचर होने लगते हैं।</li><li>पाखाने के साथ आँवों मिला हो तो 60 ग्राम प्याज को छीलकर महीन कूटकर इसे 5-6 बार जल से धोकर 250 ग्राम गाय के ताजा दही के साथ खायें। <strong>(नोट- यह 1 खुराक है।)</strong> ऐसी दिन में तीन खुराकें (सुबह, दोपहर, शाम) सेवन करने से मात्र 2-3 दिन में ही लाभ हो जाता है।</li><li>प्याज का रस सिर में मलने से जुऐं (लीखें या डींगर) नष्ट हो जाते हैं। • प्याज का रस 1 भाग शहद दो भाग में मिलाकर पकाकर 10 ग्राम की मात्रा में नित्य सेवन करने से कामेन्द्रिय में उत्तेजना पैदा हो जाती है तथा सेवन कर्ता की अपार काम शक्ति बढ़ जाती है।</li><li>सफेद प्याज का रस और अदरक तथा शहद 5-5 ग्राम खूब भली प्रकार मिलाकर नित्य प्रात:काल 40 दिन तक सेवन करने से नामर्द भी मर्द बनता है।</li><li>प्याज के रस में आटा गूंथकर बाटी सेंककर प्याज की ही सब्जी से महीना 20 दिन खाने से खोई हुई मर्दानगी वापस आने लगती है।</li><li>मसूढ़ों की सूजन में कच्ची प्याज को नमक के साथ खाना लाभप्रद है।&nbsp;</li><li>गुदा भ्रंश नामक रोग में प्याज का ताजा रस आधा से 1 औंस तक खान्ड में मिलाकर दिन में बार पिलाना लाभप्रद है।</li><li>गाँठ, फोड़ा, बद एवं व्रण में प्याज को भूनकर पुल्टिस के रूप में प्रभावित अंग पर लगाना (रखना) लाभप्रद है।</li></ul><p><strong>नोट- पुल्टिस को क्रमशः प्रति 3-4 घंटे पर बदलते रहना चाहिए जिससे स्थान गरम बना रहे। पुल्टिस बनाने हेतु प्याज को घी में भूनना चाहिए इस प्रयोग से जो गांठ न बैठती हो और न पकती हो वह कुछ ही दिनों में पक जाती है पुल्टिस में यदि हल्दी मिला ली जाए तो योग और भी अधिक लाभकारी हो जाता है।</strong></p><ul><li>दाद में प्याज को सिरके में पीसकर लगाना लाभप्रद है।</li><li>प्याज के बीजों को पीसकर दाँतों पर मलने से दन्तकृमि नष्ट हो जाते हैं।</li><li>प्याज के रस को रसौत मिलाकर 1 औंस की मात्रा में सुबह-शाम भोजन के बाद सेवन करते रहने से कुछ ही दिनों में स्त्रियों का मासिक धर्म नियमित होने लगता है तथा कष्टार्त्तव की स्थिति नष्ट हो जाती है</li><li>अम्लपित्त रोग में (जब रोगी को खाया हुआ भोजन नहीं पंचता है, बार- बार खट्टी डकारें आती हैं) 50 ग्राम प्याज को काटकर गाय के ताजे दही में मिलाकर सेवन करना अत्यधिक लाभप्रद है।</li><li>यदि अधिक सम्भोग करते रहने के कारण कामशक्ति घट गई हो तो प्याज के कटे टुकड़े और गोघृत 50-50 ग्राम 250 मि.ली. गाय के दूध में एकत्र कर पकायें जब गाढ़ा हो जाए तब उतारकर मिश्री मिलाकर (शीतल होने पर सेवन करें। दो माह तक सेवन जारी रखें तथा लाल प्याज का ही प्रयोग करें।</li><li>प्याज का रस, अदरक का रस तथा शहद तीनों को मिलाकर 40 दिनों तक सेवन करने से गई हुई जवानी पुनः वापस आ जाती है</li></ul><p><strong>नोट-प्याज की मात्रा 10-15 ग्राम तक है किन्तु आवश्यकतानुसार अधिक मात्रा में भी सेवन किया जा सकता है। गरम प्रकृति के व्यक्ति को प्याज का अधिक प्रयोग नहीं करना चाहिए। प्याज प्यास उत्पन्न करता है तथा पसीना अधिक लाता है। स्मरण शक्ति को हानि पहुँचाता है। स्नायु को उत्तेजित करता है तथा काम को बढ़ाता है। कच्चा प्याज अधिक उत्तेजक है। जिनके रक्त में यूरिक एसिड की मात्रा अधिक हो, उन्हें प्याज का प्रयोग करना हानिकारक है। प्याज दिमाग और गले को भी हानिकारक है। गरम प्रकृति (स्वभाव) वाले व्यक्ति को अधिक प्याज खाने से नजला पैदा हो जाता है। रात्रि को भोजन में बतौर सलाद कच्चा प्याज हर्गिज सेवन न करें। इसके सूंघने से भी गरम प्रकृति के व्यक्ति के सिर में दर्द होने लगता है।</strong></p><p>.&nbsp;</p><ul><li>&nbsp;प्याज को खाने के कुछ देर बाद दही या मट्ठा पी लेने से इसका दर्प नष्ट हो जाता है। कासनी और शहद भी प्याज का दर्प नाशक है। प्याज को पकाकर खाने से हानि कम होती है और प्याज़ को जितना अधिक पकाया जाएगा, हानि भी उतनी ही कम होगी। सिरका और काला नमक भी प्याज के दर्पनाशक है।</li></ul><p>हमें उम्मीद है कि प्याज खाने के फायदे (Pyaj Ke Fayde) जानकर आप इसका उपयोग अवश्य करेंगे और इससे बहुत-से लाभ उठाएंगे। यदि इनके अतिरिक्त प्याज खाने के फायदे (Benefits of Eating Raw Onion) आपको पता हैं, तो टिप्पणी करके हमें अवश्य बताएँ।</p><h2 class="wp-block-heading">यह भी पढ़ें</h2><p>● <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com/neem-ke-fayde-in-hindi/">नीम के 10 फायदे – Neem Ke 10 Fayde</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>इस लेख में जानते हैं क्या हैं नीम के 10 फायदे (Neem Khane Ke Fayde) और किस तरह नीम के पत्ती के फायदे (Neem ki Patti khane ke fayde) का भरपूर लाभ लिया जा सकता है। साथ ही किन रोगों में यह रामबाण सिद्ध होती है।</p><p>सुप्रसिद्ध सर्वविदित सर्वत्र पाया जाने वाला त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) को दूर करने की अपार क्षमता से सुशोभित वृक्ष हैपुराणों में इसे अमृत तुल्य माना गया हैनीम वृक्ष का पान्चांग (फल, फूल, पत्ते, जड़ और छाल) का रेशा-रेशा अर्थात् जड़ से शिखर तक वृक्ष औषधीय गुणों से भरपूर है यही इसके विशेष महत्त्व की बात है, ऐसा बहुत कम वृक्षों के साथ महत्व जुड़ा हुआ है इसकी कोपलें नेत्र रोग, गर्मी, कोढ़ और कफ नाशक होते हैं इसके पत्ते कृमि, विष, अरूचि और अजीर्ण नाशक होते हैंइसके सूखे हुए पत्ते मनुष्य और कपड़ों (दोनों) की रक्षा करते हैं तथा अनाज में रखने से उसे भी घुनने (कृमियों) से बचाते हैं। इस वृक्ष के फल (निबौली) <a
href="/bhagandar-ka-ilaaj-dawa-lakshan/">बबासीर</a>, प्रमेह, कोढ़, कृमि और गुल्म को शान्त करते हैंइसके पके फल (निबौली) रक्त, पित्त, कफ, नेत्र रोग, दमा नाशक है। इस खाँसी, बबासीर, प्रमेह और कृमिजन्य विकार नाशक गुणों से भरपूर है। निबौली वृक्ष का फूल (निबौली का फूल) कफ और कृमि नाशक है। इस वृक्ष का डन्ठल खाँसी, बबासीर, प्रेमह और कृमिजन्य विकार नाशक गुणों से भरपूर हैं। निबौली की गिरी कोढ़ में विशेष रूप से आरोग्यता प्रदान करने वाली है। नीम (निबौली) का तैल कृमि, कोढ़ और त्वचा रोग नाशक और दांत, मस्तक, स्नायु और छाती के दर्द को मिटाने के गुणों से भरपूर है। आइए, जानते हैं कि नीम के 10 फायदे जो सबसे मुख्य हैं वे क्या हैं–</p><h2 class="wp-block-heading">नीम के 10 फायदे जानें</h2><ol><li>नीम मूत्रल है यौनांगों को विकार मुक्त करके पुष्ट और सबल बनाता है। यह चेतना सर्जक है और दिमागी ताकत का असीम भंडार है। यह स्त्रियों के मासिक धर्म को नियमित भी करता है।</li><li>नीम की निबौली खाने से अजीर्ण नष्ट हो जाता हैइसके सेवन से मल निष्कासित होकर रक्त स्वच्छ हो जाता है। रक्त संचार तीव्रता से होने के कारण जठराग्नि&#8217; तीव्र हो जाती है। परिणामस्वरूप क्षुधा बढ़ जाती है।</li><li>शरीर अथवा शरीर का कोई अंग विशेष यदि सुन्न हो गया हो तो नियमित 3-4 सप्ताह के नीम तैल की मालिश से सुन्न नसों में पूर्ण रूपेण चेतना आकर सुन्नपन नष्ट हो जाता है। नीम के बीजों का तैल निकलवाकर मालिश करें।</li><li>&nbsp;नीम पत्तियों का रस 1-1 चम्मच प्रतिदिन सुबह-शाम पीने से अफीम खाने की लत में कमी आकर धीरे-धीरे छूट जाती है यदि अफीम खाने की लत अधिक सताये तो भांग का अल्प मात्रा में सेवन कर लिया करें । अफीम के मुकाबले भांग कम हानिकारक है तथा इसका सेवन कभी भी छोड़ा जा सकता है।</li><li>अरुचि खाने-पीने की हो अथवा काम धन्धे की, नीम के सूखे पत्तों का चूर्ण बनाकर 1-1 चुटकी प्रत्येक 2-2 घंटे पर दिन में 3-4 बार सेवन करने से नष्ट हो जाती है इस हेतु नीम की कोपलें भूनकर भी खाई जा सकती है।</li><li>अन्डवृद्धि (हार्निया) में नीम, हुरहुर की पत्तियाँ और अमरबेल सभी सममात्रा में लेकर गोमूत्र में घोट-पीसकर अन्डकोषों पर लेप करते रहना अत्यन्त उपयोगी है।</li><li><strong>आँखे दुखने पर —</strong> नीम की पत्तियों का रस 1-1 बूँद आँखों में डालें। नोट – बच्चों की दुखती आंखों में न डालकर कानों में डालें तथा यदि 1 आँख &#8211; दुख रही हो तो विपरीत कान (बांयी आँख पर दुखने पर दांये कान में डालें।</li><li>नीम की पत्तियों का रस और पठानी लोध (10-10 ग्राम पीसकर आँखों की पलकों पर लेप करने से आँखों की जलन और लालिमा नष्ट हो जाती है।</li><li>आँखों में सूजन होने पर 10 ग्राम नीम की पत्तियों उबालकर 5 ग्राम फिटकरी में घोलकर दिन में तीन बार करना लाभप्रद है।</li><li>आग से जल जाने पर नीम तेल लगाना उपयोगी है। नीम की 50 ग्राम कोंपलें तोड़कर 250 ग्राम खौलते तैल में इतना पकायें कि नीम की कोपलें जल जायें (किन्तु जलकर राख न हो) तदुपरान्त 1-2 बार छानकर सुरक्षित रखलें और लगायें।</li></ol><p>नीम के 10 फायदे जो मुख्य-मुख्य हैं, वे तो आपने जान लिए हैं। लेकिन इसके अतिरिक्त भी नीम के अनेक लाभ हैं। आइए, जानें नीम के अन्य लाभ–</p><h2 class="wp-block-heading">नीम के अन्य फायदे</h2><p><strong>नीम का मरहम —</strong> 250 ग्राम नीम के तैल में 125 ग्राम वैक्स (मोम), नीम की हरी पत्तियों का रस 1 किलो, नीम की जड़ की छाल का चूरा 50 ग्राम और नीम की पत्तियों की राख 25 ग्राम डालें । तैल और नीम का रस हल्की आग पर इतना पकायें कि तैल आधा या इससे भी कम रह जाए। फिर इसी में मोम डाल दें। जब तैल और मोम एकजान हो जाए तो छाल का चूरा और पत्तियों की राख भी मिला दें । यह प्रत्येक प्रकार का घाव भरने हेतु रामबाण मरहम तैयार हो गया।</p><ul><li>नीम की हरी पत्तियां, भीमसेनी कपूर, जस्ता भस्म, लाल चन्दन का बुरादा , 10-10 ग्राम और शुद्ध रांगा 50 ग्राम को किसी लोहे के पात्र (कड़ाही में खूब , ) घोटकर सुरमा बनाकर आंखों में लगाने से पड़वाल जड़मूल से नष्ट हो जाता है।</li><li>आतशक में नीम की पत्तियों का रस 10 ग्राम अथवा नीम का तेल 5 ग्राम नित्य पियें और यौनांगों पर नीम तैल की मालिश करें। अति उपयोगी योग है।</li><li>नीम की पत्तियाँ, काली मिर्च और चावल 25-25 ग्राम घोट पीसकर नसवार बनालें सूरज निकलने से पूर्व ही 1-1 चुटकी यह नसवार लेकर नथुनों से ऊपर खींचें मात्र 1 सप्ताह के नित्य प्रयोग से पुराने से पुराना आधासीसी का रोग जड़ से भाग जाएगा।</li><li>आँव आने पर नीम पत्तियों का आधा कप काढ़ा अथवा पत्ती का 2 या ढाई ग्राम चूर्ण या पत्ती का दस ग्राम रस या छाल का चूर्ण डेढ़ से दो ग्राम तक अथवा फल, फूल छाल, डन्ठल और पत्ती अर्थात् पंचांग का चूर्ण हो तो मात्र टो ग्राम सेवन करने से लाभ हो जाता है ।</li><li>20 ग्राम नीम की पत्तियाँ पीसकर आधा कप पानी में घोलकर 5 दाने काली मिर्च के भी मिलालें । इसे पीने से किसी भी कारण से उल्टियां (वमन या कै) आ रही हो, शर्तिया शान्त हो जाती हैं ।</li><li>नीम की छाल, मजीठ, पीपल की छाल, नीम वृक्ष पर चढ़ी गिलोय प्रत्येक 10-10 ग्राम लेकर काढ़ा बनाकर आधा-आधा कप सुबह-शाम पीने से एक्जिमा नष्ट हो जाता है । दो किलो नीम पत्ती का रस, 500 मि.ली.सरसों का तेल, आक का दूध, लाल कनेर की जड़ और काली मिर्च 5-5 ग्राम लेकर हल्की आग पर पकाकर तैल मात्र शेष रहने पर छानकर सुरक्षित रखलें । तैल को लगाने से एक्जिमा समूल नष्ट हो जाता है तथा त्वचा पर कोई दाग शेष नहीं रहता है ।&nbsp;</li><li>प्रातः (सूर्योदय से पूर्व) कुल्ला करके नीम की 10 ग्राम पत्तियाँ घोटकर पानी में मिलाकर पीने से <a
href="/kabj-ka-permanent-ilaj-hindi/">कब्ज</a> मिटकर पेट स्वच्छ हो जाता है।</li><li>महानिम्ब (बकायन) के पत्तों और छाल का काढ़ा पीने से और छाल की पुल्टिस बनाकर गले पर बांधने से कण्ठमाला रोग जड़ मूल से मिट जाता है&#8221;</li><li>कच्ची निबौली को चबाने से कर्णमूल (कनफोड़े) ठीक हो जाते हैं अथवा नीम के बीजों को नीम के ही तैल में पकाकर इसमें फुलाया हुआ नीला थोथा पीसकर मरहम बनाकर लगायें ।</li></ul><p><strong>नोट- नीला थोथा जहर है अतः प्रयोग के बाद हाथ अवश्य साबुन से खूब भली-भांति धोकर स्वच्छ करलें ।</strong></p><p><strong>कनखजूरे के विष में— </strong>नीम की पत्तियाँ घोटकर सैंधा नमक मिलाकर लेप करने से (जहाँ कनखजूरे ने काटा हो वहाँ लेप करें) विष नष्ट हो जाता है।</p><ul><li>नीम पत्तियों का 25 ग्राम रस नमक मिलाकर गुनगुना करके कानों में टपकाने से कानों से समस्त कीड़े निकल जाते हैं। आवश्यकता पड़ने पर (कान में कीडे होने पर) यह क्रिया दूसरे दिन भी की जा सकती है ।</li><li>50 ग्राम सरसों के तैल में 25-30 ग्राम नीम के पत्ते पकावें । (इसी में 5 ग्राम पिसी हल्दी डाल लें । तदुपरान्त इस तैल को छानकर 1 छोटा चम्मच शहद मिलाकर शीशी में सुरक्षित रखलें इस तैल को 3-4 दिनों कान में टपकाने से कानों का बहना और दुर्गन्ध निकलना शर्तिया दूर हो जाता है । अथवा नीम के तैल में शहद मिलाकर रूई की बत्ती से कान में फेरने मात्र से ही पीव आना और दुर्गन्ध निकलना, दर्द होना मिट जाता है।</li><li>नीम पत्ती 1 का रस चम्मच पीने से तथा 2-2 बूँद कानों में डालने से कान सुन्न पड़ जाने का रोग दूर हो जाता है।</li><li>नीम की फूल-पत्ती और निबौली पीसकर 40 दिन निरन्तर शर्बत बनाकर पीने से सफेद कोढ़ से मुक्ति मिल जाती है।</li><li>नीम का गोंद नीम के ही रस में ही पीस कर पीने से गलित कोद नष्ट हो जाता है । कोढ़ (लेप्रोसी) से ग्रसित रोगी को नीम वृक्ष के नीचे ही रहने, खाने, पीने और नीम की पत्तियां बिछावन की भांति बिछाकर सोना अत्यन्त ही लाभप्रद है घावों पर नीम का तैल लगाना अथवा शरीर पर मालिश करना, नीम की पत्तियों का रस पीना अथवा नीम से झरने वाला मद (50 ग्राम) तक पीना हितकर है। नीम की पत्ती का रस पानी में मिलाकर स्नान करना तथा बिस्तर से हटायी गयी नीम पत्तियों को जलाकर (धूनी लगाने से) वातावरण स्वच्छ रहता है। जली हुई पत्तियों की राख नीम के तैल में मिलाकर घावों पर लगाना भी लाभकारी है । नीम की सूखी पत्तियों के ढेर में गन्धक चूर्ण डालकर आग लगाने से खटमल और मच्छर भाग जाते हैं ।</li><li>पेट की खराबी के कारण होने वाले गले की दाह में नीम के रस में निबौली घोटकर शर्बत की भांति पीना लाभप्रद है।</li><li>बलगमी खाँसी में नीम के पत्तों की भस्म शहद में मिलाकर चाटना अत्यन्त लाभकारी है । नीम भस्म को सौंठ, अजवायन, काली मिर्च, पुदीना एवं अदरक रस में घोटकर चाटने से तुरन्त लाभ होता है। इस प्रयोग से श्वास नली के समस्त अवरोध और दूषण शान्त हो जाते हैं ।</li><li>30 ग्राम नीम की कोपलों का रस तीन दिन पीने से खून की खराबी दूर हो जाती है ।</li><li>खुजली में नीम और मेंहदी के पत्तों को एक साथ रगड़कर रस निकाल कर 25 ग्राम की मात्रा में पीना तथा शेष बचे रस को नारियल के तैल में भूनकर छानकर शरीर पर मलना लाभकारी है । अथवा नीम का पंचांग (बीज, फूल, फल और पत्ते तथा जड़) समान मात्रा में पीसकर 4 चम्मच सरसों के तैल में उक्त चूरा हल्की आग पर तपाकर (नीम जलने की गन्ध फैलते ही और धुंआ उठते हुए ही) उतारकर, छानकर साफ-स्वच्छ शीशी में सुरक्षित रखलें । इस तैल की मालिश से मात्र खुजली ही नहीं, वरन् त्वचा सम्बन्धी समस्त विकार नष्ट हो जाते हैं।</li><li>पतझड़ के मौसम में नीम छाल को पीसकर छानकर दो ग्राम की मात्रा में 3-3 घंटे पर ताजे पानी से सेवन करने से खूनी दस्त रुक जाते हैं।&nbsp;</li><li>नीम तैल की निरन्तर काफी दिनों तक मालिश करते रहने से गंजापन नष्ट हो जाता है।&nbsp;</li><li>25 ग्राम सरसों के तैल को पकाकर (खूब खौलने तक पकायें) उसमें 10 ग्राम नीम की कोपलें डालकर काली पड़ने दें (जलने से पहले ही उतार लें) फिर इसवने छानकर तैल को पुनः गुनगुना करके गठिया से आक्रान्त अंगों पर मालिश करें तथा इसी तैल से शाक-भाजी बनाकर खायें। गठिया के लिए अक्सीर योग। अथवा महानिम्ब (बकायन) के बीज को पीसकर दो ग्राम की मात्रा में गुनगुने पानी के साथ सेवन करें। सुन्न पड़ गये अंगों को इस योग के सेवन करने. से चैतन्यता मिलती है।</li><li>नीम पत्तियों के रस में मिश्री मिलाकर सुबह-शाम पीने से शरीर (देह) की गर्मी (शरीर में गर्मी का जोर) शान्त हो जाता है ।</li></ul><p><strong>गर्मी से बुखार होने पर—</strong> नीम की छाल, गिलोय, लाल चन्दन, धनिया और कुटकी सम मात्रा में लेकर जौकुट कर काढ़ा बनाकर 20 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन (तीन दिन में तीन खुराकें) लें इससे अधिक सेवन कदापि न करें । यह ‘गडुच्यादि क्वाथ&#8217; कहलाता है। मात्र इतने सेवन से ही बुखार भाग जाता है और प्यास भी शान्त हो जाती है । यह उपचार रक्त को ठण्डा करता है।</p><ul><li>नीम की पत्तियों का रस निकालकर हल्का गर्म करके (इसमें 5-7 बूँद शहद भी मिला सकते हैं) गरारें (कुल्ला) करने से गले की जलन शान्त हो जाती है तथा कफ को हटाने में तो यह योग लाभप्रद</li></ul><h3 class="wp-block-heading">नीम के पत्ती के फायदे &#8211; Neem Ke Patte Ke Fayde</h3><p><strong>&nbsp;गिल्टियों और सूजन में—</strong> नीम की पत्तियों को दरड़ लें (बारीक न पीसें) और नमक डालकर कड़वे तैल में पकायें, इसमें एक चुटकी पिसी हल्दी मिलाकर पुल्टिस तैयार कर किसी कपड़े में पोटली बनाकर गिल्टियों और सूजन पर हल्की- हल्की टकोर (सेंक) करें। दो दिन में ही आराम मिलने लगेगा।</p><p><strong>नोट—टकोर करने पर पहले तो सूजन बढ़ती हुई लगेगी, ऐसा खून संचार की क्रिया के कारण होता है मगर बाद में शर्तिया लाभ होगा । अतः घबरायें नहीं और प्रयोग जारी रखें।</strong></p><ul><li>महानीम (बकायन) के पत्तों का रस पानी में मिलाकर पीने और छाल को पीसकर लेप करने से गृधसी रोग (कमर से निचले जोड़ों में दर्द और जकड़न) नष्ट हो जाता है।&nbsp;</li><li>नीमरस में जरा सा नमक (सम्भव हो तो पांचों पिसे हुए नमक) मिलाकर दिन में 4 बार पीते रहने से घमौरियाँ नष्ट हो जाती हैं तथा गर्मी, खुश्की नहीं होती है और पित्ती भी नहीं निकलती है ।</li><li>नीम के तैल में कपूर की टिकिया घोलकर ठण्डी हवा और छांव में बैठकर (धूप के असर से होने वाली पित्ती निकलने पर) मालिश करना तथा आधा घंटे के पश्चात् स्नान करना अत्यधिक लाभप्रद है।</li><li>नीम की पत्तियों का रस और सरसों का तैल 10-10 ग्राम लेकर आग पर इतना पकायें कि रस जल जाए, तेल मात्र शेष रहे । इस तैल को घाव पर लगाना इतना अधिक गुणकारी है कि ऐलोपैथी की कीमती से कीमती घाव भरने का आयन्टमैन्ट (मलहम) इसका मुकाबला नहीं कर सकता है।</li><li>40 दिनों तक निरन्तर नीम क्वाथ पीने से और त्वचा पर नीम का तेल लगाते रहने से चम्बल रोग (सोरायसिस ) जड़ से नष्ट हो जाता है।</li><li>बहार के मौसम में प्रतिदिन नीम की 5 कोपलें चबाते रहने से अथवा 1 हफ्ता तक बेसन की रोटी में नीम की कोपलें कुतरकर मिला दें तथा घी में खूब तर करके खाने से 1 साल तक त्वचा रोगों से बचाव हो जाता है।</li><li>नीम की 7 लाल पत्तियाँ और 7 काली मिर्च के दानें प्रतिदिन चबाने से अथवा नीम और बहेड़े के बीज तथा हल्दी 5-5 ग्राम पीसकर ताजा पानी में घोलकर 1 सप्ताह पीने से 1 साल तक चेचक रोग से बचाव हो जाता है।</li><li>हरड़, बहेड़ा, आँवला का छिलका, सौंठ, पीपल, अजवायन, सैंधा और काला नमक प्रत्येक 10-10 ग्राम, काली मिर्च 1 ग्राम नीम के पत्ते आधा किलो और जौ क्षार 20 ग्राम को कूट पीस छानकर सुरक्षित रखलें । 3 से 5 ग्राम की मात्रा में फँकी मारकर गुनगुने पानी या चाय के साथ पीने से चौथैया बुखार भाग ही जाता है इसका सेवन प्रत्येक प्रकार की ज्वरों में भी उपयोगी है ।</li><li>सुबह-सुबह नीम की छाल का रस निकालकर 25 ग्राम की मात्रा में पीने के दो घंटे बाद घी की चूरी (परांठे की चूरी बनाकर घी में सानकर) 1 सप्ताह तक निरन्तर खाने (पानी न पियें अथवा कम से कम पियें) से जलोदर रोग नष्ट हो जाता है।</li><li>जवानी के कील मुँहासे मुरझाकर दाग छोड़ गए हों तो नीम के बीज सिरके में पीसकर 5-7 दिन दागों पर लेप करने से लाभ हो जाता है।</li><li>नीम का मद (गोंद) दो प्रतिदिन खाने जहरवाद नष्ट हो जाता है।</li><li>नीम का तैल सिर में मालिश करने से जुऐं लीखें नष्ट हो जाती हैं।</li><li>नये जूते के काटे हुए जख्म में नीम तैल या नीम तैल में वैसलीन मिलाकर लगाना लाभप्रद है। नीम की पत्तियों की राख भी नीम तैल के साथ लगावें ।</li><li>25 ग्राम नीम के पत्ते 250 ग्राम पानी में उबालकर 25-25 ग्राम की मात्रा में प्रति दो-दो घंटे पर पीने से यकृत की कमजोरी (शराब इत्यादि सेवन करने से लीवर डीमेज होना) दूर हो जाती है। यह प्रयोग लीवर टानिक का कार्य करता है।</li><li>नीम वृक्ष की अन्दर वाली छाल को खूब बारीक (चन्दन की भांति) घिसकर जोड़ों के दर्द से आक्रान्त अंग पर गाढ़ा-गाढ़ा लेप करें (लेप सूख जाने • पर पुनः करें) अत्यधिक लाभप्रद योग है ।</li><li>नीम की पत्तियों, अनार का बक्कल, हरड़ का बक्कल, पठानी लोध, आम का छिलका (प्रत्येक 10-10 ग्राम) पानी में पीसकर मुखमण्डल की झाइयों पर लगाना अत्यन्त उपयोगी है। मुख के स्याह धब्बे दूर होकर त्वचा का प्राकृतिक रंग उभर आता है।</li><li>टायफाइड बुखार में नीम के बीज पीसकर दो-दो घंटे पर पिलाने से ज्वर झरता है । मल निकलकर शरीर में ताजा खून बनकर नवस्फूर्ति और शक्ति का संचार होता है।</li><li>निबौली, अजवायन एवं नौशादर सममात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर सुरक्षित रखलें। प्रतिदिन प्रातः काल तीन ग्राम की मात्रा में ताजे पानी से खाने से तिल्ली बढ़ने का रोग ठीक हो जाता है ।</li><li>नीम के 5 नग बीजों की गिरी पीसकर दिन में तीन बार खाने से द रुक जाते हैं।</li><li>पान में नीम तैल की 10 बूंदें डालकर दिन में ऐसे 5-6 बार पान खाये अर्थात् नीम तैल की दिन भर में 50-60 बूंदें पेट में चली जाऐं) निरन्तर 2-3 माह के सेवन से पुराने से पुराना दमा जड़ मूल से पीछा छोड़ जाता है।</li><li>नीम, बबूल, मौलश्री की छाल, सिरस के बीज, जली हुई सुपारी, जले हुए बादाम के छिलके प्रत्येक 50 ग्राम, खड़िया मिट्टी 100 ग्राम, बहेड़ा 20 ग्राम, काली मिर्च 3 ग्राम, लौंग 5 ग्राम, पिपरमेन्ट आधा ग्राम लेकर सभी को पीस छानकर सुरक्षित रखलें। इस मंजन को प्रयोग करने से दांतों की समस्त बीमारियां नष्ट हो जाती हैं।</li><li>नीम के पत्ते दही में पीसकर लगाने से दाद जड़मूल से नष्ट हो जाता है। नीम की छाल का काढ़ा पीना तथा निबौली का तैल विशेषतः बकायन का तैल दाद में लगाना भी उपयोगी है।</li><li>नीम के छाया शुष्क फूल और कलमी शोरा 10-10 ग्राम पीस छानकर (कपड़े से छानें) सुरक्षित रखें। इस सुरमा को सुबह-शाम 1-1 सलाई लगाते रहने- से दिन प्रतिदिन आँखों की ज्योति (नजर) बढ़ती चली जाती है ।</li><li>नीम की पत्तियों के रस में जीरा, पोदीना और काला नमक मिलाकर पीने से दिल की जलन दूर हो जाती हैयह शर्बत दिल को ताकत देता है और हृदय को ठण्डक से भर देता है।</li><li>नीम की पत्तियाँ दीमक की दुश्मन हैं। नीम की मींगी (निबौली) की खाद इस हेतु कृषि भूमि हेतु उपयोगी है। वहीं पुरानी पुस्तकों की रक्षार्थ बीच-बीच में सूखे पत्ते लगाना लाभप्रद है ।</li><li>दो मुट्ठी नीम के पत्ते, दो टिकिया कपूर, थोड़ा सा अगर और चन्दन की घर-आंगन या कमरे में धूनी देने से संक्रामक रोगों से बचाव हो जाता है क्योंकि इस धूनी के प्रभाव से वायुमण्डल साफ-स्वच्छ हो जाता है।</li><li>नीम की छाल का अन्दर वाला हिस्सा बारीक पीसकर (पानी डालकर) सिर पर लेप करने से नकसीर बन्द हो जाती है । अथवा नीम की पत्तियां और अजवायन पानी में पीसकर कनपटियों पर लेप करना भी अत्यन्त लाभप्रद है । गर्मी के मौसम में नीम की पत्तियों का रस निकालकर नमकीन शरबत की भांति सेवन करने से शरीर की गर्मी का उबाल शान्त हो जाता है जिसके परिणामवरूप नकसीर फूटने की नौबत ही नहीं आती है।</li><li>नीम का तेल 250 ग्राम, शुद्ध मोम और बिरोजा 50-50 ग्राम लें। पहले बिरोजा को दड़दड़ा करके पीसकर तैल में गरम कर पिघलाकर बाद में मोम डालदें जब तीनों मिलकर 1 जान हो जाऐं तो शीशी में रखलें । यह नासूर नाशक अति उत्तम &#8216;मरहम बन जाएगा प्रतिदिन नासूर को नीम रस में रुई भिगोकर साफ करके उक्त मरहम लगायें। यह नासूर हेतु शर्तिया व रामबाण प्रयोग है।</li><li>नेहरूआ अथवा नहारू रोग में त्वचा के अन्दर 1 बाल की भांति कीड़ा होता है इसे निकालने के लिए नीम की पत्तियां पीसकर गरम करके त्वचा पर | लगाना अत्यन्त ही उपयोगी है । इस प्रयोग से नहारू अपने आप स्वयं ही फूट जायेगा, उसे वहीं धागे से बाँध दें। मात्र दो या तीन बार के उक्त प्रयोग से नहारू पूर्णरूपेण बाहर निकल आता है। अति सरल प्रयोग है।</li><li>नीम की कोपलें एवं जस्ता 10-10 ग्राम, मिश्री 10 ग्राम, लौंग और छोटी इलायची 3-3 नग को खूब बारीक पीसकर शीशी में सुरक्षित रखें । इस सुरमें को प्रतिदिन रात्रि में लगाकर सो जाने से नेत्रों का दर्द, सूजन, लालिमा, धुन्ध और जाला इत्यादि नेत्र विकार नष्ट होकर मात्र 1 पखवाडे के नित्य प्रयोग से नेत्रों की ज्योति दुगुनी हो जाती है।&nbsp;</li><li>नीम के तैल का दीपक जलाने से दीपक पर पतंगे नहीं आते का मुँह ढक दें ताकि भाप न निकल सके । फिर 3-4 घन्टे के बाद इसे काम • छायाशुष्क नीम के पत्ते किसी बरतन में जलावें । जल जाने पर बरतन में लें)। यह नीम पत्ती की भस्म हुई। इसे 5-6 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन ताजा पानी से सेवन करने से गर्दा और मत्राशय की पथरी कट-कट कर निकल जाती है। शान्त हो जाती है तथा गर्मी के मौसम में अधिक प्यास भी नहीं लगती है।&nbsp;</li><li>नीम की पत्तियों के रस में मिश्री मिलाकर पीने से बदन की समस्त गर्मी शांत हो जाती है तथा गर्मी के मौसम में अधिक प्यास भी नहीं लगती है।</li><li>नीम की कोमल सींकें काली मिर्च के साथ मिश्री डालकर पीसकर पीने से प्यास की भड़की (अधिकता) मिट जाती है।</li><li>प्लेग रोग में गिल्टियों पर मिट्टी का तेल रुई की फुरैरी से लगायें तथा 11 नीम की सींकें और 5-7 नग काली मिर्च 50 ग्राम गुलाब अर्क में पीसकर प्रत्येक दो घन्टे पर देना सर्वोत्तम एवं लाभकारी है अथवा नीम के पत्ते और काली मिर्च पीसकर सेवन करायें। इससे भी प्लेग नष्ट हो जाता है।</li><li>नीम का तैल गोदुग्ध में मिलाकर पीने से श्वेत प्रदर रोग नष्ट हो जाता है नीम की छाल के रस में सफेद जीरा मिलाकर पीना भी श्वेत प्रदर (ल्यूकोरिया) नाशक है ।</li><li>पुरुषों के प्रमेह रोग में नीम की छाल का काढ़ा प्रतिदिन प्रात: काल में पीना लाभकारी है नीम पत्ती के रस में मिश्री मिलाकर पीना भी प्रमेह नाशक है। अथवा महानिम्ब (बकायन) के बीजों को चावलों के साथ पीसकर घी में मिलाकर चाटें। यह योग सर्वोत्तम प्रमेह नाशक है ।</li><li>नीम की पत्तियों को हल्की आंच में तपाकर रस निकालकर सीना और बगलों में हल्के हाथ से मालिश करने से पसली चलना (हब्बा-डब्बा) रोग मिटता है।&nbsp;</li><li>नीम के पत्तों का रस गुनगुना करके प्रसव कष्ट के समय जच्चा को पिला देने से गर्भाशय में संकुचन होकर प्रसव जल्द और बिना कष्ट के हो जाता है अथवा नीम की छोटी सी जड़ लेकर गर्भिणी की कमर के साथ बाँध दें, यह योग भी लाभकारी है ।</li></ul><p><strong>नोट- प्रसव हो जाने पर इस जड़ को खोलकर अवश्य फेंक दें।</strong></p><ul><li>नीम की छाल का उबाला हुआ पानी प्रसूता (जच्चा) को एक सप्ताह तक देते रहने से इसे प्यास नहीं सताती है तथा स्वास्थ्य उत्तम रहता है और स्तनों में शिशुपान हेतु दूध भी पौष्टिक बनता है।</li><li>पक्षाघात में नीम बीजों के तैल की निरन्तर मालिश करना अचूक एवं शर्तिया लाभकारी उपचार है । जितना अधिक तैल त्वचा में पहुँचेगा उतने ही शीघ्र रक्त संचार में प्रवाह उत्पन्न होकर चैतन्यता आ जाएगी।</li><li>नीम की पत्तियाँ पीसकर पानी और शक्कर मिलाकर एक छोटा गिलास भर कर गरम करके सेवन करने से पीलिया रोग नष्ट हो जाता है ।</li></ul><p><strong>पुराने बुखार में—</strong> नीम की पत्तियाँ और काली मिर्च (21-21) लेकर पोटली में बाँधकर आधा किलो पानी में डालकर खौलायें, जब खौलने लगे तब ढक्कन से ढक दें। इसे ठण्डा होने पर सुबह-शाम 125-125 ग्राम पीने से पुराना बुखार हड्डियों से निकल जाता है। मात्र दो दिन में ही असर दिखलाता है।</p><p><strong>पुराने असाध्य घावों में—</strong> नीम के पत्ते और छाल के काढ़े से घाव को धोयें और टकोर (संक) करें तत्पश्चात् नीम की छाल के अन्दरूनी हिस्से को सिल पर रगड़ कर घाव पर लेप कर दें। इस प्रयोग के निरन्तर करते रहने से असाध्य घाव भी ठीक हो जाते हैं।</p><ul><li>नीम की छाल का अन्दर वाला छिलका तवे पर भूनकर (राख बनाकर) 10 ग्राम की मात्रा में दही के साथ सेवन करने से पेचिश जल्द ही ठीक हो जाती है।</li><li>नीम पत्ती के रस में शहद मिलाकर चाटने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं । अथवा नीम का &#8216;तैल 8-10 बूँद (बच्चों को 5 बूँद) चाय के कप में डालकर पीने से भी पेट के कीड़े मर जाते हैंया नीम की पत्तियां 5 ग्राम लेकर जरा सी <a
href="/hing-ke-fayde-in-hindi/">हींग</a> के साथ पीस कर चाटें। इस प्रयोग मे भी उदर कृमि नष्ट हो जाते हैं।</li><li>नीम की पत्तियों वाली हरी सींकों को 50 ग्राम वजन में लेकर इनका रस निकालकर 100 ग्राम उन्नाव का शर्बत में मिलाकर पीने से पेशाब में जलन और रुकावट दूर हो जाती हैं।</li><li>नीम की छाल और खैरसार 10-10 ग्राम गाय के मूत्र में पीसकर 5 ग्राम शहद मिला कर निरन्तर सेवन करते रहने से फील पांव, (हाथी पांव) का रोग ठीक हो जाता है। इस प्रयोग के साथ में आक्रान्त पैर पर नीम तैल की करें अथवा पोटली में हल्दी का चूरा बांधकर प्रतिदिम नीम के तैल में डुबोकर टकोर . खूब मालिश (संक) करें तथा आक्रान्त पैर को शरीर से ऊँचा रखकर रात्रि में सोने की आदत डालें ताकि रक्त आसानी से पलटने लगे।</li><li>साधारण फोड़े-फुन्सियों में नीम की छाल घिसकर लगाना उपयोगी है। • अधिक फुन्सियाँ निकलने पर नीम पत्तियों का रस पीना लाभकारी है।&nbsp;</li></ul><p>इस प्रयोग से रक्त शुद्ध हो जाता है।</p><ul><li>&nbsp;नीम, सेम, भांगरा का रस 50-50 ग्राम, बबूल और मेंहदी के पत्तों का रस 75-75 ग्राम में सरसों का तैल 500 ग्राम और 1 किलो पानी को धीमी आग पर इतना पकायें की पानी जल जाये। मोम डालकर मरहम बनाकर सुरक्षित रखलें । यह मरहम इतना अधिक प्रभावशाली असरकारक) है कि साधारण फोड़े-फुन्सियाँ तोक्या जड़ों वाले फोड़ा को भी सुखा डलता है।</li><li>नीम की तोड़ी (मद) या गोंद प्रतिदिन थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पुरुष के सेवन करने से दो महीनों में उसकी बच्चा उत्पन्न करने की शक्ति कम होने लगती है।<br></li></ul><p><strong>(नोट</strong><strong>—</strong><strong>इस प्रयोग से पुरुष नपुंसक कदापि नहीं होता है, कामेच्छा में कमी होती है) तथा नीम रस का अथवा गोंद (मद) ताड़ी का सेवन छोड़कर नीम तैल का सेवन प्रारम्भ कर देने से शरीर में शीतलता का स्थान उष्णता लेकर सैक्स पावर बढ़ा देती है।)</strong></p><ul><li>10 ग्राम नीम रस, पिसी हींग और हल्दी 3-3 ग्राम लेकर 10 ग्राम पानी में काढ़ा बनायें । तत्पश्चात् इसमें सरसों का तैल 10 ग्राम डालकर इतना गरम करलें कि पानी जल जाए तदुपरान्त इसमें अफीम और कपूर 1-1 ग्राम डालकर सुरक्षित रखलें । बच्चों के कान बहने के रोग में यह तैल 2-2 बूंद कान साफ करके डालना अत्यधिक उपयोगी है । इस तैल के प्रयोग से कान के समस्त प्रकार के विकार नष्ट हो जाते हैं।</li><li>हाई ब्लड प्रैशर में प्रारम्भ में नीम पत्ती का रस प्रतिदिन 25 ग्राम पीते रहें एक सप्ताह के बाद दो दिन बीच में छोड़कर 1 सप्ताह तक पियें तथा लो ब्लड प्रैशर में नीम तैल को पियें तथा शरीर पर मलें। अति उपयोगी घरेलू योग है।</li><li>बलगमी खांसी में नीम पत्ती, सूखी भांग, कच्चे चने सूखे चने रात को पानी में भिगोकर कच्चे चने बना लें) अडुसा और सांभर नमक प्रत्येक 50-50 ग्राम की मात्रा में लेकर पीसकर (आलू की टिक्की) की भांति मिट्टी के (दिये) दो ढक्कनों के बीच रखकर गीली मिट्टी से मुंह बन्द कर (जोड़कर) 5 किलो उपलों के बीच में रखकर तपने दें। ठण्डा होने पर ढक्कन अलग कर इस औषधि (भस्म) को एक साफ स्वच्छ शीशी में सुरक्षित रखलें। आधा ग्राम यह औषधि 1 चम्मच शहद में घोलकर चाटें।</li></ul><p><strong>नोट—इस प्रयोग से यदि सीने में जलन हो तो इसकी दूसरी खुराकें आधा ग्राम से कम करलें ।) बलगम छंटकर सीना साफ और स्वच्छ हो जाएगा ।</strong></p><p><strong>बबासीर में—</strong>नीम की अन्दर वाली छाल तीन ग्राम और गुड़ 5 ग्राम को पीसकर प्रतिदिन (रोग के समूल नष्ट होने तक) सेवन करें । खूनी बबासीर में 3- 4 निबौली प्रतिदिन पानी में मलकर खाना भी अत्यधिक लाभप्रद है। मूली के रस में निबौली का गूदा सेवन करना भी उपयोगी है। नीम तैल प्रतिदिन 5 बूंद पीना तथा मस्सों पर लगाना भी बबासीर का शर्तिया उपचार है ।</p><ul><li>100 ग्राम नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर ठण्डा करके सिर धोने से (मात्र 1 सप्ताह के प्रयोग से) बाल झड़ना बन्द हो जाते हैं नीम और बेर की पत्तियों को उबालकर सिर में लेप करने से बाल झड़ना बन्द होकर नये बाल उग आते हैं। नीम पत्तियों को उबालकर सिर धोने से सफेद बाल काले हो जात है। 1 माह के निरन्तर प्रयोग से लाभ स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगेगा।</li><li>बिच्छू दंश में नीम के पत्ते मसलकर काटे हुए स्थान पर कुछ देर तक मलने से डंक गलकर बिच्छू का विष शान्त पड़ जाता है। नीम की छाल अथवा नीम की सूखी पत्तियां या निबौलियों को चिलम में भरकर कश खींचने से भी बिच्छू दंश का विष उतर जाता है। यह सभी अचूक उपचार में है।</li></ul><p><strong>भगन्दर में—</strong> आधा किलो नीम रस और 250 ग्राम बूरा की हल्की आग पर गाढ़ी (करछुली अथवा कलुछी चिपकने लगे ऐसी) चाशनी बनाकर चित्रक, हल्दी प्रत्येक 10-10 ग्राम, नागरमोथा, काला जीरा, अजवायन, निर्गुन्डी बीज, पीपल, सौंठ, काली मिर्च, दन्ती मूल, नीम और बाबची के बीज, अनन्त मूल और वायविंडग प्रत्येक 25-25 ग्राम पीस छानकर चाशनी में मिलाकर सुरक्षित रखलेंइसे 10-10 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह-शाम खाने से भगन्दर शर्तिया नष्ट हो जाता है।</p><ul><li>बर्र के काटने पर भी नीम की पत्तियां पीसकर रगड़ना अत्यधिक उपयोगी है, जहाँ इसके छत्ते लगे हों वहाँ नीम के सूखे पत्ते, सींकें, निबोलियों का ढेर लगाकर आग लगादें । इस धूनी के प्रभाव से भिड़ें (बर्र) ही भाग जायेंगी ।</li><li>नीम के 50 ग्राम पत्तों में 5-5 काली मिर्च पीसकर सौ ग्राम पानी में छानकर पीने से मलेरिया बुखार मिट जाता है ।</li><li>मन्दाग्नि में पकी हुई 10 निबोलियां प्रतिदिन खाने से भूख बढ़ जाती है तथा रक्त भी साफ और शुद्ध हो जाता है अथवा 10 ग्राम नीम रस में अदरक, पुदीना, अजवायन, जीरा 5-5 ग्राम घोट पीसकर पांचो नमक मिलाकर पीने से जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है और अजीपण दूर होकर रोगी स्वस्थ हो जाता है ।</li><li>मधुमक्खी के डंक मारने पर नीम की पत्तियां रगड़ें। यदि छत्ते में लगी मधुमक्खियों ने सामूहिक रूप से आक्रमण कर काटा हो तो नीम की पत्तियां, काली मिर्च और सैंधानमक साथ-साथ पीसकर गोघृत में मिलाकर चाटना अतीव गुणकारी है। यदि रोगी अधिक बेचैन हो तो यह नीम की पत्तियाँ मुँह बन्द करके चबायें।</li><li>नीम की गन्ध और रस विष को शर्तिया ठण्डा कर देता है ।</li><li>मधुमेह में नीम की छाल का काढ़ा पीना और करेला की भुर्जी का नाश्ता करना उपयोगी है । कुल्ला और गरारे करने से मसूढ़ों की टीसें और दाँतों का दर्द शर्तिया मिट जाती है.</li><li>नीम के फल. निबौली, पत्ते, जड़ और डन्ठल का काढ़ा तैयार करके व ने से मसूढ़ों की टीसें और दाँतों का दर्द शर्तिया मिट जाता है ।&nbsp;</li><li>&nbsp;नीम के पत्ते गरम करके स्त्रियों के नाभि के नीचे बाँधने से मासिकधर्म में होने वाला दर्द और कमरदर्द इत्यादि विकार नष्ट हो जाते हैं।</li><li>नीम की 5-7 पत्तियाँ अदरक के रस में पीसकर पीने से और नीम की पत्तियाँ गर्म करके नाभि के नीचे बाँधने से स्त्रियों का बन्द मासिकधर्म खुलकर आ जाता है । या 20 ग्राम नीम की छाल, सौंठ और गुड़ 5-5 ग्राम का काढ़ा बनाकर पीने से भी मासिकधर्म की रुकावट दूर होती है।</li><li>यदि किसी स्त्री के मासिकधर्म का स्राव न रुक रहा हो तो बकायन (महानीम) की कोपलों का रस पिलायें । अतीव गुणकारी एवं उपयोगी घरेलू उपचार है।&nbsp;</li><li>बकायन के पत्तों का काढ़ा पिलाने से मिर्गी की मूर्च्छा दूर हो जाती है।</li><li>नीम की पत्तियाँ सरसों के तैल में गरम करके, चुटकी भर हल्दी डालकर इसे किसी कपड़े में बांधकर पुल्टिस की भांति मोच से आक्रान्त भाग पर टकोर (सेंक) करने से मोच व सूजन, दर्द तथा त्वचा की अन्य टूट-फूट मिट जाती है।</li><li>निबौली को सुरमें की भांति पीसकर दो सलाई प्रतिदिन आँखों में लगाने से मोतियबिन्दु का जाला अपने आप (बिना आप्रेशन के) कटकर निकल जाता है।&nbsp;</li><li>मीठे आम अथवा किसी भी एरन्ड के बीज और नीम की पत्तियाँ चबाने से मुख की बदबू दूर हो जाती है।&nbsp;</li><li>निबौली, एरन्ड के बीज और नीम की पत्तियाँ 50-50 ग्राम लें । एरन्ड के बीजों और निबौलियों का गूदा निकालकर पत्तियों के रस में मिलाकर योनि पर लेप करने से योनि के समस्त विकार नष्ट हो जाते हैं ।</li><li>प्रसवोपरान्त योनि-द्वार के किनारे कट-फट जाते हैं, यह योनि विदीर्णता कहलाता है इसमें नीम पत्तों का उबाला हुआ पानी (हल्का गरम रह जाने पर) (दिन में तीन बार) योनि को धोना उपयोगी हैइस प्रयोग से योनि में टांके लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी और नई त्वचा कटावों को स्वयं जोड़ देगी।</li><li>रक्तपित्त में खून में उबाल आने (गर्मी होने से) विभिन्न प्रकार के त्वचा रोग उत्पन्न हो जाते हैं इस हेतु नीम पत्तियों का रस 1 डेढ़ चम्मच पीना अत्यन्त उपयोगी हैत्वचा को अन्दर की गर्मी से बचाने हेतु नीम पत्तियां डालकर पानी गरम करके फिर ठण्डे पानी से स्नान करना परम लाभकारी है ।</li><li>रक्त विकारों में रक्त शुद्ध करने हेतु नीम की टक्कर किसी से नहीं है। यह सर्वोत्तम रक्त शोधक है। इस हेतु नीम छाल का काढ़ा सेवन करना अथवा छाल को को पीसकर चूर्ण बनाकर सेवन करना अथवा बहार की ऋतु में नाजुक कोमल कोपलें 20-25 तोड़कर 5-7 काली मिर्च सहित पीसकर इस पिट्ठी को बेसन छाल की रोटी में पकाकर घी से खूब भली-भांति तर करके एक सप्ताह तक खावें ।</li><li>रतौंधी में दूधिया (कच्ची) 3-4 निबौली फोड़कर उसमें सलाई घुमाकर आँखों में आँजने से पतली के समस्त आवरण हट जाते हैं और दृष्टि गोलक ज्योति से भरने लगते हैं अथवा नीम तैल आँखों में आँजने से भी रात को सामान्य रूप से दिखलाई देने लगता है ।</li><li>नीम वृक्ष की मोटे तने का टुकड़ा काटकर पानी में घिसकर मोटा-मोटा रसौली के ऊपर लेप (लगातार महीना दो महीना) चढ़ाते रहने से रसौली सिमट कर त्वचा का अस्वाभाविक फुलाव को समतल होता है।</li><li>लिंग में घाव होने पर नीम के पत्ते घिसकर टिकिया बनाकर तवे पर सेंक कर (आलू की टिक्की की भाँति) खा जायेंलिंग के घाव भरने में उपयोगी है। वातरोग में 5 निबौलियां प्रतिदिन खाने से वात रोग नष्ट हो जाते हैं।</li><li>नीम की पत्तियाँ और काली मिर्च सैंधा नमक मिलाकर शहद और गोघृत में घोलकर चाटने से विषैलापन मिटता है। यह प्रयोग शरीर को आरोग्यता प्रदान करने वाला श्रेष्ठ उपचार है ।</li><li><a
href="https://hindipath.com/shighrapatan-ka-ilaj/">वीर्यपतन</a> में 20 ग्राम नीम की पत्तियां 50 ग्राम घी में भूनकर जला दें। यह घी वीर्य की कमी की पूर्ति कर देता है तथा कामवासना को भी शान्त रखेगा।</li><li>यदि दुर्भाग्य से किसी माँ को दुग्धपान करने वाला शिशु स्वर्ग सिधार जाए तो स्तनों से दूध निकलकर वस्त्रों को खराब करता है तथा मृत शिशु की याद नहीं भूलने देता है । इस हेतु निबौलियों की गिरी पीसकर स्तनों पर लेप करने से दूध अपने आप सूखने लगता है ।</li><li>नीम की पत्तियाँ खिलाने से सर्प विष तो शान्त होता ही है, यह भी परीक्षण हो जाता है कि विष चढ़ा भी है अथवा नहीं ।</li></ul><p><strong>नोट- नीम की पत्तियां विष का प्रभाव होने अथवा रहने तक कड़वी नहीं लगती हैं। आयुर्वेद क अनुसार यदि कोई व्यक्ति 5-7 नीम की पत्तियां प्रतिदिन चबाता रहे तो वह &#8220;नील कण्ठ&#8221; हो जाता है। ऐसे व्यक्ति को यदि सांप काट ले तो उल्टा सांप ही अपनी जान से हाथ धो बैठेगा</strong>।&nbsp;</p><ul><li>नीम पत्तों का अधिक मात्रा में काढ़ा तैयार कर किसी खुले बड़े चौड़े बरतन में रोगी को नंगा बैठाने की क्रिया करने से सुजाक मिट जाता है।&nbsp;</li><li>&nbsp;नीम का पंचांग पीसकर मेंहदी की भाँति हाथों की हथेलियों और पैरों के तलुवों में लगाने से दह (जलन अथवा निकलना) दूर हो जाता है&nbsp;</li><li>महानीम (बकायन) की सींकें, लौंग, बड़ी इलायची 5-5 लेकर 50 ग्राम पानी में थोड़ा तपाकर (यह 1 मात्रा है) प्रत्येक 2-2 घंटे बाद सेवन कराने से हैजा खड़ा होता है। रोगी की शारीरिक ऐंठन एवं अन्य कष्टों से निजात हेतु नीम तैल की मालिश कर दें। यदि रोगी का पेशाब बन्द हो तो नीम के फूल पानी में पीसकर पेड़ पर लेप कर दें। अवश्य लाभ होगा।</li><li>हृदय रोगों में नीम बीजों का चूर्ण आधा-आधा ग्राम की मात्रा में सेवन करना लाभप्रद है। नोट—अधिक मात्रा में सेवन करने से नशा चढ़ जाता है।&nbsp;</li><li>चेचक निकलने पर रोगी के बिस्तर पर नीम पत्तियाँ सुबह-शाम बिछायें तथा बदलते रहें और दरवाजों और खिड़कियों पर भी इसी प्रकार वन्दनवार की भांति नीम पत्ते बांधे और ताजे बदलते रहें। रोगी को मुनक्के का उबाला हुआ पानी पिलायें और यही (उबला हुआ मुनक्का खिलायें।</li><li>चेचक में असहनीय जलन होने पर नीम की पत्तियां घोट छान कर से बिलोकर (जब झाग बनने लगें तो) यही झाग रोगी के बदन पर मलें नीम को कोपलों को पीसकर चेचक के फफोलों पर पतला-पतला (गाढ़ा हर्गिज नहीं) लेप करना भी उपयोगी है इस प्रयोग से चेचक के दानों (फफोलों में) आग कम हो जाती है।</li><li>चेचक के रोगी को ठण्डा पानी कदापि न दें। नीम की छाल जलायें और जल भरी कटोरी छाल के अंगारे में बुझाकर यही पानी पिलायें । मुनक्के डालकर उबाला हुआ जल भी अन्दर की गर्मी निकालने में सहायक है। नीम की पत्तियां डालकर उबाला हुआ पानी भी उत्तम है क्योंकि इसके सेवन से प्यास भी बुझ जाती है और बुखार भी भागता है (चेचक के बुखार को उतारने की कोशिश न करें क्योंकि इसी के कारण चेचक के दानें बाहर फूटते हैं, यदि यह शरीर में अन्दर ही रह जाऐं तो जीवन में कभी भी इसका बुरा फल खसरा या चेचक के पूर्णरूपेण बाहर न निकलने पर) क्रानिक ब्रोकाइटिस के रूप में भागना पड़ सकता है । इसलिए चेचक जितनी अधिक और जल्दी बाहर निकल आये, उतना ही अच्छा होता है।</li><li>नीम की पत्तियों का रस गुनगुना करके सुबह, दोपहर, शाम पिलाते रहने से चेचक के दाने खुलकर निकलने में मदद मिलती है ।</li><li>चेचक के दाने सूख जाने पर नीम पत्तियों को पानी में उबालकर, करके रोगी को स्नान करायें तथा नीम पत्तियों में तपाकर छाना हुआ सरसों आदि का तैल रोगी के बदन पर लगायें।</li><li>चेचक का उबाल शान्त पड़ते ही नीम का तैल गढ़ो वाली त्वचा पर लगाना प्रारम्भ कर दें । इससे नयी-पुरानी त्वचा इकसार, इकरंग और समतल होने लगती है। रोगी के सिर पर भी नीम का तेल लगायें ताकि उसके बाल न झड़ें। यदि झड़ रहे हों तो रुक जायें।&nbsp;</li></ul><h2 class="wp-block-heading">यह भी पढ़ें</h2><p>● <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=26891</guid><description><![CDATA[<p>लहसुन खाने के फायदे (Benefits Of Eating Garlic in Hindi) बहुत से हैं क्यूंकि लहसुन एक ऐसा खाद्य पदार्थ है</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>लहसुन खाने के फायदे (Benefits Of Eating Garlic in Hindi) बहुत से हैं क्यूंकि लहसुन एक ऐसा खाद्य पदार्थ है जो अपने स्वाद और स्वास्थ्य लाभों के लिए जाना जाता है। लहसुन में कई पोषक तत्व होते हैं, जिनमें विटामिन सी, विटामिन बी6, मैंगनीज, और सेलेनियम शामिल हैं। लहसुन में एंटीऑक्सीडेंट, एंटीमाइक्रोबियल, और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण भी होते हैं।</p><p>आयुर्वेद के अनुसार लहसुन शरीर को गर्म रखने वाला कफ, गैस, अपच, बदहज्मी दूर करने वाला, जोड़ों के दर्द और लकवा में लाभ पहुँचाने वाला और हृदय रोगों को रोकने वाला हैलहसुन में एन्टी बैक्टीरियल स्क्रेलिन होता है।&nbsp; जिसके फलस्वरूप लहसुन को रगड़कर घाव पर लगा देने से घाव का विष नष्ट होकर उसके जल्द भरने में मदद मिलती है। दाद, खाज, खुजली में लहसुन या इसके पत्तों को पीसकर लगाना इसी कारण लाभप्रद होता है यदि फोड़ा दुख रहा हो तो लहसुन को पीसकर बाँधने से फोड़ा पककर फूटकर आराम मिल जाता है। आइए, इस लेख में देखते हैं कि लहसुन खाने के फायदे क्या-क्या हैं।</p><h3 class="wp-block-heading">लहसुन के फायदे जानें &#8211; Lahsun Ke Fayde</h3><ul><li>आयुर्वेद शास्त्रानुसार लहसुन की जड़ में चटपटा, पत्तों में कड़वा, नाल में कसैला, नाल के अगले भाग में नमकीन तथा बीजों में मीठा रस रहता है।&nbsp;</li><li>लहसुन कामशक्तिबर्धक, वीर्यवर्धक, तर-गरम और पाचक कब्ज निवारक, तेज और मीठा हैटूटी हड्डियों को जोड़ने वाला, गले को लाभप्रद, रक्तबर्धक, शरीर की रंगत को चमकाने वाला, बुद्धिबर्धक, बुढ़ापानाशक, बलगमी और रियाही रोगों को जड़-मूल से नष्ट करने वाला, दिल को ताकत देने वाला, बदहज्मी, बुखार और पसलियों के दर्द को दूर करने वाला, स्थायी कब्ज को नष्ट करने वाला, वायुगोला नाशक, क्षुधाबर्धक, खाँसी, सूजन, बबासीर और कोढ़ नाशक, उदर कृमि नाशक, उदर गैस नाशक, बलगम को शरीर से निष्कासित करने वाला है। लहसुन के अन्दर न्यूमोनिया तो क्या, तपेदिक तक को नष्ट करने की शक्ति विद्यमान है।</li><li>&nbsp;दाढ़, दाँत दर्द में लहसुन रस को गरम करके इसका फाहा लगाने से तुरन्त आराम होता है।</li><li>कान और नाक के दर्द में लहसुन रस को सरसों के तैल में मिलाकर गुनगुना करके डालना अत्यधिक लाभप्रद है। हैं न लहसुन खाने के फायदे अनेक?</li><li>लहसुन का रस भैंस के दूध के साथ सेवन करने से भूख बढ़ जाती है तथा गठिया और टी. बी. के रोगी के लिए तो अत्यन्त लाभप्रद और शक्तिबर्धक है।</li><li>कीड़ों मकोड़ों के काटने या डंक मारने पर लहसुन का रस लगाने से जलन नष्ट हो जाती है।</li><li>गरीबों के लिए सबसे अधिक सस्ता एन्टीबायोटिक और हानि रहित औषध मात्र लहसुन है। यह पैर के अँगूठे से सिर के बाल तक शरीर के प्रत्येक भाग व अवयवों पर अपना रोगनाशक व स्वास्थ्य रक्षक प्रभाव डालता है। जिन लोगों को दिल का एकाध दौरा पड़ चुका हो, वे यदि लहसुन इस्तेमाल न करते हों तो तुरन्त ही लहसुन का इस्तेमाल प्रारम्भ कर निश्चिन्त हो जायें।</li></ul><p><strong>नोट—</strong>आमतौर पर लोग नासमझी में लहसुन को गर्म प्रकृति होने के कारण गर्मी की ऋतु में इस्तेमाल बन्द अथवा कम कर देते हैं, जबकि गेहूँ एवं दालें भी तो गरम प्रकृति की हैं इनका सेवन क्यों करते हैं ? जबकि सत्यता यह है कि जीवन को सुरक्षित रखने हेतु एक विशेष श्रेणी तक गर्मी पाना अति आवश्यक है। गेहूं या दालों की भांति लहसुन की गर्मी भी कोई हानि नहीं पहुँचाती है। लहसुन का सही और पूर्णरूपेण लाभ इसे कच्चा खाकर ही उठाया जा सकता है। प्रातःकाल निहार मुँह लहसुन की 1 कली (जवा) चबाकर पानी के साथ खायें धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ाते जायें बच्चों को भी इसका रस दिया जा सकता है। चाहें तो इसमें शहद मिलालें। बच्चों के लिए खाँसी विशेष रूप से काली खाँसी में लहसुन का अर्क और शहद एक अति उत्तम योग है। रक्त की कमी हेतु तो यह सभी टानिकों का बाप है। लहसुन शरीर के कोले स्टेरोल स्तर को कम करती है मेनिजाईटिस (मस्तिष्कावरण शोथ) में दिल की बीमारी में वृद्धावस्था के रोगों में स्त्रियों के मासिक धर्म सम्बन्धी विकारों में तथा मधुमेह में लाभप्रद है। यह उच्च रक्तचाप घटाकर रखत में बढ़ी हुई शर्करा को कम करता है तथा हृदय की कोशिकाओं को नरम (मुलायम) बनाये रखता है। लहसुन एक्टीबायोटिक गुणों के अतिरिक्त आँतों के लिए एन्टीसैप्टिक भी है। लहसुन कई प्रकार की कैन्सर की रसूलियों को ठीक करने की क्षमता रखता है।&nbsp;</p><p><strong>यह भी पढ़ें &#8211;</strong> <a
href="/kali-mirch-ke-fayde-in-hindi/">काली मिर्च के फायदे</a></p><ul><li>लहसुन के अन्दर रोम-छिद्रों के द्वारा शरीर में शोषित होने का गुण विद्यमान है। अत: न्यूमोनिया में इसका प्रयोग छाती पर बतौर पुल्टिस के करने से लाभ होता है न्यूमोनिया में बच्चों को लहसुन की चन्द कलियाँ छीलकर धागे में पिरोकर हार की भाँति गले में पहनाना लाभप्रद है।</li><li>गाय के 100 ग्राम घी में लहसुन की तीन कलियाँ जलाऐं, जब खूब जल जाऐं तो लहसुन को निकालकर फेंक दें तथा घी को शीशी में सुरक्षित रखलें। आवश्यकता के समय कानों में 2-3 बूंदें डालें। इस योग से कान का दर्द तुरन्त मिट जाता है, कान से पीप बहना भी रुक जाता है। परीक्षित योग है।</li><li>पेट के कीड़ों को मारने हेतु लहसुन रामबाण का कार्य करता है। लहसुन को मुनक्का या शहद के साथ दिन में तीन बार प्रयोग करें। (लहसुन की 5 कलियां (जवा) छीलकर छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर 15-20 मुनक्का के दानों अथवा शहद के साथ खायें।</li></ul><p><strong>नोट &#8211; इसी योग को यदि बिना नागा 2-3 मास सेवन कर लिया जाए तो सेवनकर्ता अपने सुधरे हुए स्वास्थ्य को देखकर दंग रह जाएगा।</strong></p><ul><li>लहसुन रस की 20-25 बंदें बाल्टी भर पानी में डालकर स्नान करने से बुढ़ापा आने पर शरीर के अन्दर की मृत कोशिकाओं की दुर्गन्ध दबकर रोग पास नहीं आते हैं तथा आहार में लहसुन की चटनी के प्रयोग से रक्त संचार में तीव्रता आकर नवीन कोशिकाओं का निर्माण हो जाता है रात्रि में 250 ग्राम में लहसुन की 5 कलियाँ छोटी-छोटी काटकर, धीमी-धीमी आग पर उबालकर इसमें मिश्री मिलाकर पीने से दुर्बलता, गठिया, जोड़ों के दर्द एवं कम्पन जैसे वृद्धावस्था के रोग नष्ट होकर शरीर में पुनः नये सिरे से बल का विकास होने लग जाता है।</li><li>शरीर सूखा-सूखा सा हो जाए तो लहसुन का मुरब्बा सेवन करें 1 किलोग्राम की मात्रा में 1 पोथिया लहसुन छीलकर धूप में सुखा लें पानी नहीं रहे, अन्यथा मुरब्बा खराब हो जाएगा। तदुपरान्त कांच के मर्तवान में डालकर ऊपर से इतना शहद डालें कि समस्त कलियाँ डूब जायें फिर 10-12 दिनों तक इसे धूप में रखेंयही लहसुन का मुरब्बा है। नित्य प्रति 1 कली को दुग्ध के साथ चबायें सूखे शरीर पर यौवन रूपी पुनः बहार आ जाएगी।</li><li>लहसुन की 5 कलियाँ (जवा) छीलकर 50 मि.ग्रा. जल में पीसलें इसके बाद इसे छानकर 10 ग्राम शहद घोलकर पीने से पूलित रोग (सिर के बालों का पकना) नष्ट हो जाता है। यह योग बालों को काला रखता है तथा अत्यन्त शक्तिवर्धक पौष्टिक रसायन है।</li><li>लहसुन के 5 जवे छीलकर नित्य प्रति (जाड़ों में) चबाने से तथा साथ में घी, मक्खन, दही, दूध पीने से ढाई, 3 महीनों में ही खून की कमी नष्ट होकर शरीर की रंगत काबुली पठान की तरह लाल सुर्ख हो जाएगीदूध में लहसुन को खीर की भाँति पकाकर खायें तथा घी, दही, मक्खन में लहसुन का रस मिलाकर चाटें।</li></ul><p><strong>यह भी पढ़ें &#8211;</strong> <a
href="/dalchini-ke-fayde-in-hindi/">दालचीनी के फायदे</a></p><p><strong>नोट- लहसुन के साथ दूसरे पदार्थ चौगुनी मात्रा में सेवन करें।</strong></p><p><strong>लहसुन की खीर- </strong>लहसुन की छिली और सूखी गिरियों का चूर्ण 160 ग्राम, गाय का दूध 850 ग्राम और पानी 800 ग्राम मिलाकर पकालें। जब पानी बार में इस खीर को खाने से गुल्म रोग ठीक हो जाता है। गुल्म के साथ-साथ सूख जाए और मात्र दूध शेष रहे तब ठण्डा कर लें। सुबह से रात तक 5-6 उदावर्त नामक रोग, गृधसी, वायु, विषम ज्वर, जिगर के रोग विद्रधि और सूजन इत्यादि में भी यह खीर अत्यधिक लाभप्रद है।</p><p><strong>दन्त रोग</strong> मसूढ़ों में सूजन, दर्द, दुर्गन्ध और रक्तस्राव में— सुबह-शाम 1 तोला शहद में 15-20 बूँदें लहसुन का रस भली प्रकार मिलाकर चाटें तथा साथ ही 60 ग्राम सरसों के तैल में छिली हुई लहसुन की गिरियों की पीठी डालकर पकायें। जब लहसुन जल जाए तो तेल को कपड़े से छानकर इसमें 20 ग्राम अजवायन को जलाकर तैयार की हुई भस्म और 10 ग्राम बारीक पिसा हुआ सैंधा नमक मिलाकर प्रतिदिन सुबह-शाम दाँतों पर मंजन की भांति मलने से पायोरिया के कीड़े, सूजन, दुर्गन्ध, दर्द, खून व पीप गिरना बन्द हो जाता है। लगातार दो मास तक उपरोक्त दोनो प्रयोगों के करने से उक्त रोग जड़ से नष्ट हो जाते हैं।</p><p><strong>यह भी पढ़ें &#8211;</strong> <a
href="/anda-khane-ke-fayde/">अंडे खाने के फायदे</a></p><p><strong>रक्तचाप</strong> (ब्लड प्रेशर) की बीमारी में छिली हुई लहसुन की गिरी की पीठी 10 ग्राम, 250 ग्राम बकरी के दूध में मिलाकर तथा 10 ग्राम शहद से मीठा करके पीना लाभप्रद है दौरा खत्म होने पर लहसुन की पीठी को (आठ आने भर की खुराक में) लेकर इतने ही दूध और शहद के साथ जलपान के रूप में सेवन करते रहना चाहिए।</p><ul><li>यदि जीभ का रसज्ञान लुप्त हो जाए अर्थात् स्वाद मर जाए तो लहसुन की छिली कली मुख में रखकर खूब चबाऐं और जब लुगदी सी बन जाए तो जीभ पर रखकर मुख में खूब घुमायें तत्पश्चात् निगल जायें (इसी प्रकार तीन कलियाँ चबाकर निगलें) तदुपरान्त अपनी इच्छानुसार थोड़ा-बहुत पानी पी लें।</li><li>अत्यधिक धूम्रपान करने से अथवा भांग आदि का नशा करने वाले (नशेड़ियों) में घ्राणशक्ति का हास हो जाता है अर्थात् उनके सूंघने की शक्ति कम हो जाती है उन्हें अच्छी बुरी गन्ध नहीं आती है। ऐसी स्थिति में लहसुन का रस सूँघना लाभप्रद है एक बूंद लहसुन रस में दो बूंद पानी मिलाकर नथुनों में टपकाने से तुरन्त लाभ होता है। इस प्रयोग से सिरदर्द भी नष्ट हो जाता है और गन्धग्राही स्नायु चैतन्य हो जाते हैं।</li></ul><p><strong>डिप्थीरिया</strong> (यह रोग बच्चों को होता है इस रोग में कण्ठ में एक झिल्ली सी पैदा हो जाती है। रोगी की बहुत जल्दी मृत्यु हो जाती है। लहसुन की एक कली मुख में रखवाकर चुसवाना लाभप्रद है। जब तक बच्चा चिकित्सक अथवा राजकीय अस्पताल न पहुँच जाए तब तक यह उपचार अवश्य करें। लाभप्रद है।&nbsp;</p><p><strong>प्लूरिसी</strong> फेफड़े के आवरण में पानी पड़ जाना तथा इसके कारण सीने में दर्द और ज्वर होना प्लुरिसी कहा जाता है। इस रोग में (फेफड़ों में रुकावट उत्पन्न होती है तथा साँस रुक-रुककर आता है। लहसुन को छीलकर सिल पर पीसकर इसकी गरम-गरम पुल्टिस छाती पर बांधना लाभकारी है।</p><ul><li>लहसुन को कूटकर कपड़े से रस छानकर दमा के रोगी को प्रत्येक 3- 3 घंटे पर (आवश्यकतानुसार अधिक मात्रा में भी दिया जा सकता है) देना लाभप्रद हैइसके सेवन से खून, बलगम खारिज होकर तथा रक्तचाप सामान्य होकर दमा के रोगी को आराम आ जाता है। यह उच्च कोटि की एन्टीसेप्टिक दवा है। पेटदर्द, पाचन विकार में भी उपयोगी है।</li></ul><p><strong>यह भी पढ़ें &#8211;</strong> <a
href="/saunf-khane-ke-fayde/">सौंफ खाने के फायदे</a></p><p><strong>नोट- कब्ज होते ही दमे का दौरा जागता है अत: कब्ज हरगिज न रहने दें दमा के रोगियों को सुरापान अत्यन्त हानिकारक है, अतः इसका सेवन न करें।</strong></p><ul><li>मिट्टी की एक ढक्कनदार हांड़ी में एकपुतिया लहसुन की छिली हुई कलियाँ डालकर व शहद में डुबोदें। फिर ढक्कन लगाकर ऊपर से कपड़ा बाँध दें। गीली मिट्टी चढ़ाकर, जमीन में गाढ़कर उसी स्थल पर चूल्हा बनाकर 40 दिनों तक सुबह-शाम खाना बनायें तदुपरान्त हाँड़ी को निकाल लें। सन्तान की चाहत रखने वाले पति-पत्नी दोनों नित्य प्रति चबाकर ऊपर से दूध पियें। नियमपूर्वक पूर्णरूपेण ब्रह्मचर्य के साथ 40 दिन तक इस योग का सेवन कर लेने से उनके प्रजनन अंगों में इतनी अधिक शक्ति भर जाती है कि मात्र 1-2 बार के सहवास (संभोग क्रिया) से ही गर्भाधान हो जाता है। इस योग के सेवन के फलस्वरूप शत-प्रतिशत पुत्ररत्न की प्राप्ति होती है तथा यह योग स्त्री के गर्भाशय की शुद्धि और गर्भ स्थापन में सहायक है।</li><li>गंजे लोग प्रतिदिन लगातार कुछ सप्ताह तक दिन में तीन बार लहसुन का रस लगाकर सूखने दिया करें अतिशय लाभकारी योग है।</li><li>घाव में कीड़े पड़ जाने पर लहसुन की 10 कली, चौथाई चम्मच नमक दोनों को पीसकर देशी घी में सेंककर घाव पर बांधते ही कीड़े मर जाते हैं तथा घाव भी शीघ्र भर जाता है।</li><li>लहसुन की छिली हुई 1 से 2 तोला तक कलियाँ गोघृत में थोड़ा पकाकर धारोष्ण गोदुग्ध के साथ नित्य सुबह-शाम सेवन करने से निःसन्देह ही नपुंसकता दूर होकर पुंसत्वशक्ति बढ़ जाती है।</li><li>लहसुन का रस तथा सरसों का तैल 20-20 तोला को किसी 1 पात्र में डालकर इतना पकायें कि तेल मात्र शेष रह जाए। इस तैल को वात पीड़ित तथा पोलियो पीड़ित अंग में नित्य मालिश करने से धीरे-धीरे वातपीड़ा और अंग शिथिलता मिट जाती है&nbsp;</li><li>जिधर आधाशीशी का दर्द होता हो, उधर की कनपटी में लहसुन को पीसकर बाँधने से आधाशीशी का दर्द मिट जाता है।</li><li>अन्तर्जिह्वा निकाला हुआ लहसुन 1 तोला, जीरा 1 माशा, अदरक 1 माशा, काली मिर्च 1 माशा की चटनी बनाकर नित्य प्रति भोजन के साथ सेवन करने से मन्दाग्नि; अम्लपित्त, आध्मान, कृमि, यकृत विकार नष्ट हो जाते हैं।</li><li>लहसुन की गाँठ की लम्बी नाल को जलाकर उसकी राख को ताजे मट्ठे से नित्य सेवन करने से खूनी और बादी बबासीर के कष्ट शान्त हो जाते हैं। नोट-लाल व हरी मिर्च का सेवन न करें।</li><li>लहसुन की गाँठ की नाल की भस्म 1 माशा की मात्रा में नित्य प्रात: सायं शहद के साथ चाटने से खाँसी नष्ट हो जाती है, उदर कृमि भी नष्ट हो जाते हैं।</li><li>एक गाँठ लहसुन की छीलकर बारीक पीसकर तथा 10 तोला पानी में घोलकर मधु के साथ बार-बार पिलाने से हैजा के रोगी को पेशाब होता है और रोगी मरते-मरते बच जाता है।</li><li>छिलका रहित लहसुन 250 ग्राम, बकरी का दूध 1 किलो, गाय का घी ढाई किलो, जल 10 किलो लें। लहसुन को यवकुट कर जल में चतुर्थांश शेष रहने तक पकाकर उसमें घृत तथा दूध डालकर घृत सिद्ध होने तक पकायें। इस घृत के पात्र को धान्य राशि में 1 माह तक रखने के पश्चात् 5 से 10 ग्राम की मात्रा में नित्य सुबह-शाम सेवन करने से राजयक्ष्मा (टी.बी.) निश्चय ही नष्ट हो जाती है तथा इस योग से (घृत) के प्रभाव से बन्ध्या स्त्री, नपुंसक और वृद्ध पुरुषों में भी अपार शक्ति का संचार होकर कामशक्ति बढ़ जाती है।</li><li>लहसुन और मधु 5-5 ग्राम तथा घृत 10 ग्राम को खूब आपस में मिलाकर (अवलेह जैसा बनाकर) <strong>(नोट-यह एक मात्रा है)</strong> ऐसी 1-1 खुराक नित्य सुबह- शाम सेवन करते रहने से तथा भोजन में दूध और चावल का प्रयोग करते रहने से क्षय रोग नष्ट होकर रोगी दीर्घायु हो जाता है।</li><li>लहसुन का 20 से 30 बूंद तक ताजा रस शहद या शर्बत के साथ प्रत्येक 4-4 घंटे पर देते रहने से नन्हें शिशुओं और छोटे बच्चों की काली खांसी (हूपिंग कफ) नि:सन्देह ठीक हो जाती है। जो बच्चे इस योग का सेवन न कर सकें उन्हें लहसुन की कलियों को छीलकर तथा धागे में पिरोकर हार की भांति गले में माला पहना देना लाभप्रद है।</li><li>लहसुन का रस गुनगुना करके 2-3 बूँद&#8217;कानों में डालने से सर्दी के कारण होने वाला कर्णशूल (Otalgia) तुरन्त ही बन्द हो जाती है यदि कान में फुन्सी इत्यादि हो तो वह भी नष्ट हो जाती है।</li><li>लहसुन की 10 ग्राम कलियों को 30 ग्राम सरसों के तैल में (इसमें यदि 1 ग्राम अफीम मिलालें तो और भी अधिक उत्तम है) पकाकर शीशी में भरकर सुरक्षित रखलें इस तैल की 2-3 बूंदें कान में डालने से भी तुरन्त कर्णशूल बन्द हो जाता है तथा ऊपर वाले योग से भी अधिक प्रभावकारी है।</li><li>लहसुन, आँवला, हरताल प्रत्येक 10-10 ग्राम लेकर कल्क बनाकर 250 ग्राम तिल का तैल और 1 कि.ग्रा. गाय का दूध में मिलाकर धीमी आग पर पकायें। जब दूध जल जाए तब उतार छानकर तैल को सुरक्षित रखलें। इस तैल को नियमित रूप से कान में डालने से कर्णपाक कर्णस्राव और बधिरता मिटती है।.</li><li>20 ग्राम घी में लहसुन के छिले हुए 5 जवे पीसकर भूनलें तथा इसमें 10 ग्राम शहद मिलाकर कफजनित श्वास रोगी को चटायें। अत्यन्त लाभप्रद योग है इसके सेवन से श्वासकास नष्ट हो जाता है। लहसुन खाने के फायदे तो बहुत-से हैं, लेकिन श्वास रोग में इसका उपयोग रामबाण की तरह है।</li><li>लहसुन का स्वरस 20 से 30 बूँद तक शहद के साथ दिन में 3-4 बार सेवन करने से फुफ्फुस के विभिन्न रोग जैसे—श्वास कास श्वासनिका विस्तीर्णता, श्वासनिका प्रदाह, श्वास कृच्छता, फुफ्फुस शोथ, वात श्लेष्मिक ज्वर, फुफ्फुसपाक आदि नष्ट हो जाते हैं।</li><li>लहसुन स्वरस 10 ग्राम को सरसों का तैल 250 ग्राम में मिलाकर रखलें। इस तैल की प्रतिदिन मालिश करके एक घंटा धूप में बैठने के बाद उष्ण जल से स्नान करने से खाज खुजली नष्ट हो जाती है।</li><li>लहसुन को शहद के साथ पीसकर प्रतिदिन सुबह-शाम लेप लगाने से चम्बल (सोरायसिस) और दाद (रिंगवार्म) शर्तिया दूर हो जाता है।</li><li>लहसुन को बारीक पीसकर व्रण पर लगाने से घाव (Wound) भर जाता है तथा पका हुआ व्रण चाहें वह कृमियुक्त ही क्यों न हो, इस लेप (योग से अवश्य ठीक हो जाता है।</li><li>लहसुन, राल और हींग का धुंआ (धूनी) देने से शीतला जन्य व्रण भर जाते हैं और उनमें खुजली नहीं पड़ती है।</li><li>लहसुन, राई, चित्रकमूल को पीसकर उसकी पुल्टिस नारू (Guine warm) के स्थान पर लगाने से वह जल्द ही बाहर आ जाता है। नोट- पुल्टिस 1 घंटे से अधिक देर तक कदापि न लगावें। जब नारू बाहर आ जाए तब उस स्थान पर घी लगा देने से व्रण व वेदना नष्ट हो जाती है।</li><li>लहसुन स्वरस 10 ग्राम,<a
href="/hing-ke-fayde-in-hindi/"> हींग</a> 1 ग्राम को खरल में घोटकर शीशी में सुरक्षित रखलें। यह कफजन्य आधा शीशी (Migrane) म अत्यन्त ही लाभप्रद है। जिस ओर सिर में दर्द हो उस ओर के नथुने में 2-3 बूंदें डाल। तुरन्त लाभ होगा।</li><li>लहसुन को शहद के साथ घोटकर लेप बनाकर जिस ओर सिर में शीशी का दर्द हो उस ओर के भाग में लगाना अत्यन्त लाभकारी है लहसुन का रस और शुद्ध मधु 30-30 ग्राम मिलाकर एक ही मात्रा में चाटने से बिच्छू का विष उतर जाता है। इस योग का पुनः एक घंटे बाद प्रयोग आधा किया जा सकता है।</li><li>नमक और लहसुन को पीसकर वृश्चिक दंश के स्थान पर लेप करने से बिच्छू का विष नष्ट हो जाता है।</li><li>लहसुन व थोड़ी सी हींग दोनों का लेप बिच्छू दंश के स्थान पर लगाने से तथा उस पर कन्डे (उपले) की आग से सेंक करने पर लेप के शुष्क होते-होते ही बिच्छू का विष उतर जाता है।</li><li>हड्डी पर चोट लगने से दर्द होता हो अथवा अस्थि भंग (Fracture) हो गया हो तो—लहसुन 5 ग्राम, शुद्ध लाख 2 ग्राम और शहद 10 ग्राम की एक मात्रा बनाकर सुबह-शाम चाटने से तथा हड्डी पर लहसुन, हल्दी व घी का मिश्रण बनाकर लेप करने से दर्द दूर होकर हड्डी पुन: जुड़ जाती है।</li><li>लहसुन और दूध क्रमश: 250 और 500 ग्राम को लेकर मन्द अग्नि पर पाक करें। जब लहसुन और दूध मिलकर एकजान हो जाऐं तो खूब भली प्रकार&#8217; मलकर छानकर पुनः छने हुए दूध को आग पर पकाकर खोवा बनालें। तदुपरान्त इस खोआ में 500 ग्राम खान्ड मिलाकर 10-10 ग्राम के पेड़े बनाकर रखलें इनमें से सुबह-शाम 1 से 2 पेड़े तक खिलाने से अर्धांग, वातरोग एवं अर्दित (Facial Paralysis) इत्यादि रोग नष्ट हो जाते हैं।</li><li>लहसुन, पोदीना, धनिया, जीरा, काली मिर्च, सैंधानमक को मिलाकर चटनी बनाकर सेवन करने से रक्तदाब वृद्धि (Hypertension) रोग नष्ट जाता है • लहसुन और <a
href="/pyaj-khane-ke-fayde-in-hindi/">प्याज</a> का रस समभाग मिलाकर सुंघाने से अथवा नाक में 2-3 बूँद टपकाने से अपस्मार और अपन्त्रक की बेहोशी तुरन्त ही दूर हो जाती है।</li><li>लहसुन, जीरा, सैंधानमक, काला नमक, सौंठ, मिर्च, पीपल और हींग समस्त सममात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर नीबू के रस के साथ सेवन करने से हैजा का रोगी तुरन्त अच्छा हो जाता है</li></ul><p><strong>नोट &#8211; लहसुन की मात्रा 3 ग्राम अर्थात् 7-8 जवे या कलियां हैं। गर्म प्रकृति वालों को यह हानिकारक है। सिरदर्द पैदा करता है, खून जलाता है, फेफड़ों तथा गर्भवती स्त्रियों को हानिकारक है। गर्म प्रकृति के लोगों को आवश्यकता पड़ने पर अल्प मात्रा में सेवन करें। स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ते देखकर तुरन्त इसका सेवन बन्द कर दें। गरम वस्तु खाने से जिनका पित्त बढ़ जाता हो, उन्हें भी इसका सेवन नहीं करना चाहिए। लहसुन को कच्चा तथा चबाकर खायें। बाह्रा प्रयोग करते समय कृपया ध्यान रखें कि यह एक तीव्र जलन करने वाली चर्मदाहक वस्तु है अत: लेप को अधिक समय तक शरीर पर रखने से छाला उठ सकता है जिसमें काफी वेदना होती है, इसलिए कोमल प्रकृति के लोगों पर इसका लेप पूर्णत: सावधानीपूर्वक करें। इसका बदल जंगली लहसुन और प्याज है। इसके दर्पनाशक कतीरा, धनिया, रोगन बादाम, सिकन्जबीन, खट्टे मीठे अनार का रस और नमक पानी में पका लेना है।</strong></p><p>हमें उम्मीद है कि लहसुन खाने के फायदे जानकर आप इसका उपयोग अवश्य करेंगे और इससे बहुत-से लाभ उठाएंगे। यदि इनके अतिरिक्त लहसुन खाने के फायदे आपको पता हैं, तो टिप्पणी करके हमें अवश्य बताएँ।</p><h2 class="wp-block-heading">यह भी पढ़ें</h2><p>● <a
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href="/mungfali-khane-ke-fayde/">मूंगफली खाने के फायदे</a></p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=26782</guid><description><![CDATA[<p>शीघ्रपतन का इलाज आज-कल बहुत-से लोग जानना चाहते हैं, क्योंकि यह समस्या विकराल रूप धारण करती चली जा रही है।</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>शीघ्रपतन का इलाज आज-कल बहुत-से लोग जानना चाहते हैं, क्योंकि यह समस्या विकराल रूप धारण करती चली जा रही है। शीघ्रपतन एक यौन समस्या है जिसमें पुरुष संभोग के दौरान या उसके तुरंत बाद अनियंत्रित रूप से स्खलित हो जाते हैं। यह एक आम समस्या है, और इसका अनुभव लगभग 30% पुरुषों ने किया है। और शीघ्रपतन का इलाज (Shighrapatan Ka Ilaj) कुछ घरेलू नुस्खो से संभव है।</p><p>प्रवृष्ट करते समय ही इस रोग में तुरन्त वीर्य निकल जाता है। प्राकृतिक स्तम्भन शक्ति 2 से 5 मिनट तक होती है। इससे अधिक देर तक संभोगरत रह पाना जोड़े का संयम-धारण तथा विशेष प्रेमालाप एवं उत्तम स्वास्थ्य के कारण सम्भव हुआ करता है, किन्तु 2 मिनट से भी कम स्तम्भन शक्ति रखने वाला पुरुष शीघ्रपतन का रोगी कहलाता है। इस रोग का कारण मैथुन इच्छा की अधिकता, हस्त मैथुन, वीर्य प्रमेह, वीर्य की अधिकता, गुदा संभोग करना, अत्यधिक मैथुन करना, वीर्य की गर्मी, अधिक आनन्द प्राप्ति की कामना से बाजारू तिलाओं की अत्यधिक मालिश करना, दिल, दिमाग और यकृत की कमजोरी, वीर्य का पतलापन, मूत्राशय में रेत, पेट में कीड़े, स्त्री के गुप्त अंग का तंग और शुष्क होना, लिंग की सुपारी पर मैल जमना, सुपारी की बबासीर, सुजाक, मूत्र मार्ग की खराश, प्रोस्टैट ग्लैन्ड की शोध इत्यादि होता है।</p><h2 class="wp-block-heading">शीघ्र स्खलन का रामबाण इलाज &#8211; Shighrapatan Ka Ilaj In Hindi</h2><p>शुद्ध भाग 24 ग्राम को 1 ढीली पोटली में बांधकर 1 कि. ग्रा. गाय के दूध में डालकर पकाकर खोया तैयार करें और फिर पोटली को निकालकर फेंक दें। तदुपरान्त शुद्ध देशी घी 100 ग्राम में इस खोये (मावा) को भून लें। फिर आधा किलो खान्ड मिला लें और मीठे बादामों की गिरी (छिलका रहित), शुष्क नारियल की गिरी छिली हुई, पिस्ता की गिरी, हरी किशमिश, चिलगोंजा की गिरी प्रत्येक 30 ग्राम को पीसकर मिलाकर पुनः भूनें अन्त में आग से उतारकर कौंच के बीजों की गिरी, इमली के बीजों की गिरी, छोटा गोखरू, सफेद मूसली, काली मूसली, असगन्ध-नागौरी, सालब मिश्री प्रत्येक 12 ग्राम, लाल बहमन, सफेद बहमन, सौंठ, छोटी इलायची के बीज प्रत्येक 3 ग्राम लें सभी का सुरमें की भांति चूर्ण बनाकर उक्त मेवा औषधि में मिलाकर सुरक्षित रखलें । इस पाक को 30 ग्राम की मात्रा में प्रातः काल निहार मुँह (बिना कुछ खाये) गाय के दूध के साथ सेवन करने से शीघ्रपतन, मर्दाना कमजोरी और वीर्य का पतलापन दूर हो जाता है और शीघ्र स्खलन का रामबाण इलाज है।</p><ul><li>शुद्ध भाँग 12 ग्राम, जायफल, बबूल की गोंद भुनी हुई कुन्दर, चुनियां गोंद, मस्तंगी प्रत्येक 3 ग्राम, इमली के बीजों की गिरी, जामुन की गुठली की गिरी, प्रत्येक 6 ग्राम, विशुद्ध केसर डेढ़ ग्राम लें। सभी को विशुद्ध गुलाबजल में खरल करके चने के आकार की गोलियां बनाकरके सुरक्षित रखलें ये 2 से 3 गोलियाँ रात्रि को सोते समय खाते रहने से स्तम्भन शक्ति उत्पन्न होकर शीघ्रपतन रोग नष्ट हो जाता है।</li><li>सत्व गिलोय और वंशलोचन लेकर कूटपीसकर सुरक्षित रखलें प्रतिदिन यह 2 ग्राम औषधि शहद के साथ सेवन करने से 1 सप्ताह में वीर्य गाढ़ा हो जाता है और स्वतः स्खलित नहीं होता है अपूर्व वीर्य स्तम्भक योग है।</li><li>अकरकरा, सौंठ, कपूर, केसर, पीपली, लौंग प्रत्येक 1 तोला लेकर कूट पीसकर छानकर चने के आकार की गोलियाँ बनाकर सुरक्षित रखलें । यह 1-1 गोली प्रात:सायं दूध से खायें। ऐसे रोगी जो काफी इलाज करवाकर निराश हो गये हों, इस योग का सेवन करें।</li><li>&nbsp;कुशतिला 3-मासा, रस सिन्दूर 6 माशा, कपूर 6 माशा, जायफल 1 तोला, पीपली 1 तोला, कस्तूरी (शुद्ध) 1 माशा लेकर पानी की सहायता से 1- 1 रत्ती की गोलियाँ बनाकर सुरक्षित रखलें । यह 1 गोली रात को सोते समय दूध में शहद मिलाकर सेवन करें। यह योग प्रथम दिन से ही अपने शक्तिशाली होने का प्रभाव दिखलाता है।</li><li>कौंच के बीज और ताल मखाना समान मात्रा में लेकर कूट पीसकर छानकर सुरक्षित रखलें इसे 3 माशा की मात्रा में (सम्भोग का परहेज रखते हुए) निरन्तर 1 मास तक दूध के साथ खाने से शीघ्रपतन रोग नष्ट हो जाता है तथा रोगी को स्त्री के सामने फिर कभी दुबारा जीवन में शर्मिन्दगी उठानी नहीं पड़ती है।</li><li>&nbsp;जामुन की गुठली का चूर्ण 4 माशा की मात्रा में प्रतिदिन शाम को गुनगुने दूध से खाने से शीघ्रपतन रोग नष्ट होता है तथा वीर्य भी बढ़ता है।</li><li>लाजवन्ती के बीज और खान्ड सममात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर सुरक्षित रखलें। इसे 6 माशा की मात्रा में प्रतिदिन दूध के साथ खाने से शीघ्रपतन दूर होकर वीर्यवृद्धि हो जाती है ।</li><li>ब्रह्मदण्डी का चूर्ण 6 माशा की मात्रा में प्रतिदिन खाने से शीघ्रपतन रोग दूर हो जाता है।</li><li>बहुफली का चूर्ण 5 माशा की मात्रा में 15 दिन खा लेने से शीघ्रपतन का रोग दूर हो जाता है।</li><li>स्पीमेन फोर्ट (हिमालय ड्रग) दिन में 1-2 टिकिया निरन्तर खाते रहने से भी शीघ्रपतन का रोग दूर हो जाता है।</li><li>जंगली बेर की गुठलियों की गिरी पीसकर उसमें उससे आधी खांड मिलाकर सुरक्षित रखलें। इसे 12 ग्राम की मात्रा में नित्य सुबह-शाम गोदुग्ध से सेवन करने से शीघ्रपतन का रोग नष्ट हो जाता है।</li></ul><p>हमें उम्मीद है कि “शीघ्रपतन का इलाज” नामक इस लेख से आपको बहुत सी महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त हुई होगी और आप स्वस्थ्य जीवन की ओर दिशा बढ़ाएंगे। यदि इस विषय पर आपकी भी कोई राय है, तो उसे हमसे साझा करना न भूलें।</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=26779</guid><description><![CDATA[<p>सिर दर्द का पक्का इलाज (Sir Dard Ka Ilaj) बहुत-से लोग जानना चाहते हैं। इसका कारण यह है कि वे</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/sir-dard-ka-ilaj-dawa/">सिर दर्द का पक्का इलाज &#8211; Sir Dard Ka Ilaj aur Dawa</a> appeared first on <a
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भी नजला, जुकाम, दिमागी और तन्त्रिका की कमजोरी से उत्पन्न पुराने सिरदर्द की अत्यन्त ही सफल शास्त्रीय आयुर्वेदिक औषधि है। इसे 1-1 गोली मधु में मिलाकर सुबह-शाम दिन में 2 बार सेवन करें।</li></ul><p><strong>पुराने उपदंश के कारण सिरदर्द —</strong> इसके विषैले प्रभाव रक्त में चले जाने पर रोगी के रात्रि के समय तड़पा देने वाला दर्द होता है। यह दर्द इतना भयंकर होता है कि रोगी को लगता है कि जैसे हड्डी कुचली जा रही है।</p><p><strong>उपचार &#8211;</strong> व्याधिहरण रसायन 125 से 250 मि.ग्रा. तक खरल में सूक्ष्म पीसकर मुनक्का में रखकर सुबह-शाम दिन में 2 बार निगलना लाभप्रद है।</p><ul><li>स्वर्णक्षीरी की जड़ की छाल सुखाकर 500 मि.ग्रा. से 1 ग्राम तथा नीम के पत्तों का कपड़छचूर्ण 500 से 100 मि.ग्रा. को एकत्र मिलाकर ताजे जल से सुबह-शाम दें।</li><li>रीठा के छिलकों की भस्म 125 से 250 मि.ग्रा. तक जल से दिन में 2-3 बार तक सेवन करें।</li><li>फिटकरी की भस्म 125 मि.ग्रा., पाली कटैय्या की जड़ की छाल की भस्म 125 मि.ग्रा. — ऐसी एक मात्रा 6 से 12 घंटे के अंतर पर जल से दें।</li><li>भोजन के बाद महामन्जिष्ठारिष्ट, वाद्यारिष्ट प्रत्येक 15 मि. ली. • मिलाकर उसमें समान जल मिलाकर दिन में 2 बार सेवन करना भी पुराने आतशक (उपदंश) से उत्पन्न सिरदर्द नष्ट हो जाता है।</li></ul><p><strong>गुर्दों में शोथ होने से उत्पन्न सिरदर्द —</strong> ऐसी दशा में रोगी के सिर के निचले भाग में संक्रमण के कारण निरन्तर (हर समय) सिरदर्द होता रहता है तथा उसे रात्रि में बार-बार मूत्र आता है। रोगी के मूत्र में अण्डे की सफेदी जैसा पदार्थ (एल्क्युमिन) भी आता है मूत्र का घनत्व भी कम हो जाता है। यह सिरदर्द बड़ी आयु में हुआ करता है। इस रोग से ग्रसित रोगी उचित उपचार व्यवस्था के अभाव में शीघ्र बूढ़ा हो जाया करता है।।</p><p><strong>उपचार –</strong> वृक्क शोथ (रोग के मूल कारण) का उपचार करें।</p><ul><li> बार-बार मलेरिया ज्वर आने के कारण (रहने के कारण) भी रोगी के माथे और सिर के सामने वाले भाग में तड़पा देने वाला सिरदर्द दौरे के रूप में हुआ करता है।</li></ul><p><strong>उपचार –</strong> मलेरिया ज्वर का उचित उपचार कर जड़मूल से दूर दूर करें।</p><ul><li> दिमाग में रसूली (Intra Craninal Tumour) हो जाने पर भी पहले तो मामूली किन्तु बाद में भयंकर सिरदर्द से रोगी की दृष्टि कमजोर हो जाती है।</li><li>घी या मक्खनयुक्त भोज्य पदार्थ पूड़ियाँ, परांठे इत्यादि खाने के कारण भी सिर दर्द हो जाया करता है। यह सिरदर्द प्रातः के समय अधिक होता है।</li></ul><p><strong>उपचार &#8211;</strong> 1 या 2 नीबू का रस ठण्डे या गरम पानी निचोड़ कर व पीने से पित्ताशय में उत्तेजना से चिकनाई हज्म होकर सिरदर्द दूर हो जाता है</p><ul><li>रक्त में जमने की शक्ति कम हो जाने पर सिरदर्द प्रातः समय हुआ करता है। ज्यों-ज्यों दिन बढ़ता जाता है, दर्द कम होता जाता है। रोगी के चर्म पर खुजली के दानें औरं पित्ती उछलने जैसे लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। रोगी का चेहरा और आँखों के पपोटे सूजे हुए होते हैं। यह रोग प्रायः स्त्रियों को होता है।</li></ul><p><strong>उपचार —</strong> रक्त स्राव के अन्तर्गत लिखे हुए रक्तशोधक योगों का प्रयोग भी करें।</p><ul><li>हाई ब्लड प्रेशर (रक्तदाव की अधिकता) के कारण उत्पन्न सिरदर्द होने पर ऐलोपैथी की ‘एमाईल नाइट्रेट&#8217; नामक औषधि की 4-5 बूँदें साफ रूमाल पर डालकर मुँह और नाक के पास रखकर सुँघाने से तुरन्त आराम मिल जाता है। यह सिर दर्द का पक्का इलाज है।</li><li>धूप में चलते-फिरने के कारण उत्पन्न सिरदर्द के रोगी को ठण्डे कमरे में लिटायें तथा बिजली का पंखा चलायें। खस का इत्र सुंघायें अथवा कद्दू का तेल नाक में टपकायें या आलू बुखारा 7 दानो अथवा इमली पानी में घोलकर पिलायें वैसे गर्मी के कारण उत्पन्न सख्त सिरदर्द में होम्योपैथी औषधि ग्लोनाइन 30 शक्ति की 2-3 बूंदें पानी में डालकर प्रत्येक 20-25 मिनट पर सेवन करना लाभप्रद है। Yeh Sir Dard ki dawa kafi upyogi hai.</li><li>सिर में रक्त की अधिकता हो जाने के कारण भी तीव्र सिरदर्द उत्पन्न हो जाता है सिर भारी, माथे और सिर की गुद्दी में सख्त दर्द, आँखों के सामने लाल चिनगारियाँ अथवा काले धब्बे और कनपटियों में तड़प प्रतीत होती है।</li><li>पाचनांगों के दोषों से एवं सिर में रक्त की अधिकता के कारण उत्पन्न सिर- दर्द में सिर को मसलना या दबाना उचित नहीं है प्रत्येक प्रकार का सिरदर्द पाखाना आ जाने से कम हो जाया करता है। अत: दस्त लाने की औषधि या वेदना-शामक औषधि भी ले सकते हैं।</li><li> मस्तिष्क में कीड़े पड़ने के कारण उत्पन्न सिर दर्द के रोगी की सूँघने की शक्ति घट जाती है और इसको पीनस रोग हो जाता है तथा रोगी के तालु में छेद पड़ सकता है आतशक (उपदंश) के रोगियों को भी आधी रात के समय सिरदर्द हुआ करता है।</li></ul><p><strong>उपचार —</strong> चमड़े के पुराने जूते का तला आग में जलाकर, पीसकर कपड़े से छानकर सुरक्षित रखलें। इसकी नस्य लेने से कीड़े निकल जाते हैं तथा सिरदर्द भी दूर हो जाता है।</p><ul><li>पित्ताधिक्य के कारण उत्पन्न सिरदर्द (Bilious Headache) जिगर की खराबी, गरम भोजनों को खाने अथवा गरम-पेय पदार्थों का पीने से उत्पन्न हुआ करता है। सिर में सख्त दर्द, मितली और मुख का स्वाद कड़वा हो जाया करता है। कै और दस्तों में पित्त (Bile) निकल जाने पर सिरदर्द कम हो जाता है।</li></ul><p><strong>उपचार &#8211;</strong> सिर पर ठण्डे पानी की धार बांधकर पानी गिराना लाभप्रद है।</p><ul><li>अमृतधारा की 2-3 बूंदें बताशे पर डालकर खाना भी लाभकारी है।</li><li>चन्दन तथा कपूर को घिसकर माथे और कनपटियों पर लेप करें।</li><li>नीबू, आलूबुखारा या इमली से बना शरबत पीना लाभकारी है।</li><li>दृष्टि कमजोर हो जाने से उत्पन्न सिरदर्द की अवस्था में आँख के विशेषज्ञ चिकित्सक से आँखें टेस्ट करवाकर उपयुक्त नम्बर के शीशों की ऐनक (चश्मा) लगवाने से सिरदर्द नष्ट हो जाता हैअन्य नेत्रदृष्टिवर्धक सुरमा अथवा खाने की औषधियों का भी प्रयोग किया जा सकता है। इसे जानकार इन मामलों में सिर दर्द का पक्का इलाज कहते हैं।</li><li>(लो ब्लड प्रैशर) रक्त का दबाव कम हो जाने से उत्पन्न सिरदर्द में ब्लडप्रेशर का उपचार करने से सिरदर्द स्वयं नष्ट हो जाता है।</li><li>उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त अधिक और बार-बार खाने से भारी पगड़ी बाँधने से, सिर में जुऐं तथा बाल बड़े-बड़े होने से, दाँत में कीड़ा लगने से, शराब, कोकीन एवं लौह (आयरन) की औषधियों के अधिक प्रयोग से तथा कुछ रोगों के कारण जैसे—खाँसी, सर्दी इत्यादि के कारण भी सिर में दर्द उत्पन्न हो जाया करता है इन सभी के मूल कारणों का उपचार करने से सिरदर्द की शिकायत दूर हो जाती है।</li><li>रीठे को पानी में पीसकर नाक में टपकाने से सिर के कीड़े मर जाते हैं।</li><li>साँप की केंचुली 10 ग्राम को घी में बारीक पीसकर इसमें 10 ग्राम मिश्री मिलाकर खूब घुटाई कर शीशी में सुरक्षित रखलें आवश्यकता पड़ने पर 2 ग्रेन यह दवा बताशे में भरकर रोगी को देकर ऊपर से 3-4 घूंट पानी पिलादें। इस प्रयोग से पुराने से पुराना सिरदर्द मात्र 2-4 मात्राओं से ही सदा-सदा के लिए नष्ट हो जायेगा।</li><li>शुद्ध तिल का तैल 250 ग्राम, चन्दन और दालचीनी का तैल 10-10 ग्राम लें सभी को साफ शीशी में डालकर रख लें। इस तैल को माथे पर लगाने से सिरदर्द तुरन्त दूर हो जाता है 4-4 बूँदें दोनों कानों में भी डाल लें।</li><li>नींबू की पत्तियों को कूटकर रस निकाललें। इसकी नस्य लेने से सिरदर्द नष्ट हो जाता है जिन रोगियों को सदैव सिरदर्द की शिकायत रहती है वे इस प्रयोग को करें। जीवन भर के लिए उन्हें सिरदर्द से छुटकारा मिल जायेगा</li><li>पीपल को पानी में पीसकर मस्तक पर लेप करने से मस्तक पीड़ा नष्ट हो जाती है।</li><li>अनार की जड़ को पानी में पीसकर मस्तक पर लेप करने से बात और कफ की पीड़ा दूर हो जाती है।</li><li>धतूरे के 3-4 बीज प्रतिदिन निगलने से पुराने से पुराना सिरदर्द कुछ दिनों में ठीक हो जाता है। ही</li><li>&#8216;षडबिन्दु तैल&#8217; की नस्य लेने से सभी प्रकार का सिरदर्द दूर हो जात है।</li><li>नौशादर और बिना बुझा चूना बराबर मात्रा में लेकर शीशी में भर लें जब भी सिरदर्द हो तो शीशी को हिलाकर सूँघें। इस प्रयोग से सिरदर्द तुरन्त ही दूर हो जाता है। नजले के कारण उत्पन्न सिरदर्द हेतु उत्तम प्रयोग है।</li><li>खाने के चूने के थोड़े से घी में मिलाकर सिर पर लेप करने से गर्मी से उत्पन्न सिरदर्द दूर हो जाता है।</li><li>कच्चे दूध में बिन्दाल की मींगी पीसकर सूंघने से सिर का भयंकर दर्द शान्त हो जाता है।</li><li>पीपल और बच का समभाग चूर्ण सूँघने से सिरदर्द दूर हो जाता है।</li><li>भटकटैय्या के फलों का रस सिर में लगाने से सिरदर्द दूर हो जाता है।</li><li>रीठा, काली मिर्च और सौंठ तीनों को जल में घिसकर पानी मिलाकर 2-3 बूँदें नाक के नथुनों में टपकाकर नस्य लेने से सिरदर्द दूर हो जाता है।</li><li>छोटी पीपल डेढ़ ग्राम को बारीक पीसकर 10 ग्राम शहद के साथ च से सिरदर्द 5 मिनट में दूर हो जाता है।</li><li>मैंथल 3 ड्राम, रेक्टी फाइड स्प्रिट 3 औंस, आयल क्वाथ 2 ड्राम पर लगाने से भयंकर से भयंकर सिरदर्द दूर हो जाता है। यह सिर दर्द का पक्का इलाज कहलाता है।</li></ul><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=26691</guid><description><![CDATA[<p>हस्तमैथून करने से नुक्सान (Jada Hastmaithun Karne Ke Nuksan) होता है या फायदा &#8211; इसे समझना बहुत जरूरी है। साथ</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/hastmaithun-karne-se-nuksan-in-hindi/">हस्तमैथून करने से नुक्सान &#8211; Hastmaithun Karne Se Nuksan Ya Fayda</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>हस्तमैथून करने से नुक्सान (Jada Hastmaithun Karne Ke Nuksan<strong>)</strong> होता है या फायदा &#8211; इसे समझना बहुत जरूरी है। साथ ही इसके नकारात्मक प्रभवों से बचने के उपाय जानना भी आवश्यक है। कई लोगों का मत है कि हस्तमैथुन एक सामान्य यौन क्रिया है जो पुरुष और महिला दोनों करते हैं। आइए इस लेख में जानते हैं कि जानते हैं कि हस्तमैथुन को लेकर आयुर्वेद का क्या कहना है और इससे लाभ होता है या हानि।</p><p><strong>यह भी पढ़ें &#8211;</strong> <a
href="/bhagandar-ka-ilaaj-dawa-lakshan/">भगंदर का बिना ऑपरेशन इलाज </a></p><p>यह कोई रोग न होकर एक गन्दी आदत होती है जो कि स्वास्थ्य व समाज के लिए अशोभनीय है। यहाँ यह भी पुरुष वर्ग ही नहीं, बल्कि स्त्रियाँ भी इस घृणित आदत से ग्रसित हो जाती है किन्तु उनकी इस आदत को &#8216;चपटी&#8217; कहा जाता है। इस लत का शिकार होकर मनुष्य अपने वीर्य को हाथों, जाँघों या तकिये की रगड़ से निकाल लेता है। जबकि स्त्रियाँ अपनी अंगुली, मोमबनी, बैंगन, मोटी कलम अथवा पैसिल, मूली इत्यादि से अपना यह घृणित कार्य करती है। इस रोग का कारण एकान्त में रहना, कामवासना की अधिकता, बुरे-गन्दे विचार, नंगे चित्र अथवा चलचित्र देखना, सम्भोग प्रिय दुष्चरित्रा स्त्री-पुरुष से मेल, पेट में कीड़े होना, मूत्राशय में पथरी होना, सुपारी के मांस का लम्बा और संकीर्ण होना अथवा सुपारी पर मैल जम जाना इत्यादि है। इस घृणित आदत के फलस्वरूप स्वप्नदोष, वीर्य प्रमेह, शीघ्रपतन, नामर्दी, इन्द्री (लिंग) का छोटा, टेढ़ा-मेढ़ा और कमजोर हो जाना इत्यादि परिणाम झेलना पड़ता है।</p><p><strong>यह भी पढ़ें &#8211; </strong><a
href="/kabj-ka-permanent-ilaj-hindi/">कब्ज का परमानेंट इलाज</a></p><p>हस्तमैथून करने से नुक्सान (Hastmaithun Karne Ke Nuksan) अनेक हैं। इस रोग से ग्रसित व्यक्ति हताश, साहसहीन, उदास, व्यवसाय से घृणा करने वाला, एकान्तप्रिय, चिड़चिड़ा, डरपोक होता है। उसकी आँखों के चारों ओर काले गड्ढे पड़ जाते हैं, कब्ज रहती है, हृदय अधिक धड़कता है, रक्ताल्पता, पाचन विकार, पुराना नजला, स्मरण शक्ति की कमी, स्नायु दुर्बलता इत्यादि रोग हो जाते हैं। दिल, दिमाग, जिगर, फेफड़े, आँतें और मूत्राशय कमजोर हो जाता है। मूत्र करते समय गुदगुदी और जलन होती है। रीढ़ की हड्डी पर चीटियाँ सी रेंगती हुई प्रतीत होती है। कमर में दर्द और हथेली-तलुवों में जलन होती है। रोगी को ठण्डा पसीना आता है। दृष्टि कमजोर हो जाती है। चेहरा पीला और गाल पिचके हुए हो जाते हैंशिश्न में भी खराबी आ जाती है। उसकी जड़ कमजोर और पतली हो जाती है तथा वह ढीली-ढीली और असाधारण रूप से छोटी और किसी- किसा की एक ओर का (अत्यधिक रूप से) टेड़ी हो जाती है तथा इसकी शिरायें फूल जाती हैं और इसकी सम्वेदनात्मक संज्ञा अधिक बढ़ जाती है फलस्वरूप अन्त में रोगी नपुंसक हो जाता है। यदि इस रोग की उचित रोकथाम और उपयुक्त उपचार न किया गया तो रोगी भयानक रोगों से ग्रसित होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।</p><h2 class="wp-block-heading">हस्तमैथुन की आदत से छुटकारा पाने के उपाय</h2><ul><li>प्याज को कूटकर आधा किलो रस निकालें और फिर किसी कलईदार बर्तन में डालकर 250 ग्राम मधु मिलाकर धीमी आग पर इतना पका डालें कि <a
href="/pyaj-khane-ke-fayde-in-hindi/">प्याज</a> का समस्त रस जल जाये और मात्र मधु शेष रहे। तभी आग से उतारकर सफेद मूसली का चूर्ण 125 ग्राम मिलाकर घोटकर शीशी में सुरक्षित रखलें । इसे 6 से 12 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम खाने से नपुन्सकता, हस्तमैथुन से उत्पन्न लिंग एवं वीर्य विकार के लिए यह योग अमृततुल्य है ।</li><li>सफेद संखिया 3 ग्राम, चांदी के वर्क 9 ग्राम दोनों को मिलाकर सुरमें की भाँति खरल करें फिर इसमें 48 ग्राम खान्ड मिलाकर पुनः खरल करके सुरक्षित रखलें। यह चूर्ण 125 मि.ग्रा. की मात्रा में प्रातःकाल नाश्ते के बाद मक्खन या मलाई में लपेटकर खाने से शारीरिक और स्नायविक दुर्बलता दूर होकर शिश्न में सख्ती उत्पन्न हो जाती है । बलवान बनाने वाला अति उत्तम योग है।</li><li> बीजबन्द, सफेद मूसली, दक्षिणी शतावर, ढाक की गोंद, सेमल की गोंद, कौंच के बीज, कंगन के बीज, काली मूसली, गोंद नागौरी, सखाली, समुद्रसोख, बालछड़, तालमखाना, गोखरू, मोचरस, हुस्न यूसूफ, बहुफली, लसोड़ा भी बराबर मात्रा में एकत्र करें। फिर समस्त औषधियों को अलग-अलग कूटपीस कर मिला लें और एक शीशी में सुरक्षित रखलें । इसे 5 ग्राम की मात्रा में प्रयोग करें। इसके सेवन से नामर्दी, नपुंसकता, मैथुनशक्ति का सर्वथा अभाव, बचपन की गल्तियों (हस्तमैथुन) से उत्पन्न विकार, मैथुन एवं वीर्यपात हो जाना, बुढ़ापे के विकार, प्रौढ़ावस्था की असमर्थता, कमजोरी, हीनता, कृषता आदि दूर हो जाती है।</li><li> एक सेर घी, 500 ग्राम खोया, डेढ़ सेर गेहूँ का आटा, 200 ग्राम कीकर का गौंद, 125 ग्राम सालब मिश्री, 125 ग्राम सफेद मूसली, 50 ग्राम किशमिश 50 ग्राम चिलगोंजा, 50 ग्राम पिस्ता । केसर और कस्तूरी 2-2 ग्राम एवं चीनी डेढ़ सेर लें पहले आटे को घी में भूनें फिर उसमें खोया मिलाकर चलायें अन्त में सभी औषधियों का मिश्रण डालकर चलायें । सबसे अन्त में केसर और कस्तूरी एक प्याली में भली प्रकार घिसकर 50-50 ग्राम वजन के लड्डू तैयार कर सुरक्षित रखलें ये 1-2 लड्डू आवश्यकतानुसार गरम दूध में मिश्री और मलाई मिलाकर रात को सोने से पूर्व सेवन करें। इसके सेवन से क्षीणता, कृषता, दुर्बलता, नामर्दी, नपुंसकता, वीर्य विकार, बार-बार मूत्र त्याग करना, कमर दर्द तथा शरीर-दर्द, हस्तमैथुन-जन्य समस्त विकार नष्ट हो जाते हैं ।</li><li>सौंठ, सफेद सन्दल, आक की जड़, कंकोल, जायफल, लौंग, अकरकरा, अफीम, दारु, रूमीमस्तंगी, केसर-ये सभी औषधियाँ समान मात्रा में लेकर अलग- अलग बारीक (सुरमें की भाँति) पीसें अन्त में आपस में मिलाकर शहद की सहायता से चने के आकार की गोलियां बनाकर सुरक्षित रखलें ये 1-2 गोली दूध के साथ सेवन करें । यह योग अत्यन्त ही स्तम्भक, शक्ति एवं वीर्यवर्धक है। इसके सेवन से शीघ्रपतन, प्रमेह, वीर्य प्रमेह, नामर्दी और हस्तमैथुनजन्य विकार नष्ट होकर अपूर्व बल प्राप्त हो जाता है।</li><li>गुंदना के बीज, कुचला चूर्ण तथा लौंग 5-5 ग्राम, जरजीर के बीज, चिलगोजा की गिरी, कड़वी कूट, शीतरज सभी 10-10 ग्राम। कलौंजी, गाजर के बीज, सुरंजान मीठी सभी 30-30 ग्राम लेकर सभी औषधियों को पृथक-पृथक कूट पीसकर आपस में मिलाकर अदरक के रस में 4-4 ग्राम की मात्रा की गोलियाँ बनाकर सुरक्षित रखें। यह 1-2 गोली आवश्यकतानुसार पानी से प्रयोग करें।हस्तमैथुन के रोगी दूध में शहद मिलाकर गोली सेवन करें। कमजोर रोगी भी दूध से ही सेवन करें । इस औषधि के सेवन से स्वप्नदोष, शीघ्रपतन, हस्तमैथुनजन्य विकार, मैथुनहीनता, कमजोरी, नामर्दी, नपुंसकता असमय वीर्यपात हो जाना आदि रोग अवश्य ही नष्ट हो जाते हैं ।</li><li>सफेद प्याज का रस 10 ग्राम, शहद 6 ग्राम, शुद्ध घी 2 ग्राम को मिलाकर सुबह-शाम चाटकर ऊपर से गाय का दूध पीने से हस्तक्रिया-जनित नपुंसकता नष्ट हो जाती है</li><li>रात को सोते समय 3 ग्राम <a
href="/hing-ke-fayde-in-hindi/">हींग</a> को पानी में पीसकर 15-20 दिन तक लिंग पर लेप करने से तथा प्रात:काल गरम पानी से धो देने से हस्तमैथुन-जन्य लिंग के समस्त विकार नष्ट हो जाते हैं। हानिरहित दवा है ।</li><li>माल कंगनी का तैल, लौंग का तैल 60-60 ग्राम, जमालगोटे का तैल 1 ग्राम सभी को 120 ग्राम तिल के तैल में डालकर हिलाकर सुरक्षित रखलें। 4-5 बूँद यह दवा इन्द्री के ऊपर नरमी से मलें (सुपारी तथा अन्डकोषों पर न लगने पाये) ऊपर से पान का पत्ता रखकर पट्टी लपेटकर धागे से बाँध दें । जब तक यह मालिश की दवा का प्रयोग करें तब तक लिंग को गरम पानी से धोने के पश्चात् ही स्नान करें हस्तमैथुनजन्य एवं समस्त प्रकार के इन्द्री-दोष दूर करने हेतु अद्भुत प्रयोग है।</li><li>जमाल गोटे का तैल असली 1 भाग, अजवायन का तैल 3 भाग को मिलाकर दस मिनट तक इन्द्री पर हल्के हाथों से रगड़कर मालिश करें। (जोर से मालिश कदापि न करें) अधिक लगाने से छाले पड़ सकते हैं, अत्यन्त तेज दवा है इसके प्रयोग से लिंग में जोश उत्पन्न न होना, लिंग सुकड़ जाना, सम्भोग इच्छा की कमी इत्यादि नष्ट हो जाती है। मात्र 1-2 बूंदों की ही मालिश करें।</li><li>आम के कच्चे फल जो चने के बराबर हों, कच्चे गूलर जो छोटे हों तथा बबूल की कच्ची फलियाँ, जिनमें बीज न पड़े हों का कपड़छन सख्त और बहुत छानकर चूर्ण तैयार करके रखलें। इसे 3 ग्राम की मात्रा में 12 ग्राम मधु मिलाकर 3 सप्ताह तक निरन्तर प्रातःकाल सेवन करने से हस्तमैथुनजन्य शीघ्रपतन नष्ट हो जाता है।</li></ul><p>हमें उम्मीद है कि हस्तमैथून करने से नुक्सान को समझकर युवावर्ग इस आदत से दूर होंगे और <a
href="/category/health-fitness/">स्वस्थ्य जीवन</a> की ओर दिशा बढ़ाएंगे। यदि इस विषय पर आपकी भी कोई राय है, तो उसे हमसे साझा करना न भूलें।</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=20422</guid><description><![CDATA[<p>इस लेख में जानते हैं क्या हैं काली मिर्च के फायदे और किस तरह काली मिर्च का भरपूर लाभ लिया</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/kali-mirch-ke-fayde-in-hindi/">काली मिर्च के फायदे – Kali Mirch Ke Fayde in Hindi</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>इस लेख में जानते हैं क्या हैं काली मिर्च के फायदे और किस तरह काली मिर्च का भरपूर लाभ लिया जा सकता है। साथ ही किन रोगों में यह रामबाण सिद्ध होती है।</p><p>परम्परागत भारतीय भोजन मसालों के बिना अधूरा ही माना जायेगा और मसाले भी कितने अलग-अलग स्वाद, सुगंध और रंगत वाले–जिनसे भोजन की लज्जत कई गुना बढ़ जाती है। मसालों के प्रयोग से भोजन की गुणवत्ता भी बढ़ती है और कई तरह के <a
href="/category/health-fitness/">स्वास्थ्य लाभ</a> भी होते हैं। मसालों की इस श्रेणी में काली मिर्च का अपना अलग महत्व है।</p><p>क्या आप जानते हैं काली मिर्च की पैदावार सर्वप्रथम हमारे देश में हुई थी। देश के दक्षिण प्रांत में काली मिर्च की खेती प्रमुख तौर पर होती है और बड़े स्तर पर इसका निर्यात किया जाता है। छोटे-छोटे काले रंग के गोल दानों वाली काली मिर्च का स्वाद तीखा और चरपरा व तासीर गर्म है। खड़े-गर्म मसालों में इसका प्रमुख स्थान है जो इसे मसालों का राजा बनाता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी काली मिर्च के अनेकानेक फायदे हैं। दादी-नानी के घरेलू नुस्खों में तो कई छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज काली मिर्च ही है। काली मिर्च में विटामिन ए और सी व कारोटोंस के अलावा कई एंटी-ओक्सिडेंट गुण होते हैं। तो आइए, आज हम काली मिर्च के फायदे विस्तार से जानते हैं।</p><h2 class="wp-block-heading">काली मिर्च रखे मिज़ाज बढ़िया</h2><p>सही पढ़ा आपने। काली मिर्च में पिपराइन होता है, जो तनाव और अवसाद दूर करने में एक तरह से एंटी-डिप्रेसंट का काम करता है। भोजन में अल्प मात्रा में नियमित प्रयोग करें, इसके एंटी-डिप्रेशन तत्व आपके तनाव को कम करने में मदद करेंगे। तनाव को मात देना चाहते हैं, तो <a
href="/mungfali-khane-ke-fayde/">मूंगफली का सेवन भी बहुत लाभदायक </a>साबित हो सकता है।</p><h2 class="wp-block-heading">करे हाज़मा दुरुस्त&nbsp;&nbsp;</h2><p>काली मिर्च का एक गुण इसके अंदर मौजूद पाचक एंजाइम्स हैं। भोजन में काली मिर्च चूर्ण मिलाकर लेने से भोजन शीघ्र पचता है। हाजमा खराब रहता हो तो खाने के बाद थोड़ी सी पिसी हुई काली मिर्च चूर्ण को <a
href="/saunf-khane-ke-fayde/">सौंफ के साथ</a> चबाएँ। काली मिर्च पावडर सूप और सलाद या रायते में डालकर भी खा सकते हैं। घर का बना बढ़िया चाट मसाला बनाने के लिए काली मिर्च, सेंधा नमक, जीरा और अमचूर को एक साथ पीसकर पावडर बना लें। इसे आप सब्ज़ी और सलाद वगैरह में ऊपर से छिड़क कर खाएँ, खाने का स्वाद कई गुणा बढ़ जाएगा।</p><h2 class="wp-block-heading">दाँतों और मसूड़ों की रक्षक</h2><p>पुराने समय से ही काली मिर्च का प्रयोग दांतो को स्वस्थ रखने के लिए किया जाता रहा है। काली मिर्च दांतों के कीड़े लगने वाले दर्द से राहत दिलाती है। दाँतों और मसूड़ों में लौंग और काली मिर्च का पेस्ट लगाएँ। <a
href="/long-ke-fayde/">लौंग के फायदे</a> तो हम पहले ही बता चुके हैं। काली मिर्च श्वास की दुर्गन्ध भी दूर करता है। अगर मसूड़े कमज़ोर हो गए हों तो काली मिर्च को पीस कर उसका पेस्ट कुछ देर दांतों में लगा रहने दें और फिर कुल्ले कर लें। नियमित उपयोग से लाभ होगा।</p><h2 class="wp-block-heading">पाचन क्रिया में है लाभदायक</h2><p>अगर आप काली मिर्च का सेवन नियमित रूप से भोजन में करते हैं तो ये आपके पाचन तंत्र से निकलने वाले हाइड्रोक्लोरिक एसिड की मात्रा में सुधार करता है। हाइड्रोक्लोरिक एसिड भोजन को सुचारू रूप से पचाने में मददगार होता है। जिन लोगों को भोजन के बाद खट्टी डकारें आती हों या खाने के बाद पेट फूलता हो, उन्हें भोजन में काली मिर्च डालकर खाना चाहिए। और इसके नियमित सेवन से आंतो की सूजन भी दूर होती है। काली मिर्च पेट की गैस और बदहज़मी में फायदेमंद है। डाहेरिया रोग होने पर अल्प मात्रा में रोजाना लें। <a
href="/ilaichi-ke-fayde/">इलायची भी पाचन-क्रिया में काफ़ी फ़ायदेमंद है</a>।</p><h2 class="wp-block-heading">सुबह खाली पेट काली मिर्च खाने के फायदे</h2><p>सुबह खाली पेट काली मिर्च खाने के फायदे भी बहुत सारे हैं। इसके दानों की बाहरी परत शरीर के फैट सेल्स को गलाने में मदद करती है, इसलिए इसे एक असरदार चर्बी नाशक माना जाता है। रोज़ सुबह एक गिलास गर्म पानी में काली मिर्च के साथ शहद लें। इसके साथ वजन कम करने के लिए इसे टमाटर सूप और उबली सब्जियों में डालकर खाएँ, कुछ ही दिनों में शरीर की चर्बी घट कर शरीर छरहरा हो जायेगा। इस प्रयोग के साथ अधिक तली-भुनी और वसायुक्त भोजन का त्याग करें तो सोने पे सुहागा होगा। इसी तरह सुबह खाली पेट <a
href="/methi-ke-fayde/">मेथी का सेवन भी बहुत लाभदायक</a> माना जाता है।</p><p>काली मिर्च शरीर के कफ और वात को शांत रखता है और पित्त को सुधारता है, इसीलिए आयुर्वेद पद्धति से पकने वाले भोजन में काली मिर्च का विविध रूप से प्रयोग किया जाता है।</p><h2 class="wp-block-heading">गर्भावस्था में लाभ</h2><p>गर्भावस्था में भी काली मिर्च के फायदे नज़रअन्दाज़ नहीं किए जा सकते। गर्भ के आरंभ में कई स्त्रियों को भूख ना लगने की समस्या होती है। काली मिर्च में पाया जाने वाला फ्लेवनओइड्स तत्व जीभ की स्वाद ग्रन्थियों को जाग्रत करके भूख जगाता है इसलिए इसका चूर्ण गर्भवती महिलाओं को या जिन लोगों को भूख नहीं लगती, नींबू के साथ देना चाहिए। गर्भावस्था के दौरान बार-बार उल्टी आने या जी मितलाने की समस्या हो तो नींबू को आग में भून कर उस पर काली मिर्च पीस कर डालकर चूसें, तुरंत आराम मिलेगा।</p><h2 class="wp-block-heading">दूध में काली मिर्च डालकर पीने के फायदे</h2><p>जानकारों की मानें तो दूध में काली मिर्च डालकर पीने के फायदे अद्भुत हैं। सर्दियों के मौसम में गले में खराश होना या ठंड से गला खराब होना आम समस्या है। इससे निजात पाने के लिए गर्म दूध के साथ काली मिर्च के दानों को पीसकर सेवन करने से बंद गला खुल जाता है। काली मिर्च की तासीर गर्म होने से इसका प्रयोग सर्दी दूर करने और खांसी-जुकाम में बेहद फायदेमंद है।</p><p>सर्दियों के मौसम में काली मिर्च के लड्डू भी खूब खाए जाते हैं। आटे को घी में भूनकर उसमे काली मिर्च पावडर और मेवे मिलाकर लड्डू बना लें। रोज़ सुबह एक लड्डू गर्म दूध के साथ लें, सर्दी से होने वाली बीमारियाँ आपसे कोसों दूर रहेंगी। काली मिर्च की चाय पीने से भी सर्दी-जुकाम आदि परेशानियों से निजात मिलती है। अगर गले में दर्द हो तो काली मिर्च चूर्ण को चुटकी भर नमक के साथ फाँक लें, अवश्य लाभ होगा।</p><h2 class="wp-block-heading">पुरानी खांसी से बचाव</h2><p>बहुत लंबे समय से हो रही खांसी में काली मिर्च का गुड़ के साथ सेवन लाभकारी है। इसे सेवन करने की विधि इस प्रकार है–</p><ul><li>पहले दिन सिर्फ एक दाना काली मिर्च गुड़ की छोटी डली के साथ लें। ऊपर से गर्म पानी पीएँ।</li><li>रोजाना दानों की एक-एक कर संख्या बढ़ाते जाएँ।</li><li>15 दिनों तक लगातार इसी अनुपात में लें।</li><li>15 दिन बाद दानों की संख्या एक-एक कर घटाते जाएँ।</li><li>ये उपाय करीब एक महीने तक करें।</li></ul><h2 class="wp-block-heading">छोटे बच्चों को खांसी होने पर</h2><p>छोटे बच्चों की खाँसी में भी काली मिर्च खाने के फायदे हैं। काली मिर्च पीसकर थोड़े से शहद के साथ बच्चे को सोते समय दें, ऊपर से पानी ना पियें। इससे बच्चे के गले में जमा कफ गलकर निकल जाएगा और खांसी से निजात मिलेगी। छोटे बच्चे अक्सर पेट में कीड़े की समस्या से ग्रस्त हो जाते हैं। यदि आप उन्हें भोजन में नियमित काली मिर्च देंगे तो कुछ ही दिनों में कीड़े मल के साथ निकल जायेंगे और बच्चे को आराम आएगा।</p><h2 class="wp-block-heading">हिचकी में दिलाए तुरंत राहत</h2><p>थोड़ी-सी काली मिर्च को नींबू के साथ नमक और चीनी मिलाकर चाट लें, हिचकी बंद हो जाएगी।</p><h2 class="wp-block-heading">पेशाब में जलन की समस्या का समाधान</h2><p>मूत्राशय में किसी प्रकार का इंफेक्शन होने पर पेशाब करते वक्त तेज़ जलन का एहसास होता है। इस समस्या के उपचार के तौर पर दही में पका हुआ चावल मिलाकर ऊपर से काली मिर्च का पावडर बुरककर कुछ दिन खाएँ। काली मिर्च के फायदे इस रोग में भी हैं।</p><h2 class="wp-block-heading">बढ़ाए शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता</h2><p>काली मिर्च एक गज़ब का इम्यूनिटी बूस्टर माना जाता है। ये एंटी-बैक्टीरियल है इसलिए कई तरह के रोगों को दूर करने में इसका प्रयोग होता है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए काली मिर्च का सेवन करना चाहिए। शरीर अंदर से मजबूत होगा तो बीमारियाँ पास नहीं आएंगी। इसी तरह <a
href="/elovera-ke-fayde/">एलोवेरा भी एंटी-बैक्टीरियल गुणों से भरपूर है</a>।</p><p>काली मिर्च और बहुत से अन्य मसाले जैसे हल्दी, अदरक, तुलसी वगैरह के नियमित प्रयोग से शरीर की कोशिकाएँ स्वस्थ रहती है और कैंसर जैसे रोग होने की संभावना कम होती है। <a
href="/haldi-ke-fayde/">हल्दी के फायदे</a> भी अवश्य ही जानने चाहिए।</p><h2 class="wp-block-heading">ब्लड शुगर और कोलस्ट्रोल में लाभकारी</h2><p>बहूपयोगी काली मिर्च के रोजाना सेवन से ब्लड शुगर नियन्त्रण में मदद मिलती है। साथ ही ये शरीर के कोलस्ट्रोल को भी कम करने में असरदार है। कोलेस्ट्रोल की समस्या में <a
href="/dalchini-ke-fayde-in-hindi/">दालचीनी भी बहुत फायदेमंद</a> मानी जाती है। जो लोग काली मिर्च का लम्बे समय से सेवन करते आ रहे हैं उन्हें हृदय सम्बंधी समस्याएँ भी कम होती हैं।  </p><p>हमें उम्मीद है कि काली मिर्च के फायदे आप समझ गए होंग और आप शीघ्र ही इसे अपने भोजन व दिनचर्या में स्थान देंगे। हमें टिप्पणी करके ज़रूर बताएँ कि यह लेख आपको कैसा लगा।</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=20139</guid><description><![CDATA[<p>दालचीनी के फायदे इतने हैं कि आप जानकर हैरान रह जाएंगे। पढ़ें यह लेख और जानें दालचीनी के फायदे और</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/dalchini-ke-fayde-in-hindi/">दालचीनी के फायदे – Dalchini Ke Fayde in Hindi</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>दालचीनी के फायदे इतने हैं कि आप जानकर हैरान रह जाएंगे। पढ़ें यह लेख और जानें दालचीनी के फायदे और नुकसान क्या हैं।</p><p>दालचीनी के पेड़ मूल रूप से श्रीलंका, इंडोनेशिया, वियतनाम व चीन में पाए जाते हैं। कहते हैं कि भारत में दालचीनी श्रीलंका से आई जिसे बाद में देश के दक्षिणी प्रांत केरल में बड़े पैमाने पर उगाया जाने लगा। प्राचीन दस्तावेजों में उल्लेख मिलता है कि भारत मसालों का एक बड़ा निर्यातक था जिसमें दालचीनी प्रमुख थी। स्वाद में मीठी और बेहद सुगंधित दालचीनी को प्राचीन समय से ही भोजन, दवाइयों व सौंदर्य प्रसाधनों में प्रयोग किया जाता रहा है।</p><p>भारतीय भोजन के अलावा विदेशों में भी दालचीनी का प्रयोग खूब किया जाता है और इसकी चाय के तो कहने की क्या? सर्दियों में दालचीनी की चाय शरीर को तुरंत गर्मी देती है। दालचीनी के पेड़ों के अंदर की छाल को सुखा कर दालचीनी प्राप्त की जाती है। वैसे तो साबुत दालचीनी का अधिक प्रचलन है परंतु बाज़ार में आपको दालचीनी का तेल, पावडर और गोली भी मिल जाएगी। तो आइए, दालचीनी के बारे में इस संक्षिप्त जानकारी के बाद हम आपको दालचीनी के बहु-उपयोगी गुणों की जानकारी देते हैं।</p><p><strong>यह भी पढ़ें &#8211;</strong> <a
href="/saunf-khane-ke-fayde/">सौंफ खाने के फायदे</a></p><h2 class="wp-block-heading">दालचीनी के फायदे वज़न घटाने में&nbsp;</h2><p>जी हाँ, दालचीनी का प्रयोग शरीर की अतिरिक्त चर्बी हटाने में बेहद असरदार ढंग से काम करता है। बात अगर बढ़ते हुए वज़न को कम करने की हो तो दालचीनी से बढ़िया घरेलू उपचार और कुछ नहीं है। जो लोग दालचीनी नियमित रूप से खाते है, उनका वज़न नियन्त्रण में रहता है। तो अगर आप भी इसे आजमाना चाहते है तो निम्न उपाय करें–</p><ul><li>एक चम्मच दालचीनी पावडर एक गिलास पानी में उबालें। आधा रह जाने पर छान कर इस पानी को पी जाएँ। यह उपाय आपको हर सुबह खाली पेट करना होगा। इसके साथ नियमित व्यायाम वग़ैरह करते रहें, कुछ ही दिनों में असर दिखाई देगा।</li><li>दालचीनी पावडर के साथ शहद एक चम्मच व कुटी हुई अदरक रोज़ सुबह खाने से शरीर छरहरा बनता है व ऑर्गन फैट भी घटता है।</li><li>गर्भावस्था के बाद शीघ्र वज़न घटाने के लिए भोजन में दालचीनी का पावडर डालकर खाएँ।</li></ul><h2 class="wp-block-heading">दालचीनी से बढ़ाए रोग-निरोधक क्षमता&nbsp;</h2><p>दालचीनी में पोलीफेनोल्स नामक एंटी-ओक्सिडेंट सबसे ज्यादा पाया जाता है इसलिए ये हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाता है। यदि आप <a
href="/ritu-badali-to-kya-badali-hindi-kavita-naval-singh-bhadauria/">ऋतु परिवर्तन</a> से होने वाले रोगों जैसे सर्दी-बुखार या वायरल ज्वर से बचना चाहते हैं तो रोजाना दालचीनी का सेवन अवश्य करें।</p><p><strong>यह भी पढ़ें &#8211;</strong> <a
href="/sendha-namak-ke-fayde/">सेंधा नमक के फायदे</a></p><h2 class="wp-block-heading">मासिक धर्म की तकलीफ़ो में&nbsp;</h2><p>दालचीनी के फायदे आपको मासिक धर्म की तकलीफों से भी बचा सकते हैं। अक्सर स्त्रियों को मासिक धर्म के दौरान पेट व कमर दर्द की तकलीफ होती है। दालचीनी की चाय या दालचीनी के पानी से पेडू व कमर के दर्द से काफी राहत मिलती है। मासिक यदि रुक-रुक कर आता हो तो दालचीनी का कुनकुना पानी दिन-भर में पीते रहें।</p><h2 class="wp-block-heading">स्त्रियों में होरमोंल डिसऑर्डर रोगों से बचाव</h2><p>पोलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम एक तरह का होर्मोन्ल डिसऑर्डर रोग है। जब ओवरीज़ के अंदर छोटे-छोटे लम्प पैदा हो जाते हैं तो ओवरीज़ के आकार में अनावश्यक रूप से वृद्धि होने लगती है। ऐसे में दालचीनी के पानी को शहद के साथ लेने से जनन अंगो के इस रोग से काफी हद तक बचा जा सकता है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">हड्डियों में सूजन व दर्द होने पर&nbsp;</h2><p>दालचीनी के एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुणों के कारण हड्डियों की बिमारी जैसे जोड़ो के दर्द व चोट लगने आदि में दालचीनी के प्रयोग से दर्द से जल्दी राहत मिलती है व सूजन भी कम होती है। दालचीनी के साथ शहद का सेवन एक चमत्कारिक उपचार है।</p><p>शहद अपने आप में एक औषधि माना जाता है। यदि शहद को दालचीनी के साथ लिया जाए तो इनके मिश्रित गुण कई तरह के रोगों को दूर करने की क्षमता रखते हैं। हम आपको यहाँ दालचीनी व शहद के कुछ ऐसे उपाय बता रहे हैं जो आपको स्वस्थ व निरोगी रहने में सहायता करेंगे।</p><ul><li><a
href="/kabj-ka-permanent-ilaj-hindi/">कब्जीयत दूर करने के लिए</a> दालचीनी और शहद लें। सोने से पहले एक चम्मच शहद के साथ आधा चम्मच दालचीनी का चूर्ण मिलाकर नियमित रूप से खाएँ। ये पेट को साफ़ रखने में मदद करता है व आंतो में जमा मल बाहर निकाल देता है।</li><li>घाव जल्द भरे – किसी भी तरह के चोट या घाव होने पर शहद के साथ दालचीनी खाने से घाव बहुत जल्दी भर जाता है। शहद में एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं और दालचीनी एंटी-इन्फ्लेमेंटरी मानी जाती है।</li><li>मधुमेह रोग में लाभ – दालचीनी में प्राकृतिक रूप से मिठास होती है। दालचीनी व शहद का सेवन ब्लड शुगर घटाता है। इस लिहाज़ से टाइप 2 मधुमेह रोगियों के लिए दालचीनी को शहद के साथ लेना लाभ देता है और ये सफेद चीनी का बेहतर विकल्प भी है।&nbsp;</li><li>त्वचा के लिए – फोड़े-फुंसी या मुंहासे होने पर दालचीनी को पीस कर शहद के साथ लगाएँ। कुछ ही दिनों में मुंहासे सूखने लगेंगे।</li></ul><h2 class="wp-block-heading">रुखी त्वचा को मुलायम बनाए</h2><ul><li>दालचीनी पाउडर एक चम्मच दो चम्मच दूध के साथ मिलाकर चेहरे व गर्दन पर लगाकर रहने दें। आधे घंटे बाद पानी से धो लें। कुछ दिनों तक ये प्रयोग करने से अत्यंत रूखी त्वचा भी मुलामय होकर निखर आती है व दाग-धब्बे भी दूर होते हैं।</li><li>एक्जिमा में दालचीनी और शहद का पेस्ट लगाने से लाभ होता है।&nbsp;</li></ul><h2 class="wp-block-heading">चेहरे की रंगत निखारें दालचीनी से&nbsp;</h2><p>एक चम्मच दालचीनी लेकर उसमें आधा पका हुआ केला व कुछ बूंदे नींबू के रस की मिलाएँ। आप चाहें तो इस मिश्रण में नींबू की जगह दही का प्रयोग कर सकते हैं। इस मिश्रण को चेहरे व गर्दन पर लगाकर 20 मिनट बाद पानी से चेहरा धो लें। इस प्रयोग से कुछ ही दिनों में आपकी त्वचा बेहद चमकदार और निखरी नजर आएगी।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">बालों को स्वस्थ रखने के लिए दालचीनी के उपाय&nbsp;</h2><p>सुंदर, मज़बूत बालों के लिए ऑलिव ऑइल में दालचीनी पीस कर मिला लें। इस मिश्रण को बालों व सर की त्वचा पर हल्के हाथों से मालिश करते हुए लगाएँ। इस उपचार से बालों को पोषण भी मिलता है और रुसी आदि सम्स्याओ से भी छुटकारा मिलता है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">कोलस्ट्रोल का स्तर कम करे&nbsp;</h2><p>क्योंकि दालचीनी के गुण ओक्सिडेटिव स्ट्रेस व ब्लड ग्लूकोज़ कम करने में सहायक हैं इसलिए हृदय रोगियों को दालचीनी के सेवन से काफी लाभ मिलता है। जो लोग रोजाना अपने भोजन में दालचीनी का किसी न किसी रूप में उपयोग करते हैं उन्हें स्ट्रोक आने का खतरा कम होता है। ये रक्त धमनियों में वसा की परत जमने से रोकता है और एंटी-ओक्सीडेंट होने के कारण शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकलने में मदद करता है।</p><h2 class="wp-block-heading">अरोमा थेरेपी में प्रयोग&nbsp;</h2><p>दालचीनी का तेल–जिसे सिनेमन ऑइल भी कहते हैं–बाज़ार में आसानी से मिलता है। इस तेल को आप घर पर भी बना सकते हैं। अरोमा थेरेपी में दालचीनी के तेल को तनाव, थकान व दर्द से राहत पाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। दालचीनी का तेल आसानी से उपलब्ध हो जाता है परंतु अगर आप घर में इसे बनाना चाहते हैं तो विधि इस प्रकार है–</p><ol><li>2 कप शुद्ध ऑलिव ऑइल&nbsp;</li><li>आधा कप कुटी हुई दालचीनी</li></ol><p><strong>विधि –</strong> ऑलिव ऑइल के साथ दालचीनी को मद्धिम आंच पर 4 से 5 मिनट तक पका लें। इस मिश्रण को ठंडा करके किसी बोतल में भर कर रख लें। आप इस तेल को एक से दो महीने तक इस्तेमाल कर सकते हैं। दालचीनी के कुनकुने तेल की मालिश करने से शारीरिक थकावट दूर होती है। इस तेल से छोटे बच्चों की मालिश करने से उनकी हड्डियाँ मजबूत बनती हैं। सर में दर्द होने पर दालचीनी के तेल की मालिश करें, शीघ्र आराम मिलेगा।</p><h2 class="wp-block-heading">एंटी-फंगल व एंटी-बैक्टीरियल&nbsp;</h2><p>दालचीनी एक बेहद असरदार एंटी-बैक्टीरियल मानी जाती है इसलिए फंगल रोगों में आपको दालचीनी का तेल पानी में मिलाकर प्रभावित स्थान पर लगाने से कुछ ही दिनों में आराम मिलेगा। ये फंगस के यीस्ट को शरीर में फैलने से रोकता है। इस दालचीनी के फायदे को बहुत ज़्यादा लोग नहीं जानते हैं।</p><p>दालचीनी व युक्लिप्दुस के तेल में नींबू का रस मिलाकर एक स्प्रे बोतल में भरकर रख लें। लीजिए, हो गया आपका घरेलु कीटनाशक तैयार। इस मिश्रण का छिड़काव करने से घर में कीड़े-मकोड़े, मच्छर-मक्खी आदि की समस्या से छुटकारा मिलेगा। आप इसे कच्चे खाद्य पदार्थो जैसे चावल, दाल आदि को फंफूदी से बचाने के लिए भी प्रयोग कर सकते हैं।</p><h2 class="wp-block-heading">दालचीनी की चाय&nbsp;</h2><p>चाय में दालचीनी डालने से उसका स्वाद व सुगंध दोनों बढ़ जाते हैं। ठंड के मौसम में विशेष रूप से दालचीनी और गुड़ की चाय पीने से मौसमी सर्दी-जुखाम, नाक बंद जैसी परेशानियों से राहत मिलती है। इसके अतिरिक्त शरीर में रक्त संचालन की प्रकिया को संतुलित करने में दालचीनी काफी फायदेमंद है।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">दालचीनी से सांस की बदबू का उपचार&nbsp;</h2><p>दांतों की अगर ठीक से सफाई ना की जाए तो कैविटी, दांत-दर्द और मुंह की बदबू जैसी परेशानियां होने लगती हैं। इसलिए दांतों की उचित देखभाल के लिए ऐसे दंत मंजन का प्रयोग करना आवश्यक है जिसमें एंटी-बैक्टीरियल गुण हों और दालचीनी एक उत्तम एंटी-बैक्टीरियल होने के कारण दांतों को स्वस्थ रखने में मदद करता है।</p><ul><li>दालचीनी के पानी का कुल्ला करने से मुंह की दुर्गंध दूर होगी।</li><li>दंत मंजन के साथ थोड़ी-सी पिसी दालचीनी मिलाकर ब्रश करने से दांतों में कीड़ा नहीं लगेगा।</li></ul><p>नवप्रसूता स्त्रियों में दूध ना उतरने की समस्या में दालचीनी का प्रयोग करना चाहिए। दालचीनी रक्त को सुचारू रूप से संचालित करने में मदद करती है जिससे कि माताओं में शिशु के लिए पर्याप्त मात्रा में दूध बनने लगता है। कई बार प्रसव के कुछ काल तक माहवारी अनियमित रहती है, इसके लिए भी दालचीनी का सेवन करना लाभकारी है।</p><p>हमारी यही आशा है कि इस लेख में हमने दालचीनी के बारे में जो जानकारी उपलब्ध कराई है उनके प्रयोग से आपको अवश्य लाभ होगा। दालचीनी के फायदे आपको स्वस्थ व निरोगी काया प्रदान करेंगे।</p><h2 class="wp-block-heading">यह भी पढ़ें</h2><ul><li><a
href="/ilaichi-ke-fayde/">इलायची के फायदे</a></li><li><a
href="/long-ke-fayde/">लौंग के फायदे</a></li><li><a
href="/elovera-ke-fayde/">एलोवेरा के फायदे</a></li><li><a
href="/anjeer-ke-fayde/">अंजीर के फायदे</a></li><li><a
href="/mungfali-khane-ke-fayde/">मूंगफली खाने के फायदे</a></li><li><a
href="/anda-khane-ke-fayde/">अंडे खाने के फायदे</a></li></ul><p>The post <a
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