ज्ञानयोग – स्वामी विवेकानंद की प्रसिद्ध पुस्तक

“ज्ञानयोग” स्वामी विवेकानंद की मुख्य पुस्तकों में से एक है। इस विषय पर उन्होंने लंदन और न्यू यॉर्क में जो व्याख्यान दिए थे, उनको संकलित करके ही यह पुस्तक बनायी गयी है। ये भाषण श्री गुडविन नामक स्टेनोग्राफ़र ने लिपिबद्ध किए थे, जो बाद में स्वामी विवेकानन्द के शिष्य बन गए थे। “ज्ञानयोग” वस्तुतः दो शब्दों से मिलकर बना है – “ज्ञान” और “योग”। यह ज्ञान द्वारा ईश्वर से ऐक्य उपलब्ध करने का साधन है। यह मार्ग उन लोगों के लिए है जो बुद्धि-प्रधान हैं और तर्क तथा युक्ति से आत्मज्ञान की प्राप्ति करना चाहते हैं। पढ़ें स्वामी विवेकानंद की विख्यात किताब “ज्ञानयोग” हिंदी में–

  1. मनुष्य का यथार्थ स्वरूप
  2. मनुष्य का वास्तविक और प्रातिभासिक स्वरूप
  3. माया और भ्रम
  4. माया और ईश्वर धारणा का क्रम विकास
  5. माया और मुक्ति
  6. ब्रह्म एवं जगत
  7. विश्व बृहत ब्रह्माण्ड
  8. विश्व सूक्ष्म बृह्माण्ड
  9. अमरत्व
  10. बहुत्व में एकत्व
  11. सभी वस्तुओं में ब्रह्मदर्शन
  12. अपरोक्षानुभूति
  13. आत्मा का मुक्त स्वभाव
  14. धर्म की आवश्यकता
  15. त्मा
  16. आत्मा उसके बंधन तथा मुक्ति
  17. संन्यासी का गीत

ज्ञान योग पुस्तक में सत्रह अध्याय हैं, जो स्वामी जी के व्याख्यानों का लिपिबद्ध रूप हैं। इसमें वेदान्त के सूक्ष्म तत्त्वों की बड़ी सुन्दर और तार्किक व्याख्या की गयी है। कई अध्याय मूल वेदांत ग्रंथों अर्थात उपनिषदों पर आधारित हैं जिनकी सुललित विवेचना स्वामी विवेकानंद ने की है। जो भी इस पुस्तक को पढ़ता है, वह स्वामी जी की गंभीर प्रतिभा के ज्ञानयोग के उदात्त तत्त्वों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है।

यह एक व्यावहारिक मार्ग है। स्वामी जी के अनुसार जीवन का हर पहलू ज्ञान योग से उत्पन्न हुई चेतना द्वारा आच्छादित होना चाहिए। केवल बौद्धिक चिंतन नहीं, अपितु इन तत्त्वों का जीवन में व्यवहार बहुत आवश्यक है। यह पुस्तक हर हिंदीभाषी को नई दृष्टि प्रदान करेगी और सोचने की नई दिशा देगी।

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सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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