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><channel><title>Alasinga Perumal Archives - हिंदी पथ</title> <atom:link href="https://hindipath.com/tag/alasinga-perumal/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" /><link>https://hindipath.com/tag/alasinga-perumal/</link> <description>हिंदी का संसार</description> <lastBuildDate>Mon, 04 Apr 2022 10:30:18 +0000</lastBuildDate> <language>en-US</language> <sy:updatePeriod> hourly </sy:updatePeriod> <sy:updateFrequency> 1 </sy:updateFrequency> <generator>https://wordpress.org/?v=6.3.8</generator><image> <url>https://hindipath.com/wp-content/uploads/2019/09/HindiPath-Site-Icon-New.png</url><title>Alasinga Perumal Archives - हिंदी पथ</title><link>https://hindipath.com/tag/alasinga-perumal/</link> <width>32</width> <height>32</height> </image> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (20 नवम्बर, 1896)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-20-november-1896/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-20-november-1896/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Fri, 26 Mar 2021 13:27:59 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Alasinga Perumal]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5383</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र लन्दन से श्री आलसिंगा पेरूमल को 20 नवम्बर, 1896 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-20-november-1896/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (20 नवम्बर, 1896)</a> appeared first on <a
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class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/download-the-complete-works-of-swami-vivekananda-in-hindi-free/">स्वामी विवेकानंद</a> का श्री आलासिंगा पेरुमल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">३९, विक्टोरिया स्ट्रीट, लन्दन,<br>२० नवम्बर, १८९६</p><p>प्रिय आलासिंगा,</p><p>मैं इंग्लैण्ड से इटली के लिए १६ दिसम्बर को रवाना होऊँगा और नेपल्स से ‘नार्थ जर्मन लॉयड एस. एस. प्रिन्स रीजेन्ट लिओपोल्ड’ नामक जहाज से प्रस्थान करूँगा। जहाज आगामी १४ जनवरी को कोलम्बो पहुँचने वाला है।</p><p>श्रीलंका में कुछ चीजें देखने की मेरी इच्छा है; वहाँ से फिर मद्रास पहुँचूँगा। मेरे साथ तीन अंग्रेज दोस्त हैं – कैप्टन तथा श्रीमती सेवियर तथा श्री गुडविन। श्री सेवियर और उसकी पत्नी अल्मोड़ा के पास हिमालय में एक मठ बनाने की सोच रहे हैं, जिसे मैं अपना ‘हिमालय केन्द्र’ बनाना चाहता हूँ और वहीं पाश्चात्य शिष्यों को ब्रह्मचारी और संन्यासी के रूप में रखूँगा। गुडविन एक अविवाहित नवयुवक है। वह मेरे साथ भ्रमण करेगा और मेरे ही साथ रहेगा। वह संन्यासी जैसा ही है।</p><p>मेरी तीव्र अभिलाषा है कि श्रीरामकृष्ण देव के जन्मोत्सव से पहले मैं कलकत्ता पहुँच जाऊँ। मेरी वर्तमान कार्य-योजना यह है कि युवक प्रचारकों के प्रशिक्षण के लिए कलकत्ता और मद्रास में दो केन्द्र स्थापित करना है। कलकत्ते के केन्द्र के लिए मेरे पास पर्याप्त धन है। कलकत्ता <a
href="/ramkrishna-paramhans-biography-in-hindi/">श्रीरामकृष्ण</a> के कर्म-जीवन का क्षेत्र रह चुका है, इसलिए वह मेरा ध्यान पहले आकर्षित करता है। मद्रास के केन्द्र के लिए मैं आशा करता हूँ कि भारत से मुझे धन मिल जायेगा।</p><p>इन तीन केन्द्रों से हम काम आरम्भ करेंगे। फिर इसके बाद बम्बई और इलाहाबाद में भी केन्द्र बनायेंगे। इन तीन स्थानों से यदि भगवान् की कृपा हुई तो हम भारत भर में ही नहीं, परन्तु संसार के प्रत्येक देश में प्रचारकों का दल भेजेंगे। यह हमारा पहला कर्तव्य होना चाहिए। दिल लगाकर काम करते रहो। कुछ समय के लिए लन्दन का मुख्य कार्यालय ३९, विक्टोरिया स्ट्रीट में रहेगा, क्योंकि कार्य यहीं से होगा। स्टर्डी के पास सन्दूक भर ‘ब्रह्मवादिन्’ पत्रिका है, जिसका मुझे पहले पता नहीं था। वह अब इसके लिए ग्राहक बनाने के लिए प्रचार-कार्य कर रहा है।</p><p>चूँकि अब अंग्रेजी भाषा में भारत से एक पत्रिका आरम्भ हो गयी है, अतः अब भारतीय भाषाओं में भी हम कोई पत्रिका आरम्भ कर सकते हैं। विम्बलडन की कुमारी एम. नोबल बड़ी काम करने वाली है। वह मद्रास की दोनों पत्रिकाओं के लिए प्रचारकार्य भी करेगी। वह तुम्हें लिखेगी। ऐसे कार्य धीरे-धीरे, किन्तु निश्चित रूप से आगे बढ़ेंगे। ऐसी पत्रिकाओं को अनुयायियों के छोटे से समुदाय द्वारा ही सहायता मिलती है। एक ही समय में उनसे अनेक कार्य करने की आशा नहीं करनी चाहिए। उनको पुस्तकें खरीदनी पड़ती हैं; इंग्लैण्ड का कार्य चलाने के लिए पैसा एकत्र करना पड़ता है; यहाँ की पत्रिका के लिए ग्राहक ढूँढ़ने पड़ते हैं और फिर भारतीय पत्रिकाओं को खरीदना पड़ता है। यह बहुत ज्यादती है। यह शिक्षा प्रचार की अपेक्षा व्यापार-कार्य अधिक जान पड़ता है। ऐसी स्थिति में तुम धीरज रखो। फिर भी मुझे आशा है कि कुछ ग्राहक बन ही जायेंगे। इसके अलावा मेरे जाने के बाद यहाँ लोगों के पास करने के लिए काम होना चाहिए, नहीं तो सब किया-कराया मिट्टी में मिल जायेगा। इसलिए धीरे-धीरे यहाँ और अमेरिका में भी पत्रिका होना चाहिए। भारतीय पत्रिकाओं की सहायता भारतवासियों को ही करनी चाहिए। किसी पत्रिका के सब राष्ट्रों में समान भाव से अपनाये जाने के लिए, सब राष्ट्रों के लेखकों को एक बड़ा भारी विभाग रखना पड़ेगा, जिसके माने हैं प्रतिवर्ष एक लाख रूपये का खर्च।</p><p>तुम्हें यह न भूलना चाहिए कि मेरे कार्य अन्तरराष्ट्रीय हैं, केवल भारतीय नहीं। मेरा तथा अभेदानन्द दोनों का <a
href="/category/health-fitness/">स्वास्थ्य</a> अच्छा है।</p><p
class="has-text-align-right">शुभाकांक्षी,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-20-november-1896/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (11 नवम्बर, 1896)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-11-november-1896/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-11-november-1896/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Fri, 26 Mar 2021 13:09:00 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Alasinga Perumal]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5379</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र श्री आलसिंगा पेरूमल को 11 नवम्बर, 1896 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-11-november-1896/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (11 नवम्बर, 1896)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/download-the-complete-works-of-swami-vivekananda-in-hindi-free/">स्वामी विवेकानंद</a> का श्री आलासिंगा पेरुमल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">१४, ग्रेकोट गार्डन्स,<br>वेस्टमिनिस्टर, एस. डब्ल्यू.,<br>११ नवम्बर, १८९६</p><p>प्रिय आलासिंगा,</p><p>बहुत संभव है कि मैं १६ दिसम्बर या उसके दो एक दिन बाद यहाँ से प्रस्थान करूँ। यहाँ से इटली जाऊँगा और वहाँ के कुछ स्थानों को देखने के बाद नेपुल्स में स्टीमर पर सवार हो जाऊँगा। कुमारी मूलर, श्री और श्रीमती सेवियर तथा गुडविन नामक एक युवक मेरे साथ चल रहे हैं। सेवियर दम्पत्ति अल्मोड़े में बसने जा रहे हैं और कुमारी मूलर भी। सेवियर भारतीय सेना में पाँच साल तक अफसर के पद पर थे। अतः भारत के बारे में उन्हें काफी जानकारी है। कुमारी मूलर थियोसॉफिस्ट थीं जिन्होंने अक्षय को गोद लिया। गुडविन अंग्रेज हैं जिनके द्वारा शीघ्रलिपि में तैयार की गयी टिप्पणियों से पुस्तिकाओं का प्रकाशन सम्भव हुआ।</p><p>मैं कोलम्बो से सर्वप्रथम मद्रास पहुँचूँगा। अन्य लोग अल्मोड़े जायेंगे। वहाँ से मैं कलकत्ता जाऊँगा। जब मैं यहाँ से प्रस्थान करूँगा, तब ठीक-ठीक सूचना देते हुए पत्र लिखूँगा।</p><p>तुम्हारा शुभाकक्षी,</p><p
class="has-text-align-right">विवेकानन्द</p><p>पुनश्च – ‘<a
href="/swami-vivekananda-raj-yog-hindi-free-download-pdf/">राजयोग</a>’ पुस्तक के प्रथम संस्करण की सभी प्रतियाँ बिक गयीं और द्वितीय संस्करण छपने के लिए प्रेस में है। भारत और अमेरिका सबसे बड़े खरीददार हैं।</p><p
class="has-text-align-right">वि.</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-11-november-1896/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (11 नवम्बर, 1896)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-11-november-1896/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (28 अक्टूबर, 1896)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-28-october-1896/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-28-october-1896/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Fri, 26 Mar 2021 12:32:33 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Alasinga Perumal]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5373</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र लन्दन से श्री आलासिंगा पेरुमल को 28 अक्टूबर, 1896 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-28-october-1896/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (28 अक्टूबर, 1896)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/download-the-complete-works-of-swami-vivekananda-in-hindi-free/">स्वामी विवेकानंद</a> का श्री आलासिंगा पेरुमल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">द्वारा ई. टी. स्टर्डी,<br>३९, विक्टोरिया स्ट्रीट, लन्दन<br>२८ अक्टूबर, १८९६</p><p>प्रिय आलासिंगा,</p><p>… अभी पक्का तय नहीं कर पाया हूँ कि भारत में किस महीने लौटूँगा। इसके बारे में फिर लिखूँगा। कल एक मैत्रीपूर्ण समिति की सभा में नए स्वामीजी<sup>1</sup> ने अपनी प्रथम वक्तृता दी। यह अच्छी थी तथा मुझे पसन्द आई; उसके भीतर अच्छा वक्ता होने की शक्ति है, यह मेरा पक्का विश्वास हैं।</p><p>‘सार्वजनीन <a
href="/category/dharma/">धर्म</a>’ की तरह ‘<a
href="/bhakti-yog-swami-vivekananda-hindi/">भक्तियोग</a>’ की छपाई सुन्दर नहीं हुई… और फिर ज्यादा बिक्री के लिए भारत में किताबों का सस्ता होना तथा खरीदने वालों की प्रसन्नता हेतु अक्षरों का मोटा होना ही चाहिए…। यदि चाहो तो … का सस्ता संस्करण प्रकाशित करवा सकते हो। जानबूझकर इसका कॉपीराइ`ट मैंने सुरक्षित नहीं करवाया है। तुमने … पुस्तक को पहले न छापकर अच्छा मौका खो दिया है, परंतु हम हिन्दु इतने दीर्घसूत्री हैं कि जब तक हमारा काम पूरा होता हैं तब तक उसकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है, अतः इस प्रकार हम लुटे जाते हैं। तुम्हारी … पुस्तक एक वर्ष की चर्चा के बाद छपी है! तुम क्या सोचते हो कि पश्चिमी देशों के लोग इसके लिए महाप्रलय तक प्रतीक्षा करेंगे? इस देरी के कारण तुमने तीन-चौथाई बिक्री खो दी है … और वह हरमोहन तो मूर्ख है, तुमसे भी ज्यादा ढीला है, और उसकी छपाई तो एकदम भद्दी है। इस प्रकार पुस्तकें प्रकाशित करवाने का कोई अर्थ नहीं हैं, यह तो लोगों को धोखा देना हुआ, फिर ऐसा नहीं होना चाहिए।</p><p>बहुत सम्भव है कि श्रीमती तथा श्री सेवियर, कुमारी मूलर और श्री गुडविन सहित मैं भारत लौटूँगा। श्रीमती तथा श्री सेवियर सम्भवतः कुछ समय के लिए अल्मोड़ा में रह सकते हैं और गुडविन संन्यासी बनने वाला है। वह अवश्य ही मेरे साथ भ्रमण करेगा। अपनी सभी पुस्तकों के लिए हम उसके ऋणी हैं। मेरी वक्तृताओं को उसने सांकेतिक प्रणाली में लिख रखा था जिससे पुस्तकों का प्रकाशित होना सम्भव हुआ है… ये सभी वक्तृताएँ किसी भी पूर्व तैयारी के बिना, तत्काल दी गई थीं इसलिए उन्हें ध्यानपूर्वक पुनः जाँच कर उनका सम्पादन करना चाहिए।…</p><p>गुडविन मेरे साथ रहेगा … वह पक्का शाकाहारी है।</p><p
class="has-text-align-right">सप्रेम तुम्हारा,<br>विवेकानन्द</p><p>पुनश्च – डा. बैरौज का स्वागत किस प्रकार किया जाए इस विषय में एक छोटा लेख मैंने आज ‘इण्डियन मिरर’ को भेजा हैं। तुम भी उनके स्वागत में कुछ अच्छे शब्द ब्रह्मवादिन् में लिखो। यहाँ सब की ओर से प्रेम सहित</p><p
class="has-text-align-right">वि.</p><hr
class="wp-block-separator"/><hr
class="wp-block-separator"/><ol><li><a
href="/swami-vivekananda-ke-patra-swami-abhedananda-october-1895/">स्वामी अभेदानन्द</a></li></ol><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-28-october-1896/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (28 अक्टूबर, 1896)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-28-october-1896/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (1896)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-1896-2/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-1896-2/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Fri, 26 Mar 2021 11:42:19 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Alasinga Perumal]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5367</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र लन्दन से श्री आलासिंगा पेरुमल को 1896 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-1896-2/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (1896)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/download-the-complete-works-of-swami-vivekananda-in-hindi-free/">स्वामी विवेकानंद</a> का श्री आलासिंगा पेरुमल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">१४, ग्रेकोट गार्डन्स,<br>वेस्टमिनिस्टर, लन्दन,<br>१८९६</p><p>प्रिय आलासिंगा,</p><p>लगभग तीन सप्ताह हुए मैं स्विट्जरलैण्ड से लौटा हूँ, पर इसके पूर्व तुम्हें पत्र न लिख सका। पिछली डाक से मैंने तुम्हें कील के पॉल डॉयसन पर लिखा एक लेख भेजा था। स्टर्डी की पत्रिका की योजना में अभी भी विलम्ब है। जैसा कि तुम जानते हो मैंने सेंट जार्ज रोड स्थित मकान छोड़ दिया है। ३९, विक्टोरिया स्ट्रीट पर एक लेक्चर हॉल हमें मिल गया है। <a
href="/swami-vivekananda-ke-patra-shri-e-t-sturdy-10-september-1896/">ई. टी. स्टर्डी</a> के मार्फत भेजने पर चिट्ठी-पत्री मुझे एक साल तक मिल जाया करेगी। ग्रेकोट गार्डन्स के कमरे मेरे तथा मात्र तीन महीने के लिए आये हुए स्वामियों के आवास के लिए हैं। लन्दन में काम शीघ्रता से बढ़ रहा है और हमारी कक्षाएँ बड़ी होती जा रही हैं। इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं कि यह इस रफ्तार से बढ़ता ही जायगा, क्योंकि अंग्रेज लोग दृढ़ एवं निष्ठावान हैं। यह सही है कि मेरे छोड़ते ही इसका अधिकांश तानाबाना टूट जायगा। कुछ घटित अवश्य होगा। कोई शक्तिशाली व्यक्ति इसे वहन करने के लिए उठ खड़ा होगा। ईश्वर जानता है कि क्या अच्छा है। अमेरिका में वेदान्त और योग पर बीस उपदेशकों की आवश्यकता है। पर ये उपदेशक और इन्हें यहाँ लाने के लिए धन कहाँ मिलेगा? यदि कुछ सच्चे और शक्तिशाली मनुष्य मिल जायें तो आधा संयुक्त राज्य दस वर्ष में जीता जा सकता है। वे कहाँ हैं? वहाँ के लिए हम सब अहमक हैं। स्वार्थी, कायर, देश-भक्ति की केवल मुख से बकवास करने वाले, और अपनी कट्टरता तथा धार्मिकता के अभिमान से चूर!! मद्रासियों<sup>1</sup>में अधिक स्फूर्ति और दृढ़ता होती है, परन्तु वहाँ हर मूर्ख विवाहित है। ओफ, विवाह! विवाह! विवाह! और फिर आजकल के विवाह का तरीका जिसमें लड़कों को जोत दिया जाता है! अनासक्त गृहस्थ होने की इच्छा करना बहुत अच्छा है, परन्तु मद्रास में अभी उसकी आवश्यकता नहीं है बल्कि अविवाह की है…</p><p>मेरे बच्चे, मैं जो चाहता हूँ वह है लोहे की नसें और फौलाद के स्नायु जिनके भीतर ऐसा मन वास करता हो, जो कि वज्र के समान पदार्थ का बना हो। बल, पुरुषार्थ, क्षात्रवीर्य और ब्रह्मतेज। हमारे सुन्दर होनहार लड़के – उनके पास सब कुछ है यदि वे विवाह नाम की क्रूर वेदी पर लाखों की गिनती में बलिदान न किये जायें! हे भगवान्, मेरे हृदय का क्रन्दन सुनो। मद्रास तभी जाग्रत होगा, जब उसके प्रत्यक्ष हृदय स्वरूप सौ शिक्षित नवयुवक संसार को त्यागकर और कमर कस कर, देश-देश में भ्रमण करते हुए सत्य का संग्राम लड़ने के लिए तैयार होंगे। भारत के बाहर का एक आघात भारत के अन्दर के एक लाख आघातों के बराबर है। खैर, यदि प्रभु की इच्छा होगी तो सभी कुछ हो जायेगा।</p><p>मिस मूलर ही वह व्यक्ति हैं जिनसे मैंने तुम्हें रुपये दिलाने का वचन दिया था। मैंने उन्हें तुम्हारे नये प्रस्ताव के विषय में बतला दिया है। वे उसके बारे में सोच रही हैं। इस बीच मैं सोचता हूँ उन्हें कुछ काम दे देना उचित रहेगा। उन्होंने ‘ब्रह्मवादिन्’ और ‘प्रबुद्ध भारत’ का प्रतिनिधि बनना स्वीकार कर लिया है। इसके विषय में क्या तुम उन्हें लिखोगे? उनका पता है : एयरली लॉज, रिजवे गार्डन्स, विम्बल्डन, इंग्लैण्ड। वहीं उनके साथ पिछले कई हफ्तों से मैं रह रहा था। लेकिन लन्दन का काम मेरे वहाँ रहे बिना संभव नहीं है। इसीलिए मैंने अपना आवास बदल दिया है। मुझे दुःख है कि इससे मिस मूलर की भावनाओं को थोड़ी ठेस पहुँची है। लेकिन किया ही क्या जा सकता है! उनका पूरा नाम है मिस हेनरियेटा मूलर। मैक्समूलर के साथ गाढ़ी मित्रता हो रही है। मैं शीघ्र ही ऑक्सफोर्ड में दो व्याख्यान देने वाला हूँ।</p><p>मैं वेदान्त दर्शन पर कुछ बड़ी चीज लिख रहा हूँ और भिन्न-भिन्न वेदों से वाक्य संग्रह करने में लगा हूँ, जो कि वेदान्त की तीनों अवस्थाओं से सम्बन्ध रखते हैं। पहले अद्वैतवाद सम्बन्धी विचार, फिर विशिष्टाद्वैत और द्वैत से जो वाक्य सम्बन्ध रखते हों, वे संहिता, ब्राह्मण, उपनिषद् और पुराण में से किसी से संग्रह कराकर तुम मेरी सहायता कर सकते हो। वे श्रेणीबद्ध होने चाहिए, शुद्ध अक्षरों में लिखे जाने चाहिए और प्रत्येक के साथ ग्रन्थ और अध्याय के नाम उद्धृत होने चाहिए। पुस्तक रूप में दर्शनशास्त्र को पश्चिम में छोड़े बिना पश्चिम से चल देना दयनीय होगा।</p><p>मैसूर से तमिल अक्षरों में एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी, जिसमें सभी १०८ उपनिषद् सम्मिलित थे। मैंने प्रोफेसर डॉयसन के पुस्तकालय में वह पुस्तक देखी थी। क्या वह देवनागरी अक्षरों में भी मुद्रित हुई है? यदि हो तो मुझे एक प्रति भेजना। यदि न हो तो मुझे तमिल संस्करण तथा एक कागज पर तमिल अक्षर और संयुक्ताक्षर लिखकर भेज देना। उसके साथ देवनागरी समानार्थक अक्षर भी लिख देना जिससे मैं तमिल अक्षर पहचानना सीख जाऊँ।</p><p>श्री सत्यनाथन् जिनसे कुछ दिन हुए मैं लंदन में मिला था, कहते थे कि ‘मद्रास मेल’ ने जो मद्रास का मुख्य ऐंग्लो इण्डियन समाचार पत्र है, मेरी पुस्तक ‘<a
href="/swami-vivekananda-raj-yog-hindi-free-download-pdf/">राजयोग</a>’ की अनुकूल समीक्षा की है। मैंने सुना है कि अमेरिका के प्रधान शरीर-शास्त्रज्ञ मेरे विचारों पर मुग्ध हो गये हैं। उसके साथ ही इंग्लैण्ड में कुछ लोगों ने मेरे विचारों का मजाक उड़ाया है। यह ठीक ही है; क्योंकि इसमें सन्देह नहीं कि मेरे विचार नितान्त साहसिक हैं और बहुत कुछ उनमें से हमेशा के लिए अर्थहीन रहेंगे, परन्तु उनमें कुछ ऐसे संकेत भी हैं जिन्हें शरीर-शास्त्रज्ञ यदि शीघ्र ही ग्रहण कर ले तो अच्छा हो। फिर भी उसके परिणाम से मैं बिल्कुल सन्तुष्ट हूँ। वे चाहे मेरी निन्दा ही करें, पर चर्चा तो करें। यह मेरा आदर्श-वाक्य है। इंग्लैण्ड में बेशक भद्र लोग हैं और बेहूदी बातें नहीं करते, जैसा कि मैंने अमेरिका में पाया और फिर इंग्लैण्ड के लगभग सभी मिशनरी भिन्नमतावलम्बी वर्ग के हैं। वे इंग्लैण्ड के भद्र-जन वर्ग से नहीं आते। यहाँ के सभी धार्मिक भद्रजन इंग्लिश चर्च को मानते हैं। उन भिन्न मतावलम्बियों की इंग्लैण्ड में कोई पूछ नहीं है और वे शिक्षित भी नहीं हैं। उनके बारे में मैं यहाँ कुछ भी नहीं सुनता, जिनके विषय में तुम मुझे बार-बार आगाह करते हो। उनको यहाँ कोई नहीं जानता और यहाँ बकवास करने की उनको हिम्मत भी नहीं है। आशा है आर. के. नायडू मद्रास में ही होंगे और तुम कुशलपूर्वक हो।</p><p>डटे रहो मेरे बहादुर बच्चों! हमने अभी कार्य आरम्भ ही किया है। निराश न हो! कभी न कहो कि बस इतना काफी है!… जैसे ही मनुष्य पश्चिम में आकर दूसरे राष्ट्रों को देखता है, उसकी आँखें खुल जाती हैं। इसी तरह मुझे शक्तिशाली कार्यकर्ता मिल जाते हैं – केवल बातों से नहीं, प्रत्यक्ष दिखाने से कि हमारे पास भारत में क्या है और क्या नहीं। मेरी कितनी इच्छा है कि कम से कम दस लाख हिन्दू पूरे संसार का भ्रमण किये हुए होते!</p><p
class="has-text-align-right">प्रेमपूर्वक सदैव तुम्हारा,<br>विवेकानन्द</p><hr
class="wp-block-separator"/><ol><li>मद्रासी शब्द का प्रयोग स्वामीजी ने सदैव एक व्यापक संदर्भ में किया है, जिसके अन्तर्गत संम्पूर्ण दक्षिणवासी आ जाते हैं।</li></ol><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-1896-2/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (1896)</a> appeared first on <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5365</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र इंग्लैण्ड से श्री आलासिंगा पेरुमल को 22 सितम्बर, 1896 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-22-september-1896/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (22 सितम्बर, 1896)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/download-the-complete-works-of-swami-vivekananda-in-hindi-free/">स्वामी विवेकानंद</a> का श्री आलासिंगा पेरुमल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">द्वारा कुमारी मूलर,<br><a
href="/gyan-yog-swami-vivekananda-hindi/">/gyan-yog-swami-vivekananda-hindi/</a>एयरली लॉज, रिजवे गार्डन्स,<br>विम्बलडन, इंग्लैण्ड,<br>२२ सितम्बर, १८९६</p><p>प्रिय आलासिंगा,</p><p>मैक्समूलर द्वारा लिखित <a
href="/ramkrishna-paramhans-biography-in-hindi/">रामकृष्ण</a> पर जो लेख मैंने तुम्हें भेजा था, आशा है मिला होगा। उन्होंने कहीं भी मेरे नाम की चर्चा नहीं की है – इसके लिए दुःखित मत होना। क्योंकि मुझसे परिचय होने के छः माह पूर्व उन्होंने यह लेख लिखा था और यदि उनका मूल वक्तव्य सही है तो फिर इससे क्या लेना-देना कि किसका नाम उन्होंने लिया और नहीं लिया। जर्मनी में प्रोफेसर डॉयसन के साथ मेरा समय आनन्दपूर्वक कटा। इसके बाद हम दोनों साथ ही लन्दन आये और हमारी मित्रता घनिष्ठ हो गयी है।</p><p>मैं शीघ्र ही उनके सम्बन्ध में एक लेख भेज रहा हूँ। सिर्फ एक प्रार्थना है, मेरे लेख के पहले पुराने ढंग का – ‘प्रिय महाशय’ मत जोड़ा करो। तुमने ‘<a
href="/swami-vivekananda-raj-yog-hindi-free-download-pdf/">राजयोग</a>’ पुस्तक अभी तक देखी है या नहीं, इस वर्ष के लिए मैं एक प्रारूप भेजने की चेष्टा करूँगा। मैं तुम्हें ‘डेली न्यूज’ में प्रकाशित रूस के जार द्वारा लिखित यात्रा-पुस्तक की समीक्षा भेज रहा हूँ। जिस परिच्छेद में उन्होंने भारत को अध्यात्म और ज्ञान का देश कहा है – उसको तुम अपने पत्र में उद्धृत करके एक निबन्ध ‘इंडियन मिरर’ को भेज दो।</p><p>तुम <a
href="/gyan-yoga-par-pravachan-swami-vivekananda/">ज्ञानयोग</a> के व्याख्यान को खुशी से प्रकाशित कर सकते हो। और डॉक्टर नन्जुन्दा राव भी उसे अपने ‘प्रबुद्ध भारत’ के लिए ले सकते हैं किन्तु सिर्फ सरल और सहज भाषणों को। उन व्याख्यानों को एक बार सावधानी से देखकर उसमें पुनरावृत्ति और परस्पर विरोधी विचारों को निकाल देना है। मुझे पूरी आशा है कि लिखने के लिए अब अधिक समय मिलेगा। पूरी शक्ति के साथ कार्य में जुटे रहो।</p><p>सभी को प्यार –</p><p
class="has-text-align-right">तुम्हारा,<br>विवेकानन्द</p><p>पुनश्च – मैंने उद्धृत होने वाले परिच्छेद को रेखांकित कर दिया है। बाकी अंश किसी पत्रिका के लिए निरर्थक हैं।</p><p>मैं नहीं समझता कि अभी पत्रिका को मासिक बनाने से कोई लाभ होगा – जब तक कि तुमको यह विश्वास न हो जाय कि उसका कलेवर मोटा होगा। जैसा कि अभी है – कलेवर और सामग्री सभी मामूली है। अभी भी एक बहुत बड़ा क्षेत्र पड़ा हुआ है, जो अभी तक छुआ नहीं गया है। यथा – <a
href="/tulsidas-ka-jivan-parichay-hindi/">तुलसीदास</a>, <a
href="/kabir-das-hindi-life-story/">कबीर</a> और <a
href="/guru-nanak-hindi-life-story/">नानक</a> तथा दक्षिण भारत के सन्तों के जीवन और कृति के सम्बन्ध में लिखना। इसे विद्वत्तापूर्ण शैली तथा पूरी जानकारी के साथ लिखना होगा – ढीले-ढाले और अधकचरे ढंग से नही; असल में पत्र को आदर्श – वेदान्त के प्रचार के अलावा भारतीय अनुसंधान और ज्ञानपिपासाओं का – मुख-पत्र बनाना होगा। हाँ, <a
href="/category/dharma/">धर्म</a> ही इसका आधार होगा। तुम्हें अच्छे लेखकों से मिलकर अच्छी सामग्री के लिए आग्रह करना होगा तथा उनकी लेखनी से अच्छी रचना वसूल करनी होगी।</p><p>लगन के साथ कार्य में लगे रहो –</p><p
class="has-text-align-right">तुम्हारा,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5339</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र स्विट्जरलैण्ड से श्री आलासिंगा पेरुमल को 8 अगस्त, 1896 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-8-august-1896/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (8 अगस्त, 1896)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/download-the-complete-works-of-swami-vivekananda-in-hindi-free/">स्वामी विवेकानंद</a> का श्री आलासिंगा पेरुमल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">स्विट्जरलैंड<br>८ अगस्त, १८९६</p><p>प्रिय आलासिंगा,</p><p>कई दिन पहले मैंने अपने पत्र में तुम्हें इस बात का आभास दिया था कि मैं ‘ब्रह्मवादिन्’ के लिए कुछ करने की स्थिति में हूँ। मैं तुम्हें एक या दो वर्षों तक १०० रुपया माहवार दूँगा – अर्थात् साल में ६० अथवा ७० पौंड – यानी जितने से सौ रुपये माहवार हो सके। तब तुम मुक्त होकर ‘ब्रह्मवादिन्’ का कार्य कर सकोगे तथा इसे और भी सफल बना सकोगे। श्रीयुत मणि अय्यर और कुछ मित्र कोष इकट्ठा करने में तुम्हारी सहायता कर सकते हैं – जिससे छपाई आदि की कीमत पूरी हो जायगी। चंदे से कितनी आमदनी होती है? क्या इस रकम से लेखकों को पारिश्रमिक देकर उनसे अच्छी सामग्री नहीं लिखवायी जा सकती? यह आवश्यक नहीं कि ‘ब्रह्मवादिन्’ में प्रकाशित होने वाली सभी रचनाएँ सभी की समझ में आयें – परन्तु यह जरूरी है कि देशभक्ति और सुकर्म की भावना – प्रेरणा से ही लोग इसे खरीदें। लोग से मेरा मतलब हिन्दुओं से है।</p><p>यों, बहुत सी बातें आवश्यक हैं। पहली बात है – पूरी ईमानदारी। मेरे मन में इस बात की रत्ती भर शंका नहीं कि तुम लोगों में से कोई भी इससे उदासीन रहोगे। बल्कि व्यावसायिक मामलों में हिन्दुओं में एक अजीब ढिलाई देखी जाती है – बेतरतीब हिसाब-किताब और बेसिलसिले का कारबार। दूसरी बात : उद्देश्य के प्रति पूर्ण निष्ठा – यह जानते हुए कि ‘ब्रह्मवादिन्’ की सफलता पर ही तुम्हारी मुक्ति निर्भर करती है।</p><p>इस पत्र (ब्रह्मवादिन्) को अपना इष्टदेवता बनाओं और तब देखना, सफलता किस तरह आती है। मैंने अभेदानन्द को भारत से बुला भेजा है। आशा है, अन्य संन्यासी की भाँति उसे देरी नहीं लगेगी। पत्र पाते ही तुम ‘ब्रह्मवादिन्’ के आय-व्यय का पूरा लेखा-जोखा भेजो, जिस देखकर मैं यह सोच सकूँ कि इसके लिए क्या किया जा सकता है? यह याद रखो कि पवित्रता, निःस्वार्थ भावना और गुरु की आज्ञाकारिता ही सभी सफलताओं के रहस्य हैं।</p><p>किसी धार्मिक पत्र की खपत – विदेश में असंभव है। इसे हिन्दुओं की ही सहायता मिलनी चाहिए – यदि उनमें भले-बुरे का ज्ञान हो।</p><p>बहरहाल, श्रीमती एनी बेसेन्ट ने अपने निवास स्थान पर मुझे – भक्ति पर बोलने के लिए – निमंत्रित किया था। मैंने वहाँ एक रात व्याख्यान दिया। कर्नल अल्कॉट भी वहाँ थे। मैंने सभी सम्प्रदाय के प्रति अपनी सहानुभूति प्रदर्शित करने के लिए ही भाषण देना स्वीकार किया। हमारे देशवासियों को यह याद रखना चाहिए कि अध्यात्म के बारे में हम ही जगद्गुरू हैं – विदेशी नहीं – किन्तु सांसारिकता अभी हमें उनसे सीखना है।</p><p>मैंने मैक्समूलर का लेख पढ़ा है। हालाँकि छः माह पूर्व जब कि उन्होंने इसे लिखा था – उनके पास मजूमदार के पर्चे के सिवा और कोई सामग्री नहीं थी। इस दृष्टि से यह लेख सुन्दर है। इधर उन्होंने मुझे एक लम्बी और प्यारी चिट्ठी लिखी है, जिसमें उन्होंने <a
href="/ramkrishna-paramhans-biography-in-hindi/">श्रीरामकृष्ण</a> पर एक किताब लिखने की इच्छा प्रकट की है। मैंने उन्हें बहुत सारी सामग्री दी है, किन्तु भारत से और भी अधिक मँगाने की आवश्यकता है।</p><p>काम करते चलो। डटे रहो बहादुरी से। सभी कठिनाइयों को झेलने की चुनौती दो। देखते नहीं वत्स, यह संसार – दुःखपूर्ण है।</p><p
class="has-text-align-right">प्यार के साथ,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-8-august-1896/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (6 अगस्त, 1896)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-6-august-1896/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-6-august-1896/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 25 Mar 2021 13:19:13 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Alasinga Perumal]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5337</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र स्विट्जरलैण्ड से श्री आलासिंगा पेरुमल को 6 अगस्त, 1896 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-6-august-1896/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (6 अगस्त, 1896)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/download-the-complete-works-of-swami-vivekananda-in-hindi-free/">स्वामी विवेकानंद</a> का श्री आलासिंगा पेरुमल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">स्विट्जरलैण्ड,<br>६ अगस्त, १८९६</p><p>प्रिय आलासिंगा,</p><p>तुम्हारे पत्र से ‘ब्रह्मवादिन्’ की आर्थिक दुर्दशा का समाचार विदित हुआ। लन्दन लौटने पर तुम्हें सहायता भेजने की चेष्टा करूँगा। तुम पत्रिका का स्तर नीचा न करना, उसको उन्नत रखना; अत्यन्त शीघ्र ही मैं तुम्हारी ऐसी सहायता कर सकूँगा कि इस बेहूदे अध्यापन-कार्य से तुम्हें मुक्ति मिल सके। डरने की कोई बात नहीं है वत्स, सभी महान् कार्य सम्पन्न होंगे। साहस से काम लो। ‘ब्रह्मवादिन्’ एक रत्न है, इसे नष्ट नहीं होना चाहिए। यह ठीक है कि ऐसी पत्रिकाओं को सदा निजी दान से ही जीवित रखना पड़ता है, हम भी वैसा ही करेंगे। कुछ महीने और जमे रहो।</p><p>मैक्समूलर महोदय का <a
href="/ramkrishna-paramhans-biography-in-hindi/">श्रीरामकृष्ण</a> सम्बन्धी लेख ‘दि नाइन्टीन्थ सेन्चुरी’ में प्रकाशित हुआ है। मुझे मिलते ही मैं उसकी एक प्रतिलिपि तुम्हारे पास भेज दूँगा। वे मुझे अत्यन्त सुन्दर पत्र लिखते हैं। श्रीरामकृष्ण देव की एक बड़ी जीवनी लिखने के लिए वे सामग्री चाहते हैं। तुम कलकत्ते एक पत्र लिखकर सूचित कर दो कि जहाँ तक हो सके सामग्री एकत्र करके उन्हें भेज दी जाय।</p><p>अमेरिकी पत्र के लिए भेजा हुआ समाचार मुझे पहले ही मिल चुका है। भारत में उसे प्रकाशित करने की आवश्यकता नहीं है, समाचार-पत्र द्वारा इस प्रकार का प्रचार बहुत हो चुका है। इस विषय में खासकर मेरी अब कुछ भी रुचि नहीं है। मूर्खों को बकने दो, हमें तो अपना कार्य करना है। सत्य को कोई नहीं रोक सकता।</p><p>यह तो तुम्हें पता ही है कि मैं इस समय स्विट्जरलैण्ड में हूँ और बराबर घूम रहा हूँ। पढ़ने अथवा लिखने का कार्य कुछ भी नहीं कर पा रहा हूँ और करना भी उचित प्रतीत नहीं होता। लन्दन में मुझे एक महान् कार्य करना है, आगामी माह से उसे प्रारम्भ करना है। अगले जाड़ों में भारत लौटकर मैं वहाँ के कार्य को भी ठीक करने की कोशिश करूँगा।</p><p>सब लोगों को मेरा प्रेम! बहादुरों, कार्य करते रहो, पीछे न हटो – ‘नही’ मत कहो। कार्य करते रहो – तुम्हारी सहायता के लिए प्रभु तुम्हारे पीछे खड़े हैं। महाशक्ति तुम्हारे साथ विद्यमान है।</p><p
class="has-text-align-right">शुभाकांक्षी,<br>विवेकानन्द</p><p>पुनश्च – डरने की कोई बात नहीं है, धन तथा अन्य वस्तुएँ शीघ्र ही प्राप्त होगी।</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5274</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र अमेरिका से श्री आलासिंगा पेरुमल को 1896 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-1896/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (1896)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/download-the-complete-works-of-swami-vivekananda-in-hindi-free/">स्वामी विवेकानंद</a> का श्री आलासिंगा पेरुमल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">अमेरिका,<br>१८९६</p><p>प्रिय आलासिंगा,</p><p>गत सप्ताह मैंने तुमको ‘ब्रह्मवादिन्’ के सम्बन्ध में लिखा था। उसमें भक्ति विषयक व्याख्यानों के बारे में लिखना मैं भूल गया था। उनको एक साथ पुस्तकाकार प्रकाशित करना चाहिए। ‘गुड ईयर’ के नाम से न्यूयार्क, अमेरिका के पते पर उसकी एक सौ प्रतियाँ भेज सकते हो। मैं बीस दिन के अन्दर जहाज से इंग्लैण्ड रवाना हो रहा हूँ। <a
href="/swami-vivekananda-karma-yoga-hindi-free-download-pdf/">कर्मयोग</a>, <a
href="/gyan-yoga-par-pravachan-swami-vivekananda/">ज्ञानयोग</a> तथा <a
href="/swami-vivekananda-raj-yog-hindi-free-download-pdf/">राजयोग</a> सम्बन्धी मेरी और भी बड़ी-बड़ी पुस्तकें हैं। ‘कर्मयोग’ प्रकाशित हो चुका है। ‘राजयोग’ का आकार अत्यन्त बृहत् होगा – वह भी प्रेस में पहुँच चुका है। ‘ज्ञानयोग’ सम्भवतः इंग्लैण्ड में छपवाना होगा।</p><p>तुमने ‘ब्रह्मवादिन्’ में ‘क’ का एक पत्र प्रकाशित किया है, उसका प्रकाशन न होना ही अच्छा था। थियोसॉफिस्टों ने ‘क’ की जो खबर ली है, उससे वह जल भुन रहा है। साथ ही उस प्रकार का पत्र सभ्यजनोचित भी नहीं है, उससे सभी लोगों पर छींटाकशी होती है। ‘ब्रह्मवादिन्’ की नीति से वह मेल भी नहीं खाता। अतः भविष्य में यदि कभी ‘क’ किसी सम्प्रदाय के विरुद्ध, चाहे वह कितना ही खब्ती और उद्धत हो, कुछ लिखे तो उसे नरम करके ही छापना। कोई भी सम्प्रदाय, चाहे वह बुरा हो या भला, उसके विरूद्ध ‘ब्रह्मवादिन्’ में कोई लेख प्रकाशित नहीं होना चाहिए। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि प्रवंचकों के साथ जानबूझकर सहानुभूति दिखानी चाहिए। पुनः तुम लोगों को मैं यह बतला देना चाहता हूँ कि उक्त पत्र (ब्रह्मवादिन) इतना अधिक शास्त्रीय (technical) बन चुका है कि यहाँ पर उसकी ग्राहक संख्या बढ़ने की आशा नहीं है। साधारणतया पश्चिम के लोगोंं का इतनी अधिक क्लिष्ट संस्कृत भाषा तथा उसकी बारीकियों का ज्ञान नहीं है और न उनमें जानने की इच्छा ही है। हाँ, इतना अवश्य है कि भारत के लिए वह पत्र बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है। किसी मतविशेष का समर्थन किया जा रहा हो, ऐसा एक भी बात उसके सम्पादकीय लेख में नहीं रहनी चाहिए और तुम्हें यह सदा ध्यान रखना है कि तुम केवल भारत को नहीं, वरन् सारे संसार को सम्बोधित कर बातें कह रहे हो और तुम जो कुछ कहना चाहते हो, संसार उसके बारे में बिल्कुल अनजान है। प्रत्येक संस्कृत श्लोक का अनुवाद अत्यन्त सावधानी के साथ करना और जहाँ तक हो सके उसे सरल भाषा में व्यक्त करने की चेष्टा करना।</p><p>तुम्हारे पत्र के जवाब मिलने से पहले ही मैं इंग्लैण्ड पहुँच जाऊँगा। अतः मुझे पत्र का जवाब द्वारा ई. टी. स्टर्डी, हाई व्यू, कैवरशम, इंग्लैण्ड के पते पर देना।</p><p
class="has-text-align-right">तुम्हारा,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-1896/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (मार्च, 1896)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-march-1896/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-march-1896/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 25 Mar 2021 08:24:47 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Alasinga Perumal]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5272</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र अमेरिका से श्री आलासिंगा पेरुमल को मार्च, 1896 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-march-1896/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (मार्च, 1896)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/download-the-complete-works-of-swami-vivekananda-in-hindi-free/">स्वामी विवेकानंद</a> का श्री आलासिंगा पेरुमल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">संयुक्त राज्य अमेरिका,<br>मार्च, १८९६</p><p>प्रिय आलासिंगा,</p><p>काम में लगे रहो। मैं जो कर सकता हूँ, करूँगा।… यदि प्रभु की इच्छा हुई, तो गेरुए वस्त्रवाले साधु यहाँ और इंग्लैण्ड में काफी संख्या में दिखायी देंगे। वत्सगण, काम करते रहो।</p><p>याद रखो कि जब तक गुरू में तुम्हारी भक्ति है, तुम्हारा विरोध कोई नहीं कर सकेगा। पाश्चात्यों की दृष्टि में तीनों भाष्यों का अनुवाद बहुत बड़ी बात होगी।</p><p>…इस बीच दो लोग मेरे संन्यासी शिष्य हुए हैं तथा दो-चार सौ गृहस्थ शिष्य। किन्तु वत्स, कुछ लोगों के सिवाय अधिकांश लोग ग़रीब हैं। फिर भी, कुछ लोग तो खूब धनी हैं। इस बात को अभी किसी से न कहना।</p><p>उपयुक्त समय आने पर मैं जनता के सम्मुख प्रचंड वेग से आत्मप्रकाश करूँगा। धैर्य धारण करो वत्स, धीरज रखकर काम करो। धैर्य, धैर्य! अगले वर्ष न्यूयार्क में एक मन्दिर बनवा सकने की आशा है, शेष प्रभु की इच्छा ।</p><p>मैं यहाँ एक पत्रिका निकालूँगा। मैं लन्दन जा रहा हूँ और यदि प्रभु की कृपा हुई, तो वहाँ भी वैसा करूँगा।</p><p
class="has-text-align-right">सप्रेम तुम्हारा,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5252</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र श्री आलासिंगा पेरुमल को 23 मार्च, 1896 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-shri-alasinga-perumal-23-march-1896/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (23 मार्च, 1896)</a> appeared first on <a
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class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/download-the-complete-works-of-swami-vivekananda-in-hindi-free/">स्वामी विवेकानंद</a> का श्री आलासिंगा पेरुमल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">बोस्टन,<br>२३ मार्च, १८९६</p><p>प्रिय आलासिंगा,</p><p>…तुम्हारे पत्र का जवाब मैं शीघ्र न दे सका; तथा अभी भी मुझे बहुत जल्दी करनी पड़ रही है। मेरे नये संन्यासियों में निश्चय ही एक स्त्री है। पहले ये मजदूरों की नेता थांी।… शेष सब पुरुष हैं। मैं इंग्लैण्ड में कुछ थोड़े से और संन्यासी बनाकर भारत अपने साथ लाऊँगा। भारत में इनके ‘सफ़ेद’ वर्ण का प्रभाव हिन्दुओं से भी अधिक होगा इसके अतिरिक्त ये फुर्तीले हैं, जब कि हिन्दू मृतप्राय हैं। भारत में आशा केवल साधारण जनता से है। उच्च श्रेणी के लोग शारीरिक और नैतिक दृष्टि से मृतवत् हैं।…</p><p>मेरी सफलता का कारण मेरी लोकप्रिय शैली है – गुरु की महानता उसकी सरल भाषा में निहित है।</p><p>…मैं अगले महीने इंग्लैण्ड जा रहा हूँ। मुझे प्रतीत होता है कि मैंने अत्यधिक काम किया है। इस दीर्घकाल तक लगातार काम से मेरी नसों की शक्ति नष्ट हो गयी। मैं तुमसे सहानुभूति नहीं चाहता ; परन्तु मैं इसलिए यह लिखता हूँ कि तुम मुझसे अब कुछ अधिक आशा न रखो। जितने अच्छे ढंग से तुम कार्य कर सको, उतना करो। अब मुझे बहुत कम आशा है कि मैं बड़े बड़े काम कर सकूँगा। परन्तु मुझे हर्ष है कि मेरे व्याख्यानों को सांकेतिक लिपि में लिख रखने से बहुत सा साहित्य उत्पन्न हुआ है। चार किताबें तैयार हैं। एक तो छप चुकी है; ‘पातंजल सूत्र’ के साथ <a
href="/swami-vivekananda-raj-yog-hindi-free-download-pdf/">‘राजयोग’</a> पुस्तक छप रही है, ‘<a
href="/bhakti-yog-swami-vivekananda-hindi/">भक्तियोग</a>’ पुस्तक तुम्हारे पास है, और<a
href="/gyan-yog-swami-vivekananda-hindi/"> ‘ज्ञानयोग’ पुस्तक</a> के प्रकाशन की तैयारी चली है। इसके सिवाय <a
href="/aaj-ravivar-hai-bhajan-lyrics/">रविवार</a> में दिये गये व्याख्यान भी छप चुके हैं। स्टर्डी बहुत ही परिश्रमी व्यक्ति है, प्रत्येक कार्य में वह अग्रसर हो सकता है। मुझे सन्तोष है कि मैने भलाई करने का भरसक प्रयत्न किया है और जब मैं कार्य-विरत हो एकान्त सेवन के लिए गुफा में जाऊँगा, तब मेरा अन्तःकरण मुझे दोष न देगा।</p><p>सबको प्यार और आशीर्वाद के साथ –</p><p
class="has-text-align-right">विवेकानन्द</p><p>The post <a
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