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><channel><title>Ashtavinayak Archives - हिंदी पथ</title> <atom:link href="https://hindipath.com/tag/ashtavinayak/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" /><link>https://hindipath.com/tag/ashtavinayak/</link> <description>हिंदी का संसार</description> <lastBuildDate>Sat, 22 Jun 2024 14:27:13 +0000</lastBuildDate> <language>en-US</language> <sy:updatePeriod> hourly </sy:updatePeriod> <sy:updateFrequency> 1 </sy:updateFrequency> <generator>https://wordpress.org/?v=6.3.8</generator><image> <url>https://hindipath.com/wp-content/uploads/2019/09/HindiPath-Site-Icon-New.png</url><title>Ashtavinayak Archives - हिंदी पथ</title><link>https://hindipath.com/tag/ashtavinayak/</link> <width>32</width> <height>32</height> </image> <item><title>धूम्रवर्ण &#8211; Dhumravarna (अष्टविनायक गणेश जी का अष्टम रूप)</title><link>https://hindipath.com/dumravarna-ashtavinayak/</link> <comments>https://hindipath.com/dumravarna-ashtavinayak/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सुरभि भदौरिया]]></dc:creator> <pubDate>Sat, 22 Jun 2024 14:20:54 +0000</pubDate> <category><![CDATA[धर्म]]></category> <category><![CDATA[Ashtavinayak]]></category> <category><![CDATA[Dhumravarna]]></category> <category><![CDATA[Ganesh]]></category> <category><![CDATA[Ganpati]]></category> <category><![CDATA[Ganpati Bappa]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=26482</guid><description><![CDATA[<p>धूम्रवर्ण (Dhumravarna Ganpati) अवतार गणेश जी के अष्टविनायक (Ashtavinayak) रूपों में गणेशजी का आठवां अवतार है। भगवान् श्रीगणेश का ‘धूम्रवर्ण&#8217;</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=26479</guid><description><![CDATA[<p>विघ्नराज अवतार अष्टविनायक (Ashtavinayak) रूपों में गणेश जी का सातवां अवतार है। भगवान् श्रीगणेश का ‘विघ्नराज&#8217; नामक अवतार विष्णु ब्रह्म</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/vighnaraj-ashtavinayak/">विघ्नराज &#8211; Vighnaraj (अष्टविनायक मेंगणेश जी का सप्तम रूप)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>विघ्नराज अवतार अष्टविनायक (Ashtavinayak) रूपों में <a
href="/ganesh-ji-ki-aarti/">गणेश जी</a> का सातवां अवतार है। <a
href="/ganesh-chalisa-in-hindi/">भगवान् श्रीगणेश</a> का ‘विघ्नराज&#8217; नामक अवतार <a
href="/sri-vishnu-sahasranama-stotram/">विष्णु</a> ब्रह्म का वाचक है। वह शेष वाहन पर चलने वाला तथा ममतासुर का संहारक है।</p><p><strong>विघ्नराजावतारश्च शेषवाहन उच्यते ।&nbsp; </strong><strong><br></strong><strong>ममतासुर हन्ता स विष्णुब्रह्मेति वाचकः॥</strong>&nbsp;</p><p>एक बार की बात है। <a
href="/parvati-chalisa-in-hindi-lyrics/">भगवती पार्वती</a> अपनी सखियों से बात करती हुई हँस पड़ीं। उनके हास्य से एक पुरुष का जन्म हुआ। वह देखते-ही-देखते पर्वताकार हो गया। <a
href="/parvathi-vallabha-ashtakam-lyrics/">पार्वती जी</a> ने उसका नाम ममतासुर रखा। उन्होंने उससे कहा कि तुम जाकर गणेश का स्मरण करो। उनके स्मरण से तुम्हें सबकुछ प्राप्त हो जायगा। माता पार्वती ने उसे गणेशजी का षडक्षर (वक्रतुण्डाय हुम्) मन्त्र प्रदान किया। ममतासुर माता के चरणों में प्रणाम कर वन में तप करने चला गया।&nbsp;</p><p>वहाँ उसकी शम्बरासुर से भेंट हुई। उसने ममतासुर को समस्त आसुरी विद्याएँ सिखा दीं। उन विद्याओं के अभ्यास से ममतासुर को सारी आसुरी शक्तियाँ प्राप्त हो गयीं। इसके बाद शम्बरासुर ने उसे विघ्रराज की उपासना की प्रेरणा दी। ममतासुर वहीं बैठकर कठोर तप करने लगा। वह केवल वायुपर रहकर विघ्नराज का ध्यान तथा जप करता था। इस प्रकार उसे तप करते हुए दिव्य सहस्र वर्ष बीत गये । प्रसन्न होकर गणनाथ प्रकट हुए। ममतासुर ने विघ्नराज के चरणों में प्रणाम कर भक्ति पूर्वक उनकी पूजा की। इसके बाद उसने कहा—‘प्रभो ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे ब्रह्माण्ड का राज्य प्रदान करें। युद्ध में मेरे सम्मुख कभी कोई विघ्न न हो। मैं भगवान् शिव आदि के लिये भी सदैव अजेय रहूँ।&#8217; भगवान् विघ्नराजने कहा—‘दैत्यराज! तुमने दुःसाध्य वर की याचना की है, फिर भी मैं उसे पूरा करूँगा ।&#8217;</p><p>वर-प्राप्त कर ममता सुर पहले शम्बर के घर गया। वर-प्राप्ति का समाचार जानकर वह परम प्रसन्न हुआ। उसने अपनी रूपवती पुत्री मोहिनी का विवाह ममतासुर से कर दिया। यह समाचार जब शुक्राचार्य को मिला तो उन्होंने धूम-धाम से ममतासुर को दैत्यों का राजा बना दिया।</p><p>एक दिन ममतासुर ने शुक्राचार्य से अपनी विश्वविजय की इच्छा व्यक्त की। शुक्राचार्यने कहा—‘राजन्! तुम दिग्विजय तो करो, लेकिन विघ्नेश्वर का विरोध कभी मत करना। विघ्नराज की कृपासे ही तुम्हें इस शक्ति और वैभव की प्राप्ति हुई है।</p><p>इसके बाद ममतासुर ने अपने पराक्रमी सैनिकों द्वारा पृथ्वी और पाताल को जीत लिया। फिर स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया। इन्द्र से उसका भीषण संग्राम हुआ। रक्त की सरिता बह चली, परन्तु बलवान् असुरों के सामने देवगण न टिक सके। स्वर्ग ममतासुर के अधीन हो गया। युद्ध क्षेत्र में उसने <a
href="/vishnu-chalisa-in-hindi/">भगवान् विष्णु</a> और <a
href="/shiv-chalisa-lyrics-in-hindi-pdf/">शिव</a> को भी पराजित कर दिया सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पर ममतासुर शासन करने लगा। देवताओं को बन्दी गृह में डाल दिया गया। धर्मा चरण का नाम भी लेने वाला कोई न रहा।</p><p>सभी देवताओं ने कष्ट निवारण के लिये विघ्नराज की पूजा की। एक वर्ष की कठोर तपस्या के बाद भगवान् विघ्नराज प्रकट हुए। देवताओं ने उनसे <a
href="/category/dharma/">धर्म</a> के उद्धार तथा ममतासुर के अत्याचार से <a
href="/swami-vivekananda-mukti-hindi/">मुक्ति</a> दिलाने की प्रार्थना की। भगवान् विघ्नराज ने नारद को ममतासुर के पास भेजा। नारद ने उससे कहा कि तुम अधर्म और अत्याचार को समाप्त कर विघ्नराज की शरण-ग्रहण करो, अन्यथा तुम्हारा सर्वनाश निश्चित है। शुक्राचार्य ने भी उसे समझाया, पर उस अहंकारी असुर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। ममतासुर की दुष्टता से विघ्नराज क्रोधित हो गये। उन्होंने अपना कमल असुर सेना के बीच छोड़ दिया। उसकी गन्ध से समस्त असुर मूर्च्छित एवं शक्तिहीन हो गये। ममतासुर काँपता हुआ विघ्नराज के चरणों में गिर पड़ा। उनकी स्तुति करके क्षमा माँगी विघ्नराज ने उसे क्षमा कर पाताल भेज दिया। देवगण मुक्त होकर प्रसन्न हुए। चारों तरफ भगवान् विघ्नराज की जयकार होने लगी।</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=26475</guid><description><![CDATA[<p>विकट अवतार अष्टविनायक (Ashtavinayak Ganpati) रूपों में भगवान गणेश जी का छठवां अवतार है। यह अवतार कामासुर के दमन के</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/vikat-ashtavinayak/">विकट &#8211; Vikat (गणेश जी का षष्ट: रूप)</a> appeared first on <a
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href="/ganesh-ji-ke-108-naam/">भगवान गणेश जी</a> का छठवां<strong> </strong>अवतार है। यह अवतार कामासुर के दमन के लिए हुआ था।</p><p>विकट अष्टविनायक (Ashtavinayak) रूपों में <a
href="/ganesh-chalisa-in-hindi/">गणेश जी</a> का उग्र रूप है। उन्हें एक भयानक रूप के साथ चित्रित किया गया है, जिसमें चार भुजाएं, एक उभरा हुआ पेट और एक बड़ा सिर, हाथी के कान और सूंड है। उन्हें अक्सर एक कुल्हाड़ी पकड़े हुए दिखाया जाता है।</p><p><strong>विकटो नाम विख्यातः कामासुरविदाहकः ।&nbsp;<br>मयूरवाहनश्चायं सौरब्रह्मधरः स्मृतः ॥&nbsp;</strong></p><p>भगवान् श्री गणेश का ‘विकट&#8217; नामक प्रसिद्ध अवतार कामासुर का संहारक है, वह मयूर वाहन एवं सौरब्रह्म का धारक माना गया है। <a
href="/vishnu-chalisa-in-hindi/">भगवान् विष्णु</a> जब जालन्धर के वधहेतु वृन्दा का तप नष्ट करने गये थे। उसी समय उनके <a
href="/shukra-dev-mantra-katha-upay/">शुक्र</a> से अत्यन्त तेजस्वी कामासुर पैदा हुआ। कामासुर दैत्यगुरु शुक्राचार्य से दीक्षा प्राप्त कर तपस्या के लिये वन में गया। वहाँ उसने पञ्चाक्षरी मन्त्र का जप करते हुए कठोर तपस्या प्रारम्भ की। <a
href="/shiv-chalisa-lyrics-in-hindi-pdf/">भगवान् शिव</a> की प्रसन्नता के लिये उसने अन्न, जलका त्याग कर दिया। दिन-प्रतिदिन उसका &#8221; शरीर क्षीण होता गया तथा तेज बढ़ता गया। दिव्य सहस्र वर्ष पूरे होने पर <a
href="/om-jai-shiv-omkara-aarti/">शिव भगवान्</a> प्रसन्न हुए । आशुतोष ने प्रसन्न होकर उससे वर माँगने के लिये कहा । कामासुर <a
href="/daridra-dahan-shiv-stotra-pdf-hindi/">भगवान् शिव जी</a> के दर्शन कर कृतार्थ हो गया। उसने <a
href="/hartalika-teej-vrat-katha/">भगवान् शंक</a>र के चरणों में प्रणाम कर वर &#8211; याचना की &#8211; &#8216;प्रभो! आप मुझे ब्रह्माण्ड का राज्य तथा अपनी भक्ति प्रदान करें। मैं बलवान्, निर्भय एवं मृत्युजयी होऊँ।&nbsp;</p><p><strong>भगवान् शिवने कहा— </strong>&#8216;यद्यपि तुमने अत्यन्त दुर्लभ तथा देव-दुःखद वर की याचना की है, तथापि मैं तुम्हारी कामना पूरी करता हूँ। कामासुर प्रसन्न होकर अपने गुरु शुक्राचार्य के पास लौट आया तथा उन्हें शिव-दर्शन तथा वर-प्राप्ति का समस्त समाचार सुनाया। शुक्राचार्य ने सन्तुष्ट होकर महिषासुर की रूपवती पुत्री तृष्णा के साथ उसका विवाह कर दिया। उसी समय समस्त दैत्यों के समक्ष शुक्राचार्य ने कामासुर को दैत्यों का अधिपति बना दिया। सभी दैत्यों ने उसके अधीन रहना स्वीकार कर लिया।</p><p>कामासुर ने अत्यन्त सुन्दर रतिद नामक नगर में अपनी राजधानी बनायी। उसने <a
href="/tag/ravan/">रावण</a>, शम्बर, महिष, बलि तथा दुर्मद को अपनी सेना का प्रधान बनाया&nbsp; उस महाअसुर ने पृथ्वी के समस्त राजाओं पर आक्रमण कर उन्हें जीत लिया। फिर वह स्वर्ग पर चढ़ दौड़ा। <a
href="/tag/indra/">इन्द्रादि देवता</a> उसके पराक्रम के आगे नहीं ठहर सके। सभी उसके अधीन हो गये। वर के प्रभाव से कामासुर ने कुछ ही समय में तीनों लोकों पर अधिकार प्राप्त कर लिया। उसके राज्य में समस्त <a
href="/category/dharma/">धर्म-कर्म</a> नष्ट हो गये। चारों तरफ झूठ, छल-कपट का ही साम्राज्य स्थापित हो गया। देवता, मुनि और धर्म परायण लोग अतिशय कष्ट पाने लगे।</p><p>महर्षि मुद्गल की प्रेरणा से समस्त देवता और मुनि मयूरेश क्षेत्र में पहुँचे। वहाँ उन्होंने श्रद्धा-भक्ति पूर्वक गणेश की पूजा की देवताओं की उपासना से प्रसन्न होकर मयूर वाहन भगवान् गणेश प्रकट हुए। उन्होंने देवताओं से वर माँगने के लिये कहा। देवताओं ने कहा-&#8216;प्रभो! हम सब कामासुर के अत्याचार से अत्यन्त कष्ट पा रहे हैं। आप हमारी रक्षा करें।तथास्तु! कहकर भगवान् विकट अन्तर्धान हो गये।</p><p>मयूर-वाहन भगवान् विकट ने देवताओं के साथ कामासुर के नगर को घेर लिया। कामासुर भी दैत्यों के साथ बाहर आया। भयानक युद्ध होने लगा। उस भीषण युद्ध में कामासुर के दो पुत्र शोषण और दुष्पूर मारे गये। भगवान् विकट ने कामासुर से कहा-&#8216;तूने शिव-वर के प्रभाव से बड़ा अधर्म किया है। यदि तू जीवित रहना चाहता है तो देवताओं से द्रोह छोड़कर मेरी शरणमें आ जा। अन्यथा तुम्हारी मौत निश्चित है।&#8217; कामासुर ने क्रोधित होकर अपनी भयानक गदा भगवान् विकट पर फेंकी। वह गदा भगवान् विकट का स्पर्श किये बिना पृथ्वी पर गिर पड़ी। कामासुर मूर्च्छित हो गया। उसके शरीर की सारी शक्ति जाती रही। उसने सोचा—&#8217;इस अद्भुत देव ने जब बिना शस्त्र के मेरी ऐसी दुर्दशा कर दी, तब शस्त्र उठायेगा तो क्या होगा? वह अन्त में भगवान् विकट की शरण में आ गया। मयूरेशने उसे क्षमा कर दिया। देवता और मुनि भयमुक्त हो गये। सर्वत्र भगवान् विकट की जयकार होने लगी।</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=26466</guid><description><![CDATA[<p>लम्बोदर (Lambodar Ganesh) अवतार भगवान गणेश अष्टविनायक (Ashtavinayak) रूपों में पांचवा अवतार है। श्री गणेशजी का &#8216;लम्बोदर&#8217; नामक अवतार सत्स्वरूप</p><p>The post <a
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href="/ganesh-ji-ki-aarti/">भगवान गणेश</a> अष्टविनायक (Ashtavinayak) रूपों में पांचवा अवतार है। <a
href="/ganesh-chalisa-in-hindi/">श्री गणेशजी</a> का &#8216;लम्बोदर&#8217; नामक अवतार सत्स्वरूप तथा शक्ति ब्रह्म का धारक है। इसका भी मूषक वाहन है।</p><p><strong>लम्बोदरावतारो वै क्रोधासुर निबर्हणः।<br>शक्तिब्रह्माखुगः सद् यत् तस्य धारक उच्यते॥</strong>&nbsp;</p><p><a
href="/sri-vishnu-sahasranama-stotram/">भगवान् विष्णु</a> के मोहिनी रूप को देखकर <a
href="/daridra-dahan-shiv-stotra-pdf-hindi/">भगवान् शिव</a> काम-मोहित हो गये। जब <a
href="/vishnu-chalisa-in-hindi/">विष्णु भगवान</a> ने मोहिनी रूप का त्याग किया तो कामारिका मन दुःखी हो गया। उसी समय उनका <a
href="/tag/shukra/">शुक्र</a> धरती पर स्खलित हो गया उससे एक परम प्रतापी काले रंग का असुर पैदा हुआ। उसके नेत्र ताँबेकी तरह चमकदार थे।</p><p>वह असुर शुक्राचार्य के पास गया और कहा &#8211; &#8216;प्रभो! मुझे शिष्य स्वीकार कर मेरा पालन करिये तथा मेरा नामकरण करने की कृपा करें। शुक्राचार्य कुछ क्षण ध्यान मग्न हो गये। विचार करने के बाद अपने इस योग्य शिष्य का नाम क्रोधासुर रखा। उन्होंने उसका संस्कार कर अपनी शिक्षासे उसे भलीभाँति योग्य बनाया फिर उन्होंने शम्बर दैत्य की परम रूपवती कन्या प्रीति के साथ उसका विवाह कर दिया। एक दिन क्रोधासुर ने आचार्य के समक्ष हाथ जोड़कर कहा- &#8216;मैं आपकी आज्ञा से सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों पर विजय प्राप्त करना चाहता हूँ। अतः आप मुझे यश प्रदान करने वाला मन्त्र देने की कृपा करें।&#8217; शुक्राचार्य ने उसे सविधि <a
href="/surya-kavach/">सूर्य- मन्त्र</a> की दीक्षा दी।</p><p>क्रोधासुर शुक्राचार्य की आज्ञा लेकर वन में चला गया। वहाँ उसने एक पैर पर खड़े होकर <a
href="/surya-dev-mantra-katha-upay/">सूर्य</a> मन्त्र का जप किया उस धैर्यशाली दैत्य ने निराहार रहकर वर्षा, शीत और धूप का कष्ट सहन करते हुए कठोर तप किया असुर के सहस्रों वर्षों की तपस्या के बाद <a
href="/surya-bhagwan-ke-108-naam/">भगवान् सूर्य</a> प्रसन्न होकर प्रकट हुए। क्रोधासुर ने उनका भक्ति पूर्वक पूजन किया । <a
href="/surya-ashtakam-lyrics-in-hindi/">सूर्य भगवान्</a> को प्रसन्न देखकर उसने कहा- &#8216;प्रभो मेरी मृत्यु न हो। मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों को जीत लूँ सभी योद्धाओं में मैं अद्वितीय सिद्ध होऊँ तथास्तु! कहकर भगवान् सूर्य अन्तर्धान हो गये</p><p>घर लौटकर क्रोधासुर ने शुक्राचार्य के चरणों में प्रणाम किया शुक्राचार्य ने उसका आवेशपुरी में दैत्यों के राजा के पदपर अभिषेक कर दिया। कुछ दिनों बाद उसने असुरों से ब्रह्माण्ड-विजय की इच्छा व्यक्त की। असुर बड़े प्रसन्न हुए विजय-यात्रा प्रारम्भ हुई। उसने पृथ्वी पर सहज ही अधिकार कर लिया। फिर वह अमरावती पर चढ़ दौड़ा। उसके डर से देवता भाग गये। स्वर्ग भी उसके अधीन हो गया। इसी प्रकार वैकुण्ठ और कैलास पर भी उस महादैत्य का राज्य स्थापित हो गया। क्रोधासुर ने भगवान् सूर्य के सूर्य लोक को भी जीत लिया। वरदान देने के कारण उन्होंने भी सूर्य लोक का दुःखी हृदय से त्याग कर दिया।</p><p>अत्यन्त दुःखी देवताओं और <a
href="/tag/rishi/">ऋषियों</a> ने <a
href="/ganesh-ji-ke-108-naam/">गणेश</a> की आराधना की इससे सन्तुष्ट होकर लम्बोदर प्रकट हुए। उन्होंने कहा – &#8216;देवताओ और ऋषियो! मैं क्रोधासुर का अहंकार चूर्ण कर दूँगा। आपलोग निश्चिन्त हो जायँ।&#8217;</p><p>लम्बोदर के साथ क्रोधासुर का भीषण संग्राम हुआ। देवगण भी असुरों का संहार करने लगे। क्रोधासुर के बड़े-बड़े योद्धा समर भूमि में आहत होकर गिर पड़े। क्रोधासुर दुःखी होकर लम्बोदर के चरणों में गिर गया तथा उनकी भक्तिभाव से स्तुति करने लगा। सहज कृपालु लम्बोदर ने उसे अभयदान दे दिया। क्रोधासुर भगवान् लम्बोदर का आशीर्वाद और भक्ति प्राप्त कर शान्त जीवन बिताने के लिये पाताल चला गया। देवता अभय और प्रसन्न होकर भगवान् लम्बोदर का गुणगान करने लगे ।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/lambodar-ashtavinayak/">लम्बोदर &#8211; Lambodar (अष्टविनायक में गणेश जी का पंचम रूप)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/lambodar-ashtavinayak/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>महोदर &#8211; Mahodar (गणेश जी का तृतिय रूप)</title><link>https://hindipath.com/mahodar-ashtavinayak/</link> <comments>https://hindipath.com/mahodar-ashtavinayak/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सुरभि भदौरिया]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 04 Apr 2024 09:59:07 +0000</pubDate> <category><![CDATA[धर्म]]></category> <category><![CDATA[Ashtavinayak]]></category> <category><![CDATA[Ganesh]]></category> <category><![CDATA[Ganpati]]></category> <category><![CDATA[Ganpati Bappa]]></category> <category><![CDATA[Mahodar]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=26459</guid><description><![CDATA[<p>महोदर अवतार भगवान गणेश अष्टविनायक (Ashtavinayak Ganpati) रूपों में तीसरा अवतार है। भगवान् श्रीगणेश का महोदर नाम से विख्यात अवतार</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/mahodar-ashtavinayak/">महोदर &#8211; Mahodar (गणेश जी का तृतिय रूप)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>महोदर अवतार भगवान गणेश अष्टविनायक (Ashtavinayak Ganpati) रूपों में तीसरा अवतार है। <a
href="/ganesh-ji-ki-aarti/">भगवान् श्रीगणेश</a> का महोदर नाम से विख्यात अवतार ज्ञान-ब्रह्म का प्रकाशक है। उन्हें मोहासुर का विनाशक तथा उनका मूषक वाहन बताया गया है।</p><p><strong>महोदर इति ख्यातो ज्ञानब्रह्मप्रकाशकः ।<br>मोहासुरस्य शत्रुर्वै आखुवाहनगः स्मृतः ॥&nbsp;</strong></p><p>दैत्य गुरु शुक्राचार्य के एक शिष्य का नाम मोहासुर था। उनके आदेश से मोहासुर ने भगवान् सूर्य की आराधना की । उसकी कठोर तपस्या से <a
href="/surya-dev-mantra-katha-upay/">भगवान् सूर्य</a> प्रसन्न हो गये उन्होंने मोहासुर को सर्वत्र विजयी होने का वरदान दिया। वर से सन्तुष्ट होकर असुर अपने स्थानपर लौटा। शुक्राचार्य ने उसका दैत्य राज के पदपर अभिषेक किया। उसके बाद अपने प्रबल पराक्रम से उसने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। देवता और मुनि पहाड़ों एवं जंगलों में छिप गयेचारों तरफ से निश्चिन्त होकर मोहासुर अपनी पत्नी मदिरा के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा।</p><p>वर्णाश्रम-धर्म, सत्कर्म, यज्ञ, तप आदि सब नष्ट हो गये। दुःखी देवता <a
href="/tag/rishi/">ऋषियों</a> के साथ <a
href="/surya-ashtakam-lyrics-in-hindi/">सूर्य भगवान्</a> के पास गये तथा इस भयानक विपत्ति से <a
href="/swami-vivekananda-mukti-hindi/">मुक्ति</a> का उपाय पूछा। भगवान् सूर्य ने उन्हें एकाक्षर मन्त्र देकर <a
href="/ganesh-chalisa-in-hindi/">भगवान् गणेश</a> को प्रसन्न करने की प्रेरणा दी। देवता और मुनिगण श्रद्धा-भक्ति पूर्वक <strong>उनकी</strong> उपासना करने लगे। उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर <strong>वह वहाँ </strong>प्रकट हुए। देवताओं और मुनियों ने अत्यन्त आर्त होकर महोदर की <a
href="/tag/stuti/">स्तुति</a> की। <strong>उन्होने</strong> कहा कि मैं मोहासुर का वध करूँगा। आपलोग निश्चिन्त हो जायँ।</p><p>ऐसा कहकर मूषक पर सवार भगवान् महोदर मोहासुर से युद्ध करने के लिये चल दिये। यह समाचार <a
href="/narad-muni-story-hindi/">देवर्षि नारद</a> ने मोहासुर को दिया तथा अनन्त पराक्रमी समर्थ महोदर का स्वरूप भी उसे समझाया दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने भी उसे भगवान् महोदर की शरण लेने का शुभ परामर्श दिया उसी समय भगवान् महोदर का दूत बनकर <a
href="/vishnu-chalisa-in-hindi/">भगवान् विष्णु</a> मोहासुर के पास गये। उन्होंने मोहासुर से कहा &#8211; &#8216;तुम्हें अनन्त शक्ति &#8211; सम्पन्न भगवान् महोदर से मित्रता कर लेनी चाहिये इसी में तुम्हारा कल्याण है। यदि तुम महोदर की शरण ग्रहण कर देवताओं,<strong> मुनियों तथा ब्राह्मणों को <a
href="/category/dharma/">धर्म</a> पूर्वक जीवन बिताने में व्यवधान न पैदा करने का वचन दो तो दयामय प्रभु तुम्हें क्षमा कर देंगे। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो तो</strong> रणभूमि में तुम्हारी रक्षा असम्भव है। मोहासुर का अहंकार नष्ट हो गया। उसने भगवान् विष्णु से निवेदन किया। आप परम <strong>प्रभु जी</strong> को मेरे नगर में लाकर मुझे उनके दुर्लभ दर्शन का अवसर प्रदान करें।</p><p>भगवान् महोदर ने मोहासुर के नगर में पदार्पण किया मोहासुर ने उनका अभूत पूर्व स्वागत किया दैत्य युवतियों ने पुष्प वर्षा की। मोहासुर ने भगवान् महोदर की श्रद्धा-भक्ति पूर्वक पूजा की। <strong>गद्गदकण्ठ से स्तुति करते हुए उसने कहा कि प्रभो</strong>। अज्ञान-वश मेरे द्वारा जो अपराध हुआ हो उसके लिये मुझे क्षमा करें। मैं आपके प्रत्येक आदेश पालन करने का वचन देता हूँ। अब मैं देवताओं और मुनियोंके निकट भूलकर भी नहीं जाऊँगा उनके किसी भी धर्मा चरण में विघ्न नहीं पैदा करूँगा</p><p>सहज कृपालु भगवान् महोदर मोहासुर की दीनता पर प्रसन्न हो गये उसे अपनी भक्ति प्रदान कर दी। मोहासुर के शान्त होने से देवता, ऋषि, ब्राह्मण तथा धर्म परायण स्त्री-पुरुष- सभी सुखी हो गये। देवता और मुनि महाप्रभु महोदर की स्तुति एवं जयकार करने लगे।</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=26462</guid><description><![CDATA[<p>गजानन (Gajanan Maharaj) अवतार भगवान गणेश अष्टविनायक रूपों में चौथा अवतार है। यह अवतार लोभासुर के दमन के लिए हुआ</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/gajanan-ashtavinayak/">गजानन &#8211; Gajanan Maharaj (अष्टविनायक में गणेश जी का चतुर्थ रूप)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>गजानन (Gajanan Maharaj) अवतार भगवान गणेश अष्टविनायक रूपों में चौथा अवतार है। यह अवतार लोभासुर के दमन के लिए हुआ था।</p><p><strong>गजाननः स विज्ञेयः सांख्येभ्यः सिद्धिदायकः।<br>लोभासुरप्रहर्ता वै आखुगश्च प्रकीर्तितः ॥</strong></p><p>भगवान् श्रीगणेश का गजानन (Shree Gajanan) नामक अवतार सांख्यब्रह्म का धारक है। उसको सांख्य योगियों के लिये सिद्धिदायक जानना चाहिये उसे लोभासुर का संहारक तथा मूषक-वाहन पर चलने वाला कहा गया है।</p><p>एक बार देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर कैलास पहुँचे वहाँ उन्होंने <a
href="/hartalika-teej-vrat-katha/">भगवान् शिव-पार्वती</a> का दर्शन किया। कुबेर भगवती उमा के अनुपम सौन्दर्य को मुग्ध दृष्टि से एकटक निहारने लगे। <a
href="/tag/parvati/">भगवती पार्वती</a> उन्हें अपनी ओर एकटक निहारते देखकर अत्यन्त क्रुद्ध हो गयीं। भगवती की कोपदृष्टि से कुबेर अत्यन्त भयभीत हो गये। उसी समय भयभीत <a
href="/tag/kuber/">कुबेर</a> से लोभासुर उत्पन्न हुआवह अत्यन्त प्रतापी तथा बलवान् था।</p><p>लोभासुर दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पास गया। उसने शुक्राचार्य के चरणों में प्रणाम कर उनसे शिष्य बनाने का निवेदन किया। आचार्य ने उसे पञ्चाक्षरी मन्त्र <strong>( <a
href="/om-namah-shivaya-har-har-bhole-namah-shivaya-lyrics/">ॐ नमः शिवाय</a>)</strong> की दीक्षा देकर तपस्या करने के लिये वन भेज दिया।</p><p>निर्जन वन में जाकर उस प्रबल असुर ने स्नान किया फिर भस्म धारण कर वह <a
href="/daridra-dahan-shiv-stotra-pdf-hindi/">भगवान् शिव</a> का ध्यान करते हुए पंचाक्षरी मन्त्र का जप करने लगा। वह अन्न-जल का त्याग कर <a
href="/om-jai-shiv-omkara-aarti/">भगवान् शंकर</a> की प्रसन्नता के लिये घोर तप करने लगा। उसने दिव्य सहस्र वर्ष तक अखण्ड तप किया। उसकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर <a
href="/shiv-chalisa-lyrics-in-hindi-pdf/">शिव भगवान्</a> प्रकट हुए।</p><p>लोभासुर देवाधिदेव भगवान् शिव के चरणों में प्रणाम कर उनकी स्तुति करने लगा। औढरदानी <a
href="/pashupati-ashtakam-lyrics/">भगवान् शंकर जी</a> ने वर देकर उसे तीनों लोकों में निर्भय कर दिया।</p><p>भगवान् शिव के अमोघ वर से निर्भय लोभासुर ने दैत्यों की विशाल सेना एकत्र की। उन असुरों के सहयोग से लोभासुर ने पहले पृथ्वी के समस्त राजाओं को जीत लिया। फिर उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया <a
href="/tag/indra/">इन्द्र</a> को पराजित कर उसने अमरावती पर अधिकार कर लिया पराजित होकर इन्द्र <a
href="/narayan-kavach-in-hindi/">भगवान् विष्णु</a> के पास गये तथा उनसे अपनी व्यथा सुनायी। भगवान् विष्णु असुरों का संहार करने के लिये अपने गरुड़ वाहन पर चढ़कर आये। भयानक संग्राम हुआ। भगवान् शंकर के वर से अजेय लोभासुर के सामने उनको भी पराजय का मुँह देखना पड़ा।&nbsp;</p><p><a
href="/dasavatara-stotram/">विष्णु</a> तथा अन्य देवताओं के रक्षक <a
href="/mahadev-ke-diwane-lyrics-hansraj-raghuvanshi/">महादेव</a> हैं-यह सोचकर लोभासुर ने अपना दूत <a
href="/solah-somvar-vrat-katha/">शिव</a> के पास भेजा दूत ने उनसे कहा—&#8217;आप परम पराक्रमी लोभासुर से युद्ध कीजिये या पराजय स्वीकार कर कैलास को खाली कर दीजिये भगवान् शंकर ने अपने द्वारा दिये वरदान को स्मरण कर कैलास को छोड़ दिया। लोभासुर के आनन्द की सीमा न रही उसके राज्यमें समस्त <a
href="/category/dharma/">धर्म-कर्म</a> समाप्त हो गये; पापों का नग्न नृत्य होने लगा। ब्राह्मण और ऋषि-मुनि यातना सहने लगे।&#8217;</p><p>&nbsp;रैभ्य मुनि के कहने पर देवताओं ने गणेश-उपासना की। प्रसन्न होकर गजानन ने लोभासुर के अत्याचार से देवताओं को मुक्ति दिलाने का वचन दिया।</p><p>गजानन (Gajanan) ने भगवान् शिव को लोभासुर के समीप भेजा वहाँ शिव ने लोभासुर से साफ शब्दों में गजानन का सन्देश सुनाया। तुम गजानन की शरण-ग्रहण कर शान्तिपूर्ण जीवन बिताओ, अन्यथा युद्ध के लिये तैयार हो जाओ। उसके गुरु शुक्राचार्य ने भी भगवान् गजानन की महिमा बताकर गजानन की शरण लेना कल्याण कर बतलाया। लोभासुर ने गणेश-तत्त्व को समझ लिया फिर तो वह महाप्रभु के चरणों की वन्दना करने लगा। शरणागतवत्सल गजानन ने उसे क्षमा कर पाताल भेज दिया देवता और मुनि सुखी होकर गजानन का गुणगान करने लगे।</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=26456</guid><description><![CDATA[<p>एकदंत (Ekdant) अवतार भगवान गणेश के अष्टविनायक (Ashtavinayak) रूपों में दूसरा अवतार है। इस अवतार में भगवान गणेश का एक</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/ekadant-ashtavinayak/">एकदंत &#8211; Ekadant (गणेश जी का द्वितीय रूप)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>एकदंत (Ekdant) अवतार भगवान गणेश के अष्टविनायक (Ashtavinayak) रूपों में दूसरा अवतार है। इस अवतार में <a
href="/ganesh-ji-ki-aarti/">भगवान गणेश</a> का एक ही दाँत है। यह अवतार मदासुर के दमन के लिए हुआ था। यह एकदंत अवतार जो एकता और सामंजस्य का प्रतीक है।</p><p><strong>एकदन्तावतारौ वै देहिनां ब्रह्मधारकः।<br>मदासुरस्य हन्ता स आखुवाहनगः स्मृतः॥</strong></p><p>भगवान् गणेश का &#8216;एकदन्त अवतार&#8217; देहि ब्रह्म का धारक है। वह मदासुर का वध करने वाला है। उसका वाहन मूषक बताया गया है। मदासुर नाम का एक बलवान् पराक्रमी दैत्य था। वह महर्षि च्यवन का पुत्र था। एक बार वह अपने पिता से आज्ञा लेकर दैत्य <a
href="/tag/shukra/">गुरु शुक्राचार्य</a> के पास गया। उसने शुक्राचार्य से कहा कि आप मुझे कृपा पूर्वक अपना शिष्य बना लें। मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का स्वामी बनना चाहता हूँ। आप मेरी इच्छा पूरी करने के लिये मेरा उचित मार्ग दर्शन करें। शुक्राचार्य ने सन्तुष्ट होकर उसे अपना शिष्य बना लिया। सर्वज्ञ आचार्य ने उसे विधिसहित एकाक्षरी &#8220;ह्रीं&#8221; शक्ति मन्त्र दिया।</p><p>मदासुर अपने गुरुदेव के चरणों में प्रणाम कर जंगल में तप करने के लिये चला गया। उसने <a
href="/navdurga-hindi/">माँ भगवती</a> का <a
href="/swami-vivekananda-rajyog-dhyan-samadhi/">ध्यान करते</a> हुए हज़ारों वर्षों तक कठोर तप किया। यहाँ तक कि उसका शरीर दीमकों की बाँबी बन गया। उसके चारों ओर वृक्ष उग गए और लताएँ फैल गईं। उसके कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवती प्रकट हुईं। माता ने उसे नीरोग रहने तथा निष्कंटक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का राज्य प्राप्त होने का वरदान दिया।</p><p>मदासुर ने पहले सम्पूर्ण धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित किया। फिर स्वर्ग पर चढ़ाई की। इन्द्रादि देवताओं को जीतकर वह स्वर्ग का भी शासक बन बैठा। उसने प्रमदासुर की कन्या सालसा से विवाह किया। उससे उसे तीन पुत्र हुए। उसने शूलपाणि <a
href="/tag/shiva/">भगवान शिव</a> को भी पराजित कर दिया। सर्वत्र असुरों का क्रूरतम शासन चलने लगा। पृथ्वी पर समस्त धर्म-कर्म लुप्त हो गये। देवताओं एवं मुनियों के दुःख की सीमा न रही। सर्वत्र हाहाकार मच गया।</p><p>चिन्तित देवता सनत्कुमार के पास गये तथा उनसे उस असुर के विनाश एवं <a
href="/category/dharma/">धर्म-स्थापना</a> का उपाय पूछा। सनत्कुमार ने कहा &#8211; &#8216;देवगण आप लोग श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भगवान एकदन्त की उपासना करें। वे सन्तुष्ट होकर अवश्य ही आप लोगों का मनोरथ पूर्ण करेंगे। महर्षि के उपदेशानुसार देवगण एकदन्त की उपासना करने लगे। तपस्या के सौ वर्ष पूरे होने पर मूषक वाहक भगवान एकदंत प्रकट हुए तथा वर माँगने के लिये कहा। देवताओं ने निवेदन किया- &#8216;प्रभो! मदासुर के शासन में देवगण स्थान भ्रष्ट और मुनिगण कर्मभ्रष्ट हो गये हैं। आप हमें इस कष्ट से मुक्ति दिलाकर अपनी <a
href="/bhakti-yog-swami-vivekananda-hindi/">भक्ति प्रदान</a> करें।&#8217;</p><p>उधर <a
href="/narad-muni-story-hindi/">देवर्षि नारद</a> ने मदासुर को सूचना दी कि भगवान एकदन्त ने देवताओं को वरदान दिया है। अब वे तुम्हारा प्राण-हरण करने के लिये तुम से युद्ध करना चाहते हैं। मदासुर अत्यन्त कुपित होकर अपनी विशाल सेना के साथ एकदन्त से युद्ध करने चला।</p><p>भगवान एकदंत रास्ते में ही प्रकट हो गये। राक्षसों ने देखा कि भगवान एकदन्त सामने से चले आ रहे हैं। वह मूषक पर सवार हैं। उनकी आकृति अत्यन्त भयानक है। उनके हाथों में परशु, पाश आदि आयुध हैं। उन्होंने असुरों से कहा कि तुम अपने स्वामी से कह दो यदि वह जीवित रहना चाहता है तो देवताओं से द्वेष छोड़ दे। उनका राज्य उन्हें वापस कर दे। अगर वह ऐसा नहीं करता है तो मैं निश्चित ही उसका वध करूँगा।</p><p>महाक्रूर मदासुर युद्ध के लिये तैयार हो गया। जैसे ही उसने अपने धनुष पर बाण चढ़ाना चाहा कि भगवान एकदन्त (Ekadanta Ganapati) का तीव्र परशु उसे लगा और वह बेहोश होकर गिर गया।</p><p>बेहोशी टूटने पर मदासुर समझ गया कि यह सर्वसमर्थ परमात्मा ही हैं। उसने हाथ जोड़कर <a
href="/tag/stuti/">स्तुति</a> करते हुए कहा कि प्रभो! आप मुझे क्षमा कर अपनी दृढ़ भक्ति प्रदान करें। एकदंत ने प्रसन्न होकर कहा कि जहाँ मेरी पूजा आराधना हो, वहाँ तुम कदापि मत जाना। आज से तुम पाताल में रहोगे। देवता भी प्रसन्न होकर एकदन्त की स्तुति करके अपने लोक चले गये।</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=26453</guid><description><![CDATA[<p>वक्रतुण्ड अवतार भगवान गणेश के अष्टविनायक (Ashtavinayak Ganpati) रूपों में गणेश जी का प्रथम अवतार है। इस अवतार में भगवान</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/vakratunda-ashtavinayak/">वक्रतुण्ड &#8211; Vakratunda (गणेश जी का प्रथम रूप)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>वक्रतुण्ड अवतार भगवान गणेश के अष्टविनायक (Ashtavinayak Ganpati) रूपों में <a
href="/ganesh-ji-ki-aarti/">गणेश जी</a> का प्रथम अवतार है। इस अवतार में भगवान गणेश की सूंड बायीं ओर को मुड़ी हुई है। यह अवतार मत्सरासुर के दमन के लिए हुआ था। यह अवतार यह दर्शाता है कि <a
href="/ganesh-chalisa-in-hindi/">भगवान गणेश</a> सभी प्रकार के पापों और अत्याचारों का नाश करने के लिए सक्षम हैं।</p><p><strong>वक्रतुण्डावतारश्च देहानां ब्रह्मधारकः।<br>मत्सरासुरहन्ता स सिंहवाहनगः स्मृतः॥&nbsp;</strong></p><p><a
href="/ganesh-ji-ke-108-naam/">भगवान् श्रीगणेश</a> का &#8216;वक्रतुण्डावतार&#8217; (Vakratunda Avatar) ब्रह्मरूप से सम्पूर्ण शरीरों को धारण करने वाला, मत्सरासुर का वध करने वाला तथा सिंहवाहन पर चलने वाला है।</p><p>मुद्गल पुराण के अनुसार भगवान् गणेश के अनेकों अवतार हैं, जिनमें आठ अवतार प्रमुख हैं। पहला अवतार भगवान् वक्रतुंड का है। ऐसी कथा है कि <a
href="/tag/indra/">देवराज इन्द्र</a> के प्रमाद से मत्सरासुर का जन्म हुआ। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से भगवान् शिव के पञ्चाक्षरी मन्त्र (<a
href="/om-namah-shivaya-har-har-bhole-namah-shivaya-lyrics/">ॐ नमः शिवाय</a>) की दीक्षा प्राप्त कर <a
href="/om-jai-shiv-omkara-aarti/">भगवान् शंकर</a> की कठोर तपस्या की। <a
href="/shiv-chalisa-lyrics-in-hindi-pdf/">शंकर जी</a> ने प्रसन्न होकर उसे अभय होने का वरदान दिया।</p><p>वरदान प्राप्त कर जब मत्सरासुर घर लौटा तब शुकाचार्य ने उसे दैत्यों का राजा बना दिया। दैत्य मन्त्रियों ने शक्तिशाली मत्सर को विश्व-विजय की सलाह दी। शक्ति और पद के मद से चूर मत्सरासुर ने अपनी विशाल सेना के साथ पृथ्वी के राजाओं पर आक्रमण कर दिया। कोई भी राजा महान् असुर के सामने टिक नहीं सका। कुछ पराजित हो गये और कुछ प्राण बचाकर कन्दराओं में छिप गये। इस प्रकार सम्पूर्ण पृथ्वी पर मत्सरासुर का शासन हो गया।</p><p>पृथ्वी को अपने अधीन कर उस महापराक्रमी दैत्य ने क्रमशः पाताल और स्वर्ग पर भी चढ़ाई कर दी। शेष ने विनयपूर्वक उसके अधीन रहकर उसे कर देना स्वीकार कर लिया। वरुण, कुबेर, यम आदि समस्त देवता उससे पराजित होकर भाग गये। इन्द्र भी उसके सम्मुख नहीं टिक सके। मत्सरासुर स्वर्ग का भी सम्राट हो गया।</p><p>असुरों से दुःखी देवता <a
href="/tag/brahma/">ब्रह्मा</a> और <a
href="/tag/vishnu/">भगवान विष्णु</a> को साथ लेकर कैलास पहुँचे। उन्होंने भगवान शंकर को दैत्यों के अत्याचार का सारा समाचार सुनाया। भगवान् शंकर ने मत्सरासुर के इस दुष्कर्म की घोर निन्दा की। यह समाचार सुनकर मत्सरासुर ने कैलास पर भी आक्रमण कर दिया। भगवान शिव से उसका घोर युद्ध हुआ। परन्तु, त्रिपुरारि भगवान शिव भी उसके समक्ष नहीं ठहर सके। उसने उन्हें भी कठोर पाश में बाँध लिया और कैलास का स्वामी बनकर वहीं रहने लगा। चारों तरफ़ दैत्यों का अत्याचार होने लगा।</p><p>दुःखी देवताओं के सामने मत्सरासुर के विनाश का कोई मार्ग नहीं बचा। वे अत्यन्त चिन्तित और दुर्बल हो रहे थे। उसी समय वहाँ <a
href="/tag/dattatreya/">भगवान दत्तात्रेय</a> आ पहुँचे। उन्होंने देवताओं को वक्रतुण्ड के एकाक्षरी मन्त्र (गं) का उपदेश दिया। समस्त देवता भगवान वक्रतुंड के ध्यान के साथ एकाक्षरी मन्त्र का जप करने लगे।</p><p>उनकी आराधना से सन्तुष्ट होकर तत्काल फलदाता वक्रतुण्ड प्रकट हुए। उन्होंने देवताओं से कहा &#8211; &#8220;आप लोग निश्चिन्त हो जाएँ। मैं मत्सरासुर के गर्व को चूर-चूर कर दूँगा।&#8221;</p><p>भगवान् वक्रतुंड ने अपने असंख्य गणों के साथ मत्सरासुर के नगर को चारों तरफ़ से घेर लिया। भयंकर युद्ध छिड़ गया। पाँच दिनों तक लगातार युद्ध चलता रहा। मत्सरासुर के सुन्दरप्रिय एवं विषयप्रिय नामक दो पुत्र थे। वक्रतुण्ड के दो गणों ने उन्हें मार डाला। पुत्र-वध से व्याकुल मत्सरासुर रणभूमि में उपस्थित हुआ। वहाँ उसने भगवान वक्रतुंड को तमाम अपशब्द कहे। भगवान वक्रतुण्ड ने प्रभावशाली स्वर में कहा, &#8216;यदि तुझे प्राण प्रिय हैं तो शस्त्र रखकर मेरी शरण में आ जा। नहीं तो निश्चित मारा जाएगा&#8217;।&nbsp;</p><p>वक्रतुण्ड के भयानक रूप को देखकर मत्सरासुर अत्यन्त व्याकुल हो गया। उसकी सारी शक्ति क्षीण हो गयी। भय के मारे वह काँपने लगा तथा विनयपूर्वक वक्रतुंड की स्तुति करने लगा। उसकी प्रार्थना से सन्तुष्ट होकर दयामय वक्रतुण्ड ने उसे अभय प्रदान करते हुए अपनी <a
href="/bhakti-yog-swami-vivekananda-hindi/">भक्ति का वरदान</a> दिया तथा शान्त जीवन बिताने के लिये पाताल जाने का आदेश दिया। मत्सरासुर से निश्चिन्त होकर देवगण वक्रतुंड की स्तुति करने लगे। देवताओं को स्वतन्त्र कर प्रभु वक्रतुण्ड ने उन्हें भी अपनी <a
href="/bhakti-yog-avastha-bhed-swami-vivekanand/">भक्ति</a> प्रदान की ।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/vakratunda-ashtavinayak/">वक्रतुण्ड &#8211; Vakratunda (गणेश जी का प्रथम रूप)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/vakratunda-ashtavinayak/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> </channel> </rss>