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><channel><title>चाणक्य Archives - हिंदी पथ</title> <atom:link href="https://hindipath.com/tag/chanakya/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" /><link>https://hindipath.com/tag/chanakya/</link> <description>हिंदी का संसार</description> <lastBuildDate>Tue, 10 Oct 2023 07:07:26 +0000</lastBuildDate> <language>en-US</language> <sy:updatePeriod> hourly </sy:updatePeriod> <sy:updateFrequency> 1 </sy:updateFrequency> <generator>https://wordpress.org/?v=6.3.11</generator><image> <url>https://hindipath.com/wp-content/uploads/2019/09/HindiPath-Site-Icon-New.png</url><title>चाणक्य Archives - हिंदी पथ</title><link>https://hindipath.com/tag/chanakya/</link> <width>32</width> <height>32</height> </image> <item><title>चाणक्य नीति सूत्र संग्रह – Chanakya Niti Sutra in Hindi</title><link>https://hindipath.com/chanakya-niti-sutra-sangrah-hindi/</link> <comments>https://hindipath.com/chanakya-niti-sutra-sangrah-hindi/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[HindiPath]]></dc:creator> <pubDate>Tue, 23 Feb 2021 10:21:41 +0000</pubDate> <category><![CDATA[ग्रंथ]]></category> <category><![CDATA[Niti Shastra]]></category> <category><![CDATA[चाणक्य]]></category> <category><![CDATA[चाणक्य नीति]]></category> <category><![CDATA[राजनीति]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=4382</guid><description><![CDATA[<p>चाणक्य नीति सूत्र पढ़ें व जीवन में सफलता की ओर बढ़ें। यहाँ आप संस्कृत सूत्र के साथ हिंदी अर्थ भी पाएंगे।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/chanakya-niti-sutra-sangrah-hindi/">चाणक्य नीति सूत्र संग्रह – Chanakya Niti Sutra in Hindi</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>चाणक्य नीति सूत्र वस्तुतः <a
href="/chanakya-niti-in-hindi-pdf-free-download/">चाणक्य नीति</a> से ही संकलित किए गए हैं। सूत्र याद रखने में सरल होते हैं। वे गहराई से दिमाग़ पर असर करते हैं। यही वजह है कि प्राचीन काल में अनेक <a
href="/category/hindi-scriptures/amp/">ग्रंथों</a> की रचना सूत्रों के संकलन के रूप में की गयी।</p><p>आचार्य चाणक्य द्वारा रचित ये चाणक्य नीति सूत्र देखने में छोटे लगते हैं, लेकिन इनका प्रभाव गहन है। इनका अध्ययन जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे जाने के लिए आवश्यक है। पढ़ें आचार्य चाणक्य के ये सूत्र–</p><p><strong>सुखस्य मूलं धर्मः।</strong><br>धर्म ही सुख देने वाला है।</p><p><strong>धर्मस्य मूलमर्थः।</strong><br>धन से ही धर्म संभव है।</p><p><strong>अर्थस्य मूलं राज्यम्।</strong><br>राज्य का वैभव धन से संभव है।</p><p><strong>राज्यमूलमिन्द्रियजमः।</strong><br>राज्य की उन्नति इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने से है।</p><p><strong>इंद्रियजयस्य मूलं विनयः।</strong><br>इंद्रियों पर विजय तभी संभव है जब विनय रूपी संपदा हो।</p><p><strong>विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा।</strong><br>वृद्धों की सेवा से ही विनय भाव जाग्रत होता है।</p><p><strong>वृद्धसेवया विज्ञानत्।</strong><br>चाणक्य नीति सूत्र के अनुसार वृद्ध-सेवा से सत्य ज्ञान प्राप्त होता है।</p><p><strong>विज्ञानेनात्मानं सम्पादयेत्।</strong><br>विज्ञान (सत्य ज्ञान) से राजा अपने को योग्य बनाए।</p><p><strong>सम्पादितात्मा जितात्मा भवति।</strong><br>अपने कर्तव्यों को जानने वाला राजा ही इंद्रियों को जीतने वाला होता है।</p><p><strong>जितात्मा सर्वार्थे संयुज्येत।</strong><br>इंद्रियों को वश में रखने वाला मनुष्य सभी सम्पत्तियों को प्राप्त करता है।</p><p><strong>अर्थसम्पत् प्रकृतिसम्पदं करोति।</strong><br>राजा के सम्पन्न होने पर प्रजा भी सम्पन्न हो जाती है।</p><p><strong>प्रकृतिसम्पदा ह्यनायकमपि राज्यं नीयते।</strong><br>प्रजा के सम्पन्न होने पर राजा के बिना भी राज्य चलता है।</p><p><strong>प्रकृतिकोपः सर्वकोपेभ्यो गरीयान्।</strong><br>प्रजा का क्रोध (नाराजगी) सभी क्रोधों से भयंकर होता है।</p><p><strong>अविनीतस्वामिलाभादस्वामिलाभः श्रेयान्।</strong><br>नीच (दुराचारी) राजा के होने से राजा न होना अच्छा है।</p><p><strong>सम्पद्यात्मानमविच्छेत् सहायवान्।</strong><br>राजा स्वयं योग्य बनकर योग्य सहायकों की सहायता से शासन चलाए।</p><p><strong>न सहायस्य मन्त्रनिश्चयः।</strong><br>सहायकों के बिना राजा कोई निर्णय नहीं कर पाता।</p><p><strong>नैकं चक्रं परिभ्रमयति।</strong><br>केवल एक पहिया रथ को नहीं चला पाता।</p><p><strong>सहायः समसुखदुःखः।</strong><br>जो सुख और दुःख में बराबर साथ देने वाला होता है सच्चा सहायक होता है।</p><p><strong>मानी प्रतिमानीनामात्मनि द्वितीयं मन्त्रमुत्पादयेत्।</strong><br>अभिमानी राजा जटिल समस्याओं में अभिमान त्याग कर निष्पक्ष विचारों द्वारा निष्कर्ष पर पहुंचे।</p><p><strong>अविनीतं स्नेहमात्रेण न मंत्रे कुर्वीत।</strong><br>दुराचारी को स्नेह मात्र से मंत्रणा में न रखे।</p><p><strong>श्रुतवन्तमुपधाशुद्धं मन्त्रिणं कुर्वीत।</strong><br>बात सुनने वाले तथा उच्च विचार करने वाले मनुष्य को ही राजा अपना मंत्री बनाए।</p><p><strong>मन्त्रमूलाः सर्वारम्भाः।</strong><br>सभी कार्य विचार-विमर्श व सलाह से ही आरंभ होते हैं।</p><p><strong>मन्त्ररक्षणे कार्यसिद्धिर्भवति।</strong><br>उचित सलाह के पालन से कार्य में सफलता शीघ्र मिलती है।</p><p><strong>मन्त्रविस्रावी कार्यं नाशयति।</strong><br>हितकारी व गोपनीय बातों का प्रचार कर देने से इच्छित कार्य शीघ्र नष्ट हो जाता है।</p><p><strong>प्रमादाद् द्विषितां वशमुपयास्यति।</strong><br>घमंडी होने से गोपनीय रहस्य शत्रु को ज्ञात हो जाता है।</p><p><strong>सर्वद्वारेभ्यो मन्त्रो रक्षयितव्यः।</strong><br>सभी प्रकार से गोपनीय विचारों / सलाहों की रक्षा की जानी चाहिए।</p><p><strong>मन्त्रसम्पदा राज्यं वर्धते।</strong><br>योजना रूपी सम्पदा राज्य की वृद्धि करती है।</p><p><strong>(i) श्रेष्ठतमं मन्त्रगुप्तिमाहुः।</strong><br>अग्रिम योजनाओं की गोपनीयता श्रेष्ठतम कही गई है।<br><strong>(ii) कार्यन्धस्य प्रदीपो मन्त्रः।</strong><br>अधिकार रूपी कार्य के लिए सलाह ही दीपक है।</p><p><strong>मन्त्रचक्षुषा परछिद्राण्यव लोकयन्तिः।</strong><br>उचित सलाह रूपी आँखों से राजा शत्रु की दुर्बलताओं को देखता है।</p><p><strong>मन्त्रकाले न मत्सरः कर्तव्यः।</strong><br>सलाह-मशवरा के समय कोई जिद नहीं करनी चाहिए।</p><p><strong>त्रयाणामेकवाक्ये सम्प्रत्ययः।</strong><br>तीनों (राजा, मंत्री, और विद्वान) का एक मत होना सबसे अच्छी सफलता है।</p><p><strong>कार्यकार्यतत्त्वार्थदर्शिनो मन्त्रिणः।</strong><br>कार्य-अकार्य के रहस्य को ठीक-ठीक जानने वाले ही मंत्री होने चाहिए।</p><p><strong>षट्कर्णाद् भिद्यते मन्त्रः।</strong><br>छह कानों से सलाह-मशवरा का खुलासा हो जाता है।</p><p><strong>आपत्सु स्नेहसंयुक्तं मित्रम्।</strong><br>विपत्ति के समय भी स्नेह रखने वाला ही मित्र है।</p><p><strong>मित्रसंग्रहेण बलं सम्पद्यते।</strong><br>अच्छे और योग्य मित्रों की अधिकता से बल प्राप्त होता है, ऐसा कहना है आचार्य चाणक्य का चाणक्य नीति सूत्र में।</p><p><strong>बलवान् अलब्धलाभ प्रयतते।</strong><br>बलवान राजा जो प्राप्त न की जा सके उसको प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।</p><p><strong>अलब्धलाभो नालसस्य।</strong><br>आलसी को कुछ भी प्राप्त नहीं होता।</p><p><strong>आलसस्य लब्धमपि रक्षितुं न शक्यते।</strong><br>आलसी प्राप्त वस्तु की भी रक्षा नहीं कर सकता।</p><p><strong>न आलसस्य रक्षितं विवर्धते।</strong><br>आलसी के बचाए हुए किसी भी वस्तु की बढ़ोत्तरी नहीं होती।</p><p><strong>न भृत्यान् प्रेषयति।</strong><br>आलसी राजा सेवकों से भी काम नहीं लेते।</p><p><strong>अलब्धलाभादिचतुष्टयं राज्यतन्त्रम्।</strong><br>न प्राप्त होने वाले को प्राप्त करना, उसकी रक्षा करना, उसकी वृद्धि करना तथा उसका उचित उपयोग करना, ये चार कार्य राज्य के लिए आवश्यक हैं।</p><p><strong>राज्यतन्त्रायत्तं नीतिशास्त्रम्।</strong><br>नीति शास्त्र राज्य व्यवस्था के अधीन है।</p><p><strong>राज्यतन्त्रेष्वायत्तौ तन्त्रावापौ।</strong><br>स्वराष्ट्र नीति तथा विदेश नीति राज्य-व्यवस्था के अंग हैं।</p><p><strong>तन्त्र स्वविषयकृत्येष्वायत्तम्।</strong><br>तंत्र (स्वराष्ट्र नीति) केवल राष्ट्र के आंतरिक मामलों से सम्बद्ध है।</p><p><strong>अवापो मण्डलनिविष्टः।</strong><br>परराष्ट्र नीति सभी राष्ट्रों से सम्बद्ध होनी चाहिए।</p><p><strong>सन्धिविग्रहयोनिर्मण्डलः।</strong><br>अन्य देशों से सन्धि या विच्छेद चलते रहते हैं।</p><p><strong>नीतिशास्त्रानुगो राजा।</strong><br>नीति शास्त्र का पालन करना राजा की योग्यता है।</p><p><strong>अनन्तरप्रकृतिः शत्रुः।</strong><br>हर समय सीमा-संघर्ष होने वाले देश शत्रु बन जाते हैं।</p><p><strong>एकान्तरितं मित्रमिष्यते।</strong><br>एक जैसे ही देश मित्र बन जाते हैं।</p><p><strong>हेतुतः शत्रुमित्रे भविष्यतः।</strong><br>किसी कारण से ही शत्रु या मित्र बनते हैं।</p><p><strong>हीयमानः सधिं कुर्वीत।</strong><br>कमजोर राजा शीघ्र सन्धि कर ले।</p><p><strong>तेजो हि सन्धानहेतुस्तदर्थानाम्।</strong><br>संधि करने वालों का उद्देश्य ही संधि करना रहता है।</p><p><strong>नातप्तलौहो लौहेन सन्धीयते।</strong><br>बिना गर्म किए लोहा लोहे से नहीं जुड़ता।</p><p><strong>बलवान हीनेन विग्रह्णीयात्।</strong><br>बलवान कमजोर पर ही आक्रमण करे।</p><p><strong>न ज्यायसा समेन वा।</strong><br>अधिक बलवान या बराबर बल वाले से युद्ध न करें।</p><p><strong>गजपादयुद्धमिव बलवद्विग्रहः।</strong><br>बलवान से युद्ध करना हाथियों की सेना से पैदलों का लड़ना है।</p><p><strong>आमपात्रमामेन सह विनश्यति।</strong><br>कच्चा पात्र कच्चे पात्र से टकराकर फूट जाता है।</p><p><strong>अरिप्रयत्नमभिसमीक्षेत।</strong><br>चाणक्य नीति सूत्र की सीख है कि शत्रु के प्रयासों पर ध्यान देते रहें।</p><p><strong>सन्धायैकतो वा।</strong><br>पड़ोसी देश के साथ सन्धि भी हो तो उसकी गतिविधि की उपेक्षा न करें।</p><p><strong>अमित्रविरोधात्मरक्षामावसेत।</strong><br>शत्रु देश के गुप्तचरों पर सदैव ध्यान रखना चाहिए।</p><p><strong>शक्तिहीनो बलवन्तमाश्रयेत्।</strong><br>शक्तिहीन राजा बलवान राजा का आश्रय लें।</p><p><strong>दुर्बलाश्रयो दुःखमावहति।</strong><br>दुर्बल का आश्रय दुःख देता है।</p><p><strong>अग्निवद्राजानमाश्रयेत्।</strong><br>जैसे अग्नि का आश्रय लिया जाता है, वैसे ही राजा का भी आश्रय लें।</p><p><strong>राज्ञः प्रतिकूलं नाचरेत्।</strong><br>राजा के विपरीत आचरण न करें।</p><p><strong>उद्धतवेशधरो न भवेत्।</strong><br>मनुष्य की वेश-भूषा उटपटांग नहीं होनी चाहिए।</p><p><strong>न देवचरितं चरेत्।</strong><br>देवों के चरित्र का अनुकरण नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>द्वयोरपीर्ष्यतोद्वैधीभावं कुर्वीत।</strong><br>अपने से ईर्ष्या करने वाले दो व्यक्तियों में कूटनीति से फूट डाल देनी चाहिए।</p><p><strong>नव्यसनपरस्य कार्यावाप्तिः।</strong><br>बुरी आदतों में लगे हुए मनुष्य को कार्य की प्राप्ति नहीं होती।</p><p><strong>इन्द्रियवशवर्ती चतुरंगवानपि विनश्यति।</strong><br>इंद्रियों के अधीन रहने वाला राजा चतुरंगिनी सेना होने पर भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।</p><p><strong>नास्ति कार्यं द्यूतप्रवर्तस्य।</strong><br>जुए में लगे हुए का कोई कार्य नहीं होता।</p><p><strong>मृगयापरस्य धर्मार्थौ विनश्यतः।</strong><br>शिकार में लगे हुए का धर्म और अर्थ दोनों नष्ट हो जाते हैं।</p><p><strong>अर्थेषणा न व्यसनेषु गण्यते।</strong><br>धन की अभिलाषा रखना कोई बुराई नहीं मानी जाती।</p><p><strong>न कामासक्तस्य कार्यनुष्ठानम्।</strong><br>विषय-वासनाओं से घिरा हुआ मनुष्य कोई कार्य नहीं कर सकता।</p><p><strong>अग्निदाहादपि विशिष्टं वाक्पारुष्यम्।</strong><br>वाणी की कठोरता अग्निदाह से भी बढ़कर है।</p><p><strong>दण्डपारुष्णात् सर्वजनद्वेष्यो भवति।</strong><br>निरपराधी को कठोर दंड देने पर उसे बदला लेने वाला शत्रु बना देता है।</p><p><strong>अर्थतोषिणं श्रीः परित्यजति।</strong><br>धन से संतुष्ट राजा को लक्ष्मी त्याग देती है।</p><p><strong>अमित्रो दण्डनीत्यामायत्तः।</strong><br>दुश्मन दंड नीति का भागी होता है।</p><p><strong>दण्डनीतिमधितिष्ठन् प्रजाः संरक्षति।</strong><br>दंडनीति के उचित प्रयोग से प्रजा की रक्षा होती है।</p><p><strong>दण्डसम्पदा योजयति।</strong><br>न्याय-व्यवस्था राजा को सम्पत्ति वाला बनाता है।</p><p><strong>दण्डाभावे मन्त्रिवर्गाभावः।</strong><br>दंडनीति न लगाने पर मंत्रियों में भी कमियां आ जाती हैं।</p><p><strong>न दण्डादकार्याणि कुर्वन्ति।</strong><br>दंड विधान न लगाने पर बुरे कार्य बढ़ जाते हैं।</p><p><strong>दण्डनीत्यामायत्तमात्मरक्षणम्।</strong><br>आत्मरक्षा दंडनीति पर ही निर्भर है।</p><p><strong>आत्मनि रक्षिते सर्वं रक्षितं भवति।</strong><br>आत्मरक्षा होने पर ही सबकी रक्षा होती है।</p><p><strong>आत्मायत्तौ वृद्धिविनाशौ।</strong><br>वृद्धि और विनाश अपने हाथ में है।</p><p><strong>दण्डो हि विज्ञाने प्रणीयते।</strong><br>दंड का प्रयोग विवेक से करना चाहिए।</p><p><strong>दुर्बलोऽपि राजा नावमन्तव्यः।</strong><br>दुर्बल राजा का भी अपमान नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>नास्त्यग्नेर्दौर्बल्यम्।</strong><br>अग्नि में दुर्बलता नहीं होती।</p><p><strong>दण्डे प्रतीयते वृत्तिः।</strong><br>राजा की आय दंडनीति से प्राप्त होती है।</p><p><strong>वृत्तिमूलमर्थलाभः।</strong><br>आय प्राप्ति का मतलब लाभ पाना है।</p><p><strong>अर्थमूलौ धर्मकामौ।</strong><br>धर्म और काम का मूल धन है।</p><p><strong>अर्थमूलं कार्यम्।</strong><br>धन ही सभी कार्यों का मूल है, यह कथन है चाणक्य नीति सूत्र का।</p><p><strong>यदल्पप्रयत्नात् कार्यसिद्धिर्भवति।</strong><br>धन होने से कम प्रयास से ही कार्य सिद्ध हो जाते हैं।</p><p><strong>उपायपूर्वं न दुष्करं स्यात्।</strong><br>उपाय से कार्य कठिन नहीं होता।</p><p><strong>अनुपायपूर्वं कार्यं कृतमपिविनश्यति।</strong><br>अनुपायपूर्वक किया हुआ कार्य भी नष्ट हो जाता है।</p><p><strong>कार्यार्थिनामुपाय एव सहायः।</strong><br>उद्यमियों के लिए उपाय ही सहायक है।</p><p><strong>कार्य पुरुषकारेण लक्ष्यं सम्पद्यते।</strong><br>निश्चय कर लेने पर कार्य पूर्ण हो जाता है।</p><p><strong>पुरुषकारमनुवर्तते दैवम्।</strong><br>भाग्य पुरुषार्थ के पीछे-पीछे चलता है।</p><p><strong>दैवं विनाऽति प्रयत्नं करोति यत्तद्विफलम्।</strong><br>भाग्य पुरुषार्थी का ही साथ देता है।</p><p><strong>असमाहितस्य वृतिर्न विद्यते।</strong><br>भाग्य के भरोसे बैठे रहने पर कुछ भी प्राप्त नहीं होता।</p><p><strong>पूर्वं निश्चित्य पश्चात् कार्यमारभेत्।</strong><br>पहले निश्चय करें, फिर कार्य आरंभ करें।</p><p><strong>कार्यान्तरे दीर्घसूत्रता न कर्तव्या।</strong><br>कार्य के बीच में आलस्य न करें।</p><p><strong>न चलचित्तस्य कार्यावाप्तिः।</strong><br>चंचल चित्त वाले को कार्यसिद्धि नहीं होती।</p><p><strong>हस्तगतावमानात् कार्यव्यतिक्रमो भवति।</strong><br>अपने हाथ में साधन नहीं रहने पर कार्य ठीक नहीं होता।</p><p><strong>दोषवर्जितानि कार्याणि दुर्लभानि।</strong><br>बिना कमी रहे कार्य होना बहुत दुर्लभ है।</p><p><strong>दुरनुबन्धं कार्यं नारभेत्।</strong><br>जो कार्य हो न सके उस कार्य को प्रारंभ ही न करें।</p><p><strong>कालवित् कार्यं साधयेत्।</strong><br>समय के महत्त्व को समझने वाला निश्चय ही अपना कार्य सिद्धि कर पाता है। चाणक्य नीति का यह सूत्र गाँठ बांधने लायक़ है।</p><p><strong>कालातिक्रमात् काल एव फलं पिबति।</strong><br>समय से पहले कार्य करने से समय ही कार्य-फल को पी जाता है।</p><p><strong>क्षण प्रति कालविक्षेपं न कुर्यात् सर्वं कृत्येषु।</strong><br>सभी प्रकार के कार्यों में एक क्षण की भी उपेक्षा न करें।</p><p><strong>देशफलविभागौ ज्ञात्वा कार्यमारभेत्।</strong><br>स्थान एवं परिणाम के अंतर को जानकर कार्य आरंभ करें।</p><p><strong>दैवहीनं कार्यं सुसाध्यमपि दुःसाध्यं भवति।</strong><br>भाग्यहीन वाले के सभी कार्य होने वाला भी बहुत कठिन हो जाता है।</p><p><strong>नीतिज्ञो देशकालौ परीक्षेत।</strong><br>नीति जानने वाले देश-काल की परीक्षा करें।</p><p><strong>परीक्ष्यकारिणी श्रीश्चिरं तिष्ठति।</strong><br>परीक्षण करके कार्य करने से लक्ष्मी दीर्घकाल तक रहती है।</p><p><strong>सर्वाश्च सम्पतः सर्वोपायेन परिग्रहेत्।</strong><br>सभी सम्पत्तियों का सभी उपायों से संग्रह करना चाहिए।</p><p><strong>भाग्यवन्तमपरीक्ष्यकारिणं श्रीः परित्यजति।</strong><br>बिना विचारे कार्य करने वाले भाग्यशाली को भी लक्ष्मी त्याग देती है।</p><p><strong>ज्ञानानुमानैश्च परीक्षा कर्तव्या।</strong><br>ज्ञान और अनुमान से परीक्षा करनी चाहिए।</p><p><strong>यो यस्मिन् कर्मणि कुशलस्तं तस्मिन्नैव योजयेत्।</strong><br>जो मनुष्य जिस कार्य में निपुण हो, उसे वही कार्य सौंपना चाहिए।</p><p><strong>दुःसाध्यमपि सुसाध्यं करोत्युपायज्ञः।</strong><br>उपायों का ज्ञाता कठिन को भी आसान बना देता है।</p><p><strong>अज्ञानिना कृतमपि न बहु मन्तव्यम्।</strong><br>अज्ञानियों द्वारा किए कार्य को महत्त्व नहीं देना चाहिए।</p><p><strong>यादृच्छिकत्वात् कृमिरपि रूपान्तराणि करोति।</strong><br>संयोग से कीट भी लकड़ी को कतरते-कतरते चित्रनुमा बना देता है। इसका मतलब यह नहीं कि वह चित्रकार है।</p><p><strong>सिद्धस्यैव कार्यस्य प्रकाशनं कर्तव्यम्।</strong><br>कार्य सिद्ध होने पर ही कहीं कहना चाहिए।</p><p><strong>ज्ञानवतामपि दैवमानुषदोषात् कार्याणि दुष्यन्ति।</strong><br>ज्ञानवान लोगों के कार्य भी भाग्य से या मनुष्यों द्वारा दूषित हो जाते हैं।</p><p><strong>दैवं शान्तिकर्मणा प्रतिषेधव्यम्।</strong><br>प्राकृतिक विपत्ति को शांतिकर्म से टालने का प्रयास करना चाहिए।</p><p><strong>मानुषीं कार्यविपत्ति कौशलेन विनिवारयेत्।</strong><br>मनुष्य द्वारा पैदा की गई कार्य-विपत्ति का कुशलता से निवारण करना चाहिए।</p><p><strong>कार्यविपत्तौ दोषान् वर्णयन्ति बालिशाः।</strong><br>मूर्ख लोग कार्य-विपत्ति पर दोष देखने लगते हैं।</p><p><strong>कार्यार्थिना दाक्षिण्यं न कर्तव्यम्।</strong><br>हानि पहुंचाने वालों के प्रति उदारता न करें।</p><p><strong>क्षीरार्थी वत्सो मातुरुधः प्रतिहन्ति।</strong><br>दूध के लिए बछड़ा माँ के थनों पर प्रहार करता है।</p><p><strong>अप्रयत्नात् कार्यविपत्तिर्भवति।</strong><br>प्रयास न करने से कार्य का नाश होता है।</p><p><strong>न दैवप्रमाणानां कार्यसिद्धिः।</strong><br>भाग्य भरोसे रहने वालों को कार्यसिद्धि नहीं होती।</p><p><strong>कार्यबाह्यो न पोषयत्याश्रितान्।</strong><br>कर्तव्य से भागने वाला आश्रितों का पोषण नहीं कर सकता।</p><p><strong>यः कार्यं न पश्यति सोऽन्धः।</strong><br>जो कार्य को नहीं देखता वह अंधा है। चाणक्य नीति सूत्र की यह याद रखने वाली बात है।</p><p><strong>प्रत्यक्षपरोक्षानुमानैः कार्याणि परीक्षेत्।</strong><br>प्रत्यक्ष, परोक्ष साधनों तथा अनुमान से कार्यों की परीक्षा करें।</p><p><strong>अपरीक्ष्यकारिणं श्रीः परित्यजति।</strong><br>बिना विचारे कार्य करने वाले को लक्ष्मी त्याग देती हैं।</p><p><strong>परीक्ष्य तार्या विपत्तिः।</strong><br>कार्य-विपत्ति का परीक्षा से निराकरण करें।</p><p><strong>स्वशक्तिं ज्ञात्वा कार्यमारंभेत्।</strong><br>अपनी शक्ति को जानकर ही कार्य आरंभ करें।</p><p><strong>स्वजनं तर्पयित्वा यः शेषभोजी सोऽमृतभोजी।</strong><br>स्वजनों को तृप्त करके शेष भोजी अमृत भोजी होता है।</p><p><strong>सर्वानुष्ठानादायमुखानि वर्धन्ते।</strong><br>सभी अनुष्ठानों से आय के साधन बढ़ते हैं।</p><p><strong>नास्ति भीरोः कार्यचिन्ता।</strong><br>कायर को कार्य की चिन्ता नहीं होती।</p><p><strong>स्वामिनः शीलं ज्ञात्वा कार्यार्थी कार्यं साधयेत्।</strong><br>स्वामी के शील को जानकर काम करने वाले कार्य-साधना करते हैं।</p><p><strong>धेनोः शीलज्ञः क्षीरं भुङ्क्ते।</strong><br>गाय के सीधेपन जानने वाला दूध का उपभोग करता है।</p><p><strong>क्षुद्रे गुह्यप्रकाशनमात्मवान् न कुर्यात्।</strong><br>नीच व्यक्ति से अपनी गोपनीय बातें कभी नहीं करनी चाहिए।</p><p><strong>आश्रितैरप्यवमनसते मृदुस्वभावः।</strong><br>मृदु स्वभाव वाला व्यक्ति आश्रितों से भी अपमानित होता है।</p><p><strong>तीक्ष्णदण्डः सर्वेरुद्वेदनीयो भवति।</strong><br>कठोर दंड देने वाले राजा से प्रजा घृणा करती है।</p><p><strong>यथार्हं दण्डकारी स्यात्।</strong><br>राजा यथोचित दंड का उपयोग करे।</p><p><strong>अल्पसारं श्रुतवन्तमपि न बहुमन्यते लोकः।</strong><br>गंभीर न रहने वाले विद्वान को समाज सम्मान नहीं देता।</p><p><strong>अतिभारः पुरुषमवसादयति।</strong><br>अधिक दबाव पुरुष को दुःखी करता है।</p><p><strong>यः संसदि परदोषं शंसति स स्वदोषं प्रख्यापयति।</strong><br>जो भरी सभा में दूसरे का दोष दिखाता है, वह अपने ही दोषों को उजागर करता है।</p><p><strong>आत्मनमेव नाशयत्यनात्मवातां कोपः।</strong><br>मूर्खों का क्रोध उन्हीं का नाश करता है।</p><p><strong>नास्त्यप्राप्यं सत्यवताम्।</strong><br>सत्य-सम्पन्न लोगों के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है।</p><p><strong>साहसेन न कार्यसिद्धिर्भवति।</strong><br>केवल साहस से कार्य-सिद्धि नहीं होती।</p><p><strong>व्यसानार्तो विरमत्यप्रवेशेन।</strong><br>बुरी आदतों में लगा हुआ व्यक्ति लक्ष्य तक पहुंचे बिना रुक जाता है।</p><p><strong>नास्त्यनन्तरायः कालविक्षेपे।</strong><br>समय की उपेक्षा करने से कार्य में बाधा आ जाती है। इसलिए चाणक्य नीति सूत्र की मानें, तो समय का सदैव सदुपयोग करें।</p><p><strong>असंशयविनाशात् संशयविनाशः श्रेयान्।</strong><br>भविष्य में होने वाला विनाश से हो रहा विनाश श्रेष्ठ है।</p><p><strong>परधनानि निक्षेप्तुः केवलं स्वार्थम्।</strong><br>दूसरे की धरोहर के प्रति भेदभाव स्वार्थ है।</p><p><strong>दानं धर्मः।</strong><br>दान करना धर्म है।</p><p><strong>नार्यागतोऽर्थवत् विपरीतोऽनर्थभावः।</strong><br>संस्कारहीन समाज में प्रचलित धन का उपयोग मानव जीवन नाशक होता है।</p><p><strong>यो धर्मार्थौ न विवर्धयति स कामः।</strong><br>जो धर्म और अर्थ की वृद्धि नहीं करता वह वासना है।</p><p><strong>तद्विपरीतोऽर्थाभासः।</strong><br>धर्म के विपरीत प्रकार से आया हुआ धन मात्र महसूस करा सकता है।</p><p><strong>ऋजुस्वभावपरो जनेषु दुर्लभः।</strong><br>निष्कपट व्यवहार वाला व्यक्ति बहुत दुर्लभ होता है।</p><p><strong>अवमानेनागतमैश्वर्यमवमन्यते साधुः।</strong><br>अन्याय से आया हुआ धन को उपेक्षित कर देने वाला ही साधु है।</p><p><strong>बहूनपि गुणानेक दोषो ग्रसति।</strong><br>बहुत से गुणों को भी एक दोष चौपट कर देता है।</p><p><strong>महात्मना परेण साहसं न कर्तव्यम्।</strong><br>महात्मा लोग दूसरों के साहस पर भरोसा न करें।</p><p><strong>कदाचिदपि चरित्रं न लंघेत्।</strong><br>चरित्र का उल्लंघन कभी नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>क्षुधार्तो न तृणं चरति सिंहः।</strong><br>भूखा हुआ शेर कभी घास नहीं खाता।</p><p><strong>प्राणदपि प्रत्ययो रक्षितव्यः।</strong><br>प्राण से भी अधिक विश्वास की रक्षा करनी चाहिए।</p><p><strong>पिशुनः श्रोता पुत्रदारैरपि त्यज्यते।</strong><br>चुगलखोर की बात सुनने वाले को पुत्र-पत्नी भी त्याग देते हैं।</p><p><strong>बालादप्यर्थजातं शृणुयात्।</strong><br>बालकों को भी अत्यंत उपयोगी बातें सुननी चाहिए।</p><p><strong>सत्यमप्यश्रद्धेयं न वदेत्।</strong><br>सत्य भी यदि प्रिय न हो, तो भी उसे नहीं कहना चाहिए। जिन्हें यशलाभ की इच्छा हो, उन्हें चाणक्य नीति सूत्र की यह बात याद रखनी चाहिए।</p><p><strong>नाल्पदोषाद् बहुगुणस्त्यज्यन्ते।</strong><br>अल्प दोष से अधिक गुण नहीं त्यागे जाते।</p><p><strong>विपश्चित्स्वपि सुलभा दोषः।</strong><br>ज्ञानी पुरुषों में भी दोष हो सकता है।</p><p><strong>नास्ति रत्नमखण्डितम्।</strong><br>बिना दोषयुक्त रत्न (हीरा-जवाहरात) भी नहीं मिलता।</p><p><strong>मर्यादातीतं न कदाचिदपि विश्वसेत्।</strong><br>चरित्रहीन का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>अप्रियेण कृतं प्रियमपि द्वेष्यं भवति।</strong><br>शत्रु द्वारा किया जा रहा उपकार भी घातक होता है।</p><p><strong>नमन्त्यपि तुलाकोटिः कूपोदकक्षयं करोति।</strong><br>नमस्कार करने पर ही ढेकुली कुएं से पानी निकालता है।</p><p><strong>सतां मतं नातिक्रमेत्।</strong><br>सज्जनों के विचारों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>गुणवदाश्रयन्निर्गुणोऽपि गुणी भवति।</strong><br>गुणवान के सहारे बिना गुण वाला भी गुणी हो जाता है।</p><p><strong>क्षीराश्रितं जलं क्षीरमेव भवति।</strong><br>दूध में मिला हुआ जल दूध ही हो जाता है।</p><p><strong>मृत्पिण्डोऽपि पाटलिगन्धमुत्पादयति।</strong><br>मिट्टी भी फूलों के संपर्क में रहने पर सुगंध पैदा करती है।</p><p><strong>रजतं कनकसंगात कनकं भवति।</strong><br>चांदी सोने के संपर्क में आकर सोना ही बन जाती है।</p><p><strong>उपकर्तर्यपकर्तुमि-छत्यबुधः।</strong><br>मूर्ख व्यक्ति भलाई के बदले बुराई करता है।</p><p><strong>न पापकर्मणामाक्रोशभयम्।</strong><br>पाप करने वाले को निन्दा का भय नहीं होता।</p><p><strong>उत्साहवतां शत्रवोऽपि वशीभवन्ति।</strong><br>हिम्मत वालों के शत्रु भी वश में हो जाते हैं।</p><p><strong>विक्रमधना राजानः।</strong><br>राजा पराक्रम (वीरता) से धनी होते हैं।</p><p><strong>नास्त्यलसस्यैहिकामुष्मिकम्।</strong><br>आलसी व्यक्ति का वर्तमान और भविष्य नहीं होता।</p><p><strong>निरुत्साहाद् दैवं पतति।</strong><br>उत्साह के अभाव में भाग्य भी नष्ट हो जाता है।</p><p><strong>मत्स्यार्थीव जलमुपयुज्यार्थ गृह्णीयात्।</strong><br>मछुआरे के समान जल में डूबकर लाभ ले लें।</p><p><strong>अविश्वस्तेषु विश्वासो न कर्तव्यः।</strong><br>जिनका विश्वास न हो, उन पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>विषं विषमेव सर्वकालम्।</strong><br>जहर कभी भी जहर ही है।</p><p><strong>अर्थ समादाने वैरिणां संग एव न कर्तव्यः।</strong><br>धन बचाना हो तो दुश्मनों का साथ छोड़ दें।</p><p><strong>अर्थसिद्धौ वैरिणं न विश्वसेत्।</strong><br>उद्देश्य प्राप्ति के लिए भी शत्रुओं पर विश्वास न करें।</p><p><strong>अर्थाधीन एव नियतसम्बन्धः।</strong><br>कोई भी सम्बन्ध उद्देश्य से जुड़ा रहता है।</p><p><strong>शत्रोरपि सुतः सखा रक्षितव्यः।</strong><br>शत्रु का पुत्र यदि मित्र हो, तो उसकी रक्षा करें।</p><p><strong>यावच्छत्रोश्छिद्रं तावद् बद्धहस्तेन वा स्कन्धेन वा बाह्यः।</strong><br>शत्रु की कमजोरी जानने तक उसे बनावटी आडंबरों में रखें।</p><p><strong>शत्रुछिद्रे प्रहरेत्।</strong><br>शत्रु के कमजोरी पर ही चोट पहुंचानी चाहिए।</p><p><strong>आत्मछिद्रं न प्रकाशयेत।</strong><br>अपनी कमजोरी किसी से न बताएं। चाणक्य नीति सूत्र की यह बहुत महत्वपूर्ण बात है।</p><p><strong>छिद्रप्रहारिणः शत्रवः।</strong><br>शत्रु कमजोरी पर ही अक्सर चोट पहुंचाते हैं।</p><p><strong>हस्तगतमपि शत्रुं न विश्वसेद्।</strong><br>हाथ में आए हुए शत्रु पर भी भूलकर विश्वास न करें।</p><p><strong>स्वजनस्य दुर्वृृत्तं निवारयेत।</strong><br>अपने हितैषियों की कमियों (दोषों) को दूर करना चाहिए।</p><p><strong>स्वजनावमानोऽपि मनस्विनां दुःखमावहति।</strong><br>मनस्वियों को अपने लोगों का अपमान दुःख देता है।</p><p><strong>एकांगदोषः पुरुषमवसादयति।</strong><br>एक अंग का दोष भी व्यक्ति को दुःखी करता है।</p><p><strong>शत्रुं जयति सुवृत्तता।</strong><br>अच्छी आदत ही शत्रुओं को जीतती है।</p><p><strong>निकृतिप्रिया नीचाः।</strong><br>नीच व्यक्ति सज्जनों के लिए दुखदायी होता है।</p><p><strong>नीचस्य मतिर्न दातव्या।</strong><br>दुष्ट व्यक्ति को उपदेश नहीं देना चाहिए।</p><p><strong>तेषु विश्वासो न कर्तव्यः।</strong><br>दुष्ट व्यक्ति पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>सुपूजितोऽपि दुर्जनः पीडयत्येव।</strong><br>सम्मान पाया हुआ दुर्जन दुःख ही देता है।</p><p><strong>चन्दनानपि दावोऽग्निर्दहत्येव।</strong><br>चन्दन आदि को भी दावानल (जंगल में लगने वाली आग) जलाता ही है।</p><p><strong>कदाऽपि पुरुषं नावमन्येत्।</strong><br>कभी भी पुरुष का अपमान न करें।</p><p><strong>क्षन्तव्यमिति पुरुषं न बाधेत्।</strong><br>क्षमा करने योग्य पुरुष को दुःखी न करें।</p><p><strong>भर्त्राधिकं रहस्ययुक्तं वक्तुमिच्छन्त्यबुद्धयः।</strong><br>मालिक द्वारा कहे गए गोपनीय बातों को भी मूर्ख व्यक्ति कह देना चाहते हैं।</p><p><strong>अनुरागस्तु फलेन सूच्यते।</strong><br>सच्चा प्रेम कहने से नहीं अपितु कार्य रूप में दिखने लगता है।</p><p><strong>आज्ञाफलमैश्वर्यम्।</strong><br>ऐश्वर्य का परिणाम आज्ञा है।</p><p><strong>दातव्यमपि बलिशः क्लेशेन दास्यति।</strong><br>देने योग्य व्यक्तियों (दानियों) को भी मूर्ख व्यक्ति कष्ट (पीड़ा) देता है।</p><p><strong>महदैश्वर्यं प्राप्याप्यधृतिमान् विनश्यति।</strong><br>धैर्यहीन व्यक्ति अधिक सुख-सुविधा पाकर नष्ट हो जाता है।</p><p><strong>नास्त्यघृतेरैहिकाममुष्मिकम्।</strong><br>धैर्यहीन व्यक्ति का वर्तमान और भविष्य नहीं होता।</p><p><strong>न दुर्जनैः सह संसर्गः कर्तव्यः।</strong><br>दुष्टों की संतति से सदा दूर ही रहना चाहिए।</p><p><strong>शौण्डहस्तगतं पयोऽप्यवमन्यते।</strong><br>शराबी के हाथ का दूध भी त्याग देना चाहिए।</p><p><strong>कार्यसंकटेष्वर्थव्यवसायिनी बुद्धिः।</strong><br>कठिन समय में बुद्धि ही राह दिखाती है।</p><p><strong>मितभोजनं स्वास्थ्यम्।</strong><br>थोड़ा भोजन करना ही स्वास्थ्य लाभ है।</p><p><strong>पथ्यमपथ्यं वाऽजीर्णे नाश्नीयात्।</strong><br>नहीं पचने वाली वस्तु से <a
href="/kabj-ka-permanent-ilaj-hindi/">कब्ज</a> हो जाए तो पचने वाली वस्तु भी नहीं खानी चाहिए।</p><p><strong>जीर्णभोजिनं व्याधिर्नोपि सर्पितः।</strong><br>पच जाने पर भोजन करने वाले को बीमारी नहीं होती।</p><p><strong>जीर्णशरीरे वर्धमानं व्याधिं नोपेक्ष्येत्।</strong><br>बुढ़ापे में बढ़ रहे छोटे रोग को भी अनदेखा न करें।</p><p><strong>अजीर्णे भोजनं दुःखम्।</strong><br>बदहजमी होने पर भोजन कष्ट पहुंचाता है।</p><p><strong>शत्रोरपि विशिष्यते व्याधिः।</strong><br>शत्रु से भी रोग बड़ा है।</p><p><strong>दानं निधानमनुगामि।</strong><br>दान अपनी हैसियत के अनुसार देना चाहिए।</p><p><strong>पदुतरे तृष्णापरे सुलभमतिसन्धानम्।</strong><br>चालाक और लोभी व्यक्ति बेकार ही स्वार्थवश घनिष्ठता बढ़ाता है।</p><p><strong>तृष्णया मतिश्छाद्यते।</strong><br>लोभ बुद्धि को ढंक लेता है।</p><p><strong>कार्यबहुत्वे बहफलमायतिकं कुर्यात्।</strong><br>बहुत-से कार्यों में अधिक फल देने वाला कार्य पहले करें।</p><p><strong>स्वयमेवावस्कन्नं कार्यं निरीक्षेत्।</strong><br>स्वयं बिगाड़े या अन्यों के बिगाड़े कार्यों का स्वयं निरीक्षण करें।</p><p><strong>मूर्खेषु साहसं नियतम्।</strong><br>मूर्खों में साहस होता ही है।</p><p><strong>मूर्खेषु विवादो न कर्तव्यः।</strong><br>मूर्खों से विवाद नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>मूर्खेषु मूर्खवत् कथ्येत्।</strong><br>मूर्ख से मूर्ख की ही भाषा में बोलें।</p><p><strong>आयसैरावसं छेद्यम्।</strong><br>लोहे से लोहा काटना चाहिए।</p><p><strong>नास्त्यधीमतः सखा।</strong><br>मूर्ख का मित्र नहीं होता।</p><p><strong>धर्मेण धार्यते लोकः।</strong><br>धर्म ही मानव को धारण करता है।</p><p><strong>प्रेतमपि धर्माधर्मावनुगच्छतः।</strong><br>धर्म और अधर्म प्रेत योनि में भी साथ नहीं छोड़ते।</p><p><strong>दया धर्मस्य जन्मभूमिः।</strong><br>दया धर्म की जन्मभूमि है।</p><p><strong>धर्ममूले सत्यदाने।</strong><br>धर्म ही सत्य और दान का मूल है।</p><p><strong>धर्मेण जयति लोकान्।</strong><br>व्यक्ति धर्म से ही लोकों को जीतता है।</p><p><strong>मृत्युरपि धर्मिष्ठं रक्षति।</strong><br>धार्मिक व्यक्ति मृत्यु के बाद भी अमर रहता है।</p><p><strong>तद्विपरीतं पापं यत्र प्रसज्यते तत्र धर्मावमतिर्महती प्रसज्यते।</strong><br>जहां पाप फैल जाता है, वहां धर्म का घोर अपमान होने लगता है।</p><p><strong>उपस्थितविनाशानां प्रकृत्याकारेण लक्ष्यते।</strong><br>उपस्थित विनाश प्रकृति के व्यवहार से सूचित होते हैं।</p><p><strong>आत्मविनाशं सूचयत्यधर्मबुद्धिः।</strong><br>अधर्म बुद्धि खुद का विनाश कर देती है।</p><p><strong>पिशुनवादिनो न रहस्यम्।</strong><br>चुगलखोर को गोपनीय बातें कभी न बताएं।</p><p><strong>पर रहस्यं नैव श्रोतव्यम्।</strong><br>दूसरों की गोपनीय बातें न सुनें।</p><p><strong>वल्लभस्य कारकत्वधर्म युक्तम्।</strong><br>मालिक अपने सेवकों को मुंह न लगाए, ऐसा करने से वे उद्दंड हो जाते हैं और प्रजा को दुःखी करते हैं।</p><p><strong>स्वजनेष्वतिक्रमो न कर्तव्यः।</strong><br>अपने परिजनों का अपमान नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>माताऽपि दुष्टा त्याज्या।</strong><br>माता भी दुष्ट हो, तो त्याग कर देने योग्य है।</p><p><strong>स्वहस्तोऽपि विषदग्धश्छेद्यः।</strong><br>विषैले हाथ को काट देना चाहिए।</p><p><strong>परोऽपि च हितो बन्धुः।</strong><br>अनजान व्यक्ति यदि शुभ चिन्तक हो तो उसे अपना भाई समझना चाहिए।</p><p><strong>कक्षादत्यौबधं गृह्यते।</strong><br>सूखे जंगल से भी औषधि लाई जा सकती है।</p><p><strong>नास्ते चौरेषु विश्वासः।</strong><br>चोरों पर कभी विश्वास न करें।</p><p><strong>अप्रतीकारेष्वनादरो न कर्तव्यः।</strong><br>शत्रु को दुःखी देखकर कभी उपहास न करें।</p><p><strong>व्यसनं मनागपि बाधते।</strong><br>छोटी बुराई भी दुख देने वाली होती है।</p><p><strong>अमरवदर्थजातमर्जयेत्।</strong><br>अपने को अमर मानकर धन-संचय करना चाहिए।</p><p><strong>अर्थवानम् सर्वलोकस्य बहुमतः।</strong><br>धनी को सारा लोक इज्जत करता है।</p><p><strong>महेन्द्रयष्यर्थहीनं न बहु मन्यते लोकः।</strong><br>महान राजा यदि धनहीन हो तब भी लोक-सम्मान नहीं प्राप्त कर पाता।</p><p><strong>दारिद्र्यं खलु पुरुषस्य जीवितं मरणम्।</strong><br>गरीबी तो जीते-जी मरने के समान है।</p><p><strong>विरूपोऽर्थवान् सुरूपः।</strong><br>कुरूप व्यक्ति के पास यदि धन हो तो वह सुंदर रूप वाला हो जाता है।</p><p><strong>अदातारमप्यर्थवन्तर्थिनो न त्यजन्ति।</strong><br>मांगने वाले तो कंजूस धनवान को भी नहीं छोड़ते।</p><p><strong>अकुलीनोऽपि धनी कुली कुलीनाद्विशिष्टः।</strong><br>जिसका कुल कलंकित हो और भरपूर धन-संपदा हो वह कुलीन से भी श्रेष्ठ है।</p><p><strong>नास्त्यवमानभयमनार्यस्य।</strong><br>नीच को अपमान का भय नहीं होता।</p><p><strong>न चेतनवतां वृत्तिर्भयम्।</strong><br>कुशल लोगों को रोजी-रोटी का भय नहीं रहता।</p><p><strong>न जितेन्द्रियाणां विषयभयम्।</strong><br>जिनकी इंन्द्रियां वश में होती हैं, उनको विषय-वासना का भय नहीं रहता।</p><p><strong>न कृतार्थानां मरणभयम्।</strong><br>भला करने वालों को मृत्यु का भय नहीं रहता।</p><p><strong>कस्यचिदर्थं स्वमिव मन्यते साधुः।</strong><br>किसी के भी धन को सज्जन अपनी वस्तु जैसा ख्याल रखता है।</p><p><strong>परविभवेष्वादरो न कर्तव्यः।</strong><br>दूसरों की सुख-सुविधाओं का लोभ नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>परविभवेष्वादरोऽपि नाशमूलम्।</strong><br>दूसरों के धन का लोभ नाश का कारण है।</p><p><strong>अल्पमपि पर द्रव्यं न हर्तव्यम्।</strong><br>दूसरों की छोटी-से-छोटी वस्तु भी कभी चुरानी नहीं चाहिए।</p><p><strong>परद्रव्यापहरणमात्मद्रव्यनाशहेतुः।</strong><br>दूसरों के धन की चोरी करना अपने धन का नाश करना है।</p><p><strong>न चौर्यात्परं मृत्युपाशः।</strong><br>चोरी करने से तो मर जाना अच्छा है।</p><p><strong>यवागूरपि प्राणधारणं करोति लोके।</strong><br>सत्तू से भी लोक में प्राण की रक्षा होती है।</p><p><strong>न मृतस्यौषधं प्रयोजनम्।</strong><br>मरे हुए व्यक्ति को औषधि से क्या लेना।</p><p><strong>समकाले स्वयमपि प्रभुत्वस्य प्रयोजनं भवित।</strong><br>प्रत्येक समय जागरूक रहना ही उद्देश्य प्राप्ति का कारण बन जाता है।</p><p><strong>नीचस्य विद्याः पापकर्मणि योजयन्ति।</strong><br>दुराचारी की विद्याएं पाप कर्मों को बढ़ाने वाली होती हैं।</p><p><strong>पयःपानमपि विषवर्धन भुजंगस्य नामृतं स्यात्।</strong><br>सांप को दूध पिलाना भी उसका विष बढ़ाना है, न कि अमृत।</p><p><strong>न हि धान्यसमो ह्यर्थः।</strong><br>अन्न के समान दूसरा कोई धन नहीं है।</p><p><strong>न क्षुधासमः शत्रुः।</strong><br>भूख के समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है।</p><p><strong>अकृतेर्नियताक्षुत्।</strong><br>आलसियों का भूखों मरना भाग्य में है।</p><p><strong>नास्त्यभक्ष्यं क्षुधितस्य।</strong><br>भूखे के लिए कुछ भी अभक्ष्य नहीं है।</p><p><strong>इन्द्रियाणि जरावशं कुर्वन्ति।</strong><br>इन्द्रियां बुढ़ापे के अधीन में कर देती हैं।</p><p><strong>सानुक्रोशं भर्तारमाजीवेत्।</strong><br>जो सेवकों के दुख-दर्द को समझता हो वही सेवा योग्य है।</p><p><strong>लुब्धसेवी पावकेच्छया खद्योतं धमति।</strong><br>कठोर व्यवहार वाले मालिक के सेवक आग के लिए जुगनू को फूंकते हैं।</p><p><strong>विशेषज्ञ स्वामिनमाश्रयेत्।</strong><br>योग्य स्वामी का ही सहारा लेना चाहिए।</p><p><strong>पुरुषस्य मैथुनं जारा।</strong><br>अधिक मैथुन करने से पुरुष शीघ्र ही वृद्ध हो जाता है।</p><p><strong>स्त्रीणां अमैथुनं जरा।</strong><br>स्त्रियां मैथुन न करने से शीघ्र वृद्ध हो जाती हैं।</p><p><strong>न नीचोत्तमयोर्विवाहः।</strong><br>दुष्ट और अच्छे का विवाह नहीं होना चाहिए।</p><p><strong>अगम्यागमनादायुर्यशश्च पुण्यानि क्षीयन्ते।</strong><br>न भोगी जाने वाली स्त्री या बालिका के साथ सहवास करने से आयु, यश व पुण्य क्षीण हो जाते हैं।</p><p><strong>नास्त्यहंकार समः शत्रुः।</strong><br>अहंकार से बड़ा दूसरा कोई शत्रु नहीं।</p><p><strong>संसदि शत्रु न परिक्रोशेत्।</strong><br>सभा में शत्रु पर क्रोध नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>शत्रुव्यसनं श्रवणसुखम्।</strong><br>शत्रुव्यसन सुनने से सुख मिलता है।</p><p><strong>अधनस्य बुद्धिर्न विद्यते।</strong><br>निर्धन को बुद्धि नहीं होती।</p><p><strong>हितमप्यधनस्य वाक्य न शृणोति।</strong><br>निर्धन का हितकारक वाक्य भी नहीं सुना जाता।</p><p><strong>अधनः स्वभार्ययाप्यवमन्यते।</strong><br>निर्धन अपनी भार्या से भी अपमानित होता है।</p><p><strong>पुष्पहीनं सहकारमपि नोपासते भ्रमराः।</strong><br>पुष्पहीन छोटे आम को भी भंवरे त्याग देते हैं।</p><p><strong>विद्या धनमधनानाम्।</strong><br>विद्या गरीबों का धन है।</p><p><strong>विद्या चौरैरपि न ग्राह्या।</strong><br>विद्या को चोर भी नहीं चुरा सकते।</p><p><strong>विद्या ख्यापिता ख्यातिः।</strong><br>विद्या ख्याति को फैलाती है।</p><p><strong>यशः शरीरं न विनश्यति।</strong><br>यश रूपी शरीर का कभी नाश नहीं होता।</p><p><strong>यः परार्थमुपसर्पति स सत्पुरुषः।</strong><br>जो परोपकार आगे बढ़ाता है, वही सत्पुरुष है।</p><p><strong>इन्द्रियाणां प्रशम शास्त्रम्।</strong><br>इन्द्रियों को शांत रखना ही बुद्धिमानी है।</p><p><strong>अशास्त्रकार्यवृत्तौ शास्त्राकुशं निवारयति।</strong><br>बुराइयों को हावी होने पर शास्त्र का अंकुश उसे रोकता है।</p><p><strong>नीचस्य विद्या नोपेतव्या।</strong><br>दुष्ट की विद्या नहीं लेनी चाहिए।</p><p><strong>म्लेच्छभाषण न शिक्षेत्।</strong><br>म्लेच्छों की भाषा न सीखें।</p><p><strong>म्लेच्छानामपि सुवृत्तं ग्राह्यम्।</strong><br>म्लेच्छों की भी अच्छी बातें ग्रहण योग्य होती हैं।</p><p><strong>गुणे न मत्सरः कार्यः।</strong><br>गुण सीखने में आलस नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>शत्रोरपि सुगुणो ग्राह्यः।</strong><br>शत्रु के भी सद्गुण ले लेने चाहिए।</p><p><strong>विषादप्यमृतं ग्राह्यम्।</strong><br>विष से भी अमृत ले लेना चाहिए।</p><p><strong>अवस्थया पुरुषः सम्मान्यते।</strong><br>योग्यता से ही पुरुष सम्मान पाता है।</p><p><strong>स्थान एव नरा पूज्यन्ते।</strong><br>अपने गुणों से ही पुरुष पूजित होते हैं।</p><p><strong>आर्यवृत्तमनुतिष्ठेत।</strong><br>श्रेष्ठ स्वभाव को बनाए रखें।</p><p><strong>कदापि मर्यादां नातिमेत्।</strong><br>मर्यादा का कदापि उल्लंघन न करें।</p><p>नास्त्यर्ध पुरुष रत्नस्य।<br>पुरुष रूपी रत्न का कोई मूल्य नहीं आंका जा सकता।</p><p><strong>न स्त्रीरत्नसमं रत्नम्।</strong><br>स्त्री रत्न के समान अन्य रत्न नहीं है।</p><p><strong>सुदुर्लभं रत्नम्।</strong><br>रत्न प्राप्त करना बहुत कठिन होता है।</p><p><strong>अयशो भयं भयेषु।</strong><br>बदनामी सभी भयों से बड़ा भय है।</p><p><strong>नास्त्यलसस्य शास्त्रगमः।</strong><br>आलसी शास्त्र का अध्ययन कभी नहीं कर सकता।</p><p><strong>न स्त्रैणस्य स्वर्गाप्तिर्धर्मकृत्यं च।<br></strong>स्त्रैण (वह पुरुष जो स्त्रियों के जैसा व्यवहार करता है) से सुख चाहने वाले से स्वर्ग प्राप्ति और धर्म-कर्म की अपेक्षा रखना बेकार है।</p><p><strong>स्त्रियोऽपि स्त्रैणमवमन्यते।</strong><br>स्त्री भी ऐसे स्त्रैण पुरुष का अपमान करती है।</p><p><strong>न पुष्पार्थी सिञ्चति शुष्कतरुम्।</strong><br>फूलों को चाहने वाला मनुष्य सूखे वृक्ष को नहीं सींचता।</p><p><strong>अद्रव्यप्रयत्नो बालुकाक्वथानादनन्यः।</strong><br>बिना धन का कार्य मतलब बालू से तेल निकालना है।</p><p><strong>न महाजनहासः कर्तव्यः।</strong><br>महान लोगों का अनादर नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>कार्यसम्पदं निमित्तानि सूचयन्ति।</strong><br>किसी कार्य के लक्षण ही उसकी सिद्धि-असिद्धि की सूचना देते हैं।</p><p><strong>नक्षत्रादपि निमित्तानि विशेषयन्ति।</strong><br>नक्षत्रों से भी भावी सिद्धि या असिद्धि की सूचना मिलती है।</p><p><strong>न त्वरितस्य नक्षत्रपरीक्षा।</strong><br>अपने कार्य की सिद्धि चाहने वाला नक्षत्र से भाग्य की परीक्षा नहीं करता।</p><p><strong>परिचये दोषा न छाद्यन्ते।</strong><br>परिचय में दोष छिपे नहीं रहते।</p><p><strong>स्वयमशुद्धः परानाशङ्कते।</strong><br>स्वयं अशुद्ध व्यक्ति दूसरों की शुद्धता पर संदेह करता है।</p><p><strong>स्वभावो दुरतिक्रमः।</strong><br>स्वभाव को बदला नहीं जा सकता।</p><p><strong>अपराधानुरूपो दण्डः।</strong><br>अपराध के अनुरूप ही दंड देना चाहिए।</p><p><strong>कथानुरूपं प्रतिवचनम्।</strong><br>जैसा पूछा जाए, उसी के अनुरूप ही उत्तर होना चाहिए।</p><p><strong>विभवानुरूपमाभरणम्।</strong><br>वैभव के अनुरूप ही आभूषण होने चाहिए।</p><p><strong>कुलानुरूपं वृत्तम्।</strong><br>कुल के अनुरूप ही चरित्र होना चाहिए।</p><p><strong>कार्यानुरूपः प्रयत्नः।</strong><br>कार्य के अनुरूप ही प्रयास करना चाहिए।</p><p><strong>पात्रानुरूपं दानम्।</strong><br>व्यक्तित्व के अनुरूप ही दान देना चाहिए।</p><p><strong>वयोऽनुरूपः वेषः।</strong><br>उम्र के अनुरूप ही वेश होना चाहिए।</p><p><strong>स्वाम्यनुकूलो भृत्यः।</strong><br>सेवक को स्वामी के अनुकूल ही चलना चाहिए।</p><p><strong>गुरुवशानुवर्ती शिष्यः।</strong><br>शिष्य को गुरु के अनुकूल आचरण होना चाहिए।</p><p><strong>भर्तृशानुवर्तिनी भार्या।</strong><br>पत्नी को पति के अनुकूल आचरण (व्यवहार) होना चाहिए।</p><p><strong>पितृवशानुवर्ती पुत्रः।</strong><br>पुत्र को पिता के अनुकूल आचरण होना चाहिए।</p><p><strong>अत्युपचारः शंकितव्यः।</strong><br>अधिक औपचारिकता में शंका करनी चाहिए।</p><p><strong>स्वामिनमेवानुवर्तेत।</strong><br>सेवक सदा स्वामी की आज्ञाओं का पालन करे।</p><p><strong>मातृताडितो वत्सो मातरमेवानुरोदिति।</strong><br>माँ द्वारा पीटा गया बच्चा माँ के आगे रोता है।</p><p><strong>स्नेहवत स्वल्पो हि रोषः।</strong><br>गुरुजनों का गुस्सा भी स्नेहवत होता है।</p><p><strong>आत्मछिद्रं न पश्यति परिछिद्रमेव पश्यति बालिशः।</strong><br>मूर्ख व्यक्ति दूसरों के ही दोष देखता है, कभी अपने नहीं।</p><p><strong>सोपचारः कैतवः।</strong><br>धूर्त दूसरों के कपटी सेवक बनते हैं।</p><p><strong>काम्यैर्विशेषैरूपचरणमुपचारः।</strong><br>स्वामी को विशेष चाहने वाली वस्तु की भेंट देना ही धूर्तों की सेवा है।</p><p><strong>चिरपरिचितानामत्युपचारः शंकितव्यः।</strong><br>पुराने परिचितों द्वारा अधिक सम्मान देना शंका योग्य होता है।</p><p><strong>गौर्दुष्करा श्वसहस्रादेकाकिनी श्रेयसी।</strong><br>बिगड़ैल गाय भी हजार कुत्तों से श्रेष्ठ है।</p><p><strong>श्वो मयूरादद्य कपोतो वरः।</strong><br>कल के मोर से आज का कबूतर भला।</p><p><strong>अतिसंगो दोषमुत्पादयति।</strong><br>अधिक लगाव दोष उत्पन्न करता है।</p><p><strong>सर्व जयत्यक्रोधः।</strong><br>बिना क्रोध करने वाला सबको जीत लेता है।</p><p><strong>यद्यपकारिणि कोपः कोपे कोप एवं कर्तव्यः।</strong><br>दुष्ट व्यक्ति के क्रोध करने पर ही अपना क्रोध प्रकट करें।</p><p><strong>मतिमत्सु मूर्खमित्रगुरुवल्लभेषु विवादो न कर्तव्यः।</strong><br>बुद्धिमान, मूर्ख, मित्र, गुरु तथा स्वामी से विवाद न करें।</p><p><strong>नस्त्यपिशाचमैश्वर्यम्।</strong><br>ऐश्वर्य बिना बुराइयों का नहीं होता।</p><p><strong>नास्ति धनवतां शुभकर्मसु श्रमः।</strong><br>धनवानों का परिश्रम शुभ कार्यों में नहीं होता। होता है तो समझो कोई न कोई स्वार्थ है।</p><p><strong>नास्ति गतिश्रमो यानवताम्।</strong><br>वाहनों पर निर्भर रहने वाले पैदल चलने का कष्ट नहीं करते।</p><p><strong>अलौहमयं निगडं कलत्रम्।</strong><br>पत्नी बिना लोहे की बेड़ी है।</p><p><strong>यो चरित्रकुशलः सतस्मिन् योक्तव्यः।</strong><br>जो व्यक्ति जिस कार्य में निपुण है, उसे उसी कार्य में लगाना चाहिए।</p><p><strong>दुष्टकलत्रं मनस्विनां शरीरकर्शनम्।</strong><br>विद्वानों की नजर में दुष्ट पत्नी दुःख का कारण है।</p><p><strong>अप्रमत्तो दारान्निरीक्षेत्।</strong><br>सावधानी से पत्नी का निरीक्षण करें।</p><p><strong>स्त्रीषु किञ्चिदपि न विश्वसेत्।</strong><br>स्त्रियों पर बिलकुल भी विश्वास नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>न समाधि स्त्रीषु लोकज्ञता च।</strong><br>स्त्रियों में विवेक एवं लोक-व्यवहार का ज्ञान नहीं होता।</p><p><strong>गुरुणां माता गरीयसी।</strong><br>गुरुओं में माता श्रेष्ठ है।</p><p><strong>सर्वावस्थासु माता भर्तव्या।</strong><br>सभी परिस्थितियों में माता का भरण-पोषण करें।</p><p><strong>वैदुष्यमलंकारेणाच्छाद्यते।</strong><br>अधिक योग्यता अलंकारों से ढक जाती है।</p><p><strong>स्त्रीणां भूषणं लज्जा।</strong><br>स्त्रियों का आभूषण ही लज्जा है।</p><p><strong>विप्राणां भूषणं वेदः।</strong><br>वेद ही विप्रों के आभूषण हैं।</p><p><strong>सर्वेषां भूषणं धर्मः।</strong><br>धर्म सभी का अलंकार है।</p><p><strong>अनुपद्रवं देशभावसेत।</strong><br>जहां आतंकवादी न हों, उसी देश में रहना चाहिए।</p><p><strong>साधु जल बहुलो देशः।</strong><br>जहां सज्जनों की अधिकता हो वही अच्छा देश है।</p><p><strong>राज्ञो भेतव्यं सार्वकालम्।</strong><br>राजा से सदा डरना चाहिए।</p><p><strong>न राज्ञः परं दैवतम्।</strong><br>राजा से बढ़कर परम देवता नहीं है।</p><p><strong>सुदूरमपि दहति राजवह्नि।</strong><br>राजा के क्रोध की आग बड़ी तेज होती है और दूर तक की बुराइयों को जला देती है।</p><p><strong>रिक्तहस्तो न राजानमभिगच्छेत्।</strong><br>राजा के पास खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।</p><p><strong>गुरुं च दैवं च।</strong><br>मन्दिर तथा गुरु के पास कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।</p><p><strong>कुटुम्बिनो भेतव्यम्।</strong><br>राज परिवार से कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।</p><p><strong>गन्तव्यं च सदा राजकुलम्।</strong><br>राजकुल में बराबर जाते रहना चाहिए।</p><p><strong>राजपुरुषैः सम्बन्धं कुर्यात्।</strong><br>राज पुरुषों से अच्छे सम्बन्ध रखना चाहिए।</p><p><strong>राजदासी न सेवितव्या।</strong><br>राजमहलों में रहने वाली से मेल-जोल कभी न बढ़ाएं।</p><p><strong>न चक्षुषाऽपि राजातं निरीक्षेत्।</strong><br>राजा से आँख से आँख मिलाकर कभी बात नहीं करनी चाहिए।</p><p><strong>पुत्रे गुणवति कुटुम्बिनः स्वर्गः।</strong><br>पुत्र के गुणी होने पर परिवार वालों को हमेशा सुख ही सुख है।</p><p><strong>पुत्राः विद्यानां पारं गमयितव्या।</strong><br>पुत्र को सभी विद्याओं में पारंगत बनाना चाहिए।</p><p><strong>जनपदार्थं ग्रामं त्यजेत्।</strong><br>जनपद के लिए गांव का त्याग कर देना चाहिए।</p><p><strong>ग्रामार्थं कुटुम्बं त्यजेत्।</strong><br>गांव के लिए परिवार का त्याग कर देना चाहिए।</p><p><strong>अतिलाभः पुत्रलाभः।</strong><br>पुत्र रत्न की प्राप्ति सभी सुखों से बढ़कर है।</p><p><strong>दुर्गतेः पितरौ रक्षित स पुत्रः।</strong><br>माता-पिता की परेशानियां दूर करने वाला ही पुत्र है।</p><p><strong>कुलं प्रख्यापयति पुत्रः।</strong><br>उत्तम पुत्र कुल गौरव होता है।</p><p><strong>नानपत्यस्य स्वर्गः।</strong><br>पुत्रहीन व्यक्ति को स्वर्ग नहीं मिलता है।</p><p><strong>या प्रसूते सा भार्या।</strong><br>सुन्दर सन्तान को जन्म देने वाली ही पत्नी है।</p><p><strong>तीर्थसमवाये पुत्रवतीमनुगच्छेत्।</strong><br>कई रानियों के एक साथ रजस्वला होने के बाद राजा प्रथम पुत्रवती रानी के पास जाए।</p><p><strong>सतीर्थगमनाद् ब्रह्मचर्यं नश्यति।</strong><br>मासिक धर्म काल में सहवास करने पर ब्रह्मचर्य का नाश होता है।</p><p><strong>न परक्षेत्रे बीजं विनिक्षिपेत।</strong><br>दूसरे स्त्री के साथ कभी सहवास न करें।</p><p><strong>पुत्रार्था हि स्त्रियः।</strong><br>स्त्रियां पुत्र रत्न देने वाली होती हैं।</p><p><strong>स्वदासी परिग्रहो हि दासभावः।</strong><br>अपनी दासी से सहवास करना उसी का दास बनने के बराबर है।</p><p><strong>उपस्थितविनाशः पथ्यवाक्यं न शृणोति।</strong><br>जिसका विनाश होने वाला हो उसे अच्छी बात नहीं सूझती।</p><p><strong>नास्ति देहिनां सुखदुःखभावः।</strong><br>प्राणियों को सुख-दुःख तो लगा रहता है।</p><p><strong>मातरमिव वत्साः सुखदुःखानि कर्तारमेवानुगच्छन्ति।</strong><br>माँ के पीछे चलते बच्चे के समान सुख-दुःख मनुष्य के पीछे चलते हैं।</p><p><strong>तिलमात्रप्युकारं शैलषन्मन्यते साधुः।</strong><br>सज्जन तिलवत उपकार को भी पर्वत के समान मानता है।</p><p><strong>उपकारोऽनार्येष्वकर्तव्यः।</strong><br>दुष्ट का कभी भला नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>प्रत्युपकारभयादनार्यः शत्रुर्भवति।</strong><br>दुष्ट के साथ उपकार करने पर वह उपकार न मानकर शत्रु बन जाता है।</p><p><strong>स्वल्पमप्युपकारकृते प्रत्युपकार कर्तुमार्यो स्वपिति।</strong><br>छोटे उपकार के बदले उपकार करने के लिए सज्जन हमेशा जागरूक रहता है।</p><p><strong>न कदाऽपि देवताऽवमन्तव्या।</strong><br>देवताओं का कभी अपमान नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>न चक्षुषः समं ज्योतिरस्ति।</strong><br>आँख के समान ज्योति नहीं है।</p><p><strong>चक्षुर्हि शरीरिणां नेता।</strong><br>आँख ही प्राणियों के मार्गदर्शक हैं।</p><p><strong>अपचक्षुः किं शरीरेण।</strong><br>बिना आँख वाले शरीर से क्या करना।</p><p><strong>नाप्सु मूत्रं कुर्यात्।</strong><br>जल में पेशाब न करें।</p><p><strong>न नग्नो जलं प्रविशेत्।</strong><br>नग्न होकर जल में प्रवेश नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>यथा शरीरं तथा ज्ञानम्।</strong><br>जैसा शरीर होता है, वैसा ही ज्ञान होता है।</p><p><strong>यथा बुद्धिस्तथा विभवः।</strong><br>जैसी बुद्धि होती है, वैसा ही वैभव भी होता है।</p><p><strong>अग्न्वाग्निं न निक्षिपेत।</strong><br>आग में आग न डालें।</p><p><strong>तपस्विनः पूजनीया।</strong><br>तपस्वी पूजनीय होते हैं।</p><p><strong>परदारान् न गच्छेत।</strong><br>पराई स्त्री के साथ संभोग नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>अन्नदानं भ्रूणहत्यामपि मार्ष्टि।</strong><br>अन्नदान करना भ्रूणहत्या जैसे पापों से मुक्त करा देता है।</p><p><strong>न वेदबाह्यो धर्मः।</strong><br>धर्म वेद से अलग नहीं है।</p><p><strong>कदाचिदपि धर्मं निषेवेत।</strong><br>कभी-न-कभी तो धर्म का पालन करना ही चाहिए।</p><p><strong>स्वर्गं नयति सुनृतम्।</strong><br>सत्य आचरण से स्वर्ग मिलता है।</p><p><strong>नास्ति सत्यात्परं तपः।</strong><br>सत्य से बढ़कर तप नहीं है।</p><p><strong>सत्यं स्वर्गस्य साधनम्।</strong><br>सत्य ही स्वर्ग का साधन है।</p><p><strong>सत्येन धार्यते लोकः।</strong><br>सत्य द्वारा ही समाज में रहा जा सकता है।</p><p><strong>सत्याद् देवो वर्षति।</strong><br>सत्य से ही देवता प्रसन्न होते हैं।</p><p><strong>नानृतात्पातकं परम्।</strong><br>झूठ से बढ़कर पाप नहीं है।</p><p><strong>न मीमांसयः गुरवः।</strong><br>गुरुजनों की आलोचना नहीं करनी चाहिए।</p><p><strong>खलत्वं नोपेयात्।</strong><br>बुरे विचार कभी न अपनाएं।</p><p><strong>नास्ति खलस्य मित्रम्।</strong><br>दुष्ट का कोई मित्र नहीं होता।</p><p><strong>लोकयात्रा दरिद्रं बाधते।</strong><br>सामाजिक व्यवहार में कमी दरिद्र मनुष्य को दुःखी करती है।</p><p><strong>अतिशूरो दानशूरः।</strong><br>दानवीर ही सच्चा वीर है।</p><p><strong>गुरुदेवब्राह्मणेषु भक्तिर्भूषणम्।</strong><br>गुरु, देवता तथा ब्राह्मणों के प्रति भक्ति ही भूषण है।</p><p><strong>सर्वस्य भूषणं विनयः।</strong><br>विनय सबका भूषण है।</p><p><strong>अकुलीनोऽपि विनीतः कुलीनाद्विशिष्टः।</strong><br>विनीत अकुलीन भी कुलीन से श्रेष्ठ है।</p><p><strong>आचारादायुर्वर्धते कीर्तिश्च।</strong><br>अच्छे आचरण से आयु और कीर्ति बढ़ती है।</p><p><strong>प्रियमप्यहितं न वक्तव्यम्।</strong><br>प्रिय होते हुए भी हितकारी न हो उसे नहीं बोलना चाहिए।</p><p><strong>बहुजनविरुद्धमेकं नानुवर्तेत्।</strong><br>बहुत लोगों को छोड़कर एक के पीछे न जाएं।</p><p><strong>न दुर्जनेषु भाग्धेयः कर्तव्यः।</strong><br>दुर्जनों के साथ कभी साझेदारी नहीं करनी चाहिए।</p><p><strong>न कृतार्थेषु नीचेषु सम्बन्धः।</strong><br>भाग्यशाली होने पर भी नीचों से सम्बन्ध न रखें।</p><p><strong>ऋणशत्रु व्याधिर्निविशेषः कर्तव्यः।</strong><br>ऋण, शत्रु तथा व्याधि को जड़ से नष्ट कर देना चाहिए।</p><p><strong>भूत्यादुर्तनं पुरुषस्य रसायनम्।</strong><br>सम्पन्न जीवन बिताना ही व्यक्ति के लिए लाभदायक है।</p><p><strong>नार्थिष्वज्ञा कार्या।</strong><br>मांगने वालों का कभी अपमान नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>दुष्करं कर्म कारयित्वा कर्तारवमवमन्यते नीचः।</strong><br>कठिन कार्य कराके भी नीच व्यक्ति काम करने वाले को अपमानित करता है।</p><p><strong>नाकृतज्ञस्य नरकान्निवर्तनम्।</strong><br>पापी पुरुष के लिए नरक के सिवाय कोई जगह नहीं।</p><p><strong>जिह्वाऽऽयत्ततौ वृद्धिविनाशौ।</strong><br>वृद्धि और विनाश जिह्वा के अधीन है।</p><p><strong>विषामृतयोराकरो जिह्वा।</strong><br>जीभ विष और अमृत की खान है।</p><p><strong>प्रियवादिनो न शत्रुः।</strong><br>प्रिय बोलने वाले का कोई शत्रु नहीं होता।</p><p><strong>स्तुता अपि देवतास्तुस्यन्ति।</strong><br>स्तुति किए जाने पर देवता भी संतुष्ट होते हैं।</p><p><strong>अनृतमपि दुर्वचनं चिरं तिष्ठति।</strong><br>निराधार दुर्वचन भी लम्बे समय तक भूलते नहीं हैं।</p><p><strong>राजद्विष्टं न च वक्तव्यम्।</strong><br>राजा पर आरोप भरे शब्द नहीं बोलने चाहिए।</p><p><strong>श्रुतिसुखात् कोकिलालापातुष्यन्ति।</strong><br>सुनने का तो सुख कोयलों की कूह-कूह से मिलता है।</p><p><strong>स्वधर्महेतुः सत्पुरुषः।</strong><br>सत्पुरुष स्वधर्म हेतु होते हैं।</p><p><strong>नास्त्यर्थिनो गौरवम्।</strong><br>धन से अधिक मोह होने पर सम्मान नहीं मिलता।</p><p><strong>स्त्रीणां भूषणं सौभाग्यम्।</strong><br>सौभाग्य स्त्रियों का भूषण है।</p><p><strong>शत्रोरपि न पातनीया वृत्तिः।</strong><br>शत्रु की भी जीविका नष्ट नहीं करनी चाहिए।</p><p><strong>अप्रयत्नोदकं क्षेत्रम्।</strong><br>बिना प्रयास के जलीय स्रोत मिल जाए उसे ही अपना क्षेत्र समझें। अर्थात् जहां सर्व सुलभ वस्तुएं उपलब्ध हो जाएं।</p><p><strong>एरण्डमवलम्व्य कुञ्जरं न कोपयेत।</strong><br>कमजोर का सहारा लेकर बलशाली से न भिड़ें। एरण्ड का सहारा लेकर हाथी को कुपित न करें।</p><p><strong>अतिप्रवृद्धा शाल्मली वारणस्तम्भो न भवति।</strong><br>अति पुराना शाल वृक्ष हाथी का खम्भा नहीं होता।</p><p><strong>अतिदीर्घोपि कर्णिकारी न मुसली।</strong><br>कनेर का वृक्ष बहुत बड़ा भी हो तो भी मूसल बनाने के काम नहीं आता।</p><p><strong>अति दीप्तोऽपि खद्योतो न पावकः।</strong><br>अत्यधिक चमकने पर भी जुगनू आग नहीं होता।</p><p><strong>न प्रवृद्धत्व गुणहेतुः।</strong><br>निपुणता कोई जरूरी नहीं कि अच्छे गुणों का कारण है।</p><p><strong>सुजीर्णोऽपि पिचमुन्दो न शकुलायते।</strong><br>अति पुराना भी नीम सरोता नहीं बन सकता।</p><p><strong>यथाबीजं तथा निष्पत्तिः।</strong><br>जैसा बीज वैसा ही कार्य।</p><p><strong>यथा शृणुतं तथा बुद्धिः।</strong><br>जैसा सुना जाता है वैसी ही बुद्धि हो जाती है।</p><p><strong>यथा कुलं तथाऽऽचारः।</strong><br>जैसा कुल होता है, वैसा ही चरित्र होता है।</p><p><strong>संस्कृत पिचमन्दो सहकारनवति।</strong><br>पका हुआ नीम आग नहीं बनता।</p><p><strong>न चागतं सुखं त्यजेत्।</strong><br>आए हुए सुख का परित्याग नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>स्वयमेव दुःखमधिगच्छति।</strong><br>मनुष्य स्वयं ही दुःखों को बुलाता है।</p><p><strong>रात्रि चारणं न कुयति।</strong><br>रात के समय व्यर्थ न घूमें।</p><p><strong>न चार्ध रात्रं स्वपेत।</strong><br>आधी रात्रि को न सोएं।</p><p><strong>तद्विद्वदिम परीक्षेत।</strong><br>विद्वानों के समक्ष ब्रह्म की चर्चा करें।</p><p><strong>पर गृहं कारण न प्रविशेत्।</strong><br>दूसरे के घर में अकारण न जाएं।</p><p><strong>ज्ञात्वापि दोषमेव करोति लोकः।</strong><br>लोग जानबूझकर अपराध करते हैं।</p><p><strong>शास्त्रप्रधाना लोकवृत्तिः।</strong><br>लोक-व्यवहार शास्त्र प्रधान है।</p><p><strong>शास्त्राभावे शिष्टाचारमनुगच्छेत्।</strong><br>शास्त्र के अभाव में शिष्टाचार का पालन करना चाहिए।</p><p><strong>ना चरिताच्छास्त्रां गरीयः।</strong><br>शिष्टाचार से शास्त्र बड़े नहीं हैं।</p><p><strong>दूरस्थमपि चारचक्षुः पश्यति राजा।</strong><br>अपने विवेक तथा गुप्तचरों द्वारा राजा दूर की वस्तु को भी देखता है।</p><p><strong>गतानुगतिको लोको।</strong><br>एक दूसरे की देखा-देखी लोग अपना व्यवहार करते हैं।</p><p><strong>यमनुजीवेत्तं नापवदेत्।</strong><br>जिस पर आश्रित हो, उसकी निन्दा नहीं करनी चाहिए।</p><p><strong>तपः सारः इन्द्रियनिग्रहः।</strong><br>इंद्रियों को वश में रखना ही तप का सार है।</p><p><strong>दुर्लभः स्त्रीबन्धनान्मोक्षः।</strong><br>स्त्रियों के मोह में लगे रहने से मोक्ष नहीं मिलता।</p><p><strong>स्त्रीनामं सर्वाशुभानां क्षेत्रम्।</strong><br>स्त्रियां सभी बुराइयों की जड़ हैं।</p><p><strong>न च स्त्रीणां पुरुष परीक्षा।</strong><br>स्त्री पुरुष के गुणों की परीक्षा नहीं कर सकती।</p><p><strong>स्त्रीणां मनः क्षणिकम्।</strong><br>स्त्रियों का मन बहुत चंचल होता है।</p><p><strong>अशुभ द्वेषिणः स्त्रीषु न प्रसक्ता।</strong><br>बुरे कर्मों से दूर रहने वाले पुरुष स्त्रियों के चक्कर में नहीं पड़ते।</p><p><strong>यशफलज्ञास्त्रिवेदविदः।</strong><br>तीनों वेदों को जानने वाले ही यज्ञ के महत्त्व व परिणाम को जानते हैं।</p><p><strong>स्वर्गस्थानं न शाश्वततं यावत्पुण्य फलम्।</strong><br>स्वर्ग-स्थान सदैव नहीं है।</p><p><strong>न च स्वर्ग पतनात्परं दुःखम्।</strong><br>स्वर्ग से पतन होने पर असाधारण दुःख होता है।</p><p><strong>देही देहं त्यक्त्वा ऐन्द्रपदं न वाञ्छति।</strong><br>प्राणी शरीर को छोड़कर इन्द्रपद भी नहीं चाहता।</p><p><strong>दुःखानामौषधं निर्वाणम्।</strong><br>दुःखों की औषधि निर्वाण (मोक्ष) है।</p><p><strong>अनार्यसम्बन्धाद् वरमार्यशत्रुता।</strong><br>बुरे मित्र से तो समझदार शत्रु ही ठीक है।</p><p><strong>निहन्ति दुर्वचनं कुलम्।</strong><br>अप्रिय बातें कुल का नाश करती हैं।</p><p><strong>न पुत्रसंस्पर्शात् परं सुखम्।</strong><br>पुत्र स्पर्श से बड़ा कोई सुख नहीं है।</p><p><strong>विवादे धर्ममनुस्मरेत्।</strong><br>विवाद में धर्म का स्मरण करना चाहिए।</p><p><strong>निशान्ते कार्यं चिन्तयेत्।</strong><br>रात्रि के अंत में यानी प्रातःकाल में दिन भर कार्यों पर विचार करना चाहिए।</p><p><strong>प्रदोषे न संयोगः कर्तव्यः।</strong><br>प्रातःकाल सहवास नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>उपस्थित विनाशो दुर्नयं मन्यते।</strong><br>जिसका विनाश होता है, वह अन्याय पर उतर आता है।</p><p><strong>क्षीरार्थिनः किं करिष्यः।</strong><br>दूध का इच्छुक हथिनी से क्या करेगा?</p><p><strong>न दानसमं वश्यं वश्यम।</strong><br>दान के समान कोई उपकार नहीं है।</p><p><strong>पराय तेषूत्कण्ठा न कुर्यात्।</strong><br>दूसरे के हाथ में चली गई वस्तु को पाने के लिए उतावले मत बनो।</p><p><strong>असत्समृद्धिरसद्भिरेव भुज्येत।</strong><br>बुरे तरीके से कमाया हुआ धन बुरे लोगों द्वारा ही भोगी जाती है।</p><p><strong>निम्बफलं काकैरेव भुज्यते।</strong><br>नीम का फल कौओं द्वारा खाया जाता है।</p><p><strong>नाम्भोधिस्तृष्णामपोहति।</strong><br>समुद्र प्यास नहीं बुझाता।</p><p><strong>बालुका अपि स्वगुणमाश्रयन्ते।</strong><br>बालू भी अपने गुण का अनुसरण करती है।</p><p><strong>सन्तोऽसत्सु न रमन्ते।</strong><br>सन्तों को असन्तों के बीच में आनन्द नहीं आता।</p><p><strong>न हंसः प्रेतवने रमन्ते।</strong><br>हंसों को श्मशान में अच्छा नहीं लगता।</p><p><strong>अर्थार्थं प्रवर्तते लोकः।</strong><br>मनुष्य धन के लिए बदल जाता है।</p><p><strong>आशया बध्यते लोकः।</strong><br>संसार आशा द्वारा बांधा जाता है।</p><p><strong>न चाशापरेः श्री सह तिष्ठति।</strong><br>केवल आशा रखने वाले के साथ लक्ष्मी नहीं ठहरती।</p><p><strong>आशापरे न धैर्यम्।</strong><br>अधिक उम्मीद वाला होने मात्र से धैर्यशील नहीं हो सकते।</p><p><strong>दैन्यान्भरणमुत्तमम्।</strong><br>गरीबी से मृत्यु अच्छी है।</p><p><strong>आशा लज्जां व्यपोहति।</strong><br>आशा लज्जा को दूर कर देती है।</p><p><strong>न मात्रा सह वासः कर्तव्यः।</strong><br>एकान्त में माता के साथ भी न रहें।</p><p><strong>आत्मा न स्तोत्वयः।</strong><br>अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिए।</p><p><strong>न दिवा स्वप्नं कुर्यात्।</strong><br>दिन में नहीं सोना चाहिए।</p><p><strong>न चासन्नमपि पश्येत्यैश्वर्यान्ध न ऋणोतीष्टं वाक्यम्।</strong><br>धन से अंधा व्यक्ति ज्ञानियों की बात नहीं सुनता।</p><p><strong>स्त्रीणां न भर्तुः परं दैवतम्।</strong><br>पति ही स्त्रियों का परम देवता है।</p><p><strong>तदनुवर्तनमुभयसुखम्।</strong><br>पति के अनुकूल व्यवहार करना दोनों को सुखी बनाता है।</p><p><strong>अतिथिमभ्यागतं पूजये यथाविधिः।</strong><br>घर आए हुए अतिथि को जितना हो सके उतना सम्मान देना चाहिए।</p><p><strong>नास्ति हव्यस्य व्याघातः।</strong><br>यज्ञ में दी गई हवन सामग्री कभी बेकार नहीं होती।</p><p><strong>शत्रुर्मित्रवत् प्रतिभाति।</strong><br>बुद्धि भ्रष्ट होने पर शत्रु मित्र जैसा दिखाई देने लगता है।</p><p><strong>मृगतृष्णा जलवत् भाति।</strong><br>लालची बुद्धि होने पर रेगिस्तान भी जल जैसा दिखाई देने लगता है।</p><p><strong>दुर्मेधसामसच्छास्त्रं मोहयति।</strong><br>बुद्धिहीनों को निकम्मेपन की शिक्षा देने वाली पुस्तकें अच्छी लगती हैं।</p><p><strong>सत्संगः स्वर्गवासः।</strong><br>सत्संग स्वर्ग में रहने के समान है।</p><p><strong>आर्यः स्वमिव परं मन्यते।</strong><br>आर्य लोग दूसरों को भी अपने ही समान मानते हैं।</p><p><strong>रूपानुवर्ती गुणः।</strong><br>गुण रूप के ही अनुसार होते हैं।</p><p><strong>यत्र सुखेन वर्तते देव स्थानम्।</strong><br>जहां सुख मिले वही अच्छा स्थान है।</p><p><strong>विश्वासघातिनो न निष्कृतिः।</strong><br>विश्वासघाती की मुक्ति कभी नहीं होती।</p><p><strong>दैवायत्तं न शोचयेत।</strong><br>दुर्भाग्य पर दुःख नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>आश्रित दुःखमात्मन इव मन्यते साधुः।</strong><br>सज्जन दूसरों के दुःखों को अपना ही जैसा मानते हैं।</p><p><strong>हृद्गतमाच्छाद्यान्यद् वदत्यनार्यः।</strong><br>दुष्ट व्यक्ति हृदय की बात को छिपाकर कुछ और ही बोलता है।</p><p><strong>बुद्धिहीनः पिशाच तुल्यः।</strong><br>बुद्धिहीन व्यक्ति पिशाच के समान होता है।</p><p><strong>असहायः पथि न गच्छेत्।</strong><br>मार्ग में अकेले नहीं जाना चाहिए।</p><p><strong>पुत्रो न स्तोतव्यः।</strong><br>पुत्र की स्तुति नहीं करनी चाहिए।</p><p><strong>स्वामी स्तोतव्योऽनुजीविभिः।</strong><br>सेवकों को स्वामी की प्रशंसा करनी चाहिए।</p><p><strong>धर्मकृत्येष्वपि स्वामिन एवं घोषयेत्।</strong><br>धार्मिक कार्यों में भी स्वामी को ही श्रेय देना चाहिए।</p><p><strong>राजाज्ञां नातिलंघेत्।</strong><br>राजा की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>यथाऽऽज्ञप्तं तथा कुर्यात्।</strong><br>जैसी आज्ञा हो वैसा ही करना चाहिए।</p><p><strong>नास्ति बुद्धिमतां शत्रुः।</strong><br>बुद्धिमानों का कोई शत्रु नहीं होता।</p><p><strong>आत्मछिद्रं न प्रकाशयेत्।</strong><br>अपनी कोई गुप्त बात कभी प्रकट न करें।</p><p><strong>क्षमानेव सर्वं साधयति।</strong><br>क्षमाशील व्यक्ति अपनी प्रशंसा प्राप्त कर लेता है।</p><p><strong>आपदर्थ धनं रक्षेत्।</strong><br>आपत्ति से बचने के लिए धन की रक्षा करें।</p><p><strong>साहसवतां प्रियं कर्तव्यम्।</strong><br>साहसी पुरुषों को कार्य प्रिय होता है।</p><p><strong>श्व कार्यमद्य कुर्वीत्।</strong><br>कल का कार्य आज ही कर लेना चाहिए।</p><p><strong>आपराह्निकं पूर्वाहत एवं कर्तव्यम्।</strong><br>दोपहर के कार्य को प्रातःकाल ही कर लें।</p><p><strong>व्यवहारानुलोभो धर्मः।</strong><br>व्यवहार के अनुसार ही धर्म है।</p><p><strong>सर्वज्ञता लोकज्ञता।</strong><br>जो सांसारिकता का अनुभवीय ज्ञात होता है, वही सर्वत्र होता है।</p><p><strong>शास्त्रोऽपि लोकज्ञो मूर्ख तुल्यः।</strong><br>शास्त्र जानने वाला यदि लोक-व्यवहार नहीं जानता तो वह मूर्ख के समान होता है।</p><p><strong>शास्त्र प्रयोजनं तत्त्व दर्शनम्।</strong><br>समस्त वस्तुओं का यथार्थ ज्ञान कराना ही शास्त्र का उद्देश्य होता है।</p><p><strong>तत्त्वज्ञानं कार्यमेव प्रकाशयति।</strong><br>कार्य ही तत्त्वज्ञान मार्ग प्रकाशित करते हैं।</p><p><strong>व्यवहारे पक्षपाते न कार्यः।</strong><br>व्यवहार में पक्षपात नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>धर्मादपि व्यवहारो गरीयान्।</strong><br>धर्म से भी व्यवहार बड़ा है।</p><p><strong>आत्मा हि व्यवहारस्य साक्षी।</strong><br>आत्मा व्यवहार की साक्षी है।</p><p><strong>सर्वसाक्षी ह्यात्मा।</strong><br>आत्मा सर्वसाक्षी है।</p><p><strong>न स्यात् कूटसाक्षी।</strong><br>झूठी साक्षी (गवाह) नहीं होना चाहिए।</p><p><strong>कूटसाक्षिणो नरके पतन्ति।</strong><br>झूठी गवाही देने वाले नरक में गिरते हैं।</p><p><strong>प्रच्छन्नपापानां साक्षिणो महाभूतानि।</strong><br>छिपकर किए गए पापों के पंच महाभूत हैं।</p><p><strong>आत्मनः पापमात्मैव प्रकाशयति।</strong><br>अपने किए हुए पाप को व्यक्ति की आत्मा बता देती है।</p><p><strong>व्यवहारेऽन्तर्गतमाचारः सूचयति।</strong><br>व्यवहार से ही आचरण जाना जाता है।</p><p><strong>आकारसंवरणं देवानामशक्यम्।</strong><br>आचरण के अनुसार ही मुखमंडल हो जाता है।</p><p><strong>चोर राजपुरुषेेभ्यो दित्तं रक्षते।</strong><br>चोरों एवं राज पुरुष से अपने धन की रक्षा करो।</p><p><strong>दुर्दर्शना हि राजानः प्रजाः नाशयन्ति।</strong><br>अपनी प्रजा की खोज-खबर न लेने वाला राजा उस प्रजा को नष्ट कर देता है।</p><p><strong>सुदर्शना हि राजानः प्रजाः रञ्जयन्ति।</strong><br>खोज-खबर लेने वाले राजा प्रजा को प्रसन्न रखते हैं।</p><p><strong>न्याययुक्तं राजानं मातरं मन्यते प्रजाः।</strong><br>न्यायी राजा को प्रजा माँ समझती है।</p><p><strong>तादृशः स राजा इह सुखं ततः स्वर्गमाप्नोति।</strong><br>प्रजा का ख्याल रखने वाले राजा इस लोक में सुख भोगकर स्वर्ग प्राप्त करता है।</p><p><strong>अहिंसा लक्षणो धर्मः।</strong><br>अहिंसा ही धर्म का लक्षण है।</p><p><strong>शरीराणाम् एव पर शरीरं मन्यते साधुः।</strong><br>साधु पुरुष अपने शरीर को दूसरों की भलाई में लगा देते हैं।</p><p><strong>मांसभक्षणमयुक्तं सर्वेषाम्।</strong><br>मांस-भक्षण सभी के लिए बुरा है।</p><p><strong>न संसार भयं ज्ञानवताम्।</strong><br>ज्ञानियों को संसार का भय नहीं होता।</p><p><strong>विज्ञान दीपेन संसार भयं निवर्तते।</strong><br>विज्ञान के दीप से संसार का भय भाग जाता है।</p><p><strong>सर्वमनित्यं भवति।</strong><br>सब कुछ नश्वर है।</p><p><strong>कृमिशकृन्मूत्रभाजनं शरीरं पुण्यपपजन्महेतुः।</strong><br>पाप पुण्य का हेतु शरीर कृमि मल-मूत्र का पात्र है।</p><p><strong>जन्ममरणादिषु दुःखमेव।</strong><br>जन्म-मरण आदि में दुःख ही है।</p><p><strong>सतेभ्यस्तुर्तुं प्रयतेत।</strong><br>अतः जन्म-मृत्यु से पार होने का प्रयत्न करना चाहिए।</p><p><strong>तपसा स्वर्गमाप्नोति।</strong><br>तप से स्वर्ग प्राप्त होता है।</p><p><strong>क्षमायुक्तस्य तपो विवर्धते।</strong><br>क्षमा करने वाले का तप बढ़ता है।</p><p><strong>सक्ष्मात् सर्वेषां कार्यसिद्धिर्भवति।</strong><br>क्षमा करने से सभी कार्यों में सफलता मिलती है।</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=2742</guid><description><![CDATA[<p>चाणक्य के कड़वे वचन सुनने में रूखे, पर सारगर्भित हैं। जीवन में सफलता के लिए इन्हें समझना जरूरी है। इन्हें चाणक्य नीति से संकलित किया गया है।</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>चाणक्य के कड़वे वचन जो यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे हैं, <a
href="/chanakya-niti-in-hindi-pdf-free-download/">चाणक्य नीति</a> दर्पण से लिए गए हैं। सुनने में ये रूखे जरूर लगते हैं, लेकिन हैं बहुत सारगर्भित।</p><p>यदि आप जीवन में सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ना चाहते हैं, तो चाणक्य के कड़वे वचन (Chanakya Ke Kadve Vachan) आपको अवश्य मार्ग दिखाएंगे। लेकिन हाँ, ज़रूरत है तो बस एक चीज की–इन कटु उक्तियों को सकारात्मकता से लेने की और इन्हें अपने जीवन में ढालने की। पढ़ें आचार्य चाणक्य के कड़वे वचन–</p><h2 class="wp-block-heading">चाणक्य नीति के प्रथम अध्याय से कड़वे वचन</h2><p>यहाँ हम चाणक्य के कड़वे वचन–जो <a
href="/chanakya-niti-chapter-1-hindi/">चाणक्य नीति के पहले अध्याय</a> में आए हैं–उनकी चर्चा कर रहे हैं। पहला अध्याय हमेशा ही महत्वपूर्ण होता है। इसलिए इन कड़वे वचनों का महत्व और भी बढ़ जाता है।</p><p><strong>दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः।<br>ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> जिसकी स्त्री दुष्टा हो, मित्र नीच स्वभाव के हों, नौकर जवाब देने वाले हों और जिस घर में साँप रहता हो, ऐसे घर में रहने वाला व्यक्ति निश्चय ही मृत्यु के निकट रहता है अर्थात् ऐसे व्यक्ति की मृत्यु किसी भी समय हो सकती।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> आचार्य चाणक्य यहाँ कटु, लेकिन बहुत ही व्यावहारिक बात कह रहे हैं। यदि आपका जीवनसाथी, मित्र और नौकर आपके प्रति पूरी तरह ईमानदार नहीं हैं, तो आपके जीवन पर खतरा मंडरा रहा है। मोनियर विलियम्स के संस्कृत-अंग्रेजी शब्दकोश के अनुसार &#8220;शठ&#8221; का अर्थ है झूठा (false), कपटी (deceitful), छलिया (fraudulent), घातक (malignant) और दुष्ट (wicked)।</p><p>अगर आप जाने-अनजाने ऐसे लोगों पर भरोसा करते हैं जो मिथ्याभाषी और कपटी आदि हैं व वे आपके निकटस्थ भी हैं, आपके करीबी हैं, तो निश्चित ही आप अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं। इसलिए अपनी आँखें खोल कर रखिए और पहचानिए कि आपका जीवनसाथी, मित्र या मातहत उपर्युक्त दुर्गुणों से ग्रस्त तो नहीं है। यदि आप इनमें से किसी को भी ऐसा पाते हैं, तो तुरंत उनसे छुटकारा पाने में ही आपकी भलाई है। चाणक्य के इस कड़वे वचन को गाँठ बांध लीजिए।</p><figure
class="wp-block-pullquote"><blockquote><p>अपनी आँखें खोलकर रखिए। पहचानिए कि कहीं आपका जीवनसाथी, मित्र या मातहत &#8220;शठ&#8221; तो नहीं है।</p></blockquote></figure><p><strong>नखीनां च नदीनां च शृङ्गीणां शस्त्रपाणिनाम्।<br>विश्वासो नैव कर्त्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> नाखून वाले हिंसक पशुओं, नदियों, सींग वाले पशुओं, शस्त्रधारियों, स्त्रियों एवं राजकुलों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>व्याख्या</strong> <strong>–</strong> चाणक्य के कड़वे वचन कई बार चुभते जरूर हैं, लेकिन होते खरे हैं। कुछ बातें सभी समझते हैं – हिंसक पशु अगर शांत बैठा भी दिखे, तो उससे दूर रहना ही भला। चाहे आप कितने बड़े तैराक क्यों न हो, अनजान नदी में नहीं कूदना चाहिए। लेकिन कुछ बातें उतनी सहज नहीं हैं, मसलन शस्त्रधारियों से दूर रहना चाहिए। मन वैसे ही चंचल है। बड़े-से-बड़े योगी भी मन को वश करने की लगातार कोशिश करते रहते हैं। वे भी दावा नहीं कर सकते कि उनका मन पर पूरा बस है। ऐसे में अगर किसी के पास शस्त्र है और उसका मन चलायमान हो जाए, तो जान पर बन आना स्वाभाविक है। इसलिए शस्त्रधारियों से जितना दूर रहा जाए, उतना बेहतर है।</p><p>अब बात आती है स्त्रियों पर भरोसा न करने की। चाणक्य नीति में स्त्रियों को लेकर कई जगह ऐसी बातें कही गई हैं जो आज के दौर में जँचती नहीं हैं। लेकिन गहराई से देखेंगे तो आप पाएंगे कि इन बातों का वह मतलब नहीं, जो आम तौर पर समझा जाता है। प्राचीन नीति ग्रंथों में अक्सर ऐसा देखा जाता है।</p><p>प्रायः ये पुस्तकें पुरुषों को संबोधित करके लिखी गई हैं, इसलिए विपरीत लिंग के लोगों के लिए सहज ही &#8220;स्त्री&#8221; शब्द प्रयुक्त हुआ है। इसका कारण यह है कि उस समय अधिकांशतः पुरुष ही नीति या राजनीति आदि में ज्यादा सक्रिय हुआ करते थे। साथ ही नीति का दायरा भी अब बढ़कर जीवन के हर क्षेत्र को छू रहा है। लेकिन आज समय बदल चुका है। स्त्रियाँ हर क्षेत्र में पुरुषों के कंधे-से-कंधा मिलाकर चल रही हैं। इसलिए जब इन पुस्तकों में &#8220;स्त्री&#8221; कहा जाता है तो उसे विपरीत लिंगी व्यक्ति समझना अधिक युक्ति-युक्त है। यदि यह ग्रंथ कोई स्त्री पढ़ रही है तो &#8220;स्त्री&#8221; की जगह पुरुष, &#8220;पत्नी&#8221; की जगह &#8220;पति&#8221; आदि समझा जाना चाहिए।</p><p>अब आते हैं इस बात पर कि स्त्रियों अर्थात् विपरीत लिंग के व्यक्तियों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। मनोविज्ञान के अनुसार विपरीत लिंग के व्यक्ति के प्रति एक सहज आकर्षण होता है। आम तौर पर बड़े-बड़े व्यक्ति भी इससे अछूते नहीं रहते। कई बार यह आकर्षण बहुत तीव्र हो जाता है, जिससे बुद्धि भ्रमित हो जाती है व विवेक नष्ट हो जाता है। ऐसे में सही-गलत की समझ खत्म हो जाती है। इसलिए विपरीत लिंगी व्यक्ति के प्रति अनायास ही विश्वास नहीं कर लेना चाहिए। अपनी बुद्धि की कसौटी पर उसे भी अवश्य कसना चाहिए। यही आचार्य चाणक्य का मत है।</p><p>चाणक्य के कड़वे वचन राजकुल को भी अपने दायरे में लेते हैं। राजकुल अर्थात वे लोग जिनके पास बहुत शक्ति है, जिसे आज-कल ‘पावर’ कहा जाता है। यह बड़ी ही नशीली वस्तु है। ऐसे लोग अपनी शक्ति या सत्ता को बनाए रखने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। इसलिए इन ताकतवर लोगों पर भी बहुत सोच-समझ कर ही यकीन करना चाहिए। नहीं तो लेने-के-देने पड़ सकते हैं।</p><figure
class="wp-block-pullquote"><blockquote><p>यदि चाणक्य नीति कोई महिला पढ़ रही है तो उसे &#8220;स्त्री&#8221; की जगह &#8220;पुरुष&#8221;, &#8220;पत्नी&#8221; की जगह &#8220;पति&#8221; आदि समझा जाना चाहिए।</p></blockquote></figure><h2 class="wp-block-heading">चाणक्य के कड़वे वचन – द्वितीय अध्याय</h2><p>अब बात करते हैं <a
href="/chanakya-niti-chapter-2-hindi/">चाणक्य नीति के दूसरे अध्याय से</a> उन उक्तियों की, जो कड़वी लेकिन सत्य हैं।</p><p><strong>न विश्वसेत् कुमित्रे च मित्रे चाऽपि न विश्वसेत्।<br>कदाचित् कुपितं मित्रं सर्व गुह्यं प्रकाशयेत्॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> कुमित्र पर तो कभी विश्वास करे ही नहीं, अच्छे दोस्त पर भी कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। क्योंकि सुमित्र भी कभी क्रोधित होकर गुप्त भेद दूसरों के सामने प्रकट कर देता है।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> इंसान अगर मारा जाता है, धोखा खाता है तो अजनबी से नहीं, बल्कि किसी अपने से – दोस्त से। खराब मित्र तो विश्वास के काबिल ही नहीं, इसीलिए वे खराब हैं। उन्हें अपने राज़ बताना स्वयं अपने को कठिनाई में डालने के समान है। लेकिन उपर्युक्त श्लोक में विशेष बात यह है कि आचार्य चाणक्य के अनुसार मित्र पर, अच्छे दोस्त पर भी भरोसा नहीं करना चाहिए। क्योंकि वह क्षणिक क्रोध में भी है और उसके पास आपके भेद हैं, तो गुस्से के उन क्षणों में आपके भेद सुरक्षित नहीं हैं।</p><p><strong>माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।<br>न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> ऐसे माँ-बाप अपनी संतान के दुश्मन हैं जो उन्हें शिक्षित नहीं करते। अशिक्षित व्यक्ति बुद्धिमानों की सभा में उसी तरह सम्मान नहीं पाता जिस प्रकार हंसों के झुण्ड में बगुला।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> उपनिषदों के अनुसार माता-पिता देव-रूप हैं। लेकिन यदि वे अविवेकी हैं, तो देव दानव में परिणत हो सकता है। माँ-बाप हमेशा ही बच्चों के लिए अच्छे नहीं होते हैं। यदि कोई माँ-बाप अपने बच्चों को उपयुक्त शिक्षा-दीक्षा नहीं देते हैं, तो वे उनका जीवन चौपट कर देते हैं। अशिक्षित संतान न तो प्रगति कर पाती है और न ही उसका कहीं सम्मान होता है। बात कड़वी है? है तो सही, लेकिन है सच्ची।</p><figure
class="wp-block-pullquote"><blockquote><p>ऐसे माँ-बाप अपनी संतान के दुश्मन हैं जो उन्हें शिक्षित नहीं करते।</p><cite>आचार्य चाणक्य</cite></blockquote></figure><p><strong>लालनाद् बहवो दोषास्ताडनाद् बहवो गुणाः।<br>तस्मात्पुत्रं च शिष्यं च ताडयेन्न तु लालयेत्॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> प्यार-दुलार से बेटे और शिष्य में बहुत से दोष पैदा हो जाते हैं, जबकि ताड़ना (डाँट-फटकार) से उनका विकास होता है। अतः संतति और शिष्यों को डाँटते रहना चाहिए।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> संतान और शिष्य से प्यार करना जरूरी है, लेकिन ज्यादा लाड़-प्यार से बिगड़ना भी स्वाभाविक ही है। इसलिए आवश्यक है कि यदि संतान या शिष्य को गलत रास्ते पर जाते हुए देखें, तो सही रास्ते पर लाने के लिए डाँट-डपट भी उपयोगी है। किसी को फटकार अच्छी नहीं लगती, स्वाभाविक ही है। किंतु हर चीज का अपना महत्व है। किस चीज को कहाँ इस्तेमाल करना है, इसकी समझ भी बहुत जरूरी है। ऐसे में डाँट-फटकार का अपना महत्व है। इसे अनदेखा नहीं करना चाहिए।</p><h2 class="wp-block-heading">तीखी, लेकिन काम की बातें</h2><p>आइए, अब चलते हैं <a
href="/chanakya-niti-chapter-3-hindi/">तीसरे अध्याय</a> पर और जानते हैं वे कौन-सी तीखी लेकिन काम की बातें हैं, जो इस अध्याय में हमें पढ़ने को मिलती हैं।</p><p><strong>अतिरूपेण वै सीता अतिगर्वेण रावणः।<br>अतिदानात् वलिबद्धो अति सर्वत्र वर्जयेत्॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> अधिक सुन्दरता ही <a
href="/sita-ramayan-story-hindi/">सीता</a> के अपहरण का कारण हुआ, अधिक गर्व से ही रावण मारा गया, अधिक दान के कारण राजा बलि बन्धन को प्राप्त हुए। इसलिए “अति” का त्याग कर देना चाहिए।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> यह मानवीय स्वभाव है कि जब कोई वस्तु या गुण हमें आकर्षित करता है, तो बहुत अधिक करता है। जरूरत से ज्यादा करता है। हम उसे पाने के लिए बाकी सब कुछ भूलने को तैयार हो जाते हैं। उसके लिए हम सब छोड़ने को उद्यत हो जाते हैं। लेकिन इस श्लोक में &#8220;अति&#8221; से दूर रहने का संदेश कौटिल्य हमें दे रहे हैं। चाहे &#8220;अति&#8221; में कितनी ही मधुरता क्यों न हो, कितना ही नशा क्यों न हो, कितना ही खिंचाव क्यों न हो – उससे बचकर रहने में ही भलाई है।</p><figure
class="wp-block-pullquote"><blockquote><p>चाहे &#8220;अति&#8221; में कितनी ही मधुरता क्यों न हो, कितना ही नशा क्यों न हो, कितना ही खिंचाव क्यों न हो – उससे बचकर रहने में ही भलाई है।</p></blockquote></figure><p><strong>उपसर्गेऽन्यचक्रे च दुर्भिक्षे च भयावहे।<br>असाधुजनसम्पर्के यः पलायति सः जीवति॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> आग लगने, बाढ़ आने, सूखा पड़ने, उल्कापात, अकाल, आतताइयों द्वारा हमला और ख़राब संगति–इन हालात में जो व्यक्ति प्रभावित जगह से भाग निकलता है, वही जीवित रहता है।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> यूँ तो डटे रहने में महानता है। टिके रहने में वीरता है। जो पीछे हट जाए उसे तरह-तरह की बातें सुनाई जाती हैं। लेकिन परिस्थिति के अनुसार तौलने में हर्ज नहीं कि तथाकथित वीरता दिखाने की जरूरत है या जीवन बचाने की। उपर्युक्त हालात में जीवन रक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए और अहम् को दरकिनार कर जिन्दगी बचाने के लिए भाग निकलना चाहिए। यही नीति शास्त्र का कथन है।</p><h2 class="wp-block-heading">चुभेंगी ये बातें</h2><p>चाणक्य <a
href="/chanakya-niti-chapter-4-hindi/">चौथे अध्याय</a> में कुछ ऐसी बातें कहते हैं, जो बहुत चुभती हैं। लेकिन कोई गौर करे तो पाएगा कि इनमें व्यावहारिक ज्ञान छुपा हुआ है।</p><p><strong>मूर्खश्चिरायुर्जातोऽपि तस्माज्जातमृतो वसः।<br>मृतः स चाऽल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत्॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> लंबी उम्र का मूर्ख पुत्र की अपेक्षा पैदा होते ही मर जाने वाला पुत्र बेहतर है। क्योंकि पैदा होते ही मर जाने वाला पुत्र तो थोड़े समय के लिए दुःखदायी होता है, लेकिन मूर्ख जब तक जीवित रहता है तब तक दुःख देता रहता है।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> मूर्खता से खराब इस संसार में कोई चीज नहीं है, मौत भी नहीं। संतान से हर कोई प्यार करता है, लेकिन आत्मसम्मान उससे भी ज्यादा प्रिय होता है। मूर्ख संतान अपने कृत्यों से आत्मसम्मान को भी लहू-लुहान कर सकती है। इस दृष्टि से आचार्य चाणक्य बहुत ही चुभीली बात कहते हैं। लेकिन बात है गंभीर।</p><p><strong>त्यजेद्धर्मं दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।<br>त्यजेत्क्रोधमुखीं भार्यां निःस्नेहान् बान्धवांस्त्यजेत्॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> दयारहित धर्म को छोड़ देना चाहिए। विद्या से हीन गुरु का त्याग कर देना चाहिए। हमेशा क्रोध करने वाली पत्नी का त्याग कर देना चाहिए। स्नेह से हीन बन्धु-बान्धवों को भी त्याग देना चाहिए।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> कुछ लोगों से और कार्यों से सहज प्रीति होती है, जैसे कि गुरु, पति व पत्नी आदि। फिर भी यह समझना जरूरी है कि प्रीति और आसक्ति दो भिन्न चीजें हैं। स्नेह जब अंधा हो जाए, तो आसक्ति में परिवर्तित हो जाता है। अतः स्नेह अपनी जगह है, लेकिन सजग बुद्धि का अपना महत्व है। यही बुद्धि हमें बताती है कि कब किससे अलग होने का समय आ गया है। बिना करुणा का धर्म त्यागने योग्य है। वह गुरु भला क्या सिखा सकता है जो स्वयं ही विद्याहीन हो? कुछ नहीं। क्रोधी जीवनसाथी जीवन को नष्ट कर देता है। कहते हैं कि अगर आपने अच्छा जीवनसाथी पा लिया, तो आप पचास फ़ीसदी वैसे ही भाग्यशाली हैं। वैसे ही यदि वह गुस्सैल है, तो जिंदगी बर्बाद समझिए। फिर अटके रहने से क्या फायदा? यही हैं स्नेह और आसक्ति को लेकर चाणक्य के कड़वे वचन।</p><figure
class="wp-block-pullquote"><blockquote><p>स्नेह जब अंधा हो जाए, तो आसक्ति में परिवर्तित हो जाता है।</p></blockquote></figure><h2 class="wp-block-heading">रूखी, किंतु उपयोगी बातें</h2><p>अब देखते हैं <a
href="/chanakya-niti-chapter-5-hindi/">चाणक्य नीति के पाँचवे अध्याय में</a> क्या हैं सुनने में रूखी, किंतु जीवन में उपयोगी बातें–</p><p><strong>जन्ममृत्यु हि यात्येको भुनक्त्येकः शुभाऽशुभम्।<br>नरकेषु पतत्येक एको याति परां गतिम्॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> मनुष्य अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही स्वयं मृत्यु को प्राप्त होता है। मनुष्य शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य के फल को भी अकेला ही भोगता है। अकेला ही तरह-तरह के कष्टों को भोगता है और अकेला ही मुक्ति प्राप्त करता है।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> आचार्य चाणक्य के अनुसार इहलोक और परलोक में कोई भी आपकी सहायता नहीं कर सकता है। आपको यदि आगे बढ़ना है, तो आपका एक ही मददगार है–स्वयं आप। हमें लगता जरूर है कि कोई और हमारी मदद कर सकता है, विशेषतः कठिन समय में। लेकिन वास्तविकता यह है कि न आज तक किसी ने आपकी सहायता की है और न ही कोई आगे करेगा। इसलिए अपनी लड़ाई लड़ने के लिए खुद ही तैयार रहना चाहिए। दूसरे लोग कभी-कभी थोड़ा काम आ जरूर सकते हैं, लेकिन ज्यादा सहायक साबित नहीं हो सकते। तो संसार में सफलता के लिए और जन्म-मरण के चक्र से परे जाने के लिए स्वयं ही चेष्टा करना, उद्योग करना, आत्मविश्वास रखना अनिवार्य है।</p><figure
class="wp-block-pullquote"><blockquote><p>आपको यदि आगे बढ़ना है, तो आपका एक ही मददगार है–स्वयं आप।</p></blockquote></figure><p>अब नज़र डालते हैं कि <a
href="/chanakya-niti-chapter-6-hindi/">छठे अध्याय</a> में चाणक्य के कड़वे वचन क्या हैं–</p><p><strong>वरं न राज्यं न कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्।<br>वरं न शिष्यो न कुशिष्यशिष्यो वरं न दारा न कुदारदाराः॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> दुष्ट राजा के राज्य में रहने से श्रेष्ठ है कि राज्यविहीन होकर रहा जाए। ख़राब मित्रों से बेहतर है मित्रता के बिना ही रहा जाए। अयोग्य शिष्यों की अपेक्षा शिष्यों का न होना अच्छा है। ख़राब पत्नी होने से बिना पत्नी के रहना ही उत्तम है।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> हम हमेशा दोषारोपण कर खुद को बचाने की कोशिश करते हैं। फिर भी याद रखना चाहिए कि सबके पास एक अंतिम विकल्प हमेशा रहता है–स्वयं को अलग कर लेने का विकल्प। इस विकल्प का चुनाव संघर्ष मांगता है, ख़तरा मोल लेने की क्षमता मांगता है और साहस मांगता है। छोड़ने के लिए यथास्थितिवाद को त्यागना पड़ेगा। इसलिए यदि अन्य कोई रास्ता न बसे, तो उस वस्तु या व्यक्ति को त्यागना ही श्रेष्ठ है।</p><p>आइए, अब दृष्टिपात करते हैं <a
href="/chanakya-niti-chapter-7-hindi/">अध्याय 7</a> के कुछ ऐसे श्लोकों पर–</p><p><strong>हस्ती अंकुशमात्रेण वाजी हस्तेन ताड्यते।<br>शृंगीलकुटहस्तेन खड्गहस्तेन दुर्जनः॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> हाथी अंकुश से, घोड़ा चाबुक से, बैल आदि सींग वाले जानवर डण्डे से बस में रहते हैं, लेकिन बुरे लोगों को बस में करने के लिए तो कई बार तलवार ही हाथ में लेनी पड़ती है।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> शस्त्र और शास्त्र दोनों ही आवश्यक हैं। भारत के पराभूत होने का एक कारण यह भी है कि हमने शास्त्र को तो बहुत अधिक महत्व दिया, लेकिन शस्त्र बिल्कुल ही छोड़ दिए। कहते भी तो हैं कि &#8220;शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्रचर्चा प्रवर्तते&#8221; अर्थात् शस्त्र से रक्षित राष्ट्र में शास्त्र-चर्चा होती है। बाहुबल के अभाव में मनोबल पराभूत हो ही जाता है। बहुत से लोग शान्ति और अध्यात्म को न समझते हैं, न ही समझ सकते हैं। ऐसे में या तो स्वयं दुर्जनों के हाथों दलन को स्वीकार करें या मारे जाएँ अथवा तेजस्विता का वरण करें और खड्ग से धर्म की रक्षा करें। हाँ, यह सदैव ध्यान में रहे कि खड्ग का उपयोग धर्म व राष्ट्र की रक्षा के लिए हो, न कि निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए। अतः प्रत्येक व्यक्ति को मनोबल और विद्याबल के साथ बाहुबल को बढ़ाने पर भी विचार करना चाहिए।</p><figure
class="wp-block-pullquote"><blockquote><p>&#8220;शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्रचर्चा प्रवर्तते&#8221; अर्थात् शस्त्र से रक्षित राष्ट्र में शास्त्र-चर्चा होती है।</p></blockquote></figure><p>अब देखते हैं कि <a
href="/chanakya-niti-chapter-8-hindi/">चाणक्य नीति का अष्टम अध्याय</a> क्या कहता है–</p><p><strong>चाण्डालानां सहस्रैश्च सूरिभिस्तत्वदर्शिभिः।<br>एको हि यवनः प्रोक्तो न नीचो यवनात्परः॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> कहा गया है कि हज़ारों चाण्डालों के बराबर एक यवन यानी मलेच्छ – धर्म-विरोधी व्यक्ति होता है। इससे अधिक कोई अन्य नीच नहीं होता।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> यहाँ धर्म का अर्थ मज़हब नहीं लेना चाहिए, जो आज-कल प्रचलित है। धर्म वह है जिसे धारण किया जाता है और जो आपको धारण करता है। वह आपका प्राकृत् कर्म है। वह जीवन को दिशा देने वाले नियमों का संग्रह है। धर्म वह है जो ऋत् हो अर्थात् ठीक या उचित हो। कहा भी गया है–</p><p>धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।<br>तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥</p><p>अर्थात् जो धर्म के नाश की चेष्टा करता है, धर्म उसका नाश कर देता है। जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। इसलिए धर्म को नष्ट करने की चेष्टा कभी नहीं करनी चाहिए, जिससे हत हुआ धर्म हमें नष्ट न करे। धर्मरक्षा हम सभी का कर्त्तव्य है। धर्म के विरोध में चाहे कोई भी व्यक्ति क्यों न हो–अपना या पराया–उसे धर्म को हानि पहुँचाने नहीं देना चाहिए। नहीं तो धर्म की हानि स्वयं के अस्तित्व को समाप्त करने के लिए पर्याप्त है। इस बात का सदैव स्मरण रखना चाहिए।</p><p>आइए, दृष्टिपात करते हैं <a
href="/chanakya-niti-chapter-9-hindi/">नवम अध्याय</a> पर–</p><p><strong>निर्विषेणापि सर्पेण कर्तव्या महती फणा।<br>विषमस्तु न वाप्यस्तु घटाटोपो भयंकरः॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> विषहीन साँप को भी अपना फन फैलाना चाहिए। दिखावा भी अत्यन्त आवश्यक होता है।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> आप उतने ही शक्तिशाली होते हैं, जितना कि दूसरे आपको समझते हैं। इससे मतलब नहीं है कि आपके पास कितनी शक्ति है। मतलब है तो इस बात से कि अन्य और विशेषतः आपके विरोधी आपको कितना शक्तिसंपन्न मानते हैं। संभव है कि आपके हृदय में अहिंसा का आदर्श हो और होना भी चाहिए। लेकिन हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि आपके विरोधी इसे आपकी निर्बलता तो नहीं मान रहे। जिस क्षण वे मानेंगे कि आप कमज़ोर हैं, वे आपको कुचलने का पूरा प्रयास करेंगे। अतः प्रदर्शन भी कई बार आवश्यक होता है।</p><figure
class="wp-block-pullquote"><blockquote><p>आप उतने ही शक्तिशाली होते हैं, जितना कि दूसरे आपको समझते हैं।</p></blockquote></figure><p>आइए, अब चलते हैं <a
href="/chanakya-neeti-dasham-adhyay-hindi/">दसवें अध्याय</a> की तरफ–</p><p><strong>येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।<br>ते मर्त्यलोके भुविः भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> जिनके पास न विद्या है, न तप है, न दानशीलता है, न चरित्र में शील है, न गुण है, न धर्म है–वे भूमि पर भाररूप पशु ही हैं, जो मनुष्य के रूप में विचरण करते हैं।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> आचार्य चाणक्य तीखे लहज़े में बताते हैं कि मनुष्य के रूप में जानवर कौन हैं। साथ ही किस तरह मनुष्य को पशु बनने से बचना चाहिए। यदि इंसान को जानवर होने से बचना है तो उसे विद्यावान होना ही चाहिए–सदैव सीखने की ललक उसमें बनी रहनी चाहिए। उसे तपशील होना चाहिए–श्रम के प्रति आस्था होनी चाहिए। उसे मेहनत से जी नहीं चुराना चाहिए। शीलवान होना चाहिए। मनुष्य को गुणग्राही होना चाहिए। स्वयं में सदैव सद्गुण विकसित करने का यत्न करते रहना चाहिए। प्रत्येक को वास्तविक मनुष्यत्व प्राप्ति के लिए धर्म पर स्थिर रहना चाहिए। धर्म माने जो ठीक है, जो सही है, जो उचित है। इन गुणों की जिनमें आभा है, वे ही मनुष्य हैं। आचार्य चाणक्य कहते हैं कि शेष तो निरे पशु ही हैं।</p><p>देखते हैं <a
href="/chanakya-niti-chapter-11-hindi/">ग्यारहवें अध्याय में</a> क्या हैं चाणक्य के कड़वे वचन (Chanakya Ke Kadve Vachan)–</p><p><strong>न दुर्जनः साधुदशामुपैति बहु प्रकारैरपि शिक्ष्यमाणः।<br>आमूलसिक्तं पयसा घृतेन न निम्बवृ़क्षोः मधुरत्वमेति॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> अनेक तरह से समझाए और सिखाए जाने पर भी दुष्ट व्यक्ति अभद्रता को नहीं छोड़ता, जिस प्रकार नीम का वृक्ष दूध और घी से सींचे जाने पर भी मधुरता को प्राप्त नहीं होता।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> किसी का भी स्वभाव बदलना बहुत मुश्किल है। यह काम लगभग असंभव की श्रेणी का है। ऐसा नहीं कि स्वभाव कभी बदलता ही नहीं, लेकिन लाखों में से एक बार ऐसा होता है। अपवाद नियम को ही पुष्ट करता है। अतः दुर्जनों से सदैव सावधान रहना चाहिए, चाहे वे कितना ही भरोसा दिलाने की कोशिश करें कि वे बदल गए हैं, उनका दिल साफ़ हो गया है, अब वे ग़लत नहीं करेंगे आदि आदि। उनका कड़वापन इतनी आसानी से समाप्त नहीं होता है। जहाँ आपने थोड़ा-सा भी विश्वास किया, थोड़ी-सी ढील दी, वहीं आपकी पतंग उन दुर्जनों द्वारा काट दी जाएगी।</p><p>अब क़दम बढ़ाते हैं <a
href="/chanakya-niti-chapter-12-hindi/">बारहवें अध्याय</a> की ओर–</p><p><strong>हस्तौ दानवर्जितौ श्रुतिपुटौ सारस्वतद्रोहिणी<br>नेत्रे साधुविलोकरहिते पादौ न तीर्थं गतौ।<br>अन्यायार्जितवित्तपूर्णमुदरं गर्वेण तुंगं शिरौ<br>रे रे जम्बुक मुञ्च-मुञ्च सहसा नीचं सुनिन्द्यं वपुः॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> जिसने जीवन में कभी दान नहीं दिया, जिसके कानों ने कभी वेद मंत्रों को नहीं सुना, जिसने आँखों से साधुओं के दर्शन नहीं किए, पैरों से तीर्थ यात्राएँ नहीं की, अन्याय से अर्जित धन से जिसका पेट भरा है और सर गर्व से ऊँचा उठा हुआ है – रे रे सियार जैसे नीच मनुष्य, ऐसे नीच और निन्दनीय शरीर को जल्दी छोड़ दे।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> दान देना धर्म का सबसे बड़ा साधन है। गृहस्थ का दान न केवल समाज के संन्यासी आदि वर्गों को पोषण देता है, बल्कि स्वयं की धनादि में आसक्ति को भी कम करता है। वेद स्वयं ईश्वर की वाणी है। प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि इहलोक में उन्नति व परलोक में सद्गति प्राप्त करने के लिए वेद पढ़े व उनका नित्य श्रवण करे। वेदाध्ययन ही जीवन को सही दशा-दिशा दे सकता है।</p><p>दान और वेदाध्ययन आदि की कामना भी चित्त में तभी पैदा होती है, जब हृदय निर्मल होता है। हृदय को निर्मल बनाने का सबसे सुगम साधन है सत्संग। आज-कल लोग इसका अर्थ बड़े-बड़े कार्यक्रमों में बैठकर किसी बाबाजी को सुनना समझते हैं। उसका भी अपना महत्व है। लेकिन सत्संग का अर्थ है सज्जनों से नैकट्य, उनकी संगति, ऐसे लोगों के क़रीब रहना जो अन्तःकरण में सत् को धारण किए हुए हैं। ऐसे लोगों का सामीप्य स्वयमेव ही हृदय को निर्विकार कर देता है। तीर्थ का भी बड़ा महत्व है। जहाँ संतों ने साधना की हो, ऐसे स्थान का वातावरण आध्यात्मिकता से भर जाता है। जिस तरह सत्संग तुरतफलदायी है, वैसे ही यथार्थ तीर्थ पर की गयी साधना भी तीव्रता से फल देती है।</p><p>इन सबके अभाव में शरीर व्यर्थ है। अन्याय से अर्जित धन तन और कुल का नाश कर ही देता है। अहंकार भी महापातकी है, जो स्वयं साक्षात् द्वैतबुद्धि का कारण है। उपर्युक्त दान, सत्संग आदि कर्मों के अभाव में मनुष्य सियार की तरह है।</p><p>आइए, देखते हैं <a
href="/chanakya-niti-chapter-13-hindi/">तेरहवें अध्याय</a> की कुछ कड़वी बातें–</p><p><strong>यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम्।<br>स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्त्वा वसेत्सुखम्॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> जिससे स्नेह होता है, उसी का डर भी लगा रहता है। स्नेह ही दुख का आधार है। स्नेह ही दुख का मूल है। स्नेह को त्यागकर ही व्यक्ति सुख से रह सकता है।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> भय का एक ही कारण है, वह है आसक्ति। जहाँ आसक्ति है, वहाँ भय होगा ही। आचार्य चाणक्य के अनुसार दुःख का आधार ही आसक्ति है। फिर सुख पाने का क्या रास्ता है? <a
href="/swami-vivekananda-anasakti-hi-purna-atmatyag-hai-hindi/">अनासक्त ही दुःख का त्याग</a> कर सकता है। अनासक्ति का अर्थ यह नहीं जड़ की तरह होकर सभी संबंध छोड़ दिए जाएँ और व्यक्ति भावहीन हो जाए। अनासक्ति का अर्थ है सभी स्वार्थों को छोड़कर धर्म और परहित के लिए कार्य किया जाए। यह आदर्श है, जो निश्चय ही बहुत दूर जान पड़ता है। ऐसी अनासक्ति पाना एक दिन का कार्य नहीं है। लेकिन इसे स्मरण रखते हुए जीवन में धीरे-धीरे विकसित करने का प्रयास ही दुःखों से परे ले जाता है।</p><figure
class="wp-block-pullquote"><blockquote><p>जीवन में धीरे-धीरे अनासक्ति विकसित करने का प्रयास ही दुःखों से परे ले जाता है।</p></blockquote></figure><p>अब नज़र डालते हैं कि <a
href="/chanakya-niti-chapter-14-hindi/">चौदहवें अध्याय में</a> कौटिल्य के कौन-से कड़वे कथन हैं–</p><p><strong>आत्मापराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम्।<br>दारिद्र्यरोग दुःखानि बन्धनव्यसनानिच॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> दरिद्रता, शारीरिक और मानसिक व्याधि, दुख और बंधन तथा विपत्तियाँ ये सब व्यक्ति के अपने पापरूप वृक्ष के फल हैं।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> प्राचीन काल से ही हमारे यहाँ कर्मफल का सिद्धांत मान्य है। जैसा कर्म होगा, वैसा फल मिलेगा ही मिलेगा। यह पुण्य कर्म के जाएँ, तो अच्छा परिणाम प्राप्त होगा। यदि व्यक्ति पाप कर्म करे, तो दुःख, दारिद्र्य और रोग मिलना स्वाभाविक ही है। अतः बुरे परिणामों से बचने के लिए पाप-रूपी वृक्ष को काट देना चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है।</p><p>आइए, अब चलते हैं <a
href="/chanakya-niti-chapter-15-hindi/">अध्याय 15</a> की ओर–</p><p><strong>खलानां कण्टकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया।<br>उपानामुखभंगो वा दूरतैव विसर्जनम्॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> दुष्टों और कांटों को दूर करने के दो ही उपाय हैं – या तो जूतों से उनका मुंह कुचल दिया जाए अथवा दूर से ही उन्हें त्याग दें।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> दुर्जनों से बचने के दो मार्ग आचार्य चाणक्य यहाँ बता रहे हैं। पहला तरीक़ा तो यह है कि बल का उपयोग किया जाए। दुष्ट लोगों को बल से पराभूत कर दिया जाए। दुष्ट लोग आपको व आपके अपनों को हानि पहुँचाए बिना नहीं रहते हैं। वे राष्ट्र व समाज के लिए भी घातक हैं। ऐसे में उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता है। अतः उन्हें कुचल देना ही उपाय है। किंतु ऐसे में क्या किया जाए जब आप इतने शक्तिशाली न हों कि उन्हें पराजित कर सकें। ऐसे में मात्र एक ही उपाय शेष रहता है। वह उपाय है उनसे दूर रहना। यदि उनकी दृष्टि आपके ऊपर पड़ी, तो अनिष्ट निश्चित ही है। फिर कुछ नहीं किया जा सकता। इसलिए उनका दमन करने की शक्ति के अभाव में उनकी नज़र में आने से बचना ही बुद्धिमानी है।</p><figure
class="wp-block-pullquote"><blockquote><p>दुष्टों और कांटों को दूर करने के दो ही उपाय हैं – या तो जूतों से उनका मुंह कुचल दिया जाए या दूर से ही उन्हें त्याग दें।</p></blockquote></figure><p>आइए, नजर डालते हैं <a
href="/chanakya-niti-chapter-16-hindi/">चाणक्य नीति दर्पण के अध्याय 16</a> पर–</p><p><strong>न निर्मिता केन न दृष्टपूर्वा न श्रूयते हेममयी कुरंगी।<br>तथाऽपि तृष्णा रघुनन्दनस्य विनाशकाले विपरीतबुद्धिः॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> स्वर्ण का मृग (हिरन) न तो किसी के द्वारा निर्मित हुआ, न पहले कभी देखा गया और न किसी से सुना ही गया। फिर भी श्री रामचन्द्र जी की कामना उसे पाने की हुई। ठीक ही है, विनाश का समय आने पर मनुष्य की बुद्धि उल्टी हो जाती है।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> जब ख़राब समय आता है, तो बुद्धि उल्टी चलने लगती है। व्यक्ति हर तरह की ग़लतियाँ करने लगता है। उसका विवेक उसका साथ छोड़ने लगता है। यहाँ आचार्य चाणक्य <a
href="/ramayan-hindi/">रामायण</a> से भगवान् श्रीराम का उदाहरण देते हैं। सोने का हिरन न तो होता है और न ही किसी ने आज तक देखा है। फिर भी ख़राब समय के कारण ही श्रीराम ने ऐसी बात पर विश्वास किया और मृग-रूपी राक्षस के पीछे गए। यदि वे ऐसा न करते, तो न ही माता सीता का हरण होता और न ही भीषण युद्ध होता।</p><p>अब चलते हैं <a
href="/chanakya-niti-chapter-17-hindi/">अंतिम अध्याय 17</a> की तरफ़–</p><p><strong>अशक्तस्तुभवेत्साधुर्ब्रह्मचारी च निर्धनः।<br>व्याधिष्ठो देवभक्तश्च वृद्धा नारी पतिव्रता॥</strong></p><p><strong>भावार्थ –</strong> शक्ति (पौरुष) हीन व्यक्ति ब्रह्मचारी बन जाता है। निर्धन और आजीविका कमाने में अयोग्य व्यक्ति संन्यासी बन जाता है। असाध्य रोगों से ग्रस्त व्यक्ति देवों का उपासक बन जाता है। वृद्ध स्त्री पतिव्रता बन जाती है।</p><p><strong>व्याख्या –</strong> दुनिया में लोग अपनी कमज़ोरियों को ढँकने के लिए उनपर कुछ-न-कुछ मुलम्मा चढ़ा लिया करते हैं। प्रायः देखा गया है कि जो व्यक्ति स्त्रियों को आकृष्ट नहीं कर सकता, वह ब्रह्मचारी होने का ढोंग रचने लगता है। बहुत-से लोग जो धनार्जन नहीं कर सकते या उसके लिए उद्योग नहीं करना चाहते, वे संन्यासी का भेष धरकर यत्र-तत्र घूमते रहते हैं। जो रोगी है, वह तपस्वी होने का नाटक करने लगता है। जिस स्त्री के प्रति वृद्धावस्था के कारण कोई आकृष्ट नहीं होता, वह पतिव्रता होने का ढोंग करने लगती है। ऐसा नहीं है कि सच्चे ब्रह्मचारी, संन्यासी, साधक व पतिव्रता स्त्रियाँ नहीं होते। लेकिन उनसे कई ज़्यादा ढोंग करने वाले होते हैं। बुद्धिमान वह है जो ढोंग को पहचानता हो।</p><p>महाराज चन्द्रगुप्त काल के आचार्य चाणक्य और उनके द्वारा रचित कड़वे वचन जगत प्रसिद्द हैं। इन्हें लोग कौटिल्य के नाम से भी जानते हैं। वे चन्द्रगुप्त मौर्य के महामंत्री और गुरु थे। उन्होंने महाराज के अखंड भारत के सम्राट बनने में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आचार्य चाणक्य ने प्रजा का मार्गदर्शन करने के लिए एक नीति शास्त्र की रचना की थी, जिसे हम चाणक्य नीति के नाम से जानते हैं। चाणक्य के कड़वे वचन इसी नीतिशास्त्र का हिस्सा है। इनके द्वारा रचित कड़वे वचन आज भी लोगों के लिए प्रेरणा का उत्तम स्रोत है। सुनने और पढ़ने में शायद ये अच्छे ना लगते हों और कानों को चुभ भी सकते हैं, परन्तु ये अत्यंत मीठे फल देने वाले होते हैं। जो भी व्यक्ति इन्हें पढ़कर अपने जीवन में समाहित करता है, उसके जीवन को एक नई दिशा अवश्य मिलती है। जीवन की किसी भी कसौटी में चाणक्य नीति और उसमें उल्लेखित कड़वे वचन एकदम सटीक बैठते हैं। हर व्यक्ति को हिंदीपथ के माध्यम से चाणक्य के कड़वे वचन को पढ़कर, अपने जीवन में समाहित करना चाहिए।&nbsp;</p><h2 class="wp-block-heading">आइये जानते हैं जीवन की विविध परिस्थितियों में चाणक्य के विचार</h2><h3 class="wp-block-heading">चाणक्य के कड़वे वचन&nbsp;</h3><ul><li>हर मित्रता के पीछे कोई स्वार्थ ज़रूर होता है- यह कड़वा सच है।&nbsp;</li><li>संसार में न कोई किसी का मित्र न शत्रु होता है,&nbsp; स्वयं के विचार ही इसके लिए उत्तरदायी है।&nbsp;</li><li>जब बुरा समय आता है तो मनुष्य की बुद्धि भी काम नहीं करती है।</li><li>जो अपने धर्म, कर्म को नहीं पहचानता, वह अंधा है।&nbsp;</li><li>किसी भी व्यक्ति को बहुत अधिक ईमानदार नहीं होना चाहिए, सीधे वृक्ष और व्यक्ति पहले काटे जाते हैं।&nbsp;</li></ul><h4 class="wp-block-heading">चाणक्य नीति की बातें&nbsp;</h4><ul><li>अज्ञानी मनुष्य के लिए किताबें और अंधे मनुष्य के लिए दर्पण एक समान ही होते हैं।&nbsp;</li><li>एक अवगुण बहुत से गुणों पर भारी पड़ सकता है।&nbsp;</li><li>शांत व्यक्ति अपने व्यवहार से हर किसी को अपना बना लेता है।&nbsp;</li><li>जिस प्रकार वन की अग्नि चन्दन की लकड़ी को भी जला देती है, उसी प्रकार दुष्ट व्यक्ति किसी का भी अहित कर सकते हैं।&nbsp;</li><li>कभी भी अपने राज़ दूसरों को नहीं बताने चाहिए, यह आपको बर्बाद कर सकता है।&nbsp;</li></ul><h2 class="wp-block-heading">सफलता और असफलता सम्बन्धी चाणक्य के कड़वे वचन&nbsp;</h2><ul><li>ईमानदार व्यक्ति हमेशा प्रसन्न रहता है।</li><li>किस्मत के सहारे चलने वाला व्यक्ति शीघ्र ही बर्बाद हो जाता है।&nbsp;</li><li>बुद्धि से पैसे कमाना आसान है परंतु पैसे से बुद्धि नहीं कमाई जा सकती।&nbsp;</li><li>लक्ष्य प्राप्ति के लिए दुश्मन का सहारा कभी नहीं लेना चाहिए। आपको जीवन भर उसके सामने झुकना पड़ सकता है।&nbsp;</li><li>आलसी मनुष्य का न वर्तमान होता है और न भविष्य।&nbsp;</li></ul><h2 class="wp-block-heading">शिक्षा संबंधी चाणक्य के कड़वे वचन</h2><ul><li>शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है।&nbsp;</li><li>शिक्षा मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र होती है।&nbsp;</li><li>शिक्षित मनुष्य हर जगह सम्मान प्राप्त करता है।&nbsp;</li><li>शिक्षा देने वाला इंसान यदि घटिया भी है तो भी उसे ले लेना चाहिए।</li><li>कोई भी शिक्षक कभी साधारण नहीं होता प्रलय और निर्माण उसकी गोद मे पलते है।&nbsp;</li></ul><h2 class="wp-block-heading">मित्रता संबंधी चाणक्य के कड़वे वचन</h2><ul><li>कपटी मित्र पर कभी विश्वास ना करें।&nbsp;</li><li>अगर कोई व्यक्ति बुरे वक्त में भी आपसे स्नेह करता है तो वही आपका सच्चा मित्र है।&nbsp;</li><li>बुरे वक्त पर काम आने वाला ही सच्चा मित्र होता है।</li><li>मित्रता हमेशा बराबरी वालों से ही करनी चाहिए। यदि आप अपने से अधिक धनी और निर्धन व्यक्ति से मित्रता करते हैं तो आपको इसकी भरपाई करनी पड़ सकती है।&nbsp;</li><li>सही रास्ता न दिखाने वाली मित्रता शत्रुता से अधिक नष्ट कारी हो सकती है।&nbsp;</li></ul><h2 class="wp-block-heading">स्री संबंधी चाणक्य के कड़वे वचन</h2><ul><li>स्री के प्रति आसक्त रहने वाले पुरुष को न स्वर्ग मिलता है, न धर्म-कर्म।&nbsp;</li><li>जो पुरुष पराई स्त्री को माता समान मानता है, वह ज्ञानी होता है।&nbsp;</li><li>सौभाग्य ही स्त्री का आभूषण होता है।</li><li>पुरुष का विवेक और महिला की सुन्दरता, विश्व की सबसे बड़ी ताकत हैं।&nbsp;</li><li>स्त्री का निरीक्षण करने में आलस्य नहीं करना चाहिए क्योंकि उनका मन सैनिक रूप से स्थिर होता है।&nbsp;</li></ul><h2 class="wp-block-heading">&nbsp;धन और धर्म संबंधित चाणक्य के कड़वे वचन</h2><ul><li>सत्य और दान ही धर्म का आधार है।&nbsp;</li><li><a
href="/category/dharma/">धर्म</a> ही संसार की सबसे बड़ी मानवता है।&nbsp;</li><li>अपनी आत्मा को मंदिर बनाइये, क्यूंकि ईश्वर चित्र में नहीं अपितु चरित्र में बसते हैं।&nbsp;</li><li>अगर कुबेर भी आय से अधिक व्यय कर दे तो वह भी कंगाल हो जाता है।&nbsp;</li><li>दूसरे व्यक्ति के धन का लालच आपके नाश का कारण बन सकता है।&nbsp;</li></ul><p>निष्कर्ष&nbsp;</p><p>चाणक्य के एक-एक नीति या कड़वे वचन व्यक्ति के अस्तित्व को प्रभावशाली बनाने में मददगार हो सकते हैं। हमने यहाँ उनके द्वारा रचित कुछ उत्तम विचारों का वर्णन किया है। आशा है कि आचार्य चाणक्य के इन कड़वे अपितु प्रेरणादायक वचनों को पढ़कर आप अपने जीवन में सही बदलाव लाएंगे।</p><p>विदेशों में बसे कुछ हिंदू स्वजनों के आग्रह पर हम चाणक्य के कड़वे वचन श्लोकों को रोमन में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें आशा है कि वे इससे अवश्य लाभान्वित होंगे। पढ़ें श्लोक रोमन में–</p><h2 class="wp-block-heading">Read Chanakya Ke Kadve Vachan Shlok</h2><p><strong>duṣṭā bhāryā śaṭhaṃ mitraṃ bhṛtyaścottaradāyakaḥ।<br>sasarpe ca gṛhe vāso mṛtyureva na saṃśayaḥ॥</strong></p><p><strong>nakhīnāṃ ca nadīnāṃ ca śṛṅgīṇāṃ śastrapāṇinām।<br>viśvāso naiva karttavyaḥ strīṣu rājakuleṣu ca॥</strong></p><p><strong>na viśvaset kumitre ca mitre cā&#8217;pi na viśvaset।<br>kadācit kupitaṃ mitraṃ sarva guhyaṃ prakāśayet॥</strong></p><p><strong>mātā śatruḥ pitā vairī yena bālo na pāṭhitaḥ।<br>na śobhate sabhāmadhye haṃsamadhye bako yathā॥</strong></p><p><strong>lālanād bahavo doṣāstāḍanād bahavo guṇāḥ।<br>tasmātputraṃ ca śiṣyaṃ ca tāḍayenna tu lālayet॥</strong></p><p><strong>atirūpeṇa vai sītā atigarveṇa rāvaṇaḥ।<br>atidānāt valibaddho ati sarvatra varjayet॥</strong></p><p><strong>upasarge&#8217;nyacakre ca durbhikṣe ca bhayāvahe।<br>asādhujanasamparke yaḥ palāyati saḥ jīvati॥</strong></p><p><strong>mūrkhaścirāyurjāto&#8217;pi tasmājjātamṛto vasaḥ।<br>mṛtaḥ sa cā&#8217;lpaduḥkhāya yāvajjīvaṃ jaḍo dahet॥</strong></p><p><strong>tyajeddharmaṃ dayāhīnaṃ vidyāhīnaṃ guruṃ tyajet।<br>tyajetkrodhamukhīṃ bhāryāṃ niḥsnehān bāndhavāṃstyajet॥</strong></p><p><strong>janmamṛtyu hi yātyeko bhunaktyekaḥ śubhā&#8217;śubham।<br>narakeṣu patatyeka eko yāti parāṃ gatim॥</strong></p><p><strong>varaṃ na rājyaṃ na kurājarājyaṃ varaṃ na mitraṃ na kumitramitram।<br>varaṃ na śiṣyo na kuśiṣyaśiṣyo varaṃ na dārā na kudāradārāḥ॥</strong></p><p><strong>hastī aṃkuśamātreṇa vājī hastena tāḍyate।<br>śṛṃgīlakuṭahastena khaḍgahastena durjanaḥ॥</strong></p><p><strong>cāṇḍālānāṃ sahasraiśca sūribhistatvadarśibhiḥ।<br>eko hi yavanaḥ prokto na nīco yavanātparaḥ॥</strong></p><p><strong>nirviṣeṇāpi sarpeṇa kartavyā mahatī phaṇā।<br>viṣamastu na vāpyastu ghaṭāṭopo bhayaṃkaraḥ॥</strong></p><p><strong>yeṣāṃ na vidyā na tapo na dānaṃ jñānaṃ na śīlaṃ na guṇo na dharmaḥ।<br>te martyaloke bhuviḥ bhārabhūtā manuṣyarūpeṇa mṛgāścaranti॥</strong></p><p><strong>na durjanaḥ sādhudaśāmupaiti bahu prakārairapi śikṣyamāṇaḥ।<br>āmūlasiktaṃ payasā ghṛtena na nimbavṛ़kṣoḥ madhuratvameti॥</strong></p><p><strong>hastau dānavarjitau śrutipuṭau sārasvatadrohiṇī<br>netre sādhuvilokarahite pādau na tīrthaṃ gatau।<br>anyāyārjitavittapūrṇamudaraṃ garveṇa tuṃgaṃ śirau<br>re re jambuka muñca-muñca sahasā nīcaṃ sunindyaṃ vapuḥ॥</strong></p><p><strong>yasya sneho bhayaṃ tasya sneho duḥkhasya bhājanam।<br>snehamūlāni duḥkhāni tāni tyaktvā vasetsukham॥</strong></p><p><strong>ātmāparādhavṛkṣasya phalānyetāni dehinām।<br>dāridryaroga duḥkhāni bandhanavyasanānica॥</strong></p><p><strong>khalānāṃ kaṇṭakānāṃ ca dvividhaiva pratikriyā।<br>upānāmukhabhaṃgo vā dūrataiva visarjanam॥</strong></p><p><strong>na nirmitā kena na dṛṣṭapūrvā na śrūyate hemamayī kuraṃgī।<br>tathā&#8217;pi tṛṣṇā raghunandanasya vināśakāle viparītabuddhiḥ॥</strong></p><p><strong>aśaktastubhavetsādhurbrahmacārī ca nirdhanaḥ।<br>vyādhiṣṭho devabhaktaśca vṛddhā nārī pativratā॥</strong></p><h2 class="wp-block-heading">संबंधित लेख</h2><ul><li><a
href="https://hindipath.com/chanakya-niti-sutra-sangrah-hindi/">चाणक्य नीति सूत्र संग्रह</a></li></ul><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/chanakya-ke-kadwe-vachan/">चाणक्य के कड़वे वचन – Chanakya Ke Kadve Vachan</a> appeared first on <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=2638</guid><description><![CDATA[<p>चाणक्य नीति का अध्याय 17 "चाणक्य नीति" का अंतिम अध्याय है। इसके ऊपर चिंतन करना अत्यावश्यक है।</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><em>चाणक्य नीति का अध्याय 17 आचार्य चाणक्य की इस अमर कृति का अंतिम अध्याय है। इसमें आचार्य ने उन अंतिम चीजों पर प्रकाश डाला है, जो उनके अनुसार आवश्यक होती हैं। </em></p><p><em>चाणक्य नीति का अध्याय 17 न केवल पढ़ना जरूरी है, बल्कि इसपर चिंतन करना अत्यावश्यक है। अन्य अध्याय पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ &#8211; <a
href="https://hindipath.com/chanakya-niti-in-hindi-pdf-free-download/"><strong>चाणक्य नीति</strong></a>।</em></p><p><strong>पुस्तकं प्रत्याधीतं नाधीतं गुरुसन्निधौ।<br>सभामध्ये न शोभन्ते जारगर्भा इव स्त्रियः॥१॥</strong><br>जिन्होंने गुरु के चरणों में बैठकर गुरुमुख के द्वारा विद्याध्ययन नहीं किया, वस्तुतः पुस्तक के आधार पर ही पढ़ लिया, वे सभा के बीच में ऐसे ही सुशोभित नहीं होते जैसे व्यभिचार से गर्भधारण करने वाली स्त्री शोभित नहीं होती।</p><p><strong>कृते प्रतिकृतिं कुर्यात् हिंसेन प्रतिहिंसनम्।<br>तत्र दोषो न पतति दुष्टे दौष्ट्यं समाचरेत॥२॥</strong><br>उपकार करने वाले के प्रति उपकार की भावना और हिंसा करने वाले के प्रति हिंसा की भावना रखने पर दोष नहीं होता, कारण दुर्जन के प्रति दुष्टता का आचरण करना चाहिए, वही अच्छा होता है।</p><p><strong>यद् दूरं यद् दुराराध्यं यच्च दूरे व्यवस्थितम्।<br>तत्सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥३॥</strong><br>जो बहुत दूर है, जो कठिनता से होने वाला है और जो बहुत ऊंचाई पर स्थित है, वह सब कुछ तप के द्वारा सिद्ध हो सकता है क्योंकि तप की शक्ति प्रबल होती है।</p><p><strong>लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पताकैः</strong><br><strong>सत्यं यत्तपसा च किं शुचिमनो यद्यस्ति तीर्थेन किम्।<br>सौजन्यं यदि किं गुणैः सुमहिमा यद्यस्ति किं मण्डनैः।<br>सद्विद्या यदि किं धनैरपयशो यद्यस्ति किं मृत्युना ॥४॥</strong><br>यदि लोभ है तो और किसी दुर्गुण की क्या आवश्यकता है? यदि चुगलखोरी का स्वभाव है, तो दूसरे पातकों (पाप) की कमी से क्या काम? और यदि जीवन में सत्य है तो तप करने का क्या अर्थ है? यदि मन पवित्र है, तो जलमय तीर्थों के भ्रमण और स्नान करने से क्या लाभ? यदि सौहार्द प्रेम है तो गुणों की क्या आवश्यकता है? यदि संसार में कीर्ति फैल रही है, तो अन्य आभूषणों से क्या मतलब? यदि श्रेष्ठ विद्या है तो फिर धन की क्या आवश्यकता है? यदि अपयश फैला हुआ है, तो मृत्यु से क्या, अर्थात् वह तो जीते-जी मरा हुआ है।</p><p><strong>पिता रत्नाकरो यस्य लक्ष्मीर्यस्य सहोदरी।<br>शंखो भिक्षाटनं कुर्यान्न दत्तमुपतिष्ठति ॥५॥</strong><br>जिसका पिता रत्नों का भण्डार समुद्र है। जिसकी बहन लक्ष्मी है। शशि की भांति चमकता हुआ ऐसा शंख भी मांगता फिरे, तो समझना चाहिए कि उसने कभी दान और यज्ञ नहीं किया अर्थात् उसने कभी दान नहीं दिया क्योंकि बिना दान दिए धन नहीं मिलता।</p><p><strong>अशक्तस्तुभवेत्साधुर्ब्रह्मचारी च निर्धनः।<br>व्याधिष्ठो देवभक्तश्च वृद्धा नारी पतिव्रता ॥६॥</strong><br>शक्ति (पौरुष) हीन व्यक्ति ब्रह्मचारी बन जाता है। निर्धन और आजीविका कमाने में अयोग्य व्यक्ति <a
href="/swami-vivekananda-sanyasi-meaning-hindi/">संन्यासी</a> बन जाता है। असाध्य रोगों से ग्रस्त व्यक्ति देवों का उपासक बन जाता है। वृद्ध स्त्री पतिव्रता बन जाती है।</p><p><strong>नान्नोदकसमं दानं न तिथिर्द्वादशी समा।<br>न गायत्र्याः परो मन्त्रो न मातुर्दैवतं परम् ॥७॥</strong><br>अन्न और जल की भांति और कोई दान नहीं है । द्वादशी के समान कोई तिथि नहीं है। <a
href="/gayatri-chalisa-in-hindi/">गायत्री</a> मंत्र से बढ़कर कोई मंत्र नहीं है और माता से श्रेष्ठ कोई देवता नहीं है।</p><p><strong>तक्षकस्य विषं दन्ते मक्षिकाया मुखे विषम्।<br>वृश्चिकस्य विषं पुच्छे सर्वांगे दुर्जने विषम् ॥८॥</strong><br>सर्प के दाँत में, मक्खी के मस्तक में, बिच्छू की पूंछ में विष होता है, किन्तु दुष्ट मनुष्य के अंग-अंग में विष भरा रहता है।</p><p><strong>पत्युराज्ञां विना नारी उपोष्य व्रतचारिणी।<br>आयुष्य हरते भर्तुः सा नारी नरकं व्रजेत् ॥९॥</strong><br>पति की आज्ञा के बिना उपवास इत्यादि करने वाली स्त्री पति की आयु को नष्ट करती है और स्वयं भी नरक में जाती है। वह महान कष्ट उठाती है तथा दुख भोगती है।</p><p><strong>न दानैः शुद्ध्यते नारी नोपवासशतैरपि।<br>न तीर्थसेवया तद्वद् भतुः पदोदकैर्यथा ॥१०॥</strong><br>स्त्री विभिन्न प्रकार के दान देने से शुद्ध नहीं होती। सैंकड़ों उपवास करने से भी शुद्ध नहीं होती और सैंकड़ों तीर्थों का सेवन करने से भी वैसी शुद्ध नहीं होती जैसी वह पति का चरणोदक लेने से और चरण सेवा करने से पवित्र होती है।</p><p><strong>दानेन पाणिर्न तु कंकणेन स्नानेन शुद्धिर्न तु चन्दनेन।<br>मानेन तृप्तिर्न तु भोजनेन ज्ञानेन मुक्तिर्न तु मंडनेन ॥११॥</strong><br>दान करने से हाथ की शोभा होती है, न कि कंगन धारण करने से। शरीर की शुद्धि स्नान से होती है न कि शरीर को लीप-पोतकर चन्दन लगाने से। मनुष्य की तृप्ति सम्मान से होती है न कि भोजन से। मुक्ति का मार्ग ज्ञान है न कि तिलक धारण करके आडम्बर करने से।</p><p><strong>नापितस्य गृहे क्षौरं पाषाणे गन्धलेपनम्।<br>आत्मरूपं जले पश्यन् शक्रस्यापि श्रियं हरेत्। ॥१२॥</strong><br>नाई के घर पर जाकर बाल बनाना, पत्थर पर चन्दन आदि सुगन्धित द्रव्य लगाना और अपने रूप, प्रतिबिम्ब को जल में देखना ये कार्य इन्द्र की शोभा को भी नष्ट कर देते हैं।</p><p><strong>सद्यः प्रज्ञाहरा तुण्डी सद्यः प्रज्ञाकरी वचा।<br>सद्यः शक्तिहरा नारी सद्यः शक्तिकरं पयः। ॥१३॥</strong><br>कुन्दरू शीघ्र ही बुद्धि को नष्ट करने वाला है। वच शीघ्र ही बुद्धि को बढ़ाने वाली है। स्त्री शीघ्र ही शक्ति को हरण करने वाली है और दूध अतिशीघ्र बल प्रदान करने वाला है।</p><p><strong>यदि रामा यदि च रमा यदि तनयो विनयगुणोपेतः।<br>तनयो तनयोत्पत्तिः सुखररनगरे किमाधिक्यम् ॥१४॥</strong><br>यदि घर में सुन्दरी, सती-साध्वी पत्नी है और पर्याप्त धन-सम्पत्ति है, विनयशील पुत्र है और यदि पुत्र के घर भी पुत्र की उत्पत्ति हो गई है तो स्वर्ग में इससे अधिक क्या मिलेगा?</p><p><strong>आहारनिद्रा भय मैथुरानि समानि चैतानि नृणां पशूनाम्।<br>ज्ञाने नराणामधिको विशेषो ज्ञानेन हीना पशुभिः समानाः ॥१५॥</strong><br>भोजन करना, निद्रा लेना, भयभीत होना और मैथुन करना, मनुष्यों और पशुओं की ये चार बातें समान हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो मनुष्य और पशु में कोई खास अन्तर नहीं है, परन्तु मनुष्य को पशुओं से अलग करने दाला एक ही गुण है और वह है विवेक। इसीलिए विवेकहीन मनुष्य को पशु सम कहा जाता है।</p><p><strong>दानार्थिनो मधुकरा यदि कर्णतालै<br>दूरीकृता करिवरेण मदान्धबुद्ध्या।<br>तस्यैव गंडयुगमंडनहानिरेव<br>भृंगाः पुनर्विकचपद्मवने वसन्ति ॥१६॥</strong><br>यदि मदान्ध बुद्धि वाले करिवरेण श्रेष्ठ गजराज (हाथी) ने गजमद की इच्छा से आए हुए भौरों को अपने कानों को फड़फड़ाकर दूर हटा दिया, तो यह उस हाथी के ही दोनों गण्ड-स्थलों की शोभा की हानि हुई। भौंरे तो पुनः फिर विकसित कमल वन में जाकर रहने लगते हैं।</p><p><strong>राजा वेश्या यमश्चाग्निः चौराः बालक याचकाः<br>परदुःखं न जानन्ति अष्टमो ग्रामकण्टकाः ॥१७॥</strong><br>राजा, वेश्या, <a
href="/yamraj-ki-aarti/">यमराज</a>, <a
href="/tag/agni/">अग्नि</a>, चोर, बालक तथा याचक और आठवां ग्रामकंटक (ग्रामवासियों को पीड़ा देकर अपना निर्वाह करने वाला) ये दूसरे के दुख को नहीं जानते।</p><p><strong>अधः पश्यसि किं बाले पतितं तव किं भुवि।<br>रे रे मूर्ख न जानासि गतं तारुण्यमौक्तिकम्। ॥१८॥</strong><br>किसी बहुत बूढ़ी स्त्री को जिसकी कमर झुक गई है, यह देखकर, कोई लड़का व्यंग्य बाण छोड़ते हुए पूछता है- “हे नव तरुणी! नीचे क्या देखती है, दूंढती है? तेरा भूमि पर क्या गिर पड़ा है, तेरा क्या खो गया है?” इस व्यंग्य बाण को सुनकर बूढ़ी स्त्री बोली- &#8220;अरे ओ मूर्ख! तू नहीं जानता कि मेरा यौवनरूपी मोती खो गया है। मैं उसी को ढूंढ रही हूँ।&#8221;</p><p><strong>व्यालाश्रयापि विफलापि सकण्टकापि<br>वक्रापि पंकसहितापि दुरासदापि।<br>गन्धेन बन्धुरसि केतकि सर्वजन्तो-<br>रेको गुणः खलु निहन्ति समस्तदोषान् ॥१९ ॥</strong><br>हे केतकि! यद्यपि तू सर्पो का घर है. फलों से रहित है, तुझ में कांटे हैं, साथ ही टेढ़ी भी है, तू पैदा भी कीचड़ में होती है, तू मिलती भी मुश्किल से है। इतना सब कुछ होने पर भी तू अपने गन्ध और गुण की वजह से सब प्राणियों की प्रिय बन रही है। इससे पता चलता है कि एक गुण सारे दोषों को नष्ट कर देता है।</p><p><strong>यौवनं धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकता।<br>एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम् ॥२०॥</strong><br>जवानी, धन-सम्पत्ति की अधिकता, अधिकार और विवेकहीनता इन चारों में से प्रत्येक बात अकेली ही मनुष्य को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। परन्तु यदि कहीं ये चारों इकट्ठे हों अर्थात् मनुष्य युवा भी हो, उसके पास पैसा भी हो और वह अपनी इच्छानुसार काम करने वाला भी हो अर्थात् उसके काम में उसे टोकने वाला भी कोई न हो और फिर दुर्भाग्यवश उसमें विचारबुद्धि भी न हो तो मनुष्य के विनाश होने में एक पल भी नहीं लगता।</p><p><strong>परोपकरणं येषां जागर्ति हृदये सताम्।<br>नश्यन्ति विपदस्तेषां सम्पदः स्यु पदे-पदे ॥२१॥</strong><br>जिन सज्जन पुरुषों के हृदय में परोपकार करने की भावना सदा जाग्रत रहती है, उनकी आपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं और हरेक कदम पर सम्पत्ति की प्राप्ति होती है।</p><p>यह अंतिम अध्याय अर्थात् चाणक्य नीति का अध्याय 17 आपको कैसा लगा, कृपया टिप्पणी करके हमें जरूर बताएँ।</p><h2 class="wp-block-heading">संबंधित लेख</h2><ul><li><a
href="/chanakya-ke-kadwe-vachan/">चाणक्य के कड़वे वचन</a></li><li><a
href="https://hindipath.com/chanakya-niti-sutra-sangrah-hindi/">चाणक्य नीति सूत्र संग्रह</a></li></ul><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=2628</guid><description><![CDATA[<p>चाणक्य नीति का सोलहवाँ अध्याय बहुत ही गहन है। गंभीरता पूर्वक इसका जितना अध्ययन किया जाए, वह कम है।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/chanakya-niti-chapter-16-hindi/">चाणक्य नीति का सोलहवाँ अध्याय</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>चाणक्य नीति का सोलहवाँ अध्याय बहुत ही गहन है। गंभीरता पूर्वक इसका जितना अध्ययन किया जाए, वह कम है। प्रत्येक गंभीर अध्येता को चाणक्य नीति का सोलहवाँ अध्याय जरूर पढ़ना चाहिए, जो व्यावहारिक ज्ञान का कोष है।</p><p>अन्य अध्याय पढ़ने व विषय-सूची देखने के लिए कृपया यहाँ जाएँ &#8211; <a
href="https://hindipath.com/chanakya-niti-in-hindi-pdf-free-download/"><strong>चाणक्य नीति</strong></a>।</p><p><strong>न ध्यातं पदमीश्वरस्य विधिवत्संसारविच्छित्तये<br>स्वर्गद्वारकृपाटपाटनपटुः धर्माेऽपि नोपार्जितः।<br>नारीपीनपयोधरयुगलं स्वप्नेऽपि नार्लिगितं<br>मातुः केवलमेव यौवनच्छेदकुठारो वयम् ॥१॥</strong><br>जिसने संसार सागर में उद्धार के लिए न तो विधिपूर्वक श्री नारायण की आराधना की, न जप-तप योगादि किए, न स्वर्ग का द्वार खोलने के लिए धर्म-संग्रह किया, न ही यथार्थ में तो क्या स्वप्न में भी किसी रमणी के स्तनों और जांघों का आलिंगन किया, ऐसे लोग जिन्होंने न तो इस लोक में सुख भोगा और न ही परलोक में सुख का कोई साधन किया। ऐसे लोगों का जन्म तो माँ के यौवन रूपी उपवन का काटकर नष्ट कर देने वाली कुल्हाड़ी है।</p><p><strong>जल्पन्ति सार्धमन्येन पश्यन्त्यन्यं सविभ्रमाः।<br>हृदये चिन्तयन्त्यन्यं न स्त्रीणामेकतो रतिः॥२॥</strong><br>कुल्टा स्त्रियों बातचीत किसी के साथ करती हैं, हाव-भाव के साथ विलास पूर्वक देखती अन्य को हैं और हृदय में और ही किसी का चिन्तन करती हैं। कुलटाओं, वेश्याओं की एक से चाहत नहीं होती।</p><p><strong>यो मोहयन्मन्यते मूढो रत्तेयं मयि कामिनी।<br>स तस्य वशगो भूत्वा नृत्येत क्रीडा शकुन्तवत् ॥३॥</strong><br>जो व्यक्ति अविवेक के कारण ऐसा समझता है कि यह मनोहर और सुन्दर स्त्री मुझ से मोहित है, वह व्यक्ति उसके वशीभूत होकर मनोरंजन के लिए पाले गए पक्षी की भांति उसके इशारों पर नाचा करता है।</p><p><strong>कोऽर्थान्प्राप्य न गर्वितो विषयिणः कस्यापदोऽस्तंगताः।<br>स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं भुवि मनः को नाम राज्ञप्रियः।।<br>कः कालस्य न गोचरत्वमगमत् कोऽर्थो गतो गौरवम्।<br>को वा दुर्जनदुर्गुणेषु पतितः क्षेमेण यातः पथिः ॥४॥</strong><br>इस संसार में कोई ऐसा मनुष्य नहीं हुआ जो धन-ऐश्वर्य पाकर अहंकार ग्रस्त न हुआ हो। विषय भोगी ऐसा कोई नहीं जिसे संकटों का सामना न करना पड़ा हो। ऐसा कोई प्राणी नहीं हुआ जिसे रूपवतियों ने अपने वश में न किया हो। ऐसा कोई प्राणी नहीं जो राजा द्वारा सदा ही सम्मानित किया गया हो। ऐसा कोई प्राणी नहीं जो पैदा तो हुआ हो, किन्तु मृत्यु को प्राप्त न हुआ हो। ऐसा कोई प्राणी नहीं हुआ जो कभी याचक न बना हो। ऐसा कोई प्राणी नहीं जो दुर्जनों द्वारा सताया न गया हो अथवा जिसने दुर्गुण न अपनाए हों।</p><p><strong>न निर्मिता केन न दृष्टपूर्वा न श्रूयते हेममयी कुरंगी।<br>तथाऽपि तृष्णा रघुनन्दनस्य विनाशकाले विपरीतबुद्धिः ॥५॥</strong><br>स्वर्ण का मृग (हिरन) न तो किसी के द्वारा निर्मित हुआ, न पहले कभी देखा गया और न किसी से सुना ही गया। फिर भी श्री रामचन्द्र जी की कामना उसे पाने की हुई। ठीक ही है, विनाश का समय आने पर मनुष्य की बुद्धि उल्टी हो जाती है।</p><p><strong>गुणैरुत्तमतां यान्ति नौच्चैरासनसंस्थितैः।<br>प्रसादशिखरस्थोऽपि किं काको गरुडायतेम ॥६॥</strong><br>ऊँचे स्थान पर बैठने से कोई ऊँचा नहीं हो जाता। गुणवान ही ऊँचा माना जाता है। महल की अटारी पर बैठने से कौआ, गरुड़ नहीं कहलाने लगता।</p><p><strong>गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते न महत्योऽपि सम्पदः।<br>पूर्णेन्दु किं तथा वन्द्यो निष्कलंको यथा कुशः ॥७॥</strong><br>सभी स्थानों पर व्यक्ति के गुणों की पूजा होती है, गुणों का आदर-सम्मान होता है। सम्पत्ति होने पर भी गुणहीन व्यक्ति का सत्कार नहीं होता। पूर्ण चन्द्र (पूर्णिमा का) क्या वैसा दिखाई देता है, जैसा बहुत मामूली प्रकाश वाला किन्तु धब्बों से रहित द्वितीया का <a
href="/chandra-dev-mantra-katha-upay/">चन्द्रमा</a>? आचार्य चाणक्य कहते हैं कि कभी नहीं, ऐसा कभी नहीं होता।</p><p><strong>परमोक्तगुणो यस्तु निर्गुणोऽपि गुणी भवेत्।<br>इन्द्रोऽपि लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गुणैः ॥८॥</strong><br>जिसके गुणों की प्रशंसा दूसरे लोग करते हैं, वह अल्पगुणी होने पर भी गुणवान माना जाएगा। किन्तु पूर्णगुणी होने पर भी जो स्वयं अपने गुणों की चर्चा करता है वह गुणहीन ही माना जाएगा, चाहे वह साक्षात इन्द्र ही क्यों न हो।</p><p><strong>विवेकिमनुप्राप्तो गुणो याति मनोज्ञताम्।<br>सुतरां रत्नमाभाति चामीकरनियोजितम् ॥९॥</strong><br>गुण, सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म, कर्तव्य अकर्तव्य को समझने वाले विवेकी व्यक्ति को पाकर सुन्दरता को प्राप्त करते हैं, खिल उठते हैं, सोने में जड़ा हुआ हीरा बहुत सुन्दर प्रतीत होता है।</p><p><strong>गुणं सर्वत्र तुल्योऽपि सीदत्येको निराश्रयः।<br>अनर्घ्यमपि माणिक्यं हे माश्रयमपेक्षते ॥१०॥</strong><br>गुणों से सर्वज्ञ ईश्वर के समान होता हुआ भी आश्रयहीन अकेला व्यक्ति दुख उठाता है। अत्यन्त मूल्यवान माणिक्य भी स्वर्ण में जड़े जाने की अपेक्षा रखता है।</p><p><strong>अतिक्लेशेन ये चार्थाः धर्मस्यातिक्रमेण तु।<br>शत्रुणां प्रणिपातेन ते ह्यर्थाः न भवन्तु मे ॥११॥</strong><br>जो धन अन्यों को हानि तथा पीड़ा पहुंचाकर, धर्म का उल्लंघन करके और शत्रु के सामने झुकने से प्राप्त होता है, ऐसा धन मुझे नहीं चाहिए।</p><p><strong>किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला।<br>या तु वेश्यैव सामान्यपथिकैरपि भुज्यते ॥१२॥</strong><br>उस धन-सम्पत्ति से क्या लाभ है जो घर की वधू के समान एक के उपयोग के लिए है। जो सम्पत्ति वेश्या के समान न केवल नागरिकों बल्कि पथिकों द्वारा भी भोगी जाती है, उसी धन-सम्पत्ति को श्रेष्ठ माना गया है।</p><p><strong>धनेषु जीवितव्येषु स्त्रीषु चाहारकर्मषु।<br>अतृप्ता प्राणिनः सर्वे याता यास्यन्ति यान्ति च ॥१३॥</strong><br>धन, जीवन, स्त्री सेवन और अन्न सेवन के विषय में सभी मनुष्य अतृप्त रहकर गए हैं, जाएंगे और जाते हैं।</p><p><strong>क्षीयन्ते सर्वदानानि यज्ञहोमबलि क्रियाः।<br>न क्षीयते पात्रदानं भयं सर्वदेहिनाम् ॥१४॥</strong><br>अन्न, जल, वस्त्र, भूमि आदि का दान तथा यज्ञ, होम और बलिदान ये सभी कर्मफल भोग के उपरान्त नष्ट हो जाते हैं, किन्तु सुपात्र को दिया हुआ दान और जीवों को दिया गया अभयदान कभी नष्ट नहीं होता।</p><p><strong>तृणं लघु तृणात्तूलं तूलादपि च याचकः।<br>वायुना किं न जीतोऽसौ मामयं याचयिष्यति ॥१५॥</strong><br>तिनका बहुत हल्का होता है किन्तु तिनके से भी रूई हल्की होती है और रूई से भी हल्का होता है याचक (माँगने वाला)। यदि ऐसा है तो वह याचक हवा के द्वारा क्यों नहीं उड़ाया जाता अर्थात् हवा उसे उड़ाकर क्यों नहीं ले जाती? यह याचक मुझसे भी कुछ मांगेगा, इस भय से हवा उसे उड़ाकर नहीं ले जाती।</p><p><strong>वरं वनं व्याघ्रजेन्द्रसेवितं, द्रुमालयं पक्वाफलाम्बुसेवनं।<br>तृणेषु शय्या शतजीर्णवल्कलं, न बन्धुमध्ये धनहीन जीवनम् ॥१६॥</strong><br>अपमान सहकर जीने से मर जाना अच्छा है, क्योंकि मृत्यु के समय क्षणभर के लिए दुःख होता है किन्तु अपमान होने पर नित्य दुख और क्लेश होता है।</p><p><strong>प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति मानवाः।<br>तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥१७॥</strong><br>मधुर वचन बोलने से सब मनुष्य प्रसन्न और सन्तुष्ट होते हैं। अतः मधुर वचन ही बोलना चाहिए, क्योंकि वचनों में क्या दरिद्रता?</p><p><strong>संसार कटु वृक्षस्य द्वे फले ह्यमृतोपमे।<br>सुभाषितं च सुस्वादुः संगति सज्जने जने ॥१८॥</strong><br>संसार रूपी विष वृक्ष पर अमृत तुल्य दो ही फल हैं जो मनुष्य को ग्रहण करने चाहिए सुभाषित अर्थात् अच्छी वाणी एवं सुसंगति-सज्जनों का संग।</p><p><strong>जन्मजन्मनि चाभ्यस्तं दानमध्ययनं तपः।<br>तेनैवाभ्यासयोगेन देही वाऽभ्यस्यते ॥१९॥</strong><br>जन्म-जन्मान्तर में मनुष्य ने जिस दान, विद्याध्ययन और तप का अभ्यास किया है, उस ही अभ्यास के योग से वह फिर उसी का अभ्यास करता है।</p><p><strong>पुस्तकेषु च या विद्या परहस्तेषु च यद्धनम्।<br>उत्पन्नेषु च कार्येषु न सा विद्या न तद्धनम् ॥२०॥</strong><br>पुस्तकों में कैद विद्या और दूसरों के हाथों में गया धन, व्यक्ति के किसी काम नहीं आते।</p><p>चाणक्य नीति का सोलहवाँ अध्याय आपको कैसा लगा, कृपया टिप्पणी करके हमें अवश्य बताएँ।</p><h2 class="wp-block-heading">संबंधित लेख</h2><ul><li><a
href="/chanakya-ke-kadwe-vachan/">चाणक्य के कड़वे वचन</a></li><li><a
href="https://hindipath.com/chanakya-niti-sutra-sangrah-hindi/">चाणक्य नीति सूत्र संग्रह</a></li></ul><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=2617</guid><description><![CDATA[<p>चाणक्य नीति का अध्याय 15 आपके समक्ष प्रस्तुत करते हुए हमें हर्ष का अनुभव हो रहा है। यह अध्याय ज्ञान और व्यावहारिक सूझ-बूझ से भरपूर है।</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><em>चाणक्य नीति का अध्याय 15 आपके समक्ष प्रस्तुत करते हुए हमें हर्ष का अनुभव हो रहा है। यह अध्याय ज्ञान और व्यावहारिक सूझ-बूझ से भरपूर है। </em></p><p><em>चाणक्य नीति का अध्याय 15 आपको जीवन के विभिन्न आयामों से परिचित कराता है, जो एक सफल जीवन जीने के लिए आवश्यक हैं। अन्य अध्याय पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ &#8211; <a
href="https://hindipath.com/chanakya-niti-in-hindi-pdf-free-download/"><strong>चाणक्य नीति</strong></a>।</em></p><p><strong>यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु।<br>तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटा भस्मलेपनैः॥१॥</strong><br>जिसके चित्त में सभी प्राणियों के लिए दयाभाव है, उसे शरीर पर भस्म लगाने, जटाएँ बढ़ाने, अतिरिक्त ज्ञान प्राप्त करने अथवा मोक्ष के लिए प्रयत्न करने की क्या आवश्यकता है?</p><p><strong>एकमेवाक्षरं यस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत्।<br>पृथिव्यां नास्ति तद्द्रव्यं यद् दत्त्वा चाऽनृपी भवेत्॥२॥</strong><br>जो गुरु अपने शिष्य को एक अक्षर ॐ अर्थात् ईश्वर का भली-भाँति ज्ञान करा देता है, शिष्य कभी भी ऐसे गुरु के ऋण को नहीं उतार सकते। जगत में ऐसी कोई वस्तु नहीं अथवा धन नहीं जिसे गुरु को देकर शिष्य गुरु के ऋण से मुक्त हो जाए।</p><p><strong>खलानां कण्टकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया।<br>उपानामुखभंगो वा दूरतैव विसर्जनम्॥३॥</strong><br>दुष्टों और कांटों को दूर करने के दो ही उपाय हैं – या तो जूतों से उनका मुंह कुचल दिया जाए अथवा दूर से ही उन्हें त्याग दें।</p><p><strong>कुचैलिनं दन्तमलोपधारिणं बह्वाशिनं निष्ठुरभाषितं च।<br>सूर्योदये चास्तमिते शयानं विमुञ्चतेश्रीर्यदि चक्राणिः॥४॥</strong><br>गन्दे वस्त्र पहनने वाले को, गन्दे दांतों वाले को, बहुत भोजन करने वाले को, कठोर कड़वे वचन बोलने वाले को, <a
href="/surya-dev-mantra-katha-upay/">सूर्योदय</a> के बाद और <a
href="/surya-chalisa-in-hindi/">सूर्यास्त</a> के समय सोने वाले को <a
href="/lakshmi-ji-ki-aarti/">लक्ष्मी</a> त्याग देती है, चाहे वह विष्णु ही क्यों न हो।</p><p><strong>त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं, दाराश्च भृत्याश्च सुहृज्जनाश्च।<br>तंचार्थवन्तं पुनराश्रयन्ते, ह्यर्थो हि लोके पुरुषस्य बन्धुः॥५॥</strong><br>धन से विहीन व्यक्ति को उसके मित्र, नौकर चाकर, बन्धु-बान्धव, घर की स्त्रियाँ, यहाँ तक कि पत्नी भी त्याग देती है।</p><p><strong>अन्यायोपार्जितं वित्तं दशवर्षाणि तिष्ठति।<br>प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं तद् विनश्यति॥६॥</strong><br>अन्याय, अधर्म, अनीति से कमाया हुआ धन दस वर्ष तक रहता है और ग्यारहवें वर्ष के प्रारम्भ में ब्याज और मूल सहित नष्ट हो जाता है।</p><p><strong>अयुक्तस्वामिनो युक्तं युक्तं नीचस्य दूषणम्।<br>अमृतं राहवे मृत्युर्विषं शंकरभूषणम्॥७॥</strong><br>समर्थ व्यक्ति का अयोग्य अथवा अनुचित कार्य भी अच्छा ही होता है और छोटे व्यक्ति का उत्तम कार्य भी दोषयुक्त होता है। राहु के लिए अमृत भी मृत्यु का कारण बना और प्राणघातक विष शिव के कण्ठ का आभूषण हो गया।</p><p><strong>तद् भोजनं यद् द्विज भुक्तशेषं तत्सौहृदं यत्क्रियते परस्मिन्।<br>सा प्राज्ञता या न करोति पापं दम्भं विना यः क्रियते स धर्मः॥८॥</strong><br>द्विज के भोजन के पश्चात् शेष बचने वाला भोजन ही उत्तम भोजन है, दूसरों पर लुटाया जाने वाला स्नेह ही स्नेह है। बुद्धिमान वही है जो पाप कर्म से दूर है और जिसमें अहंकार नहीं वही धर्म श्रेष्ठ है।</p><p><strong>मणिर्लुण्ठति पादाग्रे कांचः शिरसि धार्यते।<br>क्रय-विक्रयवेलायां कायः कांचो मणिर्णणिः॥९॥</strong><br>मणि यदि पैरों में भी लुढ़कती रहे और कांच को सिर पर धारण कर लिया जाए तब भी क्रय-विक्रय के समय मणि का मूल्य, काँच के मूल्य से श्रेष्ठ ही होगा।</p><p><strong>अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्या अल्पं च कालो बहुविघ्नता च।<br>असारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥१०॥</strong><br>वेद शास्त्र अनन्त हैं और विद्याएँ भी बहुत-सी हैं। निश्चय ही समय बहुत कम है और विघ्न बहुत हैं। इसलिए इन शास्त्रों में जो सार तत्व हो वही ग्रहण करने योग्य है, जैसे हंस दूध और पानी के मिश्रण में से दूध ही ग्रहण कर लेता है।</p><p><strong>दूरादागतं पथिश्रान्तं वृथा च गृहमागतम्।<br>अनर्चयित्वा यो भुंक्ते स वै चाण्डाल उच्यते।॥११॥</strong><br>दूर से चलकर आने वाले, थके हुए, बिना किसी स्वार्थ के घर आए हुए अतिथि का आदर-सत्कार किए बिना जो गृहस्वामी स्वयं भोजन कर लेता है, निश्चय ही वह चाण्डाल कहलाने के योग्य है।</p><p><strong>पठन्ति चतुरो वेदान् धर्मशास्त्राण्यनेकशः।<br>आत्मानं नैव जानन्ति दर्वी पाकर सं यथा।॥१२॥</strong><br>चारों वेदों तथा बहुत से धर्मशास्त्रों को पढ़कर भी जो व्यक्ति आत्मा और परमात्मा को नहीं जानते, उनकी गति उस कड़छी की भांति है, जो रसदार शाक में भी उसके स्वाद से वंचित रह जाती है।</p><p><strong>धन्या द्विजमयीं नौका विपरीता भवार्णवे।<br>तरन्त्यधोगता सर्वे उपस्थिता पतन्त्येव हि।॥१३॥</strong><br>यह द्विज रूपी नौका धन्य है, जो संसाररूपी समुद्र में उल्टी रीति से चलती है। उल्टी रीति क्या है? इसके नीचे रहने वाले सब तर जाते हैं, भव-सागर से पार हो जाते हैं, किन्तु ऊपर रहने वाले नीचे गिर जाते हैं।</p><p><strong>अयममृतणनिधानं नायको औषधीनां<br>अमृतमयशरीरः कान्तियुक्तोऽपि चन्द्रः।<br>भवति विगतरश्मिर्मण्डले प्राप्य भानोः<br>परसदननिविष्टः को न लघुत्वं याति।॥१४॥</strong><br><a
href="/chandra-dev-mantra-katha-upay/">चन्द्रमा</a> अमृत का भण्डार है, औषधियों को रसयुक्त करने वाला होने से उनका अधिपति है। समुद्र से लक्ष्मी जी के साथ उत्पन्न होने के कारण उनका भाई है। अत्यन्त चमकीला होने के कारण तेजवान है, किन्तु <a
href="/surya-dev-ki-aarti/">सूर्यमण्डल</a> में पहुंचते ही वह निस्तेज हो जाता है। सच है दूसरे के घर जाकर कौन लघुता को प्राप्त नहीं होता।</p><p><strong>अलिरयं नलिनिदलमध्यमः कमलिनीमकरन्दमदालसः।<br>विधिवशात्प्रदेशमुपागतः कुरजपुष्परसं बहु मन्यते।॥१५॥</strong><br>भौंरा जब कमलिनी के मध्य में रहता था, तब कमलिनी के पराग के रस का पान कर उसके मद में अलसाया रहता था। किन्तु अब कालवश परदेश में आकर कुटज के फूल के रस को ही बहुत मानता है, जिसमें न रस है और न गन्ध।</p><p><strong>पीतः क्रुद्धेन तातश्चरणतलहतो वल्लभोऽयेन रोषा<br>अबाल्याद्विप्रवर्यैः स्ववदनविवरे धार्यते वैरिणी मे।<br>गेहं मे छेदयन्ति प्रतिदिवसममाकान्त पूजानिमित्तात्<br>तस्मात् खिन्ना सदाऽहं द्विज कुलनिलयं नाथ युक्तं त्यजामि।॥१६॥</strong></p><p>अगस्त्य ऋषि ने रुष्ट होकर मेरे पिता समुद्र को पी डाला, विप्रवर ऋषि भृगु ने क्रोध में मेरे प्राणप्रिय पति <a
href="/vishnu-chalisa-in-hindi/">विष्णु</a> को लात मारी, श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा बाल्यकाल से ही अपने मुखरूपी विवर (छिद्र) में मेरी सौत (सरस्वती) धारण की जाती है और जो प्रतिदिन पार्वती के पति <a
href="/shiv-chalisa-lyrics-in-hindi-pdf/">शिव</a> की पूजा के लिए मेरे गृह (कमल) को तोड़ते हैं, उजाड़ते हैं। हे स्वामिन! इन कारणों से खिन्न होकर मैं ब्राह्मणों के गृह को सदा ठीक ही छोड़े रहती हूँ।</p><p><strong>बन्धनानि खलु सन्ति बहूनि प्रेमरज्जुकृतबन्धनमन्यत्।<br>दारुभेदनिपुणोऽपि षडंघ्रि-र्निष्क्रियो भवति पंकजकोशे।॥१७॥</strong><br>बन्धन तो निश्चय ही बहुत से हैं, किन्तु प्रेम रूपी रस्सी का बंधन अत्यन्त दृढ़ होता है। काठ को छेदने में कुशल भँवरा भी कमल के पुष्प में बन्द होकर चेष्टारहित हो जाता है। कमल के साथ अत्यन्त स्नेह होने के कारण उसे छेदने में समर्थ होने पर भी उसे नहीं छेदता।</p><p><strong>छिन्नोऽपि चन्दनतरुर्न जहाति गन्धं<br>वृद्धोऽपि वारणपतिर्न जहाति लीलानम्।<br>यन्त्रार्पितो मधुरतां न जहार्ति चेक्षु<br>क्षणोऽपि न त्यजति शीलगुणान्कुकुलीनः।॥१८॥</strong><br>कटा हुआ भी चन्दन का वृक्ष अपनी सुगन्ध को नहीं छोड़ता। बूढ़ा हाथी भी विलास लीला (काम-क्रीड़ा) को नहीं छोड़ता और ईख कोल्हू में पेरे जाने पर भी अपने मिठास को नहीं छोड़ती, इसी प्रकार कुलीन व्यक्ति धनहीन, दरिद्र होने पर भी दया, दाक्षिण्य (चतुरता) आदि गुणों को नहीं छोड़ता।</p><p><strong>उर्ध्या कोऽपि महीधरो लघुतरो दोर्म्यां धृतौ लीलया<br>तेन त्वं दिवि भूतले च सततं गोवर्धनो गीयसे।<br>त्वां त्रैलोक्यधरं वहायि कुचयोरग्रेण नो गण्यते<br>किं वा केशव भाषणेन बहुना पुण्यं यशसा लभ्यते।॥१९॥</strong><br><a
href="/krishn-chalisa-in-hindi/">भगवान् कृष्ण</a> ने गोवर्धन पर्वत को एक उंगली पर उठा लिया, जिससे वे गिरधारी कहलाये। उनके इस कार्य से गोवर्धन पर्वत को भी यश मिला। किंतु गोपियों ने <a
href="/gopal-chalisa-hindi/">कन्हैया</a> को अपनी छाती से लगा-लगा कर बहुत खिलाया, लेकिन उनका नाम कोई भी नहीं जानता है। अतः कीर्ति भी भाग्य से ही मिलती है।</p><p>चाणक्य नीति का अध्याय 15 आपको कैसा लगा, हमें टिप्पणी करके अवश्य बताएँ।</p><h2 class="wp-block-heading">संबंधित लेख</h2><ul><li><a
href="/chanakya-ke-kadwe-vachan/">चाणक्य के कड़वे वचन</a></li><li><a
href="https://hindipath.com/chanakya-niti-sutra-sangrah-hindi/">चाणक्य नीति सूत्र संग्रह</a></li></ul><p></p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=2499</guid><description><![CDATA[<p>चाणक्य नीति का चतुर्दश अध्याय गागर में सागर की तरह है। यह ज्ञान की बहुत-सी भिन्न-भिन्न धाराओं को छूता है।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/chanakya-niti-chapter-14-hindi/">चाणक्य नीति का चतुर्दश अध्याय</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><em>चाणक्य नीति का चतुर्दश अध्याय गागर में सागर की तरह है। यह अध्याय ज्ञान की बहुत-सी भिन्न-भिन्न धाराओं को छूता है। जीवन में चहुँमुखी प्रगति के लिए चाणक्य नीति का चतुर्दश अध्याय बेहद पठनीय है। अन्य अध्याय पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ &#8211; <a
href="https://hindipath.com/chanakya-niti-in-hindi-pdf-free-download/"><strong>चाणक्य नीति</strong></a>।</em></p><p><strong>पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि अन्नमापः सुभाषितम्।<br>मूढैः पाषाणखंडेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ॥१॥</strong><br>धरती पर तीन ही रत्न हैं जल, अन्न और मधुर वचन, किन्तु मूर्ख पत्थर के टुकड़ों को रत्न कहते हैं । व्याख्या चाणक्य कहते हैं कि पृथ्वी पर तीन रत्न हैं जल, अन्न और सूक्तियाँ।</p><p><strong>आत्मापराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम्।<br>दारिद्र्यरोग दुःखानि बन्धनव्यसनानिच ॥२॥</strong><br>दरिद्रता, शारीरिक और मानसिक व्याधि, दुख और बंधन तथा विपत्तियाँ ये सब व्यक्ति के अपने पापरूप वृक्ष के फल हैं।</p><p><strong>पुनर्वित्तं पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही।<br>एतत्सर्वं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः ॥३॥</strong><br>नष्ट हुआ धन पुनः प्राप्त हो जाता है, एक मित्र से मित्रता टूट जाने पर दूसरा मित्र मिल जाता है। स्त्री भी पुनः मिल जाती है, भू, सम्पत्ति, देश, राज्य फिर मिल सकते हैं, किन्तु मनुष्य का शरीर बार-बार नहीं मिलता।</p><p><strong>बहूनां चैव सत्त्वानां रिपुञ्जयः।<br>वर्षान्धाराधरो मेघस्तृणैरपि निवार्यते ॥४॥</strong><br>निश्चय ही बहुत से लोगों का समुदाय शत्रु को भी जीत लेता है, जैसे वर्षा की धारा को धारण करने वाला बादल तिनकों के समूह द्वारा भी रोक दिया जाता है अर्थात् घास की झोपड़ी के भीतर वर्षा का जल नहीं पहुंच पाता।</p><p><strong>जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि।<br>प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तारे वस्तुशक्तितः ॥५॥</strong><br>जल में तेल, दुर्जन के पास गुप्त रहस्य, सत्पात्र को दिया गया दान और बुद्धिमान को शास्त्र का ज्ञान ये थोड़े हों तो भी वस्तु की शक्ति से स्वयं विस्तार को प्राप्त हो जाते हैं।</p><p><strong>धर्माऽऽख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत्।<br>सा सर्वदैव तिष्ठेच्चेत् को न मुच्येत बन्धनात् ॥६॥</strong><br>धर्मस्थल में जब व्यक्ति कथामृत का पान करता . शमशान में किसी का शवदाह होते देखकर तथा किसी रोगी को छटपटाते देखकर व्यक्ति सांसारिक मोह -माया को निरर्थक मानने लगता है, परन्तु जैसे ही उस स्थान से हटता है, उसकी बुद्धि पुनः मोह-माया से ग्रस्त हो जाती है।</p><p><strong>उत्पन्नपश्चात्तापस्य बुद्धिर्भवति यादृशी।<br>तादृशी यदि पूर्वा स्यात्कस्य स्यान्न महोदयः ॥७॥<br></strong>अशुभ कर्म करने के बाद पछताने वाले व्यक्ति को जैसी बुद्धि उत्पन्न होती है, यदि वैसी ही बुद्धि पहले उत्पन्न हो जाए, तो किसको मोक्ष की प्राप्ति न हो जाए अर्थात् सबको मोक्ष मिल जाए।</p><p><strong>दाने तपसि शौर्ये च विज्ञाने विनये नये।<br>विस्मयो न हि कर्तव्यो बहुरत्ना वसुन्धरा ॥८॥</strong><br>दान, तप, शौर्य, विनम्रता और नीतिज्ञता का कभी अभिमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि धरती अनेक प्रकार के रत्नों से लबरेज है अर्थात् दान देने में, तपस्या आदि में एक से एक बढ़कर व्यक्ति मौजूद है।</p><p><strong>दूरस्थोऽपि न दूरस्थो यो यस्य मनसि स्थितः।<br>यो यस्य हृदये नास्ति समीपस्थोऽपि दूरतः ॥९॥</strong><br>जो मन में बसा हुआ है, वह दूर होने पर भी दूर नहीं है और जो मन में बसा हुआ नहीं है, वह बहुत पास होकर भी दूर ही रहता है।</p><p><strong>यस्माच्च प्रियमिच्छेत् तस्य ब्रूयात्सदा प्रियम्।<br>व्याघ्रो मृगवधं गन्तुं गीतं गायति सुस्वरम् ॥१०॥</strong><br>निश्चय ही जिसका अप्रिय, बुरा करने की चाहना, इच्छा हो उसके साथ हमेशा मीठा बोलना चाहिए, जैसे शिकारी हिरण का वध करने के लिए मीठे स्वर में गीत गाता है।</p><p><strong>अत्यासन्न विनाशाय दूरस्था न फलप्रदा।<br>सेव्यतां मध्यभागेन राजवह्निगुरुस्त्रियः ॥११॥</strong><br>राजा, अग्नि, गुरु और स्त्री इन सबका मध्यावस्था से सेवन करना चाहिए। न इनके अत्यन्त निकट रहना चाहिए और न अत्यन्त दूर रहना चाहिए, क्योंकि बहुत पास होने पर ये विनाश का कारण बन जाते हैं और दूर होने पर ये लाभ प्रदान नहीं करते।</p><p><strong>अग्निरापः स्त्रियो मूर्खाः सर्पा राजकुलानि च।<br>नित्यं यत्नेन सेव्यानि सद्यः प्राणहराणि षट् ॥ १२॥</strong><br>अग्रि, जल, स्त्रियाँ, मूर्ख, सर्प और राजकुल ये सदा सावधानी से सेवन करने योग्य हैं क्योंकि ये शीघ्र ही प्राणों को हरने वाले हैं।</p><p><strong>स जीवति गुणा यस्य यस्य धर्म स जीवति।<br>गुण धर्म विहीनस्य जीवितं निष्प्रयोजनम् ॥१३॥</strong><br>जीवित वही है जिसमें गुण विद्यमान हैं जिसके जीवन में धर्म है वही जीता है । गुण और <a
href="/category/dharma/">धर्म</a> के बिना व्यक्ति का जीना निष्फल तथा व्यर्थ है।</p><p><strong>यदीच्छसि वशीकर्तुं जगदेकेन कर्मणा।<br>परापवादशास्त्रेभ्यो गां चरन्तीं निवारय ॥१४॥</strong><br>यदि व्यक्ति सम्पूर्ण जगत को किसी एक ही कर्म द्वारा अपने आधीन करना चाहता है तो उसे दूसरे की बुराई रूपी खेती में चरती अपनी जिह्वा को रोक लेना चाहिए।</p><p><strong>प्रस्तावसदृशं वाक्यं प्रभावसदृशं प्रियम्।<br>आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पण्डितः ॥१५॥</strong><br>जो व्यक्ति अवसर के अनुकूल बात करता है, सामर्थ्य के अनुसार साहस का प्रदर्शन करता है तथा अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध करता है, वही वास्तव में पण्डित है।</p><p><strong>एक एव पदार्थस्तु त्रिधा भवति वीक्षति।<br>कुपणं कामिनी मांसं योगिभिः कामिभिः श्वभिः ॥१६॥</strong><br>एक ही पदार्थ को तीन प्राणी अपनी-अपनी दृष्टि से देखते हैं स्त्री का शरीर वह पदार्थ है जिसे योगी शवरूप समझते हैं, कामियों के लिए वही सौन्दर्य का भण्डार है और कुत्तों के लिए मांस पिण्ड।</p><p><strong>सुसिद्धमौषधं धर्मं गृहछिद्रं व मैथुनम्।<br>कुभुक्तं कुश्रुतं चैव मतिमान्न प्रकाशयेत् ॥१७॥</strong><br>बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह छः बातें पर्दे में रखे- सिद्ध की हुई औषधि, दान-जप-तप आदि धार्मिक कृत्य, घर के दोष, सम्भोग, कुभोजन तथा निन्दित वचन।</p><p><strong>तावन्मौनेन नीयन्ते कोकिलश्चैव वासराः।<br>यावत्सर्वं जनानन्ददायिनी वाङ् न प्रवर्तते ॥१८॥</strong><br>जब तक सब मनुष्यों को आनन्द प्रदान करने वाली <a
href="/ritu-aayi-basanti-pyari-hindi-kavita-naval-singh-bhadauria/">बसन्त ऋतु</a> आरम्भ होती है, तब तक कोयलों द्वारा अपने दिन मौन रहकर बिताए जाते हैं।</p><p><strong>धर्मं धनं च धान्यं गुरोर्वचनमौषधम्।<br>संगृहीतं च कर्तव्यमन्यथा न तु जीवति ॥१९॥</strong><br>धर्म का आचरण, धन का उपार्जन, नाना प्रकार के अन्नों का संचय, गुरु के वचनों का तथा विविध प्रकार की औषधियों का सेवन विधि-विधान से तथा प्रयत्न पूर्वक करना चाहिए। ऐसा न करने पर निश्चय ही व्यक्ति ठीक प्रकार से जी नहीं सकता।</p><p><strong>त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम्।<br>कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यतः ॥२०॥</strong><br>दुष्ट मनुष्यों के साथ को त्यागकर साधु (भद्र) पुरुषों की संगति करनी चाहिए। दिन-रात पुण्य कर्म प्रारम्भ करते रहना चाहिए तथा सदैव संसार की अनित्यता को ध्यान में रखते हुए परमात्मा का स्मरण करते रहना चाहिए।</p><p>चाणक्य नीति का चतुर्दश अध्याय आपको कैसा लगा, कृपया हमें टिप्पणी करके जरूर बताएँ।</p><h2 class="wp-block-heading">संबंधित लेख</h2><ul><li><a
href="/chanakya-ke-kadwe-vachan/">चाणक्य के कड़वे वचन</a></li><li><a
href="https://hindipath.com/chanakya-niti-sutra-sangrah-hindi/">चाणक्य नीति सूत्र संग्रह</a></li></ul><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=2470</guid><description><![CDATA[<p>चाणक्य नीति का अध्याय तेरह ज्ञान का खज़ाना है। इसमें व्यावहारिकता की समझ कूट-कूट कर भरी हुई है।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/chanakya-niti-chapter-13-hindi/">चाणक्य नीति का अध्याय तेरह</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><em>चाणक्य नीति का अध्याय तेरह ज्ञान का खज़ाना है। इसमें व्यावहारिकता की समझ कूट-कूट कर भरी हुई है। जीवन को उन्नत बनाने के लिए चाणक्य नीति का अध्याय तेरह ज़रूर पढ़ना चाहिए। अन्य अध्याय पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ &#8211; <a
href="https://hindipath.com/chanakya-niti-in-hindi-pdf-free-download/"><strong>चाणक्य नीति</strong></a>।</em></p><p><strong>मुहूर्तमपि जीवेच्च नरः शुक्लेन कर्मणा।<br>न कल्पमपि कष्टेन लोक द्वय विरोधिना ॥१॥</strong><br>शुभ, श्रेष्ठ और उत्तम कर्म करता हुआ व्यक्ति एक मुहूर्त भी जीवित रहे तो अत्युत्तम है किन्तु दोनों लोक बिगाड़ने वाले, पाप कर्म करने वाले का कल्पभर जीवित रहना भी अच्छा नहीं है।</p><p><strong>गतं शोको न कर्तव्य भविष्यतो नैव चिन्तयेत्।<br>वर्तमानेन कालेन प्रवर्तन्ते विचक्षणाः ॥२॥</strong><br>बीती हुई घटना का शोक नहीं करना चाहिए. भविष्य की चिन्ता भी नहीं करनी चाहिए। बुद्धिमान लोग वर्तमान काल के अनुसार कार्य में प्रवृत्त होते हैं।</p><p><strong>स्वभावेन हि तुष्यन्ति देवाः सत्पुरुषाः पिताः।<br>ज्ञातयः स्नानपानाभ्यां वाक्यदानेन पण्डिताः ॥३॥</strong><br>देवता, सत्पुरुष और पिता ये स्वभाव से ही &#8211; सन्तुष्ट होते हैं, बंधु-बान्धव अच्छे भोजन से और पण्डित जन सम्मान पूर्वक बुलाये जाने से सन्तुष्ट हो जाते हैं।</p><p><strong>अहो स्वित् विचित्राणि चरितानि महात्मनाम्।<br>लक्ष्मीं तृणाय मन्यन्ते तद्भरेण नमन्ति च ॥४॥</strong><br>अहो! महात्माओं के चरित्र भी बड़े विचित्र होते हैं। वे धन-सम्पत्ति को तिनके के समान मानते हैं किन्तु उसके भार से झुक जाते है।</p><p><strong>यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम्।<br>स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्त्वा वसेत्सुखम् ॥५॥</strong><br>जिससे स्नेह होता है, उसी का डर भी लगा रहता है। स्नेह ही दुख का आधार है। स्नेह ही दुख का मूल है। स्नेह को त्यागकर ही व्यक्ति सुख से रह सकता है।</p><p><strong>अनागत विधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा।<br>द्वावेतौ सुखमेवैते यद्भविष्यो विनश्यति ॥६॥</strong><br>दुख के आने से पूर्व ही उसके निवारण का उपाय कर लेने वाला तथा संकट पड़ने पर तुरन्त समाधान खोजकर उससे मुक्त हो जाने वाला, ये दोनों ही सुखी रहते हैं।</p><p><strong>राज्ञेधर्मणि धर्मिष्ठाः पापे पापाः समे समाः।<br>राजानमनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः ॥७॥</strong><br>राजा धर्मात्मा हो तो प्रजा भी धर्मशील होती है। राजा के पापी होने पर प्रजा भी पाप-कर्मा होती है और राजा के उदासीन होने पर प्रजा भी उदासीन होती है, क्योंकि प्रजा राजा का अनुसरण करती है, जैसा राजा वैसी ही प्रजा होती है ।</p><p><strong>जीवन्तं मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम्।<br>मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवी न संशयः ॥८॥</strong><br><a
href="/category/dharma/">धर्म</a> से रहित, जीवित व्यक्ति को भी मैं मरे के समान मानता हूँ। धर्मशील मृत्यु को प्राप्त होने पर भी दीर्घजीवी होता है, इस बारे में कोई सन्देह नहीं है क्योंकि उसकी कीर्ति सदा अमर रहती है।</p><p><strong>धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्वते।<br>अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम् ॥९॥</strong><br>जिस व्यक्ति के पास धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों में से एक भी नहीं होता, उसका जन्म बकरे के गले में लटकने वाले स्तनों के समान व्यर्थ और निष्फल है।</p><p><strong>दह्यमानां सुतीव्रेण नीचाः परयशोऽग्निना।<br>अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते ॥१०॥</strong><br>दुष्ट आदमी दूसरों की कीर्ति को देखकर जलता है और जब स्वयं उन्नति नहीं कर पाता तो प्रगतिशील व्यक्ति की निंदा करने लगता है।</p><p><strong>बन्धन्य विषयासंगः मुक्त्यै निर्विषयं मनः।<br>मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥११॥</strong><br>मन ही बन्धन और मोक्ष का कारण है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह में फंसा मन जीव के बन्धन का कारण है और इन विषयों से रहित मन ही मोक्ष प्राप्ति का साधन है ।</p><p><strong>देहाभिमानगलिते ज्ञानेन परमात्मनः।<br>यत्र-तत्र मनो याति तत्र-तत्र समाधयः ॥१२॥</strong><br>देह के अभिमान के नष्ट हो जाने पर और अपने आपको परमात्मनिष्ठ जान लेने पर जहाँ-जहाँ मन जाता है, वहाँ-वहाँ ही समाधि समझनी चाहिए।</p><p><strong>ईप्सितं मनसः सर्वं कस्य सम्पद्यते सुखम्।<br>दैवायत्तं यतः सर्वं तस्मात् सन्तोषमाश्रयेत् ॥१३॥</strong><br>मनचाहा सुख किसको प्राप्त होता है क्योंकि सब कुछ भाग्य के वश में है। इसलिए संतोष का सहारा लेना चाहिए।</p><p><strong>यथा धेनु सहस्रेषु वत्सो गच्छति मातरम्।<br>तथा यच्च कृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥१४॥</strong><br>जैसे हजारों गायों में भी बछड़ा अपनी माता के पास ही पहुंच जाता है अथवा उसके पीछे-पीछे चलता है, उसी प्रकार किया हुआ कर्म भी सदा कर्त्ता के पीछे -पीछे चलता रहता है।</p><p><strong>अनवस्थितकायस्य न जने न वने सुखम्।<br>जनो दहति संसर्गाद् वनं संगविवर्जनात ॥१५॥</strong><br>अव्यवस्थित कर्म करने वाले व्यक्ति को न तो जनसमाज में सुख मिलता है और न वन में। जनसमाज में मनुष्यों का संसर्ग उसे जलाता है और वन में एकाकी रहने के कारण वह दुखी रहता है, पीड़ित होता है।</p><p><strong>यथा खनित्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति।<br>तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥१६॥</strong><br>जैसे खोदने वाला फावड़ा, कुदाल आदि से खोदने के द्वारा पाताल से भी पानी को प्राप्त कर लेता है वैसे ही सेवा करने वाला शिष्य गुरु से विद्या को प्राप्त कर पाता है ।</p><p><strong>कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी।<br>तथापि सुधियाचार्यः सुविचार्येव कुर्वते ॥१७॥</strong><br>कर्मफल कर्म के आधीन रहता है और मनुष्यों की बुद्धि भी कर्म के अनुसार ही चलती है । फिर भी विद्वान, भद्र और श्रेष्ठ मनुष्य भली-भांति सोच विचार कर ही कार्य करते हैं।</p><p><strong>एकाक्षरं प्रदातारं यो गुरुं नाभिवन्दते।<br>श्वानयोनि शतं भुक्त्वा चाण्डालेष्वभिजायते ॥१८॥</strong><br>जो एक अक्षर &#8216;ओ३म&#8217; का ज्ञान कराने वाले गुरु को नमन नहीं करता, उनकी चरण वन्दना, आदर-सत्कार नहीं करता, वह कुत्ते की सौ योनियों को भोगने के उपरान्त चाण्डालों में पैदा होता है ।</p><p><strong>युगान्ते प्रचलेन्मेरुः कल्पान्ते सप्त सागराः।<br>साधवः प्रतिपन्नार्थान्न चलन्ति कदाचन ॥१९॥</strong><br>युग के आखिर में सुमेरु पर्वत चलने वाला हो जाता है और कल्प के आखिर में सातों समुद्र भी अपनी मर्यादा का उल्लंघन कर देते हैं किन्तु साधुजन, श्रेष्ठ पुरुष अपने संकल्प एवं प्रतिज्ञा से विचलित नहीं होते।</p><p>हमें आशा है कि चाणक्य नीति का अध्याय तेरह आपको पसंद आया होगा। कृपया टिप्पणी करके अपनी राय हमसे अवश्य साझा करें।</p><h2 class="wp-block-heading">संबंधित लेख</h2><ul><li><a
href="/chanakya-ke-kadwe-vachan/">चाणक्य के कड़वे वचन</a></li><li><a
href="https://hindipath.com/chanakya-niti-sutra-sangrah-hindi/">चाणक्य नीति सूत्र संग्रह</a></li></ul><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=2462</guid><description><![CDATA[<p>चाणक्य नीति का द्वादश अध्याय गागर में सागर की तरह ज्ञान को समेटे हुए है। पढ़ें यह पठनीय अध्याय और जीवन को ज्ञान की ज्योति से आलोकित करें। अन्य अध्याय पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ - चाणक्य नीति।</p><p>The post <a
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href="/chanakya-niti-in-hindi-pdf-free-download/"><strong>चाणक्य नीति</strong></a>।</em></p><p><strong>सानन्दं सदनं सुताश्च सुधयः कान्ता प्रियालापिनी,<br>इच्छापूर्तिधनं स्वयोषिति रतिः स्वाज्ञापरः सेवकाः।<br>आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नपानं गृहे,<br>साधोः संगमुपासते च सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः ॥१॥</strong><br>जो घर आनन्द से भरा हुआ है, जहाँ होशियार संतान और मीठा बोलने वाली पत्नी है, आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त धन है, सभी एक-दूसरे के प्रति अनुरागी हैं, जहाँ सेवक स्वामिभक्त हैं, जहाँ अतिथि का उचित सत्कार होता है, <a
href="/om-jai-shiv-omkara-aarti/">शिव</a> का पूजन होता है और प्रतिदिन अच्छे पकवान व पेय बनते हैं, जहाँ दोस्तों का आवागमन होता रहता है एवं साधुजनों का भी आना-जाना लगा रहता है – ऐसे व्यक्ति का गृहस्थाश्रम ही प्रशंसा के योग्य है।</p><p><strong>आर्तेषु विप्रेषु दयान्वितश्चेच्छ्रद्धेन यः स्वल्पमुपैति दानम्।<br>अनन्तपारं समुपैति दानं यद्दीयते तन्न लभेद् द्विजेभ्यः ॥२॥</strong><br>जो यजमान दुःखी व आर्त ब्राह्मणों को भक्ति पूर्वक थोड़ा-सा भी दान देता है, उसे उतना ही मात्र प्राप्त नहीं होता, बल्कि अनन्त गुना होकर उसे वापस मिलता है।</p><p><strong>दाक्षिण्यं स्वजने दया परजने शाठ्यं सदा दुर्जने।<br>प्रीतिः साधुजने स्मय खलजने विद्वज्जने चार्जवम्।<br>शौर्यं शत्रुजने क्षमा गुरुजने नारीजने धूर्तताः<br>इत्थं ये पुरुषा कलासु कुशलास्तेष्वेव लोकस्थितिः ॥३॥</strong><br>अपने बन्धु-बान्धवों के साथ शालीनता, दूसरों के ऊपर दया, दुर्जनों के प्रति शठता, सज्जनों के प्रति प्रीति, बुद्धिमानों के साथ सरलता, शत्रुओं के प्रति वीरता, माता-पिता, आचार्य आदि बड़े लोगों के लिए सहिष्णुता, सहनशीलता, स्त्रियों के प्रति अविश्वास – जो व्यक्ति इस प्रकार व्यवहार-कुशल होते हैं, वही संसार में सुखी रहते हैं।</p><p><strong>हस्तौ दानवर्जितौ श्रुतिपुटौ सारस्वतद्रोहिणी<br>नेत्रे साधुविलोकरहिते पादौ न तीर्थं गतौ।<br>अन्यायार्जितवित्तपूर्णमुदरं गर्वेण तुंगं शिरौ<br>रे रे जम्बुक मुञ्च-मुञ्च सहसा नीचं सुनिन्द्यं वपुः ॥४॥</strong><br>जिसने जीवन में कभी दान नहीं दिया, जिसके कानों ने कभी वेद मंत्रों को नहीं सुना, जिसने आँखों से साधुओं के दर्शन नहीं किए, पैरों से तीर्थ यात्राएँ नहीं की, अन्याय से अर्जित धन से जिसका पेट भरा है और सर गर्व से ऊँचा उठा हुआ है – रे रे सियार जैसे नीच मनुष्य, ऐसे नीच और निन्दनीय शरीर को जल्दी छोड़ दे।</p><p><strong>येषां श्रीमद्यशोदासुत-पद-कमले नास्ति भक्तिर्नराणाम्<br>येषामाभीरकन्या प्रियगुणकथने नानुरक्ता रसज्ञा।<br>तेषां श्रीकृष्णलीला ललितरसकथा सादरौ नैव कर्णों,<br>धिक्तान् धिक्तान् धिगेतान्, कद्ययति सततं कीर्तनरस्था मृदंग ॥५॥</strong><br>उन्हें धिक्कार हैं जिन्हें यशोदानंदन <a
href="/krishna-aarti/">श्रीकृष्ण</a> के चरण-कमल में कोई भक्ति नहीं है। जिनकी जिह्वा को <a
href="/radha-rani-ki-aarti/">श्री राधा रानी</a> और गोपियों की लीलाओं के गायन में कोई आनंद नहीं आता है। जिनके कानों में भगवान् की मधुर कथाओं को सुनने की उत्सुकता नहीं है। मृदंग की &#8220;धिक तान धिक तान&#8221; ध्वनि ऐसे लोगों की ही निंदा करने के लिए है।</p><p><strong>पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किं<br>नोलूकोऽप्यवलोकयते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम्?<br>वर्षा नैव पतति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम्<br>यत्पूर्वं विधिना ललाट लिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः ॥६॥</strong><br>यदि बसन्त ऋतु में करील के वृक्ष पर पत्ते नहीं उगते, तो इसमें बसन्त का क्या दोष? यदि उल्लू दिन में भी नहीं देखता, तो इसमें <a
href="/surya-dev-mantra-katha-upay/">सूर्य</a> का क्या दोष? यदि चातक के मुख में वर्षा की बूंदें नहीं गिरतीं, तो इसमें बादलों का क्या दोष? ब्रह्मा ने पहले से ही जो कुछ मनुष्य के भाग्य में लिख दिया है, उसे मिटाने में कौन समर्थ है।</p><p><strong>सत्संगतेर्भवति हि साधुता खलानां<br>साधूनां न हि खलसंगतेः खलत्वम्।<br>आमोदं कुसुमभवं मृदेव धत्ते<br>मृद्गन्धं न हि कुसुमानि धारयन्ति ॥७॥</strong><br>सत्सङ्ग से दुष्ट लोगों में भी सज्जनता आ जाती है, किन्तु साधुओं में दुष्टों की संगति से दुष्टता नहीं आती, जैसे फूलों से पैदा होने वाली सुगन्ध को मिट्टी ही धारण करती है, मिट्टी की गन्ध को फूल कभी भी धारण नहीं करते।</p><p><strong>साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूताः हि साधवः।<br>कालेन फलते तीर्थः सद्यः साधु समागमः ॥८॥</strong><br>साधुओं का दर्शन करने से भी पुण्य प्राप्त होता है, क्योंकि श्रेष्ठ लोग साक्षात् तीर्थवत ही हैं। तीर्थ का फल समय आने पर ही प्राप्त होता है, किन्तु साधुओं का संग तो शीघ्र ही मनोभावों को पूर्ण करने वाला है।</p><p><strong>विप्रास्मिन्नगरे महान् कथय कस्ताल द्रुमाणां गणः<br>को दाता रजको ददाति वसनं प्रातर्गृहीत्वा निशि।<br>को दक्षः परिवित्तदारहरणं सर्वेऽपि दक्षाः जनाः<br>कस्माज्जीवति हे सखे! विषकृमिन्यायेन जीवाम्यहम् ॥९॥</strong><br>एक यात्री ने एक नगर में पहुँच वहाँ रहने वाले ब्राह्मण से पूछा, “हे विप्र! इस नगर में बड़ा कौन है?” ब्राह्मण ने उत्तर दिया, “&#8217;ताड़ के पत्तों का समुदाय।” यात्री ने फिर पूछा, “दानशील कौन है?” उत्तर मिला, “धोबी सबसे बड़ा दाता है, जो प्रातःकाल वस्त्र ले जाकर सायंकाल लौटा देता है।” यात्री ने पूछा, “यहाँ चतुर कौन है?” ब्राह्मण ने कहा, “दूसरे के धन और नारी को हरण करने में सभी मनुष्य चतुर हैं।” यात्री ने पूछा, “ऐसी हालत में कैसे जीते हो?” ब्राह्मण बोला, “हे मित्र! मैं विष में रहने वाले कीड़े के समान (जो उसी में पैदा होता है, उसी में जीता है और उसी में मर जाता है) इनके साथ ही रहता हुआ ही जीता हूँ।”</p><p><strong>न विप्रपादोदक पंकिलानि न वेदशास्त्रध्वनिगर्जितानि।<br>स्वाहास्वधाकारध्वनिवर्जितानि श्मशानतुल्यानि गृहाणितानि ॥१०॥</strong><br>जिस घर में विप्र के पाँवों को धुलाने वाले पानी से कीचड़ न हुआ हो, जहाँ वेद आदि शास्त्रों के पाठ स्वर नहीं गूंजे हों, जो घर स्वाहा की ध्वनि से रहित हो, वह घर निश्चय ही शमशान भूमि के समान है।</p><p><strong>सत्यं माता-पिता ज्ञानं धर्मों भ्राता दया सखा।<br>शान्तिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः ॥११॥</strong><br>सत्य मेरी माता है, ज्ञान पिता है, धर्म मेरा भाई है व दया मेरी बहन है, शान्ति मेरी पत्नी है और क्षमा मेरा पुत्र है – यही छः मेरे सगे-संबंधी हैं।</p><p><strong>अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः<br>नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्त्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥ १२॥</strong><br>शरीर नाशवान है, धन-सम्पत्ति भी हमेशा रहने वाली नहीं है। मृत्यु सदा सिरहाने खड़ी है। अतः <a
href="/category/dharma/">धर्म</a> का संचय और धर्म का आचरण ही सदैव करना चाहिए।</p><p><strong>वयसः परिणामे हि यः खलाः खल एव सः।<br>सुपक्वमपि माधुर्यं नोपायतीन्द्र वारुणम् ॥१३॥<br></strong>अवस्था के परिपक्व हो जाने (अधिक आयु होने) पर भी जो दुष्ट है, वह दुष्ट ही बना रहता है, जैसे अत्यन्त पक जाने पर भी इन्द्रायण के फल में मिठास नहीं आती, वह कड़वा ही बना रहता है।</p><p><strong>निमन्त्रणोत्सवा विप्रा गावो नवतृणोत्सवाः।<br>पत्युत्साहयुता नार्याः अहं कृष्ण-रणोत्सवः ॥१४॥</strong><br>ब्राह्मणों को भोजन के लिए निमंत्रण, गौओं के लिए ताजा घास की प्राप्ति, पति का अत्यन्त उत्साहित होना ही पत्नी का उत्सव है। आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मेरे लिए तो भंयकर मार-काट वाला संग्राम ही उत्सव है।</p><p><strong>मातृवत् परदारेषु परद्रव्याणि लोष्ठवत्।<br>आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति सः पंडितः ॥१५॥</strong><br>दूसरों की पत्नी को माता की भांति, दूसरे के धन को मिट्टी के ढेले की भांति तथा सारे प्राणियों को अपनी आत्मा की भांति देखने वाला ही संसार में यर्थाथरूप में मनुष्य है।</p><p><strong>धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दाने समुत्साहता<br>मित्रेऽवञ्चकता गुरौ विनयता चित्तेऽपि गम्भीरता।<br>आचारे शुचिता गुणे रसिकता शास्त्रेषु विज्ञातृता<br>रूपे सुन्दरता शिवे भजनता त्वय्यस्ति भो राघव ॥१६॥</strong><br>धर्म में तत्परता, मुख में माधुर्य (मीठे वचन). दान देने में अत्यन्त उत्साह होना, मित्र के साथ निष्कपटता एवं निश्छलता, गुरु के प्रति नम्रता, अन्तःकरण में गम्भीरता, आचरण गुण-ग्राहकता, शास्त्रों में विशेष ज्ञान का होना, रूप में सौन्दर्य और परमात्मा में भक्ति का होना ये बातें श्रेष्ठ और सज्जन व्यक्तियों में ही दिखाई देती हैं।</p><p><strong>काष्ठं कल्पतरुः सुमेरुरचलश्चिन्तामणिः प्रस्तरः<br>सूर्यस्तीव्रकरः शशिः क्षयकरः क्षारोहि निरवारिधिः।<br>कामो नष्टतनुर्बलिर्दितिसुतो नित्य पशुः कामगोः<br>नैतास्ते तुलयामि भो रघुपते कस्योपमा दीयते ॥१७॥</strong><br>कल्पवृक्ष यद्यपि इच्छाओं का पूरक है किन्तु वह काष्ठ है, सुमेरु पर्वत है, चिन्तामणि पत्थर है सूर्य प्रचण्ड रश्मियों वाला है, <a
href="/chandra-dev-mantra-katha-upay/">चन्द्रमा</a> क्षीण होने वाला है, समुद्र खारी है, कामदेव शरीर-रहित है, बलि दानशील दैत्य है और कामधेनु तो सदा पशु ही है-मैं इन सबको तेरे समान नहीं पाता हूँ, हे रघुपते! आपकी किसके साथ उपमा दी जाए, किसके साथ आपकी तुलना की जाए?</p><p><strong>विनयं राजपुत्रेभ्यः पण्डितेभ्यः सुभाषितम्।<br>अनृतं द्यूतकारेभ्यः स्त्रीभ्यः शिक्षेत् कैतवम् ॥१८॥</strong><br>राजपुत्रों से नम्रता एवं सुशीलता, पण्डितों. विद्वानों से उत्तम और प्रियवचन बोलना, जुआरियों से मिथ्या भाषण और स्त्रियों से छल करना सीखना चाहिए।</p><p><strong>अनालोच्य व्ययं कर्ता चानाथः कलहप्रियः।<br>आर्तः स्त्रीहसर्वक्षेत्रेषु नरः शीघ्रं विनश्यति ॥१९॥</strong><br>बिना सोचे-विचारे, आय के साधनों को बिना। देखे-भाले, अत्यधिक व्यय करने वाला, सहायकों से रहित होने पर भी युद्धों में रुचि रखने वाला और सब वर्णों की स्त्रियों से सहवास के लिए उत्सुक रहने वाला व्यक्ति शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।</p><p><strong>जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः।<br>स हेतु सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥२०॥</strong><br>पानी की एक-एक बूंद गिरने से जिस प्रकार घड़ा भर जाता है, उसी प्रकार थोड़े-थोड़े अभ्यास से सब विद्याओं, धर्म तथा धन की प्राप्ति की जा सकती है।</p><p><strong>नाहारं चिन्तयेत् प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत्।<br>आहारो हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते॥२१॥</strong><br>विद्वान व्यक्ति को भोजनादि की सभी चिंताएँ छोड़कर एकमात्र धर्म संग्रह की चिंता में ही लीन रहना चाहिए. क्योंकि आहार (भोजन) तो मुनष्यों के जन्म के साथ ही उत्पन्न हो जाता है।</p><p>चाणक्य नीति का द्वादश अध्याय आपको कैसा लगा? कृपया हमें टिप्पणी करके बताएँ।</p><h2 class="wp-block-heading">संबंधित लेख</h2><ul><li><a
href="/chanakya-ke-kadwe-vachan/">चाणक्य के कड़वे वचन</a></li><li><a
href="https://hindipath.com/chanakya-niti-sutra-sangrah-hindi/">चाणक्य नीति सूत्र संग्रह</a></li></ul><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=1399</guid><description><![CDATA[<p>चाणक्य नीति का एकादश अध्याय गागर में सागर की तरह ज्ञान को समेटे हुए है। पढ़ें यह पठनीय अध्याय और जीवन को ज्ञान की ज्योति से आलोकित करें।</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><em>चाणक्य नीति का एकादश अध्याय गागर में सागर की तरह ज्ञान को समेटे हुए है। पढ़ें यह पठनीय अध्याय और जीवन को ज्ञान की ज्योति से आलोकित करें। अन्य अध्याय पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ &#8211; <a
href="/chanakya-niti-in-hindi-pdf-free-download/"><strong>चाणक्य नीति</strong></a>।</em></p><p><strong>दातृत्वं प्रियवक्तृत्वं धीरत्वमुचितज्ञता।<br>अभ्यासेन न लभ्यन्ते चत्वारः सहजा गुणाः ॥१॥</strong><br>दान देना, बातचीत में मधुर वाणी का प्रयोग करना, धीरज रखना और उचित-अनुचित का ज्ञान, ये चारों गुण स्वाभाविक होते हैं। इन्हें अभ्यास से प्राप्त नहीं किया जा सकता।</p><p><strong>आत्मवर्गं परित्यज्य परवर्गं समाश्रयेत्।<br>स्वयमेव लयं याति यथा राज्यमधर्मतः ॥२॥</strong><br>जो व्यक्ति अपने वर्ग को छोड़कर दूसरे के वर्ग का सहारा लेता है वह अपने आप ही नष्ट हो जाता है, जैसे राजा दूसरे के धर्म का सहारा लेने से नष्ट हो जाता है।</p><p><strong>हस्ती स्थूलतनुः स चांकुश वशः किं हस्तिमात्रोंऽकुशः।<br>दीपे प्रज्वलिते प्रणश्यति तमः किं दीपमात्रं तमः।<br>वज्रेणभिहताः पतन्ति गिरयः किं वज्रमात्रं नगाः<br>तेजो यस्य विराजते स बलवान् स्थूलेषु कः प्रत्ययः ॥३॥</strong><br>लम्बे-चौड़े डील-डौल वाला हाथी अंकुश से वश में होता है। अन्धकार का नाश एक मामूली दीपक से हो जाता है और विशाल पर्वत वज्र के प्रहार से खण्ड-खण्ड हो जाता है। क्या अंकुश हाथी के जैसा डील-डौल वाला होता है? क्या दीपक अंधकार जितना विस्तृत होता है? क्या वज्र पर्वत जैसा होता है? वस्तुतः तेजवान ही बलवान है। आकार-प्रकार अथवा विस्तार से कोई बलवान नहीं हो जाता।</p><p><strong>कलौ दशसहस्राणि हरिस्त्यजति मेदिनीम्।<br>तदर्द्धे जाह्नवी तोयं तदर्द्धे ग्रामदेवता ॥४॥</strong><br>कलियुग के दस सहस्त्र वर्ष शेष रह जाने पर सर्वव्यापक परमेश्वर भूमि को त्याग देंगे। उसके आधे अर्थात् पांच सहस्त्र वर्ष शेष रहने पर गंगा का पानी भूमि त्याग देगा और ढाई सहस्त्र वर्ष शेष रहने पर ग्राम देवता गांव का परित्याग कर देंगे।</p><p><strong>गृहाऽऽसक्तस्य नो विद्या न दया मांसभोजिनः।<br>द्रव्य लुब्धस्य नो सत्यं न स्त्रैणस्य पवित्रता ॥५॥</strong><br>घर में आसक्ति अर्थात् मोह रखने वाले को कभी विद्या प्राप्त नहीं होती। मांस का सेवन करने वाले में दया नहीं होती। धन के लोभी में सच्चाई नहीं होती और दुराचारी, व्यभिचारी, भोग-विलासी व्यक्ति में पवित्रता नहीं होती।</p><p><strong>न दुर्जनः साधुदशामुपैति बहु प्रकारैरपि शिक्ष्यमाणः।<br>आमूलसिक्तं पयसा घृतेन न निम्बवृ़क्षोः मधुरत्वमेति ॥६॥</strong><br>अनेक तरह से समझाए और सिखाए जाने पर भी दुष्ट व्यक्ति अभद्रता को नहीं छोड़ता, जिस प्रकार नीम का वृक्ष दूध और घी से सींचे जाने पर भी मधुरता को प्राप्त नहीं होता।</p><p><strong>अन्तर्गतमलो दुष्टस्तीर्थस्नानशतैरपि।<br>न शुद्ध्यतियथाभाण्डं सुरया दाहितं च तत् ॥७॥</strong><br>पाप-वासनाओं से भरा दुर्जन व्यक्ति सैकड़ों बार तीर्थ-स्नान करने पर भी उसी प्रकार पवित्र नहीं होता, जैसे शराब का पात्र तपाए जाने पर भी पवित्र नहीं होता।</p><p><strong>न वेत्ति यो यस्य गुणप्रकर्षं स तं सदा निन्दति नाऽत्र चित्रम्।<br>यथा किराती करिकुम्भजाता मुक्ताः परित्यज्य बिभति गुंजाः ॥८॥</strong><br>जो जिसके गुणों को, गुणों की श्रेष्ठता को नहीं जानता, वह हमेशा उसकी उपेक्षा करता है – इसमें आश्चर्य कैसा? जैसे कि भीलनी हाथी मस्तक पर स्थित मोती को छोड़कर घुँघची की माला ही पहनती है।</p><p><strong>ये तु संवत्सरं पूर्णं नित्यं मौनेन भुञ्जते।<br>युगकोटिसहस्रन्तु स्वर्गलोक महीयते ॥९॥</strong><br>जो व्यक्ति पूरे साल हमेशा मौन होकर, चुपचाप, बिना बोले हुए भोजन करता है, वह अवश्य ही एक हजार करोड़ युगों तक स्वर्गधाम में गौरव, आदर, सम्मान पाता है।</p><p><strong>कामं क्रोधं तथा लोभं स्वादं शृंगारकौतुकम्।<br>अतिनिद्राऽतिसेवा व विद्यार्थी ह्यष्ट वर्जयेत् ॥१०॥</strong><br>कामुकता, क्रोध और लोभ, बिना परिश्रम पदार्थों की प्राप्ति की कामना, स्वादिष्ट पदार्थों के भक्षण की कामना, बनना-संवरना, खेल तमाशे, मन-बहलाव के लिए ताश आदि खेलना, बहुत सोना तथा अत्यधिक सेवा या चापलूसी करना – इन आठ बातों को विद्यार्थियों को अवश्य ही छोड़ देना चाहिए।</p><p><strong>अकृष्टफलमूलेन वनवासरतः सदा।<br>कुरुतेऽहरहः श्राद्धमृषिर्विप्रः स उच्यते ॥११॥</strong><br>बिना जोती हुई धरती से पैदा फल एवं कंदमूल आदि खाकर जो जीवन बिताता है और सदैव वन में बसने की इच्छा रखता है, हर रोज़ पितरों का <a
href="/tarpan-vidhi-in-hindi/">श्राद्ध</a> करता है, वह ब्राह्मण ऋषि कहा जाता है।</p><p><strong>एकाहारेण सन्तुष्टः षड्कर्मनिरतः सदा।<br>ऋतुकालेऽभिगामी च स विप्रो द्विज उच्यते ॥१२॥</strong><br>एक समय के आहार से संतोष पाकर हमेशा छ: कर्मों–यज्ञ करना-कराना, वेद पठन-पाठन, दान लेना-देना–के लिए तैयार रहने वाला व ऋतुकाल में ही स्त्री-संग करने वाला विप्र ही द्विज कहलाता है।</p><p><strong>लौकिके कर्मणि रतः पशूनां परिपालकः।<br>वाणिज्यकृषिकर्मा यः स विप्रो वैश्य उच्यते ॥१३॥</strong><br>सदा लौकिक कर्मों में लीन रहने वाला, पशुपालन करने वाला, व्यापार और खेती करने वाला विप्र वैश्य कहलाता है।</p><p><strong>लाक्षादितैलनीलानां कुसुम्भमधुसर्पिषाम्।<br>विक्रेता मद्यमांसानां स विप्रः शूद्र उच्यते ॥१४॥</strong><br>लाक्षादि, तेल, नील, कुमकुम, मधु, घी, शराब, मांस आदि का काम करने वाला विप्र शूद्र कहलाता है।</p><p><strong>परकार्यविहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थसाधकः।<br>छलीद्वेषी मधुक्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते ॥१५॥</strong><br>दूसरे के कामों को बिगाड़ने वाला पाखण्डी, अपना ही स्वार्थ सिद्ध करने में लगा अर्थात् स्वार्थी, छल करने वाला, दूसरों की प्रगति को देखकर ईर्ष्या करने वाला, ऊपर से बहुत कोमल तथा नम्र लेकिन अन्दर से बहुत कपटी – ऐसा विप्र पशु कहलाता है।</p><p><strong>वापीकूपतड़ागानामारामसुखश्वनाम्।<br>उच्छेदने निराशंक स विप्रो म्लेच्छ उच्यते ॥१६॥</strong><br>बावड़ी, कूप, तालाबों, वाटिकाओं और मन्दिरों के तोड़ने-फोड़ने, नष्ट-भ्रष्ट करने में जिसे किसी का डर नहीं होता, वह विप्र म्लेच्छ कहलाता है।</p><p><strong>देवद्रव्यं गुरुद्रव्यं परदाराभिमर्षणम्।<br>निर्वाहः सर्वभूतेषु विप्रश्चाण्डाल उच्यते ॥१७॥</strong><br>विद्वानों एवं गुरु के धन का हरण करने वाला, अन्य स्त्रियों से सहवास करने वाला और सभी प्रकार के लोगों के साथ निर्वाह कर लेने वाला विप्र चाण्डाल कहलाता है।</p><p><strong>देयं भोज्यधनं सुकृतिभिर्नो संचयस्तस्य वै,<br>श्रीकर्णस्य बलेश्च विक्रमपतेरद्यापि कीर्ति स्थिता।<br>अस्माकं मधुदानयोगरहितं नष्टं चिरात्संचित<br>निर्वाणादिति नष्टपादयुगलं घर्षत्यमी मक्षिकाः ॥१८॥</strong><br>पुण्यात्माओं का खाद्यान्न हमेशा दान देने के लिए ही होता है। उन्हें कभी भी उसका संग्रह नहीं करना चाहिए, क्योंकि दान देने की वजह से ही <a
href="/karn-mahabharat-jivan-parichay/">दानवीर कर्ण</a>, महाराज बलि और महाराज <a
href="/vikram-betal-ki-kahani/">विक्रमादित्य</a> का यश इस संसार में बना हुआ है। दान और भोग के बिना वह धन मधुमक्खियों के चिरकाल से एकत्र किए हुए शहद की भांति नष्ट हो जाता है। तब वे व्यथित होकर कहती हैं कि हमारे मधु का नाश हो गया, हमने तो उसका भोग भी नहीं किया। ऐसा कहकर वे अपने हाथ-पैरों को मलती अर्थात् मलाल करती हैं।</p><p>चाणक्य नीति का एकादश अध्याय आपको कैसा लगा? टिप्पणी करके हमें बताएँ।</p><h2 class="wp-block-heading">संबंधित लेख</h2><ul><li><a
href="/chanakya-ke-kadwe-vachan/">चाणक्य के कड़वे वचन</a></li><li><a
href="https://hindipath.com/chanakya-niti-sutra-sangrah-hindi/">चाणक्य नीति सूत्र संग्रह</a></li></ul><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=1160</guid><description><![CDATA[<p>पढ़ें चाणक्य नीति का दसवां अध्याय हिंदी में और पाएँ जीवन को उन्नत और सुन्दर बनाने के अनमोल सूत्र।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/chanakya-neeti-dasham-adhyay-hindi/">चाणक्य नीति का दसवाँ अध्याय अर्थ सहित</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><em>पढ़ें आचार्य कौटिल्य की अमर रचना चाणक्य नीति का दसवाँ अध्याय अर्थ के साथ हिंदी भाषा में। यदि आप चाणक्य नीति के अन्य अध्यायों का भी अध्ययन करना चाहते हैं, तो कृपया यहाँ जाएँ – <a
href="/chanakya-niti-in-hindi-pdf-free-download/"><strong>हिंदी में चाणक्य नीति</strong></a>।</em></p><h2 class="wp-block-heading">Chanakya Neeti&#8217;s 10th Chapter With Hindi Meaning</h2><p><strong>धनहीनो न च हीनश्च धनिक स सुनिश्चयः।<br>विद्या रत्नेन हीनो यः स हीनः सर्ववस्तुषु ॥१॥</strong><br>ग़रीब इंसान दीन-हीन नहीं है। वह विद्या के धन से युक्त हो सकता है। लेकिन जिसके पास विद्यारूपी सम्पत्ति नहीं है, वह सब वस्तुओं से हीन है।</p><p><strong>दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिवेत्।<br>शास्त्रपूतं वदेद् वाक्यं मनःपूतं समाचरेत् ॥२॥</strong><br>आँखों से अच्छी तरह देखकर धरती पर पैर रखें, कपड़े से छानकर पानी पिएँ, शास्त्र से शुद्ध करके अर्थात् शास्त्र-सम्मत वाक्य ही बोलें और मन में सोच-विचारकर जो पवित्र काम हो, उसे ही भली प्रकार से करें।</p><p><strong>सुखार्थी चेत् त्यजेद्विद्यां त्यजेद्विद्यां चेत् त्यजेत्सुखम्।<br>सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम् ॥३॥</strong><br>जिसे सुख की इच्छा हो, उसे विद्या को त्याग देना चाहिए तथा यदि विद्या पाने की इच्छा हो, तो सुख की कामना त्याग देनी चाहिए। सुख की कामना करने वाले को विद्या की प्राप्ति कैसे सम्भव है और विद्यार्थी को सुख किस तरह मिल सकता है।</p><p><strong>कवयः किं न पश्यन्ति किं न कुर्वन्ति योषितः।<br>मद्यपा किं न जल्पन्ति किं न खादन्ति वायसाः ॥४॥</strong><br>कवि क्या नहीं देख सकते? स्त्रियाँ क्या नहीं कर सकतीं? शराबी क्या नहीं बक सकते? और कौए क्या नहीं खा सकते हैं?</p><p><strong>रंकं करोति राजानं राजानं रंकमेव च।<br>धनिनं निर्धनं चैव निर्धनं धनिनं विधिः ॥५॥</strong><br>आचार्य चाणक्य कहते हैं कि भगवान की लीला बड़ी विचित्र है। वह भिखारी को राजा बना देता है और राजा को भिखारी, अमीर को ग़रीब और ग़रीब को अमीर।</p><p><strong>लुब्धानां याचकः शत्रुमूर्खाणां बोधकः रिपुः।<br>जारस्त्रीणां पतिः शत्रुश्चौराणां चन्द्रमा रिपुः ॥६॥</strong><br>लोभी का दुश्मन मांगने वाला, मूर्ख का शत्रु बुद्धिमान, व्यभिचारिणी का दुश्मन पति और चोरों का शत्रु <a
href="/chandra-dev-mantra-katha-upay/">चन्द्रमा</a> है।</p><p><strong>येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।<br>ते मर्त्यलोके भुविः भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥७॥</strong><br>जिनके पास न विद्या है, न तप है, न दानशीलता है, न चरित्र में शील है, न गुण है, न धर्म है–वे भूमि पर भाररूप पशु ही हैं, जो मनुष्य के रूप में विचरण करते हैं।</p><p><strong>अन्तःसार विहीनानामुपदेशो न जायते।<br>मलयाचलसंसर्गात् न वेणुश्चन्दनायते ॥८॥</strong><br>भीतर योग्यता से हीन, मलिन हृदय वाले व्यक्तियों पर उपदेश का कोई असर नहीं पड़ता, जैसे मलयागिरी से आने वाली वायु के संपर्क से भी बांस चन्दन नहीं होता।</p><p><strong>यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्।<br>लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥९॥</strong><br>जिसके पास स्वयं ही बुद्धि नहीं है वेद आदि शास्त्र उसका क्या लाभ कर सकते हैं। उदाहरणार्थ जन्म से अंधे व्यक्ति को दर्पण से क्या प्रयोजन?</p><p><strong>दुर्जनं सज्जनं कर्तुमुपायो न हि भूतले।<br>अपानं शतधा धौतं न श्रेष्ठमिन्द्रियं भवेत् ॥१०॥</strong><br>दुष्ट व्यक्ति को सज्जन बनाने के लिए भूमि पर निश्चय ही कोई उपाय नहीं है, जिससे मल त्याग करने वाली इन्द्रिय (गुदा) को सौ प्रकार से धोने पर भी वह श्रेष्ठ इन्द्रिय नहीं बनती।</p><p><strong>आप्तद्वेषाद् भवेन्मृत्युः परद्वेषात्तु धनक्षयः।<br>राजद्वेषाद् भवेन्नाशो ब्रह्मद्वेषात्कुलक्षयः ॥११॥</strong><br>आत्मद्वेष से मनुष्य मृत्यु का ग्रास बनता है, दूसरों से द्वेष करने से धन का क्षय होता है, राजा से द्वेष करने से स्वयं का नाश होता है और ब्राह्मण से द्वेष करने से कुल नष्ट हो जाता है।</p><p><strong>वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्रसेवितं, द्रुमालयः पत्रफलाम्बु सेवनम्।<br>तृणेषु शय्या शतजीर्णवल्कलं, न बन्धुमध्ये धनहीनजीवनम् ॥१२॥</strong><br>मनुष्य बाघ और हाथी जैसे भयंकर जीवों से घिरे वन में रहले। वृक्ष पर मकान बनाकर, फल और पत्ते खाकर, नदी का जल पीकर और पेड़ों की छाल के वस्त्र पहनकर रह ले, किन्तु धनहीन होकर अपने बन्धु-बान्धवों के बीच न रहे।</p><p><strong>विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं सन्ध्या, वेदाः पत्रम शास्त्रा धर्मकर्माणि<br>तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं, छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ॥१३॥</strong><br>ब्राह्मण वृक्ष है और सन्ध्या उपासना (प्रातः, दोपहर एवं सायं अर्थात् सन्धि कालों में की जाने वाली ईश्वर की आराधना) उस वृक्ष की जड़ है, चारों वेद उस वृक्ष की शाखाएँ हैं, <a
href="/category/dharma/">धर्म</a>-कर्म उसके पत्ते हैं, इसलिए मूल की प्रयत्नपूर्वक एवं सावधानी से रक्षा करनी चाहिए क्योंकि मूल के नष्ट हो जाने पर न शाखा ही रहेगी और न ही पत्ते शेष रहेंगे।</p><p><strong>माता च कमला देवी पिता देवो जनार्दनः।<br>बान्धवा विष्णुभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥१४॥</strong><br><a
href="/laxmi-chalisa/">लक्ष्मी जी</a> जिसकी माता और सर्वव्यापक ईश्वर जिसका पिता तथा <a
href="/vishnu-chalisa-in-hindi/">भगवान विष्णु</a> के भक्त जिसके बन्धु बान्धव हैं, उसके लिए तीनों लोक अपने ही देश के समान हैं।</p><p><strong>एक वृक्षे समारूढा नानावर्णविहंगमाः।<br>प्रभाते दिक्षु गच्छन्ति तत्र का परिवेदना ॥१५॥</strong><br>अनेक रंग-रूपों के पक्षी एक वृक्ष पर बैठते हैं और प्रभातबेला में दसों दिशाओं में उड़ जाते हैं, इस बारे में कैसा शोक?</p><p><strong>बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्।<br>वने सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥१६॥</strong><br>जिसके पास बुद्धि है उसी के पास बल है। बुद्धिहीन के पास बल कहाँ? जंगल में बल के मद से उन्मत्त शेर बुद्धिमान खरगोश के द्वारा मारा गया।</p><p><strong>का चिन्ता मम जीवने यदि हरिर्विश्वम्भरो गीयते, नो चेदर्भकजीवनाय जननीस्तन्यं कघं निर्मयेत्।<br>इत्यालोच्य मुहुर्मुहुर्यदुपते लक्ष्मीपते केवलं, त्वात्पादाम्बुजसेवनेन सततं कालो मया नीयते ॥१७॥</strong><br>जब श्री हरि विश्वम्भर कहलाते हैं अर्थात् सारे जगत का पालन-पोषण करने वाले हैं, तो मुझे जीवन में किस बात की चिंता है। यदि श्री नारायण विश्वम्भर न होते तो गर्भ में आने पर शिशु के लिए माँ के स्तनों में दूध किस प्रकार आ जाता है। हे जगत नारायण! आपके जगत-भर्त्ता होने के विश्वास के कारण ही मैं अपना समय आपके श्री चरणों की सेवा में व्यतीत करता हूँ।</p><p><strong>गीर्वाणवाणीषु विशिष्टबुद्धि स्तथाऽपि भाषान्तर लोलुपोऽहम्।<br>यथा सुरगणेष्वमृते च सेविते स्वर्गांगनानामधरासवे रुचिः ॥१८॥</strong><br>यद्यपि मैं संस्कृत भाषा में विशिष्ट बुद्धि रखता हूँ फिर भी दूसरी भाषाओं को जानने का लोभ उसी प्रकार करता हूँ जैसे अमृत के विद्यमान होने पर भी देवताओं की इच्छा स्वर्ग की अप्सराओं के अधर रस का पान करने के लिए आतुर रहती है।</p><p><strong>अन्नाद् दशगुणं पिष्टं पिष्टाद् दशगुणं पयः।<br>पयसोऽष्ट गुणं मांसं मांसाद् दशगुणं घृतम् ॥१९॥</strong><br>अन्न से दस गुना गुण आटे में है। आटे से दस गुना अधिक शक्ति दूध में है। दूध से आठ गुना अधिक शक्ति मांस में है और मांस से दस गुना अधिक शक्ति घी में है।</p><p><strong>शाकेन रोगाः वर्धन्ते पयसा वर्धते तनुः।<br>घृतेन वर्धते वीर्य मांसान्मांसं प्रवर्घते ॥२०॥</strong><br>अस्वच्छ साग से रोग बढ़ते हैं। दूध से शरीर बढ़ता है। घी से वीर्य बढ़ता है और मांस से मांस बढ़ता है।</p><p>हमें उम्मीद है कि चाणक्य नीति का दसवाँ अध्याय पुस्तक के अन्य अध्यायों की ही तरह आपके लिए ज्ञानवर्धक रहेगा। आचार्य चाणक्य का यह ग्रंथ गागर में सागर के समान है। इसके प्रत्येक श्लोक में व्यावहारिक ज्ञान के अद्भुत सूत्र छिपे हुए हैं। चाणक्य नीति का दसवाँ अध्याय भी ऐसे ही सूत्रों से परिपूर्ण है। पढ़ें और लाभ उठाएँ।</p><h2 class="wp-block-heading">संबंधित लेख</h2><ul><li><a
href="/chanakya-ke-kadwe-vachan/">चाणक्य के कड़वे वचन</a></li><li><a
href="https://hindipath.com/chanakya-niti-sutra-sangrah-hindi/">चाणक्य नीति सूत्र संग्रह</a></li></ul><p>The post <a
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