<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss
version="2.0"
xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
><channel><title>Harriet Hale Archives - हिंदी पथ</title> <atom:link href="https://hindipath.com/tag/harriet-hale/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" /><link>https://hindipath.com/tag/harriet-hale/</link> <description>हिंदी का संसार</description> <lastBuildDate>Mon, 04 Apr 2022 09:09:16 +0000</lastBuildDate> <language>en-US</language> <sy:updatePeriod> hourly </sy:updatePeriod> <sy:updateFrequency> 1 </sy:updateFrequency> <generator>https://wordpress.org/?v=6.3.8</generator><image> <url>https://hindipath.com/wp-content/uploads/2019/09/HindiPath-Site-Icon-New.png</url><title>Harriet Hale Archives - हिंदी पथ</title><link>https://hindipath.com/tag/harriet-hale/</link> <width>32</width> <height>32</height> </image> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी तथा हैरियट हेल को लिखित (28 नवम्बर, 1896)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-mary-and-harriet-28-november-1896/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-mary-and-harriet-28-november-1896/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Sun, 28 Mar 2021 07:54:57 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Harriet Hale]]></category> <category><![CDATA[Mary Hale]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5388</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र लन्दन से कुमारी मेरी तथा हैरियट हेल को 28 नवम्बर, 1896 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-mary-and-harriet-28-november-1896/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी तथा हैरियट हेल को लिखित (28 नवम्बर, 1896)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी मेरी तथा हैरियट हेल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">३९, विक्टोरिया स्ट्रीट,<br>लन्दन,<br>२८ नवम्बर, १८९६</p><p>प्रिय बहनो,</p><p>चाहे जिस कारण से भी हो, मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि तुम चारों से ही मैं सबसे अधिक स्नेह करता हूँ एवं मुझे अत्यन्त गर्व के साथ यह विश्वास है कि तुम चारों भी मुझसे वैसा ही स्नेह करती हो। इसलिए भारत रवाना होने से पूर्व तुम लोगों को यह पत्र स्वयं ही आत्मप्रेरित होकर लिख रहा हूँ। लन्दन में हमारे कार्य को जबरदस्त सफलता मिली है। अंग्रेज लोग अमेरिकनों की तरह उतने अधिक सजीव नहीं हैं, किन्तु यदि कोई एक बार उनके हृदय को छू ले तो फिर सदा के लिए वे उसके गुलाम बन जाते हैं। धीरे-धीरे मैं उन पर अपना अधिकार जमा रहा हूँ। आश्चर्य है कि छः माह के अन्दर ही सार्वजनिक भाषणों के अलावा भी मेरी कक्षा में १२० व्यक्ति नियमित रूप से उपस्थित हो रहे हैं। अंग्रेज लोग अत्यन्त कार्यशील हैं, अतः यहाँ के सभी लोग क्रियात्मक रूप से कुछ करना चाहते हैं। कैप्टन तथा श्रीमती सेवियर एवं श्री गुडविन कार्य करने के लिए मेरे साथ भारत रवाना हो रहे हैं और उसका व्यय-भार भी वे स्वयं उठायेंगे। यहाँ पर और भी बहुत से लोग इस प्रकार कार्य करने को प्रस्तुत हैं। प्रतिष्ठित स्त्री-पुरुषों के मस्तिष्क में एक बार किसी भावना को प्रवेश करा देने पर, उसे कार्य में परिणत करने के लिए वे अपना सब कुछ त्याग करने के लिए कटिबद्ध हो जाते हैं! और सबसे अधिक आनन्दप्रद समाचार (यह कोई साधारण बात नहीं) यह है कि भारत में कार्य प्रारम्भ करने के लिए हमें आर्थिक सहायता प्राप्त हो गयी है एवं आगे चलकर और भी प्राप्त होगी। अंग्रेज जाति के सम्बन्ध में मेरी धारणा पूर्णतया बदल चुकी है। अब मुझे यह पता चल रहा है कि अन्यान्य जातियों की अपेक्षा प्रभु ने उन पर अधिक कृपा क्यों की है। वे दृढ़ संकल्प तथा अत्यन्त निष्ठावान हैं; साथ ही उनमें हार्दिक सहानुभूति है – बाहर उदासीनता का केवल एक आवरण रहता है। उसको तोड़ देना है, बस फिर तुम्हें अपनी पसन्द का व्यक्ति मिल जायगा।</p><p>इस समय कलकत्ता तथा हिमालय में मैं एक एक केन्द्र स्थापित करने जा रहा हूँ। प्रायः ७००० फुट ऊँची एक समूची पहाड़ी पर हिमालय-केन्द्र स्थापित होगा। वह पहाड़ी गर्मी की ऋतु में शीतल तथा जाड़े में ठंडी रहेगी। कैप्टन तथा श्रीमती सेवियर वहीं रहेंगे एवं यूरोपीय कार्यकर्ताओं का वह केन्द्र होगा, क्योंकि मैं उनको भारतीय रहन-सहन अपनाने तथा निदाघतप्त भारतीय समतल भूमि में बसने के लिए बाध्य कर मार डालना नहीं चाहता। मैं चाहता हूँ कि सैकड़ों की संख्या में हिन्दू युवक प्रत्येक सभ्य देश में जाकर वेदान्त का प्रचार करें और वहाँ से नर-नारियों को एकत्र कर कार्य करने के लिए भारत भेजें। यह आदान-प्रदान बहुत ही उत्तम होगा। केन्द्रों को स्थापित कर मैं ‘जॉब का ग्रन्थ’१ में वर्णित उस व्यक्ति की तरह ऊपर-नीचे चारों ओर घूमूँगा।</p><p>आज यहीं पर पत्र को समाप्त करना चाहता हूँ – नहीं तो आज की डाक से रवाना न हो सकेगा। सभी ओर से मेरे कार्यों के लिए सुविधा मिलती जा रही है – तदर्थ मैं अत्यन्त सुखी हूँ एवं मैं समझता हूँ कि तुम लोगों को भी मेरी तरह सुख का अनुभव होगा। तुम्हें अनन्त कल्याण तथा सुख-शान्ति प्राप्त हो। अनन्त प्यार के साथ –</p><p>शुभाकांक्षी,</p><p
class="has-text-align-right">विवेकानन्द</p><p>पुनश्च – धर्मपाल का क्या समाचार है? वह क्या कर रहा है? उससे भेंट होने पर मेरा स्नेह कहना।</p><p
class="has-text-align-right">वि.</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-mary-and-harriet-28-november-1896/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी तथा हैरियट हेल को लिखित (28 नवम्बर, 1896)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-mary-and-harriet-28-november-1896/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी हैरियेट हेल को लिखित (17 सितम्बर, 1896)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-harriet-hale-17-september-1896/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-harriet-hale-17-september-1896/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Fri, 26 Mar 2021 11:21:36 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Harriet Hale]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5363</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र इंग्लैण्ड से कुमारी हैरियेट हेल को 17 सितम्बर, 1896 लिखा था। पढ़ें विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में। और आनंद ले।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-harriet-hale-17-september-1896/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी हैरियेट हेल को लिखित (17 सितम्बर, 1896)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/download-the-complete-works-of-swami-vivekananda-in-hindi-free/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी हैरियेट हेल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">एयरली लॉज, रिजवे गार्डन्स,<br>विम्बलडन, इंग्लैण्ड,<br>१७ सितम्बर, १८९६</p><p>प्रिय बहन,</p><p>स्विट्जरलैण्ड से यहाँ वापस आने पर अभी-अभी तुम्हारा अत्यन्त शुभ समाचार मिला। ‘चिरकुमारी आश्रम’ (Old Maids Home) में प्राप्य सुख के बारे में आखिर तुमने अपना मत परिवर्तन किया है, उससे मुझे बहुत ही खुशी हुई। अब तुम्हारा यह सिद्धान्त बिल्कुल ठीक है कि नब्बे प्रतिशत व्यक्तियों के लिए विवाह जीवन का सर्वोत्तम ध्येय है और जब वे इस चिरन्तन सत्य का अनुभव कर उसका अनुसरण करने को प्रस्तुत हो जायेगे, उन्हें सहनशीलता और क्षमाशीलता अपनानी पड़ेगी तथा जीवन-यात्रा में मिल-जुलकर चलना पड़ेगा, तभी उनका जीवन अत्यन्त सुखपूर्ण होगा।</p><p>प्रिय हैरियेट, तुम यह निश्चित जानना कि ‘सम्पन्न जीवन’ में अन्तर्विरोध है। अतः हमें सर्वदा इस बात की सम्भावना स्वीकार करनी चाहिए कि हमारे उच्चतम आदर्श से निम्न श्रेणी की ही वस्तुएँ हमें मिलेंगी, यह समझ लेने पर प्रत्येक वस्तु का हम अधिक से अधिक सदुपयोग करेंगे। मैं जहाँ तक तुमको जानता हूँ, उससे मेरी धारणा बनी है कि तुम्हारे अन्दर ऐसी प्रशांत शक्ति विद्यमान है, जो क्षमा तथा सहनशीलता से पर्याप्त पूर्ण है। अतः मैं निश्चित रूप से यह भविष्यवाणी कर सकता हूँ कि तुम्हारा दाम्पत्य-जीवन अत्यन्त सुखमय होगा।</p><p>तुम तथा तुम्हारे वाग्दत्त पति को मेरा आशीर्वाद। प्रभु तुम्हारे पति के हृदय में सर्वदा यह बात जाग्रत रखें कि तुम जैसी पवित्र, सच्चरित्र, बुद्धिशालिनी, स्नेहमयी तथा सुन्दरी सहधर्मिणी को पाना उनका सौभाग्य था। इतने शीघ्र ‘अटलांटिक’ महासागर पार करने की मेरी कोई सम्भावना नहीं है, यद्यपि मेरी यह हार्दिक अभिलाषा है कि तुम्हारे विवाह में उपस्थित रहूँ।</p><p>ऐसी दशा में हम लोगों की एक पुस्तक में से कुछ अंश उद्धृत करना ही मेरे लिए उत्तम है : ‘अपने पति को इहलोक की समस्त काम्य वस्तुओं की प्राप्ति करने में सहायता प्रदान कर, तुम सर्वदा उनके ऐकान्तिक प्रेम की अधिकारिणी बनो; अनन्तर पौत्र-पौत्रियों की प्राप्ति के बाद जब आयु समाप्त होने लगे, तब जिस सच्चिदानन्द सागर के जलस्पर्श से सब प्रकार के विभेद दूर हो जाते हैंं एवं हम सब एक में परिणत होते हैं, उन्हें प्राप्त करने के लिए तुम दोनों परस्पर सहायक बनो।’</p><p>‘उमा की तरह तुम जीवन भर पवित्र तथा निष्काम रहो तथा तुम्हारे पति का जीवन शिव जैसा उमागतप्राण हो!’</p><p
class="has-text-align-right">तुम्हारा स्नेहाधीन भाई,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-harriet-hale-17-september-1896/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी हैरियेट हेल को लिखित (17 सितम्बर, 1896)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-harriet-hale-17-september-1896/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – मेरी तथा हेरियट हेल को लिखित (31 जुलाई, 1894)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-mary-or-harriet-hale-31-july-1894/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-mary-or-harriet-hale-31-july-1894/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 04 Mar 2021 07:38:52 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Harriet Hale]]></category> <category><![CDATA[Mary Hale]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=4646</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र इलियट मेन से मेरी तथा हेरियट हेल को 31 जुलाई, 1894 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-mary-or-harriet-hale-31-july-1894/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – मेरी तथा हेरियट हेल को लिखित (31 जुलाई, 1894)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का मेरी तथा कुमारी हेल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">ग्रीनेकर सराय, इलियट, मेन,<br>३१ जुलाई, १८९४</p><p>प्रिय बहनों,</p><p>बहुत दिनों से तुम लोगों को मैंने कोई पत्र नहीं लिखा, लिखने लायक कोई खास समाचार भी नहीं था। यह एक बड़ी सराय तथा खेत-घर है। यहाँ पर ईसाई वैज्ञानिकों की<sup>1 </sup>समिति की एक बैठक हो रही है। इस बैठक की संयोजिका ने गत वसन्त ऋतु में, जब मैं न्यूयार्क में था, मुझे यहाँ आने के लिए निमन्त्रित किया था, और इसीलिए मैं यहाँ पर आया हूँ। निःसन्देह यह स्थान सुन्दर तथा ठण्डा है और शिकागो के मेरे अनेक पुराने मित्र भी यहाँ उपस्थित हैं। श्रीमती मिल्स तथा कुमारी स्टॉकहम तुम्हें याद होंगी, कुछ और स्त्री-पुरुषों के साथ वे नदी के किनारे की खुली जगह में तम्बू लगाकर रह रही हैं। उनका समय बहुत आनन्दपूर्वक बीत रहा है तथा कभी-कभी लोग दिन भर, तुम जिसे वैज्ञानिक पोशाक कहती हो, पहने रहते हैं। भाषण प्रायः प्रतिदिन होते हैं। बोस्टन से श्री कॉलबिल नाम के एक सज्जन आये हुये हैं। वे अपना प्रतिदिन का भाषण कहा जाता है कि प्रेताविष्ट होकर देते हैं। ‘यूनिवर्सल ट्रुथ्’ की सम्पादिका (?) जो जिमि मिल्स नामक भवन की ऊपरी मंजिल पर रहती थीं, यहाँ आकर बस गयी हैं। वे धार्मिक उपासना की परिचालना कर रही हैं तथा मानसिक शक्ति के द्वारा सब प्रकार की बीमारियों को दूर करने की शिक्षा भी दे रही हैं; मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि शीघ्र ही ये लोग अन्धों को नेत्रदान तथा इसी प्रकार के अन्य कार्य भी करने लगेंगे। यह एक अजीब सम्मेलन है। सामाजिक विधि-निषेधों की इन्हें विशेष कोई परवाह नहीं, ये लोग काफी स्वच्छन्द तथा खुश हैं। श्रीमती मिल्स एक अच्छी-खासी प्रतिभाशालिनी महिला हैं। ऐसी और भी अनेक महिलाएँ हैं। श्रीमती च्यापन नामक एक महिला को मैंने विधवा समझा था किन्तु अब पता चला है कि उनके पति जीवित हैं। वे अत्यन्त रूपवती हैं। डिट्रॉएट की रहने वाली एक दूसरी अत्यन्त शिक्षित एवं सुन्दर, काली आँखों तथा लम्बे केशों वाली महिला मुझे समुद्रतट से १५ मील की दूरी पर एक द्वीप में ले जा रही हैं। आशा है, वहाँ हम लोगों का समय अच्छा बीतेगा। कुमारी आर्थर स्मिथ भी यहीं पर हैं। कुमारी गर्नजी स्वाम्पस्कॉट से घर गयी हैं। यहाँ से मेरी एनिस्क्वाम जाने की सम्भावना है। यह स्थान अत्यन्त सुन्दर तथा मनोरम है, नहाने की यहाँ बड़ी सुविधा है। कोरा स्टॉकहम ने मेरे लिए नहाने की एक पोशाक ला दी है और मैं बत्तख की तरह जल का आनन्द ले रहा हूँ – यह स्थान बड़ा ही सुन्दर है यहाँ तक कि मड्ह्रिल (Mudville) में रहने वालों के लिये भी।</p><p>और विशेष कुछ लिखने का मुझे अवसर नहीं, मैं इस समय इतना अधिक व्यस्त हूँ कि मदर चर्च को पृथक् पत्र लिखने तक का मुझे समय नहीं है। कुमारी हाउ से मेरा प्यार तथा श्रद्धा निवेदन करना।</p><p>बोस्टन के श्री वुड भी यहीं हैं, जो तुम्हारे सम्प्रदाय के एक प्रधान ज्योतिष हैं। किन्तु श्रीमती व्हर्लपूल<sup>2</sup> के सम्प्रदाय में सम्मिलित होने में उन्हें घोर आपत्ति है। वे इसलिए अपने को दार्शनिक-रासायनिक-भौतिक-आध्यात्मिक आदि और भी न जाने कितनी व्याधियों के मानसिक चिकित्सक के रूप में परिचित करना चाहते हैं। कल यहाँ एक भीषण चक्रवात आया था, फलस्वरूप तम्बुओं की अच्छी ‘चिकित्सा’ हुई है। जिस बड़े तम्बू के नीचे उन लोगों के भाषण हो रहे थे, उस ‘चिकित्सा’ के फलस्वरूप उसकी आध्यात्मिकता इतनी बढ़ गयी कि वह मर्त्य आँखों से एकदम अन्तर्हित हो गया और उस आध्यात्मिकता से विभोर होकर प्रायः दो सौ कुर्सियाँ जमीन पर नृत्य करने लगीं! मिल्स कम्पनी की श्रीमती फिग्स प्रतिदिन सुबह नियमित रूप से प्रवचन करती हैं, और श्रीमती मिल्स अत्यन्त व्यस्तता के साथ सब जगह उछल-कूद रही हैं – वे सभी लोग अत्यन्त आनन्द में मस्त हैं। मैं विशेषकर ‘कोरा’ को देखकर अत्यन्त आनन्दित हूँ, क्योंकि पिछले जाड़े में उन लोगों को विशेष कष्ट उठाना पड़ा था और थोड़ा आनन्द उसके लिए लाभकर ही होगा। वे लोग तम्बुओं में किस प्रकार की स्वाधीनता उपभोग करते हैं यह सुनकर तुम्हें आश्चर्य होगा, किन्तु ये लोग सभी बड़े सज्जन तथा शुद्धात्मा हैं – कुछ मनचले अवश्य है, और कुछ नहीं।</p><p>मैं आगामी <a
href="/aaj-shaniwar-hai-bhajan-lyrics/">शनिवार</a> तक यहाँ रहूँगा, अतः इस पत्र के मिलते ही यदि तुम इसका जवाब दो, तो यहाँ से रवाना हो जाने के पहले मुझे वह मिल सकता है।</p><p>एक युवक यहाँ प्रतिदिन गाता है – वह पेशेवर गवैया है; अपनी वाग्दत्ता वधू तथा बहन के साथ वह यहाँ है। उसकी भावी पत्नी भी अच्छा गाती है तथा देखने में अत्यन्त सुन्दर है। अभी उस रात छावनी के सभी लोग एक पेड़ के नीचे सोये थे, जिसके नीचे मैं हर रोज प्रातःकाल हिन्दू-रीति से बैठकर इन लोगों को उपदेश देता हूँ। मैं भी उन लोगों के साथ गया था – तारों के नीचे धरती माता की गोद में सोये हुये हम लोगों ने एक अच्छी रात बितायी, खासकर मैंने तो हर घड़ी उसका पूरा आनन्द लिया। धरती पर सोना, जंगल में पेड़ के नीचे बैठकर ध्यान लगाना, मेरे एकवर्ष के कठोर जीवन के बाद उस रात के आनन्द का मैं वर्णन नहीं कर सकता। सराय में रहने वाले लोग कमोवेश अच्छी स्थिति के हैं और जो लोग तम्बू में रहते हैं, वे सभी स्वस्थ, सबल, शुद्ध तथा सरल प्रकृति के हैं। मैं उन्हें ‘शिवोऽहम्’ ‘शिवोऽहम्’ सिखाता हूँ और वे लोग उसे दुहराते रहते हैं; सभी सरल तथा पवित्र हैं, एवं बिल्कुल निर्भीक। अतः मैं अत्यन्त आनन्दित हूँ, कृतार्थ हूँ। मैं ईश्वर का आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे धन नहीं दिया और इन तम्बुओं में रहने वाले इन बच्चों को गरीब बनाया। तुनक-मिजाज, ऐशपसन्द स्त्री-पुरुष होटल में ठहरे हुये हैं, किन्तु वज्रदेही, वज्रहृदय, पावकसम उत्साह-सम्पन्न लोग तम्बुओं में हैं। कल जब मूसलाधार वर्षा हो रही थी और चक्रवात सब कुछ उलट-पलट रहा था, उस समय ये निडर वीरहृदय लोग आत्मा की महिमा में प्रतिष्ठित होकर तम्बुओं को उड़ा ले जाने से रोकने के लिए उनकी रस्सियों को पकड़कर ऐसे झूल रहे थे कि यदि तुम उस दृश्य को देखती, तो तुम्हें प्रसन्नता होती। मैं ऐसे लोगों को देखने के लिए सौ मील चलने को तैयार हूँ। प्रभु इनका कल्याण करें। आशा है, तुम लोग अपने सुन्दर ग्राम्य जीवन का आनन्द ले रही होगी। मेरे लिए तुम किंचित्मात्र भी चिन्तित न होना – मेरी देख-भाल हो जायेगी, और अगर होती नहीं है तो मैं समझूँगा कि मेरा जाने का समय आ चुका है और मैं चल दूँगा।</p><p>‘हे माधव, लोग तुम्हें बहुत कुछ भेंट करते हैं – मैं गरीब हूँ किन्तु मेरे पास मेरा शरीर, मन तथा आत्मा है – ये सब कुछ तुम्हारे पादपद्मों में समर्पित कर रहा हूँ। हे जगन्नाथ इन्हें तुम अंगीकार कर लो, अस्वीकार न करो।’ इस प्रकार मैं चिरकाल के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर चुका हूँ। एक बात और। यहाँ के लोग कुछ शुष्क प्रकृति के हैं; सारे जगत् में ऐसे लोगों की संख्या बहुत ही कम है, जो शुष्क न हों। वे लोग ‘माधव’ को नहीं समझ पाते। या तो वे ज्ञानार्जन भर करना चाहते हैं अथवा झाड़-फूँक से बीमारी दूर करना, टेबिल पर भूत उतारना, डाकिनी विद्या इत्यादि में प्रवृत्त होते हैं। इस देश में ‘प्रेम जीवन, स्वाधीनता’ की जितनी बातें सुनायी देती हैं, उतनी मुझे और कहीं भी नहीं सुनायी दीं, परन्तु इन विषयों में यहाँ के लोगों की धारणा जितनी कम है, उतनी और कहीं नहीं है। यहाँ ईश्वर या तो भय का प्रतीक है या रोग दूर करने वाली एक शक्ति अथवा किसी प्रकार का स्पन्दन आदि। प्रभु इनका मंगल करें! और फिर भी ये लोग दिन-रात तोते की तरह ‘प्रेम’, ‘प्रेम’ की रट लगाते रहते हैं।</p><p>अच्छे सपनों, अच्छी भावनाओं के लिये मेरी शुभकामनायें सदा तुम्हारे साथ हों। तुम अच्छी हो, उदार हो। चेतन को जड़ में परिणत करने के बजाय अर्थात् आध्यात्मिक सत्ता को साधारण लोगों की भाँति स्थूल, भौतिक स्तर पर ले आने के बजाय जड़ को चैतन्य से बदल डालो, हर रोज सुन्दरता, शान्ति तथा पवित्रता के उस जगत की कम से कम एक झलक तो देख ही लिया करो और रात-दिन उसी में डूबे रहने की चेष्टा करती रही। किसी अतिप्राकृत वस्तु को पाने की कभी चेष्टा न करो, पैर की अँगुलियों से भी ऐसी वस्तुओं का स्पर्श न करो। तुम्हारे मन सर्वदा अविच्छिन्न तैलधारावत् तुम्हारे हृदय-सिंहासननिवासी उस प्रियतम के पादपद्मों में दिन रात रत हो और उसके सिवाय देह आदि की ओर तुम्हारा ध्यान न जाय।</p><p>जीवन क्षणस्थायी है, एक क्षणिक स्वप्न; यौवन तथा सौन्दर्य नश्वर हैं। दिन-रात यही जपती रहो – ‘तुम्हीं मेरे पिता हो, माता हो, पति हो, प्रिय हो, प्रभु हो तथा ईश्वर हो – मैं तुम्हारे सिवाय और कुछ भी नहीं चाहती, कुछ भी नहीं चाहती, कुछ भी नहीं चाहती। तुम मुझमें हो, मैं तुममें हूँ – तुममें और मुझमें कोई अन्तर नहीं।’ धन नष्ट हो जाता है, सौन्दर्य विलीन हो जाता है, जीवन तेजी से समाप्त हो जाता है तथा शक्ति लुप्त हो जाती है, किन्तु प्रभु चिरकाल विद्यमान रहते हैं, प्रेम निरन्तर बना रहता है। यदि इस देहयन्त्र को बनाये रखने में किसी प्रकार का गौरव माना जाय, तो दैहिक कष्टों से आत्मा को पृथक् रखना उससे कहीं अधिक गौरव की बात है। जड़ के साथ किसी प्रकार का सम्पर्क न रखना ही इस बात का एकमात्र प्रमाण है कि तुम जड़ नहीं हो।</p><p>ईश्वरासक्त हो जाओ। देह का या कुछ और का क्या हो उस की क्या परवाह? पाप की विभीषिका में यही कहो कि हे मेरे भगवन्! हे मेरे प्रिय! मृत्युकालीन यातना में भी यही कहो कि हे मेरे भगवन्! हे मेरे प्रिय! संसार के सभी पापों में भी यही कहती रहो कि हे मेरे भगवान्! हे मेरे प्रिय! तुम यहीं हो, मैं तुम्हें देख रही हूँ। तुम मेरे साथ हो, मैं तुम्हारा अनुभव कर रही हूँ। मैं तुम्हारी हूँ, मुझे ग्रहण करो। मैं इस जगत् की नहीं हूँ, मैं तो तुम्हारी हूँ, अतः मुझे न त्यागो। इस हीरे की खान को छोड़कर काँच के टुकड़ों को ढूँढ़ने में प्रवृत्त न हो। यह जीवन एक महान् सुयोग है – क्या, तुम इसकी अवहेलना कर सांसारिक सुख में फँसना चाहती हो? वे निखिल आनन्द के मूल स्त्रोतस्वरूप हैं, उस परम श्रेयस् का अनुसन्धान करो, उस परम श्रेयस् को ही तुम्हारे जीवन का लक्ष्य बनाओ और तुम परम श्रेयस् को प्राप्त हो जाओगी।</p><p
class="has-text-align-right">साशीर्वाद तुम्हारा,<br>विवेकानन्द</p><hr
class="wp-block-separator"/><ol><li>ईसाई वैज्ञानिक ( Christian Scientist ) अमेरिका का एक सम्प्रदाय विशेष है। उनका यह दावा है कि ईसा की तरह अलौकिक उपायों के द्वारा ये लोग भी रोग दूर कर सकता हैं। स.</li><li>ईसाई वैज्ञानिक सम्प्रदाय की स्थापना करनेवाली श्रीमती एडी को स्वामी जी परिहासपूर्वक Mrs. Whirlpool (आवर्त) कहते थे, क्योंकि Eddy तथा Whirlpool पर्यायवाचक शब्द हैं। स०</li></ol><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-mary-or-harriet-hale-31-july-1894/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – मेरी तथा हेरियट हेल को लिखित (31 जुलाई, 1894)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-mary-or-harriet-hale-31-july-1894/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – मेरी हेल तथा हेरियट हेल को लिखित (26 जून, 1894)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-mary-hale-or-harriet-hale-26-june-1894/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-mary-hale-or-harriet-hale-26-june-1894/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 04 Mar 2021 07:28:55 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Harriet Hale]]></category> <category><![CDATA[Mary Hale]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=4633</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र शिकागो से मेरी हेल तथा हेरियट हेल को 26 जून, 1894 लिखा था। पढ़ें विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-mary-hale-or-harriet-hale-26-june-1894/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – मेरी हेल तथा हेरियट हेल को लिखित (26 जून, 1894)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का मेरी हेल तथा हेरियट हेल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">द्वारा श्री जार्ज. डब्ल्यू. हेल,<br>५४, डियरबोर्न एवेन्यू, शिकागो,<br>२६ जून, १८९४</p><p>प्रिय बहनों,</p><p>हिन्दू के <a
href="/tulsidas-ka-jivan-parichay-hindi/">महाकवि तुलसीदास</a> ने अपने <a
href="/ramayan-ke-paath-ki-mahima-pratham-adhyay/">रामायण</a> के स्वस्ति-वाचन में लिखा है – ‘मैं साधु तथा असाधु दोनों की ही चरणवन्दना करता हूँ, किन्तु हाय, मेरे लिए दोनों ही समान रूप से दुःखदायी हैं। असाधु व्यक्ति मेरे समीप आकर मुझे अत्यन्त दुःख पहुँचाते हैं और साधु व्यक्ति जब मुझे छोड़ जाते हैं, तब वे अपने साथ ही मेरे प्राणों को हर ले जाते हैं।’<sup>1</sup></p><p>मैं इस बात को मानता हूँ। जिन भगवत्प्रिय साधु जनों के प्रति प्रेम तथा जिनकी सेवा ही मेरे लिए इस संसार में सुख व प्रेम का एकमात्र अवलंबन है, उनका विरह मेरे लिए मृत्यु यंत्रणा के समान है किन्तु ये सब आवश्यक हैं। हे मेरे प्रियतम के वेणुसंगीत, मुझे ले चलो – मैं तुम्हारा ही अनुसरण कर रहा हूँ। उदारमना, मधुर-प्रकृति, सहृदय, तुम जैसे पवित्र लोगों से वियुक्त होकर मुझे जो कष्ट हो रहा है, जो यातनाएँ मिल रही हैं, उसे व्यक्त करना मेरे लिए असम्भव है। हाय, यदि मैं स्टोइक (एूदग्म्) दार्शनिकों की तरह सुख-दुःख में निर्विकार रह सकता!</p><p>आशा है, तुम लोग सुन्दर ग्रामीण दृश्यों का आनन्द ले रही होगी।</p><p>या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।<br>यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥</p><p>– ‘समस्त प्राणियों के लिए जो रात्रि है, संयमी पुरुष उसमें जागते रहते हैं और जब प्राणिसमूह जागते रहते हैं, आत्मज्ञानी मुनि के लिए तब वह रात्रि स्वरूप है।<sup>2</sup></p><p>इस जगत् की धूल तक भी तुम्हारा स्पर्श न कर सके, क्योंकि कवियों का ही कहना है कि यह जगत् फूल-मालाओं से ढका हुआ एक सड़ा मुर्दा है। यदि तुमसे हो सके, तो इसका स्पर्श तक न करना। तुम तो स्वर्गस्थ विहंगमों के शिशु शावक हो – इससे पहले कि तुम्हारे पैर इस दूषित पंकराशि को, इस संसार को स्पर्श करें, चले आओ, उड़कर आकाश की ओर चले आओ।</p><p>‘ओ तुम, जो जाग रहे हो, फिर से मत सो जाना।’</p><p>‘जागतिक प्राणियों के लिए प्रेम करने की अनेक वस्तुएँ हैं – उनको उनसे प्रेम करने दो। हमारे प्रेमास्पद तो एक ही हैं – और वे हैं हमारे प्रभु। वे क्या क्या कहते हैं, इसकी हमें कोई परवाह नहीं। किन्तु जब वे हमारे प्रेमास्पद पर विकट विशेषणों का आरोप कर उन्हें रंगना चाहते हैं, हमें भय लगता है। उन लोगों की जो मर्जी हो करते रहें, हमारे लिए तो वे केवल प्रेमास्पद ही हैं – मेरे प्रियतम, प्रियतम, प्रियतम, और कुछ भी नहीं।’</p><p>‘यह कौन जानना चाहता है कि उनमें कितनी शक्ति तथा कितने गुण हैं और हमारी भलाई करने का कितना सामर्थ्य उनमें विद्यमान है? हम निश्चित रूप से यही कहेंगे कि उनसे हमारा प्रेम धन के लिए नहीं है। हम अपने प्रेम का विक्रय नहीं करते। हमें इसकी आवश्यकता नहीं है। हम तो उसका वितरण करते हैं।’</p><p>‘हे दार्शनिक! क्या तुम हमसे उनके स्वरूप की, उनके ऐश्वर्य तथा गुण की बातें करना चाहते हो? मूर्ख! उनके अधर के एक चुम्बन मात्र के लिए यहाँ हमारे प्राण निकल रहे हैं। तुम अपनी उन व्यर्थ की वस्तुओं को अपने घर वापस ले जाओ और मेरे लिए मेरे प्रियतम का एक चुम्बन भेज दो – क्या तुम यह कर सकते हो?’</p><p>‘मूर्ख! किसके सम्मुख भय तथा आतंक से तुम अपने लड़खड़ाते घुटने टेक रहे हो? मैंने अपने गले के हार को उनके गले में डाल दिया है तथा उस में एक धागा बाँधकर उनको मैं अपने साथ लिवा ले जा रही हूँ – इस डर से कि कहीं क्षण भर के लिए भी वे मुझे छोड़कर अन्यत्र न चले जायें। वह हार प्रेम का हार है और वह धागा प्रेमोल्लास का धागा है। मूर्ख, तुम इस रहस्य को नहीं जानते कि वह असीम मेरे प्रेम के बन्धन में बँधकर मेरी मुट्ठी भर में आ जाता है। क्या तुम्हें यह नहीं मालूम कि विश्व के वे नियन्ता वृन्दावन की गोपियों की नूपुर-ध्वनि के साथ साथ नाचते फिरते थे?</p><p>उन्मत्त की तरह यह जो कुछ मैं लिख गया, उसे क्षमा कर देना। अव्यक्त को व्यक्त करने के प्रयास की मेरी इस धृष्टता को माफ कर देना – वह सिर्फ अनुभव का ही विषय है। सदा मेरा शुभाशीर्वाद लेना।</p><p
class="has-text-align-right">तुम्हारा भाई,<br>विवेकानन्द</p><hr
class="wp-block-separator"/><ol><li>बन्दौं सन्त असन्तन चरता । दुखप्रद उभय बीच कछु बरना ॥ बिछुरत एक प्रान हर लेई । मिलत एक दारुन दुख देई ॥</li><li>गीता ॥२।६९॥</li></ol><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-mary-hale-or-harriet-hale-26-june-1894/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – मेरी हेल तथा हेरियट हेल को लिखित (26 जून, 1894)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-mary-hale-or-harriet-hale-26-june-1894/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> </channel> </rss>