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><channel><title>Isabelle Mckindley Archives - हिंदी पथ</title> <atom:link href="https://hindipath.com/tag/isabelle-mckindley/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" /><link>https://hindipath.com/tag/isabelle-mckindley/</link> <description>हिंदी का संसार</description> <lastBuildDate>Sat, 10 Apr 2021 11:25:30 +0000</lastBuildDate> <language>en-US</language> <sy:updatePeriod> hourly </sy:updatePeriod> <sy:updateFrequency> 1 </sy:updateFrequency> <generator>https://wordpress.org/?v=6.3.8</generator><image> <url>https://hindipath.com/wp-content/uploads/2019/09/HindiPath-Site-Icon-New.png</url><title>Isabelle Mckindley Archives - हिंदी पथ</title><link>https://hindipath.com/tag/isabelle-mckindley/</link> <width>32</width> <height>32</height> </image> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखित (4 अप्रैल, 1895)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-isabelle-mckindley-4-april-1895/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-isabelle-mckindley-4-april-1895/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Fri, 19 Mar 2021 12:40:56 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Isabelle Mckindley]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5002</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र अमेरिका से कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को 4 अप्रैल, 1895 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-isabelle-mckindley-4-april-1895/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखित (4 अप्रैल, 1895)</a> appeared first on <a
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class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">संयुक्त राज्य अमेरिका,<br>४ अप्रैल, १८९५</p><p>प्रिय आलासिंगा,</p><p>तुम्हारा पत्र अभी मिला। कोई व्यक्ति मेरा अनिष्ट करने की चेष्टा कर सकता है, तुम इससे मत डरो। जब तक प्रभु मेरी रक्षा करते हैं, मैं अभेद्य रहूँगा। अमेरिका के सम्बन्ध में तुम्हारी धारणा बहुत अस्पष्ट है।… यह एक विशाल देश है और यहाँ के अधिकांश मनुष्य <a
href="/category/dharma/">धर्म</a> में विशेष रुचि नहीं रखते।… ईसाई धर्म देशभक्ति के रूप में स्थित है, इससे अधिक और कुछ नहीं… अब मेरे पुत्र, साहस न छोड़ो।… मुझे सब सम्प्रदायों के भाष्यों सहित वेदान्त सूत्र भेजो।… मैं ईश्वर के हाथ में हूँ। भारत लौटने से क्या लाभ होगा? भारत मेरे विचारों को आगे नहीं बढ़ा सकता। यह देश मेरे विचारों को उदारतापूर्वक अपनाता है। मुझे जब आज्ञा मिलेगी, तब मैं वापस जाऊँगा। तब तक तुम धैर्यपूर्वक और शान्त भाव से काम करो। यदि मेरे ऊपर कोई आक्रमण करे, तो उसके अस्तित्व को एक तरह से भूल जाओ।…मेरा विचार एक ऐसी सोसाइटी स्थापित करने का है, जहाँ वेद और वेदान्त के भाष्य सहित लोगों को शिक्षा मिल सके। अभी इस भाव से कार्य करो।… जितनी बार तुम्हें दुर्बलता का अनुभव होता है, यह समझो कि तुम न केवल अपने आपको बल्कि अपने उद्देश्य को भी हानि पहुँचा रहे हो। अनन्त शक्ति और श्रद्धा ही सफलता का कारण है।</p><p
class="has-text-align-right">सदैव आशीर्वादपूर्वक,<br>विवेकानन्द</p><p>पुनश्च – आनन्दपूर्वक रहो… अपने आदर्श पर स्थिर रहो… मुख्यतः हमेशा यह याद रखो कि कभी दूसरों को मार्ग दिखाने का या उन पर हुक्म चलाने का यत्न न करना, जैसा कि अमेरिकन लोग कहते हैं, शासन (Boss) मत करो। सबके दास बने रहो।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-isabelle-mckindley-4-april-1895/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखित (4 अप्रैल, 1895)</a> appeared first on <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5000</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र न्यूयार्क से कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को 27 मार्च, 1895 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
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class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">५४, पश्चिम ३३,<br>न्यूयार्क,<br>२७ मार्च, १८९५</p><p>प्रिय बहन,</p><p>तुम्हारे कृपापत्र ने मुझे अनिर्वचनीय आनन्द दिया है। उसे मैंने बड़ी आसानी से पूरा पढ़ लिया। अंततः मैंने गेरुआ खोज ही निकाला और कोट बनवा लिया है। लेकिन, अभी तक गर्मियों के लिए कोई ऐसी चीज नहीं मिल सकी है। यदि तुम्हें मिले, तो कृपया मुझे सूचित करो। मैं न्यूयार्क में सिलवा लूँगा। तुम्हारा – डियरबोर्न एवेन्यू का अदभुत-अयोग्य दर्जी – साधुओं के कपड़े भी ठीक-ठाक तैयार नहीं कर सकता।</p><p>बहन लॉक ने मुझे लम्बी चिट्ठी लिखी है और उत्तर में विलंब का कारण जानना चाहती हैं। अतिरिक्त उत्साह में सहज ही बह जाती हैं वह, इसलिए मैं चुप हूँ। नहीं जानता, क्या जवाब दूँगा। कृपया मेरी ओर से उन्हें बता दो कि कोई स्थान निश्चित करना अभी मेरे लिए संभव नहीं। श्रीमती पीक भली हैं, महान् हैं और धर्मपरायण हैं – किन्तु, सांसारिक मामलों में उनकी बुद्धि की पहुँच मेरे ही बराबर है। हालाँकि मैं दिन-प्रतिदिन चतुर होता जा रहा हूँ। श्रीमती पीक से, वाशिंगटन के किसी अर्धपरिचित व्यक्ति ने गर्मियों के लिए कोई जगह देने का, प्रस्ताव किया है।</p><p>कौन जाने, वह किसी के चक्कर में पड़ जाएँ! ठगी और धोखाधड़ी के लिए यह बढ़िया देश है, जहाँ के ९९.९ प्रतिशत लोगों की नीयत, दूसरों से अनुचित लाभ उठाने की ही रहती है। आँख मूँदो कि पूरे गायब! बहन जोसेफिन उग्र स्वभाव की हैं। श्रीमती पीक सीधी-सादी महिला हैं। यहाँ के लोगों ने मेरे साथ ऐसा बढ़िया व्यवहार किया है कि अब बाहर कदम रखने के लिए मैं घण्टों अपने चारों ओर देखता रहता हूँ। सब ठीक-दुरुस्त हो जाएगा। बहन जोसेफिन से थोड़ा धीरज धरने को कहो।</p><p>‘बूढ़ों का घर’ चलाने से बेहतर है शिशुशाला चलाना – तुम प्रतिदिन यही अनुभव करती होगी, जहाँ तक मेरा अनुमान है। तुम श्रीमती बुल से मिलीं और मेरा ख्याल है, उनकी सरलता और घरेलू ढंग पर तुम्हें अचरज हुआ होगा। श्रीमती एडम्स से जब-तब मुलाकात तो होती होगी। श्रीमती बुल उनके पाठों से बहुत उपकृत हुई हैं। मैंने भी कुछ लिया था, लेकिन कोई फायदा नहीं! रोज-बरोज सामने बढ़नेवाला बोझ मुझे आगे झुकने नहीं देता – जैसा कि श्रीमती एडम्स चाहती हैं। चलते समय आगे झुकने की चेष्टा करते ही – केन्द्र की गुरुता पेट की सतह पर चली जाती है। इसलिए – मैं सामने की ओर तनकर ही आगे बढ़ता हूँ।</p><p>क्यों, कोई करोड़पति नहीं आ रहा? लखपति भी नहीं? बहुत दुःख की बात है!!! भई, मैं चेष्टा कर रहा हूँ, और क्या कर सकता हूँ! मेरे क्लासों में औरतें ही औरतें हैं। और, तुम किसी महिला से तो शादी नहीं कर सकतीं। अच्छी बात! धीरज धरो! मैं सतर्क दृष्टि से ढूँढ़ता रहूँगा और मौका मिलने पर चूकूँगा नहीं, यदि तुम्हें कोई नहीं मिला, तो यह मेरे आलस्य के कारण नहीं होगा।</p><p>जिन्दगी उसी पुरानी रफ्तार से चल रही है। कभी-कभी मैं अनन्त भाषणों और बकबक से ऊब जाता हूँ। लगातार कई दिनों तक मौन रहना चाहता हूँ।</p><p>तुम्हारे सुन्दर सपनों की आशा में (क्योंकि तुम्हारे सुखी होने का वही एक मार्ग है) –</p><p
class="has-text-align-right">तुम्हारा प्यारा भाई,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=4994</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र न्यूयार्क से कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को 25 फरवरी, 1895 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
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class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">५४, पश्चिम ३३,<br>न्यूयार्क,<br>२५, फरवरी, १८९५</p><p>प्रिय बहन,</p><p>तुम बीमार हो गयी थीं, जानकर दुःखित हूँ। मैं तुम्हारी एक ‘परोक्ष चिकित्सा’ करूँगा। हालाँकि, तुम्हारी ‘स्वीकारोक्ति’<sup>1</sup> मेरी बुद्धि की आधी शक्ति खींचकर बाहर कर देती है।</p><p>तुमको रोग से मुक्त मिल गयी – अच्छी बात है अंत भला, तो सब भला। किताबें सही-सलामत पहुँच गयी हैं, इसके लिए अनेक धन्यवाद।</p><p
class="has-text-align-right">तुम्हारा चिरंतन स्नेही भा.,<br>विवेकानन्द</p><hr
class="wp-block-separator"/><ol><li>क्रिश्चियन सायन्स के अध्ययन और साधना को लेकर हेल बहनों को कभी-कभी छेड़ने में स्वामी जी को आनन्द आता था। न्यूयार्क से लिखित इस छोटी-सी चिट्ठी में भी स्वामी जी ने बड़ी कुशलता से रोग के सामने कभी स्वीकारोक्ति नहीं करने की वैज्ञानिक साधना की चुटकी ली है। स.</li></ol><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=4982</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र न्यूयार्क से कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को 24 जनवरी, 1895 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-isabelle-mckindley-24-january-1895/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखित (24 जनवरी, 1895)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">५२८, ५वाँ एवेन्यू, न्यूयार्क,<br>२४ जनवरी, १८९५</p><p>प्रिय कुमारी बेल,</p><p>आशा है, तुम अच्छी हो…</p><p>पुरुषों ने मेरे पिछले व्याख्यान की बहुत प्रशसा नहीं की, किन्तु स्रियों ने उसे आशातीत रूप से पसन्द किया। तुम जानती हो कि ब्रुकलिन स्त्री-अधिकारों के आन्दोलन के प्रतिकूल विचारों का केन्द्र है; और जब मैंने कहा कि स्त्रियाँ योग्य होती हैं और प्रत्येक काम के लिए उपयुक्त हैं, तो निश्चय ही यह लोगों को पसन्द नहीं आया होगा। कोई बात नहीं, स्रियाँ तो विभोर थीं।</p><p>मुझे पुनः थोड़ी सर्दी हो गयी है। मैं गर्नसी लोगों के पास जा रहा हूँ। शहर में मुझे एक कमरा मिल गया है, जहाँ मैं क्लास लेने कई घंटे जाया करूँगा। मदर चर्च अब बिल्कुल ठीक हो गयी होंगी और तुम लोग इस सुखद मौसम का आनन्द ले रही होंगी। जब तुम अगली बार श्रीमती एडम्स से मिलो, तब उन्हें मेरी और से पर्वत परिमाण प्रेम और आदर देना।</p><p>पूर्ववत् गर्नसी के पते पर मेरे पत्रों को भेज दो। सबों को प्यार,</p><p
class="has-text-align-right">तुम्हारा सदा स्नेही भाई,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=4866</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र वाशिंगटन से कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को 26 अक्टूबर, 1894 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-isabelle-mckindley-26-october-1894/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखित (26 अक्टूबर, 1894)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">वाशिंगटन,<br>द्वारा श्रीमती ई. टोटेन,<br>१७०८, डब्ल्यू. आई. स्ट्रीट,<br>२६ (?) अक्टूबर १८९४</p><p>प्रिय बहन,</p><p>लम्बी चुप्पी के लिए क्षमा करना; किन्तु मैं मदर चर्च को नियमपूर्वक लिखता रहा हूँ। मुझे विश्वास है, तुम सभी इस मनोहर शरत् ऋतु का आनन्दपूर्वक उपभोग कर रहे हो। मैं बाल्टिमोर और वाशिंगटन का अपूर्व आनन्द ले रहा हूँ।</p><p>यहाँ से फिलाडेलफिया जाऊँगा। मेरा ख्याल था, कुमारी मेरी फिलाडेलफिया में हैं, इसीलिए उनका पता-ठिकाना माँगा था। किन्तु, जैसा कि मदर चर्च कहती हैं – वह फिलाडेलफिया के पास किसी दूसरी जगह रहती हैं। मैं नहीं चाहता कि वह कष्ट उठाकर मुझसे मिलने आएँ।</p><p>जिस महिला के यहाँ मैं टिका हुआ हूँ, वह कुमारी ह्वो की भतीजी हैं – नाम है श्रीमती टोटेन। एक सप्ताह से अधिक दिनों तक मैं उनका अतिथि रहूँगा। तुम मुझे उनके पते पर पत्र लिख सकती हो।</p><p>मैं इस जाड़े में – जनवरी या फरवरी तक – इंग्लैण्ड जाना चाहता हूँ। लन्दन की एक महिला ने – जिनके यहाँ मेरे मित्र ठहरे हैं – मुझे अपने घर पर ठहरने का निमन्त्रण भेजा है और उधर भारत से वे हर रोज प्रेरित कर रहे हैं – लौट आइए।</p><p>कार्टून में पित्तू कैसा लगा? किसी को मत दिखलाना। यह अच्छा नहीं है कि हम पित्तू का इस तरह मखौल उड़ाएँ।</p><p>तुम्हारे कुशल-संवाद सदा जानना चाहता हूँ। किन्तु, अपने पत्रों को जरा स्पष्ट और साफ लिखने की ओर ध्यान दो! इस परामर्श से नाराज मत होना।</p><p
class="has-text-align-right">तुम्हारा प्रिय भाई,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-isabelle-mckindley-26-october-1894/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखित (26 अक्टूबर, 1894)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-isabelle-mckindley-26-october-1894/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र –  ईसाबेल मैक्किंडली को लिखित (26 सितम्बर, 1894)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-isabelle-mckindley-26-september-1894/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-isabelle-mckindley-26-september-1894/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 11 Mar 2021 05:20:22 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Isabelle Mckindley]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=4785</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र बोस्टन से ईसाबेल मैक्किंडली को 26 सितम्बर, 1894 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-isabelle-mckindley-26-september-1894/">स्वामी विवेकानंद के पत्र –  ईसाबेल मैक्किंडली को लिखित (26 सितम्बर, 1894)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का ईसाबेल मैक्किंडली को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">बोस्टन,<br>२६ सितम्बर, १८९४</p><p>प्रिय बहन,</p><p>तुम्हारा पत्र – भारत की डाक के साथ – अभी अभी मिला।</p><p>भारत से समाचारपत्रों की कतरनों का एक पोथा मेरे पास भेजा गया है। मैं इन्हें तुम्हारे पास – अवलोकन तथा संरक्षण के हेतु भेज रहा हूँ।</p><p>मैं पिछले कई दिनों से भारत के लिए पत्र लिखने में व्यस्त हूँ, कुछ दिन और बोस्टन में रहूँगा।</p><p>प्यार तथा आशीर्वाद के साथ –</p><p
class="has-text-align-right">तुम्हारा चिर स्नेहाबद्ध<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-isabelle-mckindley-26-september-1894/">स्वामी विवेकानंद के पत्र –  ईसाबेल मैक्किंडली को लिखित (26 सितम्बर, 1894)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-isabelle-mckindley-26-september-1894/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र –  ईसाबेल मैक्किंडली को लिखित (मई, 1894)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-isabelle-mckindley-2-may-1894/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-isabelle-mckindley-2-may-1894/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 04 Mar 2021 07:46:12 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Isabelle Mckindley]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=4572</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र न्यूयार्क से ईसाबेल मैक्किंडली को मई, 1894 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-isabelle-mckindley-2-may-1894/">स्वामी विवेकानंद के पत्र –  ईसाबेल मैक्किंडली को लिखित (मई, 1894)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का ईसाबेल मैक्किंडली को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">न्यूयार्क<br>२ (वास्तव में पहली) मई, १८९४</p><p>प्रिय बहन,</p><p>मैं विवश हूँ, अभी तत्काल तुमको पुस्तिका नहीं भेज सकूँगा। अखबार की कुछ कतरनें भारत से आयी हैं, तुम्हें तुम्हारे पास भेज रहा हूँ। पढ़ने के पश्चात् उन्हें श्रीमती बैग्ली के पास भेज देना। इस पत्र के सम्पादक मजूमदार के सम्बन्धी हैं। मैं बेचारे मजूमदार के लिए दुःखी हूँ!!</p><p>मुझे यहाँ अपने कोट के लिए अभीष्ट नारंगी रंग नहीं मिल सका, अतः जो सबसे अधिक उस जैसा मिला – पीलेपन की अधिकता लिये हुये गहरा लाल रंग – उसी से सन्तोष करना पड़ा।</p><p>कुछ दिनों में कोट तैयार हो जायेगा।</p><p>अभी उस दिन वाल्डोर्फ में व्याख्यान से मुझे ७० डालर प्राप्त हुए। कल के व्याख्यान से आशा है, कुछ अधिक ही प्राप्त होंगे।</p><p>७ ता. से १७ ता. तक बोस्टन में कार्यक्रम है, पर वे लोग बहुत कम देते हैं।</p><p>कल मैंने एक पाइप १३ डालर का खरीदा है – कृपया ‘फादर पोप’ से इसका जिक्र न करना। कोट में ३० डालर लगेंगे। मुझे खाना ठीक मिल रहा है… और पर्याप्त रुपये भी। आगामी लेक्चर के बाद बैंक में कुछ जमा करवा सकूँगा।</p><p>… शाम को मैं एक निरामिष भोज में बोलने जा रहा हूँ।</p><p>हाँ, मैं निरामिष हूँ…, क्योंकि जब वैसा खाना मिल जाता है, तो मैं उसे ही अधिक पसन्द करता हूँ। परसों लीमन एबॉट के यहाँ एक और मध्याह्न भोज का निमन्त्रण है। मेरा समय बहुत अच्छा बीत रहा है, बोस्टन में भी बहुत अच्छा बीतेगा – सिर्फ उस गर्हित लेक्चरबाजी को छोड़कर! जैसे ही १९ वीं तारीख बीतेगी – बोस्टन से शिकागो, एक छलांग… और फिर आराम और विश्राम की एक लम्बी साँस, दो-तीन हफ्ते तक विश्राम। बस, बैठा रहूँगा और बातें करूँगा, बातें और धूम्रपान।</p><p>हाँ, तुम्हारे न्यूयार्क के लोग बड़े भले हैं, सिर्फ बुद्धि की अपेक्षा उनके पास धन अधिक है।</p><p>मैं हार्वर्ड विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के बीच व्याख्यान देने जा रहा हूँ। श्रीमती ब्रीड ने बोस्टन और हार्वर्ड में तीन-तीन व्याख्यान आयोजित किये हैं। कुछ के आयोजन लोग यहाँ भी कर रहे हैं, जिससे शिकागो जाते समय मैं न्यूयार्क एक बार फिर जाऊँगा और उन्हें दो चार जोरदार बातें सुनाकर पैसे जेब में भर लूँगा और शिकागो उड़ जाऊँगा।</p><p>न्यूयार्क या बोस्टन से यदि तुम्हें कुछ ऐसा मँगाना हो, जो शिकागो में न मिलता हो, तो जल्दी ही लिख देना। अब मेरे पास ढेर से डालर हैं। तुम जो चाहोगी क्षण भर में भेज दूँगा। यह न सोचना कि इसमें कुछ अशोभन होगा – मेरे सम्बन्ध में कोई पाखण्ड नहीं। यदि मैं भाई हूँ, तो भाई हूँ – दुनिया में अगर किसी बात से मुझे नफरत करना है, तो पाखण्ड से।</p><p
class="has-text-align-right">तुम्हारा स्नेही भाई,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=4650</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र एनिसक्वाम से ईसाबेल मैक्किंडली को 20 अगस्त, 1894 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-isabelle-mckindley-20-august-1894/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – ईसाबेल मैक्किंडली को लिखित (20 अगस्त, 1894)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">एनिसक्वाम,<br>२० अगस्त, १८९४</p><p>प्रिय बहन,</p><p>तुम्हारा कृपा-पत्र मुझे समय से एनिस्क्वाम में मिल गया। मैं फिर एक बार बैग्ली-परिवार के साथ हूँ। वे सदा की भाँति दयालु हैं। प्रो. राइट यहाँ नहीं थे। लेकिन परसों वे आये और हम लोग एक साथ बहुत आनन्दपूर्ण समय काट रहे हैं। एवॉन्स्टन के श्रीयुत् ब्रैड्ली, जिनसे तुम एबॉन्स्टन में मिल चुकी हो, यहाँ आये थे। उनकी साली ने कई दिनों में मुझे एक तस्वीर के लिए बैठाया, और उसने मेरी एक तस्वीर बनायी। मैंने नौका-विहार का आनन्द उठाया; एक शाम को नाव उलट गयी थी, और मेरे कपड़े वगैरह सब भीग गये थे।</p><p>ग्रीनेकर में मेरा समय बड़ा ही अच्छा बीता। वहाँ के लोग कितने दयालु एवं निष्कपट थे। लगता है, फ़ैनी हार्ट् ली एवं श्रीमती मिल्स अब तक घर वापस चली गयी होंगी।</p><p>यहाँ से शायद मैं न्यूयार्क वापस जाऊँगा। अथवा मैं बोस्टन में श्रीमती ओलि बुल के यहाँ जा सकता हूँ। शायद तुमने यहाँ के प्रसिद्ध वायलिनवादक श्री ओलि बुल का नाम सुना है। ये उन्हीं की विधवा पत्नी हैं। ये बहुत ही आध्यात्मिक महिला हैं। वे केम्ब्रिज में रहती हैं और भारत से मंगाये गये लकड़ी की शिल्पकृतियों से बनी उनकी बैठक प्रशस्त तथा सुन्दर है। वे चाहती हैं कि मैं जब चाहूँ उनके पास चले आऊँ तथा व्याख्यान के लिये उनकी बैठक का इस्तेमाल करूँ। बोस्टन वास्तव में किसी भी काम के लिए बड़ा अच्छा क्षेत्र है। लेकिन बोस्टन के लोग किसी वस्तु को जिस शीघ्रता के साथ ग्रहण करते हैं, उसी शीघ्रता से उसका परित्याग भी करते हैं; जब कि न्यूयार्क के लोग कुछ धीमी चाल के हैं, परन्तु वे जब किसी चीज को ग्रहण करते हैं, आमृत्यु उसका परित्याग नहीं करते।</p><p>मैंने इन दिनों अपना <a
href="/category/health-fitness/">स्वास्थ्य</a> ठीक रखा और भविष्य में भी ऐसा ही रखने की आशा करता हूँ। अभी भी मुझे अपनी संचित राशि से कुछ निकालने का अवसर नहीं मिला, फिर भी मेरे पास अभी अपर्याप्त धन है। मैंने सारी अर्थकरी योजनाओं का परित्याग कर दिया है और एक टुकड़े रोटी एवं एक झोपड़ी से ही पूर्णतः सन्तुष्ट रहूँगा तथा कर्म करता रहूँगा।</p><p>मुझे आशा है कि तुम अपना ग्रीष्मावकाश आनन्द से व्यतीत कर रही हो। कृपया कुमारी हाउ एवं श्री फ्रैंक हाउ को मेरा अभिवादन एवं प्रेम सूचित करना।</p><p>शायद अपने अन्तिम पत्र में तुमसे यह नहीं बता पाया कि मैं कैसे पेड़ों के नीचे सोया रहा, उपदेश दिया और कम से कम कुछ दिनों के लिये अपने को फिर एक बार एक स्वर्गीय वातावरण में पाया।</p><p>उम्मीद है कि आगामी शीतकाल में मैं न्यूयार्क को अपना केन्द्र बनाऊँगा, एवं इस सम्पर्क में कुछ निश्चय कर लेने पर मैं तुम्हें सूचित करूँगा। मैं यह भी निश्चित नहीं कर पाया हूँ कि मुझे इस देश में अभी और रहना है या नहीं। इस प्रकार का कोई निष्कर्ष मुझसे नहीं निकलता। मुझे अवसर की प्रतीक्षा करनी है। तुम्हारे चिर-स्नेही भाई की सदा-सर्वदा यह प्रार्थना है कि प्रभु तुम्हें सदा आशीर्वाद दें।</p><p
class="has-text-align-right">विवेकानन्द</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-isabelle-mckindley-20-august-1894/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – ईसाबेल मैक्किंडली को लिखित (20 अगस्त, 1894)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-isabelle-mckindley-20-august-1894/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखित (26 अप्रैल, 1894)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-isabelle-mckindley-26-april-1894/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-isabelle-mckindley-26-april-1894/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Tue, 02 Mar 2021 11:03:13 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Isabelle Mckindley]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=4570</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र न्यूयार्क से कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को 26 अप्रैल, 1894 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-isabelle-mckindley-26-april-1894/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखित (26 अप्रैल, 1894)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">न्यूयार्क,<br>२६ अप्रैल, १८९४</p><p>प्रिय बहन,</p><p>तुम्हारा पत्र कल मिला। तुम पूर्णतः ठीक थी – मुझे उस पागल इण्टीरियर (‘शिकागो इण्टीरियर’ – एक प्रेसबिटेयियन अखबार, जो स्वामी जी के विरुद्ध लिखता था) का मजाक पसन्द आया। किन्तु भारत से आयी डाक, जो मुझे तुमने कल भेजी है, सचमुच ही जैसा ‘मदर चर्च’ ने अपने पत्र में लिखा है, दीर्घ काल के बाद मिला एक शुभ संवाद है। दीवान जी का एक बहुत सुन्दर पत्र आया है। उस वयोवृद्ध सज्जन ने हमेशा की तरह मदद का प्रस्ताव किया है। प्रभु उनका भला करे। फिर कलकत्ता में प्रकाशित मेरे बारे में एक पुस्तिका है – स्पष्ट है कि मेरे जीवन काल में ही कम से कम एक बार इस पैग़म्बर को अपने देश में ही सम्मान प्राप्त हुआ। भारतीय एवं अमेरिकन अखबारों और पत्रों में मेरे बारे में प्रकाशित सामग्री के उद्धरण हैं। कलकत्ते के पत्रों में प्रकाशित उद्धरण तो विशेषकर सन्तोषप्रद हैं, पर इनकी अतिशयोक्तिपूर्ण लेखन शैली के कारण मैं इन्हें तुम्हारे पास न भेजूँगा। उनमें मुझे विशिष्ट, अद्भुत और इसी ढंग की बेकार की बातों से विभूषित किया गया है, परन्तु उन्होंने मुझे समग्र जाति की कृतज्ञता भी भेजी है। अब सिर्फ एक बात के सिवा मुझे कोई चिन्ता नहीं है कि मेरे देशवासी या अन्य लोग मेरे बारे में क्या कहते हैं। मेरी बूढ़ी माँ हैं। वे जिन्दगी भर यातना सहती रहीं और इन कष्टों के बीच भी मुझे ईश्वर और मानव के सेवार्थ अर्पण कर सकीं। किन्तु यह संवाद कि उन्होंने अपने सबसे प्यारे का, अपनी आशा का त्याग किया – दूर देश में घोर पाशविक जीवन बिताने के लिए – जैसा कि मजूमदार कलकत्ते में प्रचारित कर रहे हैं, उनका प्राण हर लो। पर प्रभु महान् हैं; उनकी सन्तान को कोई चोट नहीं पहुँचा सकता।</p><p>मेरे किसी प्रयास के बिना ही भेद खुल गया। क्या तुम जानती हो कि हमारे अन्यतम प्रधान पत्र का, जो मेरी इतनी प्रशंसा करता है, सम्पादक कौन है? और ईश्वर को धन्यवाद देता है कि हिन्दुत्व का प्रतिनिधित्व करने अमेरिका आया? वह मजूमदार का चचेरा भाई है!! बेचारा मजूमदार! ईर्ष्यावश उसने झूठ बोलकर अपना ही अहित किया है। ईश्वर जानता है, मैंने अपनी सफाई देने का कोई प्रयास नहीं किया।</p><p>‘फोरम’ में मैने श्री गाँधी का लेख इसके पूर्व ही पढ़ लिया था।</p><p>अगर तुम्हारे पास गत मास का ‘रिव्यू ऑफ रिव्यूज’ हो, तो उसमें से भारत की अफीम समस्या पर भारत के एक सर्वोच्च अंग्रेज अधिकारी का दिया हुआ हिन्दुओं के सम्बन्ध में विवरण माँ को पढ़कर सुना देना। उसने हिन्दुओं की तुलना अंग्रेजों से की है और हिन्दुओं को आसमान पर चढ़ा दिया है। सर् लेपेल ग्रिफिन हमारी जाति के कट्टर शत्रु थे, पता नहीं, मोचें में यह परिवर्तन कैसे हुआ?</p><p>बोस्टन में श्रीमती ब्रीड के यहाँ समय बहुत अच्छा बीता और प्रोफेरस राइट से मुलाकात हुई। मैं बोस्टन फिर जा रहा हूँ। दर्जी मेरा नया गाउन बना रहा है – केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी (हार्वर्ड) में मेरा व्याख्यान होगा और मैं वहाँ प्रो. राइट का मेहमान रहूँगा। बोस्टन के पत्रों में मेरे स्वागत में वे लोग खूब लिख रहे हैं।</p><p>अब इन वाहियात कामों से मैं थक गया हूँ। मई के उत्तरार्द्ध में शिकागो जाऊँगा। और कुछ दिन ठहरने के बाद मैं पुनः पूर्व की ओर वापस चला आऊँगा।</p><p>मैंने पिछली रात को वाल्डोर्फ़ होटल में व्याख्यान दिया था। श्रीमती स्मिथ ने दो डालर प्रति टिकट बेचे। यद्यपि हॉल पूरा भरा हुआ था, लेकिन था छोटा ही। अभी तक रकम मुझे नहीं मिली है। आशा है, आज दिनभर में मिल जायेगी।</p><p>लिन में मुझे सौ डालर प्राप्त हुए। उनको मैं भेज नहीं रहा हूँ, क्योंकि मुझे नया गाउन तथा दूसरी ऊटपटाँग चीजें लेनी हैं।</p><p>बोस्टन में मैं रुपये कमाने की आशा नहीं करता। फिर भी अमेरिका के मस्तिष्क को स्पर्श तो मुझे करना ही है और मुझसे अगर हो सका, तो उसे और उद्वेलित भी करना है।</p><p
class="has-text-align-right">तुम्हारा प्यारा भाई,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-isabelle-mckindley-26-april-1894/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखित (26 अप्रैल, 1894)</a> appeared first on <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=4544</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र डिट्रॉएट से कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को 17 मार्च, 1894 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-isabelle-mckindley-17-march-1894/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखित (17 मार्च, 1894)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी ईसाबेल मैक्किंडली को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">डिट्रॉएट,<br>१७ मार्च, १८९४</p><p>प्रिय बहन,</p><p>तुम्हारा पैकेट मुझे कल मिला। तुमने मोजे नाहक भेजे, मै यहाँ स्वयं ही दो चार जुटा लेता। पर हर्ष की यह बात है कि यह तुम्हारे स्नेह का द्योतक है। मेरा थैला ठसाठस भर गया है। समझ में नहीं आता कि अब मैं कैसे उसे लिए फिरता रहूँ।</p><p>आज मैं श्रीमती बैग्ली के यहाँ लौट आया। श्री पामर के यहाँ अधिक दिन रुकने की वजह से वह नाराज थीं। पामर के घर पर दिन बड़े ही आराम से कटे। वे बहुत ही मौजी और सादादिल आदमी हैं, और उन्हें अपने सुखभोगों में और अपने ‘कडुवे स्काच्’ में अत्यधिक रुचि है। लेकिन हैं वे एकदम अकलंक और बच्चों जैसे सरल।</p><p>मेरे चले आने से वे बहुत दुःखी थे, लेकिन मैं विवश था। यहाँ एक सुन्दरी तरुणी से मैं दो बार मिला। नाम मैं उसका भूल रहा हूँ। लेकिन इतनी तेज, सुन्दर, आध्यात्मिक एवं असांसारिक! प्रभु उस पर कृपा रखें। आज सबेरे वह श्रीमती मैक्ड्यूवेल के साथ आयी और इतनी सुन्दरता और आध्यात्मिक गभीरता से उसने बातें की कि मैं तो चकित रह गया। वह योगियों के बारे में सब कुछ जानती है और साधना में काफी आगे बढ़ चुकी है!</p><p>‘तेरा पथ खोज से परे है ।’ प्रभु उस सीधी-सादी, पवित्र और निर्मल लड़की पर कृपा करें! यह मेरे कठोर और कष्टप्रद जीवन का श्रेष्ठ पुरस्कार है कि समय समय पर तुम जैसी पवित्र और आनन्दित लोगों के दर्शन मुझे हो जाया करते हैं। बौद्धों की एक उदार प्रार्थना है – ‘पृथ्वी के सभी पवित्र मनुष्यों के समक्ष मैं नतमस्तक हूँ।’ जब भी मैं किसी ऐसी आकृति को देखता हूँ, जिस पर प्रभु अपनी अँगुली से ‘मेरा’ – यह शब्द स्पष्ट रूप से अंकित कर दिये होते हैं तब ही मुझे इस प्रार्थना के सही अर्थ का बोध होने लगता है। तुम अभी जिस प्रकार सुखी हो, कृपाधन्य हो, सत्स्वभाव हो, पवित्र हो, उसी प्रकार सदा बने रहो। इस भयानक संसार के कर्दम व धूलि से तुम्हारे पैरों का कभी स्पर्श न हो। फूलों के से तुम्हारे जन्म की ही भाँति तुम्हारा जीवन और तुम्हारा प्रयाण भी फूलों के से ही हों। निरन्तर तुम्हारे अग्रज की यही प्रार्थना है।</p><p
class="has-text-align-right">विवेकानन्द</p><p>The post <a
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