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><channel><title>Mary Hale Archives - हिंदी पथ</title> <atom:link href="https://hindipath.com/tag/mary-hale/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" /><link>https://hindipath.com/tag/mary-hale/</link> <description>हिंदी का संसार</description> <lastBuildDate>Tue, 08 Jun 2021 10:45:20 +0000</lastBuildDate> <language>en-US</language> <sy:updatePeriod> hourly </sy:updatePeriod> <sy:updateFrequency> 1 </sy:updateFrequency> <generator>https://wordpress.org/?v=6.3.10</generator><image> <url>https://hindipath.com/wp-content/uploads/2019/09/HindiPath-Site-Icon-New.png</url><title>Mary Hale Archives - हिंदी पथ</title><link>https://hindipath.com/tag/mary-hale/</link> <width>32</width> <height>32</height> </image> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (27 अगस्त, 1901)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-27-august-1901/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-27-august-1901/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Sat, 17 Apr 2021 07:48:33 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Mary Hale]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=6027</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र बंगाल से कुमारी मेरी हेल को 27 अगस्त, 1901 लिखा था। पढ़ें विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-27-august-1901/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (27 अगस्त, 1901)</a> appeared first on <a
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class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी मेरी हेल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">बैलूड़ मठ,<br>हावड़ा, बंगाल,<br>२७ अगस्त, १९०१</p><p>प्रिय मेरी,</p><p>मैं मनाता हूँ कि मेरा <a
href="/category/health-fitness/">स्वास्थ्य</a> तुम्हारी आशा के अनुरूप हो जाय, कम से कम इतना अच्छा कि तुम्हें एक लम्बा पत्र ही लिख सकूँ। पर यथार्थ यह है कि वह दिनप्रतिदिन गिरता ही जा रहा है ; इसके अतिरिक्त भी अनेक परेशानियाँ और उलझने साथ लगी हैं। मैने तो अब उन पर ध्यान देना ही छोड़ दिया है।</p><p>स्विट्जरलैण्ड के अपने सुन्दर काष्ठगृह में सुख-स्वास्थ्य से परिपूर्ण रहो, यही मेरी कामना है। यदाकदा स्विट्जरलैण्ड अथवा अन्य स्थानों की प्राचीन वस्तुओं का हल्का अध्ययन – निरीक्षण करते रहने से चीजों का आनन्द थोड़ा और भी बढ़ जायगा। मैं बहुत प्रसन्न हूँँ कि तुम पहाड़ों की मुक्त-वायु में साँस ले रही हो। लेकिन दुःख है कि सैम पूर्णतः स्वस्थ नहीं है। ख़ैर, इसमें कोई चिन्ता की बात नहीं, उसकी काठी वैसे ही बड़ी अच्छी है।…</p><p>‘स्त्रियों का चरित्र और पुरूषों का भाग्य, इन्हें स्वयं ईश्वर भी नहीं जानता, मनुष्य की तो बात ही क्या।’ चाहे यह मेरा स्त्रियोचित स्वभाव ही मान लिया जाय, पर इस क्षण तो मेरे मन में यही आता है कि काश तुम्हारे भीतर पुरूषत्व का थोड़ा अंश होता। ओह मेरी! तुम्हारी बुद्धि, स्वास्थ्य, सुन्दरता, सब उस एक आवश्यक तत्त्व के बिना व्यर्थ जा रहे हैं, और वह है – व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा! तुम्हारा दर्प, तुम्हारी तेजी सब बकवास है, केवल मजाक। अधिक से अधिक तुम एक बोर्डिग-स्कूल की छोकरी हो – रीढ़हीन! बिल्कुल ही रीढ़हीन!</p><p>आह! यह जीवनपर्यन्त दूसरों को रास्ता सुझाते रहने का व्यापार! यह अत्यंत कठोर है, अत्यंत क्रूर! पर मैं असहाय हूँ इसके आगे। मैं तुम्हें प्यार करता हूँ, मेरी, ईमानदारी से, सच्चाई से, मैं तुम्हें प्रिय लगनेवाली बातों से छल नहीं सकता। न ही यह मेरे वश का रोग है।</p><p>फिर मैं एक मरणोन्मुख व्यक्ति हूँ, मेरे पास छल करने के लिए समय नहीं। अतः ऐ लड़की, जाग! अब मैं तुमसे ऐसे पत्रों की आशा करता हूँ, जिनमें खड़ी धार जैसी तेजी हो, उसकी तेजी बनाये रखो, मुझे पर्याप्त रूप से जाग्रति की आवश्यकता है।</p><p>मुझे मैक्वीग परिवार के विषय में, जब वे यहाँ थे, कोई समाचार नहीं मिला। श्रीमती बुल या निवेदिता से कोई सीधा पत्र-व्यवहार न होने पर भी श्रीमती सेवियर से मुझे बराबर उनके विषय में सूचना मिलती रही है, और अब सुनता हूँ कि वे सब नार्वे में श्रीमती बुल के अतिथि हैं।</p><p>मुझे नहीं मालूम कि निवेदिता भारत कब वापस आयेगी, या कभी आयेगी भी या नहीं।</p><p>एक तरह से मैं एक अवकाशप्राप्त व्यक्ति हूँ; आन्दोलन कैसा चल रहा है, इसकी कोई बहुत जानकारी मैं नहीं रखता। दूसरे आन्दोलन का स्वरूप भी बड़ा होता जा रहा है और एक आदमी के लिए उसके विषय में सूक्ष्मतम जानकारी रखना असभव है।</p><p>खाने-पीने, सोने और शेष समय में शरीर की शुश्रूषा करने के सिवा मैं और कुछ नहीं करता। विदा मेरी। आशा है इस जीवन में कहीं न कहीं हम तुम अवश्य मिलेंगे। और न भी मिलें तो भी, तुम्हारे इस भाई का प्यार तो सदा तुम पर रहेगा ही।</p><p
class="has-text-align-right">विवेकानन्द</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-27-august-1901/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (5 जुलाई, 1901)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-5-july-1901/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-5-july-1901/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Sat, 17 Apr 2021 07:07:13 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Mary Hale]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=6020</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र मठ से कुमारी मेरी हेल को 5 जुलाई, 1901 लिखा था। पढ़ें विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-5-july-1901/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (5 जुलाई, 1901)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी मेरी हेल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">मठ,<br>५ जुलाई, १९०१</p><p>प्रिय मेरी,</p><p>मैं तुम्हारे लम्बे प्यारे पत्र के लिए अत्यंत कृतज्ञ हूँ, क्योंकि इस समय मुझे किसी ऐसे ही पत्र की जरूरत थी, जो मेरे मन को थोड़ा प्रोत्साहन दे सके। मेरा <a
href="/category/health-fitness/">स्वास्थ्य</a> बहुत ख़राब रहा है और अभी है भी। मैं केवल कुछ दिनों के लिए सँभल जाता हूँ, इसके बाद फिर ढह पड़ना जैसे अनिवार्य हो जाता है। ख़ैर, इस रोग की प्रकृति ही ऐसी है।</p><p>काफी पहले मैं पूर्वी बंगाल और आसाम में भ्रमण करता रहा हूँ। आसाम काश्मीर के बाद भारत का सबसे सुन्दर प्रदेश है, लेकिन साथ ही बहुत अस्वास्थ्यकर भी है। पर्वतों और गिरि शृंखलाओं में चक्कर काटती हुई विशाल ब्रह्मपुत्र – जिसके बीच बीच में अनेक द्वीप हैं, बस देखने ही लायक है।</p><p>तुम तो जानती ही हो कि मेरा देश नद-नदियों का देश है। किन्तु इसके पूर्व इसका वास्तविक अर्थ मैं नहीं जानता था। पूर्वी बंगाल की नदियाँ नदियाँ नहीं, मीठे पानी के घुमड़ते हुए सागर हैं, ओर वे इतनी लम्बी हैं कि स्टीमर उनमें हफ़्तों तक लगातार चलते रहते हैं। कुमारी मैक्लिऑड जापान में हैं। वे उस देश पर मुग्ध हैं और मुझसे वहाँ आने को कहा है, लेकिन मेरा स्वास्थ्य इतनी लम्बी समुद्रयात्रा गवारा नहीं कर सकता, अतः मैंने इंकार कर दिया है। इसके पहले मैं जापान देख भी चुका हूँ।</p><p>तो तुम वेनिस का आनन्द ले रही हो! यह वृद्ध पुरूष (नगर) अवश्य ही मजेदार होगा – क्योंकि शाइलॉक केवल वेनिस में ही हो सकता था, है न?</p><p>मुझे अत्यंत ख़ुशी है कि सैम इस वर्ष तुम्हारे साथ ही है। उत्तर के अपने नीरस अनुभव के बाद युरोप में उसे आनन्द आ रहा होगा। इधर मैंने कोई रोचक मित्र नहीं बनाया और जिन पुराने मित्रों को तुम जानती हो, वे प्रायः सबके सब मर चुके हैं – खेतड़ी के राजा भी। उनकी मृत्यु सिकन्दरा में सम्राट् अकबर की समाधि के एक ऊँचे मीनार से गिर पड़ने से हुई। वे अपने ख़र्चें से आगरे में इस महान् प्राचीन वास्तु-शिल्प के नमूने की मरम्मत करवा रहे थे, कि एक दिन उसका निरीक्षण करते समय उनका पैर फिसला और वे सैकड़ों फुट नीचे गिर गये। इस प्रकार तुम देखती हो न कि प्राचीन के प्रति हमारा उत्साह ही कभी कभी हमारे दुःख का कारण बनता है। इसलिए मेरी, ध्यान रहे, कहीं तुम अपनी भारतीय प्राचीन वस्तुओं के प्रति अत्यधिक उत्साहशील न हो जाना!</p><p>मिशन के प्रतीक-चिह्न में सर्प रहस्यवाद (योग) का प्रतीक है, <a
href="/surya-dev-mantra-katha-upay/">सूर्य </a>ज्ञान का, उद्वेलित सागर कर्म का, कमल भक्ति का, और हंस परमात्मा का, जो इस सबके मध्य में स्थित है।</p><p>सैम और माँ को प्यार कहना।</p><p
class="has-text-align-right">सस्नेह,<br>विवेकानन्द</p><p>पुनश्च – हर समय शरीर से अस्वस्थ रहने के कारण ही यह छोटा पत्र लिखना पड़ रहा है।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-5-july-1901/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (5 जुलाई, 1901)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-5-july-1901/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (18 मई, 1901)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-18-may-1901/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-18-may-1901/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Fri, 16 Apr 2021 12:47:57 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Mary Hale]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=6007</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र बंगाल से कुमारी मेरी हेल को 18 मई, 1900 लिखा था। पढ़ें विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-18-may-1901/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (18 मई, 1901)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी मेरी हेल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">बेलूड़ मठ,<br>हावड़ा, बंगाल (भारत)<br>१८ मई, १९०१</p><p>प्रिय मेरी,</p><p>कभी कभी किसी बडे नाम के साथ पुछल्ले की तरह लग जाने से बड़ी कठिनाई जो जाती है। और यही तो मेरे पत्र के साथ हुआ! तुमने मुझे २२ जनवरी १९०१ को पत्र लिखा था, पर पता दिया महान् कुमारी मैक्लिऑड का। परिणाम यह हुआ कि वह पत्र उनके पीछे पीछे सारी दुनिया की खाक छानता रहा और अब कल जापान से भेजा जाकर मुझे मिला है, जहाँ की आजकल <a
href="/swami-vivekananda-ke-patra-miss-josephine-macleod-27-february-1901/">कुमारी मैक्लिऑड</a> हैं। तो इस तरह स्फिंक्स की उस पहेली का उत्तर हुआ : ‘तू किसी बड़े नाम के साथ छोटे नाम को नहीं जोड़ेगा।’</p><p>तो मेरी तुम फ़्लोरेंस और इटली में मौज करती रहीं, और मुझे पता भी नहीं कि तुम इस समय हो कहाँ। अच्छा, मोटी वृद्धा ‘महिला’, यह पत्र मैं मोनरो एण्ड कम्पनी, ७ रू स्क्राइब के पते पर तुम्हें भेज रहा हूँ।</p><p>तुम फ्लोरेंस और इटली की झीलों में समय गुजार रही हो। बहुत अच्छा। यद्यपि तुम्हारा कवि उसे निरर्थक मानने में आपत्ति करता है।</p><p>प्यारी बहन, कुछ अपने बारे में भी बताउँ? भारत, मैं पिछली शिशिर ऋतु में आया था। तमाम जाड़े कष्ट भोगता रहा और इसी ग्रीष्म में पूर्वी बंगाल और आसाम के दौरे पर निकल गया। ये इलाक़े विशालकाय नदियों और पहाड़ियों और मलेरिया से परिपूर्ण है। दो महीने के कठिन परिश्रम से बीमार पड़ गया और अब कलकत्ता वापस आ गया हूँ, जहाँ धीरे धीरे मेरा <a
href="/category/health-fitness/">स्वास्थ्य</a> सुधर रहा है।</p><p>कुछ महीने हुए <a
href="/swami-vivekananda-ke-patra-khetri-king-ajit-singh-14-june-1899/">खेतड़ी के राजा</a> की गिर पड़ने से मृत्यु हो गयी। इस तरह तुम देखती हो कि मेरे चारों ओर इस समय अँधेरा ही अँधेरा है, मेरा अपना स्वास्थ्य भी चौपट है। फिर भी मुझे पूरा विश्वास है कि शीघ्र ही मैं पुनः उठ खड़ा होऊँग़ा। बस मैं अगले सुअवसर की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।</p><p>काश इस समय मैं यूरोप आ सकता तो तुमसे खूब बातें हो सकतीं; पर मैं जल्दी ही भारत वापस लौट जाता, क्योंकि इन दिनों एक प्रकार की शान्ति तो मैं महसूस ही कर रहा हूँ और मेरी बेचैनी भी अधिकांशतः दूर हो चुकी है।</p><p>हैरियट ऊली, ईसाबेल, हैरियट मैक्किडली को मेरा प्यार कहना और माँ से मेरा चिर प्रेम एवं कृतज्ञता ज्ञापित करना। माँ से कहना कि एक हिन्दु की सूक्ष्म कृतज्ञभावना पीढ़ियों तक बनी रहती है।</p><p
class="has-text-align-right">भगवदपदाश्रीत तुम्हारा,<br>विवेकानन्द</p><p>पुनश्च – जब तुम्हारी इच्छा हो मुझे पत्र लिखो।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-18-may-1901/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (18 मई, 1901)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-18-may-1901/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (23 जून, 1900)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-23-june-1900/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-23-june-1900/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 15 Apr 2021 07:58:11 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Mary Hale]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5932</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र न्यूयार्क से कुमारी मेरी हेल को 26 जून, 1900 लिखा था। पढ़ें विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-23-june-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (23 जून, 1900)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी मेरी हेल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">वेदान्त सोसाइटी,<br>१४६ पूर्व ५५वीं स्ट्रीट,<br>न्यूयार्क,<br>२३ जून, १९००</p><p>प्रिय मेरी,</p><p>तुम्हारे सुन्दर पत्र के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। मैं अत्यन्त कुशलपूर्वक, प्रसन्न तथा पहले जैसा ही हूँ। उत्थान के पूर्व लहरें अवश्य उठती हैं। ऐसा ही मेरे साथ भी है। मुझे बड़ी ख़ुशी है कि तुम मेरे लिए प्रार्थना करने जा रही हो। तुम मेथाडिस्टों की एक शिविर-सभा क्यों नहीं आयोजित करतीं? मुझे यकीन है कि उसका शीघ्रतर प्रभाव पड़ेगा।</p><p>मैं समस्त भावुकता तथा संवेगात्मकता से छुटकारा पाने के लिए कटिबद्ध हूँ, और अब यदि कभी भी तुम मुझे भावुक देखो तो फाँसी पर चढ़ा देना। मैं अद्वैतवादी हूँ; हमारा लक्ष्य है ‘ज्ञान’ – कोई भावना नहीं, कोई ममता नहीं, क्योंकि ये सब जड़-पदार्थ, अन्धविश्वास तथा बन्धन के अन्तर्गत आते हैं। मैं केवल सत एवं ज्ञान हूँ।</p><p>ग्रीनेकर में तुम्हें ख़ूब आराम मिलेगा, मुझे पूरा विश्वास है। वहाँ तुम ख़ूब आनन्द मनाओ। एक क्षण के लिए भी मेरी ख़ातिर चिन्ता न करना। जगन्माता मेरी देखभाल करती हैं। वे मुझे तेजी से भावुकता के नरक से बाहर निकाल रही हैं और शुद्ध विवेक के प्रकाश में ले जा रही हैं। तुम्हारे सुख की अनन्त कामना सहित।</p><p
class="has-text-align-right">तुम्हारा भाई,<br>विवेकानन्द</p><p>पुनश्च – मार्गट २६ को चल रही है। एक दो हफ़्ते में मैं भी चल पड़ूँगा। किसीका मेरे ऊपर वश नहीं, क्योंकि मैं आत्मा हूँ। मेरी कोई महत्त्वाकांक्षा नहीं; यह सब जगन्माता का काम है, इसमें मेरा कोई योग नहींं।</p><p
class="has-text-align-right">वि.</p><p>मैं तुम्हारा पत्र नही ‘पचा’ सका, क्योंकि पिछले दिनों मेरी अजीर्ण की शिकायत बढ़ गयी थी।</p><p
class="has-text-align-right">वि.</p><p>अनासक्ति मेरे साथ सदैव रही है। वह एक क्षण में आयी है। बहुत शीघ्र ही मैं ऐसे स्थान पर जाऊँगा, जहाँ कोई संवेदना, कोई भाव मुझे नहीं छू सकेगा।</p><p
class="has-text-align-right">वि.</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-23-june-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (23 जून, 1900)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-23-june-1900/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (17 जून, 1900)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-17-june-1900/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-17-june-1900/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 15 Apr 2021 07:37:03 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Mary Hale]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5927</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र लॉस एंजिलिस से कुमारी मेरी हेल को 17 जून, 1900 लिखा था। पढ़ें विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-17-june-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (17 जून, 1900)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी मेरी हेल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">१९२१ पश्चिम २१वीं स्ट्रीट,<br>लॉस एंजिलिस,<br>१७ जून, १९००</p><p>प्रिय मेरी,</p><p>यह सही है कि मैं पहले से काफी अच्छा हूँ, पर अभी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हुआ हूँ। दुःख भोगनेवाले हर आदमी की मनःस्थिति एक जैसी होती है। न तो वह गैस है, न ही अन्य कोई वस्तु।</p><p>काली-पूजा किसी भी धर्म का आवश्यक साधन नहीं है। <a
href="/category/dharma/">धर्म</a> के विषय में जितना कुछ भी जानने योग्य है, उपनिषद् उसकी शिक्षा देते हैं। काली-पूजा मेरी अपनी विशिष्ट ‘सनक’ है। तुमने कभी भी उसके विषय में मुझे प्रवचन करते या भारत में उसकी शिक्षा देते हुए नहीं सुना होगा। मैं केवल उन्हीं चीजों की शिक्षा देता हूँ, जो विश्व-मानवता के लिए हितकर हैं। यदि ऐसी कोई विचित्र विधि है, जो केवल मुझी पर लागू होती है, तो मैं उसे गुप्त रखता हूँ, और यहीं सब बात ख़त्म हो जाती है। मैं तुम्हें नहीं बताऊँगा कि काली-पूजा क्या है, क्योंकि कभी मैंने इसकी शिक्षा किसीको नहीं दी।</p><p>यदि तुम यह सोचती हो कि हिन्दू लोग बोस-परिवार का बहिष्कार करते हैं, तो तुम एकदम भ्रम में हो। अंग्रेज शासक उन्हें एक किनारे धकेल देना चाहते हैं। वास्तव में भारतीय जाति में वे उस प्रकार का विकास देखना पसन्द ही नहीं करते। वे उनका रहना यहाँ मुहाल किये दे रहे हैं, इसीसे वे बाहर जाना चाहते हैं।</p><p>‘एंग्लिसाइज़्ड’ (आंग्लीकृत) का मतलब उन लोगों से है, जो अपने रहनसहन तथा आचरण से यह प्रदर्शित करते हैं कि वे हमारे जैसे निर्धन पुराने ढंग के हिन्दुओं पर शर्म का अनुभव करते हैं। मैं अपनी जाति या जन्म अथवा जातीयता से शर्मिन्दा नहीं हूँ। मुझे आश्चर्य नहीं है कि इस प्रकार के लोगों को हिन्दू पसन्द नहीं करते।</p><p>हमारे धर्म में, जो उपनिषदों के सिद्धान्तों पर आधारित है, अनुष्ठानों तथा प्रतीकों के लिए कोई स्थान नहीं है। बहुत से लोग ऐसा सोचते हैं कि अनुष्ठानों के सम्पन्न करने से धर्म का साक्षात्कार करने में सहायता मिलती है। मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है।</p><p>धर्म वह है जो धर्म-ग्रन्थों या उपदेष्टाओं अथवा मसीहा या उद्धारक पर निर्भर नहीं रहता और जो हमें इस जीवन में या किसी अन्य जीवन में दूसरों पर आश्रित नहीं बनाता। इस अर्थ में उपनिषदों का अद्वैतवाद ही एकमात्र धर्म है। लेकिन धर्म <a
href="/category/hindi-scriptures/">ग्रन्थों</a>, मसीहों, अनुष्ठानों आदि का अपना स्थान है। वे बहुतों की सहायता कर सकते हैं, जैसे कि काली-पूजा मेरे ऐहिक कार्यों में मेरी सहायता करती है। उन सबका स्वागत है।</p><p>पर गुरू का भाव एक दूसरी बात है। यह आत्मिक शक्ति तथा ज्ञान को सम्प्रेषित करनेवाले तथा उसे ग्रहण करनेवाले के बीच का सम्बन्ध है। शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि से प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक विशेष प्रकार (type) होता है। प्रत्येक दूसरों से निरन्तर विचार ग्रहण करते हुए, उन्हें अपने उसी ‘प्रकार’ के अनुरूप बना रहा है, अर्थात् अपनी जातीयता के आधार पर। इन ‘प्रकारों’ के विनष्ट होने का अभी समय नहीं आया है। सब प्रकार की शिक्षा चाहे उसका कोई भी स्रोत हो, प्रत्येक देश के आदर्शों के अनुकूल है, सिर्फ उन्हें अपनी राष्ट्रीयता के रंग में रँग लेना आवश्यक है, यानी उस प्रकार की शेष अभिव्यक्ति के साथ उनका तादात्म्य होना आवश्यक है।</p><p>त्याग प्रत्येक जाति का सदैव आदर्श रहा है; दूसरी जातियों को केवल इसका ज्ञान नहीं है, यद्यपि प्रकृति द्वारा अवचेतन रूप से वे इसका पालन करने को बाध्य हैं। युग युग तक एक उद्देश्य निश्चित रूप से चलता रहता है। और वह पृथ्वी तथा सूर्य के नाश के साथ ही समाप्त होगा। और वास्तव में विविध विश्व निरन्तर प्रगति कर रहे हैं! और फिर भी अभी तक असीम विश्वों में से कोई इतना विकास नहीं कर सका कि हमसे सम्बन्ध स्थापित कर सके! सब बकवास! उनमें भी प्राणी जन्मते हैं, हमारी जैसी प्रक्रियाएँ वहाँ भी घटित होती हैं और हमारे समान वे भी मरते हैं! उद्देश्य का विस्तार! बच्चे हैं! ओ बच्चों, स्वप्नलोक में ही रहो!</p><p>अस्तु, अब अपने बारे में। हैरियट से तुम आग्रह करो कि वह मुझे कुछ डालर प्रतिमास देती रहे। ऐसा ही करने को मैं दूसरे मित्रों से भी कहूँगा। यदि मैं सफल हो गया, तो भारत को चल दूँगा। जीविका के लिए इस मंच-कार्य से मैं बेतरह थक गया हूँ। इसमें अब मुझे कुछ भी आनन्द नहीं आता। मैं अवकाश लेकर, यदि कर सका तो, कुछ विद्वत्तापूर्ण लेखन कार्य करना चाहता हूँ।</p><p>शिकागो मैं शीघ्र ही आ रहा हूँ, आशा है दो-चार दिनों के भीतर ही वहाँ पहुँच जाऊँगा। यह बताओ कि क्या श्रीमती एडम्स मेरे लिए किसी कक्षा का प्रबन्ध नहीं कर सकेंगी, जिसकी आमदनी से मैं अपने वापस जाने का भाड़ा चुका सकूँ?</p><p>मैं विभिन्न स्थानों में कोशिश करूँगा। मुझमें इतना आशावाद आ गया है मेरी, कि यदि मेरे पंख होते तो मैं हिमालय उड़ जाता।</p><p>अपने सारे जीवन में मेरी, मैंने इस संसार के लिए काम किया, पर यह मेरे शरीर की आध सेर बोटी लिए बिना मुझे रोटी का एक टुकड़ा तक नहीं देता।</p><p>यदि मुझे रोटी का एक टुकड़ा रोज मिल जाय, तो मैं बिल्कुल अवकाश ले लूँ। किन्तु यह असंभव है। यही शायद उस उद्देश्य का बढ़ता हुआ विस्तार है, जो, जैसे जैसे मेरी उम्र बढ़ती जाती है, वैसे वैसे सब घृणित आन्तरिकताओं का उद्घाटन करता जा रहा है!</p><p
class="has-text-align-right">चिर प्रभुपदाश्रित,<br>विवेकानन्द</p><p>पुनश्च – यदि कभी भी किसीको सांसारिक वस्तुओं की व्यर्थता का बोध हुआ है, तो इस समय मुझे हो चुका है। यह संसार घृण्य, जघन्य मुर्दे के समान है। जो इसकी मदद करने की सोचता है, वह मूर्ख है। पर हमें अच्छा या बुरा करते हुए ही अपनी मुक्ति के लिए प्रयत्न करना होगा। मुझे आशा है कि मैंने ऐसा किया है। प्रभु मुझे उस मुक्ति की ओर ले चलें। एवमस्तु। मैंने भारत या किसी भी देश पर विचार करना त्याग दिया है। अब मैं स्वार्थी बन गया हूँ, अपना उद्धार करना चाहता हूँ!</p><p>“जिसने <a
href="/brahma-chalisa-in-hindi/">ब्रह्मा</a> को वेद प्रकट किये, जो प्रत्येक के हृदय में व्यक्त है, बन्धन से मुक्ति पाने की आशा से मैं उसीकी शरण लेता हूँ।”<sup>1</sup></p><p
class="has-text-align-right">वि.</p><hr
class="wp-block-separator"/><ol><li>यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥ – श्वेताश्वतरोपनिषद्॥६।१८॥</li></ol><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-17-june-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (17 जून, 1900)</a> appeared first on <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5915</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र कुमारी मेरी हेल को 30 अप्रैल, 1900 लिखा था। पढ़ें विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-30-april-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (30 अप्रैल, 1900)</a> appeared first on <a
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class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी मेरी हेल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">३० अप्रैल, १९००</p><p>प्रिय मेरी,</p><p>आकस्मिक अस्वस्थता तथा ज्वर के कारण अभी भी शिकागो न आ सकने के लिए मैं बाध्य हूँ। सफर के लायक शक्ति प्राप्त करते ही मैं चल पड़ूँगा। हाल में मुझे मार्गट का पत्र मिला था। कृपया उससे मेरा प्यार कहना और तुम्हें भी मेरा चिर स्नेह। हैरियट कहाँ है? शिकागो में ही? और मैक्किंडली बहनें? सबको मेरा प्यार।</p><p
class="has-text-align-right">विवेकानन्द</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-30-april-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (30 अप्रैल, 1900)</a> appeared first on <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5912</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र कुमारी मेरी हेल को 23 अप्रैल, 1900 लिखा था। पढ़ें विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-23-april-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (23 अप्रैल, 1900)</a> appeared first on <a
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class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी मेरी हेल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">२३ अप्रैल, १९००</p><p>प्रिय मेरी,</p><p>मुझे आज चल पड़ना चाहिए था, पर परिस्थितियाँ कुछ ऐसी सामने आ गयीं हैं कि जाने के पूर्व मैं कैलिफोर्निया के विशाल रेड-वुड वृक्षों के नीचे आयोजित एक शिविर में सम्मिलित होने का लोभ संवरण नहीं कर सकता। इसलिए आने का कार्यक्रम मैं तीन-चार दिनों के लिए स्थगित करता हूँ। दूसरे लगातार परिश्रम के बाद, इसके पहले कि मैं चार दिन की हाड़-तोड़ यात्रा के लिए चल पड़ूँ मुझे भगवान् की दी हुई मुक्त वायु की थोड़ी आवश्यकता है।</p><p>मार्गट अपने पत्र में बार बार आग्रह करती है कि मैं पन्द्रह दिनों के भीतर आंट मेरी को देखने के अपने वादे का अवश्य पालन करूँ। उस वादे का पालन तो अवश्य होगा, पर पन्द्रह की बजाय बीस दिन में। तब तक गत कई दिनों से शिकागो में चलनेवाली बर्फ़ की आँधी से मैं अपने को बचाये रख सकूँगा और थोड़ी शक्ति भी प्राप्त हो जायगी।</p><p>ऐसा लगता है मार्गट आंट मेरी की बड़ी हिमायती है, जब कि मेरे अलावा और लोगों की भी भतीजियाँ, बहनें और चाचियाँ हैं।</p><p>कल वन के लिए मैं रवाना हो रहा हूँ। ओह! शिकागो में घुसने के पूर्व फेफड़ों को तो ताजी हवा से भर लूँ। तब तक एक अच्छी लड़की की तरह शिकागो आनेवाली मेरी डाक अपने पास रखना और उसे यहाँ मत भेज देना।</p><p>मैंने काम समाप्त कर दिया है। मेरे मित्रों का आग्रह है कि मैं रेल का सामना करने के पहले कुछ दिन – तीन-चार दिन – विश्राम ले लूँ।</p><p>यहाँ से न्यूयार्क तक का तीन महीने का एक मुफ़्त पास मुझे मिल गया है। ‘स्लीपिंग कार’ के अतिरिक्त और कोई ख़र्चा नहीं। इस तरह तुम देखती हो न, सब कुछ मुफ़्त, मुफ़्त!</p><p
class="has-text-align-right">सस्नेह तुम्हारा,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5847</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र सैन फ़्रेंसिस्को से कुमारी मेरी हेल को 28 मार्च, 1900 लिखा था। पढ़ें विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-28-march-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (28 मार्च, 1900)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी मेरी हेल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">१७१९, टर्क स्ट्रीट,<br>सैन फ़्रांसिस्को,<br>२८ मार्च, १९००</p><p>प्रिय मेरी,</p><p>यह पत्र तुम्हें यह जताने के लिए लिख रहा हूँ कि ‘मैं बहुत ख़ुश हूँ।’ यह नहीं कि मैं किसी धूमिल आशावाद से ग्रस्त होता जा रहा हूँ, बल्कि दुःख झेलने की मेरी क्षमता बढ़ती जा रही है। मैं इस संसार के सुख-दुःख रूपी महामारी की दुर्गंध से ऊपर उठता जा रहा हूँ; उनका अर्थ मेरे लिए मिटता जा रहा है। यह संसार एक स्वप्न है। यहाँ किसीके हँसने-रोने का कोई मूल्य नहीं। वह केवल स्वप्न है, और देर या सबेर अवश्य टूटेगा। वहाँ तुम लोगों के क्या हाल-चाल हैं? हैरियट पेरिस आनन्द मनाने जा रही है! वहाँ मेरी उससे अवश्य भेंट होगी। मैं एक फ़्रेंच डिक्शनरी कंठाग्र कर रहा हूँ। मैं कुछ धन भी अर्जित कर रहा हूँ। सुबह-शाम कठिन परिश्रम करता हूँ, फिर भी अच्छा हूँ। नींद अच्छी आती है, हाजमा भी अच्छा है। पूर्ण अनियमितता है।</p><p>तुम पूर्व की ओर जा रही हो। आशा है, अप्रैल के अन्त में मैं शिकागो आऊँगा। यदि न आ सका, तो पूर्व में तुम्हारे जाने के पहले तुमसे जरूर मिलूँगा।</p><p><a
href="/swami-vivekananda-ke-patra-miss-isabelle-mckindley-4-april-1895/">मैक्किंडली</a> परिवार की लड़कियाँ क्या कर रही हैं? चकोतरों की पुष्टई खा रही हैं और मोटी हो रही हैं? चलते रहो, जिन्दगी तो एक स्वप्न है। क्या तुम इससे खुश नहीं हो? बाप रे! वे शाश्वत स्वर्ग चाहते हैं।ईश्वर को धन्यवाद है कि सिवा उसके और कुछ भी शाश्वत नहीं है। मुझे विश्वास है उसे केवल ईश्वर ही सहन कर सकता है। शाश्वतता की यह बकवाद!</p><p>सफलता धीरे धीरे मुझे मिलनी शुरू हो चुकी है, वह अभी और भी अधिक मिलेगी। फिर भी चुपचाप रहूँगा। अभी तुम्हें सफलता नहीं मिल रही है, इसका मुझे दुःख है, मतलब मैं दुःखित अनुभव करने का प्रयत्न कर रहा हूँ, क्योंकि मै किसी भी वस्तु के लिए अब और दुःखी नही हो सकता। मैं उस शान्ति को प्राप्त कर रहा हूँ, जो बुद्धि के परे है, जो न सुख है न दुःख, बल्कि इन दोनों से ही उपर है। ‘मदर’ से यह कह देना। पिछले दो वर्षों में मैं जिस शारीरिक और मानसिक मृत्यु की घाटी से गुजरा हूँ, उसीने मुझे यह प्राप्त करने में सहायता दी है। अब मैं उस ‘शान्ति’, उस शाश्वत मौन के निकट आ रहा हूँ। अब मैं जो चीज जिस रूप में है, उसे उसी रूप में देखना चाहता हूँ, उस शान्ति के भीतर, अपने परम रूप में। ‘जो अपने भीतर ही आनन्द पाता है, जो अपने भीतर ही इच्छाओं को देखता है, वस्तुतः उसीने अपने जीवन का पाठ पढ़ा है।’ यही है वह महान् पाठ जिसे अनेक जन्मों, स्वर्गों-नरकों में से होकर हमें सीखना है – कि अपनी आत्मा के परे कुछ भी याचना करने, इच्छा करने के लिए नहीं है। ‘जो सबसे बड़ी वस्तु मैं प्राप्त कर सकता हूँ, वह आत्मा है।’ ‘मैं मुक्त हूँ’, अतः सुखी होने के लिए मुझे अन्य किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं। ‘अनन्त काल से अकेला, चूँकि मैं मुक्त था,अतः मुक्त हूँ और सदा रहूँगा भी।’ यह वेदान्त मत है। इतने समय तक मैं सिद्धान्त का प्रचार करता रहा, लेकिन ओह! कितने आनन्द का विषय है प्यारी बहन मेरी, कि इसे मैं अब प्रत्येक दिन अनुभव कर रहा हूँ। हाँ, मैं अनुभव कर रहा हूँ। ‘मैं मुक्त हूँ।’ ‘एकम्, एकम्, एकमेवाद्वितीयम।’</p><p
class="has-text-align-right">सच्चिदानन्द स्वरूप,<br>विवेकानन्द</p><p>पुनश्च – अब मैं सच्चा विवेकानन्द बनने जा रहा हूँ। कभी तुमने बुराई का आनन्द लिया है? हा! हा! ओ भोली लड़की! तू क्या कहती है कि सब कुछ अच्छा है! बकवास! कुछ अच्छा है, कुछ बुरा है। मैं अच्छे का भी आनन्द लेता हूँ और बुरे का भी। मैं ही जीसस था और मैं ही जूडास इस्केरियट। दोनों ही मेरी लीला है, दोनों ही मेरे विनोद। ‘जब तक द्वैतभाव है, भय से तुझे मुक्ति नहीं मिलेगी।’ शुतुरमुर्गवाला तरीका? – बालू में अपना सिर छिपा लेना और सोचना कि तुम्हें कोई देख नहीं रहा है! सब अच्छा ही अच्छा है! साहसी बनो और जो भी आये उसका सामना करो। अच्छा आये, बुरा आये, दोनों का स्वागत है, दोनों ही मेरे लिए खेल हैं। ऐसी कोई भलाई नहीं, जिसे मैं प्राप्त करना चाहूँ, ऐसा कोई आदर्श नहीं, जिसे पकड़ लेना चाहूँ, ऐसी कोई महत्त्वाकाँक्षा नहीं जिसे पूरा करना चाहूँ। मैं हीरों की खान हूँ, अच्छे और बुरे की कंकड़ियों से खेल रहा हूँ। बुराई, तुम्हारे लिए अच्छा है कि मेरे पास आओ; अच्छाई, तुम्हारे लिए भी अच्छा है कि मेरे पास आओ। यदि ब्रह्माण्ड मेरे कान के पास भी भहराकर गिरता है, तो इससे मुझे क्या? मैं वह शान्ति हूँ, जो बुद्धि के परे है। बुद्धि तो केवल हमें अच्छे और बुरे का ज्ञान देता है। मैं उससे परे हूँ, मैं शान्ति हूँ।</p><p
class="has-text-align-right">वि.</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5840</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र सैन फ़्रेंसिस्को से कुमारी मेरी हेल को 22 मार्च, 1900 लिखा था। पढ़ें विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-miss-mary-hale-22-march-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (22 मार्च, 1900)</a> appeared first on <a
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class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी मेरी हेल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">१७१९, टर्क स्ट्रीट,<br>सैन फ़्रांसिस्को,<br>२२ मार्च, १९००</p><p>प्रिय मेरी,</p><p>तुम्हारे पत्र के लिए अनेक धन्यवाद। तुम्हारा कहना सच है कि भारत वासियों के विषय में सोचने के अलावा भी मुझे सोचने को बहुत कुछ है, पर अपने गुरूदेव के कार्य को सम्पादित करने का जो सबको समाहित कर लेनेवाला मेरा जीवन-उद्देश्य है, उसके सामने इन सबको गौण हो जाना पड़ता है। मैं चाहता हूँ कि यह त्याग सुखकर हो सके। पर ऐसा नहीं है, और स्वाभाविक है कि इससे मनुष्य कभी कभी कटु हो जाता है, क्योंकि तुम यह जान लो मेरी कि मैं अभी भी मनुष्य ही हूँ और अपने मनुष्य स्वभाव को पूरी तरह विस्मृत नहीं कर सका हूँ। मुझे आशा है कि कभी ऐसा कर सकूँगा। मेरे लिए प्रार्थना करो।</p><p>अवश्य ही मेरे प्रति या किसी भी वस्तु के प्रति <a
href="/swami-vivekananda-ke-patra-miss-josephine-macleod-12-november-1898/">कुमारी मैक्लिऑड</a> अथवा कुमारी नोबुल की क्या धारणा है, इसके लिए मैं उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। या ऐसा हो सकता है? आलोचना से तो खिन्न होते तुमने मुझे कभी नहीं देखा होगा।</p><p>मुझे ख़ुशी है कि एक लम्बे समय के लिए तुम यूरोप जा रही हो। ख़ूब लम्बा चक्कर लगाओ, तुम काफी समय से घर की कबूतरी बनी रही हो।</p><p>जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं तो चिरन्तन रूप से भ्रमण करते करते थक गया हूँ। इसीलिए मैं घर वापस जाना और आराम करना चाहता हूँ। मैं अब और काम करना नहीं चाहता। मेरा मामला किसी विद्वान के अवकाश प्राप्त करने जैसा ही असम्भव है। वह मुझे कभी नहीं मिलता। मैं कामना करता हूँ कि वह मुझे मिले, विशेषकर अब जब कि मैं टूट चुका और काम करते करते थक चुका हूँ। जब भी मुझे श्रीमती सेवियर का उनके हिमालय स्थित आवास से पत्र मिलता है, मेरी हिमालय को उड़ जाने की इच्छा होने लगती है। मैं सचमुच इस मंचकार्य और शाश्वत घुमक्कड़ी तथा नये लोगों से मिलने एवं व्याख्यानबाजी से तंग आ चुका हूँ।</p><p>शिकागो में कक्षा चलाने की झंझट में पड़ने की तुम्हें जरूरत नहीं। मैं फ़्रिस्को में पैसा पैदा कर रहा हूँ और शीघ्र ही घर वापस जाने के लिए काफी पैदा कर लूँगा।</p><p>तुम्हारा और बहनों का क्या हाल है? मैं करीब अप्रैल के प्रारम्भ में शिकागो आने की आशा करता हूँ।</p><p
class="has-text-align-right">तुम्हारा,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5822</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र सैन फ़्रेंसिस्को से कुमारी मेरी हेल को 12 मार्च, 1900 लिखा था। पढ़ें विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
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class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का कुमारी मेरी हेल को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">१७१९, टर्क स्ट्रीट,<br>सैन फ़्रांसिस्को,<br>१२ मार्च, १९००</p><p>प्रिय मेरी,</p><p>तुम्हारा क्या हाल-चाल है? ‘मदर’ और बहनें कैसी हैं? शिकागो के क्या हालचाल हैं? मैं फ़्रिस्को में हूँ, और एकाध महीने यहीं रहूँगा। शिकागो के लिए मैं शुरू अप्रैल में रवाना होऊँगा। अवश्य ही उसके पहले मैं तुम्हें लिखूँगा। मेरी बड़ी इच्छा है कि तुम लोगों के साथ कुछ दिन रहूँ, आदमी काम करते करते थक जाता है। मेरा <a
href="/category/health-fitness/">स्वास्थ्य</a> बस यूँ ही सा है, किन्तु मेरा मन शान्त है और पिछले कुछ समय से ऐसा ही रहा है। मैं सारी चिन्ताएँ ईश्वर को सौंप देने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं तो केवल एक कार्यकर्ता हूँ। आज्ञापालन करना और काम करते जाना ही मेरा जीवन-उद्देश्य है। शेष सब प्रभु के हाथ में है।</p><p>“समस्त चिन्ताएँ और उपाय छोड़कर तुम मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हें सब भयों से मुक्त कर दूँगा।”<sup>1</sup></p><p>मैं इसे कार्यान्वित करने की प्राणपण से चेष्टा कर रहा हूँ। ईश्वर से प्रार्थना है कि इसमें मैं शीघ्र ही सफल हो सकूँ।</p><p
class="has-text-align-right">तुम्हारा चिरस्नेही भाई,<br>विवेकानन्द</p><hr
class="wp-block-separator"/><ol><li>सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।<br>अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ – गीता॥१८।६६॥</li></ol><p>The post <a
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