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><channel><title>Ramayan Archives - हिंदी पथ</title> <atom:link href="https://hindipath.com/tag/ramayan/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" /><link>https://hindipath.com/tag/ramayan/</link> <description>हिंदी का संसार</description> <lastBuildDate>Sat, 19 Apr 2025 17:25:41 +0000</lastBuildDate> <language>en-US</language> <sy:updatePeriod> hourly </sy:updatePeriod> <sy:updateFrequency> 1 </sy:updateFrequency> <generator>https://wordpress.org/?v=6.3.10</generator><image> <url>https://hindipath.com/wp-content/uploads/2019/09/HindiPath-Site-Icon-New.png</url><title>Ramayan Archives - हिंदी पथ</title><link>https://hindipath.com/tag/ramayan/</link> <width>32</width> <height>32</height> </image> <item><title>वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 45 हिंदी में &#8211; Valmiki Ramayana Balakanda Chapter &#8211; 45</title><link>https://hindipath.com/valmiki-ramayana-balakanda-chapter-45-in-hindi/</link> <comments>https://hindipath.com/valmiki-ramayana-balakanda-chapter-45-in-hindi/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सुरभि भदौरिया]]></dc:creator> <pubDate>Sat, 19 Apr 2025 17:25:39 +0000</pubDate> <category><![CDATA[धर्म]]></category> <category><![CDATA[Ramayan]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=28187</guid><description><![CDATA[<p>देवताओं और दैत्योंद्वारा क्षीर-समुद्र-मन्थन, भगवान् रुद्र द्वारा हालाहल विष का पान, भगवान् विष्णु के सहयोगसे मन्दराचल का पाताल से उद्धार</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><strong>देवताओं और दैत्योंद्वारा क्षीर-समुद्र-मन्थन, भगवान् रुद्र द्वारा हालाहल विष का पान, </strong><a
href="https://hindipath.com/vishnu-chalisa-in-hindi/"><strong>भगवान् विष्णु</strong></a><strong> के सहयोगसे मन्दराचल का पाताल से उद्धार और उसके द्वारा </strong><a
href="https://hindipath.com/tag/samudra-manthan/"><strong>मन्थन</strong></a><strong>, </strong><a
href="https://hindipath.com/dhanvantari-aarti-hindi/"><strong>धन्वन्तरि</strong></a><strong>, अप्सरा, वारुणी, उच्चै:श्रवा, कौस्तुभ तथा अमृतकी उत्पत्ति और देवासुर-संग्राममें दैत्योंका संहार</strong></p><p>विश्वामित्रजी की बातें सुनकर लक्ष्मण सहित <a
href="https://hindipath.com/ram-chalisa/">श्रीरामचन्द्रजी</a> को बड़ा विस्मय हुआ। वे मुनिसे इस प्रकार बोले—॥ १ ॥</p><p>‘ब्रह्मन्! आपने गंगाजीके स्वर्गसे उतरने और समुद्र के भरने की यह बड़ी उत्तम और अत्यन्त अद्भुत कथा सुनायी॥ २ ॥</p><p>‘काम-क्रोधादि शत्रुओं को संताप देने वाले महर्षे! आपकी कही हुई  इस सम्पूर्ण कथापर पूर्णरूपसे विचार करते हुए हम दोनों भाइयों की यह रात्रि एक क्षणके समान बीत गयी है॥ ३ ॥</p><p>‘विश्वामित्रजी! लक्ष्मणके साथ इस शुभ कथापर विचार करते हुए ही मेरी यह सारी रात बीती है’॥ ४ ॥</p><p>तत्पश्चात् निर्मल प्रभातकाल उपस्थित होनेपर तपोधन विश्वामित्रजी जब नित्यकर्मसे निवृत्त हो चुके, तब शत्रुदमन श्रीरामचन्द्र जी ने उनके पास जाकर कहा—॥ ५ ॥</p><p>‘मुने! यह पूजनीया रात्रि चली गयी। सुनने योग्य सर्वोत्तम कथा मैंने सुन ली। अब हमलोग सरिताओंमें श्रेष्ठ पुण्यसलिला त्रिपथगामिनी नदी गंगा जी के उस पार चलें॥ ६ ॥</p><p>‘सदा पुण्यकर्म में तत्पर रहने वाले ऋषियों की यह नाव उपस्थित है। इस पर सुखद आसन बिछा है। आप परमपूज्य महर्षि को यहाँ उपस्थित जानकर ऋषियों की भेजी हुई  यह नाव बड़ी तीव्र गतिसे यहाँ आयी है’॥ ७ ॥</p><p>महात्मा रघुनन्दनका यह वचन सुनकर विश्वामित्र जी ने पहले ऋषियोंसहित श्रीराम-लक्ष्मण को पार कराया॥ ८ ॥</p><p>तत्पश्चात् स्वयं भी उत्तर तटपर पहुँचकर उन्होंने वहाँ रहनेवाले ऋषियोंका सत्कार किया। फिर सब लोग गंगाजीके किनारे ठहरकर विशाला नामक पुरीकी शोभा देखने लगे॥ ९ ॥</p><p>तदनन्तर श्रीराम-लक्ष्मणको साथ ले मुनिवर विश्वामित्र तुरंत उस दिव्य एवं रमणीय नगरी विशालाकी ओर चल दिये, जो अपनी सुन्दर शोभासे स्वर्गके समान जान पड़ती थी॥ १० ॥</p><p>उस समय परम बुद्धिमान् श्रीरामने हाथ जोड़कर उस उत्तम विशाला पुरीके विषयमें महामुनि विश्वामित्रसे पूछा—॥ ११ ॥</p><p>‘महामुने! आपका कल्याण हो। मैं यह सुनना चाहता हूँ कि विशालामें कौन-सा राजवंश राज्य कर रहा है? इसके लिये मुझे बड़ी उत्कण्ठा है’॥ १२ ॥</p><p>श्रीरामका यह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रने विशाला पुरीके प्राचीन इतिहासका वर्णन आरम्भ किया—॥ १३ ॥</p><p>‘रघुकुलनन्दन श्रीराम! मैंने इन्द्रके मुखसे विशाला-पुरीके वैभवका प्रतिपादन करनेवाली जो कथा सुनी है, उसे बता रहा हूँ, सुनो। इस देशमें जो वृत्तान्त घटित हुआ है, उसे यथार्थरूपसे श्रवण करो॥ १४ ॥</p><p>‘श्रीराम! पहले सत्ययुगमें दितिके पुत्र दैत्य बड़े बलवान् थे और अदितिके परम धर्मात्मा पुत्र महाभाग देवता भी बड़े शक्तिशाली थे॥ १५ ॥</p><p>‘पुरुषसिंह! उन महामना दैत्यों और देवताओंके मनमें यह विचार हुआ कि हम कैसे अजर-अमर और नीरोग हों?॥ १६ ॥</p><p>‘इस प्रकार चिन्तन करते हुए उन विचारशील देवताओं और दैत्योंकी बुद्धिमें यह बात आयी कि हमलोग यदि क्षीरसागरका मन्थन करें तो उसमें निश्चय ही अमृतमय रस प्राप्त कर लेंगे॥ १७ ॥</p><p>‘समुद्रमन्थनका निश्चय करके उन अमिततेजस्वी देवताओं और दैत्योंने वासुकि नागको रस्सी और मन्दराचलको मथानी बनाकर क्षीर-सागरको मथना आरम्भ किया॥ १८ ॥</p><p>‘तदनन्तर एक हजार वर्ष बीतनेपर रस्सी बने हुए सर्पके बहुसंख्यक मुख अत्यन्त विष उगलते हुए वहाँ मन्दराचलकी शिलाओंको अपने दाँतोंसे डँसने लगे॥ १९ ॥</p><p>‘अत: उस समय वहाँ अग्निके समान दाहक हालाहल नामक महाभयंकर विष ऊपरको उठा। उसने देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत्को दग्ध करना आरम्भ किया॥ २० ॥</p><p>‘यह देख देवतालोग शरणार्थी होकर सबका कल्याण करनेवाले महान् देवता पशुपति रुद्रकी शरणमें गये और त्राहि-त्राहिकी पुकार लगाकर उनकी स्तुति करने लगे॥ २१ ॥</p><p>‘देवताओंके इस प्रकार पुकारनेपर देवदेवेश्वर भगवान् शिव वहाँ प्रकट हुए। फिर वहीं शङ्ख-चक्रधारी भगवान् श्रीहरि भी उपस्थित हो गये॥ २२ ॥</p><p>‘श्रीहरिने त्रिशूलधारी भगवान् रुद्रसे मुसकरा कर कहा—‘सुरश्रेष्ठ! देवताओंके समुद्रमन्थन करने पर जो वस्तु सबसे पहले प्राप्त हुई  है, वह आपका भाग है; क्योंकि आप सब देवताओंमें अग्रगण्य हैं। प्रभो! अग्र पूजा के रूपमें प्राप्त हुए इस विषको आप यहीं खड़े होकर ग्रहण करें’॥ २३-२४ ॥</p><p>‘ऐसा कहकर देवशिरोमणि विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। देवताओंका भय देखकर और भगवान् विष्णु की पूर्वोक्त बात सुनकर देवेश्वर भगवान् रुद्रने उस घोर हालाहल विष को अमृत के समान मानकर अपने कण्ठमें धारण कर लिया तथा देवताओं को विदा करके वे अपने स्थान को चले गये॥ २५-२६ ॥</p><p>‘रघुनन्दन! तत्पश्चात् देवता और असुर सब मिलकर क्षीर सागर का मन्थन करने लगे। उस समय मथानी बना हुआ उत्तम पर्वत मन्दर पाताल में घुस गया॥ २७</p><p>‘तब देवता और गन्धर्व भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करने लगे—‘महाबाहो! आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति हैं। विशेषत: देवताओंके अवलम्बन तो आप ही हैं। आप हमारी रक्षा करें और इस पर्वत को उठावें’॥ २८ १/२ ॥</p><p>‘यह सुनकर भगवान् हृषीकेश ने कच्छपका रूप धारण कर लिया और उस पर्वतको अपनी पीठपर रखकर वे श्रीहरि वहीं समुद्र के भीतर सो गये॥ २९ १/२ ॥</p><p>‘फिर विश्वात्मा पुरुषोत्तम भगवान् केशव उस पर्वतशिखरको हाथसे पकड़कर देवताओंके बीचमें खड़े हो स्वयं भी समुद्र का मन्थन करने लगे॥ ३० १/२ ॥</p><p>‘तदनन्तर एक हजार वर्ष बीतनेपर उस क्षीरसागरसे एक आयुर्वेदमय धर्मात्मा पुरुष प्रकट हुए, जिनके एक हाथमें दण्ड और दूसरेमें कमण्डलु था। उनका नाम धन्वन्तरि था। उनके प्राकट्यके बाद सागरसे सुन्दर कान्तिवाली बहुत-सी अप्सराएँ प्रकट हुई ं॥ ३१-३२ ॥</p><p>‘नरश्रेष्ठ! मन्थन करने से ही अप् (जल) में उसके रससे वे सुन्दरी स्त्रियाँ उत्पन्न हुई  थीं, इसलिये अप्सरा कहलायीं॥ ३३ ॥</p><p>‘काकुत्स्थ! उन सुन्दर कान्तिवाली अप्सराओं की संख्या साठ करोड़ थी और जो उनकी परिचारिकाएँ थीं, उनकी गणना नहीं की जा सकती। वे सब असंख्य थीं॥ ३४ ॥</p><p>‘उन अप्सराओंको समस्त देवता और दानव कोर्इ भी अपनी ‘पन्ती’ रूपसे ग्रहण न कर सके, इसलिये वे साधारणा (सामान्या) मानी गयीं॥ ३५ ॥</p><p>‘रघुनन्दन! तदनन्तर वरुणकी कन्या वारुणी, जो सुराकी अभिमानिनी देवी थी, प्रकट हुई&nbsp; और अपनेको स्वीकार करनेवाले पुरुषकी खोज करने लगी॥ ३६ ॥</p><p>‘वीर श्रीराम! दैत्योंने उस वरुणकन्या सुराको नहीं ग्रहण किया, परंतु अदितिके पुत्रोंने इस अनिन्द्य सुन्दरीको ग्रहण कर लिया॥ ३७ ॥</p><p>‘सुरासे रहित होनेके कारण ही दैत्य ‘असुर’ कहलाये और सुरा-सेवनके कारण ही अदितिके पुत्रोंकी ‘सुर’ संज्ञा हुई । वारुणीको ग्रहण करने से देवता लोग हर्ष से उत्फुल्ल एवं आनन्द मग्न हो गये॥ ३८ ॥</p><p>‘नरश्रेष्ठ! तदनन्तर घोड़ों में उत्तम उच्चै:श्रवा, मणिरन्त कौस्तुभ तथा परम उत्तम अमृत का प्राकट्य हुआ॥ ३९ ॥</p><p>‘श्रीराम! उस अमृतके लिये देवताओं और असुरों के कुलका महान् संहार हुआ। अदिति के पुत्र दिति के पुत्रों के साथ युद्ध करने लगे॥ ४० ॥</p><p>समस्त असुर राक्षसोंके साथ मिलकर एक हो गये। वीर! देवताओंके साथ उनका महाघोर संग्राम होने लगा, जो तीनों लोकों को मोह में डालने वाला था॥ ४१ ॥</p><p>‘जब देवताओं और असुरों का वह सारा समूह क्षीण हो चला, तब महाबली भगवान् विष्णुने मोहिनी मायाका आश्रय लेकर तुरंत ही  अपहरण कर लिया॥ ४२ ॥</p><p>‘जो दैत्य बल पूर्वक अमृत छीन लानेके लिये अविनाशी पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु के सामने गये, उन्हें प्रभावशाली भगवान् विष्णु ने उस समय युद्ध में पीस डाला॥ ४३ ॥</p><p>‘देवताओं और दैत्यों के उस घोर महायुद्धमें अदिति के वीर पुत्रों ने दिति के पुत्रों का विशेष संहार किया॥ ४४ ॥</p><p>‘दैत्यों का वध करने के पश्चात् त्रिलोकी का राज्य पाकर देवराज इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए और ऋषियों तथा चारणोंसहित समस्त लोकों का शासन करने लगे’॥ ४५ ॥</p><p
class="has-text-align-center">इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४५॥</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=28184</guid><description><![CDATA[<p>ब्रह्माजी का भगीरथ की प्रशंसा करते हुए उन्हें गंगाजलसे पितरोंके तर्पणकी आज्ञा देना और राजा का वह सब करके अपने</p><p>The post <a
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href="https://hindipath.com/brahma-samhita-lyrics/">ब्रह्माजी </a>का भगीरथ की प्रशंसा करते हुए उन्हें गंगाजलसे पितरोंके तर्पणकी आज्ञा देना और राजा का वह सब करके अपने नगरको जाना, <a
href="https://hindipath.com/ganga-maiya-ki-aarti/">गंगा</a> वतरण के उपाख्यान की महिमा</strong></p><p>श्रीराम! इस प्रकार <a
href="https://hindipath.com/ganga-stuti-lyrics/">गंगाजी</a> को साथ लिये राजा भगीरथने समुद्रतक जाकर रसातलमें, जहाँ उनके पूर्वज भस्म हुए थे, प्रवेश किया। वह भस्मराशि जब गंगाजी के जल से आप्लावित हो गयी, तब सम्पूर्ण लोकों के स्वामी <a
href="https://hindipath.com/brahma-chalisa-in-hindi/">भगवान् ब्रह्मा</a> ने वहाँ पधारकर राजासे इस प्रकार कहा—॥ १-२ ॥</p><p>‘नरश्रेष्ठ! महात्मा राजा सगरके साठ हजार पुत्रों का तुमने उद्धार कर दिया। अब वे देवताओं की भाँति स्वर्ग लोक में जा पहुँचे॥ ३ ॥</p><p>‘भूपाल! इस संसार में जब तक सागरका जल मौजूद रहेगा; तबतक सगरके सभी पुत्र देवताओं की भाँति स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित रहेंगे॥ ४ ॥</p><p>‘ये गंगा तुम्हारी भी ज्येष्ठ पुत्री होकर रहेंगी और तुम्हारे नामपर रखे हुए भागीरथी नामसे इस जगत्में विख्यात होंगी॥ ५ ॥</p><p>‘त्रिपथगा, दिव्या और भागीरथी—इन तीनों नामों से गंगा की प्रसिद्धि होगी। ये आकाश, पृथ्वी और पाताल तीनों पथोंको पवित्र करती हुई  गमन करती हैं, इसलिये त्रिपथगा मानी गयी हैं॥ ६ ॥</p><p>‘नरेश्वर! महाराज! अब तुम गंगाजीके जलसे यहाँ अपने सभी पितामहों का तर्पण करो और इस प्रकार अपनी तथा अपने पूर्वजों द्वारा की हुई  प्रतिज्ञा को पूर्ण कर लो॥ ७ ॥</p><p>‘राजन्! तुम्हारे पूर्वज धर्मात्माओं में श्रेष्ठ महायशस्वी राजा सगर भी गंगा को यहाँ लाना चाहते थे; किंतु उनका यह मनोरथ नहीं पूर्ण हुआ॥ ८ ॥</p><p>‘वत्स! इसी प्रकार लोकमें अप्रतिम प्रभावशाली, उत्तम गुणविशिष्ट, महर्षितुल्य तेजस्वी, मेरे समान तपस्वी तथा क्षत्रिय-धर्म परायण राजर्षि अंशुमान्ने भी गंगा को यहाँ लाने की इच्छा की; परंतु वे इस पृथ्वीपर उन्हें लाने की प्रतिज्ञा पूरी न कर सके॥ ९-१० ॥</p><p>‘निष्पाप महाभाग! तुम्हारे अत्यन्त तेजस्वी पिता दिलीप भी गंगा को यहाँ लानेकी इच्छा करके भी इस कार्य में सफल न हो सके॥ ११ ॥</p><p>‘पुरुषप्रवर! तुमने गंगा को भूतल पर लानेकी वह प्रतिज्ञा पूर्ण कर ली। इससे संसार में तुम्हें परम उत्तम एवं महान् यश की प्राप्ति हुई  है॥ १२ ॥</p><p>शत्रुदमन! तुमने जो गंगाजीको पृथ्वीपर उतारनेका कार्य पूरा किया है, इससे उस महान् ब्रह्मलोक पर अधिकार प्राप्त कर लिया है, जो धर्म का आश्रय है॥</p><p>‘नरश्रेष्ठ! पुरुषप्रवर! गंगाजी का जल सदा ही स्नान के योग्य है। तुम स्वयं भी इसमें स्नान करो और पवित्र होकर पुण्यका फल प्राप्त करो॥ १४ ॥</p><p>‘नरेश्वर! तुम अपने सभी पितामहों का तर्पण करो। तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं अपने लोक को जाऊँगा। तुम भी अपनी राजधानी को लौट जाओ’॥ १५ ॥</p><p>ऐसा कहकर सर्वलोक पितामह महायशस्वी देवेश्वर ब्रह्माजी जैसे आये थे, वैसे ही देवलोक को लौट गये॥ १६ ॥</p><p>नरश्रेष्ठ! महायशस्वी राजर्षि राजा भगीरथ भी गंगाजी के उत्तम जलसे क्रमश: सभी सगर-पुत्रों का विधिवत् तर्पण करके पवित्र हो अपने नगरको चले गये। इस प्रकार सफल मनोरथ होकर वे अपने राज्यका शासन करने लगे॥ १७-१८ ॥</p><p>रघुनन्दन! अपने राजाको पुन: सामने पाकर प्रजावर्गको बड़ी प्रसन्नता हुई । सबका शोक जाता रहा। सबके मनोरथ पूर्ण हुए और चिन्ता दूर हो गयी॥ १९ ॥</p><p>श्रीराम! यह गंगाजी की कथा मैंने तुम्हें विस्तारके साथ कह सुनायी। तुम्हारा कल्याण हो। अब जाओ, मंगलमय संध्यावन्दन आदि का सम्पादन करो। देखो, संध्याकाल बीता जा रहा है॥ २० ॥</p><p>यह गंगा वतरण का मंगलमय उपाख्यान आयु बढ़ानेवाला है। धन, यश, आयु, पुत्र और स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाला है। जो ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा दूसरे वर्णके लोगों को भी यह कथा सुनाता है, उसके ऊपर देवता और पितर प्रसन्न होते हैं॥ २१-२२ ॥</p><p>ककुत्स्थकुलभूषण! जो इसका श्रवण करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और आयुकी वृद्धि एवं कीर्ति का विस्तार होता है॥ २३ ॥</p><p
class="has-text-align-center">इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४४॥</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=28181</guid><description><![CDATA[<p>भगीरथकी तपस्या से संतुष्ट हुए भगवान् शङ्कर का गंगा को अपने सिरपर धारण करके बिन्दुसरोवर में छोड़ना और उनका सात</p><p>The post <a
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href="https://hindipath.com/shiv-dhyan-mantra/">भगवान् शङ्कर</a> का <a
href="https://hindipath.com/ganga-stuti-lyrics/">गंगा</a> को अपने सिरपर धारण करके बिन्दुसरोवर में छोड़ना और उनका सात धाराओं में विभक्त हो भगीरथ के साथ जाकर उनके पितरों का उद्धार करना</strong></p><p>श्रीराम!<a
href="https://hindipath.com/brahma-samhita-lyrics/"> देवाधिदेव ब्रह्माजी</a> के चले जाने पर राजा भगीरथ पृथ्वी पर केवल अँगूठे के अग्र भाग को टिकाये हुए खड़े हो एक वर्ष तक <a
href="https://hindipath.com/kashi-vishwanath-mantra-lyrics/">भगवान् शङ्करकी</a> उपासनामें लगे रहे॥ १ ॥</p><p>वर्ष पूरा होने पर सर्वलोकवन्दित उमावल्लभ भगवान् पशुपति ने प्रकट होकर राजा से इस प्रकार कहा—॥ २ ॥</p><p>‘नरश्रेष्ठ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा प्रिय कार्य अवश्य करूँगा। मैं गिरिराज कुमारी गंगा देवी को अपने मस्तकपर धारण करूँगा’॥ ३ ॥</p><p>श्रीराम! शङ्करजी की स्वीकृति मिल जानेपर हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री <a
href="https://hindipath.com/ganga-stotram-lyrics/">गंगाजी</a>, जिनके चरणोंमें सारा संसार मस्तक झुकाता है, बहुत बड़ा रूप धारण करके अपने वेगको दुस्सह बनाकर आकाशसे भगवान् शङ्करके शोभायमान मस्तकपर गिरीं॥ ४ १/२ ॥</p><p>उस समय परम दुर्धर <a
href="https://hindipath.com/shri-ganga-ji-mahima-braj-bhasha-naval-singh-bhadauria/">गंगा देवी</a> ने यह सोचा था कि मैं अपने प्रखर प्रवाहके साथ शङ्करजी को लिये-दिये पातालमें घुस जाऊँगी॥ ५ १/२ ॥</p><p>उनके इस अहंकारको जानकर त्रिनेत्रधारी भगवान् हर कुपित हो उठे और उन्होंने उस समय गंगाको अदृश्य कर देनेका विचार किया॥ ६ १/२ ॥</p><p>पुण्य स्वरूपा गंगा भगवान् रुद्र के पवित्र मस्तकपर गिरीं। उनका वह मस्तक जटामण्डलरूपी गुफा से सुशोभित हिमालय के समान जान पड़ता था। उसपर गिरकर विशेष प्रयत्न करने पर भी किसी तरह वे पृथ्वीपर न जा सकीं॥ ७-८ ॥</p><p>भगवान् शिवके जटा-जालमें उलझकर किनारे आकर भी गंगा देवी वहाँ से निकलने का मार्ग न पा सकीं और बहुत वर्षों तक उस जटाजूट में ही भटकती रहीं॥ ९ ॥</p><p>रघुनन्दन! भगीरथने देखा, गंगाजी भगवान् शङ्करके जटामण्डलमें अदृश्य हो गयी हैं; तब वे पुन: वहाँ भारी तपस्यामें लग गये। उस तपस्याद्वारा उन्होंने भगवान् शिवको बहुत संतुष्ट कर लिया॥ १० ॥</p><p>तब महादेवजी ने गंगा जी को बिन्दुसरोवरमें ले जाकर छोड़ दिया। वहाँ छूटते ही उनकी सात धाराएँ हो गयीं॥ ११ ॥</p><p>ह्लादिनी, पावनी और नलिनी—ये कल्याणमय जलसे सुशोभित गंगाकी तीन मंगलमयी धाराएँ पूर्व दिशाकी ओर चली गयीं॥ १२ ॥</p><p>सुचक्षु, सीता और महानदी सिन्धु—ये तीन शुभ धाराएँ पश्चिम दिशाकी ओर प्रवाहित हुई॥ १३ ॥</p><p>उनकी अपेक्षा जो सातवीं धारा थी, वह महाराज भगीरथ के रथके पीछे-पीछे चलने लगी। महातेजस्वी राजर्षि भगीरथ भी दिव्य रथपर आरूढ़ हो आगे-आगे चले और गंगा उन्हीं के पथ का अनुसरण करने लगीं। इस प्रकार वे आकाशसे भगवान् शङ्कर के मस्तक पर और वहाँ से इस पृथ्वी पर आयी थीं॥ १४-१५ ॥</p><p>गंगाजीकी वह जलराशि महान् कलकल नाद के साथ तीव्र गति से प्रवाहित हुई। मत्स्य, कच्छप और शिंशुमार (सूँस) झुंड-के-झुंड उसमें गिरने लगे। उन गिरे हुए जलजन्तुओंसे वसुन्धराकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ १६ १/२ ॥</p><p>तदनन्तर देवता, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष और सिद्धगण नगर के समान आकारवाले विमानों, घोड़ों तथा गजराजोंपर बैठकर आकाशसे पृथ्वीपर गयी हुई गंगाजी की शोभा निहारने लगे॥ १७-१८ ॥</p><p>देवतालोग आश्चर्यचकित होकर वहाँ खड़े थे। जगत्में गंगावतरणके इस अद्भुत एवं उत्तम दृश्यको देखनेकी इच्छासे अमित तेजस्वी देवताओंका समूह वहाँ जुटा हुआ था॥ १९ १/२ ॥</p><p>तीव्र गतिसे आते हुए देवताओं तथा उनके दिव्य आभूषणों के प्रकाशसे वहाँ का मेघरहित निर्मल आकाश इस तरह प्रकाशित हो रहा था, मानो उसमें सैकड़ों सूर्य उदित हो गये हों॥ २० १/२ ॥</p><p>शिंशुमार, सर्प तथा चञ्चल मत्स्य समूहों के उछलने से गंगाजी के जलसे ऊपरका आकाश ऐसा जान पड़ता था, मानो वहाँ चञ्चल चपलाओंका प्रकाश सब ओर व्याप्त हो रहा हो॥ २१ १/२ ॥</p><p>वायु आदिसे सहस्रों टुकड़ोंमें बँटे हुए फेन आकाश में सब ओर फैल रहे थे। मानो शरद्-ऋतु के श्वेत बादल अथवा हंस उड़ रहे हों॥ २२ १/२ ॥</p><p>गंगाजी की वह धारा कहीं तेज, कहीं टेढ़ी और कहीं चौड़ी होकर बहती थी। कहीं बिलकुल नीचे की ओर गिरती और कहीं ऊँचे की ओर उठी हुई थी। कहीं समतल भूमिपर वह धीरे-धीरे बहती थी और कहीं-कहीं अपने ही जलसे उसके जलमें बारम्बार टक्करें लगती रहती थीं॥ २३-२४ ॥</p><p>गंगाका वह जल बार-बार ऊँचे मार्गपर उठता और पुन: नीची भूमि पर गिरता था। आकाशसे भगवान् शङ्करके मस्तकपर तथा वहाँसे फिर पृथ्वीपर गिरा हुआ वह निर्मल एवं पवित्र गंगाजल उस समय बड़ी शोभा पा रहा था॥</p><p>उस समय भूतल निवासी ऋषि और गन्धर्व यह सोचकर कि भगवान् शङ्कर के मस्तक से गिरा हुआ यह जल बहुत पवित्र है, उसमें आचमन करने लगे॥ २६ १/२ ॥</p><p>जो शापभ्रष्ट होकर आकाशसे पृथ्वीपर आ गये थे, वे गंगाके जलमें स्नान करके निष्पाप हो गये तथा उस जलसे पाप धुल जानेके कारण पुन: शुभ पुण्य से संयुक्त हो आकाश में पहुँचकर अपने लोकोंको पा गये॥</p><p>उस प्रकाश मान जलके सम्पर्क से आनन्दित हुए सम्पूर्ण जगत्को सदाके लिये बड़ी प्रसन्नता हुर्इ। सब लोग गंगा में स्नान करके पापहीन हो गये॥ २९ १/२ ॥</p><p>(हम पहले बता आये हैं कि) राजर्षि महाराज भगीरथ दिव्य रथपर आरूढ़ हो आगे-आगे चल रहे थे और गंगाजी उनके पीछे-पीछे जा रही थीं॥ ३० १/२ ॥</p><p>श्रीराम! उस समय समस्त देवता, ऋषि, दैत्य, दानव, राक्षस, गन्धर्व, यक्षप्रवर, किन्नर, बड़े-बड़े नाग, सर्प तथा अप्सरा—ये सब लोग बड़ी प्रसन्नताके साथ राजा भगीरथके रथके पीछे गंगाजीके साथ-साथ चल रहे थे। सब प्रकारके जलजन्तु भी गंगाजीकी उस जलराशिके साथ सानन्द जा रहे थे॥ ३१-३२ १/२ ॥</p><p>जिस ओर राजा भगीरथ जाते, उसी ओर समस्त पापों का नाश करने वाली सरिताओंमें श्रेष्ठ यशस्विनी गंगा भी जाती थीं॥ ३३ १/२ ॥</p><p>उस समय मार्गमें अद्भुत पराक्रमी महामना राजा जह्नु यज्ञ कर रहे थे। गंगाजी अपने जल-प्रवाह से उनके यज्ञमण्डप को बहा ले गयीं॥ ३४ १/२ ॥</p><p>रघुनन्दन! राजा जह्नु इसे गंगाजीका गर्व समझकर कुपित हो उठे; फिर तो उन्होंने गंगाजीके उस समस्त जलको पी लिया। यह संसारके लिये बड़ी अद्भुत बात हुर्इ॥ ३५ १/२ ॥</p><p>तब देवता, गन्धर्व तथा ऋषि अत्यन्त विस्मित होकर पुरुष प्रवर महात्मा जह्नु की स्तुति करने लगे॥ ३६ १/२ ॥</p><p>उन्होंने गंगाजी को उन महात्मा नरेशकी कन्या बना दिया। (अर्थात् उन्हें यह विश्वास दिलाया कि गंगाजीको प्रकट करके आप इनके पिता कहलायेंगे।) इससे सामर्थ्यशाली महातेजस्वी जह्नु बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने कानोंके छिद्रोंद्वारा गंगाजीको पुन: प्रकट कर दिया, इसलिये गंगा जह्नुकी पुत्री एवं जाह्नवी कहलाती हैं॥ ३७-३८ ॥</p><p>वहाँसे गंगा फिर भगीरथके रथका अनुसरण करती हुर्इ चलीं। उस समय सरिताओं में श्रेष्ठ जाह्नवी समुद्रतक जा पहुँचीं और राजा भगीरथके पितरोंके उद्धाररूपी कार्यकी सिद्धिके लिये रसातलमें गयीं॥ ३९ १/२ ॥</p><p>राजर्षि भगीरथ भी यन्त पूर्वक गंगाजी को साथ ले वहाँ गये। उन्होंने शापसे भस्म हुए अपने पितामहोंको अचेत-सा होकर देखा॥ ४० १/२ ॥</p><p>रघुकुलके श्रेष्ठ वीर! तदनन्तर गंगाके उस उत्तम जलने सगर-पुत्रोंकी उस भस्मराशिको आप्लावित कर दिया और वे सभी राजकुमार निष्पाप होकर स्वर्गमें पहुँच गये॥ ४१ ॥</p><p
class="has-text-align-center">इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४३॥</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=28168</guid><description><![CDATA[<p>अंशुमान् और भगीरथकी तपस्या, ब्रह्माजी का भगीरथको अभीष्ट वर देकर गंगाजी को धारण करने के लिये भगवान् शङ्कर को राजी</p><p>The post <a
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href="https://hindipath.com/brahma-ji-ki-aarti/"><strong>ब्रह्माजी</strong></a><strong> का भगीरथको अभीष्ट वर देकर </strong><a
href="https://hindipath.com/tag/ganga/"><strong>गंगाजी</strong></a><strong> को धारण करने के लिये </strong><a
href="https://hindipath.com/tag/shiva/"><strong>भगवान् शङ्कर</strong></a><strong> को राजी करने के निमित्त प्रयत्न करने की सलाह देना</strong></p><p>श्रीराम! सगरकी मृत्यु हो जानेपर प्रजाजनोंने परम धर्मात्मा अंशुमान्को राजा बनाने की रुचि प्रकट की॥ १ ॥</p><p>रघुनन्दन! अंशुमान् बड़े प्रतापी राजा हुए। उनके पुत्रका नाम दिलीप था। वह भी एक महान् पुरुष था॥ २ ॥</p><p>रघुकुल को आनन्दित करने वाले वीर! अंशुमान् दिलीप को राज्य देकर हिमालय के रमणीय शिखर पर चले गये और वहाँ अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे॥ ३ ॥</p><p>महान् यशस्वी राजा अंशुमान्ने उस तपोवनमें जाकर बत्तीस हजार वर्षोंतक तप किया। तपस्याके धनसे सम्पन्न हुए उस नरेशने वहीं शरीर त्यागकर स्वर्गलोक प्राप्त किया॥ ४ ॥</p><p>अपने पितामहों के वधका वृत्तान्त सुनकर महातेजस्वी दिलीप भी बहुत दु:खी रहते थे। अपनी बुद्धि से बहुत सोचने-विचारने के बाद भी वे किसी निश्चय पर नहीं पहुँच सके॥ ५ ॥</p><p>वे सदा इसी चिन्ता में डूबे रहते थे कि किस प्रकार पृथ्वीपर गंगाजीका उतरना सम्भव होगा? कैसे गंगाजलद्वारा उन्हें जलाञ्जलि दी जायेगी और किस प्रकार मैं अपने उन पितरों का उद्धार कर सकूँरुगा॥ ६ ॥</p><p>प्रतिदिन इन्हीं सब चिन्ताओंमें पड़े हुए राजा दिलीपको, जो अपने धर्माचरणसे बहुत विख्यात थे, भगीरथ नामक एक परम धर्मात्मा पुत्र प्राप्त हुआ॥ ७ ॥</p><p>महातेजस्वी दिलीपने बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान तथा तीस हजार वर्षोंतक राज्य किया॥ ८ ॥</p><p>पुरुषसिंह! उन पितरोंके उद्धारके विषयमें किसी निश्चयको न पहुँचकर राजा दिलीप रोगसे पीड़ित हो मृत्युको प्राप्त हो गये॥ ९ ॥</p><p>पुत्र भगीरथ को राज्य पर अभिषिक्त करके नरश्रेष्ठ राजा दिलीप अपने किये हुए पुण्यकर्मके प्रभावसे इन्द्रलोकमें गये॥ १० ॥</p><p>रघुनन्दन! धर्मात्मा राजर्षि महाराज भगीरथके कोई संतान नहीं थी। वे संतान-प्राप्तिकी इच्छा रखते थे तो भी प्रजा और राज्य की रक्षा का भार मन्त्रियों पर रखकर गंगा जी को पृथ्वी पर उतारने के प्रयत्न में लग गये और गोकर्ण तीर्थ में बड़ी भारी तपस्या करने लगे॥ ११-१२ ॥</p><p>महाबाहो! वे अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर पञ्चाग्निका सेवन करते और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर एक-एक महीनेपर आहार ग्रहण करते थे। इस प्रकार घोर तपस्यामें लगे हुए महात्मा राजा भगीरथके एक हजार वर्ष व्यतीत हो गये॥ १३ १/२ ॥</p><p>इससे प्रजाओंके स्वामी भगवान् ब्रह्माजी उनपर बहुत प्रसन्न हुए। पितामह ब्रह्माने देवताओंके साथ वहाँ आकर तपस्यामें लगे हुए महात्मा भगीरथसे इस प्रकार कहा—॥ १४-१५ ॥</p><p>‘महाराज भगीरथ! तुम्हारी इस उत्तम तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाले नरेश्वर! तुम कोई वर माँगो’॥ १६ ॥</p><p>तब महातेजस्वी महाबाहु भगीरथ हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गये और उन सर्वलोकपितामह ब्रह्मासे इस प्रकार बोले—॥ १७ ॥</p><p>‘भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि इस तपस्याका कोई उत्तम फल है तो सगरके सभी पुत्रोंको मेरे हाथसे गंगाजीका जल प्राप्त हो॥ १८ ॥</p><p>‘इन महात्माओंकी भस्मराशिके गंगाजीके जलसे भीग जानेपर मेरे उन सभी प्रपितामहोंको अक्षय स्वर्गलोक मिले॥ १९ ॥</p><p>‘देव! मैं संततिके लिये भी आपसे प्रार्थना करता हूँ। हमारे कुल की परम्परा कभी नष्ट न हो। भगवन्! मेरे द्वारा माँगा हुआ उत्तम वर सम्पूर्ण इक्ष्वाकुवंश के लिये लागू होना चाहिये’॥ २० ॥</p><p>राजा भगीरथके ऐसा कहनेपर सर्वलोकपितामह ब्रह्माजीने मधुर अक्षरोंवाली परम कल्याणमयी मीठी वाणीमें कहा—॥ २१ ॥</p><p>‘इक्ष्वाकुवंश की वृद्धि करने वाले महारथी भगीरथ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारा यह महान् मनोरथ इसी रूपमें पूर्ण हो॥ २२ ॥</p><p>‘राजन्! ये हैं हिमालयकी ज्येष्ठ पुत्री हैमवती गंगाजी। इनको धारण करनेके लिये भगवान् शङ्करको तैयार करो॥ २३ ॥</p><p>‘महाराज! गंगाजीके गिरनेका वेग यह पृथ्वी नहीं सह सकेगी। मैं त्रिशूलधारी भगवान् शङ्करके सिवा और किसी को ऐसा नहीं देखता, जो इन्हें धारण कर सके’॥ २४ ॥</p><p>राजासे ऐसा कहकर लोकस्रष्टा ब्रह्माजी ने भगवती गंगा से भी भगीरथ पर अनुग्रह करने के लिये कहा। इसके बाद वे सम्पूर्ण देवताओं तथा मरुद्गणोंके साथ स्वर्गलोक को चले गये॥ २५ ॥</p><p
class="has-text-align-center">इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४२॥</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/valmiki-ramayana-balakanda-chapter-42-in-hindi/">वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 42 हिंदी में &#8211; Valmiki Ramayana Balakanda Chapter &#8211; 42</a> appeared first on <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=28113</guid><description><![CDATA[<p>महर्षि वाल्मीकि कृत रामकथा पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – संपूर्ण रामायण हिंदी में। सगर पुत्रों के भावी विनाश</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/valmiki-ramayana-balakanda-chapter-40-in-hindi/">वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 40 हिंदी में &#8211; Valmiki Ramayana Balakanda Chapter &#8211; 40</a> appeared first on <a
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href="https://hindipath.com/valmiki-story-hindi/">महर्षि वाल्मीकि</a> </strong>कृत रामकथा पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – <a
href="https://hindipath.com/ramayan-hindi/"><strong>संपूर्ण रामायण हिंदी में</strong></a>।</p><p><strong><em>सगर पुत्रों के भावी विनाश की सूचना देकर ब्रह्माजी का देवताओं को शान्त करना, सगरके पुत्रों का पृथ्वी को खोदते हुए कपिल जी के पास पहुँचना और उनके रोष से जलकर भस्म होना</em></strong></p><p>देवताओंकी बात सुनकर भगवान् ब्रह्माजी ने कितने ही प्राणियों का अन्त करने वाले सगर पुत्रों के बल से मोहित एवं भयभीत हुए उन देवताओं से इस प्रकार कहा—॥ १ ॥</p><p>‘देवगण! यह सारी पृथ्वी जिन <a
href="/tag/krishna/">भगवान् वासुदेव</a> की वस्तु है तथा जिन <a
href="/vishnu-chalisa-in-hindi/">भगवान् लक्ष्मी पति</a> की यह रानी है, वे ही सर्वशक्तिमान् <a
href="/vishnu-chalisa-in-hindi/">भगवान् श्रीहरि</a> कपिल मुनि का रूप धारण करके निरन्तर इस पृथ्वी को धारण करते हैं। उनकी कोपाग्नि से ये सारे राजकुमार जलकर भस्म हो जायँगे॥ २-३ ॥</p><p>‘पृथ्वी का यह भेदन सनातन है—प्रत्येक कल्प में अवश्यम्भावी है। (श्रुतियों और स्मृतियों में आये हुए सागर आदि शब्दों से यह बात सुस्पष्ट ज्ञात होती है।) इसी प्रकार दूरदर्शी पुरुषों ने सगर के पुत्रों का भावी विनाश भी देखा ही है; अत: इस विषय में शोक करना अनुचित है’॥</p><p><a
href="/brahma-samhita-lyrics/">ब्रह्माजी</a> का यह कथन सुनकर शत्रुओंका दमन करनेवाले तैंतीस देवता बड़े हर्ष में भरकर जैसे आये थे, उसी तरह पुन: लौट गये॥ ५ ॥</p><p>सगरपुत्रोंके हाथसे जब पृथ्वी खोदी जा रही थी, उस समय उससे वज्रपात के समान बड़ा भयंकर शब्द होता था॥ ६ ॥</p><p>इस तरह सारी पृथ्वी खोदकर तथा उसकी परिक्रमा करके वे सभी सगर पुत्र पिता के पास खाली हाथ लौट आये और बोले—॥ ७ ॥</p><p>‘पिताजी! हमने सारी पृथ्वी छान डाली। देवता, दानव, राक्षस, पिशाच और नाग आदि बड़े-बड़े बलवान् प्राणियोंको मार डाला। फिर भी हमें न तो कहीं घोड़ा दिखायी दिया और न घोड़ेका चुरानेवाला ही। आपका भला हो। अब हम क्या करें? इस विषयमें आप ही कोई उपाय सोचिये’॥ ८-९ ॥</p><p>‘रघुनन्दन! पुत्रों का यह वचन सुनकर राजाओं में श्रेष्ठ सगरने उनसे कुपित होकर कहा—॥ १० ॥</p><p>‘जाओ, फिर से सारी पृथ्वी खोदो और इसे विदीर्ण करके घोड़े के चोर का पता लगाओ। चोर तक पहुँचकर काम पूरा होनेपर ही लौटना’॥ ११ ॥</p><p>अपने महात्मा पिता सगर की यह आज्ञा शिरोधार्य करके वे साठ हजार राजकुमार रसातलकी ओर बढ़े (और रोषमें भरकर पृथ्वी खोदने लगे)॥ १२ ॥</p><p>उस खुदाई के समय ही उन्हें एक पर्वताकार दिग्गज दिखायी दिया, जिसका नाम विरूपाक्ष है। वह इस भूतल को धारण किये हुए था॥ १३ ॥</p><p>रघुनन्दन! महान् गजराज विरूपाक्ष ने पर्वत और वनों सहित इस सम्पूर्ण पृथ्वी को अपने मस्तक पर धारण कर रखा था॥ १४ ॥</p><p>काकुत्स्थ! वह महान् दिग्गज जिस समय थककर विश्राम के लिये अपने मस्तक को इधर-उधर हटाता था, उस समय भूकम्प होने लगता था॥ १५ ॥</p><p><a
href="/ram-chalisa/">श्रीराम</a>! पूर्व दिशाकी रक्षा करने वाले विशाल गजराज विरूपाक्ष की परिक्रमा करके उसका सम्मान करते हुए वे सगर पुत्र रसातल का भेदन करके आगे बढ़ गये॥ १६ ॥</p><p>पूर्व दिशाका भेदन करनेके पश्चात् वे पुन: दक्षिण दिशा की भूमिको खोदने लगे। दक्षिण दिशामें भी उन्हें एक महान् दिग्गज दिखायी दिया॥ १७ ॥</p><p>उसका नाम था महापद्म। महान् पर्वत के समान ऊँचा वह विशाल काय गजराज अपने मस्तक पर पृथ्वीको धारण करता था। उसे देखकर उन राजकुमारों को बड़ा विस्मय हुआ॥ १८ ॥</p><p>महात्मा सगर के वे साठ हजार पुत्र उस दिग्गजकी परिक्रमा करके पश्चिम दिशा की भूमिका भेदन करने लगे॥ १९ ॥</p><p>पश्चिम दिशामें भी उन महाबली सगरपुत्रों ने महान् पर्वताकार दिग्गज सौमनस का दर्शन किया॥ २० ॥</p><p>उसकी भी परिक्रमा करके उसका कुशल-समाचार पूछकर वे सभी राजकुमार भूमि खोदते हुए उत्तर दिशा में जा पहुँचे॥ २१ ॥</p><p>रघुश्रेष्ठ! उत्तर दिशामें उन्हें हिमके समान श्वेतभद्र नामक दिग्गज दिखायी दिया, जो अपने कल्याणमय शरीरसे इस पृथ्वी को धारण किये हुए था॥ २२ ॥</p><p>उसका कुशल-समाचार पूछकर राजा सगरके वे सभी साठ हजार पुत्र उसकी परिक्रमा करनेके पश्चात् भूमि खोदनेके काममें जुट गये॥ २३ ॥</p><p>तदनन्तर सुविख्यात पूर्वोत्तर दिशा में जाकर उन सगरकुमारोंने एक साथ होकर रोष पूर्वक पृथ्वी को खोदना आरम्भ किया॥ २४ ॥</p><p>इस बार उन सभी महामना, महाबली एवं भयानक वेगशाली राजकुमारों ने वहाँ सनातन वासुदे वस्व रूप भगवान् कपिल को देखा॥ २५ ॥</p><p>राजा सगरके यज्ञ का वह घोड़ा भी भगवान् कपिल के पास ही चर रहा था। रघुनन्दन! उसे देखकर उन सबको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ॥ २६ ॥</p><p>भगवान् कपिल को अपने यज्ञमें विघ्न डालने वाला जानकर उनकी आँखें क्रोध से लाल हो गयीं। उन्होंने अपने हाथों में खंती, हल और नाना प्रकार के वृक्ष एवं पत्थरों के टुकड़े ले रखे थे॥ २७ ॥</p><p>वे अत्यन्त रोष में भरकर उनकी ओर दौड़े और बोले— ‘अरे! खड़ा रह, खड़ा रह। तू ही हमारे यज्ञ के घोड़े को यहाँ चुरा लाया है। दुर्बुद्धे! अब हम आ गये। तू समझ ले, हम महाराज सगर के पुत्र हैं’॥ २८ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥</p><p>रघुनन्दन! उनकी बात सुनकर भगवान् कपिल को बड़ा रोष हुआ और उस रोषके आवेश में ही उनके मुँह से एक हुंकार निकल पड़ा॥ २९ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥</p><p>श्रीराम! उस हुंकारके साथ ही उन अनन्त प्रभावशाली महात्मा कपिलने उन सभी सगरपुत्रों को जलाकर राखका ढेर कर दिया॥ ३० ॥</p><p
class="has-text-align-center"><strong>इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४०॥</strong></p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/valmiki-ramayana-balakanda-chapter-40-in-hindi/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 39 हिंदी में &#8211; Valmiki Ramayana Balakanda Chapter &#8211; 39</title><link>https://hindipath.com/valmiki-ramayana-balakanda-chapter-39-in-hindi/</link> <comments>https://hindipath.com/valmiki-ramayana-balakanda-chapter-39-in-hindi/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सुरभि भदौरिया]]></dc:creator> <pubDate>Sat, 15 Feb 2025 13:56:59 +0000</pubDate> <category><![CDATA[धर्म]]></category> <category><![CDATA[Ramayan]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=28110</guid><description><![CDATA[<p>विश्वामित्रजी की कही हुई कथा सुनकर श्रीरामचन्द्र जी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने कथाके अन्त में अग्नितुल्य तेजस्वी विश्वामित्र मुनि से</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/valmiki-ramayana-balakanda-chapter-39-in-hindi/">वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 39 हिंदी में &#8211; Valmiki Ramayana Balakanda Chapter &#8211; 39</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><a
href="/vishwamitra-ki-kahani-in-hindi/">विश्वामित्रजी</a> की कही हुई कथा सुनकर <a
href="/ramayan-manka-108-hindi/">श्रीरामचन्द्र जी</a> बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने कथाके अन्त में अग्नितुल्य तेजस्वी विश्वामित्र मुनि से कहा—॥ १ ॥</p><p>‘ब्रह्मन्! आपका कल्याण हो। मैं इस कथा को विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ। मेरे पूर्वज महाराज सगर ने किस प्रकार यज्ञ किया था?’॥ २ ॥</p><p>उनकी वह बात सुनकर विश्वामित्रजीको बड़ा कौतूहल हुआ। वे यह सोचकर कि मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, उसीके लिये ये प्रश्न कर रहे हैं, जोर-जोरसे हँस पड़े। हँसते हुए-से ही उन्होंने श्रीरामसे कहा—॥</p><p>‘<a
href="/ram-chalisa/">राम</a>! तुम महात्मा सगरके यज्ञका विस्तारपूर्वक वर्णन सुनो। पुरुषोत्तम! शङ्करजीके श्वशुर हिमवान् नामसे विख्यात पर्वत विन्ध्याचल तक पहुँचकर तथा विन्ध्यपर्वत हिमवान्तक पहुँचकर दोनों एक-दूसरे को देखते हैं (इन दोनों के बीचमें दूसरा कोई ऐसा ऊँचा पर्वत नहीं है, जो दोनोंके पारस्परिक दर्शन में बाधा उपस्थित कर सके)। इन्हीं दोनों पर्वतों के बीच आर्यावर्त की पुण्यभूमि में उस यज्ञ का अनुष्ठान हुआ था॥ ४-५ ॥</p><p>‘पुरुषसिंह! वही देश यज्ञ करनेके लिये उत्तम माना गया है। तात ककुत्स्थनन्दन! राजा सगर की आज्ञा से यज्ञिय अश्वकी रक्षाका भार सुदृढ़ धनुर्धर महारथी अंशुमान्ने स्वीकार किया था॥ ६ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥</p><p>‘परंतु पर्वके दिन यज्ञमें लगे हुए राजा सगरके यज्ञसम्बन्धी घोड़े को <a
href="/tag/indra/">इन्द्र</a> ने राक्षस का रूप धारण करके चुरा लिया॥ ७ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥</p><p>‘काकुत्स्थ! महामना सगरके उस अश्वका अपहरण होते समय समस्त ऋत्विजों ने यजमान सगर से कहा— ‘ककुत्स्थनन्दन! आज पर्वके दिन कोई इस यज्ञ सम्बन्धी अश्व को चुराकर बड़े वेग से लिये जा रहा है। आप चोर को मारिये और घोड़ा वापस लाइये, नहीं तो यज्ञमें विघ्न पड़ जायगा और वह हम सब लोगों के लिये अमंगलका कारण होगा। राजन्! आप ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे यह यज्ञ बिना किसी विघ्न-बाधाके परिपूर्ण हो’॥</p><p>‘उस यज्ञ-सभामें बैठे हुए राजा सगरने उपाध्यायों की बात सुनकर अपने साठ हजार पुत्रों से कहा—‘पुरुषप्रवर पुत्रो! यह महान् यज्ञ वेदमन्त्रोंसे पवित्र अन्त:करण वाले महाभाग महात्माओं द्वारा सम्पादित हो रहा है; अत: यहाँ राक्षसों की पहुँच हो, ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता (अत: यह अश्व चुराने वाला कोई देवकोटि का पुरुष होगा)॥</p><p>‘अत: पुत्रो! तुम लोग जाओ, घोड़े की खोज करो। तुम्हारा कल्याण हो। समुद्र से घिरी हुई इस सारी पृथ्वी को छान डालो। एक-एक योजन विस्तृत भूमि को बाँटकर उसका चप्पा-चप्पा देख डालो। जबतक घोड़े का पता न लग जाय, तब तक मेरी आज्ञासे इस पृथ्वी को खोदते रहो। इस खोदनेका एक ही लक्ष्य है— उस अश्वके चोर को ढूँढ़ निकालना॥ १३—१५ ॥</p><p>‘मैं यज्ञ की दीक्षा ले चुका हूँ, अत: स्वयं उसे ढूँढ़नेके लिये नहीं जा सकता; इसलिये जबतक उस अश्व का दर्शन न हो, तबतक मैं उपाध्यायों और पौत्र अंशुमान्के साथ यहीं रहूँगा’॥ १६ ॥</p><p>‘श्रीराम! पि ताके आदेश रूपी बन्धन से बँधकर वे सभी महाबली राजकुमार मन-ही-मन हर्ष का अनुभव करते हुए भूतल पर विचरने लगे॥ १७ ॥</p><p>‘सारी पृथ्वी का चक्कर लगाने के बाद भी उस अश्व को न देखकर उन महाबली पुरुष सिंह राजपुत्रों ने प्रत्येक के हिस्से में एक-एक योजन भूमिका बँटवारा करके अपनी भुजाओं द्वारा उसे खोदना आरम्भ किया। उनकी उन भुजाओं का स्पर्श वज्र के स्पर्श की भाँति दुस्सह था॥ १८ ॥</p><p>‘रघुनन्दन! उस समय वज्रतुल्य शूलों और अत्यन्त दारुण हलों द्वारा सब ओरसे विदीर्ण की जाती हुई वसुधा आर्तनाद करने लगी॥ १९ ॥</p><p>‘रघुवीर! उन राजकुमारों द्वारा मारे जाते हुए नागों, असुरों, राक्षसों तथा दूसरे-दूसरे प्राणियों का भयंकर आर्तनाद गूँजने लगा॥ २० ॥</p><p>‘रघुकुल को आनन्दित करनेवाले श्रीराम! उन्होंने साठ हजार योजनकी भूमि खोद डाली। मानो वे सर्वोत्तम रसातलका अनुसंधान कर रहे हों॥ २१ ॥</p><p>‘नृपश्रेष्ठ राम! इस प्रकार पर्वतोंसे युक्त जम्बूद्वीप की भूमि खोदते हुए वे राजकुमार सब ओर चक्कर लगाने लगे॥ २२ ॥</p><p>‘इसी समय गन्धर्वों, असुरों और नागों सहित सम्पूर्ण देवता मन-ही-मन घबरा उठे और <a
href="/tag/brahma/">ब्रह्माजी</a> के पास गये॥ २३ ॥</p><p>‘उनके मुखपर विषाद छा रहा था। वे भयसे अत्यन्त संत्रस्त हो गये थे। उन्होंने महात्मा ब्रह्माजी को प्रसन्न करके इस प्रकार कहा—॥ २४ ॥</p><p>‘भगवन्! सगर के पुत्र इस सारी पृथ्वी को खोदे डालते हैं और बहुत-से महात्माओं तथा जलचारी जीवों का वध कर रहे हैं॥ २५ ॥</p><p>‘यह हमारे यज्ञमें विघ्न डालने वाला है। यह हमारा अश्व चुराकर ले जाता है’ ऐसा कहकर वे सगरके पुत्र समस्त प्राणियों की हिंसा कर रहे हैं’॥ २६ ॥</p><p
class="has-text-align-center"><strong>इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३९॥</strong></p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=28107</guid><description><![CDATA[<p>महर्षि वाल्मीकि कृत रामकथा पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – संपूर्ण रामायण हिंदी में। राजा सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति तथा</p><p>The post <a
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href="https://hindipath.com/valmiki-story-hindi/">महर्षि वाल्मीकि</a> </strong>कृत रामकथा पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – <a
href="https://hindipath.com/ramayan-hindi/"><strong>संपूर्ण रामायण हिंदी में</strong></a>।</p><p><strong>राजा सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति तथा यज्ञकी तैयारी</strong></p><p>विश्वामित्रजीने मधुर अक्षरोंसे युक्त वह कथा श्रीरामको सुनाकर फिर उनसे दूसरा प्रसंग इस प्रकार कहा—॥ १ ॥</p><p>‘वीर! पहलेकी बात है, अयोध्यामें सगर नामसे प्रसिद्ध एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। उन्हें कोई पुत्र नहीं था; अत: वे पुत्र-प्राप्ति के लिये सदा उत्सुक रहा करते थे॥ २ ॥</p><p>‘श्रीराम! विदर्भराजकुमारी केशिनी राजा सगरकी ज्येष्ठ पत्नी थी। वह बड़ी धर्मात्मा और सत्यवादिनी थी॥ ३ ॥</p><p>‘सगरकी दूसरी पन्तीका नाम सुमति था। वह अरिष्टनेमि कश्यप की पुत्री तथा गरुडकी बहिन थी॥ ४ ॥</p><p>‘महाराज सगर अपनी उन दोनों पत्नियोंके साथ हिमालय पर्वतपर जाकर भृगुप्रस्रवण नामक शिखरपर तपस्या करने लगे॥ ५ ॥</p><p>‘सौ वर्ष पूर्ण होनेपर उनकी तपस्याद्वारा प्रसन्न हुए सत्यवादियोंमें श्रेष्ठ महर्षि भृगुने राजा सगरको वर दिया॥ ६ ॥</p><p>‘निष्पाप नरेश! तुम्हें बहुत-से पुत्रोंकी प्राप्ति होगी। पुरुषप्रवर! तुम इस संसारमें अनुपम कीर्ति प्राप्त करोगे॥ ७ ॥</p><p>‘तात! तुम्हारी एक पत्नी तो एक ही पुत्रको जन्म देगी, जो अपनी वंशपरम्पराका विस्तार करनेवाला होगा तथा दूसरी पत्नी साठ हजार पुत्रोंकी जननी होगी॥ ८ ॥</p><p>‘महात्मा भृगु जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय उन दोनों राजकुमारियों (रानियों)-ने उन्हें प्रसन्न करके स्वयं भी अत्यन्त आनन्दित हो दोनों हाथ जोड़कर पूछा—॥ ९ ॥</p><p>‘ब्रह्मन्! किस रानीके एक पुत्र होगा और कौन बहुत-से पुत्रोंकी जननी होगी? हम दोनों यह सुनना चाहती हैं। आपकी वाणी सत्य हो’॥ १० ॥</p><p>‘उन दोनोंकी यह बात सुनकर परम धर्मात्मा भृगुने उत्तम वाणीमें कहा—‘देवियो! तुमलोग यहाँ अपनी इच्छा प्रकट करो। तुम्हें वंश चलानेवाला एक ही पुत्र प्राप्त हो अथवा महान् बलवान्, यशस्वी एवं अत्यन्त उत्साही बहुत-से पुत्र? इन दो वरोंमेंसे किस वरको कौन-सी रानी ग्रहण करना चाहती है?’॥ ११-१२ ॥</p><p>‘रघुकुलनन्दन श्रीराम! मुनिका यह वचन सुनकर केशिनीने राजा सगरके समीप वंश चलानेवाले एक ही पुत्रका वर ग्रहण किया॥ १३ ॥</p><p>‘तब गरुड़की बहिन सुमतिने महान् उत्साही और यशस्वी साठ हजार पुत्रोंको जन्म देनेका वर प्राप्त किया॥ १४ ॥</p><p>‘रघुनन्दन! तदनन्तर रानियोंसहित राजा सगरने महर्षिकी परिक्रमा करके उनके चरणों में मस्तक झुकाया और अपने नगरको प्रस्थान किया॥ १५ ॥</p><p>‘कुछ काल व्यतीत होनेपर बड़ी रानी केशिनीने सगरके औरस पुत्र ‘असमञ्ज’ को जन्म दिया॥ १६ ॥</p><p>‘पुरुषसिंह! (छोटी रानी) सुमतिने तूँबीके आकारका एक गर्भपिण्ड उत्पन्न किया। उसको फोड़नेसे साठ हजार बालक निकले॥ १७ ॥</p><p>‘उन्हें घीसे भरे हुए घड़ोंमें रखकर धाइयाँ उनका पालन-पोषण करने लगीं। धीरे-धीरे जब बहुत दिन बीत गये, तब वे सभी बालक युवावस्थाको प्राप्त हुए॥</p><p>‘इस तरह दीर्घकालके पश्चात् राजा सगरके रूप और युवावस्थासे सुशोभित होनेवाले साठ हजार पुत्र तैयार हो गये॥ १९ ॥</p><p>‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! सगरका ज्येष्ठ पुत्र असमञ्ज नगरके बालकोंको पकड़कर सरयूके जलमें फेंरुक देता और जब वे डूबने लगते, तब उनकी ओर देखकर हँसा करता॥ २० <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥</p><p>‘इस प्रकार पापाचारमें प्रवृत्त होकर जब वह सत्पुरुषोंको पीड़ा देने और नगर-निवासियोंका अहित करने लगा, तब पिताने उसे नगरसे बाहर निकाल दिया॥ २१ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥</p><p>‘असमञ्जके पुत्रका नाम था अंशुमान्। वह बड़ा ही पराक्रमी, सबसे मधुर वचन बोलनेवाला तथा सब लोगोंको प्रिय था॥ २२ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥</p><p>‘नरश्रेष्ठ! कुछ कालके अनन्तर महाराज सगरके मनमें यह निश्चित विचार हुआ कि ‘मैं यज्ञ करूँ’॥ २३ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥</p><p>‘यह दृढ़ निश्चय करके वे वेदवेत्ता नरेश अपने उपाध्यायोंके साथ यज्ञ करनेकी तैयारीमें लग गये’॥ २४ ॥</p><p
class="has-text-align-center"><strong>इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३८॥</strong></p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=28103</guid><description><![CDATA[<p>महर्षि वाल्मीकि कृत रामकथा पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – संपूर्ण रामायण हिंदी में। गंगा से कार्तिकेयकी उत्पत्तिका प्रसंग</p><p>The post <a
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href="https://hindipath.com/valmiki-story-hindi/">महर्षि वाल्मीकि</a> </strong>कृत रामकथा पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – <a
href="https://hindipath.com/ramayan-hindi/"><strong>संपूर्ण रामायण हिंदी में</strong></a>।</p><p><strong><em>गंगा से कार्तिकेयकी उत्पत्तिका प्रसंग</em></strong></p><p>जब महादेवजी तपस्या कर रहे थे, उस समय<a
href="/tag/indra/"> इन्द्र</a> और <a
href="/tag/agni/">अग्नि</a> आदि सम्पूर्ण देवता अपने लिये सेनापति की इच्छा लेकर <a
href="/brahma-chalisa-in-hindi/">ब्रह्माजी</a> के पास आये॥ १ ॥</p><p>देवताओं को आराम देनेवाले <a
href="/ram-chalisa/">श्रीराम</a>! इन्द्र और अग्निसहित समस्त देवताओंने <a
href="/brahma-samhita-lyrics/">भगवान् ब्रह्मा</a> को प्रणाम करके इस प्रकार कहा—॥ २ ॥</p><p>‘प्रभो! पूर्वकाल में जिन <a
href="/12-jyotirling-name-list-hindi/">भगवान् महेश्वर</a> ने हमें (बीज रूप से) सेनापति प्रदान किया था, वे <a
href="/parvati-chalisa-in-hindi-lyrics/">उमादेवी</a> के साथ उत्तम तपका आश्रय लेकर तपस्या करते हैं॥ ३ ॥</p><p>‘विधि-विधानके ज्ञाता पितामह! अब लोकहितके लिये जो कर्तव्य प्राप्त हो, उसको पूर्ण कीजिये; क्योंकि आप ही हमारे परम आश्रय हैं’॥ ४ ॥</p><p>देवताओं की यह बात सुनकर सम्पूर्ण लोकों के <a
href="/brahma-ji-ki-aarti/">पितामह ब्रह्मा जी</a> ने मधुर वचनोंद्वारा उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—॥ ५ ॥</p><p>‘देवताओ! गिरिराज कुमारी <a
href="/parvati-ji-ki-aarti/">पार्वती</a> ने जो शाप दिया है, उसके अनुसार तुम्हें अपनी पत्नियोंके गर्भसे अब कोई  संतान नहीं होगी। उमा देवी की वाणी अमोघ है; अत: वह सत्य होकर ही रहेगी; इसमें संशय नहीं है॥</p><p>‘ये हैं उमाकी बड़ी बहिन आकाशगंगा, जिनके गर्भ में <a
href="/om-jai-shiv-omkara-aarti/">शङ्करजी</a> के उस तेजको स्थापित करके अग्निदेव एक ऐसे पुत्रको जन्म देंगे, जो देवताओं के शत्रुओं का दमन करनेमें समर्थ सेना पति होगा॥ ७ ॥</p><p>‘ये <a
href="/ganga-stuti-lyrics/">गंगा</a> गिरिराजकी ज्येष्ठ पुत्री हैं, अत: अपनी छोटी बहिनके उस पुत्रको अपने ही पुत्रके समान मानेंगी। उमाको भी यह बहुत प्रिय लगेगा। इस में संशय नहीं है’॥ ८ १/२ ॥</p><p>रघुनन्दन! ब्रह्माजी का यह वचन सुनकर सब देवता कृतकृत्य हो गये। उन्होंने ब्रह्माजी को प्रणाम करके उनका पूजन किया॥ ९ ॥</p><p>श्रीराम! विविध धातुओंसे अलंकृत उत्तम कैलास पर्वतपर जाकर उन सम्पूर्ण देवताओंने अग्निदेवको पुत्र उत्पन्न करनेके कार्यमें नियुक्त किया॥ १० ॥</p><p>वे बोले—‘देव! हुताशन! यह देवताओंका कार्य है, इसे सिद्ध कीजिये। भगवान् रुद्रके उस महान् तेजको अब आप गंगाजीमें स्थापित कर दीजिये’॥ ११ ॥</p><p>तब देवताओंसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर अग्निदेव गंगाजीके निकट आये और बोले—‘देवि! आप इस गर्भ को धारण करें। यह देवताओंका प्रिय कार्य है’॥ १२ ॥</p><p>अग्निदेवकी यह बात सुनकर <a
href="/ganga-dussehra-stotra/">गंगादेवी</a> ने दिव्यरूप धारण कर लिया। उनकी यह महिमा—यह रूप-वैभव देखकर अग्निदेव ने उस रुद्र-तेजको उनके सब ओर बिखेर दिया॥ १३ ॥</p><p>रघुनन्दन! अग्निदेवने जब <a
href="/ganga-ke-108-naam/">गंगा देवी</a> को सब ओरसे उस रुद्र-तेज द्वारा अभिषिक्त कर दिया, तब गंगाजीके सारे स्रोत उससे परिपूर्ण हो गये॥ १४ ॥</p><p>तब गंगाने समस्त देवताओंके अग्रगामी अग्निदेवसे इस प्रकार कहा—‘देव! आपके द्वारा स्थापित किये गये इस बढ़े हुए तेज को धारण करने में मैं असमर्थ हूँ। इसकी आँच से जल रही हूँ और मेरी चेतना व्यथित हो गयी है’॥ १५ १/२ ॥</p><p>तब सम्पूर्ण देवताओंके हविष्यको भोग लगानेवाले अग्निदेवने गंगादेवीसे कहा—‘देवि! हिमालय पर्वतके पार्श्वभागमें इस गर्भको स्थापित कर दीजिये’॥ १६ १/२ ॥</p><p>निष्पाप रघुनन्दन! अग्नि की यह बात सुनकर महातेजस्विनी गंगा ने उस अत्यन्त प्रकाशमान गर्भको अपने स्रोतों से निकालकर यथोचित स्थान में रख दिया॥</p><p>गंगा के गर्भ से जो तेज निकला, वह तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्ण के समान कान्तिमान् दिखायी देने लगा (गंगा सुवर्णमय मेरुगिरिसे प्रकट हुई हैं; अत: उनका बालक भी वैसे ही रूप-रंग का हुआ)। पृथ्वी पर जहाँ वह तेजस्वी गर्भ स्थापित हुआ, वहाँकी भूमि तथा प्रत्येक वस्तु सुवर्णमयी हो गयी। उसके आस-पासका स्थान अनुपम प्रभा से प्रकाशित होने वाला रजत हो गया। उस तेज की तीक्ष्णतासे ही दूरवर्ती भूभाग की वस्तुएँ ताँबे और लोहे के रूप में परिणत हो गयीं॥ १८-१९ ॥</p><p>उस तेजस्वी गर्भका जो मल था, वही वहाँ राँगा और सीसा हुआ। इस प्रकार पृथ्वी पर पड़कर वह तेज नाना प्रकारके धातुओं के रूप में वृद्धि को प्राप्त हुआ॥ २० ॥</p><p>पृथ्वी पर उस गर्भके रखे जाते ही उसके तेजसे व्याप्त होकर पूर्वोक्त श्वेत पर्वत और उससे सम्बन्ध रखने वाला सारा वन सुवर्ण मय होकर जगमगाने लगा॥ २१ ॥</p><p>पुरुषसिंह रघुनन्दन! तभीसे अग्नि के समान प्रकाशित होने वाले सुवर्णका नाम जात रूप हो गया; क्योंकि उसी समय सुवर्ण का तेजस्वी रूप प्रकट हुआ था। उस गर्भ के सम्पर्क से वहाँ का तृण, वृक्ष, लता और गुल्म—सब कुछ सोनेका हो गया॥ २२ ॥</p><p>तदनन्तर इन्द्र और मरुद्गणों सहित सम्पूर्ण देवताओंने वहाँ उत्पन्न हुए कुमार को दूध पिलाने के लिये छहों कृत्तिकाओं को नियुक्त किया॥ २३ ॥</p><p>तब उन कृत्तिकाओं ने ‘यह हम सबका पुत्र हो’ ऐसी उत्तम शर्त रखकर और इस बातका निश्चित विश्वास लेकर उस नवजात बालकको अपना दूध प्रदान किया॥ २४ ॥</p><p>उस समय सब देवता बोले—‘यह बालक कार्ति केय कहलायेगा और तुमलोगों का त्रिभुवनविख्यात पुत्र होगा—इसमें संशय नहीं है’॥ २५ ॥</p><p>देवताओं का यह अनुकूल वचन सुनकर शिव और पार्वतीसे स्कन्दित (स्खलित) तथा गंगा द्वारा गर्भस्राव होनेपर प्रकट हुए अग्निके समान उत्तम प्रभासे प्रकाशित होनेवाले उस बालकको कृत्तिकाओंने नहलाया॥ २६ ॥</p><p>ककुत्स्थकुल भूषण श्रीराम! अग्नितुल्य तेजस्वी महाबाहु कार्तिकेय गर्भस्राव काल में स्कन्दित हुए थे; इसलिये देवताओं ने उन्हें स्कन्द कहकर पुकारा॥ २७ ॥</p><p>तदनन्तर कृत्तिकाओंके स्तनोंमें परम उत्तम दूध प्रकट हुआ। उस समय स्कन्दने अपने छ: मुख प्रकट करके उन छहोंका एक साथ ही स्तनपान किया॥ २८ ॥</p><p>एक ही दिन दूध पीकर उस सुकुमार शरीरवाले शक्ति शाली कुमार ने अपने पराक्रम से दैत्यों की सारी सेनाओं पर विजय प्राप्त की॥ २९ ॥</p><p>तत्पश्चात् अग्नि आदि सब देवताओंने मिलकर उन महातेजस्वी स्कन्दका देवसेना पति के पदपर अभिषेक किया॥ ३० ॥</p><p>श्रीराम! यह मैंने तुम्हें गंगा जी के चरित्र को विस्तारपूर्वक बताया है; साथ ही कुमार कार्तिकेय के जन्म का भी प्रसंग सुनाया है, जो श्रोता को धन्य एवं पुण्यात्मा बनाने वाला है॥ ३१ ॥</p><p>काकुत्स्थ! इस पृथ्वीपर जो मनुष्य कार्तिकेय में भक्तिभाव रखता है, वह इस लोकमें दीर्घायु तथा पुत्र-पौत्रों से सम्पन्न हो मृत्यु के पश्चात् स्कन्द के लोक में जाता है॥</p><p
class="has-text-align-center"><strong>इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३७॥</strong></p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=28087</guid><description><![CDATA[<p>महर्षि वाल्मीकि कृत रामकथा पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – संपूर्ण रामायण हिंदी में। देवताओं का शिव-पार्वती को सुरतक्रीडासे</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/valmiki-ramayana-balakanda-chapter-36-in-hindi/">वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 36 हिंदी में &#8211; Valmiki Ramayana Balakanda Chapter &#8211; 36</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><strong><a
href="https://hindipath.com/valmiki-story-hindi/">महर्षि वाल्मीकि</a> </strong>कृत रामकथा पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – <a
href="https://hindipath.com/ramayan-hindi/"><strong>संपूर्ण रामायण हिंदी में</strong></a>।</p><p><strong>देवताओं का शिव-पार्वती को सुरतक्रीडासे निवृत्त करना तथा उमादेवीका देवताओं और पृथ्वी को शाप देना</strong></p><p>विश्वामित्रजी की बात समाप्त होनेपर <a
href="/ramayan-manka-108-hindi/">श्रीराम</a> और <a
href="/lakshman-ji-ka-jivan-parichay/">लक्ष्मण</a> दोनों वीरोंने उनकी कही हुई कथा का अभिनन्दन करके <a
href="/vishwamitra-ki-kahani-in-hindi/">मुनिवर विश्वामित्र</a> से इस प्रकार कहा—॥ १ ॥</p><p>‘ब्रह्मन्! आपने यह बड़ी उत्तम धर्म युक्त कथा सुनायी। अब आप गिरिराज हिमवान्की ज्येष्ठ पुत्री <a
href="/tag/ganga/">गंगा</a> के दिव्यलोक तथा मनुष्यलोक से सम्बन्ध होने का वृत्तान्त विस्तारके साथ सुनाइये; क्योंकि आप विस्तृत वृत्तान्तके ज्ञाता हैं॥ २ ॥</p><p>‘लोकको पवित्र करनेवाली गंगा किस कारण से तीन मार्गोंमें प्रवाहित होती हैं? सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगा की ‘त्रिपथगा’ नामसे प्रसिद्धि क्यों हुई?॥ ३ ॥</p><p>‘धर्मज्ञ महर्षे! तीनों लोकों में वे अपनी तीन धाराओं के द्वारा कौन-कौन-से कार्य करती हैं?’ <a
href="/ram-chalisa/">श्रीरामचन्द्रजी</a> के इस प्रकार पूछनेपर तपोधन विश्वामित्रने मुनि मण्डली के बीच गंगाजी से सम्बन्ध रखनेवाली सारी बातें पूर्णरूपसे कह सुनायीं—॥ ४ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥</p><p>‘श्रीराम! पूर्वकालमें <a
href="/om-jai-shiv-omkara-aarti/">महातपस्वी भगवान् नीलकण्ठ</a> ने <a
href="/parvati-ji-ki-aarti/">उमादेवी</a> के साथ विवाह करके उनको नववधू के रूप में अपने निकट आयी देख उनके साथ रति-क्रीडा आरम्भ की॥ ५ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥</p><p>‘परम बुद्धिमान् <a
href="/shiv-chalisa-lyrics-in-hindi-pdf/">महान् देवता भगवान् नीलकण्ठ</a> के <a
href="/parvati-chalisa-in-hindi-lyrics/">उमा देवी</a> के साथ क्रीडा-विहार करते सौ दिव्य वर्ष बीत गये॥ ६ ॥</p><p>‘शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीराम! इतने वर्षों तक विहारके बाद भी <a
href="/daridra-dahan-shiv-stotra-pdf-hindi/">महादेवजी</a> के उमादेवीके गर्भ से कोई पुत्र नहीं हुआ। यह देख ब्रह्मा आदि सभी देवता उन्हें रोकनेका उद्योग करने लगे॥ ७ ॥</p><p>‘उन्होंने सोचा—इतने दीर्घकाल के पश्चात् यदि रुद्रके तेजसे उमादेवी के गर्भसे कोई महान् प्राणी प्रकट हो भी जाय तो कौन उसके तेजको सहन करेगा? यह विचारकर सब देवता <a
href="/shiv-gita-hindi/">भगवान् शिव</a> के पास जा उन्हें प्रणाम करके यों बोले—॥ ८ ॥</p><p>‘इस लोकके हितमें तत्पर रहनेवाले देवदेव महादेव! देवता आपके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं। इससे प्रसन्न होकर आप इन देवताओंपर कृपा करें॥ ९ ॥</p><p>‘सुरश्रेष्ठ! ये लोक आपके तेजको नहीं धारण कर सकेंगे; अत: आप क्रीडासे निवृत्त हो वेदबोधित तपस्या से युक्त होकर उमादेवी के साथ तप कीजिये॥ १० ॥</p><p>‘तीनों लोकों के हितकी कामना से अपने तेज (वीर्य) को तेज:स्वरूप अपने-आपमें ही धारण कीजिये। इन सब लोकोंकी रक्षा कीजिये। लोकोंका विनाश न कर डालिये’॥ ११ ॥</p><p>‘देवताओं की यह बात सुनकर सर्वलोक <a
href="/shiva-rudrashtakam-stotram/">महेश्वर शिव</a> ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया; फिर उनसे इस प्रकार कहा—॥ १२ ॥</p><p>‘देवताओ! उमासहित मैं अर्थात् हम दोनों अपने तेजसे ही तेजको धारण कर लेंगे। पृथ्वी आदि सभी लोकोंके निवासी शान्ति लाभ करें॥ १३ ॥</p><p>‘किंतु सुरश्रेष्ठगण! यदि मेरा यह सर्वोत्तम तेज (वीर्य) क्षुब्ध होकर अपने स्थानसे स्खलित हो जाय तो उसे कौन धारण करेगा?—यह मुझे बताओ’॥ १४ ॥</p><p>उनके ऐसा कहने पर देवताओं ने वृषभ ध्वज <a
href="/shiva-aahvaan-mantra/">भगवान् शिव</a> से कहा—‘भगवन्! आज आपका जो तेज क्षुब्ध होकर गिरेगा, उसे यह पृथ्वीदेवी धारण करेगी’॥ १५ ॥</p><p>‘देवताओं का यह कथन सुनकर महाबली देवेश्वर शिवने अपना तेज छोड़ा, जिससे पर्वत और वनों सहित यह सारी पृथ्वी व्याप्त हो गयी॥ १६ ॥</p><p>‘तब देवताओंने अग्निदेवसे कहा—‘अग्ने! तुम वायुके सहयोगसे भगवान् शिव के इस महान् तेजको अपने भीतर रख लो’॥ १७ ॥</p><p>‘अग्निसे व्याप्त होनेपर वह तेज श्वेत पर्वत के रूप में परिणत हो गया। साथ ही वहाँ दिव्य सरकंडों का वन भी प्रकट हुआ, जो अग्नि और <a
href="/tag/surya/">सूर्य</a> के समान तेजस्वी प्रतीत होता था॥ १८ ॥</p><p>‘उसी वन में अग्नि जनित महातेजस्वी कार्तिकेयका प्रादुर्भाव हुआ। तदनन्तर ऋषियोंसहित देवताओंने अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर देवी उमा और भगवान् शिव का बड़े भक्तिभावसे पूजन किया॥ १९ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥</p><p>‘श्रीराम! इसके बाद गिरिराजनन्दिनी उमाके नेत्र क्रोध से लाल हो गये। उन्होंने समस्त देवताओं को रोष पूर्वक शाप दे दिया। वे बोलीं—॥ २० <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥</p><p>‘देवताओ! मैंने पुत्र-प्राप्तिकी इच्छासे पतिके साथ समागम किया था, परंतु तुमने मुझे रोक दिया। अत: अब तुमलोग भी अपनी पत्नियोंसे संतान उत्पन्न करने योग्य नहीं रह जाओगे। आज से तुम्हारी पन्तियाँ संतानोत्पादन नहीं कर सकेंगी—संतानहीन हो जायँगी’॥ २१-२२ ॥</p><p>‘सब देवताओं से ऐसा कहकर उमा देवी ने पृथिवीको भी शाप दिया—‘भूमे! तेरा एक रूप नहीं रह जायगा। तू बहुतोंकी भार्या होगी॥ २३ ॥</p><p>‘खोटी बुद्धिवाली पृथ्वी! तू चाहती थी कि मेरे पुत्र न हो। अत: मेरे क्रोधसे कलुषित होकर तू भी पुत्रजनित सुख या प्रसन्नता का अनुभव न कर सकेगी’॥ २४ ॥</p><p>‘उन सब देवताओंको उमादेवीके शापसे पीडित देख देवेश्वर भगवान् शिवने उस समय पश्चिम दिशाकी ओर प्रस्थान कर दिया॥ २५ ॥</p><p>‘वहाँसे जाकर हिमालय पर्वतके उत्तर भागमें उसीके एक शिखरपर उमादेवीके साथ भगवान् महेश्वर तप करने लगे॥ २६ ॥</p><p>‘लक्ष्मण सहित श्रीराम! यह मैंने तुम्हें गिरिराज हिमवान्की छोटी पुत्री उमादेवी का विस्तृत वृत्तान्त बताया है। अब मुझसे गंगाके प्रादुर्भावकी कथा सुनो’॥ २७ ॥</p><p
class="has-text-align-center"><strong>इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्ड में छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३६॥</strong></p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=28078</guid><description><![CDATA[<p>महर्षि वाल्मीकि कृत रामकथा पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – संपूर्ण रामायण हिंदी में। शोणभद्र पार करके विश्वामित्र आदिका</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/valmiki-ramayana-balakanda-chapter-35-in-hindi/">वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 35 हिंदी में &#8211; Valmiki Ramayana Balakanda Chapter &#8211; 35</a> appeared first on <a
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href="https://hindipath.com/valmiki-story-hindi/">महर्षि वाल्मीकि</a> </strong>कृत रामकथा पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – <a
href="https://hindipath.com/ramayan-hindi/"><strong>संपूर्ण रामायण हिंदी में</strong></a>।</p><p><strong><em>शोणभद्र पार करके विश्वामित्र आदिका <a
href="/ganga-chalisa/">गंगाजी </a>के तट पर पहुँचकर वहाँ रात्रि वास करना तथा श्रीराम के पूछने पर विश्वामित्रजी का उन्हें गंगाजी की उत्पत्ति की कथा सुनाना</em></strong></p><p>महर्षियों सहित विश्वामित्र ने रात्रि के शेष भाग में शोण भद्र के तटपर शयन किया। जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब वे <a
href="/ram-chalisa/">श्रीरामचन्द्रजी</a> से इस प्रकार बोले—॥ १ ॥</p><p>‘<a
href="/aarti-raghuvar-lala-ki/">श्रीराम</a>! रात बीत गयी। सबेरा हो गया। तुम्हारा कल्याण हो, उठो, उठो और चलने की तैयारी करो’॥ २ ॥</p><p>मुनिकी बात सुनकर पूर्वाह्णकाल का नित्यनियम पूर्ण करके <a
href="/ram-raksha-stotra-in-hindi-pdf-download/">श्री राम</a> चलने को तैयार हो गये और इस प्रकार बोले—॥ ३ ॥</p><p>‘ब्रह्मन्! शुभ जलसे परिपूर्ण तथा अपने तटोंसे सुशोभित होनेवाला यह शोणभद्र तो अथाह जान पड़ता है। हमलोग किस मार्ग से चलकर इसे पार करेंगे?’॥ ४ ॥</p><p>श्रीरामके ऐसा कहने पर विश्वामित्र बोले—‘जिस मार्ग से महर्षिगण शोणभद्र को पार करते हैं, उसका मैंने पहले से ही निश्चय कर रखा है, वह मार्ग यह है’॥ ५ ॥</p><p><a
href="/vishwamitra-ki-kahani-in-hindi/">बुद्धिमान् विश्वामित्र</a> के ऐसा कहनेपर वे महर्षि नाना प्रकारके वनोंकी शोभा देखते हुए वहाँसे प्रस्थित हुए॥ ६ ॥</p><p>बहुत दूरका मार्ग तै कर लेनेपर दोपहर होते-होते उन सब लोगोंने मुनिजनसेवित, सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाजीके तटपर पहुँचकर उनका दर्शन किया॥ ७ ॥</p><p>हंसों तथा सारसों से सेवित पुण्यसलिला भागीरथीका दर्शन करके <a
href="/ramayan-manka-108-hindi/">श्रीरामचन्द्र जी</a> के साथ समस्त मुनि बहुत प्रसन्न हुए॥ ८ ॥</p><p>उस समय सबने <a
href="/ganga-stuti-lyrics/">गंगा जी</a> के तटपर डेरा डाला। फिर विधिवत् स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण किया। उसके बाद अग्निहोत्र करके अमृतके समान मीठे हविष्य का भोजन किया। तदनन्तर वे सभी कल्याणकारी महर्षि प्रसन्नचित्त हो महात्मा विश्वामित्र को चारों ओर से घेरकर गंगाजी के तटपर बैठ गये॥ ९-१० <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥</p><p>जब वे सब मुनि स्थिरभाव से विराजमान हो गये और श्रीराम तथा लक्ष्मण भी यथायोग्य स्थानपर बैठ गये, तब श्रीराम ने प्रसन्नचित्त होकर विश्वामित्र जी से पूछा—॥ ११ ॥</p><p>‘भगवन्! मैं यह सुनना चाहता हूँ कि तीन मार्गोंसे प्रवाहित होने वाली नदी ये गंगाजी किस प्रकार तीनों लोकोंमें घूमकर नदों और नदियोंके स्वामी समुद्र में जा मिली हैं?’॥ १२ ॥</p><p>श्रीराम के इस प्रश्नद्वारा प्रेरित हो महामुनि विश्वामित्र ने गंगाजी की उत्पत्ति और वृद्धि की कथा कहना आरम्भ किया—॥ १३ ॥</p><p>‘श्रीराम! हिमवान् नामक एक पर्वत है, जो समस्त पर्वतों का राजा तथा सब प्रकारके धातुओंका बहुत बड़ा खजाना है। हिमवान्की दो कन्याएँ हैं, जिनके सुन्दर रूप की इस भूतल पर कहीं तुलना नहीं है॥ १४ ॥</p><p>‘मेरु पर्वतकी मनोहारिणी पुत्री मेना हिमवान्की प्यारी पत्नी है। सुन्दर कटि प्रदेश वाली मेना ही उन दोनों कन्याओं की जननी हैं॥ १५ ॥</p><p>‘रघुनन्दन! मेना के गर्भ से जो पहली कन्या उत्पन्न हुई, वही ये गंगा जी हैं। ये हिमवान्की ज्येष्ठ पुत्री हैं। हिमवान्की ही दूसरी कन्या, जो मेनाके गर्भ से उत्पन्न हुई, उमा नाम से प्रसिद्ध हैं॥ १६ ॥</p><p>कुछ कालके पश्चात् सब देवताओंने देवकार्य की सिद्धि के लिये ज्येष्ठ कन्या गंगाजी को, जो आगे चलकर स्वर्ग से त्रिपथगा नदी के रूप में अवतीर्ण हुई, गिरिराज हिमालय से माँगा॥ १७ ॥</p><p>‘हिमवान्ने त्रिभुवन का हित करने की इच्छासे स्वच्छन्द पथ पर विचरने वाली अपनी लोकपावनी पुत्री गंगा को धर्म पूर्वक उन्हें दे दिया॥ १८ ॥</p><p>‘तीनों लोकों के हितकी इच्छा वाले देवता त्रिभुवन की भलाई के लिये ही गंगा जी को लेकर मन-ही-मन कृतार्थताका अनुभव करते हुए चले गये॥ १९ ॥</p><p>‘रघुनन्दन! गिरिराज की जो दूसरी कन्या उमा थीं, वे उत्तम एवं कठोर व्रत का पालन करती हुई घोर तपस्यामें लग गयीं। उन्होंने तपोमय धनका संचय किया॥ २० ॥</p><p>‘गिरिराज ने उग्र तपस्या में संलग्न हुई अपनी वह विश्ववन्दिता पुत्री उमा अनुपम प्रभावशाली भगवान् रुद्र को ब्याह दी॥ २१ ॥</p><p>‘रघुनन्दन! इस प्रकार सरिताओं में श्रेष्ठ <a
href="/ganga-stotram-lyrics/">गंगा</a> तथा भगवती उमा—ये दोनों गिरिराज हिमालयकी कन्याएँ हैं। सारा संसार इनके चरणोंमें मस्तक झुकाता है॥ २२ ॥</p><p>‘गति शीलों में श्रेष्ठ तात श्रीराम! गंगाजीकी उत्पत्तिके विषय में ये सारी बातें मैंने तुम्हें बता दीं। ये त्रिपथगामिनी कैसे हुई? यह भी सुन लो। पहले तो ये आकाश मार्ग में गयी थीं। तत्पश्चात् ये गिरिराज कुमारी गंगा रमणीया देवनदी के रूपमें देवलोक में आरूढ़ हुई थीं। फिर जलरूप में प्रवाहित हो लोगों के पाप दूर करती हुई रसातल में पहुँची थीं’॥ २३-२४ ॥</p><p
class="has-text-align-center"><strong>इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३५॥</strong></p><p>The post <a
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