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><channel><title>Turiyananda Archives - हिंदी पथ</title> <atom:link href="https://hindipath.com/tag/turiyananda/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" /><link>https://hindipath.com/tag/turiyananda/</link> <description>हिंदी का संसार</description> <lastBuildDate>Tue, 10 Oct 2023 06:39:40 +0000</lastBuildDate> <language>en-US</language> <sy:updatePeriod> hourly </sy:updatePeriod> <sy:updateFrequency> 1 </sy:updateFrequency> <generator>https://wordpress.org/?v=6.3.9</generator><image> <url>https://hindipath.com/wp-content/uploads/2019/09/HindiPath-Site-Icon-New.png</url><title>Turiyananda Archives - हिंदी पथ</title><link>https://hindipath.com/tag/turiyananda/</link> <width>32</width> <height>32</height> </image> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्रीमती फ़्रांसिस लेगेट को लिखित (3 सितम्बर, 1900)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-3-september-1900/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-3-september-1900/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 15 Apr 2021 11:31:46 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <category><![CDATA[Turiyananda]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5964</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र पेरिस से स्वामी तुरीयानन्द को 3 सितम्बर, 1900 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-3-september-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्रीमती फ़्रांसिस लेगेट को लिखित (3 सितम्बर, 1900)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का श्रीमती फ़्रांसिस लेगेट को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">६, प्लेस द एतात युनि,<br>पेरिस,<br>३ सितम्बर, १९००</p><p>प्रिय माँ,</p><p>यहाँ इस भवन में हमारी सनकियों की एक सभा हुई।</p><p>भिन्न भिन्न देशों से प्रतिनिधि आये, दक्षिण में भारत से लेकर उत्तर में स्कॉटलैण्ड तक से, इंग्लैण्ड और अमेरिका ने दोनों पक्षों को आधार प्रदान किया।</p><p>हमें अध्यक्ष चुनने में बड़ी कठिनाई हुई, क्योंकि यद्यपि डा. जेम्स (प्रो. विलियम जेम्स) थे, वे विश्व की समस्याओं के हल की अपेक्षा श्रीमती मेल्टन (शायद एक चुम्बकीय चिकित्सक (magnetic healer) द्वारा उठाये अपने शरीर के फफोलों को अधिक मन में बसाये हुए थे।</p><p>मैंने ‘जो’ (जोसेफिन मैक्लिऑड) के लिए प्रस्ताव किया, किन्तु उसने इसलिए अस्वीकार कर दिया कि उसका नया गाउन नहीं आया था – और वह एक कोने से, विजय की पृष्ठभूमि से, सारे दृश्य को देखने के लिए चली गयी।</p><p>श्रीमती (ओलि) बुल तैयार थीं, किन्तु मार्गट (<a
href="/swami-vivekananda-ke-patra-sister-nivedita-28-august-1900/">भगिनी निवेदिता</a>) ने इस सभा के एक तुलनात्मक दर्शन कक्षा का रूप धारण करने पर आपत्ति की।</p><p>जब हम लोग इस प्रकार किंकर्तव्यविमूढ़ थे, तभी एक छोटा, गठीला और गोल-मटोल व्यक्ति एक कोने से उठा और बिना किसी औपचारिकता के उसने घोषणा की, यदि हम <a
href="/surya-dev-mantra-katha-upay/">सूर्यदेव</a> और <a
href="/chandra-dev-mantra-katha-upay/">चन्द्रदेव</a> की उपासना करें, तो सभी कठिनाईयाँ अपने आप दूर हो जायँगी, न केवल अध्यक्ष चुनने की समस्या, वरन् स्वयं जीवन की समस्या हल हो जायगी। उसने अपना भाषण पाँच मिनट में समाप्त कर लिया, किन्तु उसके शिष्य को, जो उपस्थित था, उसका अनुवाद करने में पूरा पौन घंटा लगा। इसी बीच उसके गुरू उठे और अपने कमरे के बिछौने इस उद्देश्य से लपेटने लगे, जैसा कि उन्होंने कहा, कि वे हमें तत्काल ‘अग्निदेवता’ की शक्ति का प्रत्यक्ष प्रदर्शन देंगे।</p><p>इस समय ‘जो’ ने आपत्ति की और अपने कमरे में ‘अग्नि-यज्ञ’ नहीं चाहती, इस बात पर उसने जोर दिया। इस पर भारतीय साधु ने ‘जो’ की ओर उसके व्यवहार पर घोर अप्रसन्न होकर बड़ी क्रुद्ध दृष्टि से देखा – उसको विश्वास था कि वह अग्नि-उपासना में पूर्णरूप से दीक्षित हो गयी है।</p><p>तब डा. जेम्स ने अपने फफोलों की सेवा करने से एक मिनट निकालकर घोषणा की कि यदि वे मेल्टन के फफोलों के विकास में पूर्णतया व्यस्त न होते, तो वे ‘अग्निदेव’ तथा उनके भाइयों के ऊपर बड़ी रोचक बातें कहते। इसके अतिरिक्त चूँकि उनके महान् गुरू हर्बट स्पेन्सर ने इस विषय की गवेषणा उनके पूर्व नहीं की, अतः वे मौन ही रहेंगे।</p><p>द्वार के पास से एक आवाज आयी, वह वस्तु ‘चटनी’ है। हम सबने मुड़कर देखा कि वह मार्गट है। उसने कहा, “ ‘चटनी’ ही है। ‘चटनी’ और काली जीवन की सभी कठिनाइयों को दूर कर देंगी और हम लोगों को सारी बुराई पी जाने तथा अच्छाई को समझने के योग्य बना देंगी।” लेकिन वह अचानक रूक गयी और दृढ़तापूर्वक बोली कि वह आगे कुछ न कहेगी, क्योंकि श्रोताओं में से एक नर प्राणी के द्वारा उसे बोलने में बाधा पहुँचायी गयी है। उसे निश्चय था कि श्रोताओं में से एक व्यक्ति ने खिड़की की ओर सिर मोड़ लिया था और एक महिला के प्रति उचित ध्यान नहीं दे रहा था। यद्यपि वह स्वयं स्त्री-पुरूष की समानता में विश्वास करती थी, तथापि उसने उस घृणास्पद व्यक्ति की स्त्रियों के प्रति आदर की भावना के अभाव के कारण को जानना चाहा। तब सभी लोगों ने घोषणा की कि वे उसके प्रति पूर्ण ध्यान दे रहे हैं, और सबसे ऊपर समान अधिकार दे रहे हैं, परन्तु इसका कोई प्रभाव नहीं हुआ। मार्गट को उस भीषण समूह से कोई सरोकार नहीं था और वह बैठ गयी।</p><p>तब बोस्टन की <a
href="/swami-vivekananda-ke-patra-mrs-ole-bull-12-march-1900/">श्रीमती बुल </a>खड़ी हुई और यह समझाने लगीं कि किस प्रकार दुनिया की सारी कठिनाईयाँ स्त्री-पुरूष के सच्चे सम्बन्ध को न समझने के कारण हैं। ‘उचित व्यक्तियों को ठीक प्रकार समझना ही इसका एकमात्र इलाज है और तब प्रेम में मुक्ति पाना और मुक्ति, मातृत्व, भ्रातृत्व, <a
href="/tarpan-vidhi-in-hindi/">पितृत्व</a>, तथा ईश्वरत्व में स्वातंत्र्य, प्रेम में स्वातंत्र्य और स्वातंत्र्य में प्रेम तथा स्त्री-पुरूष के सम्बन्ध में सच्चे आदर्श की उचित प्रतिष्ठा करना।’</p><p>इस पर स्कॉटलैण्ड के प्रतिनिधि ने दृढ़तापूर्वक आपत्ति की और कहा, क्योंकि शिकारी ने चरवाहे का पीछा किया, चरवाहे ने गड़रिये का, गड़रिये ने किसान का और किसान ने मछुए को समुद्र में खदेड़ भगाया, अब हमने गहरे समुद्र से मछुए को पकड़ना चाहा और उसे <a
href="/bhartiya-kisan-par-nibandh-in-hindi/">किसान</a> पर आक्रमण करने दिया इत्यादि; और इस प्रकार जीवन का जाला पूर्ण हो जायगा और हम सब लोग प्रसन्न होंगे – पर उसे यह खदेड़ने का कार्य बहुत काल तक नहीं करने दिया गया। एक क्षण में प्रत्येक व्यक्ति खड़ा हो गया और हमने केवल शब्दों का एक होहल्ला सुना – ‘सूर्य देव और चन्द्र देव’, ‘चटनी और काली’, ‘ठीक समझ रखने की स्वतंत्रता, स्त्री-पुरूष सम्बन्ध; मातृत्व,’ ‘कभी नहीं, मछुए को अवश्य ही समुद्रतट वापस जाना होगा’ इत्यादि। इस पर ‘जो’ ने घोषणा की कि इस समय वह शिकारी का पार्ट अदा करने के लिए इच्छुक है, और यदि वे अपनी मूर्खता का परित्याग नहीं करते, तो वह उन्हें अपने घर से खदेड़ भगायेगी।</p><p>तब शान्ति हुई और सुस्थिरता आयी और मैं यह पत्र लिखने में लग गया हूँ।</p><p
class="has-text-align-right">आपका सस्नेह,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-3-september-1900/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी तुरीयानन्द को लिखित (सितम्बर, 1900)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-september-1900/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-september-1900/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 15 Apr 2021 11:18:30 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <category><![CDATA[Turiyananda]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5961</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र स्वामी तुरीयानन्द को सितम्बर, 1900 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का स्वामी तुरीयानन्द को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">६, प्लेस द एतात युनि,<br>सितम्बर, १९००</p><p>प्रिय तुरीयानन्द,</p><p>अभी अभी तुम्हारा पत्र मिला। ‘माँ’ की इच्छा से सब कार्य चलते रहेंगे, डरने की कोई बात नहीं है। मैं शीघ्र ही यहाँ से दूसरी जगह जा रहा हूँ। सम्भवतः ‘कान्स्ट टिनोप्ल’ तथा कुछ अन्य स्थानों में कुछ दिन तक भ्रमण करता रहूँगा। आगे ‘माँ’ जाने। श्रीमती वीलमॉट का पत्र मिला। उससे पता चला कि उसमें बहुत कुछ उत्साह है। निश्चिन्त रहो और जमकर बैठ जाओ। सब कुछ ठीक हो जायगा। अगर ‘नाद-श्रवण’ आदि से किसीको कोई नुकसान पहुँचे, तो इससे वह मुक्त हो सकता है, यदि वह ध्यान करना कुछ समय के लिए छोड़ दे और मांसमछली खाना प्रारम्भ कर दे। अगर देह क्रमशः कमजोर नहीं हो रही है, तो चिन्ता करने का कोई कारण नहीं।… धीरे धीरे अभ्यास करना चाहिए।</p><p>तुम्हारे पत्र का जवाब आने से पहले ही मैं इस स्थान से चल दूँगा। अतः इसका जवाब यहाँ न भेजना। शारदा के प्रेषित कागजादि सब कुछ मुझे मिल गये हैं। और उसे कुछ सप्ताह पूर्व बहुत कुछ लिखा जा चुका है। भविष्य में उसे और भी लिखने का विचार है।</p><p>अब मुझे कहाँ रवाना होना है, इसका कोई निश्चय नहीं है। केवल मैं इतना ही लिख सकता हूँ कि मैं निश्चिन्त होने का प्रयास कर रहा हूँ।</p><p>काली का एक पत्र आज मुझे मिला है। उसका जवाब कल दूँगा। मेरा शरीर एक प्रकार से ठीक ही चल रहा है। परिश्रम करने से गड़बड़ी होती है, और बिना परिश्रम के ठीक रहता हूँ, बस, यही स्थिति है। ‘माँ’ जानें। निवेदिता इंग्लैण्ड गयी हुई हैं, <a
href="/swami-vivekananda-ke-patra-mrs-ole-bull-1-april-1900/">श्रीमती बुल</a> और वह – दोनों मिलकर धन संग्रह कर रही हैं। किशनगढ़ की बालिकाओं को लेकर वहीं पर वह स्कूल खोलना चाहती हैं। वह जो कुछ कर सके – ठीक है। मैं अब किसी विषय में कुछ भी नहीं कहता हूँ – बस इतना ही है।</p><p>मेरा स्नेह जानना। किन्तु कार्य के सम्बन्ध में मुझे कोई उपदेश नहीं देना है। इति।</p><p
class="has-text-align-right">दास,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-september-1900/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी तुरीयानन्द को लिखित (1 सितम्बर, 1900)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-1-september-1900/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-1-september-1900/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 15 Apr 2021 11:09:49 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <category><![CDATA[Turiyananda]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5959</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र पेरिस से स्वामी तुरीयानन्द को 1 सितम्बर, 1900 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-1-september-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी तुरीयानन्द को लिखित (1 सितम्बर, 1900)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का स्वामी तुरीयानन्द को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">पोस्ट आफिस दे फारेस्ट<br>सॉन्ताक्लॉरा को,<br>६, प्लेस द एतात युनि, पेरिस,<br>१ सितम्बर, १९००</p><p>प्रेमास्पद,</p><p>तुम्हारे पत्र से सब समाचार विदित हुए। कुछ दिन पहले ही सैन फ़्रांसिस्को से पूर्ण वेदान्ती तथा सत्याश्रम (Home of Truth) के बीच कुछ मतभेद होने का आभास मुझे मिला था। एक व्यक्ति ने ऐसा लिखा था। इस प्रकार होना स्वाभाविक है, बुद्धिपूर्वक सबको सन्तुष्ट करते हुए कार्य को चालू रखना ही विज्ञता है।</p><p>मैं अब कुछ दिन के लिए अज्ञातवास कर रहा हूँ। फ़्रांसीसियों के साथ इसलिए रहना है कि मुझे उनकी भाषा सीखनी है। मैं एक प्रकार से निश्चिन्त हो चुका हूँ अर्थात् न्यास-संलेख (ट्रस्ट डीड) पर हस्ताक्षर करके मैंने उसे कलकत्ता भेज दिया है; मैंने उसमें अपना कोई निजी स्वत्व या अधिकार नहीं रखा है। तुम लोग अब सभी विषयों के मालिक हो, मुझे विश्वास है कि प्रभुकृपा से तुम लोग समस्त कार्यो का संचालन कर सकोगे।</p><p>व्यर्थ का चक्कर काटकर मेरी अपने को मारने की अब अधिक इच्छा नहीं है; कहीं पर बैठकर पुस्तकादि के आधार पर कालक्षेप करना अब मेरा ध्येय है। फ़्रेंच भाषा पर कुछ अंशों तक मेरा अधिकार हो चुका है, दो-एक महीने उनके साथ रहने से ही मैं उस भाषा में अच्छी तरह वार्तालाप कर सकूँगा।</p><p>फ़्रेंच तथा जर्मन – इन दोनों भाषाओं में दक्षता प्राप्त होने पर यूरोपीय विद्या में बहुत कुछ प्रवेश हो सकता है। फ़्रेंच लोग केवल माथापच्ची करनेवाले होते हैं, इन लोगों की आकांक्षाएँ इस लोक पर ही केन्द्रित हैं; इन लोगों की यह दृढ़ धारणा है कि ईश्वर या जीव कुसंस्कार मात्र हैं, उस बारे में वे बातें ही नहीं करना चाहते!!! यह असली चार्वाक का देश है। देखना है कि प्रभु क्या करते हैं। किन्तु यह देश पाश्चात्य सभ्यता का शीर्षस्थानीय है। पेरिस नगरी पाश्चात्य सभ्यता की राजधानी है।</p><p>भाई, प्रचार सम्बन्धी समस्त कार्यों से तुम लोग मुझे मुक्त कर दो। मैं अब उससे दूर हूँ, तुम लोग स्वयं सँभालो। मेरी यह दृढ़ धारणा है कि ‘माँ’ मेरी अपेक्षा सौ गुना कार्य तुम लोगों के द्वारा सम्पादित करेंगी।</p><p>काली का एक पत्र बहुत दिन पहले मुझे मिला था। वह अब तक सम्भवतः न्यूयार्क आ गया होगा। कुमारी वाल्डो बीच बीच में समाचार लेती रहती है।</p><p>मेरा शरीर कभी ठीक रहता है और कभी अस्वस्थ। कुछ दिनों से पुनः श्रीमती वाल्डन की वही मर्दन-चिकित्सा जारी है। उसका कहना है कि मैं इस बीच ठीक हो चुका हूँ! मैं तो सिर्फ़ यह देख रहा हूँ कि चाहे अब मेरे पेट में वायु की शिकायत कितनी भी क्यों न हो, चलने-फिरने अथवा पहाड़ पर चढ़ने में मुझे कोई कष्ट नहीं होता है। प्रातःकाल मैं ख़ूब डण्ड-बैठक लगाता हूँ। फिर ठण्डे पानी में गोता लगाता हूँ!!</p><p>जिसके साथ मुझे यहाँ रहना है, कल मैं उसका मकान देख आया हूँ। वह ग़रीब है, किन्तु विद्वान् है; उसके रहने की जगह पुस्तकों से भरी हुई है, वह छठी मंजिल पर रहता है। यहाँ अमेरिका की तरह ‘लिफ़्ट’ की व्यवस्था नहीं है – चढ़ना-उतरना पड़ता है। किन्तु अब मुझे इस कारण कोई कष्ट नहीं होता।</p><p>उसके मकान के चारों ओर एक सुन्दर सार्वजनिक पार्क है। वह अंग्रेजी नहीं बोल सकता है, ख़ासकर इसीलिए मैं वहाँ जा रहा हूँ। बाध्य होकर मुझे भी फ्रेंच भाषा का प्रयोग करना होगा। आगे ‘माँ’ की इच्छा है। सब कुछ उसका ही कार्य है, वे ही जानती हैं। साफ साफ तो वे कुछ भी नहीं बतलातीं, ‘गुम होकर रहती हैं’, किन्तु मैं यह देख रहा हूँ, कि इस बीच मेरा ध्यान-जप भी अच्छी तरह से चालू है।</p><p>कुमारी बुक, कुमारी वेल, श्रीमती ऐम्पीनल, कुमारी वेक्हम, श्री जार्ज, डा० लॉगन आदि मेरे सभी मित्रों से मेरी प्रीति कहना तथा तुम स्वयं जानना।</p><p>लॉस एंजिलिस में सभी से मेरी प्रीति कहना।</p><p
class="has-text-align-right">विवेकानन्द</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-1-september-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी तुरीयानन्द को लिखित (1 सितम्बर, 1900)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-1-september-1900/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी तुरीयानन्द को लिखित (अगस्त, 1900)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-august-1900/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-august-1900/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 15 Apr 2021 10:39:30 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <category><![CDATA[Turiyananda]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5953</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र पेरिस से स्वामी तुरीयानन्द को अगस्त, 1900 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-august-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी तुरीयानन्द को लिखित (अगस्त, 1900)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का स्वामी तुरीयानन्द को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">६ प्लेस द एतात युनि,<br>पेरिस,<br>अगस्त, 1900</p><p>भाई हरि,</p><p>मैं अब फ़्रान्स में समुद्र के किनारे रह रहा हूँ। धर्मेतिहास सम्मेलन समाप्त हो चुका है। सम्मेलन कुछ भी महत्त्वपूर्ण नहीं था। लगभग बीस पण्डित मिलकर शालग्राम की उत्पत्ति, जिहोवा की उत्पत्ति आदि विषयों पर व्यर्थ का बकवाद करते रहे। मैंने भी अवसर के अनुकूल कुछ कह दिया।</p><p>मेरे शरीर एवं मन भग्न हो चुके हैं। विश्राम की आवश्यकता है। फिर भी ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, जिस पर निर्भर रहा जा सके, और इधर जब तक मैं जीवित रहूँगा, मुझ पर भरोसा रखकर सब कोई नितान्त स्वार्थी बन जायँग़े।</p><p>…लोगों के साथ व्यवहार करने में दिन-रात मानसिक कष्ट का अनुभव होता है। इसलिए… लिख-पढ़कर मैं पृथक् हो चुका हूँ। अब मैं यह लिखे दे रहा हूँ कि किसीका भी एकाधिपत्य न रहेगा। सभी कार्य बहुमत से सम्पन्न होंगे… जितने शीघ्र इस प्रकार के न्यास-संलेख (trust deed) का सम्पादन हो, उतना ही अच्छा है, तभी मुझे कहीं शान्ति मिलेगी।… अस्तु, <strong>स्मारं स्मारं स्वगृहचरितं </strong>मुरारि काष्ठस्वरूप हो गये।<sup>1</sup> काठ बनने के डर से मैं भाग रहा हूँ, इसमें दोष ही क्या है?</p><p>इस बात को यहीं तक रहने दो। अब तुम लोगों की जैसी इच्छा हो करो। अपना कार्य मैं समाप्त कर चुका हूँ, बस! गुरू महाराज का मैं ऋणी था – प्राणों की बाजी लगाकर मैं ने उस ऋण को चुकाया है। यह बात तुम्हें कहाँ तक बतलाऊँ? समस्त कर्तृत्व का दस्तावेज बनाकर मुझे भेजा गया है। कर्तृत्व को छोड़कर बाकी सभी स्थलों पर मैने हस्ताक्षर कर दिया है!…</p><p>तुमको एवं गंगाधर को और काली, शशि तथा नवीन बालकों को पृथक् रखकर राखाल एवं बाबूराम को मैं कर्तृत्व सौंप रहा हूँ। गुरूदेव उन्हें ही श्रेष्ठ मानते थे। यह उनका ही कार्य है।… मैंने हस्ताक्षर कर दिये हैं। अब जो कुछ मैं करूँगा, वह मेरा निजी कार्य होगा।…</p><p>अब मैं अपना कार्य करने के लिए जा रहा हूँ। गुरू महाराज के ऋण को<sup>2</sup> अपने प्राणों की बाजी लगाकर मैंने चुकाया है। अब मेरे लिए उनका कोई कर्ज चुकाना शेष नहीं है और न उनका ही मुझ पर कोई दावा है।…</p><p>तुम लोग जो कुछ कर रहो हो, वह गुरू महाराज का कार्य है, उसे करते रहो। मुझे जो कुछ करने का था, मैं कर चुका हूँ, बस। मुझे उस बारे में और कुछ न लिखना और न बतलाना, उसमें मेरा कोई भी अभिमत नहीं है।… अब सब कुछ भिन्न प्रकार से होगा।… इति।</p><p
class="has-text-align-right">नरेन्द्र</p><p
class="has-text-align-left">पुनश्च – सबसे मेरा प्यार कहना। इति</p><hr
class="wp-block-separator"/><ol><li>२६ मई, १८९० ई० को श्री प्रमदादास मित्र महोदय के लिए लिखित पत्र को देखिए।</li><li>२६ मई, १८९० ई० को श्री प्रमदादास मित्र महोदय के लिए लिखित पत्र को देखिए।</li></ol><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-august-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी तुरीयानन्द को लिखित (अगस्त, 1900)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-august-1900/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी तुरीयानन्द को लिखित (13 अगस्त, 1900)</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-13-august-1900/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-13-august-1900/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 15 Apr 2021 10:03:22 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <category><![CDATA[Turiyananda]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5949</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र पेरिस से स्वामी तुरीयानन्द को 13 अगस्त, 1900 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-13-august-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी तुरीयानन्द को लिखित (13 अगस्त, 1900)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का स्वामी तुरीयानन्द को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">६ प्लेस द-एतात् यूनि, पेरिस,<br>१३ अगस्त, १९००</p><p>भाई हरि,</p><p>कैलिफोर्निया से तुम्हारा पत्र मिला। तीन व्यक्तियों को भावावेश होने लगा, बुराई क्या है? उससे बहुत कुछ कार्य होता है। गुरू महाराज जानें। जो होना है, होने दो। उनका कार्य है, वे ही जानें, हम तो दास के सिवाय और कुछ नहीं हैं।</p><p>इस पत्र को, द्वारा श्रीमती एस० पानेल, इस पते से सैन फ़्रांसिस्को भेज रहा हूँ।</p><p>अभी न्यूयार्क से साधारण समाचार प्राप्त हुआ है। वे लोग कुशलपूर्वक हैं। काली बाहर गया हुआ है। तुम सैन फ़्रांसिस्को में किमासीत प्रभाषेत व्रजेत किम् लिख भेजना। और मठ में रूपये भेजने के विषय में उदासीन न होना। लॉस एंजिलिस तथा सैन . फ्रांसिस्को से प्रतिमास निश्चित रूप से रूपये जाने चाहिए।</p><p>मैं एक प्रकार से ठीक ही हूँ। शीघ्र ही इंग्लैण्ड रवाना होना है। शरत् का समाचार मिलता रहता है। बीच में उसको पेचिश हो गयी थी। और सब लोग अच्छी तरह से हैं। अब की बार किसी को मलेरिया नहीं हुआ है। <a
href="/ganga-chalisa/">गंगा</a>-तट पर उसका विशेष आक्रमण भी नहीं होता है। वर्तमान वर्ष में वर्षा कम होने के कारण बंगाल में अकाल पड़ने का भय है।</p><p>भाई, ‘माँ’ की कृपा से कार्य में जुटे रहो। ‘माँ’ जानें, तुम जानो – मैं मुक्त हूँ। अब मैं विश्राम लेने जा रहा हूँ।</p><p
class="has-text-align-right">दास,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5944</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र न्यूयार्क से स्वामी तुरीयानन्द को 25 जुलाई, 1900 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-25-july-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी तुरीयानन्द को लिखित (25 जुलाई, 1900)</a> appeared first on <a
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class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का स्वामी तुरीयानन्द को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">१०२ पूर्व ५८वाँ रास्ता,<br>न्यूयार्क,<br>२५ जुलाई, १९००</p><p>प्रिय तुरीयानन्द,</p><p>श्री हैन्सबॉरो के एक पत्र से यह विदित हुआ कि तुम उनके यहाँ गये थे। वे तुमको बहुत चाहते हैं और मेरा यह विश्वास है कि तुम भी समझ गये होगे कि उन लोगों की मित्रता कितनी स्वाभाविक, पवित्र तथा स्वार्थरहित है। कल मैं पेरिस रवाना हो रहा हूँ, सब कुछ ठीक हो चुका है। अभेदानन्द यहाँ नहीं है। चूँकि मैं जा रहा हूँ, इसलिए वह कुछ चिन्तित हो उठा है – किन्तु इसके अलावा उपाय ही क्या है?</p><p>६, प्लेस द-एतात् यूनि – श्री लेगेट के इस पते से अब तुम मुझे पत्र देना। श्रीमती वाईकाफ, हैन्सबॉरो तथा हेलेन से मेरा स्नेह कहना। समितियों का कार्य पुनः सामान्य रूप से प्रारम्भ कर दो तथा श्रीमती हैन्सबॉरो से कहो कि वे समय पर चन्दा वसूल करें और अर्थ संग्रह कर भारत भेजें; क्योंकि सारदा ने लिखा है कि वे लोग बहुत ही आर्थिक कष्ट में हैं। श्रीमती बुक को मेरी हार्दिक श्रद्धा कहना। तुम मेरा असीम प्यार जानना।</p><p
class="has-text-align-right">सतत प्रभुपदाश्रित,<br>तुम्हारा,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5938</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र न्यूयार्क से स्वामी तुरीयानन्द को 18 जुलाई, 1900 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-18-july-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी तुरीयानन्द को लिखित (18 जुलाई, 1900)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का स्वामी तुरीयानन्द को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">१०२ पूर्व ५८वीं स्ट्रीट,<br>न्यूयार्क,<br>१८ जुलाई, १९००</p><p>प्रिय तुरीयानन्द,</p><p>पुनः प्रेषित किया हुआ तुम्हारा पत्र मुझे मिला। डिट्राएट में मैं केवल तीन दिन ठहरा। इस समय यहाँ न्यूयार्क में भीषण गर्मी है। पिछले हफ्ते भारत से तुम्हारे लिए कोई डाक नहींं थी। अभी तक <a
href="/swami-vivekananda-ke-patra-sister-nivedita-11-july-1900/">भगिनी निवेदिता</a> के बारे में कोई ख़बर नहीं मिली।</p><p>यहाँ हम लोगों के साथ सब कुछ पहले जैसा ही चल रहा है। कोई विशेष बात नहीं है। कुमारी मूलर अगस्त में नहीं आ सकतीं। मैं उनका इन्तजार नहीं करूँगा। मैं अगली ट्रेन पकड़ रहा हूँ। जब तक उनकी कोई ख़बर न मिल जाय वहीं रहो। कुमारी बुक को प्यार।</p><p
class="has-text-align-right">प्रभुपदाश्रित,<br>विवेकानन्द</p><p>पुनश्च – करीब एक हफ़्ते हुए काली पहाड़ चला गया। वह सितम्बर के पहले वापस नहीं आ सकता। मैं बिल्कुल अकेला हूँ, और धुलाई कर रहा हूँ, मुझे यह पसन्द है। क्या तुम मेरे मित्रों से मिले हो? उनसे मेरा प्यार कहना।</p><p
class="has-text-align-right">वि.</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-18-july-1900/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी तुरीयानन्द को लिखित</title><link>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda/</link> <comments>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Wed, 14 Apr 2021 10:19:09 +0000</pubDate> <category><![CDATA[स्वामी विवेकानंद]]></category> <category><![CDATA[Patra]]></category> <category><![CDATA[Turiyananda]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5883</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र स्वामी तुरीयानन्द को मार्च, 1900 लिखा था। पढ़ें स्वामी विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी तुरीयानन्द को लिखित</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p
class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का स्वामी तुरीयानन्द को लिखा गया पत्र)</p><p>भाई हरि,</p><p>तुम्हारे पाँव की हड्डी जुड़ गयी है, यह जानकर ख़ुशी हुई एवं तुम अच्छी तरह से कार्य कर रहे हो, यह समाचार भी मुझे मिला है।… मेरा शरीर ठीक ही चल रहा है। असली बात यह है कि शरीर की ओर अधिक ध्यान देने से ही रोग दिखायी देता है। मैं स्वयं रसोई बना रहा हूँ, मनचाहा भोजन कर रहा हूँ, दिन-रात परिश्रम कर रहा हूँ और ठीक हूँ; नींद की भी कोई शिकायत नहीं है, पर्याप्त मात्रा में नींद आती है।</p><p>एक माह के अन्दर मैं न्यूयार्क जा रहा हूँ। सारदा की पत्रिका क्या बन्द हो चुकी है? मुझे तो उसकी प्रतियाँ नहीं मिल रही हैं। Awakened (प्रबुद्ध भारत) भी क्या सो गया है! मुझे तो मिल नहीं रहा है। अस्तु, देश में प्लेग फैल रहा है, पता नहीं कि कौन जीवित है और कौन नहीं। <a
href="/ram-chalisa/">राम की माया है</a>!! सुनो, ‘अचू’ का आज एक पत्र आया है। वह शिकार राज्य के रामगढ़ कस्बे में छिपा हुआ था। किसीने कहा है कि विवेकानन्द मर चुका है। इसलिए उसने मुझे पत्र लिखा है!! आज उसे जवाब भेज रहा हूँ।</p><p>यहाँ सब कुछ ठीक है। अपना तथा उसका कुशल समाचार लिखना। इति।</p><p
class="has-text-align-right">दास,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=5850</guid><description><![CDATA[<p>स्वामी विवेकानंद ने यह पत्र सैन फ़्रेंसिस्को से स्वामी तुरीयानन्द को मार्च, 1900 लिखा था। पढ़ें विवेकानंद जी का यह पत्र हिंदी में।</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-march-1900/">स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी तुरीयानन्द को लिखित (मार्च, 1900)</a> appeared first on <a
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class="has-text-align-center">(<a
href="https://hindipath.com/swami-vivekananda-biography-in-hindi/">स्वामी विवेकानंद</a> का स्वामी तुरीयानन्द को लिखा गया पत्र)</p><p
class="has-text-align-right">सैन फ़्रांसिस्को,<br>मार्च, १९००</p><p>प्रिय हरिभाई,</p><p>अभी ही मुझे श्रीमती बनर्जी से बिल्टी मिली है। उन्होंने कुछ दाल, चावल भेजे हैं। मैं बिल्टी तुम्हें भेज रहा हूँ। उसे कुमारी वाल्डो को दे देना ; जब वे चीजें आ जायँगी, तब वे लेती आयेंगी।</p><p>अगले हफ़्ते यह स्थान छोड़कर मैं शिकागो जा रहा हूँ। वहाँ से फिर मैं न्यूयार्क जाऊँगा। मेरा काम किसी प्रकार चल रहा है।… इस समय तुम कहाँ रह रहे हो? क्या कर रहे हो?</p><p
class="has-text-align-right">सस्नेह तुम्हारा,<br>विवेकानन्द</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/swami-vivekananda-ke-patra-swami-turiyananda-march-1900/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> </channel> </rss>