FEATUREDधर्मस्वामी विवेकानंद

मन की शक्तियाँ – स्वामी विवेकानंद

Mann Ki Shaktiyan by Swami Vivekananda

स्वामी विवेकानंद ने जनवरी सन् 1900 में लास एंजिल्स, कैलिफोर्निया में यह भाषण दिया था। “मन की शक्तियां” नामक इस व्याख्यायान में स्वामी जी बताते हैं कि हमारे मन-मस्तिष्क में अथाह शक्तियाँ भरी पड़ी हैं और हम उनका बहुत छोटा-सा अंश ही उपयोग में लाते हैं।

जब हम इन मन की शक्तियों को नहीं समझते हैं तो चमत्कार कहते हैं, लेकिन यह अपने आप में पूरा विज्ञान है। पढ़िए स्वामी विवेकानन्द का यह अनुपम लेख और जानिए मन की विराट शक्तियों को योग के विज्ञान की सहायता से कैसे जागृत किया जाए।

सम्पूर्ण जगत में सर्वदा से ही किसी अलौकिक शक्ति में विश्वास चलता आ रहा है। हममें से भी सभी ने अलौकिक घटनाओं के विषय में सुना होगा और बहुतों ने तो ऐसी चमत्कारपूर्ण अलौकिक घटनाओं का व्यक्तिगत रूप से अनुभव भी किया होगा। अपनी आँखों देखी कुछ ऐसी ही घटनाओं का वर्णन करता हुआ मैं इस विषय का प्रारम्भ करना चाहता हूँ।

एक बार मैंने एक व्यक्ति के विषय में सुना कि वह किसी के भी मन के गुप्त प्रश्नों का उत्तर तत्काल दे देता है। यही नहीं, मुझसे बताया गया कि वह भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं को भी पहिले ही से बता देता है। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ और कुछ साथियों को लेकर उस व्यक्ति के पास पहुँच गया। हम सभी ने अपने-अपने मन में अपने-अपने प्रश्न निश्चित कर लिये थे और भूल बचाने के लिये काग़ज़ पर लिख कर उन्हें अपनी जेबों में रख लिये थे। उस व्यक्ति ने ज्यों ही हममें से एक को देखा, हमारे सारे गुप्त प्रश्नों को दुहरा ही नहीं दिया वरन् उनके उत्तर भी दे दिये। तत्पश्चात् उसने काग़ज़ पर कुछ लिखा और उसे मोड़ कर उस पर मुझसे हस्ताक्षर करने को कहा। ऐसा करने के बाद उसके कथनानुसार मैंने उस काग़ज़ की पुड़िया को बिना देखे ही तब तक के लिये अपनी जेब में रख लिया जब तक वह स्वयं उसे दिखलाने के लिये न कहे। मेरे सब साथियों के साथ भी ऐसा ही किया गया। तत्पश्चात् भविष्य में घटने वाली कुछ घटनाओं पर प्रकाश डालते हुए उसने हमसे कहा कि हम किसी भी भाषा के किसी भी शब्द या वाक्य को अपने मन में सोच लें। वह संस्कृत बिल्कुल नहीं जानता ऐसा समझ कर मैंने संस्कृत भाषा के एक लम्बे वाक्य को मन में रख लिया। पर उसकी आज्ञानुसार जब मैंने जेब में से निकाल कर काग़ज़ के उस टुकड़े को देखा तो महान आश्चर्य हुआ कि वह संस्कृत का बड़ा वाक्य ज्यों का त्यों वहाँ लिखा हुआ है! एक घंटा पहिले उस कागज पर उस वाक्य को लिखते समय अपनी बात की पुष्टि के लिये उसने यह भी सूचित कर दिया था कि यह व्यक्ति इसी वाक्य को अपने मन में निश्चित करेगा और यह सत्य निकला। मेरे दूसरे साथी से भी जिनकी जेब में भी–जिनकी जेब में भी वैसा ही काग़ज़ का टुकड़ा रखा हुआ था–अपने मन में कोई वाक्य सोच लेने के लिये कहा गया। उन्होंने अरबी भाषा का एक वाक्य निश्चित किया जो कुरान से लिया गया था। पर वह अरबी वाक्य भी उनकी जेब में रखे हुये काग़ज़ के टुकड़े पर ज्यों का त्यों लिखा हुआ मिला। मेरे साथियों में से एक डाक्टर थे। उन्होंने जर्मन भाषा में लिखी गई एक वैद्यक की पुस्तक से एक वाक्य अपने मन में रख लिया, पर वह जर्मन भाषा का वाक्य भी उनकी जेब वाले कागज़ के टुकड़े पर लिखा हुआ मिला।

यह सोच कर कि शायद उसने पहिली बार मुझे किसी प्रकार धोखा दे दिया हो, कुछ दिन पश्चात फिर कुछ दूसरे साथियों को लेकर फिर मैं उस व्यक्ति के पास गया, पर इस बार भी वह अपने चमत्कार प्रदर्शन में आश्चर्य जनक रूप में सफल रहा।

एक बार जब मैं हैदराबाद में था, मुझसे कुछ लोगों ने एक ऐसे ब्राह्मण के विषय में चर्चा की जो इच्छित वस्तुओं को अज्ञात स्थान से अज्ञात रूप में मँगा दिया करते थे। ये महाशय एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे। उनसे मैंने अपना चमत्कार दिखाने की कहा। संयोगवश उन्हें एक दिन ज्वर हो आया। भारतवर्ष में साधारणत: यह विश्वास किया जाता है कि यदि कोई पवित्रात्मा किसी अस्वस्थ मनुष्य के सिर पर हाथ रख दे तो वह शीघ्र ही स्वस्थ हो जाता है। अतएव ब्राह्मण देवता मेरे पास आकर अपने सिर पर हाथ रखने का आग्रह करने लगे। मैंने स्वीकार लिया और उनसे अपना चमत्कार दिखलाने का वचन भी ले लिया। स्वस्थ होने के बाद अपना वचन पूरा करने के लिये एक दिन वे आ पहुँचे। केवल एक लंगोटी छोड़कर हम लोगों ने उनके पास के सब वस्त्र ले लिये। ठंड पड रही थी, इसलिये अपने पास का कम्बल मैंने उन्हें ओढ़ने के लिये दे दिया और एक कोने में बैठ जाने को कहा। पूरी ५० आँखें उनकी ओर बारीकी से देख रही थीं। मनोवांछित वस्तुओं के नाम काग़ज़ पर लिख देने के लिये जब उन्होंने कहा तब हम लोगों ने ऐसी ऐसी वस्तुओं के नाम लिख लिये जो उस प्रदेश में पैदा ही नहीं होती थीं–जैसे अंगूर के गुच्छे, नारंगियाँ आदि। काग़ज़ के टुकड़े दे दिये गये। थोड़ी ही देर में देखते क्या हैं कि शरीर पर लिपटे हुए उस कम्बल के अन्दर से सारी की सारी वस्तुएँ ढेर की ढेर निकलती चली आ रही हैं। उन निकली हुई वस्तुओं को यदि तौला जाता तो मेरा अंदाज़ था कि वे तौल में उस ब्राह्मण महोदय के शरीर के तौल से दूनी भारी तो अवश्य ही होतीं! उन फलों को खाने के लिये उन्होंने कहा, पर मायाजन्य अथवा कृत्रिम समझ कर खाने में हमें हिचकिचाहट होने लगी, परन्तु जब उन्होंने स्वयं खाना प्रारम्भ कर दिया तो हम लोगों ने भी खाया और देखा कि स्वाद में कोई अन्तर नहीं है।

अन्त में ताज़े गुलाबों का ढेर लगा कर उन्होंने अपना चमत्कार प्रदर्शन बन्द कर दिया। उस ढेर का प्रत्येक गुलाब सुन्दर और पूर्ण रूप से खिला हुआ था। उसकी पंखुड़ियाँ ताज़ी और कोमल थीं तथा उन पर प्रातःकालीन ओस की बूंदें पड़ी थीं। गुलाब के सुन्दर फूलों के इतने बड़े ढेर को देखकर हम लोग आश्चर्य करने लगे। पूछने पर उन सज्जन ने यही बतलाया कि यह सब हाथ की सफाई ही है। जो कुछ भी हो केवल हाथ की सफाई के बल पर यह सब कर दिखाना असम्भव ही मालूम पड़ा। इतनी मात्रा में इतनी वस्तुएँ भला कहाँ से लाई जा सकती हैं?

इस प्रकार की बहुत सी चीजें मैंने देखी हैं और आप भी यदि भारतवर्ष का पर्यटन करें तो भिन्न-भिन्न स्थानों में आपके सामने भी इस प्रकार की सैकड़ों चीजें आयेंगी। भारत ही नहीं, सभी देशों में इस प्रकार की घटनायें होती रहती हैं। इस देश में भी इस प्रकार की बहुत सी चमत्कारपूर्ण घटनायें देखने को मिलेंगी। यह ठीक है कि इन सबमें बहुत कुछ धोखेबाज़ी है, पर इस प्रकार की धोखेबाज़ी के पीछे कुछ वास्तविकता भी रहती है जिसके अनुकरण करने का प्रयत्न किया जाता है। आप को यह मानना ही पड़ेगा कि अनुकरण के लिये भी कुछ न कुछ वास्तविकता चाहिये। वास्तविकता के बिना अनुकरण सम्भव ही नहीं।

आज से सहस्रों वर्ष पूर्व अति प्राचीन काल में इस प्रकार के चमत्कार आज की अपेक्षा अधिक दिखाई पड़ते थे। मेरा अनुमान है कि जब किसी देश की आबादी घनी हो जाती है तब उसकी मानसिक शक्ति निर्बल पड़ जाती है; इसके विपरीत जब किसी देश की आबादी विरली रहती है तब मानसिक शक्ति अपेक्षाकृत बढ़ी चढ़ी रहती है। प्रत्येक वस्तु को सूक्ष्म विश्लेषक दृष्टि से विचार करने की जिज्ञासा रखने वाले हिन्दुओं ने इन चीजों को भी अपने हाथ में लिया और इस दिशा में अनुसंधान किया। इस प्रकार अनुसंधान करने का परिणाम यह हुआ कि वे कुछ आश्चर्यजनक परिणामों पर पहुँचे और उन्होंने इसका एक विज्ञान ही बना डाला। उन्हें ज्ञात हो गया कि ऐसे चमत्कारों में असाधारणत्व भले ही हो, पर वे सब स्वाभाविक ही हैं। उनमें अलौकिकता कहीं नहीं है। वे ही ठीक उसी तरह नियमों से बंधे हुए हैं जिस प्रकार संसार के और भौतिक दृश्य हैं। प्रकृति ने किसी व्यक्तिविशेष को इस प्रकार की चमत्कारपूर्ण शक्ति देकर पैदा नहीं किया है, वरन् इस प्रकार की शक्ति क्रमपूर्वक अध्ययन और अभ्यास से प्राप्त भी की जा सकती है। इस प्रकार के विज्ञान को वे राजयोग कहते हैं। सहस्रों की संख्या में भारतवर्ष में ऐसे लोग हैं जो इस विज्ञान का अध्ययन और अभ्यास करते हैं तथा सम्पूर्ण राष्ट्र के लिये यह दैनिक पूजा-पाठ का एक अंग ही बन गया है।

जिस निष्कर्ष पर वे पहुँचे हैं वह यह है कि यह सब असाधारण शक्तियाँ मनुष्य-मन में विद्यमान हैं। यह मन सृष्टि में अविच्छिन्न रूप से विद्यमान मन का एक अंग या अंश ही है। प्रत्येक मन एक दूसरे से निकटतम रूप में सम्बन्धित है और वह जहाँ कहीं भी रहे सम्पूर्ण विश्व से उसका घनिष्ट और प्रत्यक्ष सम्बन्ध है।

आपने क्या कभी विचार-संचरण का दृश्य देखा है? एक स्थान पर बैठा हुआ मनुष्य जो कुछ सोचता है वह विचार ठीक उसी रूप में दूसरे स्थान पर बैठे हुए मनुष्य के मन में प्रकट हो जाता है। संयोगवश नहीं वरन् तैयारी के साथ एक व्यक्ति दूरपर बैठे हुए दूसरे व्यक्ति के पास संदेश भेजना चाहता है और वह व्यक्ति जानता है कि संदेश आ रहा है तथा वह उसे ठीक उसी रूप में प्राप्त भी कर लेता है। इस क्रिया में दूरी का कोई महत्व नहीं है। विचार अपनी यात्रा प्रारम्भ करता है और किसी भी स्थान पर बैठे हुए दूसरे व्यक्ति के पास पहुँच जाता है। वह व्यक्ति उसे ठीक ठीक समझ भी लेता है। यदि मेरा मन आप के मन से सर्वथा भिन्न होता तो इस प्रकार के विचार-संचरण की क्रिया कैसे सम्भव थी? साधारण अवस्थाओं में मेरा विचार आप तक सीधे सीधे नहीं पहुँचता। पहिले वह आकाश-स्थित लहरों (Ethereal Vibrations) में घुल मिल जाता है और वे लहरें तुम्हारे मस्तिष्क में प्रवेश करती हैं, फिर वहाँ पहुँच कर वे तुम्हारे विचार का रूप ग्रहण करती हैं। यहाँ पर विचार आकाश में लय हो जाते हैं और वहाँ जाकर वे फिर अपने असली रूप में पुनः प्रकट हो जाते हैं। यह क्रिया चक्रवत् है, पर मानसिक विचार-संचरण वाली विधि में ऐसी कोई बात नहीं है, उसमें वह बिना रूप-परिवर्तन के ही सीधे सीधे एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच जाता है।

इससे स्पष्ट मालूम पड़ता है कि मन अविच्छिन्न है। योगियों ने ऐसा ही कहा भी है। मन विश्वव्यापी (Universal) है। आप का मन, मेरा मन और दूसरों के छोटे छोटे मन सभी उस विश्वव्यापी अविच्छिन्न मन के अंग हैं। उनकी अवस्था महासागर में उठी हुई छोटी छोटी लहरों के समान ही है। और इसी अविच्छिन्नता के कारण हम एक दूसरों के पास विचारों को अबाधित रूप से भेज सकते हैं।

अपने चारों ओर जो हो रहा है उसे आप अच्छी तरह देख रहे हैं। यह सम्पूर्ण विश्व प्रभावात्मक है। हमारी शक्ति का जो अंश हमारे शरीर के पोषण में व्यय होता है उसे छोड़ बाकी बची हुई सम्पूर्ण शक्ति दूसरों को प्रभावित करने में ही लगती है। हमारा शरीर, हमारे सद्गुण, हमारी बुद्धि और हमारी आध्यात्मिकता सभी निरन्तर दूसरों को प्रभावित करते रहते हैं और स्वयं प्रकाशित होते रहते हैं। यही क्रिया हमारे चारों ओर निरन्तर होती रहती है। एक ठोस उदाहरण लेकर हम इसे और स्पष्ट कर सकते हैं–एक व्यक्तिविशेष आप के पास आता है, वह विद्वान है, उसकी भाषा बड़ी मधुर है और पर्याप्त समय तक आप से वार्तालाप भी करता है, पर आपके ऊपर प्रभाव जमाने में वह सर्वथा असफल रहता है और वही एक दूसरा व्यक्ति आता है जो अपनी टूटी फूटी भाषा में कुछ ही शब्द बोल पाता है, फिर भी वह आप पर विशेष प्रभाव जमा जाता है। आपमें से बहुतों ने यह देखा है। अतएव यह स्पष्ट है कि केवल शब्दों से प्रभाव नहीं जमता। शब्द और विचार दोनों मिलकर किसी दूसरे पर प्रभाव जमाने के कार्य में केवल एक तिहाई अंश का काम देते हैं, बाकी दो तिहाई तो व्यक्ति का व्यक्तित्व ही काम देता है। व्यक्तित्व में ही वह आकर्षण-शक्ति है जो दूसरों पर प्रभाव जमाती है।

हम लोगों के घरों में भी मुखिया होते हैं पर सभी मुखिया कुटुम्बियों पर प्रभाव डालने में सफल नहीं होते। कुछ सफल होते हैं तो कुछ असफल। ऐसा क्यों? हम लोग अपनी असफलता के लिये दूसरों को दोषी ठहराते हैं। जब हमें असफलता मिलती है तो हम कह उठते हैं कि अमुक अमुक व्यक्ति हमारी असफलता के कारण हैं। असफलता में कई अपना दोष या अपनी कमज़ोरी स्वीकार करना नहीं चाहता। प्रत्येक व्यक्ति अपने को निर्दोष समझता है और किसी दूसरे व्यक्ति या वस्तु को अपनी असफलता का कारण बतलाता है। कभी कभी तो भाग्य के मत्थे सब दोष मढ़ कर छुट्टी ले ली जाती है। जब कुटुम्ब के मुखिया अपनी व्यवस्था में असफल हों तो उन्हें स्वयं अपने से ही प्रश्न पूछना चाहिये कि ऐसा क्यों होता है कि कोई तो अपनी व्यवस्था में सफल होता है और कोई नहीं? तब आप को ज्ञात होगा के इसका कारण है मनुष्य-विशेष, उसकी उपस्थिति, उसका व्यक्तित्व। इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

मनुष्य-समाज के बड़े बड़े नेताओं को भी लें तो हमें सदा यही ज्ञात होगा कि उनकी सफलता का रहस्य उनका व्यक्तित्व ही था। भूतकालीन बड़े बड़े लेखकों और विचारकों को लें और देखें कि उन्होंने भी वास्तव में कितना सोचा है। उन सारे प्राचीन लेखों को देखें जिन्हें भूतकालीन मनुष्य-समाज के नेताओं ने हमें दे रखा है; उनकी प्रत्येक पुस्तक को सामने रख कर उसका मूल्य आँकें तो हमें पता लगेगा कि इस जगत में नये और मौलिक विचार बहुत ही कम हैं। उनकी पुस्तकों में दिये गये विचारों का अध्ययन करें तो वे लेखक हमारे लिये बहुत महान नहीं ज्ञात होते, पर हम यह भी जानते हैं कि वे अपने युग में महान थे। किस चीज़ ने उन्हें इतना महान बनाया था? उन्हें महान बनाने का श्रेय न उनके विचारों को है, न उनके ग्रन्थों को है और न उनके व्याख्यानों को ही, वह तो कुछ दूसरी ही वस्तु थी और चली गई–वह था उनका व्यक्तित्व। जैसा कि मैंने पहले ही बता दिया है कि दूसरों पर प्रभाव जमाने में मनुष्य का व्यक्तित्व दो तिहाई और उसकी बुद्धि तथा भाषा केवल एक तिहाई काम करते हैं। सच्चा मनुष्यत्व या उसका व्यक्तित्व ही वह वस्तु है जो हम पर प्रभाव डालती है। हमारे कर्म हमारे व्यक्तित्व के बाह्य आविष्कार मात्र हैं। प्रभावी व्यक्तित्व कर्म के रूप से प्रकट होगा ही–कारण के रहते हुए कार्य का आविर्भाव अवश्यम्भावी है।

हमारी सभी प्रकार की शिक्षाओं का उद्देश्य तो मनुष्य के इसी व्यक्तित्व का निर्माण होना चाहिये। परन्तु इसके विपरीत हम केवल बाहर से पालिश करने का ही प्रयत्न करते हैं। यदि भीतर कुछ सार न हो तो बाहरी रंग चढ़ाने से क्या लाभ? शिक्षा का लक्ष्य अथवा उद्देश्य तो मनुष्य का विकास ही है। वह व्यक्ति, जो दूसरों को प्रभावित करता है या यों कहें कि जो दूसरों पर जादू कर देता है, शक्ति का भण्डार होता है। जब वह तैयार होता है तो जो चाहता है कर डालता है। उसका व्यक्तित्व जहाँ पहुँचता है वहीं कार्य होने लगता है।

हम जानते हैं कि यद्यपि वास्तविकता यही है पर कोई भी भौतिक विधि-नियम इसकी व्याख्या अथवा मीमांसा नहीं कर सकता। रसायन शास्त्र अथवा भौतिक शास्त्र के ज्ञान से हम इसे कैसे समझा सकते हैं? आक्सिजन, हाइड्रोजन और कार्बन किस मात्रा में मिलकर ऐसा परिणाम उपस्थित कर सकते हैं? कितने परमाणु और किस दशा में एकत्रित होकर ऐसा कार्य कर सकते हैं? कितने जीव-कोष (Cells) इस रहस्यमय व्यक्तित्व को समझाने में समर्थ हो सकते हैं? फिर भी हम देखते हैं कि यह सत्य है। यही नहीं, वही (व्यक्तित्व ही) सच्चा मनुष्य है; वही चलता फिरता है और काम करता है; प्रभाव जमाता है; अपने साथियों, अपने सम्पर्क में आने वालों को चलाता है और कालकवलित भी हो जाता है; उसकी प्रतिभा, उसके ग्रंथ और उसके कार्य ही उसके चिह्नस्वरूप रह जाते हैं। इन सबके विषय में गम्भीरता से सोचें। धर्मोपदेशकों और बड़े बड़े दार्शनिकों की तुलना करें। दार्शनिकों ने बड़े बड़े ग्रन्थ लिखे पर उन्होंने शायद ही किसी व्यक्ति के अन्तर-प्रदेश पर प्रभाव जमाया हो। इसके विपरीत धर्मोपदेशकों ने अपने सामने अपने जीवन-काल में ही कितने ही देशों को झुका दिया! यह अन्तर केवल उसी व्यक्तित्व का है। उस दार्शनिक का व्यक्तित्व निर्बल और उस धर्मोपदेशक का व्यक्तित्व महान है। पहिले में हम बुद्धि के दर्शन करते हैं और दूसरे में स्वयं जीवन का स्पर्श करते हैं। एक में यह केवल रासायनिक क्रिया है जहाँ बहुत से रासायनिक पदार्थ एक जगह रख दिये जाते हैं और जो नियमानुसार धीरे धी�