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><channel><title>Pramadvara Archives - हिंदी पथ</title> <atom:link href="https://hindipath.com/tag/pramadvara/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" /><link>https://hindipath.com/tag/pramadvara/</link> <description>हिंदी का संसार</description> <lastBuildDate>Wed, 14 Sep 2022 07:11:22 +0000</lastBuildDate> <language>en-US</language> <sy:updatePeriod> hourly </sy:updatePeriod> <sy:updateFrequency> 1 </sy:updateFrequency> <generator>https://wordpress.org/?v=6.3.13</generator><image> <url>https://hindipath.com/wp-content/uploads/2019/09/HindiPath-Site-Icon-New.png</url><title>Pramadvara Archives - हिंदी पथ</title><link>https://hindipath.com/tag/pramadvara/</link> <width>32</width> <height>32</height> </image> <item><title>प्रमद्वरा का जीवित होना – महाभारत का नवम अध्याय (पौलोमपर्व)</title><link>https://hindipath.com/pramadvara-ka-jeevit-hona-chapert-9-paulom-parv-mahabharat-hindi/</link> <comments>https://hindipath.com/pramadvara-ka-jeevit-hona-chapert-9-paulom-parv-mahabharat-hindi/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 14 Oct 2021 11:11:43 +0000</pubDate> <category><![CDATA[ग्रंथ]]></category> <category><![CDATA[धर्म]]></category> <category><![CDATA[Pramadvara]]></category> <category><![CDATA[Ruru]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=8818</guid><description><![CDATA[<p>प्रमद्वरा का जीवित होना असंभव-सा प्रतीत होता था। पिछले अध्याय में प्रमद्वरा की साँप के काटने से मृत्यु हो चुकी</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/pramadvara-ka-jeevit-hona-chapert-9-paulom-parv-mahabharat-hindi/">प्रमद्वरा का जीवित होना – महाभारत का नवम अध्याय (पौलोमपर्व)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><em>प्रमद्वरा का जीवित होना असंभव-सा प्रतीत होता था। <a
href="/pramadvara-ko-sarp-dansh-chapert-8-paulom-parv-mahabharat-hindi/">पिछले अध्याय में प्रमद्वरा की साँप के काटने से मृत्यु</a> हो चुकी थी। किंतु प्रमद्वरा के वियोग में रुरु रोता-बिलखता जा रहा था। अपनी आधी आयु देकर प्रमद्वरा को जीवित करने का उपाय जानकर वह ऐसा करने के लिए तैयार हो गया। उसने <a
href="/dharmraj-ji-ki-aarti/">धर्मराज</a> के आशीष से अपनी आधी आयु प्रमद्वरा को देकर फिर जीवित कर दिया। इसके बाद दोनों का विवाह हो गया। पढ़ें कैसे सम्भव हुआ प्रमद्वरा का जीवित होना <a
href="/mahabharat-adi-parv-hindi/">आदि पर्व</a> के अन्तर्गत <a
href="/paulom-parv-chapert-4-mahabharat-hindi/">पौलोम पर्व</a> के इस अध्याय में। महाभारत की शेष कथा पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – <a
href="/mahabharat-katha-in-hindi/"><strong>महाभारत</strong></a>।</em></p><p>सौतिरुवाच<br><strong>तेषु तत्रोपविष्टेषु ब्राह्मणेषु महात्मसु⁠।<br>रुरुश्चुक्रोश गहनं वनं गत्वातिदुःखितः ⁠॥⁠ १ ⁠॥<br>शोकेनाभिहतः सोऽथ विलपन् करुणं बहु⁠।<br>अब्रवीद् वचनं शोचन् प्रियां स्मृत्वा प्रमद्वराम् ⁠॥⁠ २ ⁠॥<br>शेते सा भुवि तन्वङ्गी मम शोकविवर्धिनी⁠।<br>बान्धवानां च सर्वेषां किं नु दुःखमतः परम् ⁠॥⁠ ३ ⁠॥<br>उग्रश्रवाजी कहते हैं—</strong>शौनक जी! वे ब्राह्मण प्रमद्वरा के चारों ओर वहाँ बैठे थे, उसी समय रुरु अत्यन्त दुःखित हो गहन वन में जाकर जोर-जोर से रुदन करने लगा। शोक से पीड़ित होकर उसने बहुत करुणाजनक विलाप किया और अपनी प्रियतमा प्रमद्वरा का स्मरण कर के शोक-मग्न हो इस प्रकार बोला—‘हाय! वह कृशांगी बाला मेरा तथा समस्त बान्धवों का शोक बढ़ाती हुई भूमि पर सो रही है; इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है? ⁠॥⁠ १—३ ⁠॥</p><p><strong>यदि दत्तं तपस्तप्तं गुरवो वा मया यदि⁠।<br>सम्यगाराधितास्तेन संजीवतु मम प्रिया ⁠॥⁠ ४ ⁠॥<br></strong>‘यदि मैंने दान दिया हो, तपस्या की हो अथवा गुरुजनों की भली-भाँति आराधना की हो तो उसके पुण्य से मेरी प्रिया जीवित हो जाय ⁠॥⁠ ४ ⁠॥</p><p><strong>यथा च जन्मप्रभृति यतात्माहं धृतव्रतः⁠।<br>प्रमद्वरा तथा ह्येषा समुत्तिष्ठतु भामिनी ⁠॥⁠ ५ ⁠॥<br></strong>‘यदि मैंने जन्म से लेकर अब तक मन और इन्द्रियों पर संयम रखा हो और ब्रह्मचर्य आदि व्रतों का दृढ़तापूर्वक पालन किया हो तो यह मेरी प्रिया प्रमद्वरा अभी जी उठे’ ⁠॥⁠ ५ ⁠॥</p><p><strong>(कृष्णे विष्णौ हृषीकेशे लोकेशेऽसुरविद्विषि⁠।<br>यदि मे निश्चला भक्तिर्मम जीवतु सा प्रिया ⁠॥)<br></strong>‘यदि पापी असुरों का नाश करने वाले, इन्द्रियों के स्वामी जगदीश्वर एवं सर्वव्यापी <a
href="/krishn-chalisa-in-hindi/">भगवान् श्रीकृष्ण</a> में मेरी <a
href="/bhakti-bharat-mein-vivekananda-2/">अविचल भक्ति </a>हो तो यह कल्याणी प्रमद्वरा जी उठे’।<br><strong><br>एवं लालप्यतस्तस्य भार्यार्थे दुःखितस्य च⁠।<br>देवदूतस्तदाभ्येत्य वाक्यमाह रुरुं वने ⁠॥⁠ ६ ⁠॥<br></strong>इस प्रकार जब रुरु पत्नी के लिये दुःखित हो अत्यन्त विलाप कर रहा था, उस समय एक देवदूत उसके पास आया और वन में रुरु से बोला ⁠॥⁠ ६ ⁠॥</p><p>देवदूत उवाच<br><strong>अभिधत्से ह यद् वाचा रुरो दुःखेन तन्मृषा⁠।<br>यतो मर्त्यस्य धर्मात्मन् नायुरस्ति गतायुषः ⁠॥⁠ ७ ⁠॥<br>गतायुरेषा कृपणा गन्धर्वाप्सरसोः सुता⁠।<br>तस्माच्छोके मनस्तात मा कृथास्त्वं कथंचन ⁠॥⁠ ८ ⁠॥<br>देवदूत ने कहा—</strong>धर्मात्मा रुरु! तुम दुःख से व्याकुल हो अपनी वाणी द्वारा जो कुछ कहते हो, वह सब व्यर्थ है; क्योंकि जिस मनुष्य की आयु समाप्त हो गयी है, उसे फिर आयु नहीं मिल सकती। यह बेचारी प्रमद्वरा गन्धर्व और अप्सरा की पुत्री थी। इसे जितनी आयु मिली थी, वह पूरी हो चुकी है। अतः तात! तुम किसी तरह भी मन को शोक में न डालो ⁠॥⁠ ७-८ ⁠॥</p><p><strong>उपायश्चात्र विहितः पूर्वं देवैर्महात्मभिः⁠।<br>तं यदीच्छसि कर्तुं त्वं प्राप्स्यसीह प्रमद्वराम् ⁠॥⁠ ९ ⁠॥<br></strong>इस विषय में महात्मा देवताओं ने एक उपाय निश्चित किया है। यदि तुम उसे करना चाहो तो इस लोक में प्रमद्वरा को पा सकोगे ⁠॥⁠ ९ ⁠॥</p><p><strong>क उपायः कृतो देवैर्ब्रूहि तत्त्वेन खेचर⁠।<br>करिष्येऽहं तथा श्रुत्वा त्रातुमर्हति मां भवान् ⁠॥⁠ १० ⁠॥<br>रुरु बोला—</strong>आकाशचारी देवदूत! देवताओं ने कौन-सा उपाय निश्चित किया है, उसे ठीक-ठीक बताओ? उसे सुनकर मैं अवश्य वैसा ही करूँगा। तुम मुझे इस दुःख से बचाओ ⁠॥⁠ १० ⁠॥</p><p>देवदूत उवाच<br><strong>आयुषोउर्धं प्रयच्छ त्वं कन्यायै भृगुनन्दन⁠।<br>एवमुत्थास्यति रुरो तव भार्या प्रमद्वरा ⁠॥⁠ ११ ⁠॥<br>देवदूत ने कहा—</strong><span
style="text-decoration: underline;">भृगु</span>-नन्दन रुरु! तुम उस कन्या के लिये अपनी आधी आयु दे दो। ऐसा करने से तुम्हारी भार्या प्रमद्वरा जी उठेगी ⁠॥⁠ ११ ⁠॥</p><p>रुरुरुवाच<br><strong>आयुषोऽर्धं प्रयच्छामि कन्यायै खेचरोत्तम⁠।<br>शृङ्गाररूपाभरणा समुत्तिष्ठतु मे प्रिया ⁠॥⁠ १२ ⁠॥<br>रुरु बोला—</strong>देवश्रेष्ठ! मैं उस कन्या को अपनी आधी आयु देता हूँ। मेरी प्रिया अपने शृंगार, सुन्दर रूप और आभूषणों के साथ जीवित हो उठे ⁠॥⁠ १२ ⁠॥</p><p>सौतिरुवाच<br><strong>ततो गन्धर्वराजश्च देवदूतश्च सत्तमौ⁠।<br>धर्मराजमुपेत्येदं वचनं प्रत्यभाषताम् ⁠॥⁠ १३ ⁠॥<br>उग्रश्रवा जी कहते हैं—</strong>तब गन्धर्वराज विश्वावसु और देवदूत दोनों सत्पुरुषों ने धर्मराज के पास जाकर कहा— ⁠॥⁠ १३ ⁠॥</p><p><strong>धर्मराजायुषोऽर्धेन रुरोर्भार्या प्रमद्वरा⁠।<br>समुत्तिष्ठतु कल्याणी मृतैवं यदि मन्यसे ⁠॥⁠ १४ ⁠॥<br></strong>‘धर्मराज! रुरु की भार्या कल्याणी प्रमद्वरा मर चुकी है। यदि आप मान लें तो वह रुरु की आधी आयु से जीवित हो जाय’ ॥⁠ १४ ⁠॥</p><p>धर्मराज उवाच<br><strong>प्रमद्वरां रुरोर्भार्यां देवदूत यदीच्छसि⁠।<br>उत्तिष्ठत्वायुषोऽर्धेन रुरोरेव समन्विता ⁠॥⁠ १५ ⁠॥<br>धर्मराज बोले—</strong>देवदूत! यदि तुम रुरु की भार्या प्रमद्वरा को जिलाना चाहते हो तो वह रुरु की ही आधी आयु से संयुक्त होकर जीवित हो उठे ⁠॥⁠ १५ ⁠॥</p><p>सौतिरुवाच<br><strong>एवमुक्ते ततः कन्या सोदतिष्ठत् प्रमद्वरा⁠।<br>रुरोस्तस्यायुषोऽर्धेन सुप्तेव वरवर्णिनी ⁠॥⁠ १६ ⁠॥<br>उग्रश्रवा जी कहते हैं—</strong> <a
href="/dharmraj-ji-ki-aarti/">धर्मराज</a> के ऐसा कहते ही वह सुन्दरी मुनि-कन्या प्रमद्वरा रुरु की आधी आयु से संयुक्त हो सोयी हुई की भाँति जाग उठी ⁠॥⁠ १६ ⁠॥</p><p><strong>एतद् दृष्टं भविष्ये हि रुरोरुत्तमतेजसः⁠।<br>आयुषोऽतिप्रवृद्धस्य भार्यार्थेऽर्धमलुप्यत ⁠॥⁠ १७ ⁠॥<br>तत इष्टेऽहनि तयोः पितरौ चक्रतुर्मुदा⁠।<br>विवाहं तौ च रेमाते परस्परहितैषिणौ ⁠॥⁠ १८ ⁠॥<br></strong>उत्तम तेजस्वी रुरु के भाग्य में ऐसी बात देखी गयी थी। उनकी आयु बहुत बढ़ी-चढ़ी थी। जब उन्होंने भार्या के लिये अपनी आधी आयु दे दी, तब दोनों के पिताओं ने निश्चित दिन में प्रसन्नतापूर्वक उनका विवाह कर दिया। वे दोनों दम्पति एक-दूसरे के हितैषी होकर आनन्दपूर्वक रहने लगे ⁠॥⁠ १७-१८ ⁠॥</p><p><strong>स लब्ध्वा दुर्लभां भार्यां पद्मकिञ्जल्कसुप्रभाम्⁠।<br>व्रतं चक्रे विनाशाय जिह्मगानां धृतव्रतः ⁠॥⁠ १९ ⁠॥<br></strong>कमल के केसर की-सी कान्तिवाली उस दुर्लभ भार्या को पाकर व्रतधारी रुरु ने सर्पों के विनाश का निश्चय कर लिया ⁠॥⁠ १९&nbsp; ॥</p><p><strong>स दृष्ट्वा जिह्मगान् सर्वांस्तीव्रकोपसमन्वितः⁠।<br>अभिहन्ति यथासत्त्वं गृह्य प्रहरणं सदा ⁠॥⁠ २० ⁠॥<br></strong>वह सर्पों को देखते ही अत्यन्त क्रोध में भर जाता और हाथ में डंडा ले उन पर यथाशक्ति प्रहार करता था ⁠॥⁠ २० ⁠॥</p><p><strong>स कदाचिद् वनं विप्रो रुरुरभ्यागमन्महत्⁠।<br>शयानं तत्र चापश्यद् डुण्डुभं वयसान्वितम् ⁠॥⁠ २१ ⁠॥<br></strong>एक दिनकी बात है, ब्राह्मण रुरु किसी विशाल वन में गया, वहाँ उसने डुण्डुभ जाति के एक बूढ़े साँप को सोते देखा ⁠॥⁠ २१ ⁠॥</p><p><strong>तत उद्यम्य दण्डं स कालदण्डोपमं तदा⁠।<br>जिघांसुः कुपितो विप्रस्तमुवाचाथ डुण्डुभः ⁠॥⁠ २२ ⁠॥<br></strong>उसे देखते ही उसके क्रोध का पारा चढ़ गया और उस ब्राह्मण ने उस समय सर्प को मार डालने की इच्छा से कालदण्ड के समान भयंकर डंडा उठाया। तब उस डुण्डुभ ने मनुष्य की बोली में कहा— ⁠॥⁠ २२ ⁠॥</p><p><strong>नापराध्यामि ते किञ्चिदहमद्य तपोधन⁠।<br>संरम्भाच्च किमर्थं मामभिहंसि रुषान्वितः ⁠॥⁠ २३ ⁠॥<br></strong>तपोधन! आज मैंने तुम्हारा कोई अपराध तो नहीं किया है? फिर किसलिये क्रोध के आवेश में आकर तुम मुझे मार रहे हो’ ⁠॥⁠ २३ ⁠॥</p><p
class="has-text-align-center"><strong>इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि पौलोमपर्वणि प्रमद्वराजीवने नवमोऽध्यायः ⁠॥⁠ ९ ⁠॥</strong><br>इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत पौलोमपर्वमें प्रमद्वराके जीवित होनेसे सम्बन्ध रखनेवाला नवाँ अध्याय पूरा हुआ ⁠॥⁠ ९ ⁠॥<br>(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २४ श्लोक हैं)</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/pramadvara-ka-jeevit-hona-chapert-9-paulom-parv-mahabharat-hindi/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>प्रमद्वरा को सर्पदंश – महाभारत का आठवाँ अध्याय (पौलोमपर्व)</title><link>https://hindipath.com/pramadvara-ko-sarp-dansh-chapert-8-paulom-parv-mahabharat-hindi/</link> <comments>https://hindipath.com/pramadvara-ko-sarp-dansh-chapert-8-paulom-parv-mahabharat-hindi/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 14 Oct 2021 10:25:34 +0000</pubDate> <category><![CDATA[ग्रंथ]]></category> <category><![CDATA[धर्म]]></category> <category><![CDATA[Pramadvara]]></category> <category><![CDATA[Ruru]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=8814</guid><description><![CDATA[<p>&#8220;प्रमद्वरा को सर्पदंश&#8221; नामक यह कथा महाभारत का अष्टम अध्याय है। यह कथा आदिपर्व के अन्तर्गत पौलोम पर्व में आती</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/pramadvara-ko-sarp-dansh-chapert-8-paulom-parv-mahabharat-hindi/">प्रमद्वरा को सर्पदंश – महाभारत का आठवाँ अध्याय (पौलोमपर्व)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;प्रमद्वरा को सर्पदंश&#8221; नामक यह कथा महाभारत का अष्टम अध्याय है। यह कथा <a
href="/mahabharat-adi-parv-hindi/">आदिपर्व </a>के अन्तर्गत <a
href="/paulom-parv-chapert-4-mahabharat-hindi/">पौलोम पर्व</a> में आती है। इसमें <a
href="/agni-ke-shap-ka-mochan-chapert-7-paulom-parv-mahabharat-hindi/">पिछली कथा &#8220;अग्नि के शाप का मोचन&#8221;</a> के आगे का घटनाक्रम वर्णित है। इस अध्याय में कुल २७ श्लोक हैं। कथानक के अनुसार प्रमति के पुत्र रुरु मेनका अप्सरा की पुत्री प्रमद्वरा से प्रेम करने लगते हैं।</p><p>उन दोनों का विवाह भी तय हो जाता है, लेकिन वन में विचरण करते समय प्रमद्वरा को एक साँप काट लेता है। इस सर्पदंश से वह चेतना-शून्य होकर गिर पड़ती है। उसकी मृत्यु हो जाती है। उसके सभी सगे-संबंधियों को प्रमद्वरा को सर्पदंश की बात जब पता चलती है, तो वे रोते-बिलखते उसके समीप जा बैठते हैं। महाभारत के शेष अध्याय पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – <a
href="/mahabharat-katha-in-hindi/"><strong>हिंदी में महाभारत</strong></a>।</p><p>सौतिरुवाच<br><strong>स चापि च्यवनो ब्रह्मन् भार्गवोऽजनयत् सुतम्।<br>सुकन्यायां महात्मानं प्रमतिं दीप्ततेजसम् ⁠॥⁠ १ ⁠॥<br>प्रमतिस्तु रुरुं नाम घृताच्यां समजीजनत्।<br>रुरुः प्रमद्वरायां तु शुनकं समजीजनत् ⁠॥⁠ २ ⁠॥<br></strong>उग्रश्रवा जी कहते हैं—ब्रह्मन्! <a
href="/tag/bhrigu/">महर्षि भृगु</a> के पुत्र च्यवन ने अपनी पत्नी सुकन्या के गर्भ से एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम प्रमति था। महात्मा प्रमति बड़े तेजस्वी थे। फिर प्रमति ने घृताची अप्सरा से रुरु नामक पुत्र उत्पन्न किया तथा रुरु के द्वारा प्रमद्वरा के गर्भ से शुनक का जन्म हुआ ⁠॥⁠ १-२ ⁠॥</p><p><strong>(शौनकस्तु महाभाग शुनकस्य सुतो भवान्।<br>शुनकस्तु महासत्त्वः सर्वभार्गवनन्दनः।<br>जातस्तपसि तीव्रे च स्थितः स्थिरयशास्ततः ⁠॥⁠ ३ ⁠॥<br></strong>महाभाग शौनकजी! आप शुनक के ही पुत्र होने के कारण ‘शौनक’ कहलाते हैं। शुनक महान् सत्त्व गुण से सम्पन्न तथा सम्पूर्ण भृगुवंश का आनन्द बढ़ाने वाले थे। वे जन्म लेते ही तीव्र तपस्या में संलग्न हो गये। इससे उनका अविचल यश सब ओर फैल गया ⁠॥⁠ ३ ⁠॥</p><p><strong>तस्य ब्रह्मन् रुरोः सर्वं चरितं भूरितेजसः।<br>विस्तरेण प्रवक्ष्यामि तच्छृणु त्वमशेषतः ⁠॥⁠ ४ ⁠॥<br></strong>ब्रह्मन्! मैं महातेजस्वी रुरु के सम्पूर्ण चरित्र का विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा। वह सब-का-सब आप सुनिये ⁠॥⁠ ४ ⁠॥</p><p><strong>ऋषिरासीन्महान् पूर्वं तपोविद्यासमन्वितः।<br>स्थूलकेश इति ख्यातः सर्वभूतहिते रतः ⁠॥⁠ ५ ⁠॥<br></strong>पूर्वकाल में स्थूलकेश नाम से विख्यात एक तप और विद्या से सम्पन्न महर्षि थे; जो समस्त प्राणियों के हित में लगे रहते थे ⁠॥⁠ ५ ⁠॥<br><br><strong>एतस्मिन्नेव काले तु मेनकायां प्रजज्ञिवान्।<br>गन्धर्वराजो विप्रर्षे विश्वावसुरिति स्मृतः ⁠॥⁠ ६ ⁠॥<br></strong>विप्रर्षे! इन्हीं महर्षि के समय की बात है—गन्धर्वराज विश्वावसु ने मेनका के गर्भ से एक संतान उत्पन्न की ⁠॥⁠ ६ ⁠॥<br><br><strong>अप्सरा मेनका तस्य तं गर्भं भृगुनन्दन।<br>उत्ससर्ज यथाकालं स्थूलकेशाश्रमं प्रति ⁠॥⁠ ७ ⁠॥<br></strong>भृगुनन्दन! मेनका अप्सरा ने गन्धर्वराज द्वारा स्थापित किये हुए उस गर्भ को समय पूरा होने पर स्थूलकेश मुनि के आश्रम के निकट जन्म दिया ⁠॥⁠ ७ ⁠॥</p><p><strong>उत्सृज्य चैव तं गर्भं नद्यास्तीरे जगाम सा।<br>अप्सरा मेनका ब्रह्मन् निर्दया निरपत्रपा ⁠॥⁠ ८ ⁠॥<br></strong>ब्रह्मन्! निर्दय और निर्लज्ज मेनका अप्सरा उस नवजात गर्भ को वहीं नदी के तट पर छोड़कर चली गयी ⁠॥⁠ ८ ⁠॥</p><p><strong>कन्याममरगर्भाभां ज्वलन्तीमिव च श्रिया।<br>तां ददर्श समुत्सृष्टां नदीतीरे महानृषिः ⁠॥⁠ ९ ⁠॥<br>स्थूलकेशः स तेजस्वी विजने बन्धुवर्जिताम्।<br>स तां दृष्ट्वा तदा कन्यां स्थूलकेशो महाद्विजः ⁠॥⁠ १० ⁠॥<br>जग्राह च मुनिश्रेष्ठः कृपाविष्टः पुपोष च।<br>ववृधे सा वरारोहा तस्याश्रमपदे शुभे ⁠॥⁠ ११ ⁠॥<br></strong>तदनन्तर तेजस्वी महर्षि स्थूलकेश ने एकान्त स्थान में त्यागी हुई उस बन्धुहीन कन्या को देखा, जो देवताओं की बालिका के समान दिव्य शोभा से प्रकाशित हो रही थी। उस समय उस कन्या को वैसी दशा में देखकर द्विजश्रेष्ठ मुनिवर स्थूलकेश के मनमें बड़ी दया आयी; अतः वे उसे उठा लाये और उसका पालन-पोषण करने लगे। वह सुन्दरी कन्या उनके शुभ आश्रम पर दिनोदिन बढ़ने लगी ⁠॥⁠ ९—११ ⁠॥</p><p><strong>जातकाद्याः क्रियाश्चास्या विधिपूर्वं यथाक्रमम्।<br>स्थूलकेशो महाभागश्चकार सुमहानृषिः ⁠॥⁠ १२ ⁠॥<br></strong>महाभाग महर्षि स्थूलकेश ने क्रमशः उस बालिका के जात-कर्मादि सब संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न किये ⁠॥⁠ १२ ⁠॥</p><p><strong>प्रमदाभ्यो वरा सा तु सत्त्वरूपगुणान्विता।<br>ततः प्रमद्वरेत्यस्या नाम चक्रे महानृषिः ⁠॥⁠ १३ ⁠॥<br></strong>वह बुद्धि, रूप और सब उत्तम गुणों से सुशोभित हो संसार की समस्त प्रमदाओं (सुन्दरी स्त्रियों) से श्रेष्ठ जान पड़ती थी; इसलिये महर्षि ने उसका नाम ‘प्रमद्वरा’ रख दिया ॥⁠ १३ ⁠॥</p><p><strong>तामाश्रमपदे तस्य रुरुर्दृष्ट्वा प्रमद्वराम्।<br>बभूव किल धर्मात्मा मदनोपहतस्तदा ⁠॥⁠ १४ ⁠॥<br></strong>एक दिन धर्मात्मा रुरु ने महर्षि के आश्रम में उस प्रमद्वरा को देखा। उसे देखते ही उनका हृदय तत्काल कामदेव के वशीभूत हो गया ⁠॥⁠ १४ ⁠॥</p><p><strong>पितरं सखिभिः सोऽथ श्रावयामास भार्गवम्।<br>प्रमतिश्चाभ्ययाचत् तां स्थूलकेशं यशस्विनम् ⁠॥⁠ १५ ⁠॥<br></strong>तब उन्होंने मित्रों द्वारा अपने पिता भृगुवंशी प्रमति को अपनी अवस्था कहलायी। तदनन्तर प्रमति ने यशस्वी स्थूलकेश मुनि से (अपने पुत्रके लिये) उनकी वह कन्या माँगी ⁠॥⁠ १५ ⁠॥</p><p><strong>ततः प्रादात् पिता कन्यां रुरवे तां प्रमद्वराम्।<br>विवाहं स्थापयित्वाग्रे नक्षत्रे भगदैवते ⁠॥⁠ १६ ⁠॥<br></strong>तब पिता ने अपनी कन्या प्रमद्वरा का रुरु के लिये वाग्दान कर दिया और आगामी उत्तरफाल्गुनी नक्षत्र में विवाह का मुहूर्त निश्चित किया ⁠॥⁠ १६ ⁠॥</p><p><strong>ततः कतिपयाहस्य विवाहे समुपस्थिते।<br>सखीभिः क्रीडती सार्धं सा कन्या वरवर्णिनी ⁠॥⁠ १७ ⁠॥<br></strong>तदनन्तर जब विवाह का मुहूर्त निकट आ गया, उसी समय वह सुन्दरी कन्या सखियों के साथ क्रीड़ा करती हुई वन में घूमने लगी ⁠॥⁠ १७ ⁠॥</p><p><strong>नापश्यत् सम्प्रसुप्तं वै भुजङ्गं तिर्यगायतम्।<br>पदा चैनं समाक्रामन्मुमूर्षुः कालचोदिता ⁠॥⁠ १८ ⁠॥<br></strong>मार्ग में एक साँप चौड़ी जगह घेरकर तिरछा सो रहा था। प्रमद्वरा ने उसे नहीं देखा। वह काल से प्रेरित होकर मरना चाहती थी, इसलिये सर्प को पैर से कुचलती हुई आगे निकल गयी ⁠॥⁠ १८ ⁠॥</p><p><strong>स तस्याः सम्प्रमत्तायाश्चोदितः कालधर्मणा।<br>विषोपलिप्तान् दशनान् भृशमङ्गे न्यपातयत् ⁠॥⁠ १९ ⁠॥<br></strong>उस समय कालधर्म से प्रेरित हुए उस सर्प ने उस असावधान कन्या के अंग में बड़े जोर से अपने विष भरे दाँत गड़ा दिये&nbsp; ॥⁠ १९ ⁠॥</p><p><strong>सा दष्टा तेन सर्पेण पपात सहसा भुवि।<br>विवर्णा विगतश्रीका भ्रष्टाभरणचेतना ⁠॥⁠ २० ⁠॥<br>निरानन्दकरी तेषां बन्धूनां मुक्तमूर्धजा।<br>व्यसुरप्रेक्षणीया सा प्रेक्षणीयतमाभवत् ⁠॥⁠ २१ ⁠॥ <br></strong>उस सर्प के डँस लेने पर वह सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ी। उसके शरीर का रंग उड़ गया, शोभा नष्ट हो गयी, आभूषण इधर-उधर बिखर गये और चेतना लुप्त हो गयी। उसके बाल खुले हुए थे। अब वह अपने उन बन्धुजनों के हृदय में विषाद उत्पन्न कर रही थी। जो कुछ ही क्षण पहले अत्यन्त सुन्दरी एवं दर्शनीय थी, वही प्राणशून्य होने के कारण अब देखने योग्य नहीं रह गयी ⁠॥⁠ २०-२१ ⁠॥<br><br><strong>प्रसुप्ते वाभवच्चापि भुवि सर्पविषार्दिता।<br>भूयो मनोहरतरा बभूव तनुमध्यमा ⁠॥⁠ २२ ⁠॥<br></strong>वह सर्प के विष से पीड़ित होकर गाढ़ निद्रा में सोयी हुई की भाँति भूमि पर पड़ी थी। उसके शरीर का मध्यभाग अत्यन्त कृश था। वह उस अचेतनावस्थामें भी अत्यन्त मनोहारिणी जान पड़ती थी ⁠॥⁠ २२ ⁠॥</p><p><strong>ददर्श तां पिता चैव ये चैवान्ये तपस्विनः।<br>विचेष्टमानां पतितां भूतले पद्मवर्चसम् ⁠॥⁠ २३ ⁠॥<br></strong>उसके पिता स्थूलकेश ने तथा अन्य तपस्वी महात्माओं ने भी आकर उसे देखा। वह कमल की-सी कान्ति वाली किशोरी धरती पर चेष्टा-रहित पड़ी थी ⁠॥⁠ २३ ⁠॥</p><p><strong>ततः सर्वे द्विजवराः समाजग्मुः कृपान्विताः।<br>स्वस्त्यात्रेयो महाजानुः कुशिकः शङ्खमेखलः ⁠॥⁠ २४ ⁠॥<br>उद्दालकः कठश्चैव श्वेतश्चैव महायशाः।<br>भरद्वाजः कौणकुत्स्य आर्ष्टिषेणोऽथ गौतमः ⁠॥⁠ २५ ⁠॥<br>प्रमतिः सह पुत्रेण तथान्ये वनवासिनः।<br></strong>तदनन्तर स्वस्त्यात्रेय, महाजानु, कुशिक, शंखमेखल, उद्दालक, कठ, महायशस्वी श्वेत, भरद्वाज, कौणकुत्स्य, आर्ष्टिषेण, गौतम, अपने पुत्र रुरु सहित प्रमति तथा अन्य सभी वनवासी श्रेष्ठ द्विज दया से द्रवित होकर वहाँ आये ⁠॥⁠ २४-२५ ⁠॥</p><p><strong>तां ते कन्यां व्यसुं दृष्ट्वा भुजङ्गस्य विषार्दिताम् ⁠॥⁠ २६ ⁠॥<br>रुरुदुः कृपयाविष्टा रुरुस्त्वार्तो बहिर्ययौ।<br>ते च सर्वे द्विजश्रेष्ठास्तत्रैवोपाविशंस्तदा ⁠॥⁠ २७ ⁠॥<br></strong>वे सब लोग उस कन्या को सर्प के विष से पीड़ित हो प्राणशून्य हुई देख करुणावश रोने लगे। रुरु तो अत्यन्त आर्त होकर वहाँ से बाहर चला गया और शेष सभी द्विज उस समय वहीं बैठे रहे ⁠॥⁠ २६-२७ ⁠॥</p><p
class="has-text-align-center"><strong>इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि पौलोमपर्वणि प्रमद्वरासर्पदंशेऽष्टमोऽध्यायः ⁠॥⁠ ८ ⁠॥<br></strong>इस प्रकार श्री महाभारत आदिपर्व के अन्तर्गत पौलोमपर्व में प्रमद्वरा को सर्पदंश से सम्बन्ध रखने वाला आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ⁠॥⁠ ८ ⁠॥<br>(दाक्षिणात्य अधिक पाठ का&nbsp; श्लोक मिलाकर कुल २७ श्लोक हैं)</p><p>The post <a
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