भक्ति – स्वामी विवेकानंद

(९ नवम्बर १८९७ को लाहौर में दिया गया व्याख्यान)

समस्त उपनिषदों के गम्भीरनिनादी प्रवाह के अन्तराल से, बड़ी दूर से आनेवाली प्रतिध्वनि की तरह, एक शब्द हमारे कानों तक पहुँचता है। यद्यपि उसके आयतन और उच्चता में बहुत कुछ वृद्धि हुई है, फिर भी समग्र वेदान्त-साहित्य में, स्पष्ट होने पर भी वह उतना प्रबल नहीं है। उपनिषदों का प्रधान उद्देश्य हमारे आगे भूमा का भाव और चित्र अंकित करना ही जान पड़ता है। फिर भी इस अपूर्व उदात्त भाव के पीछे कहीं कहीं हमें कवित्व का भी आभास मिलता है, जैसे हम पढ़ते हैं :

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम्।
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः॥1

‘वहाँ सूर्य प्रकाश नहीं करता; चन्द्र और सितारे भी वहाँ नहीं हैं, ये बिजलियाँ भी वहाँ नहीं चमकतीं, फिर इस भौतिक अग्नि का तो कहना ही क्या है।’ इन दोनों अद्भुत पंक्त्तियों का अपूर्व हृदयस्पर्शी कवित्व सुनते सुनते हम मानो इस इंद्रियगम्य जगत् से – यहाँ तक कि बुद्धिजगत् से भी दूर, बहुत दूर, ऐसे एक जगत् में जा पहुँचते हैं जिसे किसी काल में ज्ञान का विषय नहीं बनाया जा सकता, यद्यपि वह सदा हमारे पास ही मौजूद रहता है। इसी महान् भाव की छाया की तरह उसका अनुगामी एक और महान् भाव है, जो जिसको मानवजाति और भी आसानी के साथ प्राप्त कर सकती है, जो मनुष्य के दैनिक जीवन में अनुसरण करने के अधिक उपयुक्त है, और जिसे मानवजीवन के प्रत्येक विभाग में प्रविष्ट कराया जा सकता है। वह क्रमशः पुष्ट होता आया है और परवर्ती युगों में पुराणों में और भी पूर्णता के साथ, और भी स्पष्ट भाषा में व्यक्त किया गया है – और वह है भक्ति का आदर्श। भक्ति का बीज पहले से ही विद्यमान है, संहिताओं में भी इसका थोड़ा बहुत परिचय मिलता है, उससे कुछ अधिक विकास उपनिषदों में देखने में आता है, किन्तु पुराणों में उसका विस्तृत निरूपण दिखाई देता है।

अतः भक्ति को भली भाँति समझने के लिए हमें अपने पुराणों को समझना होगा। इस बीच पुराणों की प्रामाणिकता को लेकर बहुत कुछ वाद-विवाद हो चुका है, कितने ही अनिश्चित और असम्बद्ध अंशों को लेकर आलोचना-प्रत्यालोचना हो चुकी है, कितने ही समालोचकों ने कई अंशों के विषय में यह दिखाया है कि वर्तमान विज्ञान के आलोक में वे ठहर नहीं सकते, आदि आदि। परन्तु इन वाद-विवादों को छोड़ देने पर, पौराणिक उक्त्तियों के वैज्ञानिक भौगोलिक और ज्योतिषिक सत्यासत्य का निर्णय करना छोड़ देने पर, तथा प्रायः सभी पुराणों का आरम्भ से अन्त तक भली भाँति निरीक्षण करने पर हमें एक तत्त्व निश्चित और स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, वह है भक्तिवाद। साधु, महात्मा और राजर्षियों के चरित का वर्णन करते हुए भक्तिवाद बारम्बार उल्लिखित, उदाहृत और आलोचित हुआ है। सौन्दर्य के महान् आदर्श – भक्ति के आदर्श दृष्टान्तों को समझाना और दर्शाना ही सब पुराणों का प्रधान उद्देश्य जान पड़ता है। मैंने पहले ही कहा है कि यह आदर्श साधारण मनुष्यों के लिए अधिकतर उपयोगी है। ऐसे लोग बहुत कम हैं, जो वेदान्तालोक की पूर्ण छटा का वैभव समझ सकते हों, अथवा उसका यथोचित आदर कर सकते हों – उनके तत्त्वों पर अमल करना बड़ी दूर की बात है। क्योंकि वास्तविक वेदान्ती का सबसे पहला काम है ‘अभीः’ अर्थात् निर्भीक होना। यदि कोई वेदान्ती होने का दावा करता हो तो उसे अपने हृदय से भय को सदा के लिए निर्वासित कर देना होगा। और हम जानते हैं कि ऐसा करना कितना कठिन है। जिन्होंने संसार के सब प्रकार के लगाव छोड़ दिये हैं, और जिनके ऐसे बन्धन बहुत ही कम रह गये हैं जो उन्हें दुर्बलहृदय कापुरुष बना सकते हों, वे भी मन ही मन इस बात को अनुभव करते हैं कि वे समय समय पर कितने दुर्बल और कैसे निर्वीर्य हो जाते हैं। जिन लोगों के चारों ओर ऐसे बन्धन हैं, जो भीतर-बाहर सर्वत्र हजारों विषयों में उलझे हुए हैं, जीवन में प्रत्येक क्षण विषयों का दासत्व जिन्हें नीचे से नीचे लिए जा रहा है, वे कितने दुर्बल होते हैं, क्या यह भी कहना होगा? हमारे पुराण ऐसे ही लोगों को भक्ति का अत्यन्त मनोहारी सन्देश देते हैं।

इन्हीं लोगों के लिए सुकोमल और कवित्वमय भावों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है, ध्रुव, प्रह्लाद तथा अन्यान्य सैकड़ों हजारों सन्तों की अद्भुत और अनोखी जीवनकथाएँ वर्णित की गयी हैं। इन दृष्टान्तों का उद्देश्य यही है कि लोग उस भक्ति का अपने अपने जीवन में विकास करें और उन्हें इन दृष्टान्तों द्वारा रास्ता साफ दिखाई दे। तुम लोग पुराणों की वैज्ञानिक सत्यता पर विश्वास करो या न करो, पर तुम लोगों में ऐसा कोई भी आदमी नहीं है, जिस पर प्रह्लाद, ध्रुव या इन पौराणिक सन्तों के आख्यानों में से किसी एक का कुछ भी असर न पड़ा हो। और यह भी नहीं कहा जा सकता कि इन पुराणों की उपयोगिता केवल आजकल के जमाने में ही है, पहले नहीं थी। पुराणों के प्रति हमारे कृतज्ञ रहने का एक और कारण यह भी है कि पिछले युग में अवनत बौद्ध धर्म हमें जिस राह से ले चल रहा था, पुराणों ने उसकी अपेक्षा प्रशस्ततर, उन्नततर और सर्वसाधारण के उपयुक्त धर्ममार्ग बताया। उनमें भक्ति का सहज और सरल भाव सुबोध भाषा में व्यक्त अवश्य किया गया है, पर उतने से ही काम नहीं चलेगा। हमें अपने दैनिक जीवन में उस भाव का व्यवहार करना होगा। ऐसा करने से हम देखेंगे कि भक्ति का वही भाव क्रमशः परिस्फुट होकर अन्त में प्रेम का सारभूत बन जाता है। जब तक व्यक्तिगत और जड़ वस्तुओं के प्रति प्रीति रहेगी, तब तक कोई पुराणों के उपदेशों से आगे न बढ़ सकेगा। जब तक दूसरों की सहायता अपेक्षित रहेगी, अथवा दूसरों पर निर्भर किया जाएगा, जब तक यह मानवीय दुर्बलता बनी रहेगी, तब तक ये पुराण भी किसी न किसी रूप में मौजूद रहेंगे। तुम उन पुराणों के नाम बदल सकते हो, उनकी निन्दा कर सकते हो, पर तुमको दूसरे कुछ नये पुराण बना लेने ही पड़ेंगे। अगर हम लोगों में किसी ऐसे महापुरुष का आविर्भाव हो जो इन पुराणों को ग्रहण करना अस्वीकार कर दे, तो तुम देखोगे कि उनके देहान्त हो जाने के बीस ही वर्ष बाद उनके शिष्यों ने उनके जीवन के आधार पर एक नया पुराण रच डाला है। बस यही अन्तर होगा।

मनुष्य की प्रकृति यही चाहती है; उसके लिए ये आवश्यक हैं। पुराणों की आवश्यकता केवल उन्हीं लोगों को नहीं है जो सारी मानवीय दुर्बलताओं के परे होकर परमहंसोचित निर्भिकता प्राप्त कर चुके हैं, जिन्होंने माया के सारे बन्धन काट डाले हैं, यहाँ तक कि स्वाभाविक अभावों तक को भी पार कर गये हैं जो सब कुछ जीत चुके हैं और जो इस लोक में देवता हैं, केवल ऐसे महापुरुषों को ही पुराणों की आवश्यकता नहीं है। सगुण रूप में ईश्वर की उपासना किये बिना साधारण मनुष्य का काम नहीं चल सकता। यदि वह प्रकृति के मध्यस्थित भगवान् की पूजा नहीं करता, तो उसे स्त्री, पुत्र, पिता, भाई, आचार्य या किसी न किसी व्यक्ति को भगवान् के स्थान पर प्रतिष्ठित करके उसकी पूजा करनी पड़ती है। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को ऐसा करने की अधिक आवश्यकता पड़ती है। प्रकाश का स्पन्दन सर्वत्र रहता है। बिल्ली या उसी श्रेणी के अन्य जानवर अँधेरे में भी देख पाते है। इसी बात पे प्रकाश का स्पन्दन अन्धकार में होना भी सिद्ध होता है। परन्तु हम यदि किसी चीज को देखना चाहते हैं, तो उस चीज में उसी स्तर के अनुकूल स्पन्दन होना चाहिए, जिस स्तर में हम लोग मौजूद हैं। मतलब यह कि हम एक निर्गुण, निराकार सत्ता के विषय में बातचीत या चर्चा भले ही करें, पर जब तक हम लोग इस मर्त्यलोक के साधारण मनुष्य की स्थिति में रहेंगे, तब तक हमें मनुष्यों में ही भगवान् को देखना पड़ेगा। इसीलिए हमारी भगवान्-विषयक धारणा एवं उपासना स्वभावतः मानुषी है। सचमुच ही ‘यह शरीर भगवान् का सर्वश्रेष्ठ मन्दिर है।’ इसी से हम देखते हैं कि युगों से मनुष्य मनुष्य की ही उपासना करता आ रहा है। लोगों का इस मनुष्योपासना के विषय में जब कभी स्वाभाविक रूप से विकसित अमिताचार देखने में आता है, तो उनकी निन्दा या आलोचना भी होती है। फिर भी हमें यह दिखाई देता है कि इसकी रीढ़ काफी मजबूत है। ऊपर की शाखा-प्रशाखाएँ भले ही खरी आलोचना के योग्य हों, पर उनकी जड़ बहुत ही गहराई तक पहुँची हुई और सुदृढ़ है। ऊपरी आडम्बरों के होने पर भी उसमें एक सारतत्त्व है। मैं तुमसे यह कहना नहीं चाहता कि तुम बिना समझे-बूझे किन्हीं पुरानी कथाओं अथवा अवैज्ञानिक अनर्गल सिद्धान्तों को जबरदस्ती गले के नीचे उतार जाओ। दुर्भाग्यवश कई पुराणों में वामाचारी व्याख्याएँ प्रवेश पा गयी है। मैं यह नहीं चाहता कि तुम उन सब पर विश्वास करो। मैं ऐसा करने को नहीं कहता, बल्कि मेरा मतलब यह है कि हमें उस सारतत्त्व को लुप्त नहीं होने देना चाहिए, जो इन पुराणों के अस्तित्व की रक्षा का कारण है। और यह सारतत्त्व है उनमें निहित भक्ति-सम्बन्धी उपदेश, जो धर्म को मनुष्य के दैनिक जीवन में परिणत करने, दर्शनों के उच्चाकाश में विचरण करनेवाले धर्म को साधारण मनुष्यों के लिए दैनिक जीवनोपयोगी एवं व्यावहारिक बनाने के लिए दिये गये हैं।

‘ट्रिब्यून’ में प्रकाशित रिपोर्ट

इस भाषण की जो रिपोर्ट ‘ट्रिब्यून’ में प्रकाशित हुई उसका विवरण निम्नलिखित है :

वक्त्ता महोदय ने भक्ति की साधना में प्रतीक-प्रतिमाओं की उपयोगिता का समर्थन किया और उन्होंने कहा कि मनुष्य इस समय जिस अवस्था में है, ईश्वरेच्छा से यदि ऐसी अवस्था न होती, तो बड़ा अच्छा होता। परन्तु विद्यमान तथ्य का प्रतिवाद व्यर्थ है। मनुष्य चैतन्य और आध्यात्मिकता आदि विषयों पर चाहे जितनी बातें क्यों न बनाए, पर वास्तव में वह अभी जड़भावापन्न ही है। ऐसे जड़ मनुष्य को हाथ पकड़कर धीरे धीरे उठाना होगा – तब तक उठाना होगा, जब तक वह चैतन्यमय, सम्पूर्ण आध्यात्मिक भावापन्न न हो जाए। आजकल के जमाने में निन्यानबे प्रतिशत ऐसे आदमी है, जिनके लिए आध्यात्मिकता को समझना कठिन है। जो प्रेरक शक्तियाँ हमें ढकेलकर आगे बढ़ा रही है, तथा हम जो फल प्राप्त करना चाहते हैं, वे सभी जड़ हैं। हर्बर्ट स्पेन्सर के शब्दों में मेरा कहना है कि हम केवल उसी रास्ते से आगे बढ़ सकते हैं, जो अल्पतम प्रतिरोध का हो। और पुराणप्रणेताओं को यह बात भली भाँति मालूम थी, तभी वे हमारे लिए ऐसी पद्धति बता गये हैं। इस प्रकार के कार्य में पुराणों को विस्मयजनक और बेजोड़ सफलता मिली है। भक्ति का आदर्श अवश्य ही आध्यात्मिक है, पर उसका रास्ता जड़ वस्तु के भीतर से होकर है और इस रास्ते के सिवा दूसरा रास्ता भी नहीं है। अतः, जड़ जगत् में जो कुछ ऐसा है, जो आध्यात्मिकता प्राप्त करने में हमारी सहायता कर सकता है, उसे ग्रहण करना होगा, और उसे इस तरह काम में लाना होगा कि मानव क्रमशः आगे बढ़ता हुआ पूर्ण आध्यात्मिक स्थिति में विकसित हो सके। शास्त्र आरम्भ से ही लिंग, जाति या धर्म का भेदभाव छोड़कर सब को वेद पाठ करने का अधिकार प्रदान करते हैं। हमें भी इसी तरह उदार होना चाहिए। यदि मनुष्य जड़ मन्दिर बनाकर भगवान् में प्रीति कर सके तो अच्छा ही है। यदि भगवान् की मूर्ति बनाकर इस प्रेम के आदर्श पर पहुँचने में मनुष्य को कुछ भी सहायता मिलती है तो उसे एक ही जगह बीस मूर्तियाँ पूजने दो। चाहे कोई भी काम क्यों न हो, यदि उसके द्वारा धर्म के उस उच्चतम आदर्श पर पहुँचने में सहायता मिलती हो तो उसे वह अबाध गति से करने दो, पर हाँ, वह काम नैतिकता के विरुद्ध न हो। ‘नैतिकता के विरुद्ध न हो’, ऐसा इसलिए कहा गया कि नैतिकताविरोधी काम हमारे धर्ममार्ग के सहायक नहीं होते, बल्कि विघ्न ही उपस्थित किया करते हैं।

स्वामी विवेकानंद ने मूर्तिपूजा के विरोध की समीक्षा करते हुए कहा कि भारतवर्ष में सर्वप्रथम कबीर ने ही ईश्वरोपासना के लिए मूर्ति का व्यवहार करने के विरुद्ध आवाज उठायी थी। परन्तु भारत में ऐसे कितने ही बड़े बड़े दार्शनिक और धर्मसंस्थापक हुए हैं, जिन्होंने भगवान् का सगुण रूप अस्वीकार कर निर्भीकता के साथ अपने निर्गुण मत का प्रचार करने पर भी मूर्तिपूजा की निन्दा नहीं की। हाँ, उन्होंने मूर्तिपूजा को उच्च कोटि की उपासना नहीं माना है, और न किसी पुराण में ही मूर्तिपूजन को ऊँचे दर्जे की उपासना ठहराया गया है।

यहूदियों के मूर्तिपूजन के इतिहास का जिक्र करते हुए स्वामीजी ने कहा कि जिहोवा एक सन्दूक के भीतर रहते हैं, ऐसा विश्वास करनेवाले यहूदी लोग भी मूर्तिपूजक ही थे। इस ऐतिहासिक दृष्टान्त के उपस्थित रहते हमें मूर्तिपूजा की केवल इसलिए निन्दा नहीं करनी चाहिए कि और लोग उसे दोषपूर्ण बताते हैं। मूर्ति या किसी और भी जड़ वस्तु के प्रतीक को, जो मनुष्य को धर्म की प्राप्ति में सहायता करे, बिना संकोच ग्रहण करना चाहिए। पर हमारा कोई भी धर्मग्रन्थ ऐसा नहीं है, जो स्पष्ट शब्दों में यह नहीं कहता कि जड़ वस्तु की सहायता से अनुष्ठित होनेवाली उपासना निकृष्ट श्रेणी की है। सारे भारतवर्ष के सब लोगों को बलपूर्वक मूर्तिपूजक बनाने की चेष्टा की गयी थी और इसकी जितनी निन्दा की जाए वह कम है। प्रत्येक व्यक्ति को कैसी उपासना करनी चाहिए, अथवा किस चीज की सहायता से उपासना करनी चाहिए – यह बात जोर जबरदस्ती से या हुक्म से कराने की क्या आवश्यकता पड़ी थी? यह बात अन्य कोई कैसे जान सकता है कि कौन आदमी किस वस्तु के सहारे उन्नति कर सकता है? कोई प्रतिमापूजा द्वारा, कोई अग्निपूजा द्वारा यहाँ तक कि कोई केवल एक खम्भे के सहारे उपासना की सिद्धि प्राप्त कर सकता है, यह किसी और को कैसे मालूम हो सकता है? इन बातों का निर्णय अपने अपने गुरुओं के द्वारा ही होना चाहिए। भक्तिविषयक ग्रन्थों में इष्टदेव-सम्बन्धी जो नियम हैं, उन्हीं में इस बात की व्याख्या देखने में आती है – अर्थात् व्यक्तिविशेष को अपनी विशिष्ट उपासनापद्धति से अपने इष्टदेव के पास पहुँचने के लिए आगे बढ़ना पड़ेगा, और वह जिस निर्वाचित रास्ते से आगे बढ़ेगा, वही उसका इष्ट है। मनुष्य को चलना तो चाहिए अपनी ही उपासनापद्धति के मार्ग से, पर साथ ही उसे अन्य मार्गों की ओर भी सहानुभूति की दृष्टि से देखना चाहिए। और इस मार्ग का अवलम्बन उसको तब तक करना पड़ेगा, जब तक वह अपने निर्दिष्ट स्थान पर नहीं पहुँच जाता – जब तक वह उस केन्द्रस्थल पर नहीं पहुँच जाता, जहाँ जड़ वस्तु की सहायता की कोई आवश्यकता ही नहीं है।

इसी प्रसंग में भारतवर्ष के बहुतेरे स्थानों में प्रचलित कुलगुरु-प्रथा के विषय में, जो एक प्रकार से वंशगत गुरुआई की तरह हो गयी है, सावधान कर देना आवश्यक है। हम शास्त्रों में पढ़ते हैं – ‘जो वेदों का सारतत्त्व समझते हैं, जो निष्पाप हैं, जो धन के लोभ से और किसी प्रकार के स्वार्थ से लोगों को शिक्षा नहीं देते, जिनकी कृपा हेतुविशेष से नहीं प्राप्त होती, वसन्त ऋतु जिस प्रकार पेड़-पौधों और लता-गुल्मों से बदले में कुछ न चाहते हुए उसमें नया जीवन डालकर उन्हें हरा-भरा कर देती है, उन्हें नयी नयी कोपलों, कलियों और फूलों से भर देती है, उसी प्रकार जिनका स्वभाव ही लोगों का कल्याण करना है, जिनका सारा जीवन ही दूसरों के हित के लिए है, जो इसके बदले लोगों से कुछ भी नहीं चाहते, ऐसे महान् व्यक्ति ही गुरु कहलाने योग्य हैं, दूसरे नहीं।’ असद्गुरु के पास तो ज्ञान-लाभ की आशा ही नहीं है, उल्टे उनकी शिक्षा से विपत्ति की ही सम्भावना रहती है, क्योंकि गुरु केवल शिक्षक या उपदेशक ही नहीं है, शिक्षा देना तो उनके कर्तव्य का एक बहुत ही मामूली अंश है। हिन्दुओं का विश्वास है कि गुरु ही शिष्य में शक्ति का संचार करते हैं। इस बात को समझने के लिए जड़ जगत् का ही एक दृष्टान्त ले लो। मानो किसी ने रोगनिवारक टीका नहीं लिया, ऐसी अवस्था में उसके शरीर के अन्दर रोग के दूषित कीटाणुओं के प्रवेश कर जाने की बहुत आशंका है। उसी प्रकार असद्गुरु से शिक्षा लेने में भी बुराइयों के सीख लेने की बहुत कुछ आशंका है। इसलिए भारत से इस कुलगुरु-प्रथा को एकदम उठा देना अत्यन्त आवश्यक हो रहा है। गुरु का काम व्यवसाय न हो जाए, इसे रोकने की चेष्टा करनी होगी, क्योंकि यह एकदम शास्त्रविरुद्ध है। किसी भी आदमी को अपने को गुरु नहीं बतलाना चाहिए और कुलगुरु-प्रथा के कारण जो वर्तमान परिस्थिति है, उसका समर्थन भी नहीं करना चाहिए।

खाद्याखाद्य-विचार के सम्बन्ध में स्वामीजी ने कहा कि आजकल खानपान के विषय में जिन कठोर नियमों पर जोर दिया जाता है, वे अधिकांश छिछले हैं। जिस उद्देश्य से इन नियमों को आरम्भ में चलाया गया था, इस उद्देश्य की सिद्धि नहीं हो पाती। खाद्य वस्तुओं को स्पर्श करने का अधिकार किसे है? – यह प्रश्न विशेष ध्यान देने योग्य है, क्योंकि इसमें एक बड़ा भारी मनोवैज्ञानिक रहस्य छिपा हुआ है। पर साधारण मनुष्यों के दैनिक जीवन में उतनी सावधानी रखना अत्यन्त कठिन ही नहीं, असम्भव भी है। जिन लोगों ने केवल धर्म के लिए ही अपने जीवन का उत्सर्ग कर दिया है, ये नियम केवल उन्हीं के लिए पालनीय हैं, पर इसकी जगह हर एक आदमी के लिए इन नियमों का पालन करना आवश्यक बताकर बड़ी भारी गलती की गयी है। क्योंकि सर्वसाधारण में अधिकतर ऐसे ही लोग हैं जो जड़ जगत् के सुखों से तृप्त नहीं हुए हैं, और ऐसे अतृप्त लोगों पर जबरदस्ती आध्यात्मिकता लादने की चेष्टा व्यर्थ है।

भक्त्तों के लिए जो उपासनापद्धतियाँ हैं, उनमें मनुष्यरूप की उपासना ही सब से उत्तम है। वास्तव में यदि किसी रूप की पूजा करनी है, तो अपनी हैसियत के अनुसार प्रतिदिन छह या बारह दरिद्रों को अपने घर लाकर, उन्हें नारायण समझकर उनकी सेवा करना अच्छा है। मैंने कितनी जगहों में प्रचलित दान की प्रथाएँ देखी हैं, पर उनसे वैसा कोई सुफल होते नहीं देखा है। इसका कारण यही है कि वह दान की क्रिया यथोचित भाव से अनुष्ठित नहीं होती है। ‘अरे! यह ले जा’ – इस प्रकार के दान को दान या दयाधर्म का अनुष्ठान नहीं कह सकते। यह तो हृदय के अहंकार का परिचायक है। इस प्रकार दान देनेवाले का उद्देश्य यही रहता है कि लोग जानें या समझें कि वह दयाधर्म का अनुष्ठान कर रहा है। हिन्दुओं को यह जानना चाहिए कि स्मृतियों के मत में दान ग्रहण करनेवालों की अपेक्षा दान देनेवाला छोटा समझा जाता है। ग्रहण करनेवाला ग्रहण करते समय साक्षात् नारायण समझा जाता है। अतः मेरे मत में यदि इस प्रकार की नयी पूजापद्धति प्रचलित की जाए, तो बड़ा अच्छा हो – कुछ दरिद्रनारायण, अन्धनारायण या क्षुधार्तनारायण को प्रतिदिन प्रतिगृह में लाना एवं प्रतिमा की जिस प्रकार पूजा की जाती है, उसी प्रकार उनकी भी भोजन-वस्त्रादि के द्वारा पूजा करना। मैं किसी प्रकार की उपासना या पूजापद्धति की न तो निन्दा करता हूँ और न किसी को बुरा बताता हूँ; बल्कि मेरे कहने का सारांश यही है कि इस प्रकार की नारायणपूजा सर्वश्रेष्ठ पूजा है, और भारत के लिए इसी पूजा की सब से अधिक आवश्यकता है।

अन्त में स्वामीजी ने भक्ति की तुलना एक त्रिकोण के साथ की। उन्होंने कहा कि इस त्रिकोण का पहला कोण यह है कि भक्ति या प्रेम कोई प्रतिदान नहीं चाहता। प्रेम में भय नहीं है, यह उसका दूसरा कोण है। पुरस्कार या प्रतिदान पाने के उद्देश्य से प्रेम करना भिखारी का धर्म है, व्यवसायी का धर्म है, सच्चे धर्म के साथ उसका बहुत ही कम सम्बन्ध है। कोई भिक्षुक न बने, क्योंकि वैसा होना नास्तिकता का चिह्न है। ‘जो आदमी रहता तो है गंगा के तीर पर, किन्तु पानी पीने के लिए कुआँ खोदता है, वह मूर्ख नहीं तो और क्या है?’ – जड़ वस्तु की प्राप्ति के लिए भगवान् से प्रार्थना करना भी ठीक वैसा ही है। भक्त को भगवान् से सदा इस प्रकार कहने के लिए तैयार रहना चाहिए – ‘प्रभो, मैं तुमसे कुछ भी नहीं चाहता, मैं तुम्हारे लिए अपना सब कुछ अर्पित करने को तैयार हूँ।’ प्रेम से भय नहीं रहता। क्या तुमने नहीं देखा है कि राह चलती हुई कमजोर हृदयवाली स्त्री एक छोटेसे कुत्ते के भोंकने से भाग खड़ी होती है, घर में घुस जाती है? दूसरे दिन वही उसी रास्ते से जा रही है। आज उसकी गोद में एक छोटासा बच्चा भी है। एकाएक किसी शेर ने निकलकर उस पर आक्रमण करना चाहा। ऐसी अवस्था में भी तुम उसे अपनी जान बचाने के लिए भागते या घर के अन्दर घुसते देखोगे? नहीं, कदापि नहीं। आज, अपने नन्हें बच्चे की रक्षा के लिए, यदि आवश्यकता पड़े तो वह शेर के मुँह में घुसने से भी बाज न आएगी। अब इस त्रिकोण का तीसरा कोण यह है कि प्रेम ही प्रेम का लक्ष्य है। अन्त में भक्त इसी भाव पर आ पहुँचता है कि स्वयं प्रेम ही भगवान् है। और बाकी सब कुछ असत् है। भगवान् का अस्तित्व प्रमाणित करने के लिए मनुष्य को अब और कहाँ जाना होगा? इस प्रत्यक्ष संसार में जो कुछ भी पदार्थ हैं, सब के अन्दर सर्वाधिक स्पष्ट दिखाई देनेवाला तो भगवान् ही है। वही वह शक्ति है जो सूर्य, चन्द्र और तारों को घुमाती एवं चलाती है तथा स्त्री-पुरुषों में, सभी जीवों में, सभी वस्तुओं में प्रकाशित हो रही है। जड़ शक्ति के राज्य में माध्याकर्षण शक्ति के रूप में वही विद्यमान है, प्रत्येक स्थान में, प्रत्येक परमाणु में वही वर्तमान है – सर्वत्र उसकी ज्योति छिटकी हुई है। वही अनन्त प्रेमस्वरूप है, संसार की एकमात्र संचालिनी शक्ति है, और वही सर्वत्र प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है।


  1. कठोपनिषद् २।२।१५॥

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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