स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

Swami Vivekananda Biography In Hindi

स्वामी विवेकानंद का जीवन-परिचय आपके सम्मुख प्रस्तुत करते हुए बहुत हर्ष का अनुभव हो रहा है। स्वामी जी की यह जीवनी “जगमगाते हीरे” नामक पुस्तक से ली गई है जिसके लेखक पंडित विद्याभास्कर शुक्ल हैं। हिन्दीपथ.कॉम हिंदी पाठकों के लिए स्वामी विवेकानंद का संपूर्ण साहित्य उपलब्ध कराने का यत्न पहले ही कर रहा है। इसी कड़ी में उनका जीवन परिचय भी प्रस्तुत किया जा रहा है। हमें पूरी उम्मीद है कि स्वामी विवेकानन्द का यह जीवन परिचय (Swami Vivekananda information in Hindi) सभी पाठकों के लिए प्रेरणादायी सिद्ध होगा।

महात्माओं का वास-स्थान ज्ञान है। मनुष्यों की जितनी ज्ञान-वृद्धि होती है, महात्माओं का जीवनकाल उतना ही बढ़ता जाता है। उन के जीवन काल की गणना मनुष्य शक्ति के बाहर है क्योंकि ज्ञान अनन्त है, अनन्त का पार कौन पा सकता है। महात्मा लोग एक देश में उत्पन्न होकर भी सभी देश अपने ही बना लेते हैं। सब समय उन के ही अनुकूल हो जाते हैं।

श्री स्वामी विवेकानंद ऐसे ही महापुरुषों में हैं।

स्वामी जी का जन्म 1863 ई० में कलकत्ता के समीपवर्ती सिमूलियां नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था। जिस समय विश्वनाथ दत्त बंगाल में “अटर्नी” हुए तभी उन के पिता ने संन्यासाश्रम में प्रवेश करके गृह त्याग कर दिया। उसी आनुवंशिक संस्कार के बीज स्वामी विवेकानंद के हृदय में भी जमे हुए थे जिन्होंने अवसर पाकर अपना स्वरूप संसार पर प्रकट किया।

स्वामी विवेकानंद का बचपन
Childhood Of Swami Vivekananda In Hindi

स्वामी विवेकानंद का पैदाइशी नाम वीरेश्वर था परन्तु प्यार के कारण घर के लोग, अड़ोसी-पड़ोसी सब उनको “नरेन्द्र” कहते थे। नरेन्द्र सुडौल, गठीला शरीर, गौर-वर्ण, मनमोहक बड़ी-बड़ी आँखें और तेजस्वी मुख वाला होनहार बालक था। उसका चित्त पढ़ने में बहुत कम लगता था, दिन रात खेलना, अपने साथ के लड़कों को तंग करना, ख़ूब ऊधम मचाना–यही उसके विशेष प्रिय कार्य थे। कोई ऐसा दिन नहीं जाता था जिस दिन माता-पिता या गुरुजन को नरेंद्र की दस-पाँच शिकायतें सुनने को न मिलती हों। वह ज्यों-ज्यों बढ़ता जाता था हँसोड़ और उपद्रवी होता जाता था। अपने सहपाठियों से मार-पीट करना, शिक्षकों से बहस-मुबाहसा करना उसका नित्य का काम था।

बुद्धि तीव्र थी, पढ़े हुए पाठ को याद कर लेना नरेन्द्र के लिए खेल था। सहपाठियों को वह उनके पढ़ने में सहायता दिया करता था। तंग किये जाने पर भी उसके सहपाठी, वाद-विवाद से खीझ जाने पर भी उसके शिक्षक, उससे द्वेष न मानकर प्रेम करते थे और उसको आदर की दृष्टि से देखते थे। नरेन्द्र को तत्त्वज्ञान संबन्धी पुस्तकों से विशेष प्रेम था। कोर्स की पुस्तकों में इतना आनन्द न आता था जितना तत्त्व-ज्ञान विषयक पुस्तकों में। एक बार तत्त्वज्ञान का एक आलोचनात्मक लेख लिखकर प्रसिद्ध पाश्चात्य-तत्त्ववेत्ता मीमांसक हर्बर्ट स्पेन्सर के पास भेजा था, उस लेख को देख कर हर्बर्ट साहब ने दाँतों तले अंगुली दबाई और नरेन्द्र को एक उत्तेजना-पूर्ण पत्र लिखते हुए लिखा–“आप अपना सतत उद्योग निरन्तर जारी रक्खें, बन्द न करें। हमें पूर्ण आशा है कि भविष्य में संसार आप से उपकृत होगा।” आगे चलकर सचमुच नरेंद्र ने अपने अदम्य उत्साह, अधिक परिश्रम, विचित्र बुद्धिमत्ता, अपूर्व स्वार्थ-त्याग और प्रेम-बल से संसार को अपना दास बना लिया।

नरेंद्र में सत्य को जानने की जिज्ञासा
The Desire To Know The Truth In Narendra

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय पढ़ें तो ज्ञात होता है कि उनमें सत्य को लेकर हमेशा से प्रेम था। जब उन्होंने बांग्ला के साथ-साथ संस्कृत और अंग्रेज़ी में भी पूर्ण योग्यता प्राप्त कर ली, बी० ए० पास कर लिया, उसी समय उन्हें पितृ-वियोग सहना पड़ा। गृहस्थी का कुल भार नरेन्द्र के ही कंधों पर आ पड़ा। नौकरी में उनका चित्त न लगता था। दिनों-दिन सांसारिक झंझटों से निवृत्ति की प्रवृत्ति ही चित्त में बढ़ती जा रही थी। इधर माता जी उनके ब्याह के लिए प्रयत्न-शीला और व्याकुल हो रही थीं। उन्होने प्यारे पुत्र के लिए बहुत प्रयत्न किया कि वह विवाह कर ले पर नरेंद्र तो कामिनी-काञ्चन की तृण-तुल्य असारता का यथार्थ रूप पूर्ण तरह से समझ चुके थे। वे ब्रह्मचर्य पालन के कट्टर पक्षपाती थे और अपने को सदैव उसी स्वरूप में देखना चाहते थे। वे लन्दन से भेजे हुए अपने एक पत्र में लिखते हैं–

“मुझे ऐसे मनुष्यों की आवश्यकता है जिनकी नसें लोहे की हों, ज्ञान-तन्तु फ़ौलाद के हों और अन्तःकरण वज्र के हों। क्षत्रियों का वीर्य और ब्राह्मणों का तेज जिनमें एकत्रित हुआ हो, मुझे ऐसे नरसिंह अपेक्षित हैं। ऐसे लाखों नहीं, करोड़ो बालक मेरी दृष्टि के सामने हैं, मेरी आकांक्षाओं को पूर्ण करने के अंकुर स्पष्टतः उनमें दिखलाई पड़ रहे हैं। परन्तु हा! उन सुन्दर बच्चों का बलिदान होगा। होमकुण्ड में उनकी पूर्णाहुति कर दी जायगी। विवाह के होमकुण्ड की धधकती हुई ज्वालायें चारों ओर से घेरे हुए खड़ी हैं। इन्हीं ज्वालाओं के कुण्ड में मेरे सुकुमार बच्चे निष्ठुरता-पूर्वक झोंक दिए जायंगे। हे दयालु! इस जलते हुए अन्तःकरण से निकलने वाले करुणोद्गार क्या तुम्हें नहीं सुनाई देते? यदि सत्य के लिए कम-से-कम ऐसे सौ सुभट भी संसार की विशाल रण-भूमि में उतर आयें तो कार्य पूर्ण हो जाय। प्रभो! तुम्हारी इच्छा होगी तो सब कुछ हो जायगा।”

बंगाल प्रान्त में उन दिनों “ब्रह्म समाज” सम्प्रदाय का प्रचार दिनों-दिन बढ़ रहा था, जिसके संस्थापक राजा राममोहन राय थे। नरेन्द्र पहले ब्रह्मो समाज में शामिल हुए। थोड़े ही दिनों के पश्चात उन्होंने जान लिया कि इस धर्म में कोई सार नहीं; केवल ऊपरी चमत्कार, आडम्बर मात्र है। अस्तु, अब वे ईसाई व मुहम्मदी तत्वों की ओर मुड़े; धर्मग्रन्थों का अनुशीलन प्रारम्भ किया, पर उनसे भी शान्ति प्राप्त न हुई। सनातन धर्म पर उन्हें श्रद्धा न थी। वे लकीर के फ़क़ीर न बनना चाहते थे तथापि अन्वेषण-दृष्टि से एक बार फिर सनातन धर्म के वेदान्त, उपनिषद, धर्म-शास्त्र का गहरी दृष्टि से अध्ययन प्रारम्भ किया।

जो शान्ति उन्हें पहले प्राप्त न हुई थी वही शान्ति वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन से अब प्राप्त होने लगी। शनैः-शनैः उनका दृढ़ निश्चय होता गया कि संसार में यदि कोई धर्म शान्ति दे सकता है तो वह एक सनातन हिन्दू धर्म है। संसार में इसी धर्म के प्रचार की आवश्यकता है। यही एक धर्म सदैव निर्बाध रूप से सर्वजीव हितकारी हो सकता है। नरेंद्र अब तक जिस भ्रम-जाल में फँसकर छटपटा रहे थे, हिन्दू शास्त्रों से वह जाल छिन्न-भिन्न हो गया। अपना कर्त्तव्य पथ उन्हें दृष्टि गोचर होने लगा। सद्गुरु कृपा की उत्कट अभिलाषा उत्पन्न हुई। इधर-उधर साधु-संग करना प्रारम्भ किया। कोई झूठ ही कह दे कि अमुक स्थान पर एक योगी महात्मा आए हुए हैं तो नरेन्द्र सब कार्य छोड़कर तत्काल ही वहाँ पहुँचते थे। कोई साधु-महात्मा मिलता तो उस से भाँति-भाँति के प्रश्न करके उसे घबराहट में डाल देते थे। इससे लोग उन्हें दुराग्रही, कपटी आदि नाना उपाधियों से विभूषित करने लगे थे। कोई-कोई महात्मा तो हठात् उन को परास्त करने की इच्छा से जाते और मुँह की खाकर लौट आते थे। परन्तु नरेन्द्र की तो गुरु-दर्शन की प्रबल अभिलाषा थी। गुरु मिलता कैसे न? “जाको जा पर सत्य सनेहू, सो तेहि मिलहि न कछु सन्देहू।”

जब रामकृष्ण परमहंस से मिले स्वामी विवेकानंद
When Vivekananda Met Ramakrishna Paramhamsa

उन्हीं दिनों एक पहुँचे हुए महात्मा श्री स्वामी रामकृष्ण परमहंस कलकत्ता के समीप दक्षिणेश्वर नामक स्थान में रहते थे। वे स्वतः तो सदैव ब्रह्म-लीन रहते ही थे परन्तु जिज्ञासु को भी अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर देते थे। नरेंद्र के एक सम्बन्धी एक दिन नरेन्द्र को वहाँ चलने के लिए बाध्य करने लगे। “आप जाकर दर्शन करें। मेरे चलने से उनके प्रति आपकी श्रद्धा कम हो जायगी”, कहकर नरेन्द्र ने उन्हें टालना चाहा पर अन्त में उनके विशेषाग्रह से जाना ही निश्चय किया।

कुछ बातचीत होने के अनन्तर, “भगवन्, आपने ईश्वर सिद्ध तो कर दिया है परंतु कभी देखा भी है?” नरेन्द्र ने दिल्लगी भाव से पूछा। “हाँ, मैंने ईश्वर देखा है। तुम्हें भी दिखला सकता हूँ”, परमहंस ने गंभीर भाव से उत्तर दिया। थोड़े समय बाद उपस्थित लोगों के चले जाने पर परमहंस ने उनको समाधि लगा दी और नरेन्द्र को दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गई। नरेंद्र की चिरेप्सित अभिलाषा पूर्ण हुई। वे परमहंस रामकृष्ण के सच्चे शिष्य बन गए। कभी-कभी बड़ी-बड़ी सभाओं तक में नरेन्द्र, गुरु-स्मरण करते हुए उनके चरण में लीन हो जाते थे। एकबार जन समुदाय में गुरु के प्रति उनके उद्गार थे, “रामकृष्ण परमहंस मेरे हैं, मैं उनका हूँ। माता, पिता, गुरु, भ्राता, इष्टदेव, मन, आत्मा, प्राण, स्वामी–वे ही मेरे सब कुछ हैं। मेरे सद्गुण उनके हैं और दुर्गण मेरे हैं। मुझे उन्हीं के सहवास में शान्ति मिली है।”

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नरेंद्र के सांसारिक बंधनों से मुक्त होने में बाधक थीं उनकी पुत्र-वत्सला माता। मातृ-भक्ति का उद्रेक संन्यास ग्रहण कर उन्हें अधिक दुःखी न करना चाहता था। परमहंस स्वामी रामकृष्ण महाराज के निर्वाण प्राप्त करने पर, माता से किसी प्रकार आज्ञा ले नरेन्द्र ने संन्यास ले ही लिया और संसार में गुरु-मत प्रचार तथा सनातन हिंदू धर्म को पुनर्जागृत करने का प्रण किया। अब से वे स्वामी विवेकानंद नाम से नए रूप में आविर्भूत हुए।

पैर में सादा देशी जूता, कमर में कौपीन, शरीर पर गेरुआ अंगरखा और सिर पर साफा धारण किया। क्या देश क्या विदेश सभी जगह वे एक ही वेश से घूमे; हाँ, सर्दी के कारण विदेश में बजाय सूती के ऊनी वस्त्रों का प्रयोग करते थे। उन के इस वेश से विदेश में प्रायः लोग उनकी खिल्ली उड़ाया करते थे।

एक बार अमेरिका में किसी पथ से होकर जा रहे थे तो एक सभ्य पुरुष ने छड़ी से उनका साफा दूर उछाल दिया।

“आप जैसे सभ्य पुरुष ने यह कष्ट क्यों उठाया?”, स्वामी जी ने पूछा।
उसने कहा, “भला आपने यह विचित्र वेश क्यों धारण किया है?”
“मैं बहुत दिनों से इस देश की सभ्यता की प्रशंसा सुनता था। इसी से इसको देखने की इच्छा से आया था।” स्वामी जी ने कहा, “यहाँ की सभ्यता का पहला पाठ आप ही ने मुझे पढ़ाया।”

स्वामी जी के कथन से वह बहुत लज्जित हुआ और क्षमा मांगते हुए घर की राह ली।

संन्यास लेने पर स्वामी विवेकानन्द ने एकान्तवास सेवन कर योगाभ्यास किया। विदेशों में भी वे जब तब एकान्त वास करते थे। अद्वैतवाद के प्रचारार्थ वे चीन, जापान गए। वहाँ से लौट कर भारत के इलाहाबाद, बनारस, पूना, मद्रास आदि नगरों में घूमे। समस्त मानव जाति के प्रति सब भेद-भावों को भुलाकर समान दृष्टि से धर्म प्रचार करना ही वे सर्वोपरि देश-सेवा समझते थे।

वे कहते थे–“अपने ज्ञान का उपयोग संसार को करने दो, अन्यों के सीखने योग्य गुणों को तुम सीखो। आकुण्ठित विचारों को हृदय में रखना मृत्यु का आह्वान है। जो दूसरों को स्वतंत्रता नहीं दे सकते, वे स्वयं स्वतंत्र होने योग्य नहीं।”

अमेरिका में स्वामी विवेकानंद
Swami Vivekananda In America

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय बताता है कि एक बार वे रामेश्वर से मध्य भारत की ओर आ रहे थे। रास्ते में रामनाड़ के महन्त से भेंट हुई। महन्त ने स्वामी जी की विद्वत्ता पर मुग्ध होकर उनसे अमेरिका की सर्वधर्म परिषद में भारत के प्रतिनिधि स्वरूप जाकर हिन्दू धर्म प्रचार की प्रार्थना की। स्वामी जी तो तैयार ही थे, सहमत हो गए और मद्रास आदि में घूमकर कुछ चन्दा एकत्रित किया। विदेश का ख़र्च, थोड़ा चन्दा, अमेरिका पहुँचते-पहुँचते रुपया ख़त्म हो गया। कोई दूसरा पुरुष होता तो अवश्य घबड़ा जाता पर जिसकी चिन्ता ईश्वर को है उसे कैसा सोच। रास्ते में एक वृद्धा स्त्री से भेंट हो गई। वह स्वामी जी का विचित्र वेष देखकर “इस पूर्वीय जीव से कुछ विनोद ही होगा” विचारती हुई उन्हें अपने घर ले गई। परन्तु घर में विनोद के बदले तत्व-ज्ञान का उपदेश स्वामी जी के मुख से सुनकर वह स्तंभित हो गई। अल्प समय में ही अमेरिका के समाचार पत्रों में स्वामी जी की कीर्ति-कथा पढ़ी जाने लगी।

एक दिन एक अहम्मन्य तत्त्वज्ञानी स्वामी जी को परास्त करने की इच्छा से उनके पास आया परन्तु उनकी असाधारण विद्वत्ता और वक्तृत्त्व शक्ति पर मुग्ध होकर उसी समय उनका शिष्य हो गया। शिकागो की सर्वधर्म सभा में स्वामी जी जब आये हुए प्रतिनिधियों का अपनी रसमयी वाणी से स्वागत करते थे तो स्वामी जी के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा हो जाती थी।

परिषद में जिस दिन स्वामी जी का भाषण होने को था, सवेरे से हो शहर की दीवालों पर लगे हुए विज्ञापन आगन्तुकों को बतला रहे थे, “एक तेजस्वी विद्वान, अद्वितीय हिन्दू संन्यासी का व्याख्यान 4 बजे सुनकर अपने को तृप्त कीजिए।” सभा-भवन में तथा उसके चारों ओर इतनी ठसाठस भीड़ थी कि तिल रखने की जगह न थी।

यथा समय स्वामी जी व्यास-पीठ पर आ उपस्थित हुए। उनकी तेजस्वी और मनोहर मूर्ति देख कर द्रष्टाओं की आँखें चकाचौंध हो गईं। सब के तुमुल जय घोष के साथ “ओ३म् तत्सत्” का गीत गाते हुए स्वामी विवेकानन्द ने मनोमुग्धकारी भाषण शुरू किया और अनेक युक्ति तथा प्रमाणों से साबित कर दिया कि एक हिन्दू धर्म ही ऐसा सार्वभौम धर्म है जिसे मानव जाति स्वीकार कर सकती है।

अमेरिका के प्रसिद्ध पत्र अभिमान के साथ जय घोष करते हुए लिखने लगे–”गेरुआ वस्त्रधारी यह हिन्दू धर्मोपदेशक ईश्वर का उत्पन्न किया हुआ जन्मसिद्ध वक्ता है। ऐसे प्रतिभाशाली देश में मिशनरियों का भेजना मूर्खता है।”

गंगा की धवल धारा की तरह स्वामी जी की कीर्ति अमेरिका, इंग्लैण्ड आदि में फैल गई। न्यूयॉर्क में “रामकृष्ण मठ” नामक एक संघ स्थापित हुआ जिसमें अब तक वेद, वेदांत, ध्यान, धारणा, प्राणायाम आदि की शिक्षा दी जाती है।

अमेरिका जाने से पूर्व भारतीय जिनका नाम तक नहीं जानते थे, लौटने पर कोलम्बो (सीलोन) में उनके स्वागत के लिए दश सहस्र पुरुष एकत्रित हुए और स्वामी जी का ख़ूब स्वागत किया। रामनाड़ के महन्त ने हाथी-घोड़ों, गाजों-बाजों, ध्वजा पताकाओं, वाद्यों, रोशनी व अपार भीड़ के साथ उनका अपूर्व स्वागत किया और पाश्चात्त्य देशों में दिग्विजयी होने के कारण अपने यहाँ एक विजय-स्तम्भ स्थापित किया।

स्वामी विवेकानन्द की भारत वापसी
Swami Vivekananda Back In India

स्वदेश में स्वामी जी ने मद्रास, बंगाल, उत्तर भारत और बंबई आदि के भिन्न-भिन्न स्थानों में घूम-घूम कर बहुत से व्याख्यान दिए। कितने ही स्थानों में संस्थाएँ खोलीं जिनका मुख्य कार्य धर्म प्रचार और ग़रीबों की सेवा करना है।

सन् 1902 की 4 जुलाई को स्वामी जी ने नित्य की भाँति प्रातः कृत्य करने के पश्चात् योगाभ्यास किया। मध्याह्न में शिष्यों को पढ़ाया। संध्या समय मुमुक्षुओं से धर्म-चर्चा की, बाहर घूमने गए। पहर रात्रि गए तक बातचीत करते-करते सहसा कहने लगे, “आज मेरी श्री गुरु-चरण दर्शनों की इच्छा है। नाशमान शरीर में अमर आत्मा का कार्य कभी नहीं रुकता। देश की इच्छाओं को अब आप लोग पूर्ण करें, ईश्वर आपको सहायता दे।” इतना कहने के साथ ही वे अपने कक्ष में गए, “ॐ तत्सत्” कहते हुए अन्तिम श्वास छोड़ दी और परमात्मा में लीन हो गए।

स्वामी विवेकानंद के विचार
Swami Vivekananda’s Message

स्वामी विवेकानंद जी बड़े संयत पुरुष थे। अपनी धुन के एक थे। दृढ़ निश्चयी थे। पास घड़ी न रखने पर भी सब कार्य उनके यथा समय ही होते थे। उनमें तीन प्रधान गुण थे–

  1. नियमितता
  2. देश, धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा
  3. स्वार्थ त्याग पूर्वक अथक परिश्रम

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय दिखलाता है कि वे एक कर्मयोगी थे और कभी खाली बैठना तो जानते ही न थे। 12-14 घंटे अभ्यास करना उनका नित्य का कार्य था। उनका सिद्धान्त था कि खाली बैठने से मनुष्य काहिल हो जाता है। खाली बैठने से बेगार करना अच्छा।

एक दिन उनके एक आलसी नौकर ने आकर कहा, “महाराज, आप सब को मुक्ति की राह बतलाते हैं पर मुझे क्यों नहीं बतलाते जो दुनिया के झंझटों से छूट जाऊँ।”
मुक्ति के लिये उद्योग की आवश्यकता है। यदि तुम कुछ न कर सको तो चोरी ही सीख लो।” स्वामी जी ने हँसकर कहा, “खाली बैठने से चोरी आदि सीखना अच्छा, क्योंकि उद्योग से ज्ञान होने पर बुरे कर्म छूट जाते हैं।”

वे अपने भारतीय मित्रों को प्रायः लिखा करते थे, “अब बार-बार यह कहने का समय नहीं कि हम ऐसे जगद्विजयी थे, उद्योगी थे, हम संसार के गुरु थे, हम सर्वोपरि थे। अब कैसे हो सो संसार को दिखला दो। अपने कर्तव्य पथ पर बढ़े चलना तुम्हारा कार्य है। यश तो पीछे-पीछे आप दौड़ता है। संसार का भार अपने ऊपर समझो, अपना भार ईश्वर पर छोड़ दो। अन्तःकरण की पवित्रता, धैर्य और दृढ़ निश्चय के साथ सतत उद्योग में निरत रहो। मरने का मोह त्याग दो। कष्टों का सामना करने की, संसार की भलाई करने की प्रतिज्ञा कर लो और उसका पालन करो। कहो कम, करो ज़्यादा। तभी सफल होगे।”

एक जगह स्वामी जी अपने एक मित्र के पत्र के उत्तर में लिखते हैं–
“तुमने लिखा कि कलकत्ते की सभा में दस हज़ार मनुष्यों की भीड़ हुई। यह बड़े आनन्द की बात है। पर सभा में फ़ी (शुल्क) एक आना मांगने पर कितने आदमी बैठे दिखलाई पड़ते इसका भी अनुभव करना था। निरुद्योगियों की सभा में उद्योग की बात ज़हर मालूम होती है। जो कुछ भी करना है आचरण से सिद्ध करो, व्यवहार से सिद्ध करो। जब तुम्हारा आचरण और व्यवहार लोगों को हितकर मालूम होगा तो वे आप से आप तुम्हारा अनुकरण करने लगेंगे। हमारा कर्तव्य है कि लोगों को धार्मिक जीवन और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग दिखावें। बस, निन्दा-स्तुति, सुख-दुःख का विचार छोड़कर उठो और कार्य आरम्भ करो।”

एक स्थान पर अपार जन समूह में स्वामी विवेकानंद का रथ खड़ा किया गया। वहीं स्वामी जी को उपदेश देना पड़ा। आपने कहा, “भगवान कृष्ण ने रथ में बैठकर गीता का उपदेश दिया था। आज वही सौभाग्य मुझे प्राप्त है। काम करना और उद्योग करना मनुष्य के हाथ में है। फल और यश ईश्वर के हाथ में है। मैं उस दिन अपने को धन्य समझूंगा जिस दिन आप लोगों का यह उत्साह कार्य रूप में परिणत होगा।”

स्वामी जी की वाणी में अद्भुत मधुरता और आकर्षण शक्ति थी। श्रोताओं पर उनके उपदेश का बिजली की तरह असर होता था। अपने उपदेश में वे किसी की बुराई करना तो जानते ही न थे फिर भी हिन्दू धर्म की ख़ूबी का सिक्का लोगों के हृदय में जमा देते थे। लोग मंत्रमुग्ध की भाँति उनके व्याख्यानों को सुनते थे। अंग्रेज़ी और संस्कृत पर उनका असाधारण अधिकार था। स्वामी जी का मत था, “उदार चरितानां तु वसुधैवकुटुम्बकम्।” मनुष्य जाति को वे समान दृष्टि से देखते थे। हिंदू संस्कृति पर उन्हें अभिमान था, उसका प्रचार और अध्यात्म ज्ञान का प्रचार उनके जीवन का लक्ष्य था। ब्रह्मचर्य की वे साक्षात् मूर्ति थे। देश सेवा, परोपकार, शिक्षा प्रसार उनके कार्यों के मुख्य अङ्ग थे। उनका जीवन संसार के लिए आदर्श था। कोई भी मनुष्य स्वामी विवेकानंद के उपदेशों के अनुसार चलकर अपना जीवन सफल बना सकता है।

हमें आशा है कि स्वामी विवेकानंद पर निबंध जो यहाँ प्रस्तुत किया गया है आपके लिए उपयोगी साबित होगा। उनके सुविचार और अनमोल वचन हमें सदैव प्रेरणा देते रहेंगे। वे हमेशा मानते थे कि किसी राष्ट्र या व्यक्ति जब आत्म-विश्वास खो देता है तो वही उसकी मृत्यु का कारण सिद्ध होता है। उनका जीवन-परिचय न केवल हमें संबल देता है, बल्कि हमारे भीतर श्रद्धा और आत्म-विश्वास का संचार भी करता है। हिंदीपथ.कॉम पर हम न सिर्फ़ स्वामी विवेकानंद के बारे में सभी जानकारियाँ देंगे, बल्कि उनकी सभी किताबें भी जल्द-से-जल्द आप तक पहुँचाने का प्रयत्न करेंगे। स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय (Swami Vivekanand Ka Jeevan Parichay) यदि आपको भी कुछ करने तथा देश-सेवा के लिए प्रेरित करता हो, तो कृपया टिप्पणी करके अपने विचार अवश्य व्यक्त करें।

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