FEATUREDस्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद के शिक्षा पर विचार

स्वामी विवेकानंद के शिक्षा पर विचार ओज और प्राण से परिपूर्ण हैं। इन्हें यदि अपने जीवन में उतारा जाए तो जीवन को रूपान्तरित किया जा सकता है। विवेकानन्द के शिक्षा-संबंधी इन विचारों को पूरी शिक्षा व्यवस्था पर लागू किया जाए, तो देश को पूर्णतः रूपान्तरित किया जा सकता है। प्रस्तुत लेख “राष्ट्र को आह्वान” नामक पुस्तक के “शिक्षा और समाज” नामक अध्याय से लिया गया है। लेख के अन्त में टिप्पणी करके अपनी राय ज़ाहिर करना न भूलें।

Swami Vivekananda Ke Shiksha Par Vichar

इस लेख के माध्यम से जानें भारत में शिक्षा प्रसार के लिए स्वामी विवेकानंद क्या उपाय सुझाते हैं। स्वामी विवेकानंद के शिक्षा पर विचार निम्नांकित स्तम्भों पर आधारित हैं–

  1. मन की एकाग्रता
  2. चरित्र-गठन
  3. व्यक्तित्व-विकास
  4. प्रबल आत्मविश्वास
  5. श्रद्धा
  6. वेदांत का समावेश

शिक्षा का अर्थ है उस पूर्णता को व्यक्त करना जो सब मनुष्यों में पहले से विद्यमान है।
(स्वामी विवेकानंद की पत्रावली १, ११४)

शिक्षा क्या है? क्या वह पुस्तक-विद्या है? नहीं! क्या वह नाना प्रकार का ज्ञान है? नहीं, यह भी नहीं। जिस संयम के द्वारा इच्छाशक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है और वह फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है।
(स्वामी विवेकानंद की पत्रावली २, २९०-९१)

मेरे विचार से तो शिक्षा का सार मन की एकाग्रता प्राप्त करना है, तथ्यों का संकलन नहीं। यदि मुझे फिर से अपनी शिक्षा आरम्भ करनी हो और इसमें मेरा वश चले, तो मैं तथ्यों का अध्ययन कदापि न करूँ। मैं मन की एकाग्रता और अनासक्ति का सामर्थ्य बढ़ाता और उपकरण के पूर्णतया तैयार होने पर उससे इच्छानुसार तथ्यों का संकलन करता।
(भगवान बुद्ध का संसार को संदेश एवं अन्य व्याख्यान और प्रवचन, ७१)

जो शिक्षा साधारण व्यक्ति को जीवन-संग्राम में समर्थ नहीं बना सकती, जो मनुष्य में चरित्र-बल, परहित-भावना तथा सिंह के समान साहस नहीं ला सकती, वह भी कोई शिक्षा है? जिस शिक्षा के द्वारा जीवन में अपने पैरों पर खड़ा हुआ जाता है, वही है शिक्षा।
(विवेकानंद जी के संग में, १७५)

शिक्षा का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे दिमाग़ में ऐसी बहुत सी बातें इस तरह ठूँस दी जायँ, जो आपस में, लड़ने लगें और तुम्हारा दिमाग़ उन्हें जीवन भर में हज़म न कर सके। जिस शिक्षा से हम अपना जीवन-निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र-गठन कर सकें और विचारों का सामंजस्य कर सकें, वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है। यदि तुम पाँच ही भावों को हज़म कर तदनुसार जीवन और चरित्र गठित कर सके हो तो तुम्हारी शिक्षा उस आदमी की अपेक्षा बहुत अधिक है, जिसने एक पूरी की पूरी लाइब्रेरी ही कण्ठस्थ कर ली है।
(भारत में विवेकानंदभारत का भविष्य)

ज्ञान मनुष्य में अन्तर्निहित ही है। कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता, सब अन्दर ही है। … हम कहते है कि न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का आविष्कार किया। तो क्या वह आविष्कार कहीं एक कोने में बैठा हुआ न्यूटन की प्रतीक्षा कर रहा था? नहीं, वह उसके मन में ही था। जब समय आया तो उसने उसे ढूँढ निकाला। संसार ने जो कुछ ज्ञान लाभ किया है, वह मन से ही निकला है। विश्व का असीम पुस्तकालय तुम्हारे मन में ही विद्यमान है। बाह्य जगत् तो तुम्हें अपने मन को अध्ययन में लगाने के लिए उद्दीपक तथा सहायक मात्र है; परन्तु प्रत्येक समय तुम्हारे अध्ययन का विषय तुम्हारा मन ही है।
(कर्मयोग २-३)

हरएक व्यक्ति हुकूमत जताना चाहता है, पर आज्ञा पालन करने के लिए कोई भी तैयार नहीं है। और यह सब इसलिए है कि प्राचीन काल के उस अद्भुत ब्रह्मचर्य आश्रम का अब पालन नहीं किया जाता। पहले आदेश पालन करना सीखो, आदेश देना फिर स्वयं आ जायगा। पहले सर्वदा दास होना सीखो, तभी तुम प्रभु हो सकोगे।
(वेदान्त : जाफना में दिया भाषण)

केवल शिक्षा! शिक्षा! शिक्षा! यूरोप के बहुतेरे नगरों में घूमकर और वहाँ के ग़रीबों के भी अमन-चैन और विद्या को देखकर हमारे ग़रीबों की बात याद आती थी और मैं आँसू बहाता था। यह अन्तर क्यों हुआ? जवाब पाया – शिक्षा!
(स्वामी विवेकानंद की पत्रावली २, ७४)

हमें जो कुछ चाहिए वह यह श्रद्धा ही है। दुर्भाग्यवश भारत से इसका प्रायः लोप ही हो गया है, और हमारी वर्तमान दुर्दशा का कारण भी यही है। एकमात्र इस श्रद्धा के भेद से ही मनुष्य-मनुष्य में अन्तर पाया जाता है। इसका और दूसरा कारण नहीं। यह श्रद्धा ही है, जो एक मनुष्य को बड़ा और दूसरे को दुर्बल और छोटा बना देती है।
(कलकत्ता-अभिनन्दन का उत्तर)

हमारे जातीय शोणित में एक प्रकार के भयानक रोग का बीज समा रहा है और वह है प्रत्येक विषय को हँसकर उड़ा देना – गाम्भीर्य का अभाव। इस दोष का सम्पूर्ण रूप से त्याग करो। वीर होओ, श्रद्धा-सम्पन्न होओ, दूसरी बातें उनके पीछे आप ही आयेंगी – उन्हें उनका अनुसरण करना ही होगा।
(कोलम्बो से अल्मोड़ा तक)

अपने से निम्न श्रेणिवालों के प्रति हमारा एकमात्र कर्तव्य है – उनको शिक्षा देना, उनके खोये हुए व्यक्तित्व के विकास के लिए सहायता करना। उनमें विचार पैदा कर दो – बस, उन्हें उसी एक सहायता का प्रयोजन है, और शेष सब काल इसके फलस्वरूप आप ही आ जायगा। हमें केवल रासायनिक सामग्रियों को इकट्ठा भर कर देना है, उनका निर्दिष्ट आकार प्राप्त करना – रवा बँध जाना तो प्राकृतिक नियमों से ही साधित होगा। … अच्छा, यदि पहाड़ मुहम्मद के पास न आये, तो महम्मद ही पहाड़ के पास क्यों न जायँ? यदि ग़रीब लड़का शिक्षा के मन्दिर तक न जा सके तो शिक्षा को ही उसके पास जाना चाहिए।
(स्वामी विवेकानंद की पत्रावली १, १३४-३५)

हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जिससे चरित्र-निर्माण हो, मानसिक शक्ति बढ़े, बुद्धि विकसित हो, और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा होना सीखे।
(विवेकानंद जी के सान्निध्य में, ४९-५०)

शिक्षा क्या वह है जिसने निरन्तर इच्छाशक्ति को बल-पूर्वक पीढ़ी-दर-पीढ़ी रोक कर प्रायः नष्ट कर दिया है, जिसके प्रभाव से नये विचारों की तो बात ही जाने दीजिये, पुराने विचार भी एक एक करके लोप होते चले जा रहे हैं, क्या वह शिक्षा है। जो मनुष्य को धीरे धीरे यन्त्र बना रही है? जो स्वयं-चालित यन्त्र के समान सुकर्म करता है, उसकी अपेक्षा अपनी स्वतन्त्र इच्छाशक्ति और बुद्धि के बल से अनुचित कर्म करनेवाला मेरे विचार से धन्य है।
(स्वामी विवेकानंद की पत्रावली २, २९१)

आज हमें आवश्यकता है वेदान्तयुक्त पाश्चात्य विज्ञान की, ब्रह्मचर्य के आदर्श और श्रद्धा तथा आत्मविश्वास की। … वेदान्त का सिद्धान्त है कि मनुष्य के अन्तर में–एक अबोध शिशु में भी–ज्ञान का समस्त भण्डार निहित है, केवल उसके जागृत होने की आवश्यकता है, और यही आचार्य का काम है। … पर इस सब का मूल है धर्म – वही मुख्य है। धर्म तो भात के समान है, शेष सब वस्तुएँ तरकारी और चटनी जैसी हैं। केवल तरकारी और चटनी खाने से अपथ्य हो जाता है, और केवल भात खाने से भी।
(विवेकानंद जी के सान्निध्य में, ४)

देखो, एकमात्र ब्रह्मचर्य का ठीक ठीक पालन कर सकने पर सभी विद्याएँ बहुत ही कम समय में हस्तगत हो जाती हैं – मनुष्य श्रुतिधर, स्मृतिधर बन जाता है। ब्रह्मचर्य के अभाव से ही हमारे देश का सब कुछ नष्ट हो गया।
(विवेकानंद जी के सान्निध्य में, ३२७)

मेरा विश्वास है कि गुरु के साक्षात् सम्पर्क रखते हुए, गुरु-गृह में निवास करने से ही यथार्थ शिक्षा की प्राप्ति होती है। गुरु से साक्षात् सम्पर्क हुए बिना किसी प्रकार की शिक्षा नहीं हो सकती। हमारे वर्तमान विश्वविद्यालयों की ही बात लीजिए। उनका आरम्भ हुए पचास वर्ष हो गये (यह १८९७ में मद्रास में कहा गया था) फल क्या मिला है? वे एक भी मौलिक-भाव-संपन्न व्यक्ति उत्पन्न नहीं कर सके। परीक्षा लेने वाली संस्थाएँ मात्र हैं! साधारण जनता की जागृति और उसके कल्याण के लिए स्वार्थ-त्याग की मनोवृत्ति का हममें थोड़ा भी विकास नहीं हुआ है।
(स्वामी विवेकानंद जी से वार्तालाप, ७६)

सत्य, प्राचीन अथवा आधुनिक किसी समाज का सम्मान नहीं करता। समय को ही सत्य का सम्मान करना पड़ेगा, अन्यथा समाज ध्वंस हो जाय, कोई हानि नहीं सत्य ही हमारे सारे प्राणियों और समाजों का मूल आधार है, अतः सत्य कभी भी समाज के अनुसार अपना गठन नहीं करेगा। … वही समाज सब से श्रेष्ठ है, जहाँ सर्वोच्च सत्यों को कार्य में परिणत किया जा सकता है – यही मेरा मत है। और यदि समाज इस समय उच्चतम सत्यों को स्थान देने में समर्थ नहीं है, तो उसे इस योग्य बनाओ। और जितना शीघ्र तुम ऐसा कर सको, उतना ही अच्छा।
(ज्ञान योग ६१-६३)

मैं कहता हूँ – मुक्त करो; जहाँ तक हो सके लोगों के बन्धन खोल दो। … जब तुम सुख की कामना समाज के लिए त्याग सकोगे तब तुम भगवान बुद्ध बन जाओगे, तब तुम मुक्त हो जाओगे।
(स्वामी विवेकानंद की पत्रावली २, २९२)

प्रत्येक मनुष्य एवं प्रत्येक राष्ट्र को बड़ा बनाने के लिए तीन बातें आवश्यक हैं–
१. सौजन्य की शक्ति में दृढ़ विश्वास।
२. ईर्ष्या और सन्देह का अभाव।
३. जो सन्मार्ग पर चलने में और सत्कर्म करने में संलग्न हों, उनकी सहायता करना।
(स्वामी विवेकानंद की पत्रावली १, १०८)

यदि आपका आदर्श जड़ है, तो आप भी जड़ हो जायेंगे। स्मरण रहे हमारा आदर्श है, परमात्मा। एकमात्र वे ही अविनाशी हैं – अन्य किसी का अस्तित्व नहीं है, और उन परमात्मा की भाँति हम भी सदा विनाशहीन हैं।
(भारतीय नारी, २२)

हिन्दू का खाना धार्मिक, उसका पीना धार्मिक, उसकी नींद धार्मिक उसकी चाल-ढाल धार्मिक, उसके विवाहादि धार्मिक, यहाँ तक कि उसकी डकैती करने की प्रेरणा भी धार्मिक है। … हरएक राष्ट्र का विश्व के लिए एक विशिष्ट कार्य होता है और जब तक वह आक्रान्त नहीं होता, तब तक वह राष्ट्र जीवित रहता है – चाहे कोई भी संकट क्यों न आये। पर ज्यों ही कार्य नष्ट हुआ कि राष्ट्र भी ढह जाता है।
(मेरा जीवन तथा ध्येय, ५-६)

क्या तुमने इतिहास में नहीं पढ़ा है कि देश के मृत्यु का चिह्न अपवित्रता या चरित्रहीनता के भीतर से होकर आया है – जब यह किसी जाति में प्रवेश कर जाती है, तो समझना कि उसका विनाश निकट आ गया है।
(ज्ञान योग ३२)

इस समय हम पशुओं की अपेक्षा कोई अधिक नीतिपरायण नहीं हैं। केवल समाज के अनुशासन के भय से हम कुछ गड़बड़ नहीं करते। यदि समाज आज कह दे कि चोरी करने से अब दण्ड नहीं मिलेगा, तो हम इसी समय दूसरे की सम्पत्ति लूटने को छूट पड़ेंगे। पुलिस ही हमें सच्चरित्र बनाती है। सामाजिक प्रतिष्ठा के लोप की आशंका ही हमें नीतिपरायण बनाती है, और वस्तुस्थिती तो यह है कि हम पशुओं से कुछ ही अधिक उन्नत हैं।’
(ज्ञान योग २७५)

अधिकांश सम्प्रदाय अल्पजीवी और पानी के बुदबुदे के समान क्षणभंगुर होते हैं, क्योंकि बहुधा उनके प्रणेताओं में चरित्र-बल नहीं होता। पूर्ण प्रेम और प्रतिक्रिया न करनेवाले हृदय से चरित्र का निर्माण होता है। जब नेता में चरित्र नहीं होता, तब उसमें निष्ठा की सम्भावना नहीं होती। चरित्र की पूर्ण पवित्रता से स्थायी विश्वास और निष्ठा अवश्य उत्पन्न होती है। कोई विचार लो, उसमें अनुरक्त हो जाओ, धैर्य-पूर्वक प्रयत्न करते रहो, तो तुम्हारे लिए सूर्योदय अवश्य होगा।
(भगवान बुद्ध का संसार को संदेश एवं अन्य व्याख्यान और प्रवचन, १५५)

हमसे पूछा जाता है : ‘आपके धर्म से समाज का क्या लाभ है?’ समाज को सत्य की कसौटी बनाया गया है। यह तो बड़ी तर्कहीनता है। समाज केवल विकास की एक अवस्था है, जिसमें होकर हम गुज़र रहे हैं। … यदि सामाजिक अवस्था स्थायी होती है, तो वह शिशु ही बनी रहने जैसी बात होती। पूर्ण मनुष्य शिशु नहीं हो सकता; यह शब्द – ‘मनुष्य-शिशु’ – ही विरोधाभासी है – इसलिए कोई समाज पूर्ण नहीं हो सकता। मनुष्य को ऐसी आरम्भिक अवस्थाओं से आगे बढ़ना होगा और वह बढ़ेगा। … मेरे गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे, “तुम स्वयं अपने कमल के फूल को खिलने में सहायता क्यों नहीं देते? भौरे तब अपने आप आयेंगे।”
(नारद-भक्ति-सूत्र एवं भक्ति-विषयक प्रवचन और आख्यान, २१)

दूसरों में बुराई न देखो। बुराई अज्ञान है, दुर्बलता है। लोगों को यह बताने से क्या लाभ कि वे दुर्बल हैं। आलोचना और खण्डन से कोई लाभ नहीं होता। हमें उन्हें कुछ ऊँची वस्तु देनी चाहिए; उन्हें उनके गरिमामयी स्वरूप की, उनके जन्मसिद्ध अधिकार की बात बताओ।
(नारद-भक्ति-सूत्र एवं भक्ति-विषयक प्रवचन और आख्यान, १७)

मैं ‘सुधार’ नहीं कहता, अपितु कहता हूँ – ‘बढ़े चलो।’ कोई वस्तु इतनी बुरी नहीं है कि उसका सुधार या पुनर्निर्माण करना पड़े। अनुकूलनक्षमता (Adaptability) ही जीवन का एकमात्र रहस्य है – उसे विकसित करनेवाला अन्तर्निहित तत्त्व है। बाह्य शक्तियों द्वारा आत्मा को दमित करने की चेष्टा के विरुद्ध आत्मा के प्रयास का परिणाम ही अनुकूलन या समायोजन है। जो अपना सर्वोत्तम अनुकूलन कर लेता है, वह सर्वाधिक दीर्घजीवी होता है। यदि मैं उपदेश न भी दूँ, तो भी समाज परिवर्तित हो रहा है, वह परिवर्तित अवश्य होगा।
(स्वामी विवेकानंद के विविध प्रसंग, ११६)

और किसी बात की आवश्यकता नहीं, आवश्यकता है केवल प्रेम, अकपटता एवं धैर्य की। जीवन का अर्थ ही वृद्धि, अर्थात् विस्तार, यानी प्रेम है। इसलिए प्रेम ही जीवन है, यही जीवन का एकमात्र गतिनियामक है और स्वार्थपरता ही मृत्यु है। इहलोक एवं परलोक में यही बात सत्य है। यदि कोई कहे कि देह के विनाश के पीछे और कुछ नहीं रहता तो भी उसे यह मानना ही पड़ेगा कि स्वार्थपरता ही यथार्थ मृत्यु है। परोपकार ही जीवन है, परोपकार न करना ही मृत्यु है। जितने नर-पशु तुम देखते हो उनमें नब्बे प्रतिशत मृत हैं, वे प्रेत हैं ; क्योंकि, ऐ बच्चो, जिसमें प्रेम नहीं है वह तो मृतक है।
(स्वामी विवेकानंद की पत्रावली १, २०९-१०)

एक ओर नया भारत कहता है कि “पाश्चात्य भाव, भाषा, खान-पान, वेश-भूषा और रीति का अवलम्बन करने से ही हम लोग पाश्चात्य जातियों की शक्तिमान हो सकेंगे।” दूसरी ओर प्राचीन भारत कहता है कि “मूर्ख। नक़ल से भी कहीं दूसरों का भाव अपना हुआ है? बिना उपार्जन किये कोई वस्तु अपनी नहीं होती। क्या सिंह की खाल पहनकर गधा कहीं सिंह हुआ है?
(वर्तमान भारत ४२-४३)

एक ओर नवीन भारत कहता है कि “पाश्चात्य जातियाँ जो कुछ करें वही अच्छा है। अच्छा न होता तो वे ऐसी बलवान हुई कैसे?” दूसरी ओर प्राचीन भारत कहता है कि “बिजली की चमक तो खूब होती है, पर क्षणिक होती है। रुको! तुम्हारी आँखें चौंधिया रही हैं, सावधान!”
(वर्तमान भारत, ४३)

उपनिषद्युगीन सुदूर अतीत में, हमने इस संसार को एक चुनौती दी थी – न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः – “न तो सन्तति द्वारा और न सम्पत्ति द्वारा, वरन केवल त्याग द्वारा ही अमृतत्व की उपलब्धि होती है।” एक के बाद दूसरी जाति ने इस चुनौती को स्वीकार किया और अपनी शक्ति भर संसार की इस पहेली को कामनाओं के स्तर पर सुलझाने का प्रयत्न किया। वे सब की सब अतीत में तो असफल रही हैं – पुरानी जातियाँ तो शक्ति और स्वर्ण की लोलुपता से उद्भूत पापाचार और दैन्य के बोझ से दबकर पिस-मिट गयीं और नयी जातियाँ गर्त में गिरने को डगमगा रही हैं। इस प्रश्न का तो हल करने के लिए अभी शेष ही है कि शान्ति की जय होगी या युद्ध की, सहिष्णुता की विजय होगी या असहिष्णुता की, शुभ की विजय होगी या अशुभ की, शारीरिक शक्ति की विजय होगी या बुद्धि की, सांसारिकता की विजय होगी या आध्यात्मिकता की। हमने तो युगों पहले इस प्रश्न का अपना हल ढूँढ लिया था। … हमारा समाधान है : असांसारिकता – त्याग।
(भारत का ऐतिहासिक क्रमविकास एवं अन्य प्रबन्ध, ६२)

मुझे एक ऐसा उदाहरण बताओ, जहाँ बाहर से इन प्रार्थनाओं का उत्तर मिला हो। जो भी उत्तर पाते हो, वह अपने हृदय से ही। तुम जानते हो कि भूत नहीं होते, किन्तु अन्धकार में जाते ही शरीर कुछ काँप सा जाता है। इसका कारण यह है कि बिल्कुल बचपन से ही हम लोगों के सिर में यह भय घुसा दिया गया है। किन्तु समाज के भय से, संसार के कहने सुनने के भय से, बन्धु-बान्धवों की घृणा के भय से, अथवा अपने प्रिय कुसंस्कार के नष्ट होने के भय से, यह सब हम दूसरों को न सिखायें। इन सबको जीत लो। धर्म के विषय में विश्व-ब्रह्माण्ड के एकत्व और आत्मविश्वास के अतिरिक्त और क्या शिक्षा आवश्यक है? शिक्षा केवल इतनी ही देनी है।
(व्यावहारिक जीवन में वेदांत – प्रथम भाग)

हमें आशा है कि स्वामी विवेकानंद के शिक्षा पर विचार आपको प्रेरित करेंगे और शिक्षा को सही अर्थों में समझने में मददगार साबित होंगे। स्वामी जी एक अन्य ओजस्वी विचार पढ़ने के लिए कृपया यहाँ देखें – स्वामी विवेकानंद के विचार

स्वामी विवेकानन्द की अन्य किताबें पढ़ने के लिए कृपया यह सूची देखें–

स्वामी विवेकानंद की अन्य पुस्तकें
Other Swami Vivekananda Books in Hindi

हमें उम्मीद है कि स्वामी विवेकानंद के शिक्षा पर विचार आपके जीवन और सोच को नई दिशा देंगे। यदि आप स्वामी जी के जीवन के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं तो कृपया यहाँ जाएँ – स्वामी विवेकानन्द का जीवन परिचय

स्वामी विवेकानंद के शिक्षा पर विचार – संबंधित प्रश्न

स्वामी विवेकानंद के शिक्षा पर विचार किसके ऊपर आधारित हैं?

स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा दर्शन संबंधी विचार मुख्यतः वेदांत के सिद्धान्तों और उनके गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के उपदेशों पर आधारित हैं।

शिक्षा के लिए आवश्यक एकाग्रता को प्राप्त करने का क्या उपाय है?

स्वामी विवेकानंद के अनुसार एकाग्रता शिक्षा के लिए अनिवार्य है। एकाग्रता विकसित करने के लिए मन का संयम और ध्यान-धारणा आवश्यक अंग हैं।

स्वामी विवेकानन्द के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य क्या है?

स्वामी जी के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य व चरित्र का निर्माण, मन की एकाग्रता प्राप्त करना तथा जीवन का चतुर्मुखी विकास है।

राष्ट्र के लिए शिक्षा का क्या महत्व है?

स्वामी जी का मत है कि सही शिक्षा ही राष्ट्र में श्रद्धा और आत्मविश्वास का संचार कर उसे विकास के पथ पर प्रवृत्त कर सकती है।

10 thoughts on “स्वामी विवेकानंद के शिक्षा पर विचार

  • लखन लाल प्रसाद

    उपरोक्त लेख पढ़ने का अवसर मिला, कुछ जीवन, जीने की कला से साक्षात्कार हुआ। सभार

    Reply
    • HindiPath

      लखन जी, यह जानकर बहुत आनन्द हुआ कि हमारा यह प्रयास आपको अच्छा लगा। आप इसी तरह हिंदीपथ.कॉम पढ़ते रहें और अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत कराते रहें।

      Reply
  • Rakesh kumar singh

    Mai Rakesh kumar singh. I live at Buxar in Bihar.
    Or mai bahut happy hu jo ki enki history ko jana. Hame bahut achhi lagi .or hame bhi es trah se dhal jana chahiye . Swami Vivekanand ki trah.
    Thanks.

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    • HindiPath

      राकेश जी, सराहना के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। निश्चय ही स्वामी विवेकानंद के विचारों को जीवन में ढालना बहुत आवश्यक है। आप यूँ ही हिंदीपथ पढ़ते रहें और अपनी प्रतिक्रियाएँ देते रहें।

      Reply
  • Manish Kumar

    apka blog bahut achha hai

    Thanks for shareing

    Reply
    • HindiPath

      मनीष जी, प्रोत्साहन के लिए आभार। स्वामी विवेकानंद हम सभी के प्रेरणास्रोत हैं। उनके विचार जन-जन तक पहुँचें, यही कामना और प्रयत्न है। इसी तरह हिंदी पथ पर आते रहें और टिप्पणियों के माध्यम से हमें अपने विचारों से अवगत कराते रहें।

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  • संजय स्वामी

    श्रेष्ठ संकलन
    साधुवाद
    -संजय स्वामी

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    • HindiPath

      उत्साह बढ़ाने के लिए बहुत-बहुत, संजय जी। इसी तरह पढ़ते रहें और हमारा मार्गदर्शन करते रहें।

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