वेदान्त – स्वामी विवेकानंद का जाफना में दिया भाषण

जफना के हिन्दुओं द्वारा निम्नलिखित मानपत्र स्वामी विवेकानन्द की सेवा में भेंट किया गया :

श्रीमत् विवेकानन्द स्वामी
महानुभाव,

आज हम जफना-निवासी हिन्दूधर्मावलम्बी आपका हार्दिक स्वागत करते हैं तथा आपने हमारा निमन्त्रण स्वीकार कर लंका के हिन्दू धर्म के इस प्रमुख केन्द्र में पधारने की जो कृपा की है, उसके लिए हम आपके बड़े आभारी है।

लगभग दो हजार वर्ष से अधिक हुए हमारे पूर्वज यहाँ दक्षिण भारत से आये थे और साथ में अपना धर्म भी लाये थे, जिसका संरक्षण इस स्थान के तमिल राजाओं ने किया। परन्तु उन राजाओं के बाद जब पुर्तगाली तथा डच राज्यों की यहाँ स्थापना हुई तब उन्होंने हमारे धर्मानुष्ठानों में हस्तक्षेप प्रारम्भ किया, हमारी धार्मिक विधियों पर प्रतिबन्ध लगा दिये तथा हमारे पवित्र देवालय भी, जिनमें दो अत्यन्त ख्यातिलब्ध थे, उन अत्याचारियों के कठोर हाथों से धराशायी हो गये। इन राष्ट्रों ने यद्यपि इस बात की लगातार चेष्टा की कि हम उनके ईसाई धर्म को स्वीकार कर लें, परन्तु फिर भी हमारे पूर्वज अपने प्राचीन धर्म पर आरूढ़ रहे और हमको उन्हीं से अपना प्राचीन धर्म तथा संस्कृति एक अमूल्य दाय के रूप में प्राप्त हुआ है। अब इस अंग्रेजी राज्य में हम लोगों का केवल महान् जातीय तथा मानसिक पुनरुत्थान ही नहीं हुआ, वरन् हमारे प्राचीन पवित्र भवन भी पुनर्निर्मित हो रहे हैं।

स्वामीजी, आपने जिस उदारता तथा निःस्वार्थ भाव से वेदोक्त धार्मिक सत्य का सन्देश शिकागो धर्ममहासभा में पहुँचाकर हिन्दू धर्म की सेवा की है, भारत के अध्यात्मदर्शन के सिद्धान्तों का जो प्रचार आपने अमेरिका तथा इंग्लैण्ड में किया है तथा पाश्चात्य देशों को हिन्दू धर्म के तत्त्व से परिचित कराकर प्राच्य तथा पाश्चात्य में आपने जो घनिष्ठ सम्बन्ध प्रस्थापित कर दिया है, उसके लिए हम आपके प्रति इस अवसर पर हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करते हैं। हम आपके इसलिए भी बड़े ऋणी हैं कि आज इस भौतिकवाद के युग में आपने हमारे प्राचीन धर्म के पुनरुत्थान का क्रम प्रारम्भ कर दिया है और विशेषकर ऐसे अवसर पर जब कि लोगों में धार्मिक विश्वास का लोप हो रहा है और आध्यात्मिक सत्यान्वेषण के प्रति अश्रद्धा हो रही है।

पाश्चात्य देशों को हमारे प्राचीन धर्म की उदारता समझाकर तथा उन देशों के धुरन्धर विद्वानों के मस्तिष्क में यह सत्य भली भाँति स्थित करके कि पाश्चात्य दर्शन में परिकल्पित तथ्यों की अपेक्षा हिन्दू दर्शन में कहीं अधिक सार है, आपने जो उपकार किया है, उसके लिए समुचित रूप से कृतज्ञता प्रकट करना हमारे सामर्थ्य के बाहर है।

आपको इस बात का आश्वासन दिलाने की हमें आवश्यकता नहीं है कि पाश्चात्य देशों में आपके धर्मप्रचार को हम बड़ी उत्सुकता से देखते रहे हैं तथा धार्मिक क्षेत्र में आपकी निष्ठा तथा सफल प्रयत्नों पर हमें सदैव गर्व तथा हार्दिक आनन्द रहा है। हमें विदित है कि आधुनिक सभ्यता के प्रतीक उन पाश्चात्य नगरों में, जहाँ बौद्धिक क्रियाशीलता, नैतिक विकास और धार्मिक तत्त्वानुसन्धान का दावा किया जाता है, आपके तथा हमारे धार्मिक साहित्य में आपके बहुमूल्य योगदान के जो प्रशंसात्मक सन्दर्भ समाचारपत्रों में आये हैं, उनसे आपके श्लाघ्य एवं महान् कार्य की सहज ही प्रतीति हो जाती है।

आपने हमारे यहाँ उपस्थित होने की जो अनुकम्पा की है उसके लिए हम बहुत कृतज्ञ हैं और आशा करते हैं कि हम लोगों को, जो आप ही के सदृश वेदों के अनुगामी हैं तथा मानते हैं कि वेद ही समस्त आध्यात्मिक ज्ञान का स्रोत है, आपका अपने बीच में स्वागत करने के अनेक अवसर प्राप्त हो सकेंगे।

अन्त में उस परम पिता परमेश्वर से, जिसने अब तक इस महान् धर्मकार्य में आपको इतनी सफलता प्रदान की है, प्रार्थना है कि वह आपको चिरजीवी करे तथा आपके इस श्रेष्ठ धर्मकार्य को आगे बढ़ाने के लिए आपको ओज तथा शक्ति प्रदान करे।

हम हैं आपके विनम्र
जफना के हिन्दू निवासियों के प्रतिनिधि

स्वामी विवेकानन्द जी ने इसका सुन्दर उत्तर दिया और दूसरे दिन सायंकाल वेदान्त पर भाषण किया जिसका विवरण निम्नलिखित है :

स्वामी विवेकानंद का भाषण

विषय तो बहुत बड़ा है, पर समय है कम। एक ही व्याख्यान में हिन्दुओं के धर्म का पूरा पूरा विश्लेषण करना असम्भव है। इसलिए मैं तुम लोगों के समीप अपने धर्म के मूलतत्त्वों का, जितनी सरल भाषा में हो सके, वर्णन करूँगा। जिस हिन्दू नाम से परिचित होना आजकल हम लोगों में प्रचलित है, इस समय उसकी कुछ भी सार्थकता नहीं है, क्योंकि उस शब्द का केवल यह अर्थ था – सिन्धुनद के पार बसनेवाले। प्राचीन फारसियों के गलत उच्चारण से यह सिन्धु शब्द ‘हिन्दू’ हो गया है। वे सिन्धुनद के इस पार रहनेवाले सभी लोगों को हिन्दू कहते थे। इस प्रकार हिन्दू शब्द हमें मिला है। फिर मुसलमानों के शासनकाल से हमने अपने आप यह शब्द अपने लिए स्वीकार कर लिया था। इस शब्द के व्यवहार करने में कोई हानि न भी हो, पर मैं पहले ही कह चुका हूँ कि अब इसकी कोई सार्थकता नहीं रही; क्योंकि तुम लोगों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि वर्तमान समय में सिन्धुनद के इस पारवाले सब लोग प्राचीन काल की तरह एक ही धर्म को नहीं मानते। इसलिए उस शब्द से केवल हिन्दू मात्र का ही बोध नहीं होता, बल्कि मुसलमान, ईसाई, जैन तथा भारत के अन्यान्य अधिवासियों का भी होता है। अतः मैं हिन्दू शब्द का प्रयोग नहीं करूँगा। तो हम किस शब्द का प्रयोग करें? – हम वैदिक (अर्थात् वेद के माननेवाले) अथवा वेदान्ती शब्द का, जो उससे भी अच्छा है, प्रयोग कर सकते हैं। जगत् के अधिकांश मुख्य धर्म कुछ एक विशेष विशेष ग्रन्थों को प्रमाणस्वरूप मान लेते हैं, लोगों का विश्वास है कि ये ग्रन्थ ईश्वर या और किसी दैवी पुरुष के वाक्य है, इसलिए ये ग्रन्थ ही उनके धर्मों की नींव हैं। पाश्चात्य आधुनिक पण्डितों के मतानुसार इन ग्रन्थों में से हिन्दुओं के वेद ही सब से प्राचीन हैं। अतः वेदों के विषय में हमें कुछ जानना चाहिए।

वेद नामक शब्दराशि किसी पुरुष के मुँह से नहीं निकली है। उसका कालनिर्णय अभी नहीं हो पाया है, न आगे होने की सम्भावना है। हम हिन्दुओं के मतानुसार वेद अनादि तथा अनन्त है। एक विशेष बात तुम लोगों को स्मरण रखनी चाहिए, वह यह कि जगत् के अन्यान्य धर्म अपने शास्त्रों को यही कहकर प्रामाणिक सिद्ध करते हैं कि वे ईश्वर-रूप व्यक्ति अथवा ईश्वर के किसी दूत या पैगम्बर की वाणी हैं, पर हिन्दू कहते हैं, वेदों का दूसरा कोई प्रमाण नहीं है, वेद स्वतःप्रमाण है, क्योंकि वेद अनादि-अनन्त हैं, वे ईश्वरीय ज्ञानराशि हैं। वेद कभी लिखे नहीं गये, न कभी सृष्ट हुए, वे अनादि काल से वर्तमान है। जैसे सृष्टि अनादि और अनन्त है, वैसे ही ईश्वर का ज्ञान भी। यह ईश्वरीय ज्ञान ही वेद है। ‘विद्’ धातु का अर्थ है जानना। वेद नामक ज्ञानराशि ऋषि नामधारी पुरुषों के द्वारा आविष्कृत हुई है। ऋषि शब्द का अर्थ है मन्त्रद्रष्टा। पहले ही से वर्तमान ज्ञान को उन्होंने प्रत्यक्ष किया है, वह ज्ञान तथा भाव उनके अपने विचार का फल नहीं था। जब कभी तुम यह सुनो कि वेदों के अमुक अंश के ऋषि अमुक हैं, तब यह मत सोचो कि उन्होंने उसे लिखा या अपनी बुद्धि द्वारा रचा है, बल्कि पहले ही से वर्तमान भावराशि के वे द्रष्टा मात्र हैं – वे भाव अनादि काल से ही इस संसार में विद्यमान थे, ऋषि ने उनका आविष्कार मात्र किया। ऋषिगण आध्यात्मिक आविष्कारक थे।

यह वेद नामक ग्रन्थराशि प्रधानतः दो भागों में विभक्त है – कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड, संस्कारपक्ष और अध्यात्मपक्ष। कर्मकाण्ड में नाना प्रकार के याग-यज्ञों की बातें हैं; उनमें अधिकांश वर्तमान युग के अनुपयोगी होने के कारण परित्यक्त हुए हैं और कुछ अभी तक किसी न किसी रूप में मौजूद हैं। कर्मकाण्ड के मुख्य भाव, जैसे साधारण व्यक्ति के कर्तव्य, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी तथा संन्यासी, इन विभिन्न आश्रमियों के भिन्न भिन्न कर्तव्य अब भी थोड़ा-बहुत माने जा रहे हैं। दूसरा भाग ज्ञानकाण्ड हमारे धर्म का आध्यात्मिक अंश है। उसका नाम वेदान्त है, अर्थात् वेदों का अन्तिम भाग, वेदों का चरम लक्ष्य। वेदज्ञान के इस सार अंश का नाम है वेदान्त अथवा उपनिषद्, और भारत के सभी सम्प्रदायों को – द्वैतवादी, विशिष्टाद्वैतवादी, अद्वैतवादी अथवा सौर, शाक्त, गाणपत्य, शैव, वैष्णव – जो कोई हिन्दू धर्म के भीतर रहना चाहे उसी को वेदों के इस उपनिषद् अंश को मानना पड़ेगा। उनकी अपनी व्याख्याएँ हो सकती हैं और वे उपनिषदों की अपनी अपनी रुचि के अनुसार व्याख्या कर सकते हैं, पर उनको इनका प्रामाण्य अवश्य मानना पड़ेगा। इसीलिए हम हिन्दू शब्द के बदले वेदान्ती शब्द का प्रयोग करना चाहते हैं। भारतवर्ष के सभी दार्शनिकों को, जो सनातनी हैं, वेदान्त का प्रामाण्य स्वीकार करना पड़ा और आजकल भारत में हिन्दू धर्म की चाहे जितनी शाखा-प्रशाखाएँ हों – उनमें से कुछ चाहे जितनी अपरिपक्व क्यों न मालूम हों, उनके उद्देश्य चाहे जितने जटिल क्यों न प्रतीत हों – जो उनको समझता और उनका अच्छी तरह अध्ययन करता है, वह समझेगा कि उन्हें उपनिषदों के भावों से मूल रूप से सम्बद्ध करके देखा जा सकता है। उन उपनिषदों के भाव हमारी जाति की अस्थि-मज्जा में ऐसे घुस गये हैं कि यदि कोई हिन्दू धर्म की बहुत ही अपरिपक्व शाखाओं के रूपकत्व का अध्ययन करेगा, तो वह भी उपनिषद् की रूपकमय अभिव्यक्ति को देखकर चकित रह जाएगा। उपनिषदों के ही तत्त्व कुछ समय बाद इन धर्मों में रूपक की भाँति मूर्तिमान हुए हैं। उपनिषदों के बड़े बड़े आध्यात्मिक और दार्शनिक तत्त्व आज हमारे घरों में पूजा के प्रतीक रूप में परिवर्तित होकर विराजमान हैं। इस प्रकार हम आज जितने पूजा के प्रतीकों का व्यवहार करते हैं, वे सब के सब वेदान्त से आये हैं, क्योंकि वेदान्त में उनका रूपक रूप से प्रयोग किया गया है, फिर क्रमशः वे भाव जाति के मर्मस्थान में प्रविष्ट होकर अन्त में पूजा के प्रतीकों के रूप में उसके दैनिक जीवन के अंग बन गये हैं।

वेदान्त के बाद ही स्मृतियों का प्रमाण है। ये भी ऋषिलिखित ग्रन्थ हैं, पर इनका प्रमाण वेदान्त के अधीन है, क्योंकि ये हमारे लिए वैसे ही है, जैसे दूसरे धर्मवालों के लिए उनके शास्त्र। हम यह मानते हैं कि विशेष ऋषियों ने ये स्मृतियाँ रची हैं, इस दृष्टि से अन्यान्य धर्मों के शास्त्रों का जैसा प्रमाण है, स्मृतियों का भी वैसा है; पर स्मृतियाँ हमारे लिए अन्तिम प्रमाण नहीं। यदि स्मृतियों का कोई अंश वेदान्त का विरोधी हो, तो उसे त्यागना पड़ेगा, उसका कोई प्रमाण न रहेगा। फिर स्मृतियाँ हर युग में बदलती भी गयी हैं। हम शास्त्रों में पढ़ते हैं – सत्ययुग में अमुक स्मृतियों का प्रमाण है, फिर त्रेता, द्वापर और कलियुग में से प्रत्येक युग में अन्यान्य स्मृतियों का। जाति पर पड़नेवाले देश-काल-पात्र के परिवर्तन के प्रभाव के अनुसार आचारों और रीतियों का परिवर्तन होना अनिवार्य है; और स्मृतियों को ही, प्रधानतः इन आचारों और रीतियों का नियामक होने के कारण, समय समय पर बदलना पड़ा है। मैं चाहता हूँ कि तुम लोग इस बात को अच्छी तरह याद रखो। वेदान्त में धर्म के जिन मूलतत्त्वों की व्याख्या हुई है वे अपरिवर्तनीय है। क्यों? – इसलिए कि वे मनुष्य तथा प्रकृति सम्बन्धी अपरिवर्तनीय तत्त्वों पर प्रतिष्ठित हैं, वे कभी बदल नहीं सकते। आत्मा, स्वर्गप्राप्ति आदि की भावना कभी बदलने की नहीं। हजारों वर्ष पहले वे जैसी थीं, अब भी वैसी हैं और लाखों वर्ष बाद भी वैसी ही रहेंगी। परन्तु जो धर्मानुष्ठान हमारी सामाजिक अवस्था और पारस्परिक सम्बन्ध पर निर्भर रहते हैं, समाज के परिवर्तन के साथ वे भी बदल जाएँगे। इसलिए विशिष्ट विधि केवल समयविशेष के लिए हितकर और उचित होगी, न कि दूसरे समय के लिए। इसलिए हम देखते हैं कि किसी समय किसी खाद्यविशेष का विधान रहा है और दूसरे समय नहीं है। वह खाद्य उस विशेष समय के लिए उपयोगी था; पर जलवायु आदि के परिवर्तन तथा अन्यान्य परिस्थितियों की माँग को पूरी करने की दृष्टि से स्मृति ने खाद्य आदि के विषय में विधान बदल दिया है। इसलिए यह स्वतः प्रतीत होता है कि यदि वर्तमान समय में हमारे समाज में किसी परिवर्तन की जरूरत हो तो वह अवश्य ही करना पड़ेगा। ऋषि लोग आकर दिखा देंगे कि किस तरह वह परिवर्तन सम्पन्न करना होगा, परन्तु हमारे धर्म के मूलतत्त्वों का एक कण भी परिवर्तित न होगा; वे ज्यों के त्यों रहेंगे।

इसके बाद पुराण आते हैं। पुराण पंचलक्षण हैं। उनमें इतिहास, ब्रह्माण्डविज्ञान, विविध रूपकों के द्वारा दार्शनिक तत्त्वों के व्याख्यान इत्यादी नाना विषय हैं। वैदिक धर्म को सर्वसाधारण जनता में लोकप्रिय बनाने के लिए पुराणों की रचना हुई। जिस भाषा में वेद लिखे हुए हैं वह अत्यन्त प्राचीन है। पण्डितों में से भी बहुत ही कम लोग उन ग्रन्थों का समयनिर्णय कर सकते हैं। पुराण उस समय के लोगों की भाषा में लिखे गये हैं जिसे हम आधुनिक संस्कृत कह सकते हैं। वे पण्डितों के लिए नहीं, किन्तु साधारण लोगों के लिए हैं, क्योंकि साधारण लोग दार्शनिक तत्त्व नहीं समझ सकते हैं। उन्हें वे तत्त्व समझाने के लिए स्थूल रूप से साधुओं, राजाओं और महापुरुषों के जीवनचरित तथा उस जाति की ऐतिहासिक घटनाओं के सहारे शिक्षा दी जाती थी। धर्म के सनातन तत्त्वों को दृष्टान्त द्वारा समझाने के लिए ही ऋषियों ने इनका उपयोग किया था।

इसके बाद तन्त्र है। ये कई एक विषयों में प्रायः पुराणों ही के समान हैं और उनमें से कुछ में कर्मकाण्ड के अन्तर्गत प्राचीन याग-यज्ञों की पुनःप्रतिष्ठा का प्रयत्न किया गया है।

ये सब ग्रन्थ हिन्दुओं के शास्त्र हैं। और जिस राष्ट्र तथा जाति में इतने अधिक शास्त्र विद्यमान हैं और जिसने अपनी शक्ति का अधिकांश – किसी को ज्ञात नहीं कि कितने हजार वर्षों तक – दार्शनिक और आध्यात्मिक विचारों में नियोजित किया है, उसमें इतने अधिक सम्प्रदायों का उद्भव होना बहुत ही स्वाभाविक है। आश्चर्य की बात है कि और भी हजारों सम्प्रदाय क्यों नहीं हुए। किसी किसी विषय पर इन सम्प्रदायों में आपस में गहरा मतभेद है। सम्प्रदायों के धार्मिक विचारों के विस्तार में जाने या उनके पारस्परिक छोटे छोटे मतभेदों का पता लगाने का अब हमें अवकाश नहीं। इसलिए हम सम्प्रदायों की सामान्य भावभूमियों और मूलतत्त्वों की विवेचना करेंगे जिन पर हिन्दू मात्र का विश्वास रहना चाहिए।

पहला प्रश्न सृष्टि का है। सभी हिन्दू मानते हैं कि यह संसार, यह प्रकृति या माया अनादि और अनन्त है। जगत् किसी एक विशेष दिन रचा नहीं गया। एक ईश्वर ने आकर इस जगत् की सृष्टि की और बाद में वह सो रहा, यह हो नहीं सकता। सर्जन की शक्ति निरन्तर गतिशील है। ईश्वर अनन्तकाल से सृष्टि रच रहा है – वह कभी आराम नहीं करता। गीता का वह अंश स्मरण करो जहाँ श्रीकृष्ण कह रहे हैं, “यदि मैं क्षण भर के लिए विश्राम लूँ, तो यह जगत् नष्ट हो जाए।”1 यदि वह सर्जनशक्ति जो दिनरात हमारे चारों ओर क्रियाशील है, क्षण भर के लिए रुक जाए तो यह संसार मिट जाए। ऐसा समय कभी न था जब वह शक्ति विश्व भर में क्रियाशील न थी; पर हाँ, कल्प का नियम है और कल्पान्त में प्रलय का सिद्धान्त भी है। हमारी संस्कृति के ‘सृष्टि’ शब्द का अंग्रेजी में ठीक से अनुवाद किया जाए तो वह ‘प्रोजेक्शन’ (projection) होना चाहिए, ‘क्रियेशन’ (creation) नहीं। खेद का विषय है कि अंग्रेजी में ‘क्रियेशन’ शब्द का अर्थ है – असत् से सत् की उत्पत्ति या अभाव से भाववस्तु का उद्भव। शून्य से संसार का उदय – यह एक भयंकर और अयौक्तिक मत है। ऐसी बात मान लेने को कहकर मैं तुम लोगों की बुद्धि का अपमान नहीं करना चाहता। ‘सृष्टि’ का ठीक प्रतिशब्द है ‘प्रोजेक्शन’। सारी प्रकृति सदा विद्यमान रहती है, केवल प्रलय के समय वह क्रमशः सूक्ष्म से सूक्ष्म होती जाती है और अन्त में एकदम अव्यक्त हो जाती है। फिर कुछ काल के विश्राम के बाद मानो कोई उसे पुनः प्रक्षेपित करता है; तब पहले ही की तरह समवाय, वैसा ही विकास, वैसे ही रूपों के प्रकाशन का क्रीड़ाक्रम चलता रहता है। कुछ काल तक यह क्रीड़ा चलती रहती है, फिर वह नष्ट हो जाता है, सूक्ष्म से सूक्ष्म हो जाता है और अन्त में लीन हो जाता है। और पुनः वह निकल आता है। अनन्तकाल से वह लहरों की चाल के सदृश एक बार सामने आ जाता है और फिर पीछे हट जाता है। देश, काल, निमित्त तथा अन्यान्य सब कुछ इसी प्रकृति के अन्तर्गत है। इसीलिए यह कहना कि सृष्टि का आदि है बिल्कुल निरर्थक है। सृष्टि का आदि है अथवा अन्त, यह प्रश्न ही नहीं उठ सकता; इसीलिए जहाँ कहीं हमारे शास्त्रों में सृष्टि के आदि-अन्त का उल्लेख हुआ है, वहाँ यह स्मरण रखना चाहिए कि उससे कल्पविशेष के आदि-अन्त का तात्पर्य है; इससे अधिक कुछ भी नहीं।

यह सृष्टि किसने की? ईश्वर ने। अंग्रेजी में ‘गॉड’ शब्द का जो प्रचलित अर्थ है, उससे मेरा मतलब नहीं। निश्चय ही उस अर्थ में नहीं, बल्कि उससे काफी भिन्न अर्थ में प्रयोग का मेरा अभिप्राय है। अंग्रेजी में और कोई उपयुक्त शब्द नहीं है। संस्कृत ‘ब्रह्म’ शब्द का प्रयोग करना ही सब से अधिक युक्तिसंगत है। वही इस जगत्-प्रपंच का सामान्य कारण है। ब्रह्म क्या है? वह नित्य, नित्यशुद्ध, नित्यबुद्ध, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, परम दयामय, सर्वव्यापी, निराकार, अखण्ड है। वह इस जगत् की सृष्टि करता है। अब यदि कहें कि यही ब्रह्म संसार का नित्य स्रष्टा और विधाता है, तो इसमें दो आपत्तियाँ उठ खड़ी होती है। हम देखते हैं कि जगत् में पक्षपात है। एक मनुष्य जन्मसुखी है, तो दूसरा जन्मदुःखी; एक धनी है तो दूसरा गरीब। इससे पक्षपात प्रतीत होता है। फिर यहाँ निष्ठुरता भी है, क्योंकि यहाँ एक जीवन दूसरे की मृत्यु के ऊपर निर्भर करता है। एक प्राणी दूसरे को टुकड़े टुकड़े कर डालता है, और हर एक मनुष्य अपने भाई का गला दबाने की चेष्टा करता है। यह प्रतिद्वन्द्विता, निष्ठुरता, घोर अत्याचार और दिनरात की आह, जिसे सुनकर कलेजा फट जाता है – यही हमारे संसार का हाल है। यदि यही ईश्वर की सृष्टि हुई तो वह ईश्वर निष्ठुर से भी बदतर है, उस शैतान से भी गया-गुजरा है जिसकी मनुष्य ने कभी कल्पना की हो। वेदान्त कहता है कि यह ईश्वर का दोष नहीं है जो जगत् में यह पक्षपात, या प्रतिद्वंद्विता वर्तमान है। तो किसने इसकी सृष्टि की? स्वयं हमीं ने। एक बादल सभी खेतों पर समान रूप से पानी बरसाता रहता है। पर जो खेत अच्छी तरह जोता हुआ है वही इस वर्षा से लाभ उठाता है। एक दूसरा खेत जो जोता नहीं गया, या जिसकी देखरेख नहीं की गयी, उससे लाभ नहीं उठा सकता। यह बादल का दोष नहीं। ईश्वर की कृपा नित्य और अपरिवर्तनीय है; हमीं लोग वैषम्य के कारण हैं। लेकिन कोई जन्म से ही सुखी है और दूसरा दुखी, इस वैषम्य का कारण क्या हो सकता है? वे तो ऐसा कुछ नहीं करते जिससे यह वैषम्य उत्पन्न हो। उत्तर यह है कि इस जन्म में न सही, पूर्वजन्म में उन्होंने अवश्य किया होगा, और यह वैषम्य पूर्वजन्म के कर्मों ही के कारण हुआ है।

अब हम उस दूसरे तत्त्व पर विचार करेंगे, जिस पर केवल हिन्दू ही नहीं बल्कि सभी बौद्ध और जैन भी सहमत हैं। हम सब यह स्वीकार करते हैं कि जीवन अनन्त है। ऐसा नहीं है कि शून्य से इसकी उत्पत्ति हुई हो, क्योंकि यह हो ही नहीं सकता। ऐसा जीवन भला कौन माँगेगा? हर एक वस्तु, जिसकी काल में उत्पत्ति हुई है, काल ही में लीन होगी। यदि जीवन कल ही शुरू हुआ हो तो अगले दिन इसका अन्त भी होगा, और पूर्ण विश्वास इसका फल होगा। जीवन सदा से अवश्य रहा होगा। आज यह बात समझने में बहुत विचारशक्ति की आवश्यकता नहीं, क्योंकि आधुनिक सभी विज्ञान इस विषय में हमें सहायता दे रहे हैं – वे जड़ जगत् की घटनाओं से हमारे शास्त्रों में लिखे हुए तत्त्वों की व्याख्या कर रहे हैं। तुम लोग यह जानते ही हो कि हममें से प्रत्येक मनुष्य अनादी अतीत कर्मसमष्टि का फल है; बच्चा जब संसार में पैदा होता है तब वह प्रकृति के हाथ से एकदम निकलकर नहीं आता – जैसे कवि बड़े आनन्द से वर्णन करते हैं – वरन् उस पर अनादि अतीत काल का बोझ रहता है। भला हो चाहे बुरा, वह यहाँ अपने पूर्वकृत कर्मों का फल भोगने आता है। उसी से इस वैषम्य की सृष्टि हुई है। यही कर्मविधान है। हममें से प्रत्येक मनुष्य अपना अपना भाग्य गढ़ रहा है। इसी मतवाद द्वारा भवितव्यतावाद तथा अदृष्टवाद का खण्डन होता है तथा ईश्वर और मनुष्य में सामंजस्य स्थापित करने का एकमात्र उपाय इसी से मिलता है। हम, हम ही लोग अपने फलभोगों के लिए जिम्मेदार हैं, दूसरा कोई नहीं। हम ही कार्य है और हम ही कारण। अतः हम स्वतन्त्र है। यदि मैं दुःखी हूँ तो यह अपने ही किये का फल है और उसी से पता चलता है कि यदि मैं चाहूँ तो सुखी हो सकता हूँ। यदि मैं अपवित्र हूँ तो वह भी मेरा अपना ही किया हुआ है, और उसी से ज्ञात होता है कि यदि मैं चाहूँ तो पवित्र भी हो सकता हूँ। मनुष्य की इच्छाशक्ति किसी भी परिस्थिति के अधीन नहीं। इसके सामने – मनुष्य की प्रबल, विराट्, अनन्त इच्छाशक्ति और स्वतन्त्रता के सामने – सभी शक्तियाँ, यहाँ तक कि प्राकृतिक शक्तियाँ भी झुक जाएँगी, दब जाएँगी और इसकी गुलामी करेंगी। यही कर्मविधान का फल है।

दूसरा प्रश्न स्वभावतः यही होगा कि आत्मा क्या है? अपने शास्त्रों में कहे हुए ईश्वर को भी हम बिना आत्मा को जाने नहीं समझ सकते। भारत में और भारत के बाहर भी बाह्य प्रकृति के अध्ययन द्वारा सर्वातीत सत्ता की झलक पाने के प्रयत्न हो चुके हैं और हम सभी जानते हैं कि इनका क्या शोचनीय फल निकला। अतीत वस्तु की झलक पाने के बदले जितना ही हम जड़ जगत् का अध्ययन करते हैं उतने ही हम भौतिकवादी होते जाते हैं। जड़ जगत् को हम जितना नियन्त्रित करना चाहते हैं, उतनी ही हमारी शेष आध्यात्मिकता भी काफूर होती जाती है, इसीलिए अध्यात्म का – ब्रह्मतत्त्व के ज्ञान का – यह रास्ता नहीं। अपने अन्दर, अपनी आत्मा के अन्दर उसका अनुसन्धान करना होगा। बाह्य जगत् की घटनाएँ उस सर्वातीत अनन्त सत्ता के विषय में हमें कुछ नहीं बताती है, केवल अन्तर्जगत् के अन्वेषण से ही उसका पता चल सकता है। अतः आत्मतत्त्व के अन्वेषण तथा उसके विश्लेषण द्वारा ही परमात्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त होना सम्भव है। जीवात्मा के स्वरूप के विषय में भारत के विभिन्न सम्प्रदायों में मतभेद है सही, पर उनमें कुछ बातों में मतैक्य भी है। हम सभी मानते हैं कि सभी जीवात्मा आदि-अन्तरहित है और स्वरूपतः अविनाशी है, और यह भी कि सर्वविध शक्ति, आनन्द, पवित्रता, सर्वव्यापकता और सर्वज्ञता प्रत्येक आत्मा में अन्तर्निहित है। यह एक महान् तत्त्व है जिसे हमको स्मरण रखना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य और प्रत्येक प्राणी में, वह चाहे जितना दुर्बल या दुष्ट, बड़ा या छोटा हो, वही सर्वव्यापी सर्वज्ञ आत्मा विराजमान है। अन्तर आत्मा में नहीं, उसकी बाह्य अभिव्यक्ति में हैं। मुझमें और एक छोटे से छोटे प्राणी में अन्तर केवल बाह्य अभिव्यक्ति में है, पर सिद्धान्ततः वह और मैं एक ही हैं, वह मेरा भाई है, उसकी और मेरी आत्मा एक ही है। यही सब से महान् तत्त्व है; इसी का भारत ने जगत् में प्रचार किया है। मानवजाति में भ्रातृभाव की जो बात अन्यान्य देशों में सुन पड़ती है उसने भारत में समस्त चेतन सृष्टि में भ्रातृभाव का रूप धारण किया है, जिसमें सभी प्राणी – छोटी छोटी चीटियों तक सभी जीव – शामिल हैं, ये सभी हमारे शरीर हैं। हमारा शास्त्र भी कहता है, “इसी तरह पण्डित लोग उस प्रभु को सर्वभूतमय जानकर सब प्राणियों की ईश्वरबुद्धि से उपासना करें।”2 यही कारण है कि भारतवर्ष में गरीबों तथा सभी पशुओं, प्राणियों और वस्तुओं के बारे में ऐसी करुणापूर्ण धारणाएँ पोषण की जाती हैं। हमारी आत्मासम्बन्धी धारणाओं की सर्वमान्य भूमियों में एक यह भी है।

अब हम स्वभावतः ईश्वरतत्त्व पर आते हैं। परन्तु एक बात आत्मा के सम्बन्ध में और रह गयी। जो लोग अंग्रेजी भाषा का अध्ययन करते हैं, उन्हें प्रायः ‘सोल’ और ‘माइण्ड’ (आत्मा और मन) के अर्थ में भ्रम हो जाता है। संस्कृत ‘आत्मा’ और अंग्रेजी ‘सोल’ ये दोनों शब्द पूर्णतः भिन्नार्थवाचक हैं। हम जिसे ‘मन’ कहते हैं, पश्चिम के लोग उसे ‘सोल’ (आत्मा) कहते हैं। पश्चिमदेशवालों को आत्मा का यथार्थ ज्ञान पहले कभी नहीं था; कोई बीस वर्ष हुए संस्कृत दर्शनशास्त्रों से यह ज्ञान उन्हें प्राप्त हुआ है। यह हमारा स्थूल शरीर है, इसके पीछे मन है, किन्तु यह मन आत्मा नहीं है। यह सूक्ष्म शरीर है – सूक्ष्म तन्मात्राओं का बना हुआ है। यही जन्म और मृत्यु के फेर में पड़ा हुआ है। परन्तु मन के पीछे है आत्मा – मनुष्यों की यथार्थ सत्ता। इस आत्मा शब्द का अनुवाद ‘सोल’ या ‘माइण्ड’ नहीं हो सकता। अतएव हम ‘आत्मा’ शब्द का ही प्रयोग करेंगे अथवा आजकल के पाश्चात्य दार्शनिकों के मतानुसार ‘सेल्फ’ शब्द का। तुम चाहे जिस शब्द का प्रयोग करो; किन्तु तुम्हें यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि स्थूल शरीर तथा मन, दोनों से आत्मा पृथक् है, और वही आत्मा, मन या सूक्ष्म शरीर के साथ, जन्म और मृत्यु के चक्र में घूम रहा है। और जब समय आता है और उसे सर्वज्ञत्व तथा पूर्णत्व प्राप्त होता है, तब यह जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त हो जाता है। फिर वह स्वतन्त्र होकर चाहे तो मन या सूक्ष्म शरीर को रख सकता है, अथवा उसे त्यागकर चिरकाल के लिए स्वाधीन और मुक्त रह सकता है। जीवात्मा का लक्ष्य मुक्ति ही है। हमारे धर्म की यही एक विशेषता है। हमारे धर्म में भी स्वर्ग और नरक हैं, परन्तु वे चिरस्थायी नहीं है, क्योंकि प्रकृतितः स्वर्ग और नरक के स्वरूप पर विचार करने से यह सहज ही मालूम हो जाएगा कि ये चिरस्थायी नहीं हो सकते। यदि स्वर्ग हो भी तो वहाँ बृहत्तर पैमाने पर मर्त्यलोक की ही पुनरावृत्ति होगी, वहाँ सुख कुछ अधिक हो सकता है, भोग कुछ ज्यादा होगा, परन्तु इससे आत्मा का अशुभ ही अधिक होगा। ऐसे स्वर्ग अनेक है। इहलोक में जो लोग फलप्राप्ति की इच्छा से सत्कर्म करते हैं वे लोग मृत्यु के बाद ऐसे ही किसी स्वर्ग में देवताओं के रूप में जन्म लेते हैं, जैसे इन्द्र अथवा अन्य इसी प्रकार के देवता। यह देवत्व एक पदविशेष है। देवता भी किसी समय मनुष्य थे और सत्कर्मों के कारण उन्हें देवत्व की प्राप्ति हुई। इन्द्र आदि किसी देवताविशेष के नाम नहीं हैं। हजारों इन्द्र होंगे। नहुष महान् राजा था और उसने मृत्यु के पश्चात् इन्द्रत्व पाया था। इन्द्रत्व केवल एक पद है। किसी ने अच्छे कर्म किये, फलस्वरूप उसकी उन्नति हुई और उसने इन्द्रत्व का पद पाया, कुछ दिन उसी पद पर प्रतिष्ठित रहा, फिर उस देवशरीर को छोड़ मनुष्य का तन धारण किया। मनुष्य का जन्म सब जन्मों से श्रेष्ठ है। कोई कोई देवता स्वर्गसुख की इच्छा छोड़ मुक्तिप्राप्ति की चेष्टा कर सकते हैं, परन्तु जिस प्रकार इस संसार के अधिकांश लोगों को धन, मान और भोग विभ्रम में डाल देते हैं, उसी प्रकार अधिकांश देवता भी मोहग्रस्त हो जाते हैं और अपने शुभ कर्मों का फल भोगकर पतित होते हैं और फिर मानवशरीर धारण करते हैं। अतएव यह पृथ्वी ही कर्मभूमि है। इस पृथ्वी ही से हम मुक्तिलाभ कर सकते हैं। अतः ये स्वर्ग भी इस योग्य नहीं कि इनकी कामना की जाए।

तो फिर हमें क्या चाहिए? – मुक्ति। हमारे शास्त्र कहते हैं कि ऊँचे ऊँचे स्वर्गों में भी तुम प्रकृति के दास हो। बीस हजार वर्ष तक तुमने राज्यभोग किया; पर इससे हुआ क्या? जब तक तुम्हारा शरीर रहेगा, जब तक तुम सुख के दास रहोगे, जब तक देश और काल का तुम पर प्रभुत्व है, तब तक तुम दास ही हो। इसीलिए हमें बाह्यप्रकृति और अन्तःप्रकृति – दोनों पर विजय प्राप्त करनी होगी। प्रकृति को तुम्हारे पैरों तले रहना चाहिए और इसे पददलित कर इससे बाहर निकलकर तुमको स्वाधीन और महिमामण्डित होना चाहिए। तब जीवन नहीं रह जाएगा, अतएव मृत्यु भी नहीं होगी। तब सुख का प्रश्न नहीं होगा, अतएव दुःख भी नहीं होगा। यही सर्वातीत, अव्यक्त, अविनाशी आनन्द है। यहाँ जिसे हम सुख और कल्याण कहते हैं, वह उसी अनन्त आनन्द का एक कणमात्र है। वही अनन्त आनन्द हमारा लक्ष्य है।

आत्मा लिंगभेदरहित है। आत्मा के विषय में यह नहीं कहा जा सकता कि वह पुरुष है या स्त्री। यह स्त्री और पुरुष का भेद तो केवल देह के सम्बन्ध में है। अतएव आत्मा पर स्त्री-पुरुष के भेद का आरोप करना केवल भ्रम है – यह लिंगभेद शरीर के विषय में ही सत्य है। आत्मा की आयु का भी निर्देश नहीं किया जा सकता। वह पुरातन पुरुष सदा समस्वरूप ही में वर्तमान है। तो यह आत्मा संसार में बद्ध किस प्रकार हो गयी? इस प्रश्न का केवल एक ही उत्तर शास्त्र देते हैं। अज्ञान ही इस समस्त बन्धन का कारण है। हम अज्ञान के ही कारण बँधे हुए है। ज्ञान से अज्ञान दूर होगा, यही ज्ञान हमें उस पार ले जाएगा। तो इस ज्ञानप्राप्ति का क्या उपाय है? – प्रेम और भक्ति से, ईश्वराराधन द्वारा और सर्वभूतों को परमात्मा का मन्दिर समझकर प्रेम करने से ज्ञान होता है। इस प्रकार अनुराग की प्रबलता से ज्ञान का उदय होगा और अज्ञान दूर होगा, सब बन्धन टूट जाएँगे और आत्मा को मुक्ति मिलेगी।

हमारे शास्त्रों में परमात्मा के दो रूप कहे गये हैं – सगुण और निर्गुण। सगुण ईश्वर के अर्थ से वह सर्वव्यापी है, संसार की सृष्टि, स्थिति और प्रलय का कर्ता है, संसार का अनादि जनक तथा जननी है, उसके साथ हमारा नित्य भेद है और मुक्ति का अर्थ – उसके सामीप्य और सालोक्य की प्राप्ति है। सगुण ब्रह्म के ये सब विशेषण निर्गुण ब्रह्म के सम्बन्ध में अनावश्यक और अतार्किक मानकर त्याग दिये गये हैं। वह निर्गुण और सर्वव्यापी पुरुष ज्ञानवान् नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ज्ञान मानव-मन का धर्म है। वह चिन्तनशील नहीं कहा जा सकता; क्योंकि चिन्तन ससीम जीवों के ज्ञानलाभ का उपाय मात्र है। वह विचारपरायण नहीं कहा जा सकता; क्योंकि विचार भी ससीम है और दुर्बलता का चिह्न मात्र है। वह सृष्टिकर्ता भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि जो बन्धन में है वही सृष्टि की ओर प्रवृत्त होता है। उसका बन्धन ही क्या हो सकता है? कोई बिना प्रयोजन के कोई काम नहीं कर सकता; उसे फिर प्रयोजन क्या है? कामनापूर्ति के लिए ही सब काम करते है। उसे क्या कामना है? वेदों में उसके लिए ‘सः’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया; ‘सः’ शब्द द्वारा निर्देश न करके निर्गुण भाव समझाने के लिए ‘तत्’ शब्द द्वारा उसका निर्देश किया गया है। ‘सः’ शब्द के कहे जाने से वह व्यक्तिविशेष हो जाता, इससे जीव-जगत् के साथ उसका सम्पूर्ण पार्थक्य सूचित हो जाता है। इसलिए निर्गुणवाचक ‘तत्’ शब्द का प्रयोग किया गया है और ‘तत्’ शब्द से निर्गुण ब्रह्म का प्रचार हुआ है। इसी को अद्वैतवाद कहते हैं।

इस निर्गुण पुरुष के साथ हमारा क्या सम्बन्ध है? यह कि हम उससे अभिन्न हैं, वह और हम एक हैं। हर एक मनुष्य सब प्राणियों के मूलकारणरूप उसी निर्गुण पुरुष की अलग अलग अभिव्यक्ति है। जब हम इस अनन्त और निर्गुण पुरुष से अपने को पृथक् सोचते हैं तभी हमारे दुःख की उत्पत्ति होती है और इस अनिर्वचनीय निर्गुण सत्ता के साथ अभेदज्ञान ही मुक्ति है। संक्षेपतः, हम अपने शास्त्रों में ईश्वर के इन्हीं दोनों भावों का उल्लेख देखते है।

यहाँ यह कहना आवश्यक है कि निर्गुण ब्रह्मवाद की भावना के माध्यम से ही किसी प्रकार के आचरणशास्त्र के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जा सकता है। अति प्राचीन काल ही से प्रत्येक जाति में यह सत्य प्रचारित किया गया है कि अपने सहजीवों को अपने समान प्यार करो, मानवप्राणी को आत्मवत् प्यार करना चाहिए। फिर हमने तो मनुष्य और इतर प्राणियों में कोई भेद ही नहीं रखा – भारत में सभी को आत्मवत् प्यार करने का उपदेश दिया गया है। परन्तु अन्य प्राणियों को आत्मवत् प्यार करने से क्यों कल्याण होगा, इसका कारण किसी ने नहीं बताया। एकमात्र निर्गुण ब्रह्मवाद ही इसका कारण बतलाने में समर्थ है। यह तुम सभी समझोगे, जब तुम सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की एकात्मता, विश्व की एकता और जीवन के अखण्डत्व का अनुभव करोगे – जब तुम समझोगे कि दूसरे को प्यार करना अपने ही को प्यार करना है तथा दूसरे को हानि पहुँचाना अपनी ही हानि करना है। तभी हम समझेंगे कि दूसरे का अहित करना क्यों अनुचित है। अतएव, यह निर्गुण ब्रह्मवाद ही आचरणशास्त्र का मूल कारण माना जा सकता है। अद्वैतवाद का प्रसंग उठाते हुए उसमें सगुण ब्रह्म का प्रश्न भी आ जाता है। सगुण ब्रह्म पर विश्वास हो तो हृदय में कैसा अपूर्व प्रेम उमड़ता है, यह मैं जानता हूँ। मैं अच्छी तरह समझता हूँ कि भिन्न भिन्न समय की आवश्यकतानुसार मनुष्यों पर भक्ति की शक्ति और सामर्थ्य का कैसा प्रभाव पड़ा है। परन्तु हमारे देश में अब रोने का समय नहीं है, कुछ वीरता की आवश्यकता है। इस निर्गुण ब्रह्म पर विश्वास कर सब प्रकार के भ्रमों से मुक्त हो ‘मैं ही वह निर्गुण ब्रह्म हूँ’ – इस ज्ञान के सहारे अपने ही पैरों पर खड़े होने से हृदय में कैसी अद्भुत शक्ति भर जाती है! और फिर भय? मुझे किसका भय है? मैं प्रकृति के नियमों की भी परवाह नहीं करता। मृत्यु मेरे निकट उपहास है। मनुष्य तब अपनी उस आत्मा की महिमा में प्रतिष्ठित हो जाता है, जो असीम अनन्त है, अविनाशी है, जिसे कोई शस्त्र छेद नहीं सकता, आग जला नहीं सकती, पानी गीला नहीं कर सकता, वायु सुखा नहीं सकती,3 – जो असीम है, जन्ममृत्यु-रहित है, तथा जिसकी महत्ता के सामने सूर्यचन्द्रादि, यहाँ तक कि सारा ब्रह्माण्ड, सिन्धु में बिन्दुतुल्य प्रतीत होता है, – जिसकी महत्ता के सामने देश और काल का भी अस्तित्व लुप्त हो जाता है। हमें इसी महामहिम आत्मा पर विश्वास करना होगा, इसी इच्छा से शक्ति प्राप्त होगी। तुम जो कुछ सोचेगे, तुम वही हो जाओगे। यदि तुम अपने को दुर्बल समझोगे, तो तुम दुर्बल हो जाओगे; वीर्यवान् सोचोगे तो वीर्यवान् बन जाओगे। यदि तुम अपने को अपवित्र सोचोगे तो तुम अपवित्र हो जाओगे; अपने को शुद्ध सोचोगे तो शुद्ध हो जाओगे। इससे हमको शिक्षा मिलती है कि हम अपने को कमजोर न समझें, प्रत्युत अपने को वीर्यवान्, सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ मानें। यह भाव हममें चाहे अब तक प्रकाशित न हुआ हो, किन्तु वह हमारे भीतर है जरूर। हमारे भीतर सम्पूर्ण ज्ञान, सारी शक्तियाँ, पूर्ण पवित्रता और स्वाधीनता के भाव विद्यमान है। फिर हम उन्हें जीवन में प्रकाशित क्यों नहीं कर सकते? क्योंकि उन पर हमारा विश्वास नहीं है। यदि हम उन पर विश्वास कर सकें, तो उनका विकास होगा – अवश्य होगा। निर्गुण ब्रह्म से हमें यही शिक्षा मिलती है। बिल्कुल बचपन से ही बच्चों को बलवान् बनाओ – उन्हें दुर्बलता अथवा किसी बाहरी अनुष्ठान की शिक्षा न दी जाए। वे तेजस्वी हों, अपने ही पैरों पर खड़े हो सकें – साहसी, सर्वविजयी, सब कुछ सहनेवाले हों। परन्तु सब से पहले उन्हें आत्मा की महिमा की शिक्षा मिलनी चाहिए। यह शिक्षा वेदान्त में – केवल वेदान्त में ही प्राप्त होगी। वेदान्त में अन्यान्य धर्मों की तरह भक्ति, उपासना आदि की भी अनेक बातें हैं – यथेष्ट मात्रा में हैं; परन्तु मैं जिस आत्मतत्त्व की बात कह रहा हूँ, वही जीवन है, शक्तिप्रद है और अत्यन्त अपूर्व है। केवल वेदान्त में ही वह महान् तत्त्व है जिससे सारे संसार के भावजगत् में क्रान्ति होगी और भौतिक जगत् के ज्ञान के साथ धर्म का सामंजस्य स्थापित होगा।

तुम्हारे सम्मुख मैंने अपने धर्म के मुख्य तत्त्वों को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। अब मुझे उनके प्रयोग और अभ्यास के बारे में कुछ शब्द कहना है। मैंने पहले ही कहा है कि भारत की वर्तमान परिस्थिति के अनुसार उसमें अनेक सम्प्रदायों का रहना स्वाभाविक है। अतः यहाँ अनेक सम्प्रदाय देखने को मिलते हैं। और साथ ही यह जानकर आश्चर्य होता है कि ये सम्प्रदाय आपस में लड़ते-झगड़ते नहीं। शैव यह नहीं कहता कि हर एक वैष्णव जहन्नुम को जा रहा है, न वैष्णव ही शैव को यह कहता है। शैव कहता है कि यह हमारा मार्ग है, तुम अपने में रहो, अन्त में हम एक ही जगह पहुँचेंगे। यह बात भारत के सभी मनुष्य जानते हैं। यही इष्टनिष्ठा का सिद्धान्त है। अति प्राचीन काल से यह स्वीकृत रहा है कि ईश्वर की उपासना की कितनी ही पद्धतियाँ है। यह भी माना गया है कि भिन्न भिन्न स्वभाव के मनुष्यों के लिए भिन्न भिन्न मार्ग आवश्यक हैं। ईश्वर तक पहुँचने का तुम्हारा रास्ता, सम्भव है, मेरा न हो। सम्भव है, उससे मेरी क्षति हो। यह धारणा कि हर एक के लिए एक ही मार्ग है – हानिकर है, निरर्थक है और सर्वथा त्याज्य है। यदि हर एक मनुष्य का धार्मिक मत एक हो जाए और हर एक एक ही मार्ग का अवलम्बन करने लगे तो संसार के लिए वह बड़ा बुरा दिन होगा। तब तो सब धर्म और सारे विचार नष्ट हो जाएँगे। सब लोगों की स्वाधीन विचारशक्ति और वास्तविक विचारभाव नष्ट हो जाएँगे। वैभिन्य ही जीवन का मूलसूत्र है। इसका यदि अन्त हो जाए तो सारी सृष्टि का लोप हो जाएगा। यह भिन्नता जब तक विचारों में रहेगी तब तक हम अवश्य जीते रहेंगे। अतएव इस भिन्नता के कारण हमें लड़ना नहीं चाहिए। तुम्हारा मार्ग तुम्हारे लिए अत्युत्तम है, परन्तु हमारे लिए नहीं। मेरा मार्ग मेरे लिए अच्छा है, पर तुम्हारे लिए नहीं। इसी मार्ग को संस्कृत में इष्ट कहते हैं। अतएव याद रखो, संसार के किसी भी धर्म से हमारा विरोध नहीं है, क्योंकि हर एक का इष्ट भिन्न है। परन्तु, जब हम मनुष्यों को आकर यह कहते हुए सुनते हैं कि ‘एकमात्र मार्ग केवल यही है’ और जब भारत जैसे असाम्प्रदायिक देश में लोगों के ऊपर उसे लादने की उन्हें कोशिश करते देखते हैं, तब हमें हँसी आ जाती है। क्योंकि जो मनुष्य ऐसे हैं कि अपने भाइयों को, एक दूसरे पथ से ईश्वर की ओर जाते हुए देख, उनका सत्यानाश करना चाहते हैं, उनके लिए प्यार की चर्चा करना वृथा है। उनके प्रेम का मोल कुछ नहीं है। प्रेम का प्रचार वे किस तरह कर सकते हैं, जब वे किसी को एक दूसरे मार्ग से ईश्वर की ओर जाते नहीं देख सकते? यदि यह प्रेम है तो फिर द्वेष क्या हुआ? हमारा झगड़ा संसार के किसी भी धर्म से नहीं है, चाहे वह मनुष्यों को ईसा की पूजा करने की शिक्षा दे अथवा मुहम्मद की अथवा किसी दूसरे मसीहा की। हिन्दू कहते हैं – “प्यारे भाइयो! मैं तुम्हारी सादर सहायता करूँगा, परन्तु तुम भी मुझे अपने मार्ग पर चलने दो। यही हमारा इष्ट है। तुम्हारा मार्ग बहुत अच्छा है, इसमें कोई सन्देह नहीं, परन्तु वह मेरे लिए, सम्भव है, घोर हानिकर हो। मेरा अपना अनुभव मुझे बताता है कि कौनसा भोजन मेरे लिए अच्छा है। यह बात डाक्टरों का समूह भी मुझे नहीं बता सकता। इसी प्रकार स्वयं के अनुभव से मैं जानता हूँ, कौनसा मार्ग मेरे लिए सर्वोत्तम है।” यही लक्ष्य है – इष्ट है; और इसीलिए हम कहते हैं कि यदि मन्दिर, प्रतीक या प्रतिमा के सहारे तुम अपने भीतर आत्मा में स्थित परमेश्वर को जान सको तो इसके लिए हमारी ओर से बधाई है। चाहो तो दो सौ मूर्तियाँ गढ़ो। यदि किसी नियम-अनुष्ठान द्वारा तुम ईश्वर को प्राप्त कर सको, तो बिना विलम्ब उसका अनुष्ठान करो। चाहे जो क्रिया हो, चाहे जो अनुष्ठान हो, यदि वह तुम्हें ईश्वर के समीप ले जा रहा है तो उसी को ग्रहण करो, जिस किसी मन्दिर में जाने से तुम्हें ईश्वरलाभ में सहायता मिले तो वहीं जाकर उपासना करो। परन्तु उन मार्गों पर विवाद मत करो। जिस समय तुम विवाद करते हो, उस समय तुम ईश्वर की ओर नहीं जाते, बढ़ते नहीं, वरन् उल्टे पशुत्व की ओर चले जाते हो।

यही कुछ बातें हमारे धर्म की है। हमारा धर्म किसी को अलग नहीं करता, वह सभी को समेट लेता है। यद्यपि हमारा जातिभेद और अन्यान्य प्रथाएँ धर्म के साथ आपस में मिली हुई दिखती हैं, तथापि ऐसी बात नहीं। ये प्रथाएँ राष्ट्र के रूप में हमारी रक्षा के लिए आवश्यक थीं। और जब आत्मरक्षा के लिए इनकी जरूरत नहीं रह जाएगी तब स्वभावतः ये नष्ट हो जाएँगी। किन्तु मेरी उम्र ज्यों ज्यों बढ़ती जाती है, ये पुरानी प्रथाएँ मुझे भली प्रतीत होती जाती है। एक समय ऐसा था जब मैं इनमें से अधिकांश को अनावश्यक तथा व्यर्थ समझता था, परन्तु आयुवृद्धि के साथ उनमें से किसी के विरुद्ध कुछ भी कहते मुझे संकोच होता है, क्योंकि उनका आविष्कार सैकड़ों सदियों के अनुभव का फल है। कल का छोकड़ा, कल ही जिसकी मृत्यु हो सकती है, यदि मेरे पास आए और मेरे सदा के संकल्पों को छोड़ देने को कहे और यदि मैं उस लड़के के मतानुसार अपनी व्यवस्था को पलट दूँ, तो मैं ही मूर्ख बनूँगा, और कोई नहीं। भारतेतर भिन्न भिन्न देशों से, समाजसुधार के विषय के यहाँ जितने उपदेश आते हैं वे अधिकांश ऐसे ही हैं। वहाँ के ज्ञानाभिमानियों से कहो, “तुम जब अपने समाज का स्थायी संगठन कर सकोगे तब तुम्हारी बात मानेंगे। तुम किसी भाव को दो दिन के लिए भी धारण नहीं कर सकते। विवाद करके उसको छोड़ देते हो। तुम कीड़ो-मकोड़ों की तरह जन्म लेते हो और उन्हीं की तरह कुछ क्षणों में मर जाते हो। बुलबुले की भाँति तुम्हारी उत्पत्ति होती है और बुलबुले की भाँति तुम्हारा नाश। पहले हमारे जैसा स्थायी समाज संगठित करो। पहले कुछ ऐसे सामाजिक नियमों और प्रथाओं को संचालित करो, जिनकी शक्ति हजारों वर्ष अक्षुण्ण रहे। तब तुम्हारे साथ इस विषय का वार्तालाप करने का समय आएगा, किन्तु तब तक मेरे मित्र, तुम मात्र चंचल बालक हो।”

मुझे अपने धर्म के विषय पर जो कुछ कहना था, वह मैं कह चुका। अब मैं तुम्हें उस बात की याद दिलाना चाहता हूँ जिसकी इस समय विशेष आवश्यकता है। धन्यवाद है, महाभारत के प्रणेता महान् व्यासजी को जिन्होंने कहा है, “कलियुग में दान ही एकमात्र धर्म है।” तप और कठिन योगों की साधना इस युग में नहीं होती। इस युग में दान देने तथा दूसरों की सहायता करने की विशेष आवश्यकता है। दान शब्द का क्या अर्थ है? सब दानों से श्रेष्ठ है – अध्यात्मदान, फिर है विद्यादान, फिर प्राणदान, भोजन-कपड़े का दान सब से निकृष्ट दान है। जो अध्यात्मज्ञान का दान करते है, वे अनन्त जन्म और मृत्यु के प्रवाह से आत्मा की रक्षा करते हैं। जो विद्यादान करते हैं, वे मनुष्य की आँखें खोलकर अध्यात्मज्ञान का पथ दिखा देते हैं। दूसरे दान, यहाँ तक कि प्राणदान भी, उनके निकट तुच्छ हैं। अतएव तुम्हें समझ लेना चाहिए कि अन्यान्य सब कर्म आध्यात्मिक ज्ञान के दान से निकृष्ट हैं। अतः तुम्हारे लिए यह समझना और स्मरण रखना आवश्यक है कि अध्यात्मज्ञान के प्रचार से अन्य सभी काम कम मूल्यवान् हैं। आध्यात्मिक ज्ञान ही के विस्तार से मनुष्यजाति की सब से अधिक सहायता की जा सकती है। आध्यात्मिकता का हमारे शास्त्रों में अनन्त स्रोत है और हमारे इस निवृत्तिमूलक देश को छोड़ और कौनसा देश है जहाँ धर्म की ऐसी प्रत्यक्षानुभूति का दृष्टान्त देखने को मिल सकता है? संसारविषयक कुछ अनुभव मैंने प्राप्त किया है। मेरी बात पर विश्वास करो, अन्यान्य देशों में वागाडम्बर बहुत है, किन्तु ऐसे मनुष्य जिन्होंने धर्म को अपने जीवन में परिणत किया है – यहीं, केवल, यहीं हैं। धर्म बातों में नहीं रहता। तोता बोलता है, आजकल मशीनें भी बोल सकती हैं। परन्तु ऐसा जीवन मुझे दिखाओ जिसमें त्याग हो, आध्यात्मिकता हो, तितिक्षा हो, अनन्त प्रेम हो। इस प्रकार का जीवन आध्यात्मिक मनुष्य का निर्देश करता है। जब कि हमारे शास्त्रों में ऐसे सुन्दर भाव विद्यमान है और हमारे देश में ऐसे महान् जीवन्त उदाहरण विद्यमान हैं, तब तो यह बड़े दुःख का विषय होगा यदि हमारे श्रेष्ठ योगियों के मस्तिष्क और हृदय से निकली हुई यह विचारराशि प्रत्येक व्यक्ति की – धनियों और दरिद्रों की, ऊँच या नीच, हर एक की – साधारण सम्पत्ति न हो सके। केवल भारत ही में नहीं, विश्व भर में इसे फैलाना चाहिए। यह हमारे प्रधान कर्तव्यों में से एक है। और तुम देखोगे कि जितना अधिक तुम दूसरों को मदद पहुँचाने के लिए कर्म करते हो, उतना ही अधिक तुम अपना ही कल्याण करते हो। यदि सचमुच तुम अपने देश को प्यार करते हो तो दुर्बोध शास्त्रों में से रत्नराशि ले-लेकर उसके सच्चे उत्तराधिकारियों को देने के लिए जी खोलकर इस महान् व्रत की साधना में लग जाओ।

और सब से पहले एक बात आवश्यक है। हाय! सदियों की घोर ईर्ष्या द्वारा हम जर्जर हो रहे हैं, हम सदा एक दूसरे के प्रति ईर्ष्याभाव रखते है! क्यों अमुक व्यक्ति हमसे बढ़ गया? क्यों हम अमुक से बड़े न हो सके? सर्वदा हमारी यही चिन्ता बनी रहती है। हम इस प्रकार ईर्ष्या के दास हो गये है कि धर्म में भी हम इसी श्रेष्ठता की ताक में रहते हैं। इसे हमें दूर करना चाहिए। यदि इस समय भारत में कोई महापाप है, तो वह यही ईर्ष्या की दासता है। हर एक व्यक्ति हुकूमत चाहता है, पर आज्ञापालन करने के लिए कोई भी तैयार नहीं है; और यह सब इसलिए है कि प्राचीन काल के उस अद्भुत ब्रह्मचर्य-आश्रम का अब पालन नहीं किया जाता। पहले आदेशपालन करना सीखो, आदेश देना फिर स्वयं आ जाएगा। पहले सर्वदा दास होना सीखो, तभी तुम प्रभु हो सकोगे। ईर्ष्या-द्वेष छोड़ो, तभी तुम उन महान कर्मों को कर सकोगे, जो अभी तक बाकी पड़े है। हमारे पूर्वजों ने बड़े बड़े और अद्भुत कर्म किये हैं, जिन पर हमें श्रद्धा और गर्व है, परन्तु यह समय हमारे कार्य करने का है जिसे देखकर हमारी भावी सन्तान गर्व करेगी और हमें योग्य पूर्वज समझेगी। हमारे पूर्वपुरुष कितने ही श्रेष्ठ और महिमान्वित क्यों न हों, पर प्रभु के आशीर्वाद से, यहाँ जो लोग हैं उनमें से हर एक अब ऐसा काम करेगा, जिसके आगे पूर्वजों के कार्य भी म्लान हो जाएँगे।


  1. उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
    संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥गीता ३/२४॥
  2. एवं तु पण्डितैर्ज्ञात्वा सर्वभूतमयं हरिम्।
  3. नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
    न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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