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><channel><title>हिंदी कहानी Archives - हिंदी पथ</title> <atom:link href="https://hindipath.com/category/hindi-story/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" /><link>https://hindipath.com/category/hindi-story/</link> <description>हिंदी का संसार</description> <lastBuildDate>Mon, 19 Sep 2022 08:56:46 +0000</lastBuildDate> <language>en-US</language> <sy:updatePeriod> hourly </sy:updatePeriod> <sy:updateFrequency> 1 </sy:updateFrequency> <generator>https://wordpress.org/?v=6.3.8</generator><image> <url>https://hindipath.com/wp-content/uploads/2019/09/HindiPath-Site-Icon-New.png</url><title>हिंदी कहानी Archives - हिंदी पथ</title><link>https://hindipath.com/category/hindi-story/</link> <width>32</width> <height>32</height> </image> <item><title>शांतशील का वध – विक्रम-बेताल की कहानी</title><link>https://hindipath.com/vikram-betal-shantsheel-ke-vadh-ki-kahani-hindi/</link> <comments>https://hindipath.com/vikram-betal-shantsheel-ke-vadh-ki-kahani-hindi/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 16 Sep 2021 06:37:31 +0000</pubDate> <category><![CDATA[हिंदी कहानी]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=8323</guid><description><![CDATA[<p>“शांतशील का वध” बेताल पच्चीसी की पच्चीसवीं व अंतिम कहानी है। इसमें राजा विक्रम दुष्ट भिक्षु शांतिशील का वध करने</p><p>The post <a
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href="/vikram-betal-ki-kahani/"><strong>विक्रम बेताल की कहानियाँ</strong></a>।</p><p><a
href="/vikram-betal-chandravati-ki-anokhi-kahani-hindi/">&#8220;चंद्रावती की अनोखी कहानी&#8221;</a> सुनाकर बेताल ने शव छोड़ दिया। राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर उस शव को लादे हुए उस भिक्षु शान्तशील के पास पहुंचे। कृष्णपक्ष की रात से भयावह हो रहे उस श्मशान में वृक्ष की जड़ के समीप बैठा वह भिक्षु टकटकी लगाए राजा की ही प्रतीक्षा कर रहा था।</p><p>उसने श्मशान की उस भूमि को रक्त से लीप रखा था। हड्डियों के सफेद चूर्ण से चौक पूरा था और चारों दिशाओं से रक्त से भरे घड़े रख दिये थे। वहां मनुष्य की चरबी से भरा दीपक जल रहा था। पास ही जल रही अग्नि में आहुति दी गई थी।</p><p>राजा उस भिक्षु के समीप पहुंचा। शव लेकर आए राजा को जैसे ही उस भिक्षु ने देखा, वह प्रसन्न होकर उठ खड़ा हुआ और राजा की प्रशंसा करता हुआ बोला, “महाराज! आपने मुझ पर दुष्कर अनुग्रह किया है। वे लोग, जो आपको समस्त राजाओं में श्रेष्ठ कहते हैं, वह उचित ही है क्योंकि एक आप ही हैं जो अपनी चिंता छोड़कर परोपकार कर सकते हैं। विद्वान लोग इसी को बड़ों की महत्ता कहते हैं कि वे लोग जो भी अंगीकार कर लेते हैं, उससे कभी विचलित नहीं होते, चाहे उस प्रयास में उनके प्राण ही क्यों न चले जाएं।”</p><p>ऐसा कहते हुए उस श्रमण ने, जो यह समझ रहा था कि उसका कार्य पूर्ण हो गया, राजा के कंधे से उस शव को उतार लिया। तत्पश्चात् उसने शव को स्नान कराया, उसके शरीर पर लेप किया, माला पहनाई और फिर उसे पूरे हुए चौक में रख दिया। फिर उसने अपने शरीर पर भस्म लगाई, केस का यज्ञोपवीत धारण किया और शवाच्छादन (मुर्दे को ओढ़ाया जाने वाला कफन) पहना, फिर कुछ देर के लिए ध्यानस्थ हो गया।</p><p>उस भिक्षु ने मंत्रबल से उस श्रेष्ठ बेताल का आह्वान किया। मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट कराने के बाद वह क्रम से उसकी पूजा करने लगा। भिक्षु ने मनुष्य की खोपड़ी से उसे अर्घ्य दिया। मनुष्य के ही दांतों के फूल चढ़ाए और सुगंधित लेप लगाया। उसने मनुष्य की आंखों का धूप दिया और मांस की बलि दी। इस तरह पूजा समाप्त करके उसने पास ही खड़े राजा से कहा, “महाराज, यहां मंत्रों के अधिष्ठाता पधारे हैं। तुम भूमि पर लेटकर इन्हें साष्टांग प्रणाम करो, इससे वे वरदायी देव तुम्हें तुम्हारा मनचाहा वर देंगे।”</p><p>यह सुनते ही राजा को बेताल द्वारा कहे गए शब्दों की याद हो आई। तब उसने भिक्षु से कहा, “भगवन्, मैं ऐसा करना नहीं जानता। अतः पहले आप प्रणाम करके मुझे दिखला दें, तब मैं वैसा ही करूंगा।” इसके बाद वह भिक्षु प्रणाम का ढंग बतलाने के लिए ज्योंही भूमि पर झुका, राजा विक्रमादित्य ने अपनी तलवार से तुरंत ही उसका सिर काट डाला।</p><p>राजा ने उसका सीना फाड़कर उसका हृदय-कमल भी निकाल लिया और वह सिर और हृदय-कमल बेताल को अर्पित कर दिया।</p><p>श्मशान के भूत-प्रेतों ने प्रसन्न होकर राजा को साधुवाद कहा। संतुष्ट होकर बेताल ने भी उस मनुष्य शरीर के अंदर से कहा, “राजन, यह भिक्षु विद्याधरों के जिस इन्द्रपद की कामना करता था, वह अब भूमि साम्राज्य का भोग कर लेने के बाद तुम्हें प्राप्त होगा। मेरे द्वारा तुम्हें बहुत कष्ट उठाना पड़ा है, अतः तुम अभीष्ट वर मांगो।”</p><p>बेताल के ऐसा कहने पर राजा उससे बोला, “वैसे तो आपकी प्रसन्नता से ही मुझे समस्त अभिमत प्राप्त हो गए हैं, तथापि हे योगेश्वर! आपका वचन अमोघ है इसलिए मैं इतना ही मांगता हूं कि अनेक कथाओं के मनोरम आरंभ से चौबीस और यह अंतिम पच्चीसवीं कथा, ये सभी समूचे विश्व में प्रसिद्ध हों और सदैव ही आदरणीय रहें।”</p><p>राजा की इस याचना के बाद बेताल ने कहा, “हे राजन! ऐसा ही होगा। किंतु इससे अधिक मैं जो कुछ चाहता हूं, तुम उसे सुनो। पहले की जो चौबीस कथाएं हैं, वे और अंतिम पच्चीसवीं कथा, यह सारी कथावली संसार में &#8216;बेताल पच्चीसी&#8217; के नाम से प्रसिद्ध होगी। लोग इनका आदर करेंगे और कल्याणदायिनी भी होंगी। जो कोई आदरपूर्वक इसका एक भी श्लोक पढ़ेगा अथवा जो इसे सुनेगा, ऐसे दोनों प्रकार के लोग शीघ्र ही पापमुक्त हो जाएंगे। जहां-जहां भी ये कथाएं पढ़ी-सुनी जाएंगी, वहां यक्ष, बेताल, डाकिनी, राक्षस आदि का प्रभाव नहीं पड़ेगा।”</p><p>इतना कहकर वह बेताल उस मनुष्य-शरीर से निकलकर योगमाया के द्वारा अपने अभीप्सित लोक को चला गया।</p><p>तत्पश्चात् <a
href="/shiv-chalisa-lyrics-in-hindi-pdf/">भगवान शिव</a>, जो राजा से प्रसन्न हो गए थे, देवताओं सहित वहां साक्षात् प्रकट हुए। उन्होंने राजा विक्रमादित्य को प्रणाम करते हुए आदेश दिया, “वत्स, तुम धन्य हो कि तुमने इस धूर्त तपस्वी को मार डाला। जो हठपूर्वक विद्याधरों का महाचक्रवर्ती पद प्राप्त करना चाहता था। मलेच्छ रूप में अवतीर्ण असुरों को शांत करने के लिए मैंने ही तुम्हें सिरजा है। अतः द्वीपों और पातालों सहित इस धरती के समस्त भोगों का उपभोग करके जब तुम इनसे ऊब जाओगे, तब अपनी ही इच्छा से उन सब सुखों का त्याग करके तुम मेरे निकट आ जाओगे। अब मेरे द्वारा प्रदत्त यह &#8216;अपराजित&#8217; नाम का खड्ग स्वीकार करो। इसकी कृपा से तुम्हें वह सब सुख प्राप्त होंगे, जो मैंने तुम्हें बताए हैं।”</p><p>यह कहकर <a
href="/om-jai-shiv-omkara-aarti/">भगवान शंकर</a> ने वह खड्ग राजा को दे दिया और वचन-रूपी पुष्पों से पूजित होकर वे अन्तर्ध्यान हो गए। अब तक रात बीत चुकी थी, सवेरा हो रहा था। राजा ने देखा कि सारे कार्य समाप्त हो चुके हैं; अतः वह अपने नगर लौट गया।</p><p>क्रमशः प्रजाजनों को जब उस रात की घटनाएं मालूम हुईं, तब उन्होंने राजा का सम्मान किया और महोत्सव मनाया। वह सारा दिन स्नान-दान, शिवार्चना, नाच-गान और गाजे-बाजे में बीता। कुछ ही समय में भगवान शिव के उस खड्ग के प्रभाव से राजा विक्रमादित्य ने द्वीपों एवं रसातलों सहित इस धरती पर निष्कंटक राज्य किया। तत्पश्चात् भगवान शिव की आज्ञा से विद्याधरों का महान स्वामित्व प्राप्त किया। राजा विक्रमादित्य ने बहुत दिनों तक विद्याधरों के राजा के रूप में सुख-भोग प्राप्त किया और अंत में वह भगवत-स्वरूप को प्राप्त हुआ।</p><pre class="wp-block-code"><code><iframe sandbox="allow-popups allow-scripts allow-modals allow-forms allow-same-origin" style="width:120px;height:240px;" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" frameborder="0" src="//ws-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?ServiceVersion=20070822&#038;OneJS=1&#038;Operation=GetAdHtml&#038;MarketPlace=IN&#038;source=ss&#038;ref=as_ss_li_til&#038;ad_type=product_link&#038;tracking_id=hindpath-21&#038;language=en_IN&#038;marketplace=amazon&#038;region=IN&#038;placement=8186253513&#038;asins=8186253513&#038;linkId=c4c5263f71f7f58342ece29947cb985d&#038;show_border=true&#038;link_opens_in_new_window=true"></iframe></code></pre><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=8314</guid><description><![CDATA[<p>“चंद्रावती की अनोखी कथा” बेताल पच्चीसी की चौबीसवीं कहानी है। इसमें राजा विक्रम बेताल के प्रश्न पर मौन रहकर उसे</p><p>The post <a
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href="/vikram-betal-ki-kahani/"><strong>विक्रम बेताल की कहानियाँ</strong></a>।</p><p><a
href="/vikram-betal-buddha-tapasvi-kahani-hindi/">&#8220;बूढ़े तपस्वी की हँसने-रोने&#8221;</a> की पहेली का उत्तर पाकर उस रात बेताल पुनः ग़ायब हो गया। वह रात किसी राक्षसी के समान थी। श्मशान में यत्र-तत्र जलती हुई चिताएं ही मानो उस राक्षसी की आंखें थीं। ऐसी महाभयानक रात में राजा विक्रमादित्य फिर से शिंशपा-वृक्ष के नीचे पहुंचा और बेताल को नीचे उतार लिया। फिर वह उसे कंधे पर डालकर मौनभाव से अपने गंतव्य की ओर चल दिया। कुछ आगे चलकर बेताल ने पुनः मौन भंग किया, “राजन! बार-बार की इस आवाजाही से मैं तो बिल्कुल ऊब चुका हूं, किंतु तुम पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। अब मैं तुमसे एक महाप्रश्न पूछता हूं, इसे सुनो।”</p><p>दक्षिणपथ में धर्मनाम का एक मांडलिक राजा राज करता था। वह राजा बहुत ही सद्गुणी था। उसके बहुत से गोत्रज (परिवारजन) थे। उसकी स्त्री का नाम चंद्रावती था, जो मालवा की रहने वाली थी और वहां के एक संभ्रान्त परिवार में पैदा हुआ थी। राजा को अपनी उस पत्नी से एक ही कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम लावण्यवती था। अपने नाम के अनुरूप ही लावण्यवती सचमुच ही मानो रूपका खजाना थी।</p><p>जब वह कन्या विवाह के योग्य हुई, तब राजा के गोत्रजों ने उसके विरुद्ध एक षड्यंत्र रचा। उन्होंने राज्य में फूट डाल दी और राजा धर्मनाम को सिंहासन से उतार दिया। वे उसके खून के प्यासे बन गए। एक रात राजा अपनी पत्नी और पुत्री सहित किसी प्रकार बचकर वहां से निकल भागा। वह अपने साथ बहुत ही उत्तम कोटि के कुछ रत्नों को भी ले जाने में कामयाब हो गया। राज्य से निकलकर राजा अपनी ससुराल मालवा के लिए चल पड़ा। पत्नी और पुत्री के साथ जाता हुआ जब वह विंध्याचल पर्वत के निकट पहुंचा तो रात हो गई। किसी प्रकार वह रात उन सबने उसी जंगल में काटी और भोर होते ही पुनः आगे चल पड़े।</p><p>वैभव और ऐश्वर्य में पले-बड़े होने के कारण उन्होंने कभी पैदल सफर नहीं किया था, अतः उनके पांव कांटों से छिल गए थे। इस तरह चलते-चलते वे एक भीलों के गांव में जा पहुंचे। उस गांव के भील चोर-लुटेरे थे। धन के लिए किसी की भी हत्या तक कर देना उनके लिए मामूली बात थी। वस्त्र और आभूषण पहनने वाले राजा को दूर से ही देखकर वे उन्हें लूटने के लिए अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र हाथों में लिए उनकी ओर दौड़ पड़े।</p><p>उन्हें देखकर राजा धर्मनाम ने अपनी स्त्री और कन्या से कहा, “ये दुष्ट पहले तुम्हारे ही ऊपर आक्रमण करेंगे, अतः तुम दोनों तुरन्त वन में जाकर छिप जाओ।”</p><p>राजा के ऐसा कहने पर भय के कारण रानी चंद्रावती अपनी कन्या को साथ लेकर तत्काल वन में चली गई। कुछ देर उपरान्त ही वे लुटेरे भील राजा के पास पहुंच गए और अपने अस्त्र-शस्त्रों से राजा पर टूट पड़े। राजा ने अपनी समस्त शक्ति से उनका मुकाबला किया। उसने अपने तीरों से अनेक लुटेरों को मार गिराया, पर अन्ततः लुटेरों ने उस पर सामूहिक रूप से आक्रमण किया और उसे मारकर उसके शरीर के समस्त आभूषण उतारकर ले गए।</p><p>दूर वन में छिपी हुई रानी और उसकी पुत्री ने यह दृश्य देखा तो प्राणों के भय से वह वहां से भाग निकलीं और दूर के घने जंगल में चली गईं। उस जंगल में एक सरोवर के समीप वृक्ष के नीचे बैठकर वे दोनों विलाप करने लगीं। इसी बीच उस वन के निकट रहने वाला घोड़े पर सवार कोई राजा आखेट करने के लिए अपने पुत्र के साथ उधर आ निकला। उस राजा का नाम था चंद्रसिंह और उसके पुत्र का नाम सिंहपराक्रम था। धूल में उभरे हुए उन मां-बेटी के पदचिन्ह देखकर चंद्रसिंह ने अपने पुत्र से कहा, “हम दोनों इन सुन्दर और उत्तम रेखाओं वाले पद-चिन्हों का अनुसरण करते हुए आगे बढ़ते हैं। ये चिन्ह अवश्य ही दो महिलाओं के हैं। यदि वे स्त्रियां हमें मिल जाएं तो उनमें से एक को तुम ब्याह लेना।”</p><p>पिता की बात सुनकर उसका पुत्र सिंहपराक्रम बोला, “उन स्त्रियों से जिसके छोटे-छोटे पैर हैं, मैं उसी के साथ विवाह करूंगा। अवश्य ही वह स्त्री कम उम्रवाली है और मेरे योग्य है। दूसरी बड़े पैरों वाली से आप विवाह कर लेना।”</p><p>पुत्र की बात सुनकर उसका पिता बोला, “तुम यह कैसी बातें करते हो, पुत्र? तुम्हारी माता को मरे अभी कुछ ही दिन तो बीते हैं। वैसी योग्य गृहणी को खोकर अब मुझे किसी और की कामना कैसे हो सकती है?”</p><p>इस पर उसके पुत्र सिंहपराक्रम ने उत्तर दिया, “पिताजी, आप ऐसा न कहें। मैने जिस स्त्री के पदचिन्ह देखकर उसे अपने लिए पसंद किया है, उसे छोड़कर दूसरी स्त्री को आप अपनी भार्या अवश्य बनाएं। आपको मेरे प्राणों की सौगन्ध।” फिर दोनों पैरों के निशान देखते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे।</p><p>जब वे दोनों विलाप करती हुई उन मां-बेटी के निकट पहुंचे, तो दोनों स्त्रियां सहमकर चुप हो गईं। उन्होंने उन बाप-बेटे को भी कोई लुटेरा ही समझा था। लेकिन जब राजा ने उन्हें अपना परिचय देकर निर्भय होने के लिए आश्वस्त किया, तब वे दोनों स्त्रियों को अपने घोड़े पर बिठाकर अपने महल ले आए।</p><p>महल में पहुंचकर उन पिता-पुत्र में आपस में यह वार्तालाप हुआ कि अब उन स्त्रियों के साथ विधिपूर्वक विवाह कर लेना चाहिए। दिए गए वचन के अनुसार राजा चंद्रसिंह के पुत्र सिंहपराक्रम ने रानी चंद्रावती को अपनी पत्नी बनाया क्योंकि उसी के पैर छोटे थे, जबकि राजा चंद्रसिंह को उसकी बेटी लावण्यवती से विवाह करना पड़ा क्योंकि उसके पैर बड़े थे। इस प्रकार पैरों की गड़बड़ी से उन पिता-पुत्रों ने क्रमशः बेटी और माता से विवाह कर लिया। चंद्रावती अपनी ही बेटी की बहू बन गई। समय पाकर उन दोनों को पुत्र एवं कन्याएं उत्पन्न हुईं और फिर उनके भी बेटी-बेटे हुए।</p><p>रात्रि के समय मार्ग में जाते हुए बेताल ने इस प्रकार यह कथा सुनाकर राजा विक्रमादित्य से पुनः पूछा, “राजन, यदि तुम जानते हो तो यह बतलाओ कि उन मां-बेटियों को, पुत्र एवं पिता के द्वारा क्रमशः जो सन्तानें पैदा हुईं, उनका आपस में क्या संबंध हुआ? यदि जानते हुए भी तुमने नहीं बतलाया, तो तुम्हें पहले कहा हुआ ही शाप लगेगा।”</p><p>यह सुनकर राजा विक्रमादित्य सोच में पड़ गया। उन्होंने बहुत सोचा-विचारा किंतु बेताल के उस प्रश्न का कोई भी उत्तर उनकी समझ में नहीं आया। अतः वह चुप्पी साधे मौन भाव से आगे बढ़ता रहा। मृत पुरुष के शरीर में प्रविष्ट और राजा के कंधे पर बैठा बेताल इस पर मन-ही-मन हंसा और सोचने लगा, “इस महाप्रश्न का उत्तर इस राजा को मालूम नहीं है, फिर भी यह प्रसन्न है और सावधानीपूर्वक पैर रखता हुआ निरंतर आगे बढ़ रहा है। यह राजा बड़ा पराक्रमी है, इसलिए वंचित होने के योग्य नहीं है। इसके अतिरिक्त वह भिक्षु मेरे साथ जो चाल चल रहा है, वह इतने से ही चुप नहीं रहेगा। इसलिए मैं उस दुरात्मा को ही उपायपूर्वक वंचित करूंगा और उसकी सिद्धि इस राजा के लिए सुलभ कर दूंगा, क्योंकि भविष्य में इसका कल्याण होने वाला है।”</p><p>ऐसा सोचकर बेताल ने राजा से कहा, “राजन, इस भयानक रात में, इस श्मशान में बार-बार आते-जाते तुमने बहुत कष्ट उठाया है, फिर भी तुम अपने निश्चय से नहीं डिगे, तुम सुख पाने के योग्य हो। मैं तुम्हारे इस आश्चर्यजनक धैर्य से संतुष्ट हुआ। अतः अब तुम इस शव को ले जाओ, मैं इसमें से चला जाता हूं। लेकिन जाने से पहले तुम्हारी भलाई के लिए मैं जो तुमसे कहना चाहता हूं, उसे सुनो और उसके अनुसार ही कार्य करो।”</p><p>बेताल ने आगे कहा, “हे राजन! तुम जिस दुष्ट भिक्षु के लिए मनुष्य का यह शरीर लेकर जा रहे हो, वह आज इस शरीर में मेरा आह्वान करके पूजा करेगा। पूजा करने के बाद वह दुष्ट तुम्हारी ही बलि चढ़ाने की इच्छा से तुमसे कहेगा कि &#8216;भूमि पर पड़कर साष्टांग प्रणाम करो।&#8217; तब उस समय तुम उस भिक्षु से कहना कि &#8216;पहले तुम करके दिखलाओ, फिर मैं वैसा ही करूंगा।&#8217;</p><p>तत्पश्चात् जब वह भूमि में पड़कर प्रणाम करके तुम्हें दिखलाए, उसी समय तुम तलवार से उसका मस्तक काट देना। तब विद्याधरों का जो ऐश्वर्य वह प्राप्त करना चाहता है, वह तुम्हें मिल जाएगा। उसकी बलि देकर तुम पृथ्वी का भोग करोगे। ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हारी बलि चढ़ा देगा। मैंने इसी कारण तुम्हारे इस कार्य में इतनी देर तक विघ्न डाला था। जाओ, तुम्हें सफलता प्राप्त हो।” इतना कहकर राजा के कंधे पर लदे मृत शरीर से निकलकर बेताल चला गया।</p><p>बेताल की बातों से प्रसन्न हुए राजा विक्रमादित्य भी उस शव को लादे वट-वृक्ष की ओर चल पड़ा जहां उस भिक्षु ने उसे पहुंचने के लिए कहा था।</p><p> राजा विक्रमादित्य बेताल को लाने के लिए पुनः शिंशपा वृक्ष के नीचे पहुँच गया। उसने बेताल को उतारकर अपने कंधे पर डाला और चलना शुरू किया। बेताल ने राजा विक्रम को फिर से यह कहानी सुनानी शुरू की – शांतशील का वध</p><pre class="wp-block-code"><code><iframe sandbox="allow-popups allow-scripts allow-modals allow-forms allow-same-origin" style="width:120px;height:240px;" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" frameborder="0" src="//ws-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?ServiceVersion=20070822&#038;OneJS=1&#038;Operation=GetAdHtml&#038;MarketPlace=IN&#038;source=ss&#038;ref=as_ss_li_til&#038;ad_type=product_link&#038;tracking_id=hindpath-21&#038;language=en_IN&#038;marketplace=amazon&#038;region=IN&#038;placement=8186253513&#038;asins=8186253513&#038;linkId=c4c5263f71f7f58342ece29947cb985d&#038;show_border=true&#038;link_opens_in_new_window=true"></iframe></code></pre><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=8310</guid><description><![CDATA[<p>“बूढ़ा तपस्वी क्यों हँसा और रोया” बेताल पच्चीसी की तेईसवीं कहानी है। इसमें राजा विक्रम बेताल को बूढ़े तपस्वी के</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>“बूढ़ा तपस्वी क्यों हँसा और रोया” बेताल पच्चीसी की तेईसवीं कहानी है। इसमें राजा विक्रम बेताल को बूढ़े तपस्वी के हँसने-रोने के कारण को बताता है। बेताल पच्चीसी की शेष कहानियाँ पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – <a
href="/vikram-betal-ki-kahani/"><strong>विक्रम बेताल की कहानियाँ</strong></a>।</p><p><a
href="/vikram-betal-chaar-brahmin-bhai-kahani-hindi/">“चार ब्राह्मण भाइयों की कथा”</a> में उत्तर पाने के बाद बेताल पुनः ग़ायब हो गया। भूत-प्रेतों से भरे उस महाश्मशान में राजा विक्रमादित्य फिर से उस शिंशपा-वृक्ष के नीचे पहुँचा। यद्यपि बेताल ने अपने अनेक रूप दिखलाए किंतु राजा ने उसे वृक्ष से नीचे उतार लिया और उसे अपने कंधे पर लादकर चुपचाप मार्ग पर चलते रहे। तब बेताल ने राजा विक्रमादित्य से कहा, “राजन, न करने योग्य इस काम में भी तुम्हारा ऐसा आग्रह है, जिसे रोका नहीं जा सकता। अतः मैं तुम्हारी थकावट दूर करने के लिए एक अन्य कथा सुनाता हूँ, सुनो।”</p><p>कलिंग देश में स्वर्गपुरी के समान भव्य नगरी थी, जहां उत्तम आचरण वाले लोग रहते थे। वहां ऐश्वर्य और पराक्रम के लिए प्रद्युम्न के समान ही प्रसिद्ध, प्रद्युम्न नाम का राजा शासन करता था। उस नगर के एक छोर पर यज्ञस्थल नाम का एक गांव था जिसे राजा प्रद्युम्न ने ब्राह्मणों को दान स्वरूप दिया था। उसी गांव मे यज्ञसोम नाम का एक वेदज्ञ ब्राह्मण भी रहता था, जो अत्यंत धनवान था। वह अग्निहोत्री था तथा अतिथि-देवों का सम्मान करने वाला था।</p><p>जब उस ब्राह्मण का यौवन बीत गया, तब सौ-सौ मनोरथों के बाद, उसके ही योग्य उसकी पत्नी के एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उत्तम लक्षणों वाला वह बालक पिता के घर में बढ़ने लगा। ब्राह्मणों ने विधिपूर्वक उसका नाम देवसोम रखा।&nbsp;</p><p>वह बालक, जिसने अपनी विद्या, विनय आदि गुणों से लोगों को वशीभूत कर लिया था, जब सोलह वर्ष का हुआ, तब अचानक ज्वर के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गया। उसके पिता यज्ञसोम ने स्नेह के कारण अपनी पत्नी सहित उस मरे हुए पुत्र को आलिंगन मे बांधे रखा और बहुत देर तक उसके शव को दाह-क्रिया के लिए नहीं जाने दिया।</p><p>बाद में वहां इकट्ठे हुए बड़े-बूढ़ों ने उसे इस प्रकार समझाया, “ब्राह्मण, आप तो भूत और भविष्य को जानने वाले हैं। आप क्या जल के बबूले के समान क्षण-भंगुर इस संसार की गति नहीं जानते? इस संसार मे ऐसे भी राजा थे, जो उन मनोहर राजमहलों में रत्नजड़ित पलंगों पर बैठे, जहाँ संगीत की झंकार भरी रहती थी। अपने शरीर पर चन्दन का लेप करते थे और अपने को अमर समझकर उत्तम स्त्रियों से घिरे रहते और सुख भोगते थे। ऐसे महापराक्रमियों को भी काल ने अपना ग्रास बना लिया। वे भी अकेले ही उस श्मशान में पहुंचे जहाँ उनके अनुयायी और प्रेत रो रहे थे और आसपास शृगाल चीत्कार कर रहे थे। चिता पर सोये उनके शरीर का मांस भी पक्षी, पशुओं और अग्नि ने खा डाला। जब उन्हें भी मरने और नष्ट होने से कोई नहीं बचा सका, तब और की तो बात ही क्या है? अतः हे विद्वान! तुम यह बतलाओ कि कि इस शव को कलेजे से लगाए रखकर तुम क्या करोगे?”</p><p>इस तरह समझाने-बुझाने के बाद किसी तरह अपने मरे हुए पुत्र को छोड़ा और शव को नहलाया-धुलाया। तब उसे एक पालकी में रखकर, आंसू बहाते तथा रोते-पीटते वे बन्धु-बांधव, जो वहां इकट्ठे थे, श्मशान ले गए।</p><p>उस श्मशान में कुटिया बनाकर एक बूढ़ा तपस्वी रहता था। वह पाशुपत मत का बूढ़ा तपस्वी (अघोरी) था। अधिक अवस्था और कठोर तपस्या के कारण उसका शरीर अत्यंत कृश हो गया था। जब वह चलता था तो ऐसा लगता जैसे अब गिरा कि तब गिरा।</p><p>उसका नाम शिव था। उसका सारा शरीर भस्म लगे श्वेत रोमों से भरा हुआ था। उसका पीला जटाजूट बिजली के समान जान पड़ता था। वह स्वयं दूसरे <a
href="/om-jai-shiv-omkara-aarti/">भगवान शिव</a> जैसा प्रतीत होता था।</p><p>वह बूढ़ा तपस्वी जिस कुटिया में रहता था, उसके साथ एक शिष्य भी रहता था। योगी ने कुछ ही देर पहले उसे बुरा-भला कहा था, जिससे वह चिढ़ा हुआ था। वह मूर्ख और दुष्ट था। <a
href="/swami-vivekananda-rajyog-dhyan-samadhi/">ध्यान</a> और <a
href="/swami-vivekananda-raj-yog-hindi-free-download-pdf/">योग </a>आदि क्रियाओं में लगा रहने के कारण उसे अहंकार हो गया था। वह भीख में मिले हुए अन्न को खाकर निर्वाह करता था। बाहर दूर से आते हुए इस जन-कोलाहल को सुनकर योगी ने उससे कहा, “बाहर जाकर झटपट यह तो देखकर आओ कि इस श्मशान में ऐसा शोरगुल क्यों हो रहा है, जैसा इससे पहले कभी नहीं सुना गया।”</p><p>बूढ़ा तपस्वी जब ऐसा बोला तो शिष्य ने उत्तर दिया, “मैं नहीं जाऊंगा, आप ही जाइए। मेरी भिक्षा की बेला बीती जा रही है।”</p><p>यह सुनकर बूढ़ा तपस्वी बोला, “अरे पेटू, धिक्कार है तुझे। आधा दिन बीत जाने पर यह तेरी कैसी भिक्षा की बेला है?” इस पर उस क्रुद्ध तपस्वी ने कहा, “अरे बुड्ढे, धिक्कार मुझे नहीं तुझ पर है। आज से न तो मैं तेरा शिष्य हूं और न तू मेरा गुरु। मैं दूसरी जगह जा रहा हूं। तू संभाल अपना यह कमंडल।” यह कहकर वह उठा और उस तपस्वी के सम्मुख दंड-कमंडल रखकर वहां से चलता बना।</p><p>कुछ देर बाद वह बूढ़ा तपस्वी हँसता हुआ अपनी कुटिया से बाहर निकलकर वहां पहुंचा जहां ब्राह्मण-कुमार को दाह-कर्म के लिए लाया गया था। उसने देखा कि लोग तरुणाई के द्वार पर खड़े उस बालक के लिए शोक कर रहे हैं। बुढ़ापे से क्षीण उस योगी ने बालक के शरीर में प्रवेश करने का निश्चय किया। झटपट एकान्त में जाकर पहले तो वह जी खोलकर रोया, फिर अंगों के उचित संचालन के साथ शीघ्रता से नाचने लगा। पल-भर बाद यौवन की इच्छा रखने वाले उस तपस्वी ने अपना शरीर छोड़कर उस ब्राह्मण-पुत्र के शरीर में प्रवेश किया।</p><p>बात ही बात में सजाई हुई चिता पर वह बूढ़ा तपस्वी रूपी ब्राह्मण-पुत्र जीवित होकर जम्हाई लेता हुआ उठ बैठा। यह देखकर वहां उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। ब्राह्मण-पुत्र के शरीर में प्रविष्ट उस योगी ने, जो योगों का स्वामी था और अपने तमाम व्रतों को छोड़ना नहीं चाहता था, बातें बनाते हुए कहा, “मरकर जब मैं परलोक पहुंचा तो <a
href="/shiv-chalisa-lyrics-in-hindi-pdf/">भगवान शंकर</a> ने प्रकट होकर मुझे जीवनदान दिया और कहा कि तुम्हें पाशुपत (अघोरी) व्रत लेना है। मुझे इसी समय एकान्त में जाकर यह व्रत ग्रहण करना है। यदि मैं ऐसा नहीं करूंगा तो जीवित नहीं रहूंगा। इसलिए आप सब लोग वापस लौट जाइए, मैं जा रहा हूं।”</p><p>इस प्रकार उस तपस्वी ने, जिसने व्रत का दृढ़ निश्चय कर रखा था, वहां एकत्र हुए हर्ष और शोक से विह्वल सब लोगों को समझा-बुझाकर घर लौटा दिया। तत्पश्चात् उसने उस जगह जाकर, जहां उसका पहला शरीर पड़ा हुआ था, वह मृत शरीर एक गड्ढे में डाला और व्रत धारण करके युवा शरीर में वह महायोगी कहीं अन्यत्र चला गया।</p><p>राजा विक्रमादित्य को यह कथा सुनाकर बेताल ने उससे पुनः कहा, “राजन, अब तुम मुझे यह बतलाओ कि दूसरे शरीर में प्रवेश करने से पहले वह बूढ़ा तपस्वी क्यों रोया और फिर नाचने क्यों लगा? मुझे इस बात को जानने का बड़ा कौतूहल हो रहा है।”</p><p>बेताल की यह बात सुनकर शाप से आशंकित और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ राजा ने मौन त्याग दिया और बेताल से कहा, “हे बेताल! इन बातों से वह बूढ़ा तपस्वी जो अभिप्राय रखता था, वह सुनो।</p><p>उस वृद्ध तपस्वी ने सोचा कि &#8216;इस बूढ़े शरीर के साथ बहुत दिनों तक मैं सिद्धियों की साधना करता रहा हूं। अब मैं इस शरीर का त्याग करने जा रहा हूं जिसे मां-बाप ने बचपन में लाड़-प्यार से पाला था।&#8217;</p><p>यही सोचकर वह बूढ़ा तपस्वी दुःखी हुआ और रोया था, क्योंकि शरीर का मोह छोड़ना बड़ा कठिन काम होता है। इसी प्रकार वह यह सोचकर प्रसन्नता से नाच उठा था कि अब वह नए शरीर में प्रवेश करेगा और इससे भी अधिक साधना कर सकेगा।”</p><p>शव के शरीर में बैठा हुआ वह बेताल, राजा की यह बातें सुनकर उसके कंधे से उतरकर पुनः उसी शिशपा-वृक्ष पर जा बैठा। राजा विक्रमादित्य ने और अधिक उत्साह से उसे ले आने के लिए फिर उसका पीछा किया।</p><p>राजा विक्रमादित्य बेताल को लाने के लिए पुनः शिंशपा वृक्ष के नीचे पहुँच गया। उसने बेताल को उतारकर अपने कंधे पर डाला और चलना शुरू किया। बेताल ने राजा विक्रम को फिर से यह कहानी सुनानी शुरू की – <a
href="/vikram-betal-chandravati-ki-anokhi-kahani-hindi/">चंद्रावती की अनोखी कथा</a></p><pre class="wp-block-code"><code><iframe sandbox="allow-popups allow-scripts allow-modals allow-forms allow-same-origin" style="width:120px;height:240px;" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" frameborder="0" src="//ws-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?ServiceVersion=20070822&#038;OneJS=1&#038;Operation=GetAdHtml&#038;MarketPlace=IN&#038;source=ss&#038;ref=as_ss_li_til&#038;ad_type=product_link&#038;tracking_id=hindpath-21&#038;language=en_IN&#038;marketplace=amazon&#038;region=IN&#038;placement=8186253513&#038;asins=8186253513&#038;linkId=c4c5263f71f7f58342ece29947cb985d&#038;show_border=true&#038;link_opens_in_new_window=true"></iframe></code></pre><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=8303</guid><description><![CDATA[<p>“चार ब्राह्मण भाइयों की कथा” बेताल पच्चीसी की बाईसवीं कहानी है। इसमें राजा विक्रम बताता है चारों भाइयों में ब्रह्महत्या</p><p>The post <a
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href="/vikram-betal-ki-kahani/"><strong>विक्रम बेताल की कहानियाँ</strong></a>।</p><p><a
href="/vikram-betal-anangmanjari-ki-asakti-kahani-hindi/">&#8220;अनंगमंजरी, उसके प्रेमी व उसके पति की कहानी&#8221;</a> का उत्तर पाकर बेताल पुनः उड़ गया। राजा विक्रमादित्य ने फिर उस शिंशपा-वृक्ष के निकट जाकर बेताल को नीचे उतारा और पहले की भांति उसे अपने कंधे पर लादकर चल पड़ा।</p><p>कुछ दूर चलने पर बेताल ने पुनः मौन भंग किया और कहा, “राजन, आप सज्जन और महापराक्रमी हैं और संसार का हर व्यक्ति सज्जन और पराक्रमी व्यक्ति का सम्मान करता है। आप परिश्रम भी बहुत कर रहे हैं। अतः परिश्रम को भुलाने के लिए मैं तुम्हें एक और नई कथा सुनाता हूं।”</p><p>प्राचीन काल में इस आर्यावर्त में कुसुमपुर नाम का एक नगर था। उस नगर के स्वामी धरणीवराह नाम के एक राजा थे। ब्राह्मण बहुल उनके राज्य में ब्राह्मणों को दान स्वरूप दिया गया ब्रह्मस्थल नाम का एक गांव था।</p><p>उस गांव में विष्णुस्वामी नाम का एक ब्राह्मण रहता था। विष्णुस्वामी के चार पुत्र थे। जब उसके वे पुत्र वेदों का अध्ययन कर चुके तो उसी बीच विष्णुस्वामी और उसकी पत्नी का देहान्त हो गया।</p><p>माता-पिता के जीवित न रहने पर उन चार ब्राह्मण भाइयों की आर्थिक स्थिति बहुत डांवाडोल हो गई, क्योंकि उनके सगे-संबंधियों ने उनका सब कुछ हड़प कर लिया था। तब उन चारों ने आपस मे सलाह की कि “यहाँ अब हमारी गुजर-बसर नहीं हो सकती। अब तो हमें अपने नाना के यहां ब्रह्मस्थल नाम के गांव में चले जाना चाहिए।”</p><p>ऐसा निश्चय करके राह में मांगते-खाते वे बहुत दिनों मे अपने नाना के घर जा पहुंचे। वहां नाना के न रहने पर भी उनके मामाओं ने उन्हें आश्रय दिया। उनके यहां खाते-पीते और वेदों का अध्ययन और अभ्यास करते हुए वे रहने लगे।</p><p>समय बीतने लगा तो उनके मामाओं ने उनकी उपेक्षा करनी आरंभ कर दी। मामों से भी उपेक्षित उन चार ब्राह्मण भाइयों ने एक दिन पास में विचार-विमर्श किया। उनमें से जो सबसे बड़ा भाई था, वह बोला, “भाइयो, हम लोगों को ऐसी हालत में क्या करना चाहिए? यह सब तो विधाता के ऊपर निर्भर है क्योंकि मनुष्य के किए से तो यहां कभी कुछ नहीं हो सकता। आज उद्विग्न होकर घूमता हुआ जब मैं श्मशान पहुंचा तो वहा मैंने एक मरे हुए पुरुष का शरीर देखा। उसे देखकर मैं उसकी दशा की सराहना करने लगा कि यह धन्य है, जो दुःख का सारा भार उतारकर इस प्रकार विश्राम कर रहा है। ऐसा सोचकर मैंने भी उसी समय मरने का निश्चय किया। मैं एक वृक्ष की डाली मे फंदा डालकर उससे लटक गया। मैं अचेत तो हो गया किंतु मेरे प्राण नहीं निकले थे। इसी समय फंदा टूट गया और मैं भूमि पर गिर पड़ा। जब मुझे चेतना आई तो मैंने देखा कि कोई कृपालु पुरुष वस्त्र से शीघ्रतापूर्वक हवा करके मुझे सचेत करने का प्रयत्न कर रहा है।”</p><p>एक क्षण रुककर वह फिर बोला, “उस व्यक्ति ने मुझसे कहा–&#8217;अरे भाई, विद्वान होकर भी तुम किसके लिए इतना खेद कर रहे हो? मनुष्य को उसके सुकर्मों से सुख और दुष्कर्मों से दुःख मिलता है। अतः यदि तुम दुःखों से घबरा गए हो तो सत्कर्म करो। तुम आत्महत्या करके नरक के दुःख की कामना क्यों करते हो?&#8217; यह कहकर मुझे समझाकर वह व्यक्ति वहां से चला गया। मैं भी इस कारण मरने का इरादा छोड़कर यहां चला आया। स्पष्ट है कि विधाता की इच्छा न होने पर मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता। अतः अब मैं किसी तीर्थस्थान पर जाकर तपस्या करूंगा और इस प्रकार शरीर का त्याग करूंगा कि फिर मुझे निर्धनता का दुःख न भोगना पड़े।”</p><p>बड़े भाई के ऐसा कहने पर उसके छोटे भाई उससे यह बोले, “आर्य, आप विद्वान होकर भी धनहीनता के कारण दुःखी क्यों हो रहे हो? क्या आप नहीं जानते कि धन तो शरद के मेघों की तरह चंचल होता है। दुर्जन की मित्रता, वेश्या और <a
href="/laxmi-chalisa/">देवी लक्ष्मी</a>–ये तीनों ही अंत में आंखें फेर लेती हैं। इनकी चाहे जितनी रखवाली की जाए, चाहे जितनी सावधानी रखी जाए, ये कभी किसी के होकर नहीं रहते। अतः मनस्वी पुरुष को यत्न करके कोई ऐसा गुण अर्जित करना चाहिए जो धन रूपी हिरण को बलपूर्वक बार-बार बांधकर ला सके।”</p><p>छोटे भाइयों की यह बातें सुनकर बड़े भाई ने शीघ्र ही धैर्य धारण करते हुए कहा, “तो फिर अर्जन करने योग्य कौन-सा गुण हो सकता है?” बाद में, वे सभी सोच-विचार करके एक-दूसरे से कहने लगे—“सारी दुनिया को छानकर हम लोग कोई विशेष ज्ञान अर्जित करेंगे।” ऐसा निश्चय करके और लौटकर मिलने का एक ठिकाना बताकर वे चारों, चार अलग-अलग दिशाओं में चले गए।</p><p>समय पाकर वे चार ब्राह्मण भाई निश्चित किये हुए ठिकाने पर आ मिले और एक दूसरे से यह बताने लगे कि किसने क्या सीखा है।</p><p>उनमें से एक ने कहा, “मैंने तो ऐसी विद्या सीखी है कि मुझे जिस किसी प्राणी की हड्डी का एक टुकड़ा मिल जाए, तो मैं अपनी विद्या से क्षण-भर में उसमें उस प्राणी के योग्य मांस तैयार कर दूं।”</p><p>इस पर दूसरे ने कहा, “मैं उसके अनुकुल चमड़ी और रोम तैयार कर सकता हूं।”</p><p>इस पर तीसरे ने कहा, “चमड़ी, मांस और रोएं हो जाने पर मैं उस प्राणी के अवयव और आकृति बना सकता हूं।”</p><p>अब चौथे की बारी थी, उसने कहा, “अवयव और आकृति बन जाने पर मैं उस प्राणी में प्राण का संचार कर देना जानता हूं।”</p><p>इस प्रकार, उन चार ब्राह्मण भाइयों ने जब अपनी-अपनी विद्या के प्रभाव का वर्णन कर लिया, तब वे उसकी सिद्धि के लिए हड्डी का कोई टुकड़ा ढूंढ़ने के लिए वन में गए।</p><p>संयोग से उन्हें वहां सिंह की एक टूटी हड्डी का टुकड़ा मिल गया। उसके बारे में बिना कुछ जाने-सुने उन्होंने उसे उठा लिया।</p><p>तब एक ने उस हड्डी में उसके योग्य मांस बना दिया। दूसरे ने उसमें उसके अनुकूल चमड़ी और रोम तैयार कर दिए। तीसरे ने उसके सारे अंग ज्यों-के-त्यों बना दिए और चौथे ने उसमें प्राण का संचार कर दिया।</p><p>अनन्तर, भयानक दिखने वाला, भयानक मुख और तीखे नखों के अंकुश वाला वह सिंह उठ खड़ा हुआ।</p><p>उसने झपटकर उन चार ब्राह्मण भाइयों को मार डाला और अपना पेट भरकर तृप्त होकर वन में चला गया। इस प्रकार वे ब्राह्मण सिंह को जीवित करने की ग़लती के कारण मारे गए। भला दुष्ट प्राणी को जगाकर कौन मनुष्य स्वयं सुखी होता है?</p><p>यदि विधाता वाम होता है तो यत्नपूर्वक सीखे हुए गुण भी सुखकर नहीं होते, बल्कि दुःख का कारण बन जाते हैं। पौरुष का वृक्ष तभी फल देता है, जब भाग्य-रूपी उसकी जड़ विकार रहित (अनुकूल) हो। वह नीति के थावले में स्थित हो और ज्ञान के जल से सींचा गया हो।</p><p>रात में मार्ग में चलते हुए राजा विक्रमादित्य के कंधे पर बैठे हुए बेताल ने उसको यह कथा सुनाकर पूछा, “राजन, अब यह बतलाओ कि उन चार ब्राह्मण भाइयों में से सिंह को बनाने का वास्तविक अपराध किसका था? यदि जानते हुए भी तुम नहीं बतलाओगे, तो पहले कहा हुआ शाप तुम पर पड़ेगा।”</p><p>बेताल की बात सुनकर राजा ने सोचा कि &#8216;बेताल मेरा मौन तुड़वाकर फिर चला जाना चाहता है तो चला जाए, मैं लौटकर फिर इसे पकड़ लाऊंगा।&#8217; मन-ही-मन ऐसा सोचकर उसने बेताल से कहा, “बेताल, जिस ब्राह्मण ने उस सिंह को प्राणदान दिया, वही उन चारों में से इस पाप का भागी है। बिना यह जाने कि यह कौन-सा प्राणी है, उन्होंने अपनी विद्या से चमड़ा, मांस, रोम और दूसरे अंग दिए, उनका दोष इस कारण नहीं है कि उन्हें वास्तविकता का ज्ञान नहीं था किंतु जिसने सिंह का आकार देखकर भी अपनी विद्या का प्रभाव दिखाने की उत्कंठा से उसमें प्राण डाले, वस्तुतः ब्रह्महत्या उसी ने की।”</p><p>उस मायावी बेताल-श्रेष्ठ ने जब राजा की यह बातें सुनीं, तब वह उसके कंधे से उड़कर फिर अपनी जगह चला गया। बेताल को पकड़ने के लिए कटिबद्ध राजा भी पहले की भांति उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।</p><p>राजा विक्रमादित्य बेताल को लाने के लिए पुनः शिंशपा वृक्ष के नीचे पहुँच गया। उसने बेताल को उतारकर अपने कंधे पर डाला और चलना शुरू किया। बेताल ने राजा विक्रम को फिर से यह कहानी सुनानी शुरू की – <a
href="/vikram-betal-buddha-tapasvi-kahani-hindi/">बूढ़ा तपस्वी क्यों हँसा और रोया</a></p><pre class="wp-block-code"><code><iframe sandbox="allow-popups allow-scripts allow-modals allow-forms allow-same-origin" style="width:120px;height:240px;" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" frameborder="0" src="//ws-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?ServiceVersion=20070822&#038;OneJS=1&#038;Operation=GetAdHtml&#038;MarketPlace=IN&#038;source=ss&#038;ref=as_ss_li_til&#038;ad_type=product_link&#038;tracking_id=hindpath-21&#038;language=en_IN&#038;marketplace=amazon&#038;region=IN&#038;placement=8186253513&#038;asins=8186253513&#038;linkId=c4c5263f71f7f58342ece29947cb985d&#038;show_border=true&#038;link_opens_in_new_window=true"></iframe></code></pre><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=8296</guid><description><![CDATA[<p>“चंद्रावलोक और ब्राह्मण-पुत्र” की कहानी का उत्तर जान बेताल पुनः उड़ गया। राजा विक्रमादित्य फिर उसी शिंशपा-वृक्ष के निकट पहुंचा।</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><a
href="/vikram-betal-chandravlok-brahmin-putra-kahani-hindi/">“चंद्रावलोक और ब्राह्मण-पुत्र”</a> की कहानी का उत्तर जान बेताल पुनः उड़ गया। राजा विक्रमादित्य फिर उसी शिंशपा-वृक्ष के निकट पहुंचा। बेताल को वृक्ष से उतारा और उसे कंधे पर लादकर लौट पड़ा। मार्ग में बेताल ने फिर राजा को एक रोचक कथा सुनाई।</p><p>विशालपुर नाम की एक नगरी में पद्मनाम नामक एक महाप्रतापी राजा राज करता था। उसकी नगरी में अर्थदत्त नाम का एक व्यापारी भी रहता था, जिसने अपने वाणिज्य-कौशल से अकूत सम्पदा एकत्रित की हुई थी। अर्थदत्त की एक ही संतान थी–अनंगमंजरी नाम की एक अजीब सुन्दर कन्या।</p><p>अनंगमंजरी जब विवाह योग्य हुई तो उसके पिता ने ताम्रलिप्ति नगर के एक संभ्रान्त व्यापारी युवक मणिवर्मा से उसका विवाह कर दिया। अपनी पुत्री से अधिक स्नेह करने के कारण अर्थदत्त ने उसे उसकी ससुराल नहीं भेजा बल्कि अपने दामाद को वहीं रहने के लिए बुला लिया। जैसे किसी रोगी को कड़वी व तीखी दवाएं अप्रिय लगती हैं, उसी प्रकार अनंगमंजरी को अपना पति मणिवर्मा भी अप्रिय जान पड़ता था, लेकिन मणिवर्मा को अपनी पत्नी प्राणों से भी अधिक प्रिय थी। वह हर समय इसी प्रयास में लगा रहता था कि उसकी अतीव सुन्दर पत्नी को कोई कष्ट न होने पाये।</p><p>एक बार अपने माता-पिता से मिलने के लिए मणिवर्मा ताम्रलिप्ति चला गया और काफी दिन तक वहीं रहता रहा। उन्हीं दिनों एक बार जब अनंगमंजरी अपनी विश्वस्त सखियों के साथ अपने भवन के एक ऊंचे झरोखे में बैठी थी। उसने नीचे एक गली में एक सुन्दर और तरुण ब्राह्मण कुमार को आते देखा। उसके चेहरे का तेज देखकर वह उसकी ओर आकर्षित हो गई। वह राजपुरोहित का पुत्र था और उसका नाम था कमलाकर।</p><p>कमलाकर ने भी ऊंचे झरोखे में बैठी अनंगमंजरी को देखा तो वह उसके रूप पर मुग्ध हो गया। वह कुछ क्षण उसी की ओर टकटकी लगाए देखता रहा, फिर एक मनोहारी मुस्कान उसकी ओर फेंकता हुआ वह वहां से चला गया। अनंगमंजरी उसकी मधुर मुस्कान पर जैसे मर मिटी। कमलाकर उसके मन पर काम-बाण चला गया था। उस दिन से सारी सुध-बुध खोकर वह उसी की याद में विदग्ध रहने लगी। उसका खाना-पीना छूट गया और वह लज्जा, भय एवं विरहोन्माद में दुबली तथा पीली पड़ गई।</p><p>प्रिय मिलन बड़ा कठिन था। अनंगमंजरी निराश-सी हो गई थी। कमलाकर को पाने की लालसा में वह एक दिन इतनी व्याकुल हो गई कि उसने प्राण त्यागने का ही निश्चय कर डाला । एक रात वह चुपके से अपनी कुलदेवी <a
href="/kali-chalisa-in-hindi/">चामुंडा माता</a> के मंदिर में पहुंची और वहां देवी के सम्मुख हाथ जोड़कर विनती की, “हे देवी! इस जन्म में तो मैं कमलाकर को पति रूप में पा नहीं सकती किंतु मुझे आशीर्वाद दो कि अगले जन्मों में वह मेरा ही पति हो।”</p><p>देवी के सम्मुख ऐसा कहकर उसने अपनी पिछौरी से एक फंदा तैयार किया और उसे एक अशोक-वृक्ष की शाखा में लटका दिया। इसी बीच महल मे जब उसकी अंतरंग सखी मालतिका की नींद खुली और उसने अनंगमंजरी को वहां न देखा तो वह उसे ढूंढ़ने निकल पड़ी। मंदिर के समीप जब उसने अनंगमंजरी को अपनी गरदन में फंदा डालते देखा तो वह घबरा उठी और दौड़ती हुई उसके समीप जा पहुंची। उसने उसके गले में फांसी का फंदा निकाला और व्यग्र स्वर में अनंगमंजरी से पूछा, “सखी, ऐसी क्या बात हो गई जिसके कारण तुम अपनी जान देने पर तैयार हो गईं। देखो, मैं तुम्हारी सखी हूं, तुम्हारी हितैषी। मुझे अपना दुःख बता दो, मैं अपने प्रयास से तुम्हारा दुख दूर करने की कोशिश करूंगी।”</p><p>तब अनंगमंजरी ने अपने मन की सारी व्यथा सुनाकर उससे कहा, “सखी, मेरे हृदय में उस तरुण के न मिलने से विरह की अग्नि जल रही है। यदि तुम मुझे जीवित देखना चाहती हो तो मुझे मेरे प्रियतम से मिला दो।”</p><p>अनंगमंजरी के ऐसा कहने पर मालतिका ने उसे आश्वासन दिया, “सखी, आज तो बहुत रात हो गई है। सवेरा होने पर मैं कुछ प्रबंध करूंगी और तुम्हारे प्रियतम को इसी जगह बुला दूंगी। इस बीच तुम धीरज धरो और अपने घर जाओ।”</p><p>सवेरा होने पर मालतिका छिपती-छिपाती कमलाकर के पास पहुंची। वह उस समय बगीचे में एक वृक्ष के नीचे चन्दन जल से भीगे कमल-पत्रों की शय्या पर लेटा हुआ था। उसका एक घनिष्ठ मित्र, जो उसके सारे रहस्य जानता था, काम-ज्वाला में जलते हुए अपने मित्र को केले के पत्ते से हवा कर रहा था। यह दृश्य देखकर मालतिका ने सोचा कि &#8216;क्या मेरी सखी अनंगमंजरी के विरह में ही इसकी यह दशा हो रही है?&#8217; ऐसा सोचकर वह सत्य का पता लगाने के लिए एक वृक्ष के पीछे छिप गई।</p><p>उसी समय कमलाकर के उस मित्र ने कहा, “मित्र, जरा देर तुम इस सुहावने बगीचे को देखकर अपना जी बहलाओ और अपने हृदय में जलती हुई विरह-वेदना की आग को ठंडा करने की कोशिश करो। मैं अभी आता हूं।”</p><p>ऐसा कहकर उसका मित्र जाने के लिए उद्यत हुआ लेकिन उसे रोककर कमलाकर ने कहा, “मित्र, कैसे बहलाऊं अपने मन को। उस व्यापारी की कन्या ने मेरे मन को चुराकर मुझे सूना कर दिया है। मेरे सूने हृदय को कामदेव ने अपने बाणों का तरकश बना दिया है। इसलिए तुम कोई ऐसा उपाय करो, जिससे मैं उसे पा सकूँ।”</p><p>कमलाकर की ऐसी बातें सुनकर मालतिका का संदेह जाता रहा। वह अपने छिपे स्थान से निकली और कमलाकर के समीप जाकर बोली, “भद्र, मुझे अनंगमंजरी ने आपके पास भेजा है। उसने संदेश दिया है कि यदि शीघ्र ही आप उससे न मिले तो वह अपने प्राण त्याग देगी। आपके विरह में उसकी बहुत बुरी दशा हो रही है। शरीर सूख गया है और उसके चेहरे की कांति आभाहीन हो गई है। यदि आप उसे बचाना चाहते हैं तो जैसा मै कहूँ वैसा ही करें।”</p><p>इस पर विरह की आग में जलते हुए कमलाकर पर मानो अमृत की वर्षा हो गई। उसने तुरंत उससे अपनी सहमति व्यक्त कर दी।</p><p>तब मालतिका ने कहा, “आज रात को मैं गुप्त रूप से अनंगमंजरी को उसके महल के बगीचे में ले आऊंगी। आप वहीं बाहर ठहरियेगा, उसके बाद मैं कोई उपाय करके आपको भी भीतर बुला लूंगी और इस तरह आप दोनों का मनचाहा मिलन हो सकेगा।”</p><p>इस प्रकार मालतिका ने अपनी बातों से उस ब्राह्मण-पुत्र को प्रसन्न किया। अपना काम पूरा करके वह वापस लौटी और उसने अनंगमंजरी को भी आनंदित किया।</p><p>उस रात जब वह कामी और उत्कंठित कमलाकर सज-धजकर अपनी प्रिया के गृहोद्यान के दरवाजे पर पहुंचा तो मालतिका उसे युक्तिपूर्वक उस उद्यान में ले गई। कमलाकर ने अनंगमंजरी को एक आम्रकुंज की छाया में बैठे हुए देखा।</p><p>बटोही जिस प्रकार छाया को देखकर खिल उठता है, वैसा ही कुछ हाल उस समय कमलाकर का हुआ। उसे देखकर कमलाकर का चेहरा खिल उठा। वह आगे बढ़ ही रहा था कि अनंगमंजरी ने उसे देख लिया। काम के आवेग ने उसकी लज्जा नष्ट कर दी थी। उसने दौड़कर कमलाकर को गले से लगा लिया, “कहां जाते हो? मैंने तुम्हें पा लिया है।” ऐसा कहकर अनंगमंजरी प्रलाप करने लगी। अत्यधिक प्रसन्नता के मारे उसकी सांस रुक गईं और उसके प्राण जाते रहे।</p><p>वायु से छिन्न लता के समान वह धरती पर गिर पड़ी। अहा! प्रेम का पंथ भी निराला है, जिसका परिणाम सदा दुःखदायी ही होता है। यह आकस्मिक और भयावह वज्रपात देखकर &#8220;हाय-हाय, यह क्या हो गया?&#8221; कहता हुआ कमलाकर भी मूर्छित होकर गिर पड़ा। कुछ क्षणों बाद जब उसे चेतना आई, तब उसने अपनी प्रिया को गोद में ले लिया और उसका आलिंगन तथा चुम्बन करता हुआ अनेक प्रकार से विलाप करने लगा।</p><p>कठोर दुख की अधिकता से वह इतना विकल हो गया कि पलक झपकते ही उसका हृदय फट गया और उसकी भी मृत्यु हो गई। मृत्यु को प्राप्त हुए दोनों प्रेमियों के लिए मालतिका जब शोक कर रही थी, तब मानो शोक के कारण ही रात भी समाप्त हो गई।</p><p>सवेरा होने पर, बगीचे के रखवालों से सारा समाचार जानकर उन दोनों के परिवार के लोग लज्जा, आश्चर्य, दुख और मोह से विकल होते हुए वहां आए। खेद से मस्तक झुकाए दोनों पक्ष के लोग बहुत देर तक इस दुविधा में पड़े रहे कि अब क्या करना चाहिए। सच है, बुरी स्त्रियां कुल को बिगाड़ने वाली और सन्तापदायक ही होती हैं।</p><p>इसी बीच उसका पति मणिवर्मा अनंगमंजरी के लिए उत्कंठित, ताम्रलिप्ति से लौट आया।</p><p>पत्नी को याद करता हुआ वह भी बगीचे में जा पहुंचा। वहां उसने अपनी स्त्री को पर-पुरुष के निकट मरी हुई देखा। फिर भी उस पर अत्यंत अनुराग होने के कारण हृदय में शोक की अग्नि जल उठी और उसने भी वहीं पर अपने प्राण त्याग दिए।</p><p>तत्पश्चात्, वहां इकट्ठे हुए लोगों की चीख-पुकार सुनकर नगर के सभी लोगों को सारा वृत्तांत मालूम हो गया और वे विस्मित होते हुए वहां आ पहुंचे। अनंगमंजरी के पिता ने चामुंडा देवी का जो मंदिर बनवाया था, वह निकट ही था। यह दृश्य देखकर गणों ने देवी से निवेदन किया, “हे देवी! अर्थदत्त ने ही यहां आपकी प्रतिष्ठा की है। यह व्यापारी सदा से ही आपका भक्त रहा है। अतः इस दुःख के समय इस पर दया करें।”</p><p>गणों की <a
href="/bhakti-yog-prarthana-swami-vivekanand/">प्रार्थना</a> सुनकर देवी ने उन्हें पुनर्जीवित होने का आशीर्वाद प्रदान कर दिया। देवी की कृपा से वे तीनों ही इस प्रकार जीवित हो उठे मानो सोते से जाग पड़े हों। अब उनके काम-विकार भी नष्ट हो चुके थे।</p><p>यह आश्चर्यजनक घटना देखकर वहां उपस्थित सभी लोग बहुत आनंदित हुए। कमलाकर लज्जा से मस्तक झुकाकर अपने घर चला गया। अर्थदत्त भी लजाई हुई अपनी कन्या को उसके पति सहित घर ले गया।</p><p>उस रात को मार्ग में जाते हुए बेताल ने यह कथा सुनाकर पृथ्वीपति विक्रमादित्य से पुनः पूछा, “राजन, अब तुम मेरी इस शंका का समाधान करो कि प्रेम में अंधे बने हुए उन तीनों में से किसकी आसक्ति अधिक थी? अनंगमंजरी को कमलाकर की अथवा अनंगमंजरी के पति मणिवर्मा की? यदि जानते हुए भी तुमने मेरी शंका का समाधान नहीं किया तो मेरा वही शाप तुम पर फट पड़ेगा।”</p><p>बेताल की यह बातें सुनकर राजा ने उत्तर दिया, “हे बेताल! मुझे तो इन तीनों में से मणिवर्मा ही अधिक मोहान्ध जान पड़ता है। कारण यह कि शेष दोनों तो एक-दूसरे के प्रति अनुरक्त थे और समय पाकर उनकी आसक्ति पक्की हो चुकी थी। अतः उन दोनों ने प्राण त्याग दिए, तो ठीक ही था; लेकिन मणिवर्मा तो बहुत ही मोहान्ध था। उसको तो पर-पुरुष के प्रति आसक्त अपनी पत्नी पर क्रोध करना चाहिए था। लेकिन ऐसा न करके उसकी प्रीति के कारण शोक से उसने अपने प्राण ही त्याग दिए थे। अतः सबसे ज्यादा मोहान्ध वही हुआ। उसी की आसक्ति सबसे अधिक थी।”</p><p>राजा का उत्तर बिल्कुल सटीक था, अतः बेताल संतुष्ट हो गया और पहले की ही भांति अपनी माया से राजा के कंधे से उतरकर अन्तर्ध्यान हो गया। तत्पश्चात् फिर वह उसी शिंशपा-वृक्ष पर जाकर उलटा लटक गया। दृढ़ निश्चयी राजा विक्रमादित्य भी पुनः उसे लाने के लिए उस शिंशपा-वृक्ष की ओर दौड़ चला।</p><p>राजा विक्रमादित्य बेताल को लाने के लिए पुनः शिंशपा वृक्ष के नीचे पहुँच गया। उसने बेताल को उतारकर अपने कंधे पर डाला और चलना शुरू किया। बेताल ने राजा विक्रम को फिर से यह कहानी सुनानी शुरू की – <a
href="/vikram-betal-chaar-brahmin-bhai-kahani-hindi/">चार ब्राह्मण भाइयों की कथा</a></p><pre class="wp-block-code"><code><iframe sandbox="allow-popups allow-scripts allow-modals allow-forms allow-same-origin" style="width:120px;height:240px;" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" frameborder="0" src="//ws-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?ServiceVersion=20070822&#038;OneJS=1&#038;Operation=GetAdHtml&#038;MarketPlace=IN&#038;source=ss&#038;ref=as_ss_li_til&#038;ad_type=product_link&#038;tracking_id=hindpath-21&#038;language=en_IN&#038;marketplace=amazon&#038;region=IN&#038;placement=8186253513&#038;asins=8186253513&#038;linkId=c4c5263f71f7f58342ece29947cb985d&#038;show_border=true&#038;link_opens_in_new_window=true"></iframe></code></pre><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/vikram-betal-anangmanjari-ki-asakti-kahani-hindi/">अनंगमंजरी की आसक्ति – विक्रम-बेताल की कहानी</a> appeared first on <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=8289</guid><description><![CDATA[<p>“चंद्रावलोक और ब्राह्मण-पुत्र” की कहानी बेताल पचीसी की बीसवीं कथा है। मृत्यु के समय ब्राह्मण-पुत्र हँसने लगता है, इसका कारण</p><p>The post <a
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href="/vikram-betal-ki-kahani/"><strong>विक्रम बेताल की कहानियाँ</strong></a>।</p><p><a
href="/vikram-betal-chandraprabh-kiska-putra-kahani-hindi/">“चंद्रप्रभ किसका पुत्र?”</a> नामक कहानी में पूछे प्रश्न का सही उत्तर पाकर बेताल फिर उड़ गया। राजा विक्रमादित्य ने शिंशपा-वृक्ष के नीचे जाकर पुनः बेताल को अपने कंधे पर उठाया और अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा।</p><p>मार्ग में बेताल ने पुनः राजा से कहा, &#8220;राजन! यह तुम्हारा कैसा दृढ़ निश्चय है? जाकर राज-पाट का सुख भोगो। तुम मुझे जो उस दुष्ट भिक्षु के पास ले जा रहे हो, यह उचित नहीं है। किंतु यदि तुम्हारा ऐसा ही आग्रह है तो मेरी यह कथा सुन लो।&#8221;</p><p>आर्यावर्त में अपने नाम को सार्थक करने वाला चित्रकूट नाम का एक नगर है। वहां के लोग व्यवस्था की सीमा का उल्लंघन नहीं करते, अर्थात् सभी वर्गों के लोग अपनी मर्यादा के भीतर रहते हुए ही अपने-अपने कार्य करते हैं।</p><p>उस नगर में चंद्रावलोक नाम का एक राजा राज्य करता था। वह राजा बहुत धीर-वीर, गंभीर एवं एक महान योद्धा था। उसकी शूरवीरता की कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई थी। लेकिन जैसा कि कहा गया है, हर व्यक्ति को अपनी समस्त इच्छित वस्तुएं कभी नहीं मिल पातीं। इसी प्रकार समस्त संपत्तियों के होते हुए भी वह राजा चंद्रावलोक इस बात से बहुत दुःखी रहता था कि उसे अपनी पसंद के अनुसार पत्नी नहीं मिली थी।</p><p>एक दिन वह अपने मन का उद्वेग मिटाने के लिए घोड़े पर सवार होकर अपने अनुचरों के साथ वन में शिकार खेलने गया। वहां उसने कई दुर्दांत हिंसक पशुओं का शिकार किया। एक सिंह का शिकार करने की इच्छा से वह अकेला ही उस विकट वन में घुस गया। वहां उसने एक हृष्ट-पुष्ट एवं कद्दावर सिंह को देखा तो लगा जैसे उसका लक्ष्य उसे मिल गया हो। उसने सिंह की ओर कई अचूक तीर छोड़े। उनमें से एक तीर सिंह को जा लगा और वह घबराकर घने जंगल की ओर भाग चला गया।</p><p>राजा ने भी अपने घोड़े की एड़ लगाई ताकि वह जल्दी से उस सिंह के पास पहुंचकर उसका वध कर सके। किंतु एड़ कुछ ज्यादा ही लग गई। उसका घोड़ा राजा के पांव की एड़ एवं चाबुक की फटकार सुनकर बेहद उत्तेजित हो उठा। सम और विषम भूमि का ध्यान छोड़कर वह वायु-वेग जैसी तीव्रता से दौड़ता हुआ राजा को वहां से दस योजन दूर एक दूसरे प्रदेश में ले आया। वहां पहुंचकर जब घोड़ा रुका, तब राजा को दिशा-भ्रम हो गया। वह किसी प्रकार घोड़े से उतरा और सही दिशा पाने के लिए इधर-उधर भटकने लगा। तभी उसकी निगाह अपने से कुछ आगे एक विशाल सरोवर पर पड़ी। उस सरोवर में कमल खिले हुए थे और भांति-भांति के जलचर उसमें तैरते दिखाई दे रहे थे।</p><p>सरोवर के किनारे पहुँचकर राजा ने अपने घोड़े की जीन खोल दी। पहले उसने घोड़े को पानी पिलाया और खुला छोड़ दिया ताकि वहाँ उगी हरी-भरी दूब खाकर वह अपना पेट भर सके। फिर स्वयं स्नान करके जल पिया। थकावट दूर होने पर वह उस रमणीक स्थान में इधर-उधर नजर डालने लगा।</p><p>तभी उसकी निगाह एक अशोक-वृक्ष के नीचे अपनी सखी के साथ बैठी एक मुनि-कन्या पर पड़ी। वह फूलों के गहने एवं वल्कल वस्त्र पहने हुए थी। प्राकृतिक शृंगार करने से वह बहुत मनोरम प्रतीत हो रही थी। राजा उसके रूप को देखकर मोहित हो गया। उसने मन में सोचा, “अरे कौन है यह? क्या यह कोई दूसरी सावित्री है जो सरोवर में स्नान करने आई हुई है या भगवान शिव की गोद में छूटी <a
href="/tag/parvati/">देवी पार्वती</a> है जो फिर <a
href="/shiv-chalisa-lyrics-in-hindi-pdf/">भगवान शिव</a> को पाने के लिए तपस्या करने आई है? अथवा यह दिन में अस्त हुए <a
href="/chandra-dev-mantra-katha-upay/">चंद्रमा</a> की कान्ति है, जिसने व्रत धारण कर रखा है। तो मैं धीरे-धीरे इसके पास जाकर वरदान प्राप्त करूं।”</p><p>ऐसा सोचकर वह राजा उस कन्या के पास पहुंचा। उस कन्या ने भी जब राजा को अपने निकट आते देखा तो उसकी आंखों में चमक आ गई। फूलों की माला गूंथते उसके हाथ सहसा ही रुक गए। वह सोचने लगी, “ऐसे विकट वन में आने वाला यह पुरुष कौन है? कोई विद्याधर है या कोई सिद्ध? इसका रूप तो मेरी आंखों को चकाचौंध किए दे रहा है।”</p><p>मन-ही-मन ऐसा सोचकर लज्जा के कारण तिरछी नजरों से देखती हुई, वह उठ खड़ी हुई। यद्यपि उसके पांव जकड़-से गए थे तथापि वह जाने को उद्यत हुई। तब चतुर और विनम्र राजा उसके पास पहुंचा और बोला, “सुन्दरी! जो व्यक्ति दूर से आया है, जिसे तुमने पहली बार देखा है और जो तुम्हारा दर्शन मात्र चाहता है, उसके स्वागत-सत्कार का तुम आश्रम-वासियों का यह कैसा ढंग है कि तुम उससे दूर भागी जा रही हो?”</p><p>राजा के ऐसा कहने पर उस कन्या की सखी ने, जो राजा के समान ही चतुर थी, राजा को वहां बिठाया और उसका आतिथ्य-सत्कार किया। उत्सुक राजा ने विनम्र स्वर में पूछा, “भद्रे! तुम्हारी इस सखी ने किस पुण्यवान वेश को अलंकृत किया है? इसके नाम के वे कौन-से अक्षर हैं, जो कानों में अमृत उड़ेलते हैं? और इस निर्जन वन में, पुष्प के समान कोमल अपने शरीर को<a
href="/tag/rishi/"> ऋषि-मुनियों</a> जैसी चर्या से क्यों कष्ट दे रही हैं?”</p><p>राजा की यह बातें सुनकर उसकी सखी ने उत्तर दिया, “श्रीमंत! यह महर्षि कण्व की पुत्री इंदीवर प्रभा है। यह आश्रम में ही पाली-पोसी गई है। इसकी माता स्वर्ग की अप्सरा मेनका हैं। पिता की आज्ञा से यह इस सरोवर पर स्नान करने के लिए आई है। इसके पिता का आश्रम यहां से अधिक दूर नहीं है।”</p><p>राजा यह बातें सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और घोड़े पर सवार होकर उस कन्या का हाथ मांगने के लिए कण्व ऋषि के आश्रम में पहुंचा। वहाँ पहुंचकर राजा ने मुनि के चरणों की वंदना की। मुनि ने भी उसका यथोचित स्वागत-सत्कार किया। उसे विश्राम करने के लिए उचित स्थान दिया।</p><p>जब राजा विश्राम कर चुका तो मुनि ने उससे कहा, “वत्स चंद्रावलोक! तुम मेरी एक बात ध्यानपूर्वक सुनो। इस संसार में प्राणियों को मृत्यु से जैसा भय है, उसे तुम भली-भांति जानते हो, फिर भी तुम अकारण ही इन बेचारे मृगों की हत्या क्यों करते हो? विधाता ने क्षत्रियों का निर्माण तो दुष्टजनों से सज्जनों की रक्षा हेतु ही किया है। अतः तुम धर्मपूर्वक राजसुख का भोग करो। हे राजन! तुम स्वयं ही सोचो कि निर्बल निरीह पशुओं का वध करने से आखिर लाभ ही क्या है? हे राजा चंद्रावलोक! क्या तुमने राजा पांडु का वृत्तांत नहीं सुना जिन्हें इसी शौक़ के कारण शापवश अपने प्राण त्यागने पड़े थे। इसीलिए मैं तुम्हें समझा रहा हूं कि मृगया (आखेट) के बहाने पर निरीह पशुओं का शिकार करना तुरंत बंद कर दो।”</p><p>मुनि के बार-बार ऐसा समझाने का राजा के मन पर भारी प्रभाव पड़ा। उसने मुनि से कहा, “हे मुनिश्रेष्ठ, आज से पहले किसी ने मुझे इस प्रकार समझाने की चेष्टा नहीं की थी इसीलिए अज्ञानवश मैं ऐसा करता रहा। किंतु मैं वचन देता हूं कि आज के बाद फिर कभी मृगया करने का विचार मन में नही लाऊंगा। आज के बाद मेरी ओर से सभी वन-प्राणी अभय हैं।”</p><p>यह सुनकर मुनि ने कहा, “राजन! तुमने वन-प्राणियों को अभयदान दिया, इससे मैं बहुत संतुष्ट हुआ हूं। अतः तुम मुझसे कोई इच्छित वर मांगो।”</p><p>मुनि के ऐसा कहने पर समय को जानने वाले राजा चंद्रावलोक ने कहा, “हे मुनिवर! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो आप अपनी कन्या इंदीवर प्रभा को मुझे दे दें।”</p><p>राजा के इस प्रकार याचना करने पर मुनि ने अपनी वह कन्या राजा को दे दी, जिसका जन्म एक अप्सरा की कोख से हुआ था और जो सिर्फ राजा के ही योग्य थी।</p><p>अनन्तर, उसके साथ विवाह करके राजा वहां से चलने को तैयार हुआ। आश्रम के समस्त मुनिकुमार आंखों में अश्रु लिए उन्हें आश्रम की सीमा तक पहुंचा आए।</p><p>जब राजा ने मुनि कण्व और उनके शिष्यों से विदा ली, तब सूर्यास्त होने को ही था। मार्ग में चलते हुए उन्हें रात्रि हो गई लेकिन राजा फिर भी चलता ही रहा।</p><p>एक स्थान पर रुककर राजा ने मार्ग में एक पीपल का वृक्ष देखा। तब राजा ने सोचा कि रात्रि मे यहीं विश्राम करना चाहिए। यही सोचकर वह वहीं घोड़े से उतर पड़ा। उस रात वह राजा वहां उस मुनिकन्या के साथ पुष्य शय्या पर सोया।</p><p>सुबह जब वह अपने नगर की ओर चलने को हुआ तो अचानक एक ब्रह्मराक्षस से उसका सामना हो गया। उस राक्षस का विकराल शरीर देखकर राजा की पत्नी, वह मुनिकन्या सिहर उठी। वह राक्षस काजल के समान काला था और कालमेघ के समान प्रतीत होता था। उसने अंतड़ियों की माला पहन रखी थी। उस समय वह किसी मनुष्य का मांस खा रहा था और उसकी खोपड़ी का रक्त पी रहा था। क्रोध के कारण उसके मुख से अग्नि-सी निकल रही थी। उसकी दाढ़ें बड़ी भयानक थीं।</p><p>प्रचंड अट्टहास करके राजा का तिरस्कार करते हुए वह बोला, “अरे नीच, मैं ज्वालामुखी नाम का राक्षस हूँ। पीपल का वह वृक्ष मेरा निवास-स्थान है। देवता भी इसकी अवमानना नहीं कर सकते। मैं रात को जब घूमने-फिरने गया, तभी तूने यहां रात बिताई। अब तू इस अविनय का फल भोग। अरे दुराचारी, वासना से तेरी सुध-बुध जाती रही है। मैं तेरा हृदय निकालकर खाऊंगा और तेरा रुधिर पी जाऊंगा।”</p><p>राजा ने ब्रह्मराक्षस की बातें सुनीं। ब्रह्मराक्षस बड़ा भयानक था। राजा ने महसूस किया कि उसे मार डालना किसी भी प्रकार संभव नहीं है, अतः उसने विनयपूर्वक कहा, “अनजाने में मुझसे जो अपराध हुआ है, आप उसे क्षमा कर दें। मैं आपके आश्रय में आया हुआ अतिथि हूं, आपकी शरण में हूं। मैं आपको मनचाहा आखेट ला दूंगा जिससे आपकी तृप्ति हो जाएगी। अतः क्रोध त्यागकर आप प्रसन्न हों।”</p><p>राजा की बातें सुनकर राक्षस कुछ शांत हुआ और उससे बोला, “अगर तुम सात दिनों के अंदर मुझे किसी ऐसे ब्राह्मण-पुत्र की भेंट लाकर दो जो सात वर्ष का होने पर भी बड़ा वीर हो, विवेकी हो और अपनी इच्छा से तुम्हारे लिए अपने को दे सके और जब वह मारा जाए तो भूमि पर डालकर उसकी माता उसके हाथ और पिता उसके पांव मजबूती से पकड़े रहें तथा तलवार के प्रहार से तुम्हीं उसे मारो, तो मैं तुम्हारे इस अपराध को क्षमा कर दूंगा, नहीं तो राजन मैं शीघ्र ही तुम्हें और तुम्हारे लश्कर को मार डालूंगा।”</p><p>प्राण जाने के भय से राजा ने तुरंत उसकी शर्त स्वीकार कर ली। तब वह ब्रह्मराक्षस तत्काल वहां से अन्तर्ध्यान हो गया।</p><p>राजा अपनी पत्नी को लिए घोड़े पर सावर होकर आगे चल दिया लेकिन उसका मन बहुत उदास था। वह सोचने लगा, “मैं भी कैसा पागल हूं जो उस ब्रह्मराक्षस की शर्त मान ली। भला वैसा उपहार मुझे मिलेगा भी कहां? मैंने प्राण जाने के भय से व्यर्थ ही उस राक्षस की शर्त स्वीकार की। इससे तो बेहतर था कि वह मुझे ही अपना आहार बना लेता। अब मैं अपने नगर को चलूं और देखूं कि होनहार क्या है?”</p><p>राजा ऐसा ही कुछ सोचता जा रहा था कि उसकी सेना उसे खोजती हुई वहां पहुंच गई। तब वह अपनी सेना व अपनी पत्नी के साथ अपने नगर चित्रकूट में आया। राजा को उसके अनुकूल पत्नी मिली है, यह जानकर राजधानी में उत्सव मनाया गया लेकिन मन का दुःख मन में ही दबाए हुए राजा ने बाकी दिन बिता दिया।</p><p>अगले दिन एकान्त में उसने अपने मंत्रियों से सारा वृत्तांत कह सुनाया। सुनकर उनमें से सुमति नामक एक मंत्री ने कहा, “राजन, आप चिंता न करें। मैं वैसा ही उपहार खोजकर ला दूंगा, क्योंकि यह धरती अनेक आश्चर्यों से भरी पड़ी है।”</p><p>राजा को इस प्रकार आश्वासन देकर उस मंत्री ने शीघ्र ही सात वर्ष की उम्र वाले एक बालक की मूर्ति बनवाई। उसने मूर्ति को रत्न से सजाकर एक पालकी में बिठा दिया। फिर वह पालकी इस घोषणा के साथ अनेक नगरो, गांवों में जहां-तहां घुमाई गई—&#8217;सात वर्ष का एक ब्राह्मण पुत्र, जो समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए अपनी इच्छा से अपना शरीर एक ब्रह्मराक्षस को सौंपेगा और इस कार्य में वह न केवल अपने माता-पिता की अनुमति ही ले लेगा, बल्कि जब वह मारा जाएगा तब स्वयं उसके माता-पिता उसके हाथ-पैर पकड़े रहेंगे। अपने माता-पिता की भलाई चाहने वाले ऐसे बालक को राजा सौ गांवों के साथ यह सोने और रत्नों से जड़ी मूर्ति भी दे देंगे।&#8217;</p><p>इस प्रकार जब बालक की वह मूर्ति घुमाई जा रही थी, तब एक ब्राह्मण-पुत्र ने यह घोषणा सुनी। वह बालक बड़ा वीर और अद्भुत आकृति वाला था। पूर्वजन्म के अभ्यास से वह बचपन से ही सदा <a
href="/swami-vivekananda-paropkar-me-hamara-hi-upkaar-hai-hindi/" rel="sponsored nofollow">परोपकार के कार्य</a> में लगा रहता था। ऐसा जान पड़ता था मानो प्रजा के पुण्य-फल ने ही उसके रूप में शरीर धारण कर रखा हो। ढिंढोरा पीटने वालों के पास जाकर उसने कहा, “प्रजा के हित में मैं अपने को अर्पित करूंगा। मैं अपने माता-पिता को समझाकर अभी आता हूं।”</p><p>उसकी यह बातें सुनकर ढिंढोरा पीटने वाले प्रसन्न हो गए। उन्होंने उसे अनुमति दे दी। घर जाकर बालक ने हाथ जोड़कर अपने माता-पिता से कहा, “समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए मैं अपना यह नश्वर शरीर दे रहा हूं। अतः आप लोग मुझे आज्ञा दें और इस प्रकार अपनी दरिद्रता का भी अंत करें। इसके लिए यहां के राजा सौ गांवों सहित सोने और रत्नों वाली मेरी यह प्रतिकृति (मूर्ति) मुझे देंगे, जिसे मैं आप लोगों को सौंप दूंगा। हे पिताश्री, तब मैं आप लोगों से भी उऋण हो जाऊंगा और पराया कार्य भी सिद्ध कर सकूँगा। दरिद्रता से छुटकारा पाकर आप भी अनेक पुत्र प्राप्त कर सकेंगे।”</p><p>पुत्र की यह बातें सुनकर उसके माता-पिता ने कहा, “बेटा! क्या तू पागल हो गया है जो ऐसी बहकी-बहकी बातें कह रहा है? भला धन के लिए कौन अपने पुत्र की हत्या करना चाहेगा और कौन बालक अपना शरीर देना चाहेगा?”</p><p>माता-पिता की यह बातें सुनकर उस बालक ने फिर कहा, “पिताश्री, न तो मेरी बुद्धि नष्ट हुई है और न ही मैं कोई प्रलाप कर रहा हूं। अतः आप मेरी अर्थयुक्त बातें सुनिए। मानव का यह शरीर अपवित्र वस्तुओं से भरा है। जन्म से ही यह जुगुप्सित (व्याधियों का घर) है। अतः शीघ्र ही इसे नष्ट हो जाना है। इसलिए बुद्धिमान लोगों का कहना है कि इस क्षणभंगुर शरीर से संसार में जितना भी पुण्य उपार्जित किया जा सके, वही सार वस्तु है। हे पिताश्री, समस्त प्राणियों का उपकार करने से बड़ा और कौन-सा पुण्य हो सकता है? और उसमें भी अगर माता-पिता की भक्ति हो तो देह-धारण करने का अधिक फल और क्या होगा?”</p><p>इस तरह की बातें कहकर उस दृढ़प्रतिज्ञ बालक ने शोक करते हुए अपने माता-पिता से अपनी मनचाही बात स्वीकार करा ली। फिर वह राजा के सेवकों के पास गया और वह सुवर्णमूर्ति तथा उसके साथ सौ गांवों का दानपत्र लाकर अपने माता-पिता को दे दिया। इसके पश्चात् उन राजसेवकों को आगे करके अपने माता-पिता के साथ वह शीघ्रतापूर्वक राजा के साथ चित्रकूट की ओर चल पड़ा।</p><p>चित्रकूट में जब राजा चंद्रावलोक ने अखंडित तेज वाले उस बालक को देखा, तब वह बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने फूलों और चन्दन के लेप से बालक को सजाया और उसे हाथी की पीठ पर बैठाकर, उसके माता-पिता के साथ उस ब्रह्मराक्षस के स्थान पर ले गया।</p><p>उस पीपल के वृक्ष के निकट वेदी बनाकर राजा के पुरोहित ने विधिपूर्वक जैसे ही अग्नि में आहुति डाली, त्योंही अट्टहास करता हुआ, मंत्र पढ़ता हुआ, वह ब्रह्मराक्षस प्रकट हुआ। लाल रंग की मदिरा पीने के कारण उन्मत्त होकर वह झूम रहा था, जम्हाइयां ले रहा था और तेजी से सांसें छोड़ रहा था। उसकी आंखें जल रही थीं, मुख से ज्वाला निकल रही थी और उसके शरीर की छाया से दिशाओं में अंधकार-सा फैला प्रतीत होने लगा था।</p><p>राजा चंद्रावलोक ने उसे देखकर नम्रतापूर्वक कहा, “भगवन्, आज मेरी प्रतिज्ञा का सातवाँ दिन है। अपने वचन के अनुसार मैं यह मानव उपहार आपके लिए लाया हूँ। अतः आप प्रसन्न होकर विधिपूर्वक उसे ग्रहण करें।”</p><p>राजा के इस प्रकार निवेदन करने पर ब्रह्मराक्षस ने अपनी जीभ से होंठों के किनारों को चाटते हुए उस ब्राह्मण बालक की ओर देखा। यह देखकर भी वह बालक तनिक भी नहीं डरा बल्कि यही सोचने लगा कि &#8216;इस प्रकार अपने शरीर का दान करके मैंने जो पुण्य अर्जित किया है, उससे मुझे ऐसा स्वर्ग अथवा मोक्ष नहीं मिलना चाहिए जिससे दूसरों का उपकार न होता हो, बल्कि जन्म-जन्मांतर में मेरा यह शरीर परोपकार के काम में ही आए।&#8217; ज्योंही ही उसने मन में यह बातें सोचीं, त्योंही क्षण भर में फूल बरसाते हुए देवसमूह के विमानों से आकाश भर गया।</p><p>अनन्तर, उस बालक को ब्रह्मराक्षस के सम्मुख लाया गया। मां ने उसके हाथ पकड़े और पिता ने पैर। इसके बाद ज्योंही राजा तलवार उठाकर उसे मारने चला, त्योंही उस बालक ने ऐसा अट्टहास किया कि ब्रह्मराक्षस सहित सब लोग विस्मय में पड़ गए। अपना-अपना काम छोड़कर हाथ जोड़कर वे उस बालक का मुंह देखने लगे। इस प्रकार, यह विचित्र और सरस कथा सुनाकर बेताल ने फिर राजा विक्रमादित्य से पूछा, “राजन! अब तुम मेरे इस प्रश्न का उत्तर दो कि प्राणान्त के ऐसे समय में भी वह बालक क्यों हँसा था? मुझे इस बात का बहुत कौतूहल है। जानते हुए भी यदि तुम इसका कारण नहीं बताओगे तो तुम्हारा सिर अनेक टुकड़ों में खंड-खंड होकर बिखर जाएगा।”</p><p>बेताल की यह बात सुनकर राजा ने कुछ इस प्रकार उसका निराकरण किया, “हे बेताल! जो प्राणी दुर्बल होता है, वह भय के उपस्थित होने पर अपने प्राणों की रक्षा के लिए अपने माता-पिता को पुकारता है। उनके न होने पर राजा को पुकारता है क्योंकि आर्तजनों की रक्षा के लिए ही तो राजा बनाए जाते हैं।</p><p>यदि उसे राजा का भी सहारा नहीं मिलता तो फिर वह अपने कुलदेवता का स्मरण करता है। उस बालक के तो सभी सहायक वहां उपस्थित थे, लेकिन वे सब-के-सब प्रतिकूल हो गए थे। माता-पिता ने धन के लोभ में उस बालक के हाथ-पैर पकड़ रखे थे। राजा अपने प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं उसका वध करने को उद्यत था और वहां देवता के रूप में जो ब्रह्मराक्षस था, वही उसका भक्षक था।</p><p>जो शरीर नाशवान है, जिसका अंत कड़वा है तथा जो अधिकाधिक जर्जर है, उसके लिए भी उन मूढ़मति वाले लोगों की ऐसी विडम्बना देखकर उसे आश्चर्य हुआ। जिन शरीरों में <a
href="/tag/brahma/">भगवान ब्रह्मा</a>, <a
href="/tag/vishnu/">भगवान विष्णु</a>, देवराज इन्द्र और <a
href="/om-jai-shiv-omkara-aarti/">भगवान शंकर</a> का निवास होता है, वे भी अवश्य नष्ट हो जाते हैं और उसी शरीर को स्थिर बनाए रखने की इन सबमें कैसी विचित्र वासना है! वह बालक उन लोगों की देह-ममता की यह विचित्रता देखकर अचरज में पड़ गया और अपनी अभिलाषा को पूर्ण जानकर प्रसन्न हुआ और इसी आश्चर्य व प्रसन्नता से वह हँस पड़ा था।”</p><p>राजा विक्रमादित्य जब ऐसा कहकर चुप हो गए, तब वह बेताल अपनी माया के बल से विक्रमादित्य के कंधे से गायब होकर फिर अपनी जगह पर जा पहुंचा। राजा भी बिना आगा-पीछा देखे शीघ्रतापूर्वक पुनः उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। बड़े लोगों का हृदय समुद्र के समान होता है, उसे किसी भी तरह से क्षुब्ध नहीं किया जा सकता।</p><p>राजा विक्रमादित्य बेताल को लाने के लिए पुनः शिंशपा वृक्ष के नीचे पहुँच गया। उसने बेताल को उतारकर अपने कंधे पर डाला और चलना शुरू किया। बेताल ने राजा विक्रम को फिर से यह कहानी सुनानी शुरू की – <a
href="/vikram-betal-anangmanjari-ki-asakti-kahani-hindi/">अनंगमंजरी की आसक्ति</a></p><pre class="wp-block-code"><code><iframe sandbox="allow-popups allow-scripts allow-modals allow-forms allow-same-origin" style="width:120px;height:240px;" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" frameborder="0" src="//ws-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?ServiceVersion=20070822&#038;OneJS=1&#038;Operation=GetAdHtml&#038;MarketPlace=IN&#038;source=ss&#038;ref=as_ss_li_til&#038;ad_type=product_link&#038;tracking_id=hindpath-21&#038;language=en_IN&#038;marketplace=amazon&#038;region=IN&#038;placement=8186253513&#038;asins=8186253513&#038;linkId=c4c5263f71f7f58342ece29947cb985d&#038;show_border=true&#038;link_opens_in_new_window=true"></iframe></code></pre><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/vikram-betal-chandravlok-brahmin-putra-kahani-hindi/">चंद्रावलोक और ब्राह्मण-पुत्र – विक्रम बेताल की कहानी</a> appeared first on <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=8280</guid><description><![CDATA[<p>“चंद्रप्रभ किसका पुत्र?” बेताल पच्चीसी की उन्नीसवीं कहानी है। राजा चंद्रप्रभ के तीन पिताओं में से उसका पिता वाक़ई कौन</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>“चंद्रप्रभ किसका पुत्र?” बेताल पच्चीसी की उन्नीसवीं कहानी है। राजा चंद्रप्रभ के तीन पिताओं में से उसका पिता वाक़ई कौन था–बेताल के इस प्रश्न का राजा विक्रमादित्य अपने तेज़ दिमाग़ से सही जवाब देता है। बेताल पच्चीसी की शेष कहानियाँ पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – <a
href="/vikram-betal-ki-kahani/"><strong>विक्रम बेताल की कहानियाँ</strong></a>।</p><p><a
href="/vikram-betal-yashodhan-baldhar-kahani-hindi/">&#8220;यशोधन और बलधर में कौन अधिक चरित्रवान?&#8221;</a> कहानी का सही उत्तर राजा विक्रम से प्राप्त कर बेताल पुनः उड़ गया। राजा विक्रमादित्य ने शिंशपा-वृक्ष से फिर बेताल को उतारा और उसे अपने कंधे पर डालकर चल पड़ा। चलते हुए बेताल ने पुनः कहा, “राजन! सुनो, मैं तुम्हें इस बार यह मनोहर कथा सुनाता हूं।&#8221;</p><p>बहुत पहले वक्रोलस नाम का एक नगर था। जहां इन्द्र के समान एक राजा राज्य करता था। उसका नाम था सूर्यप्रभ। राजा सूर्यप्रभ हर प्रकार से सुखी था किंतु उसे एक ही दुःख था कि बहुत-सी रानियों के होते हुए भी उसे कोई संतान नहीं हुई थी।</p><p>उस समय ताम्रलिप्ति नाम की एक महानगरी में धनपाल नाम का एक महाजन (सेठ) रहता था, जो उस क्षेत्र के सभी धनवानों में अग्रणी था। उसकी इकलौती पुत्री का नाम धनवती था। वह इतनी सुन्दर थी कि उसे देखकर किसी अप्सरा का भ्रम होता था।</p><p>जब वह कन्या युवती हुई, तब महाजन की मृत्यु हो गई। राजा का सहारा पाकर महाजन के संबंधियों ने उसका सारा धन हड़प लिया। महाजन की पत्नी हिरण्यवती किसी प्रकार अपने रत्न एवं आभूषणों को छिपाकर अपनी पुत्री सहित अपने संबंधियों के डर से वहां से भाग निकली। उसके हृदय में दुख का अंधेरा घिरा हुआ था। अपनी पुत्री का हाथ थामे वह बड़ी कठिनाई से नगर से बाहर निकली।</p><p>संयोगवश अंधकार में जाती हुई हिरण्यवती ने दिख न पाने के कारण सूली पर चढ़ाए गए एक चोर को अपने कंधे से धक्का दे दिया। वह चोर जीवित था। उसके कंधे के धक्के से वह तिलमिला उठा और कराहकर कह उठा, “हाय! मेरे कटे हुए जख्मों पर कौन नमक छिड़क रहा है?” इस पर उस महाजन की स्त्री ने क्षमायाचना करते हुए उस चोर से पूछा, “श्रीमंत, आप कौन हैं?”</p><p>तब उस चोर ने उत्तर दिया, “मैं एक कुख्यात चोर हूं। चोरी करने एक कारण मुझे सूली पर चढ़ाए जाने का दंड मिला है। लेकिन आर्या, आप बतलाएं कि आप कौन हैं और इस अंधकार में भटकती हुई कहां जा रही हैं?”</p><p>चोर के पूछने पर महाजन की पत्नी उसे अपना परिचय देने लगी, तभी <a
href="/chandra-dev-mantra-katha-upay/">चंद्र देव</a> निकल आए और उनके प्रकाश में सारा क्षेत्र आलोकित हो गया। तब चोर ने देख लिया कि उस स्त्री के साथ चंद्रमा के मुख के समान एक कन्या भी वहां मौजूद थी। यह देखकर उसने उसकी माता से प्रार्थना की, “आर्ये, तुम मेरी एक <a
href="/bhakti-yog-prarthana-swami-vivekanand/">प्रार्थना</a> सुनो। मैं तुम्हें एक हजार स्वर्णमुद्राएं दूंगा। तुम अपनी कन्या मुझे दे दो।”</p><p>यह सुनकर धनवती की माता हंसी और चोर से पूछा, “तुम तो मरने वाले हो। सूली पर टंगे हुए तुम्हें मरने में विलम्ब नहीं होगा। फिर क्यों मेरी कन्या का हाथ मांगना चाहते हो?”</p><p>इस पर उस चोर ने कहा, “यह सत्य है कि मेरी आयु समाप्त हो गई है, पर मैं पुत्रहीन हूं। शास्त्रों में लिखा है कि पुत्रहीन व्यक्ति की सद्गति नहीं होती। अतः यह यदि मेरी आज्ञा से किसी और के द्वारा पुत्र पैदा करेगी तो वह मेरा क्षेत्रज पुत्र होगा। इसी से मैं तुमसे यह निवेदन करता हूं कि मेरा मनोरथ पूरा करो।”</p><p>चोर की बात सुनकर महाजन की पत्नी के मन में लोभ पैदा हो गया। उसने चोर की बात स्वीकार कर ली।</p><p>तब वह महाजन की पत्नी कहीं से जल ले आई और यह कहकर उसने उस जल को चोर के हाथों पर डाल दिया कि &#8216;मैं अपनी यह कुंवारी कन्या तुम्हें देती हूं।&#8217;</p><p>तब उस चोर ने उस कन्या को अपना क्षेत्रज पुत्र उत्पन्न करने का आदेश दिया और अपनी सास से बोला, “सामने उस बरगद के विशाल वृक्ष को देखो। उस वृक्ष की जड़ के समीप जमीन खोदो तो वहां जमीन में दबी तुम्हें कुछ स्वर्णमुद्राएं मिलेंगी। वह स्वर्णमुद्राएं निकाल लो और मेरी मृत्यु के बाद विधिपूर्वक मेरा दाह-संस्कार करा देना। तत्पश्चात् मेरी अस्थियों का किसी तीर्थस्थान में विसर्जन करने के पश्चात् अपनी कन्या सहित वक्रोलस नगर में चली आना। वहां राजा सूर्यप्रभ के शासन में वहां के लोग सुखपूर्वक रहते हैं। मुझे आशा है तुम्हें वहां रहने के लिए किसी प्रकार की कठिनाई नहीं आएगी।”</p><p>यह कहकर उस प्यासे चोर ने हिरण्यवती द्वारा लाया हुआ जल पीया और सूली पर चढ़ाए जाने की पीड़ा के कारण अपने प्राण त्याग दिए।</p><p>हिरण्यवती ने चोर के निर्देशानुसार बरगद के वृक्ष के पास जाकर स्वर्णमुद्राएं निकालीं और किसी गुप्त मार्ग से अपने पति के किसी मित्र के यहां चली गई। वहां रहकर उसने युक्तिपूर्वक उस चोर की दाह-क्रिया करवाई और उसकी अस्थियों को किसी तीर्थ में प्रवाहित कराने आदि की भी व्यवस्था कर दी।</p><p>अगले दिन वह उस छिपे धन को लेकर अपनी कन्या के साथ वहां से निकल पड़ी और चलती-चलती क्रमशः वक्रोलस नगर में पहुंच गई। वहां उसने वसुदत्त नाम के किसी श्रेष्ठ वणिक से एक मकान खरीद लिया और पुत्री सहित उस मकान में रहने लगी। उन्हीं दिनों उस नगर में विष्णुस्वामी नाम के एक अध्यापक रहते थे। मनःस्वामी नाम का उनका एक ब्राह्मण-शिष्य बहुत रूपवान था।</p><p>यद्यपि वह ब्राह्मण-शिष्य उत्तम कुल का था तथापि यौवन के वशीभूत होकर हंसावली नाम की एक विलासिनी के प्रेम में फंस गया था। हंसावली शुल्क के रूप में पांच-सौ स्वर्णमुद्राएं मांगती थी और इतना धन उसके पास नहीं था इसलिए वह उसे पाने को दिन-रात बेचैन रहता था।</p><p>एक दिन उस महाजन की कन्या धनवती ने अपने मकान की छत पर से उस सुन्दर युवक को देखा। धनवती उसकी सुन्दरता पर मोहित हो गई। उसे अपने चोर पति की आज्ञा का स्मरण हो आया। तब उसने अपनी माता को बुलाया और उससे कहा, “माँ, नीचे खड़े उस ब्राह्मण युवक के रूप और यौवन को तो देखो। उसके नेत्र कितने सुन्दर हैं। इस वेश मे तो वह साक्षात् कामदेव जैसा दिखाई दे रहा है।”</p><p>यह सुनकर उसकी माता हिरण्यवती समझ गई कि धनवती को यह युवक पसंद आ गया है। तब उसने मन में सोचा, “पति की आज्ञा से पुत्र-प्राप्ति के लिए मेरी पुत्री को किसी पुरुष का वरण तो करना ही है, फिर क्यों न इसी युवक से अनुरोध किया जाए?” यह सोचकर उसने इच्छित संदेश के साथ भेद जानने वाली एक दासी को भेजा कि वह उस ब्राह्मण युवक को यहां ले आए।</p><p>उस दासी ने जाकर उस ब्राह्मण युवक को एकांत में बुलाया और सारी बातें कहीं। उन्हें सुनकर वह व्यसनी ब्राह्मण युवक बोला, “यदि मुझे हंसावली के लिए पाँच सौ सोने की मोहरें दे, तो मैं एक रात के लिए वहां जा सकता हूं।”</p><p>उसके ऐसा कहने पर दासी ने यह बात महाजन की स्त्री से कही। महाजन की स्त्री ने उसी के हाथ उतना धन भेज दिया। वह धन लेकर मनःस्वामी उस दासी के साथ महाजन की कन्या उस धनवती के महल में गया, जो एक रात्रि के लिए उसे अर्पित कर दी गई थी।</p><p>वहां मनःस्वामी ने अत्यंत उत्कंठित उस कन्या को देखा, जिसने धरती को विभूषित कर रखा था। चकोर जिस प्रकार चांद को देखता है, वैसे ही वह धनवती को देखकर प्रसन्न हुआ। उसने धनवती के साथ समागम करते हुए वह रात बिताई। सवेरा होने पर जिस प्रकार से वह वहां आया था, उसी प्रकार वहां से निकलकर चला गया।</p><p>समय पाकर धनवती गर्भवती हुई और उसने मनःस्वामी के अंश-रूप एक सुन्दर बालक को जन्म दिया। बालक के लक्षण उसके उज्ज्वल भविष्य की सूचना दे रहे थे। पुत्र के रूप में उस बालक को पाकर धनवती बहुत संतुष्ट हुई। रात में <a
href="/om-jai-shiv-omkara-aarti/">भगवान शिव</a> ने स्वप्न में उन्हें दर्शन देकर आदेश दिया कि “सहस्र स्वर्णमुद्राओं के साथ, पालने में लेटे हुए इस बालक को सवेरे राजा सूर्यप्रभ के दरवाजे पर छोड़ आओ। इससे इसका और तुम्हारा दोनों का कल्याण होगा।” <a
href="/shiv-chalisa-lyrics-in-hindi-pdf/">शिवजी</a> के ऐसा कहने पर वह वणिकपुत्री और उसकी माता जागकर आपस में विचार-विमर्श करने लगी और भगवान की बातों पर विश्वास पर वे राजा सूर्यप्रभ के सिंहद्वार पर उस बालक को स्वर्णमुद्राओं सहित छोड़ आई।</p><p>उधर <a
href="/shiv-gita-hindi/">भगवान शंकर</a> ने पुत्र की चिंता में सदा दुःखी रहने वाले राजा सूर्यप्रभ को भी स्वप्न में आदेश दिया, “राजन! उठो, तुम्हारे सिंहद्वार पर किसी ने पालने में लेटे हुए एक सुंदर बालक को रख दिया है। उसे स्वीकार करो और उसका पुत्रवत् पालन करो।”</p><p>राजा की नींद खुली और उसने सिंहद्वार पर जाकर देखा तो उसे भगवान शिव के कथन की सत्यता का पता चला। बालक के साथ धनराशि भी रखी हुई थी और उसके हाथ-पैरों में छत्र, ध्वज आदि के चिन्हों की रेखाएं थीं। वह बालक बहुत ही सुंदर आकृति वाला था।</p><p>&#8220;भगवान शिव ने मेरे योग्य पुत्र ही मुझे दिया है।&#8221; ऐसा कहते हुए राजा ने उस बालक को अपने हाथों में उठा लिया और महल में चला गया। तब राजा ने पुत्र प्राप्ति के उपलक्ष्य में इतना धन गरीबों में लुटाया कि नगर में कोई दरिद्र ही न रहा। नृत्य-वाद्य आदि के साथ राजा ने विधिपूर्वक बालक को अपनाया और उसका नाम रखा चंद्रप्रभ। राजमहल में हर प्रकार के सुखों के साथ धीरे-धीरे राजकुमार बड़ा होने लगा। जब वह युवक हुआ तो राजा ने उसे राज्यभार सौंप दिया और वह तीर्थाटन के लिए <a
href="/12-jyotirling-name-list-hindi/">भगवान शिव की नगरी वाराणसी</a> चला गया।</p><p>नीति जानने वाला उसका पुत्र जब अपनी प्रजा पर धर्मपूर्वक शासन चला रहा था, तभी सूचना मिली कि वाराणसी में उसके पिता का देहान्त हो गया है। पिता की मृत्यु का संवाद पाकर राजा चंद्रप्रभ ने उसके लिए शोक किया तथा उसके लिए श्राद्ध आदि किए। फिर वह धर्मात्मा अपने मंत्रियों से बोला, “पिताजी से भला मैं किस प्रकार उऋण हो सकता हूं। फिर भी मैं अपने हाथों उनका एक ऋण चुकाऊंगा। मैं उनकी अस्थियां ले जाकर विधिपूर्वक <a
href="/ganga-maiya-ki-aarti/">गंगा नदी</a> में प्रवाहित करूंगा तथा गया जाकर सभी पितरों को पिंडदान दूंगा। मैं इसी प्रसंग में पूर्व समुद्र तक की तीर्थयात्रा भी करूंगा।”</p><p>राजा के ऐसा कहने पर उसके मंत्री उससे बोले, “देव! आपको किसी प्रकार ऐसा नहीं करना चाहिए। आप यदि राज्य को इस प्रकार अरक्षित छोड़कर चले गए तो पीछे से शत्रुओं को राज्य पर आक्रमण करते देर न लगेगी। अतः आप पिता के संबंध में यह कार्य किसी और के हाथों करा लें। एक राजा के लिए प्रजापालन के अतिरिक्त और कोई बड़ा <a
href="/category/dharma/">धर्म</a> नहीं है।”</p><p>अपने मंत्रियों की बात सुनकर राजा चंद्रप्रभ ने कहा, “हम जो कुछ निश्चय कर चुके हैं, वह अटल है। पिता के लिए मुझे तीर्थयात्रा अवश्य करनी है। इस क्षणभंगुर शरीर का क्या विश्वास? पता नहीं कब पूज्य पिताजी की तरह मेरा साथ छोड़ दे। अतः मेरा आदेश है कि जब तक मैं इस तीर्थयात्रा से वापस न लौट आऊं, मेरे स्थान पर तुम लोग मेरे राज्य की रक्षा करोगे।”</p><p>राजा की यह आज्ञा सुनकर मंत्रिगण चुप ही रहे। तब वह राजा अपनी यात्रा की तैयारियां करने लगा। एक शुभ दिन स्नानादि करके उसने अग्निहोत्र की विधि सम्पन्न की और ब्राह्मणों का पूजन किया। फिर शांत वेश धारण करके जुते हुए रथ में बैठकर उसने नगर से प्रस्थान किया।</p><p>जो सामंत, राजपुत्र, नगरवासी तथा ग्रामीण आदि राजा को छोड़ने सीमान्त तक आए थे, उनकी इच्छा न होने पर भी राजा चंद्रप्रभ ने बड़ी कठिनता से उन्हें समझा-बुझाकर वापस लौटा दिया और मंत्रियों को राज्य-शासन का भार सौंपकर वाहनों पर आरूढ़ ब्राह्मणों तथा पुरोहितों के साथ वे आगे बढ़े।</p><p>विचित्र प्रकार के वेशों और भाषाओं को देख-सुनकर प्रसन्न होते तथा अनेक प्रकार के देशों को देखते हुए वे सब क्रमशः गंगा के तट पर जा पहुंचे। राजा ने उस गंगा नदी को देखा, जिसमें जल-कल्लोल से बनने वाली लहरियां, प्राणियों के स्वर्गारोहण के लिए बनाई जा रही सीढ़ियों के समान जान पड़ती थीं।</p><p>राजा ने रथ से उतरकर विधिपूर्वक पतित-पावनी गंगा में स्नान किया और राजा सूर्यप्रभ की अस्थियां उसमें दान देकर और श्राद्धादि सम्पन्न करके वह फिर रथ पर सवार होकर चल पड़ा और क्रमशः <a
href="/tag/rishi/">ऋषियों-मुनियों</a> से वंदित प्रयाग में जा पहुंचा। राजा ने वहां उपवास रखकर स्नान,<a
href="/daan-bharat-mein-vivekananda/"> दान</a>, श्राद्ध आदि सभी उत्तम क्रियाएं सम्पन्न कीं और उसके बाद वाराणसी गया।</p><p>वाराणसी में तीन दिन रुककर विधिपूर्वक सभी धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करके राजा &#8216;गयाशिर&#8217; नामक स्थान पर पहुंचा। वहां राजा ने पर्याप्त दक्षिणा के साथ विधिपूर्वक श्राद्ध किया और फिर धर्मारण्य चला गया। गया कूप में जब वह पिंड देने लगा तो उस पिंड को लेने के लिए उस कुएं के भीतर से मनुष्य के तीन हाथ ऊपर निकले। यह देखकर राजा घबरा गया कि यह क्या बात है? उसने अपने ब्राह्मणों से पूछा, “इनमें से किस हाथ में मैं पिंड दूं?”</p><p>तब उन ब्राह्मणों ने राजा से कहा, “राजन, इनमें से एक हाथ तो निश्चित ही किसी चोर का है क्योंकि लोहे की हथकड़ी पड़ी रहने का निशान उसकी कलाई में स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है। दूसरा हाथ किसी ब्राह्मण का है क्योंकि उसमें &#8216;पवित्री&#8217; पड़ी हुई है। तीसरा उत्तम हाथ लक्षणों वाले किसी राजा का है क्योंकि उसकी उंगलियों में बहुमूल्य रत्नों से जड़ी कई अंगूठियां पड़ी हैं। अतः हम लोग यह समझ पाने में असमर्थ हैं कि आपको पिंडदान इन तीनों हाथों में से किस हाथ में दिलाएं।”</p><p>ब्राह्मणों के ऐसा कहने पर राजा अनिश्चय में घिर गया और कोई फैसला न कर सका।</p><p>राजा विक्रमादित्य के कंधे पर बैठा बेताल इतनी कथा सुनाकर राजा से बोला, “राजन, वे ब्राह्मण और राजा चंद्रप्रभ पिंडदान देने के विषय में कोई निर्णय हुए भी यदि तुम मेरे इस प्रश्न का उत्तर नहीं दोगे तो तुम्हें पहले वाला ही शाप लगेगा।”</p><p>धर्मज्ञ राजा विक्रमादित्य ने बेताल की यह बात सुनी। तब उसने मौन त्यागकर बेताल को यह उत्तर दिया, “हे योगेश्वर! राजा चंद्रप्रभ को उस चोर के हाथ में ही पिंड देना चाहिए क्योंकि वह उसी का क्षेत्रज पुत्र था, शेष दोनों का नहीं।</p><p>उसे जन्म देने वाले ब्राह्मण को उसका पिता नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसने तो धन लेकर एक रात के लिए स्वयं को बेच दिया था। राजा सूर्यप्रभ ने यद्यपि उसके जातकर्म संस्कार आदि कराए थे और उसका पालन-पोषण भी किया था, फिर भी वह उसका पुत्र नहीं माना जा सकता। कारण, जब राजा ने उस बालक को पाया था, तब बच्चे के सिर के पास पालने में जो स्वर्णमुद्राएं रखी हुई उसे मिली थीं, वह उस बालक का अपना ही धन था, जो उसके पालन-पोषण का मूल्य था।</p><p>अतः उसकी माता जल से संकल्प करके जिसको दी गई थी और जिसने उसे पुत्र उत्पन्न करके ही आज्ञा दी थी तथा अपना सारा धन उसे सौंप दिया था, राजा चंद्रप्रभ उस चोर का ही क्षेत्रज पुत्र था। मेरे विचार से चंद्रप्रभ का उसी के हाथ में पिंड देना उचित था।”</p><p>राजा के इस सटीक उत्तर से बेताल संतुष्ट हो गया और पहले की भांति उसके कंधे से उतरकर पुनः उसी शिंशपा-वृक्ष की ओर उड़ गया, जहां से राजा विक्रम उसे लाया था। राजा विक्रमादित्य भी पहले की भांति उसे वापस लाने के लिए उसी स्थान की ओर चल पड़ा।</p><p>राजा विक्रमादित्य बेताल को लाने के लिए पुनः शिंशपा वृक्ष के नीचे पहुँच गया। उसने बेताल को उतारकर अपने कंधे पर डाला और चलना शुरू किया। बेताल ने राजा विक्रम को फिर से यह कहानी सुनानी शुरू की – <a
href="/vikram-betal-chandravlok-brahmin-putra-kahani-hindi/">चंद्रावलोक और ब्राह्मण-पुत्र</a></p><pre class="wp-block-code"><code><iframe sandbox="allow-popups allow-scripts allow-modals allow-forms allow-same-origin" style="width:120px;height:240px;" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" frameborder="0" src="//ws-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?ServiceVersion=20070822&#038;OneJS=1&#038;Operation=GetAdHtml&#038;MarketPlace=IN&#038;source=ss&#038;ref=as_ss_li_til&#038;ad_type=product_link&#038;tracking_id=hindpath-21&#038;language=en_IN&#038;marketplace=amazon&#038;region=IN&#038;placement=8186253513&#038;asins=8186253513&#038;linkId=c4c5263f71f7f58342ece29947cb985d&#038;show_border=true&#038;link_opens_in_new_window=true"></iframe></code></pre><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/vikram-betal-chandraprabh-kiska-putra-kahani-hindi/">चंद्रप्रभ किसका पुत्र? – विक्रम बेताल की कहानी</a> appeared first on <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=8271</guid><description><![CDATA[<p>“चंद्रस्वामी की दुविधा” बेताल पच्चीसी की अठारहवीं कहानी है। चंद्रस्वामी को सही-सही साधना करने के बावजूद भी सिद्धि क्यों नहीं</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>“चंद्रस्वामी की दुविधा” बेताल पच्चीसी की अठारहवीं कहानी है। चंद्रस्वामी को सही-सही साधना करने के बावजूद भी सिद्धि क्यों नहीं मिली–बेताल के इस प्रश्न का ठीक उत्तर राजा विक्रमादित्य अपनी कुशाग्र बुद्धि से सफलता-पूर्वक देता है। बेताल पच्चीसी की शेष कहानियाँ पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – <a
href="/vikram-betal-ki-kahani/"><strong>विक्रम बेताल की कहानियाँ</strong></a>।</p><p><a
href="/vikram-betal-yashodhan-baldhar-kahani-hindi/">राजा यशोधन और सेनापति बलधर की कहानी</a> का सही उत्तर राजा विक्रम से प्राप्त कर बेताल पुनः उड़ गया। उस भयानक रात में राजा विक्रमादित्य जब उस शिंशपा-वृक्ष के पास फिर पहुंचा तो वहां का बदला दृश्य देखकर कुछ विस्मित-सा हो गया। श्मशान का समूचा क्षेत्र श्मशान की चिता की अग्नि और मांसभक्षी भूत-प्रेतों से भरा हुआ था, जिनकी जीभें आग की चंचल लपटों के समान जान पड़ती थीं।</p><p>वहां उसने बहुत से प्रेत-शरीरों को उल्टे लटका देखा, जो देखने में एक जैसे प्रतीत होते थे। यह देखकर भी राजा भयभीत न हुआ। वह मन-ही-मन सोचने लगा, “अरे! यह क्या बात है? क्या वह मायावी बेताल इस प्रकार मेरा समय नष्ट कर रहा है? समझ में नहीं आता इन बहुत-से शवों में से मैं किसको ले जाऊं? यदि मेरा काम हुए बिना ही यह रात बीत गई तो फिर मरने के अतिरिक्त मेरे पास कोई अन्य उपाय नहीं बचेगा। तब मैं अग्नि में प्रवेश करके अपने प्राण दे दूंगा किंतु उपहास का पात्र कदापि नहीं बनूंगा।”</p><p>राजा जब ऐसा सोच रहा था, तब उसका यह निश्चय जानकर बेताल उसकी दृढ़ता से संतुष्ट हुआ और उसने अपनी माया समेट ली। तब राजा ने एक ही मनुष्य शरीर में बेताल को देखा। उसे वृक्ष से उतारकर राजा ने अपने कंधे पर डाला और वहां से प्रस्थान किया। चलते हुए राजा से वह बेताल फिर बोला, “राजन, मुझे यह देखकर बहुत आश्चर्य हो रहा है कि न तो तुम ऊबते ही हो और न अपनी जिद छोड़ते हो! उस योगी के लिए तुम निश्चय ही बहुत परिश्रम कर रहे हो। सुनो, तुम्हारे श्रम की थकान दूर करने के लिए मैं तुम्हें फिर एक कथा सुनाता हूं।” तब बेताल ने यह कथा सुनाई–</p><p>आर्यावर्त में <a
href="/mahakaleshwar-jyotirlinga-hindi/">उज्जयिनी नाम की एक नगरी</a> है। नागों की भूमि भोगवती और देवों की भूमि अमरावती के बाद श्रेष्ठता में तीसरा स्थान उसी का है। <a
href="https://hindipath.com/shiv-gita-hindi/">माता गौरी</a> ने कठिन तपस्या के बाद जब <a
href="/shiv-chalisa-lyrics-in-hindi-pdf/">शिवजी</a> का वरण किया था, तब इस नगरी के असाधारण गुणों से आकृष्ट होकर <a
href="/mahakaleshwar-jyotirlinga-hindi/">भगवान शिव</a> ने इसी नगरी को अपना निवास स्थान बनाया था। पुण्य की अधिकता से प्राप्त होने वाले अनेक प्रकार के सुख-भोगों से वह नगरी भरी हुई है।</p><p>उस नगरी में चंद्रप्रभ नाम का एक राजा राज करता था। उसका मंत्री एक ब्राह्मण था, जिसका नाम था देवस्वामी। देवस्वामी बहुत धनवान था, उसने बहुत से यज्ञ भी किए थे।</p><p>समय पाकर उसे चंद्रस्वामी नाम का एक पुत्र पैदा हुआ। यद्यपि उसने विद्याओं का अध्ययन किया था, फिर भी जवानी में उसे जुआ खेलने का व्यसन पैदा हो गया। एक बार चंद्रस्वामी जुआ खेलने के लिए किसी बड़े जुआखाने में गया। वहां एक से बढ़कर एक जुआरी पहले से ही मौजूद थे। चंद्रस्वामी उनके साथ जुआ खेलने लगा।</p><p>दुर्भाग्य से वह अपना सारा धन हार गया। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि वह अपने वस्त्र तथा दूसरों से मांगा हुआ धन भी हार गया। मांगने पर जब वह उस रकम को नहीं चुका सका तो उस जुआखाने के मालिक ने उसे डंडे से खूब पीटा। डंडे की चोट से चंद्रस्वामी का सारा शरीर घायल हो गया। कई दिन तक वह उसी जगह मुर्दे के समान घायल पड़ा रहा। यह देखकर उस जुआखाने के मालिक ने अपने जुआरियों से कहा—“सुनो मित्रो! तीन दिन हो गए, यह तो आंखें ही नहीं खोल रहा, पत्थर के समान हो गया है। तुम इसे मार डालो और इसका शव किसी अंधे कुएं में फेंक आओ। तुम लोगों को इसके लिए मैं उचित मुआवजा दे दूंगा।”</p><p>उसके ऐसा कहने पर दूसरे जुआरी चंद्रस्वामी को वहां से उठाकर ले गए और कुएं की खोज में दूर एक वन में जा पहुंचे। वहां एक बूढ़े जुआरी ने दूसरों से कहा, “यह तो लगभग मर ही चुका है, फिर इसे कुएं में फेंकने से क्या लाभ? बेहतर है हम इसे यहीं छोड़ दें और उस द्यूतशाला (जुआघर) के मालिक से जाकर यह कह दें कि हम उसे कुएं में डाल आए हैं।” सबने उसकी बात का समर्थन किया और वे चंद्रस्वामी को छोड़कर चले गए।</p><p>चंद्रस्वामी को होश आया तो उसने स्वयं को एक निर्जन वन में पाया। वहां एक शिवालय बना हुआ था। तब वह लड़खड़ाता-सा उठा और थके-थके क़दमों से उस मंदिर में चला गया। अंदर पहुंचकर जब उसकी हालत थोड़ी और सुधरी तो वह दुःखी होकर सोचने लगा, &#8216;कैसे दुःख की बात कि मुझे उन जुआरियों ने धोखे से लूट लिया। मैं नंगा हूं, घायल हूं, धूल से मेरा शरीर भरा हुआ है। ऐसी हालत में मैं जाऊं भी तो कहां जाऊं? मेरे पिता, मेरे संबंधी और मेरे हितैषी मित्र मुझे देखकर क्या कहेंगे? इसलिए मैं अभी तो यहीं ठहरता हूं, रात को बाहर निकलकर देखूंगा कि भूख मिटाने के लिए खाने-पीने का क्या उपाय कर सकता हूं।&#8217; थका हुआ और वस्त्ररहित चंद्रस्वामी ऐसा सोच ही रहा था कि तभी सूर्यास्त हो गया।</p><p>इसी बीच एक महाव्रती तपस्वी वहां आया। उसके समूचे शरीर में विभूति (भभूत) लगी हुई थी और जटा और शूल धारण करने के कारण वह दूसरे <a
href="/somvar-vrat-katha/">भगवान शंकर</a> के समान जान पड़ता था। उस तपस्वी ने जब चंद्रस्वामी से उसका परिचय पूछा तो चंद्रस्वामी ने उसे वह सारा वृत्तांत कह सुनाया जिसके कारण उसकी यह दुर्दशा हुई थी।</p><p>यह सुनकर तपस्वी ने चंद्रस्वामी से दयापूर्वक कहा, “तुम्हें घबराने की आवश्यकता नहीं है, वत्स। तुम मेरे अतिथि हो, यह मेरा आश्रम है। उठो और पहले स्नान करो, तत्पश्चात मैं जो कुछ भिक्षा में मांगकर लाया हूं, उसमें से कुछ हिस्सा तुम खा लो।”</p><p>उस व्रतधारी के ऐसा कहने पर चंद्रस्वामी ने उससे कहा, &#8220;भगवन, मैं ब्राह्मण हूं। आपकी भीख में हिस्सा कैसे बांटकर खाऊंगा?&#8221;</p><p>यह सुनकर अतिथि का आदर करने वाला वह सिद्ध व्रतधारी अपनी मठी (छोटी कुटिया) में घुस गया। वहां उसने इष्ट सिद्धि देने वाली अपनी विद्या का स्मरण किया। याद करते ही विद्या प्रकट हुई और जब उसने पूछा कि “मैं क्या करूं?” तो उस तपस्वी ने आज्ञा दी कि “मेरे इस अतिथि का आतिथ्य-सत्कार करो।”</p><p>विद्या ने कहा, “ऐसा ही होगा।” कहकर उसने एक स्वर्ण नगर उत्पन्न कर दिया, जिसमें बगीचा भी था और सुन्दर-सुन्दर स्त्रियां भी थीं।</p><p>उस नगर से निकलकर सुन्दरियां विस्मित चंद्रस्वामी के पास आईं और बोलीं, “भद्र उठो, स्नान-भोजन करो और अपनी थकावट दूर करो।”</p><p>यह कहकर वे उसे अंदर ले गईं। स्नान कराकर उन्होंने उसके शरीर पर अंगराग लगाया। उनके द्वारा दिए गए उत्तम वस्त्र पहनने के बाद वे उसे एक दूसरे सुन्दर भवन में ले गईं।</p><p>उस भवन के अंदर उसने एक सर्वांग सुन्दर युवती को देखा, जो उन सबकी प्रधान जान पड़ती थी और जिसे मानो विधाता ने बड़ी कुशलता से अपने हाथों स्वयं गढ़ा था। उसने उत्कंठापूर्वक चंद्रस्वामी को अपने आसन के आधे हिस्से पर बैठाया। फिर उसके साथ ही उसने दिव्य भोजन किया। भोजन के उपरान्त चंद्रस्वामी ने स्वादिष्ट पके हुए फल और फिर ताम्बूल (पान) खाया। फिर उसके साथ नरम बिस्तर पर सोकर चरम सुख प्राप्त किया!</p><p>सवेरे जब चंद्रस्वामी जागा तो वहां केवल उसे शिवालय ही दिखाई दिया। वहां न तो वह दिव्य स्त्री थी, न नगर था और न वे दासियां ही थीं।</p><p>तभी मठी के भीतर से हंसता हुआ वह तपस्वी निकला। उसके यह पूछने पर कि &#8220;रात कैसी कटी?&#8221; उदास चित्त वाले चंद्रस्वामी ने उससे कहा—“भगवन, आपकी कृपा से रात तो मैंने बहुत सुखपूर्वक बिताई लेकिन अब उस दिव्य स्त्री के बिना मेरे प्राण निकले जा रहे हैं।” यह सुनकर उस दयालु तपस्वी ने मुस्कराते हुए चंद्रस्वामी से कहा, “तुम यहीं ठहरो, वत्स। रात को तुम्हें फिर वही सुख प्राप्त होगा।” तपस्वी के कहने पर चंद्रस्वामी वहीं ठहरकर तपस्वी की विद्या के प्रताप से वह हर रात सुख भोगने लगा।</p><p>धीरे-धीरे इस विद्या का प्रभाव जानकर देव प्रेरणा से एक दिन चंद्रस्वामी ने उस तपस्वी को प्रसन्न करके कहा, “भगवन! मुझ शरणागत पर यदि सचमुच आपकी कृपा है तो मुझे यह विद्या सिखा दीजिए, जिसका ऐसा प्रभाव है।”</p><p>चंद्रस्वामी द्वारा आग्रहपूर्वक ऐसा कहने पर तपस्वी उससे बोला, “वत्स, यह विद्या तुम्हारे लिए असाध्य है क्योंकि इसकी साधना जल के अंदर की जाती है। जो साधक वहां इसकी साधना करता है, उसको भरमाने के लिए कई मायाजाल उत्पन्न होते हैं जिसके कारण वह सिद्धि नहीं प्राप्त कर सकता।</p><p>वहां उसे ऐसा भ्रम होता है कि उसका फिर से जन्म हुआ है। तब वह अपने को बालक, फिर युवक, फिर विवाहित मानता है और उसे जान पड़ता है, जैसे उसके यहां पुत्र उत्पन्न हुआ हो। तब वह झूठे मोह में पड़ जाता है कि यह मेरा मित्र है और यह शत्रु। उसे न तो इस जन्म का स्मरण रहता है, न ही इसका कि उसकी क्रियाएं विद्या की साधना में लगी हुई हैं।</p><p>जो लोग चौबीस वर्ष की आयु तक गुरु के द्वारा विद्या पढ़कर ज्ञान प्राप्त करते हैं, उन वीर पुरुषों को इस जन्म का स्मरण रहता है और वे जानते हैं कि यह सब माया का खिलवाड़ है और विद्या की सिद्धि के बाद जल से निकलकर परम सिद्धि का दर्शन करते हैं।”</p><p>तपस्वी ने आगे बताया, “जिस शिष्य को यह विद्या दी जाती है, उसे यदि यह सिद्धि नहीं मिलती तो अनुपयुक्त पात्र को शिक्षा देने के कारण उसके गुरु की भी विद्या नष्ट हो जाती है। मेरी सिद्धी से ही तुम्हें उसके सब फल प्राप्त हो रहे हैं। अतः इसके लिए तुम आग्रह क्यों कर रहे हो? कहीं ऐसा न हो कि इससे मेरी सिद्धि भी नष्ट हो जाए और जिसके द्वारा तुम ये सुख-भोग प्राप्त कर रहे हो, तुम्हें उससे भी वंचित होना पड़े।”</p><p>तपस्वी के ऐसा कहने पर चंद्रस्वामी ने हठपूर्वक कहा, “हे महात्मन! आप चिंता न करें, मैं सब कुछ सीख लूंगा।”</p><p>इसके बाद तपस्वी ने चंद्रस्वामी को विद्या सिखाना स्वीकार कर लिया। सज्जन पुरुष आश्रितों के अनुरोध पर भला क्या नहीं करते? तब वह नदी-तट पर ले जाकर चंद्रस्वामी से बोला, “वत्स, इस विद्या (मंत्र) का जाप करते हुए जब तुम माया के दृश्य देखो, तो सावधान रहना और मेरे मंत्र से सावधान रहकर माया की अग्नि में प्रवेश करना। मैं तब तक तुम्हारे लिए नदी के इस तट पर रुका रहूंगा।” यह कहकर उस व्रतधारी ने आचमन करके चंद्रस्वामी को विधिपूर्वक वह विद्या सिखाई।</p><p>अनन्तर, नदी के तट पर स्थित अपने गुरु को चंद्रस्वामी ने सिर झुकाकर प्रणाम किया और शीघ्रतापूर्वक नदी में उतर गया। जल के भीतर जाकर वह उस मंत्र का जप करने लगा, तब माया के मिथ्या प्रभाव से मोहित होकर सहसा-ही वह अपने इस जन्म की सारी बातें भूल गया। उसने देखा कि वह स्वयं किसी दूसरी नगरी में किसी अन्य ब्राह्मण का पुत्र होकर उत्पन्न हुआ। अनन्तर, वह धीरे-धीरे किशोर हुआ। उसका यज्ञोपवीत हुआ, उसने विद्याएं पढ़ीं, विवाह किया और उसके सुख-दुख में पूरी तरह लिप्त रहकर सन्तान लाभ किया। वहां पुत्र स्नेह के कारण स्वीकार किए हुए अनेक प्रकार के कार्य करता और माता-पिता तथा कुटंबियों की प्रीति से बंधा वह रहने लगा। इस प्रकार वह झूठे जन्मांतर का अनुभव कर रहा था, तभी समय जानकर उसके गुरु उस तपस्वी ने चेतना उत्पन्न करने वाली अपनी विद्या का प्रयोग किया।</p><p>उस विद्या के प्रयोग से शीघ्र ही उसने मायाजाल को भेदकर चेतना प्राप्त की। उसे अपने गुरु का स्मरण हो आया और उसने मायाजाल को भी पहचान लिया। दिव्य और असाध्य फल की प्राप्ति के लिए जब वह अग्नि में प्रवेश करने को उद्यत हुआ, तब वृद्ध और विश्वासी उसके गुरु एवं उसके कुटंबीजन उसे ऐसा करने से रोकने लगे। उन लोगों के बहुत समझाने-बुझाने पर भी दिव्य सुख की लालसा से वह अपने कुटुंबियों सहित नदी के उस तट पर गया जहां चिता बनी हुई थी। वहां उसने अपने बूढ़े माता-पिता तथा पत्नी को मरने के लिए उद्यत देखा। अपने बच्चों को भी रोता देखकर वह मोह में पड़ गया। वह सोचने लगा, “मैं यदि अग्नि में प्रवेश करूंगा तो मेरे ये सभी संबंधी मर जाएंगे। मैं यह भी नहीं जानता कि गुरु की बात सच्ची भी है या नहीं। तब मैं क्या करूं? अग्नि में प्रवेश करूं या नहीं? किंतु अब तक तो सारी बातें गुरु के कहने के अनुसार ही हुई हैं, अतः यही बात झूठ कैसे होगी? इसलिए मुझे चाहिए कि मैं प्रसन्नतापूर्वक अग्नि में प्रवेश करूं?” मन-ही-मन ऐसा सोचते हुए उस ब्राह्मण चंद्रस्वामी ने अग्नि में प्रवेश किया।</p><p>अग्नि का स्पर्श जब उसे बर्फ के समान ठंडा जान पड़ा, तब उसे आश्चर्य हुआ। तब तक माया का प्रभाव जाता रहा। नदी से निकलकर उसने अपने गुरु को देखा और उनके चरणों में प्रणाम किया, पूछने पर आरंभ से लेकर अग्नि की शीतलता तक की सारी बातें उन्हें बता दी। तब उसके गुरु ने कहा, “वत्स, मुझे इस बात की शंका हो रही है कि कहीं तुमसे कुछ भूल हो गई है, नहीं तो अग्नि तुम्हारे लिए शीतल कैसे हो गई?”</p><p>गुरु के ऐसा कहने पर चंद्रस्वामी ने पूछा, “भगवन, मैंने कहीं कोई भूल तो नहीं की?”</p><p>तब इस रहस्य को जानने की इच्छा से उसके गुरु ने अपनी विद्या का स्मरण किया। वह विद्या न तो उसके सम्मुख ही प्रकट हुई और न उसके शिष्य के सम्मुख ही। तब वे दोनों ही अपनी विद्या को नष्ट हुआ जानकर दुःखी होकर वहां से चले गए।</p><p>यह कथा सुनाकर बेताल ने राजा विक्रमादित्य को पहली कही शपथ का स्मरण कराकर उससे पूछा, “राजन, मेरा संशय दूर करो और बतलाओ कि बताई हुई सारी क्रियाएँ करने के बाद भी उन दोनों की विद्या नष्ट क्यों हो गई?”</p><p>बेताल की बात सुनकर उस वीर राजा ने उत्तर दिया, “योगेश्वर! यह तो मैं जानता हूं कि इस प्रकार आप केवल समय ही व्यतीत कर रहे हैं, फिर भी मैं बताता हूं। जब तक मनुष्य का मन द्विविधा से रहित, धैर्ययुक्त, निर्मल और सुदृढ़ नहीं होता, तब तक केवल ठीक तरह से कोई दुष्कर कार्य करने से ही उसे सिद्धि प्राप्त नहीं होती। वह मंदमति ब्राह्मण युवक चंद्रस्वामी काम करके भी द्विविधा में पड़ गया था, इसी से उसे सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकी और अपात्र को देने के कारण गुरु की भी सिद्धि जाती रही।”</p><p>राजा के ऐसा कहने पर बेताल पुनः उसके कंधे से उतरकर अदृश्य रूप से अपनी जगह पर चला गया। तत्पश्चात् राजा भी उसी प्रकार उसके पीछे-पीछे गया।</p><p>राजा विक्रमादित्य बेताल को लाने के लिए पुनः शिंशपा वृक्ष के नीचे पहुँच गया। उसने बेताल को उतारकर अपने कंधे पर डाला और चलना शुरू किया। बेताल ने राजा विक्रम को फिर से यह कहानी सुनानी शुरू की – उन्नीसवां बेताल चंद्रस्वामी की कथा – <a
href="/vikram-betal-chandraprabh-kiska-putra-kahani-hindi/">चंद्रप्रभ किसका पुत्र?</a></p><pre class="wp-block-code"><code><iframe sandbox="allow-popups allow-scripts allow-modals allow-forms allow-same-origin" style="width:120px;height:240px;" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" frameborder="0" src="//ws-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?ServiceVersion=20070822&#038;OneJS=1&#038;Operation=GetAdHtml&#038;MarketPlace=IN&#038;source=ss&#038;ref=as_ss_li_til&#038;ad_type=product_link&#038;tracking_id=hindpath-21&#038;language=en_IN&#038;marketplace=amazon&#038;region=IN&#038;placement=8186253513&#038;asins=8186253513&#038;linkId=c4c5263f71f7f58342ece29947cb985d&#038;show_border=true&#038;link_opens_in_new_window=true"></iframe></code></pre><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/vikram-betal-chandraswami-ki-duvidha-kahani-hindi/">चंद्रस्वामी की दुविधा – विक्रम बेताल की कहानी</a> appeared first on <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=8263</guid><description><![CDATA[<p>“यशोधन और बलधर में कौन अधिक चरित्रवान” बेताल पच्चीसी की सत्रहवीं कथा है। इसमें राजा विक्रम बेताल के इस प्रश्न</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/vikram-betal-yashodhan-baldhar-kahani-hindi/">यशोधन और बलधर में कौन अधिक चरित्रवान? – विक्रम बेताल की कहानी</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p>“यशोधन और बलधर में कौन अधिक चरित्रवान” बेताल पच्चीसी की सत्रहवीं कथा है। इसमें राजा विक्रम बेताल के इस प्रश्न का समाधान करता है कि राजा और सेनापति में से अधिक चरित्रवान कौन था। बेताल पच्चीसी की शेष कहानियाँ पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – <a
href="/vikram-betal-ki-kahani/"><strong>विक्रम बेताल की कहानियाँ</strong></a>।</p><p> <a
href="/vikram-betal-jimutvahan-shankhchud-kahani/">&#8220;जीमूतवाहन व शंखचूड़ की कथा&#8221;</a> कहानी का सही उत्तर राजा विक्रम से प्राप्त कर बेताल पुनः उड़ गया। राजा विक्रमादित्य ने एक बार फिर शिंशपा-वृक्ष से बेताल को उतारा। उसे कंधे पर डाला और मौन भाव से अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा। कुछ आगे पहुंचने पर बेताल ने फिर मौन भंग किया और राजा को पुनः अपनी शर्त दोहराकर उसे यह कथा सुनाई।</p><p>बहुत पहले <a
href="/ganga-maiya-ki-aarti/">गंगा नदी</a> किनारे कनकपुर नाम का एक नगर था। वहां के राजा का नाम था यशोधन। वह सचमुच अपने नाम को सार्थक करने वाला राजा था। वह परम प्रतापी था और प्रजा उसके राज्य में हर प्रकार से सुखी थी।</p><p>उस राजा के नगर में एक श्रेष्ठि (सेठ) रहता था, जिसकी कन्या उन्मादिनी एक परम सुन्दरी थी। जो भी उसकी ओर देखता, वह उसकी मोहिनी-शक्ति से उन्मत्त हो जाता था। उसका सौन्दर्य कामदेव को भी विचलित करने वाला था।</p><p>जब सेठ की कन्या युवती हुई, उसके पिता ने राजा यशोधन के पास जाकर निवेदन किया, “प्रभो! मैं अपनी रत्न स्वरूप कन्या का विवाह करना चाहता हूं किंतु आपसे निवेदन किए बिना उसका विवाह करने का मुझे साहस नहीं होता। सभी रत्नों के स्वामी आप ही हैं अतः या तो मेरी कन्या को पत्नी रूप में स्वीकार करके आप मुझे कृतार्थ करें या अस्वीकार कर दें।”</p><p>वणिक की यह बात सुनकर राजा ने उस कन्या के शुभ लक्षणों को देखने के लिए आदरपूर्वक अपने ब्राह्मणों को भेजा। उन ब्राह्मणों ने वहां जाकर ज्योंही उस परम सुंदरी को देखा त्योंही उनका चित्त चंचल हो गया; किंतु शीघ्र ही धैर्य धारण करके उन लोगों ने सोचा – “यदि राजा इस कन्या से विवाह करेगा तो उसका राज्य अवश्य ही नष्ट हो जाएगा क्योंकि राजा तब इसी के रूप में रमा रहेगा। वह प्रजा के हितों की देखभाल नहीं कर पाएगा। अतः हम लोगों को राजा को यह नहीं बताना चाहिए कि यह कन्या सुलक्षणा है।”</p><p>यही सोचकर वे सब राजा के पास पहुंचे और उन्होंने राजा से कहा, “देव, वह कन्या तो कुलटा है। हमारा परामर्श है कि आप उसके साथ विवाह न करें।”</p><p>यह जानकर राजा ने उस सुन्दरी से विवाह करना अस्वीकार कर दिया। तब उस वणिक ने राजा की आज्ञा से अपनी कन्या का विवाह बलधर नाम के राजा के सेनापति से कर दिया। उन्मादिनी नाम से विख्यात वह सुन्दरी सुखपूर्वक अपने पति के पास रहने लगी किंतु उसके मन में एक फांस-सी बनी रही कि राजा ने कुलटा कहकर मेरा त्याग किया है।</p><p>एक बार <a
href="/basanti-samikaran-hindi-kavita-naval-singh-bhadauria/">बसन्त ऋतु</a> में राजा यशोधन हाथी पर चढ़कर बसन्त महोत्सव देखने को निकला। राजा के आगमन की घोषणा सुनकर उन्मादिनी ने, जो अपने को परित्यक्त किए जाने के कारण राजा से विद्वेष रखती थी, उसे देखने के लिए अपने भवन की छत पर जाकर उसे देखने लगी।</p><p>छत पर खड़ी उस सुन्दरी की ओर जैसे ही राजा की नजरें उठीं, उसके मन मे कामाग्नि की ज्वाला सुलग उठी। कामदेव के विजयास्त्र के समान उसकी सुन्दरता को देखते ही वह राजा के हृदय में गहराई से उतर गई। पलक झपकते ही राजा संज्ञाहीन हो गया।</p><p>तब राजा के सेवक उसे संभालकर उसके महल मे ले गए। राजा द्वारा उस सुन्दरी के बारे में पूछे जाने पर उसके सेवकों ने उसे बता दिया कि यह वही कन्या है जिसके विवाह का प्रस्ताव पहले राजा के साथ करने का हुआ था। लेकिन राजा के अस्वीकार करने पर उसका विवाह उसके सेनापति के साथ कर दिया था।</p><p>यह सुनकर राजा को उन ब्राह्मणों पर बहुत क्रोध आया कि जिन्होंने उस कन्या के बारे में गलत कहकर राजा को मिथ्या सूचना दी थी। राजा ने तत्काल उन सभी ब्राह्मणों को देश निकाला दे दिया। तब से वह राजा मन-ही-मन दुखी रहने लगा। लज्जा के कारण यद्यपि उसने अपनी भावना को छिपा रखा था किंतु बाहरी लक्षणों को देखकर उसके विश्वासी जनों द्वारा पूछे जाने पर बड़ी कठिनाई से उसने अपनी पीड़ा का कारण बताया। तब उसके विश्वासी जनों ने कहा—“महाराज! इसमें इतना दुखी होने की क्या बात है? वह तो आपके ही अधीन है, फिर आप उसे अपना क्यों नहीं लेते?” लेकिन धर्मात्मा राजा यशोधन ने उनकी यह बात स्वीकार नहीं की।</p><p>सेनापति बलधर राजा का भक्त था। जब उसे यह बात मालूम हुई तो वह राजा के पास पहुंचा और उसके चरणों में झुककर बोला, “देव, आपके दास की वह स्त्री आपकी दासी ही है। वह परस्त्री नहीं है। मैं स्वयं ही उसे आपको भेंट करता हूं। आप उसे स्वीकार कर लें अथवा मै उसे देव-मंदिर में छोड़ देता हूं। जब वह देवकुल की स्त्री हो जाएगी, तब वहां से उसे ग्रहण करने में आपको दोष नहीं लगेगा।”</p><p>अपने ही सेनापति ने जब राजा से ऐसी प्रार्थना की तो आंतरिक क्रोध से उसने उसे उत्तर दिया, “राजा होकर मैं ऐसा अधर्म कैसे करूंगा? यदि मैं ही मर्यादा का उल्लंघन करूंगा तो कौन अपने कर्त्तव्य मार्ग पर स्थिर रहेगा? मेरे भक्त होकर भी तुम मुझे ऐसे पाप में क्यों प्रवृत्त करते हो जिसमें क्षणिक सुख तो है, पर जो परलोक में महादुःख का कारण है। यदि तुम अपनी धर्मपत्नी का त्याग करोगे, तो मैं तुम्हें क्षमा नहीं करूंगा क्योंकि मेरे जैसा कौन राजा ऐसा अधर्म स्वीकार कर सकता है? अब तो मृत्यु ही मेरे लिए श्रेयस्कर है।”</p><p>अनन्तर, नगर और गांव के लोगों ने मिलकर राजा से यही <a
href="/bhakti-yog-prarthana-swami-vivekanand/">प्रार्थना</a> की किंतु दृढ़-निश्चयी राजा ने उनकी बात नहीं मानी। राजा का शरीर धीरे-धीरे उसी काम-ज्वर के ताप से क्षीण होता चला गया और अंत में उसकी मृत्यु हो गई। अपने स्वामी की मृत्यु से खिन्न होकर उसके सेनापति बलधर ने भी अग्नि में प्रवेश करके अपने प्राण त्याग दिए। सच है, भक्तों की चेष्टाओं को नहीं जाना जा सकता।</p><p>राजा विक्रमादित्य के कंधे पर लदे बेताल ने यह कथा सुनाकर पूछा, “राजन! अब तुम यह बतलाओ कि उस राजा और सेनापति में से, सेनापति बलधर क्यों अधिक दृढ़चरित्र नहीं था? उसकी स्त्री तो अलौकिक सुन्दरी थी। उसने बहुत समय तक उसके साथ सुख भोगकर उसका स्वाद जाना था, फिर भी वह वैसी स्त्री को राजा को सौंपने को तत्पर हो गया था और फिर राजा की मृत्यु के बाद उसने स्वयं भी अपना शरीर अग्नि में होम करके अपने प्राण त्याग दिए थे। लेकिन, राजा ने उसकी उस पत्नी का त्याग किया था, जिसके भोग-रस का उसने आस्वादन भी नहीं किया था। भला ऐसा क्यों हुआ था? इस प्रश्न का उत्तर जानते हुए भी यदि तुम मौन रहोगे तो तुम्हें मेरा वही शाप लगेगा।”</p><p>राजा हंसकर बोला—“बेताल! कहते तो तुम ठीक ही हो लेकिन इसमें अचरज की क्या बात है? सेनापति कुलीन वंश का था, उसने स्वामी की भक्ति में जो किया, ठीक ही किया। क्योंकि सेवक का तो कर्त्तव्य ही है कि वह प्राण देकर भी अपने स्वामी की रक्षा करे।</p><p>लेकिन राजा तो मदमत्त हाथी की तरह निरंकुश होते हैं। वे जब विषय-लोलुप होते हैं तब धर्म और मर्यादाओं की सभी शृंखलाएं तोड़ देते हैं। निरंकुश हृदय वाले राजाओं का विवेक अभिषेक के जल से उसी प्रकार बह जाता है, जैसे बाढ़ के पानी में सब कुछ बह जाता है। डुलते हुए चंवर की वायु जैसे रजकण, मच्छर और मक्खियों को दूर उड़ा देती है, वैसे ही वृद्धों के द्वारा उपदिष्ट शास्त्रों के अर्थ तक को दूर भगा देती है। उसका छत्र जैसे धूप को रोकता है, वैसे ही सत्य को भी ढक देता है।</p><p>वैभव की आंधी में चौंधयाई हुई उसकी आंखें उचित मार्ग नहीं देख पातीं। नहुष आदि राजा जगतविजयी थे, फिर भी जब उनका चित्त काम-मोहित हो गया, तब उन्हें अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा था। यह राजा भी परम प्रतापी था, फिर भी वह <a
href="/lakshmi-ji-ki-aarti/">देवी लक्ष्मी</a> समान चंचला और सुन्दरता में अप्सराओं को भी मात करने वाली उन्मादिनी के द्वारा विमोहित नहीं हुआ। उस धर्मात्मा और धीर राजा ने अपने प्राण त्याग दिए किंतु कुमार्ग पर पैर नहीं रखे। इसी से तो मैं उसे दृढ़चरित्र वाला मानता हूं।”</p><p>यह उत्तर सुनकर बेताल ने कहा, “तुम्हारा उत्तर बिल्कुल ठीक है राजा विक्रमादित्य। किसी के व्यक्तित्व की पहचान उसके चरित्र से ही होती है। किंतु उत्तर देने के चक्कर में तुम अपना मौन रहने का संकल्प भूल गए। तुम भूले और मैं आजाद हो गया, इसलिए मैं चला अपने स्थान पर।”</p><p>कहते हुए बेताल उसके कंधे से सरककर पुनः अपने स्थान को उड़ गया। राजा ने भी उसी प्रकार उसे फिर प्राप्त करने के लिए शीघ्रतापूर्वक उसका अनुसरण किया। महान पुरुष जब कोई कार्य आरंभ कर देते हैं, तब वह काम, चाहे जितना कठिन क्यों न हो, उसे पूर्ण किए बिना विश्राम नहीं करते।</p><p>राजा विक्रमादित्य बेताल को लाने के लिए पुनः शिंशपा वृक्ष के नीचे पहुँच गया। उसने बेताल को उतारकर अपने कंधे पर डाला और चलना शुरू किया। बेताल ने राजा विक्रम को फिर से यह कहानी सुनानी शुरू की – <a
href="/vikram-betal-chandraswami-ki-duvidha-kahani-hindi/">चंद्रस्वामी की दुविधा</a></p><pre class="wp-block-code"><code><iframe sandbox="allow-popups allow-scripts allow-modals allow-forms allow-same-origin" style="width:120px;height:240px;" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" frameborder="0" src="//ws-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?ServiceVersion=20070822&#038;OneJS=1&#038;Operation=GetAdHtml&#038;MarketPlace=IN&#038;source=ss&#038;ref=as_ss_li_til&#038;ad_type=product_link&#038;tracking_id=hindpath-21&#038;language=en_IN&#038;marketplace=amazon&#038;region=IN&#038;placement=8186253513&#038;asins=8186253513&#038;linkId=c4c5263f71f7f58342ece29947cb985d&#038;show_border=true&#038;link_opens_in_new_window=true"></iframe></code></pre><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/vikram-betal-yashodhan-baldhar-kahani-hindi/">यशोधन और बलधर में कौन अधिक चरित्रवान? – विक्रम बेताल की कहानी</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/vikram-betal-yashodhan-baldhar-kahani-hindi/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>जीमूतवाहन व शंखचूड़ की कथा – विक्रम बेताल की कहानी</title><link>https://hindipath.com/vikram-betal-jimutvahan-shankhchud-kahani/</link> <comments>https://hindipath.com/vikram-betal-jimutvahan-shankhchud-kahani/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Tue, 14 Sep 2021 16:03:00 +0000</pubDate> <category><![CDATA[हिंदी कहानी]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=8256</guid><description><![CDATA[<p>“जीमूतवाहन व शंखचूड़ की कथा” बेताल पच्चीसी की सोलहवीं कथा है। इसमें राजा विक्रम बेताल के इस प्रश्न का समाधान</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/vikram-betal-jimutvahan-shankhchud-kahani/">जीमूतवाहन व शंखचूड़ की कथा – विक्रम बेताल की कहानी</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p> “जीमूतवाहन व शंखचूड़ की कथा” बेताल पच्चीसी की सोलहवीं कथा है। इसमें राजा विक्रम बेताल के इस प्रश्न का समाधान करता है कि जीमूतवाहन और शंखचूड़ में कौन अधिक त्यागी था। बेताल पच्चीसी की शेष कहानियाँ पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – <a
href="/vikram-betal-ki-kahani/"><strong>विक्रम बेताल की कहानियाँ</strong></a>।</p><p><a
href="/vikram-betal-shashiprabha-kiski-patni-kahani/">शशिप्रभा की कहानी </a>का उत्तर पाकर बेताल वहाँ से उड़ गया। उसे लेने के लिए राजा विक्रम पुनः वापस चल दिया। शिशंपा-वृक्ष के पास पहुंचकर विक्रमादित्य ने वृक्ष से बेताल को उतारा और पहले की तरह उसे कंधे पर डालकर मौनभाव से अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा। रास्ते में फिर मौन भंग करते हुए बेताल ने कहा, “राजन, इस बार मैं तुम्हें एक और दिलचस्प कथा सुनाता हूं, पर शर्त वही रहेगी।”</p><p>राजा के सहमति जताने पर बेताल ने इस बार यह कथा सुनाई।</p><p>बहुत पहले हिमवान पर्वत पर कंचनपुर नाम का एक नगर था। उस नगर का स्वामी जीमूतकेतु नामक एक पराक्रमी राजा था। राजा के महल के उद्यान में उसके पूर्वजों द्वारा देवताओ से प्राप्त एक कल्पवृक्ष था, जो उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करता था। उस देववृक्ष के कारण राजा को धन-धान्य, ऐश्वर्य व वैभव की कोई कमी नहीं रहती थी। उस कल्पवृक्ष की कृपा से ही राजा को जीमूतवाहन नाम का एक पुत्र पैदा हुआ था, जो अब युवावस्था में प्रवेश कर चुका था। जीमूतवाहन बहुत दानी था। वह समस्त प्राणियों पर दयाभाव रखता था एवं गुरुजनों की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहता था। जीमूतवाहन क्योंकि बोधिसत्व के अंश से पैदा हुआ था, अतः उसे अपने पूर्वजन्म का वृत्तांत भी ज्ञात था।</p><p>कुछ समय बाद जीमूतकेतु ने उसे अपना युवराज घोषित किया। प्रजा अपने युवराज को पाकर बहुत खुश हुई। एक दिन राजा के मंत्री ने आकर युवराज जीमूतवाहन से कहा, “युवराज, यह धन-धान्य, यह ऐश्वर्य सब कुछ कल्पवृक्ष के कारण ही है। अतः अपने कुल एवं प्रजा की समृद्धि के लिए इस देववृक्ष का सम्मान करना कभी मत भूलना, यह अजेय है। देवराज इन्द्र भी इसका महत्ता को स्वीकार करते हैं।”</p><p>युवराज जीमूतवाहन ने वैसा ही करने का वचन दिया। उसने मन ही मन सोचा, “मेरे पूर्वजों ने इस देववृक्ष का उचित लाभ नहीं उठाया। उन्होंने केवल इससे साधारण स्वार्थ की याचना करके इसे स्वयं तक ही सीमित रखा। इससे न केवल उनका (पूर्वजों का) अपितु इस महात्मा वृक्ष का स्थान बहुत छोटा कर दिया। आखिर संसार में और भी तो मानव रहते हैं। इस देववृक्ष का उपयोग समस्त प्राणिमात्र के कल्याण के लिए होना चाहिए।”</p><p>ऐसा सोचकर वह अपने पिता के पास पहुंचा और बोला, “पिताश्री, यह तो आप जानते ही हैं कि इस संसार-सागर में शरीर के साथ ही समस्त वस्तुएं लहरों की झलक के समान चंचल हैं। संध्या, बिजली और देवी लक्ष्मी तो विशेष रूप से क्षणस्थायी हैं। देखते-ही-देखते मिट जाने वाली हैं। इन्हें कब किसी ने स्थिर रहते देखा है?</p><p>पिताश्री, इस संसार मे एकमात्र <a
href="/swami-vivekananda-paropkar-me-hamara-hi-upkaar-hai-hindi/">परोपकार ही चिरस्थायी</a> है, जो धैर्य और यश का जन्मदाता है तथा युगों तक उसका साक्षी बना रहता है। तब फिर ऐसे क्षणिक सुखों के लिए हमने ऐसे देवतुल्य परोपकारी कल्पवृक्ष को व्यर्थ ही क्यों रख छोड़ा है? जरा सोचिए पिताश्री, जिन हमारे पूर्वजो ने इसे &#8216;मेरा है, मेरा है&#8217; कहते हुए रख छोड़ा था, आज वे कहाँ हैं? जबकि यह परोपकारी वृक्ष आज भी मौजूद है।”</p><p>“तुम क्या कहना चाहते हो, पुत्र?”, जीमूतवाहन की बात सुनकर उसके पिता ने भ्रमित होकर पूछा।</p><p>इस पर जीमूतवाहन ने कहा, “पिताश्री, यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं मनोरथ पूर्ण करने वाले इस देववृक्ष का उपयोग परोपकार की फल-सिद्धि के लिए करूं?”</p><p>पुत्र की इच्छा जानकर जीमूतकेतु ने उसे ऐसा करने की आज्ञा प्रदान कर दी। तब जीमूतवाहन ने उस कल्पवृक्ष के समीप जाकर कहा, “हे देव! तुमने हमारे पूर्वजों की सभी मनोकामनाएं पूरी की हैं, लेकिन मेरी भी एक मात्र मनोकामना पूरी कर दो। कुछ ऐसा करो जिससे मैं इस पृथ्वी को दरिद्रतारहित देख सकूँ। जाओ, तुम्हारा कल्याण हो। मैं धन की इच्छा रखने वालों के लिए तुम्हारा विसर्जन करता हूँ।”</p><p>युवराज ने हाथ जोड़कर जब यह कहा तो उस वृक्ष से आवाज आई, “तुम धन्य हो राजकुमार। तुम्हारे त्याग की मैं सराहना करता हूं। तुम्हारे पूर्वज मुझे देवताओं से मांगकर लाये थे, इसलिए मैं अब तक वचनबद्ध था। अब तुमने मेरा त्याग कर दिया है तो मैं जाता हूं। तुम्हारा कल्याण हो।”</p><p>पल-भर बाद ही वह वृक्ष आकाश में उड़ गया और उसने पृथ्वी पर इतना धन बरसाया कि वहां कोई भी ग़रीब न रहा। जीमूतवाहन के ऐसा करने से उसका यश तीनों लोकों में फैल गया। लोग उसके नाम की जय-जयकार करने लगे।</p><p>लेकिन जीमूतवाहन का कल्पवृक्ष को विसर्जन करना उसके बंधु-बांधवों का रास न आया। वे लोग उससे ईर्ष्या करने लगे। उन्होंने एकत्र होकर सोचा कि विपत्तियों का नाश करने वाला कल्पवृक्ष तो अब उनके पास रहा नहीं, उसे तो जीमूतवाहन ने लोक कल्याण के लिए दे डाला, अतः अब कंचनपुर पर सहज ही अधिकार किया जा सकता है। ऐसा सोचकर वे कंचनपुर को अधिकार में लेने के लिए युद्ध की तैयारियां करने लगे।</p><p>यह देखकर जीमूतवाहन ने अपने पिता से कहा, “पिताश्री, मैं आपके शौर्य को भली-प्रकार जानता हूं। विश्व में ऐसा कौन है जो शूरता में आपका सामना कर सके। किंतु सगे-संबधियों को मारकर इस पापमय और नाशवान शरीर से राजसुख का उपभोग करना सर्वथा अनुचित है। अतः हमें स्वेच्छा से इस राज्य को त्यागकर कहीं अन्यत्र चल देना चाहिए।”</p><p>इस पर उसके पिता ने कहा, “पुत्र, मैं तो तुम्हारे लिए ही इस राज्य की कामना करता था। जब तुम स्वयं ही इसके त्याग की बात कह रह हो तो मुझे राज्य का प्रलोभन कैसे हो सकता है। अतः जैसा तुम उचित समझो, वैसा ही करो।”</p><p>इस प्रकार जीमूतवाहन अपना राज्य छोड़कर अपने माता-पिता को साथ लेकर मलय पर्वत पर चला गया और चन्दनवन से ढके हुए एक झरने के पास वाली कंदरा में आश्रम बनाकर रहने लगा। वहां विश्वावसु नाम के सिद्धों के राजा रहते थे। उनके पुत्र मित्रावसु से जीमूतवाहन की मित्रता हो गई।</p><p>एक बार घूमता-फिरता जीमूतवाहन उपवन में स्थित भवानी गौरी का मंदिर देखने के लिए गया। वहां उसने सखियों सहित एक उत्तम कन्या को देखा जो <a
href="/mahagauri-mata-navratri/">भगवती गौरी</a> को प्रसन्न करने के लिए वीणा बजा रही थी। उस अप्सराओं को भी मात करने वाली कन्या का रूप-सौंदर्य देखकर जीमूतवाहन ठगा-सा रह गया। पहली ही निगाह में उस तन्वेगी (सुकुमारी) ने उसका हृदय चुरा लिया। वह कन्या भी कामदेव जैसे सुन्दर जीमूतवाहन को देखकर उस पर मोहित हो गई। वह एकटक उसी की ओर देखने लगी जिससे उसकी वीणा भी विकल आलाप करने लगी।</p><p>अनन्तर, जीमूतवाहन ने उसकी एक सखी से उस कन्या का नाम और उसका वंश पूछा। कन्या की सखी ने बताया कि उसका नाम मलयवती है और वह सिद्धों के राजा विश्वावसु की पुत्री तथा मित्रावसु की बहन है। तब उस सखी ने जीमूतवाहन से उसका नाम एवं वंश पूछा। यह जानने पर कि जीमूतवाहन विद्याधरों का राजा है, उसे बहुत खुशी हुई। उसने मलयवती के पास जाकर कहा, “सखी, विश्व में पूजे जाने योग्य महान विद्याधरों के राजा यहां पधारे हैं, तुम्हें आगे बढ़कर उनका स्वागत करना चाहिए।”</p><p>इस पर मलयवती मौन ही रही। लज्जावश उसके क़दम आगे न उठ सके। तब उस सखी ने जीमूतवाहन से कहा, “मेरी यह सखी लजा रही है, अतः आप मुझसे ही यह सत्कार ग्रहण करें।” ऐसा कहकर उसने एक पुष्पमाला जीमूतवाहन के गले में पहना दी।</p><p>तभी एक दासी ने उस सिद्धकन्या के पास आकर बताया, “राजकुमारी, आपकी माता जी आपको याद कर रही हैं। चलिए, विलम्ब मत कीजिए।” तब मलयवती अनमने-से भाव से जीमूतवाहन की ओर देखती हुई वहां से चल पड़ी। उसके कदमों से ऐसा लग रहा था जैसे जीमूतवाहन के पास से वह विवशता में ही जा रही हो।</p><p>जीमूतवाहन भी अपने आश्रम में लौट आया। उसका भी मन मलयवती में रमा हुआ था। घर आकर मलयवती अपनी माता से मिली और फिर अपने कक्ष में जाकर शय्या पर गिर पड़ी। उसके हृदय में कामाग्नि जल रही थी। उसकी आंखों में आंसू आ गए थे। उसकी सखियों ने उसके सन्ताप से भरे सारे शरीर पर चन्दन का लेप लगाया और कमल के पत्तों से पंखा झला। फिर भी, न तो वह सखियों की गोद में और न भूमि पर सोकर ही चैन पा सकी। रात-भर वह तड़पती ही रही। लज्जा के भय से उसने किसी दूत को भी जीमूतवाहन के पास नहीं भेजा। उसके जीवन की आशा टूट-सी रही थी। उधर, कामाग्नि से पीड़ित जीमूतवाहन का भी लगभग वैसा ही हाल था। वह भी रात मुश्किल से व्यतीत कर सका।</p><p>सुबह होने पर वह फिर से गौरी के मंदिर में पहुंचा, जहां उसने मलयवती को देखा था। उसका मित्र मुनिकुमार भी उसके पीछे-पीछे आया और उसे कामज्वाला से विह्वल देखकर आश्वासन देने लगा। उसने पाया कि मलयवती भी वहां उपस्थित थी। मुनिकुमार के आश्वासन पर उस सिद्ध कन्या की ओर बढ़ा जो उसकी ही तरफ निहार रही थी।&nbsp;</p><p>जब उसे विश्वास हो गया कि राजपुत्री उसका निवेदन ठुकराएगी नहीं, तो उसने फूलों की एक माला मलयवती के गले में डाल दी। मलयवती ने अपनी कोमल दृष्टि से जीमूतवाहन को देखते हुए एक नीलकमल की माला उसके गले में पहना दी। इस प्रकार आपस में एक शब्द बोले बिना ही उन दोनों ने स्वयंवर-विधि पूरी कर ली। तत्पश्चात वह जीमूतवाहन की ओर प्रेमपूर्ण नजरों से देखती हुई वहां से विदा हो गई। जीमूतवाहन भी, जिसका मन अभी भी राजपुत्री में रमा हुआ था, थके कदमों से वापस अपने आश्रम लौट आया।</p><p>अपने-अपने स्थान पर पहुंचकर दोनों ही विरह-वेदना से तड़पने लगे। उस रात भी न तो जीमूतवाहन को ही नींद आई और न मलयवती ही सो सकी।</p><p>तीसरे दिन, जब वह बहुत व्याकुल हो गया तो इस आशा से कि शायद उधर, विरह की आग में जलती हुई मलयवती भी उससे मिलने वहां पहुंचेगी वह अपने मित्र मुनिकुमार के साथ उस गौरी माता के मंदिर जा पहुंचा। मलयवती भी वहां तभी पहुंची थी। माता गौरी के मंदिर में पहुंचकर, आंखों में आंसू भरकर मलयवती ने देवी से प्रार्थना की, “हे देवी माता, आपकी भक्ति से मैं इस जन्म में तो जीमूतवाहन को पति रूप में पा नहीं सकूंगी, अतः आपसे <a
href="/bhakti-yog-prarthana-swami-vivekanand/">प्रार्थना</a> करती हूं कि आप मुझे अगले जन्म में जीमूतवाहन को पति रूप में पाने का आशीर्वाद दीजिए।”</p><p>यह कहकर उसने अपने साथ लाई एक चादर से अपना गला घोंटना चाहा। तभी आकाशवाणी हुई—“बेटी, ऐसा दुस्साहस मत करो। विद्याधरों का राजा जीमूतवाहन ही चक्रवर्ती होकर तुम्हारा पति बनेगा।” अपने उस मुनिकुमार मित्र के साथ जीमूतवाहन ने भी वह आकाशवाणी सुनी। वे दोनों एक वृक्ष के पीछे खड़े हुए थे। आकाशवाणी सुनकर तत्काल दोनों मलयवती के पास पहुंच गए।</p><p>जीमूतवाहन के उस मित्र मुनिकुमार ने मलयवती से कहा, “&#8217;देखो, देवी का वर सचमुच तुमको इनके रूप में प्राप्त हो गया है। तुम्हारी मनोकामना भी पूरी हो गई। अब आत्महत्या करने की कोई जरूरत नहीं है।”</p><p>जब मुनिकुमार ऐसा कह रहा था, तभी जीमूतवाहन ने पास जाकर मलयवती के गले से फंदा निकाल दिया। लज्जा के कारण मलयवती आंखें झुकाकर जमीन खरचने लगी। तभी उसे ढूंढ़ती हुई उसकी सखी ने अचानक आकर प्रसन्नतापूर्वक कहा, “सखी, प्रसन्नता की बात है कि तुम्हारा मनोरथ पूरा हुआ। मेरे सामने ही आज कुमार मित्रावसु ने तुम्हारे पिताश्री महाराज विश्वासु से यह कहा है कि, &#8216;पिताजी, विद्याधरों के राजा के पुत्र संसार में सम्मानित और कल्पतरु का दान करने वाले जीमूतवाहन, जो अतिथिरूप में यहां उपस्थित हैं अपनी मलयवती के लिए उनके जैसा कोई और वर नहीं है। अतः आप मलयवती का विवाह उन्हीं के साथ करके कृतार्थ हों।&#8217; महाराज विश्वासु ने भी कुमार की बात स्वीकार कर ली है इसलिए अब निश्चित है कि तुम्हारा विवाह जीमूतवाहन के साथ ही होगा। अतः अब तुम अपने घर चलो, और ये महाभाग भी अपने स्थान को जाएं।”</p><p>उस सखी के ऐसा कहने पर हर्ष और उत्कंठा से युक्त राजकुमारी बार-बार मुड़-मुड़कर देखती हुई वहां से चली गई। जीमूतवाहन भी अपने आश्रम की तरफ बढ़ चला। वहां उसने प्रतीक्षारत मित्रावसु से अपने अभीष्ट कार्य की बात सुनी और उसका समर्थन किया।</p><p>जीमूतवाहन को अपने पूर्वजन्म का स्मरण था। उसने मित्रावसु को बतलाया कि पूर्वजन्म में भी मित्रावसु उसका मित्र था और उसकी बहन उसकी पत्नी थी।</p><p>अनन्तर, मित्रावसु ने प्रसन्न होकर जीमूतवाहन के पिता को यह संवाद भेजा, जिससे वे संतुष्ट हुए। तत्पश्चात् अपने लक्ष्य में सफलता पाने वाले मित्रावसु ने जाकर अपने माता-पिता से भी यह संवाद कहा, तो उन्हें भी प्रसन्नता हुई।</p><p>उसी दिन मित्रावसु, जीमूतवाहन को अपने घर ले गया और अपनी क्षमता तथा वैभव के अनुसार आनंद-उत्सव की व्यवस्था करने लगा। उसने उस शुभ दिन में विद्याधरों के स्वामी जीमूतवाहन के साथ अपनी बहन मलयवती का विवाह कर दिया। बाद में जीमूतवाहन, जिसका मनोरथ पूरा हो गया था, अपनी नवविवाहिता पत्नी के साथ वहीं रहता रहा।</p><p>एक बार सहज कौतूहल से मित्रावसु के साथ घूमता हुआ जीमूतवाहन समुद्र तट के निकट एक वन में जा पहुंचा। वहां हड्डियों के बड़े-से ढेर को देखकर उसने मित्रावसु से पूछा कि हड्डियों के ये ढेर किन प्राणियों के हैं?</p><p>तब मित्रावसु ने दयालु जीमूतवाहन से कहा, “सुनो, मैं इसका सारा वृत्तांत तुम्हें संक्षेप में सुनाता हूं।”</p><p>प्राचीन काल में सर्पों की माता कद्रू ने गरुड़ की माता विनता को बाजी लगाकर धोखे से हरा दिया और अपनी दासी बना लिया था। बाद में बलवान गरुड़ ने यद्यपि अपनी माता को स्वतंत्र करा लिया फिर भी, उस बैर के कारण वह कद्रू के पुत्र सर्पों से द्वेष रखते हुए उनका भक्षण करने लगा। अक्सर वह पाताल लोक में जाकर कुछ सापों को मार डालता और कुछ भय के कारण स्वयं ही मर जाते थे। तब, नागों के राजा वासुकि को यह चिन्ता हुई कि इस तरह से तो सर्पकुल का विनाश ही हो जाएगा। अतः उसने विनयपूर्वक गरुड़ के सामने एक योजना रखी, “हे पक्षीराज, इस दक्षिण समुद्र के किनारे तुम्हारे भोजन के लिए मैं प्रतिदिन एक सर्प भेज दिया करूंगा, किंतु तुम किसी प्रकार, किसी भी समय पाताल में नहीं आओगे; क्योंकि एक साथ ही सब सर्पों के नष्ट हो जाने से तुम्हें भी कुछ लाभ नहीं होगा।”</p><p>गरुड़ ने भी इसमें अपना लाभ देखा और वासुकि की बात स्वीकार कर ली। पक्षीराज गरुड़ इस तट पर वासुकि द्वारा भेजे हुए एक सर्प को प्रतिदिन खाया करता है। यह उसी के द्वारा खाये गए सर्पों की हड्डियां हैं, जो समय पाकर बढ़ते-बढ़ते अब पर्वत शिखर के समान हो गई हैं।</p><p>दया और धैर्य के सागर जीमूतवाहन ने मित्रावसु के मुख से जब यह वृत्तांत सुना तो उसके मन को भारी कष्ट पहुंचा। उसने कहा, “शोक करने के योग्य तो सर्पों का राजा वासुकि है जो ऐसा कायर है कि प्रतिदिन अपनी प्रजा को शत्रु को भेंट कर देता है। हजार मुखवाला यह वासुकि अपने एक मुख से भी यह क्यों नहीं कह सका कि &#8216;गरुड़, पहले तुम मुझे ही खा लो।&#8217; प्रतिदिन नगरपत्नियों का विलाप सुनकर भी उस निर्दयी वासुकि ने अपने कुल का नाश करने वाले गरुड़ से प्रार्थना क्यों की? अरे, मोह भी कैसा गाढ़ा होता है ! यद्यपि गरुड़ महर्षि कश्यप का पुत्र है, वीर है और <a
href="/vishnu-bhagwan-ki-aarti/">भगवान विष्णु</a> का वाहन होने के कारण पवित्र है, फिर भी ऐसा पाप करता है।”</p><p>ऐसा कहकर परम पराक्रमी जीमूतवाहन ने मन-ही-मन निश्चय किया कि &#8216;इस नाशवान शरीर से मैं अमरता प्राप्त करूंगा। मैं आज ही अपना शरीर देकर गरुड़ के पंजे से कम-से-कम एक ऐसे सर्प की रक्षा करूंगा जो हितैषियों से रहित तथा डरा हुआ है।&#8217;</p><p>जीमूतवाहन ऐसा सोच ही रहा था तभी मित्रावसु के पिता के पास से एक प्रतिहारी उन्हें बुलाने के लिए वहां पहुंच गया। जीमूतवाहन ने यह कहकर उसे घर भेज दिया कि &#8216;तुम चलो, मैं कुछ देर बाद आऊंगा।&#8217;</p><p>मित्रावसु के जाने के बाद जीमूतवाहन वैसे ही इधर-उधर विचरण करने लगा। तभी उसके कानों में किसी के रुदन का स्वर सुनाई पड़ा। वह पास पहुंचा और छिपकर एक शिलाखंड के नीचे खड़ा हो गया। वहां उसने एक वृद्धा नागस्त्री को विलाप करते देखा। उसके समीप ही एक सुंदर-सा काले रंग वाला नागयुवक खड़ा था, जो उस स्त्री से अनुनयपूर्वक उसे घर लौट जाने को कह रहा था।</p><p>&#8216;यह कौन है?&#8217; इसे जानने को उत्सुक जीमूतवाहन ने छिपकर उनकी बातें सुनीं। वृद्धा स्त्री उस युवक से रोते हुए कह रही थी, “हा शंखचूड़, हा सौ-सौ दुःखों से पाए हुए मेरे गुणी पुत्र! हा मेरे कुल के एकमात्र सूत्र, अब मैं फिर तुम्हें कहां देख सकूँगी। हा मेरे कुलदीपक! तुम्हारे बिना तुम्हारे वृद्ध पिता कैसे अपना बुढ़ापा काट सकेंगे? तुम्हारे जो अंग सूर्य-किरणों के स्पर्श से भी कुम्हला जाते थे, वे गरुड़ के द्वारा खाये जाने की पीड़ा कैसे सहन कर पाएंगे? नागलोक तो बहुत बड़ा है, फिर विधाता और नागराज ने मुझ अभागिनी के एकमात्र पुत्र, तुम्हीं को क्यो चुन लिया?”</p><p>इस प्रकार रोती-बिलखती हुई उस मां से उसके युवा पुत्र ने कहा, “मां, मैं तो स्वयं ही बहुत दुःखी हूं। तुम मुझे और दुःखी क्यों कर रही हो? अब तुम घर लौट जाओ। मैं तुम्हें अंतिम प्रणाम करता हूं। गरुड़ के आने का समय हो रहा है।” यह सुनकर वृद्धा पछाड़ खाकर गिर पड़ी और किसी की सहायता मिलने की आशा में इधर-उधर व्याकुल नेत्रों से देखने लगी।</p><p>यह सब देखकर और सुनकर बोधिसत्व के अंश-रूप जीमूतवाहन को बड़ी दया आई। वह सोचने लगा, “आह, तो यही है शंखचूड़ नामक वह नाग, जिसे वासुकि ने गरुड़ के भोजन के लिए भेजा है और यह इसकी वृद्धा माता है जो अपने एकमात्र पुत्र के स्नेह के कारण ममतावश रोती हुई यहां तक आई है। आज यदि मैंने इसके जीवन की रक्षा न की तो मेरे जीवन को धिक्कार है।”</p><p>यह सोचकर वह उस वृद्धा और युवक के पास पहुँचा और बोला—“मां, तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हारे पुत्र की रक्षा करूंगा।” वृद्धा उसे देखकर भयभीत हो गई। उसने समझा कि वही गरुड़ है। ऐसा विचारकर उसने कातर स्वर में जीमूतवाहन से कहा, “गरुड़, मेहरबानी करके तुम मुझे खा लो किंतु मेरे पुत्र का जीवन बख्श दो।”</p><p>तब शंखचूड़ ने अपनी माता को धीरज दिया, “मां, तुम डरो मत, यह गरुड़ नही है। कहां <a
href="/chandra-dev-mantra-katha-upay/">चंद्रमा</a> के समान आनंद देने वाले ये महापुरुष और कहां वह नागभक्षी गरुड़।” शंखचूड़ के ऐसा कहने पर जीमूतवाहन ने कहा, “मां, तुम घबराओ नहीं, मैं एक विद्याधर हूं। तुम्हारे पुत्र की रक्षा के लिए यहां आया हूं। उस मूर्ख गरुड़ को मैं अपना शरीर अर्पित करूंगा। तुम अपने पुत्र के साथ घर लौट जाओ।”</p><p>यह सुनकर वृद्धा ने कहा, “ऐसा मत कहो, तुम भी मेरे पुत्र के समान हो। तुमने मेरे पुत्र की जगह अपना बलिदान देने की बात कहकर मुझ पर बहुत कृपा की है।”</p><p>तब जीमूतवाहन ने कहा, “मां, जब तुमने मुझे पुत्र कहकर यह सम्मान दिया है तो मेरे मनोरथ को सिद्ध होने दो, मुझे इस बलिदान से मत रोको, मां। अन्यथा मैं यह समझंगा कि मेरा जीवन व्यर्थ ही गया।”</p><p>जीमूतवाहन ने जब ऐसा कहा, तब शंखचूड़ उससे बोला, “हे महासत्त्व, तुमने सचमुच बहुत दयालुता दिखलाई है किंतु मैं अपने लिए तुम्हारे जीवन का बलिदान स्वीकार नहीं कर सकता। मेरे जैसे साधारण व्यक्तियों से तो यह संसार भरा पड़ा है किंतु आप जैसे विरले ही इस संसार में मिलते हैं। हे सुबुद्धि! चन्द्रबिंब के कलंक के समान मैं अपने पिता शंखपाल के पवित्र कुल को मलिन न कर सकूँगा।”</p><p>ऐसा कहकर शंखचूड़ ने अपनी माता से कहा, “मां, तुम इस दुर्गम वन से लौट जाओ। क्या तुम इस वध्य-शिला को नहीं देखतीं जो सर्पों के रक्त से भीगी हुई है और <a
href="/yamraj-ki-aarti/">यमराज </a>की विलास शय्या के समान भयानक है। मैं गरुड़ के आने से पहले ही समुद्र तट पर जाकर <a
href="/tag/shiva/">भगवान गोकर्ण</a> को प्रणाम करके शीघ्र ही लौटकर आता हूं।” यह कहकर शंखचूड़ ने करुण स्वर में रोती हुई अपनी माता से विदा लेकर उसे प्रणाम करके गोकर्ण की वन्दना के लिए वहां से प्रस्थान किया।</p><p>जीमूतवाहन यह सोचकर कि यदि इसी बीच गरुड़ आ जाए, तो मेरा मनोरथ पूरा हो जाए, वह उस शिला पर जाकर लेट गया जो गरुड़ के शिकार के लिए निश्चित की गई थी।</p><p>कुछ ही क्षण बाद गरुड़ वहां पहुंच गया। उसने जीमूतवाहन को अपने विकराल पंजों में दबाया और ऊपर उड़ गया। जीमूतवाहन को पंजों में दबाए हुए जब गरुड़ उसे चोंच मार-मारकर खाने लगा तो उसके शरीर से रक्त झर-झरकर नीचे टपकने लगा। इस बीच जीमूतवाहन का शिरोमणि, जिस पर रक्त लगा हुआ था, नीचे ठीक उस स्थान पर जाकर गिरी जहां उसका पिता, माता एवं उसकी पत्नी मलयवती बैठे हुए थे।</p><p>मलयवती ने अपने पति की शिरोमणि को तुरंत पहचान लिया और वह विह्वल हो उठी। आंखों में आंसू भरकर उसने अपने सास-ससुर को जब वह शिरोमणि दिखाई तो वे भी घबरा उठे।</p><p>तत्पश्चात्, अपनी विद्या के द्वारा ध्यान करके राजा जीमूतकेतु ने सारा वृत्तांत जान लिया और वह अपनी रानी कनकवती तथा पुत्रवधु के साथ शीघ्र ही उस स्थान की ओर चल पड़े जहां गरुड़ जीमूतवाहन को ले गया था।</p><p>इधर शंखचूड़ जब गोकर्ण को प्रणाम करके लौटा तो उसने विकल होकर देखा कि वध्य शिला रक्त से भीगी हुई थी। शंखचूड़ समझ गया कि परोपकारी जीमूतवाहन ने उसकी जगह स्वयं का बलिदान कर दिया था। तब उसने मन में सोचा कि &#8216;मैं इस बात का पता अवश्य लगाऊंगा कि सर्पों का शत्रु वह गरुड़ उस महान आत्मा को कहां ले गया है? यदि मैं उसे जीवित पा सका तो अपयश के कलंक को अपने माथे से धो सकूँगा।&#8217;</p><p>तब शंखचूड़ खून की टपकी बूंदों के सहारे आगे बढ़ता गया। उधर गरुड़ जब जीमूतवाहन को खा रहा था तो एकाएक उसे यह जानकर कुछ संदेह-सा हो गया कि उसका शिकार बजाय चीखने-चिल्लाने के शांत भाव से प्रसन्नचित उसी की ओर देख रहा था। इस पर उसने उसे खाना बंद करके सोचा, “अरे, यह तो कोई अपूर्व व्यक्ति है जो ऐसा पराक्रमी है कि मेरे खाये जाने पर भी प्रसन्न हो रहा है और इसके प्राण भी नहीं निकलते। इसके शरीर का जो थोड़ा-बहुत भाग शेष रह गया है, उसमें भी स्पंदन नहीं है। यह तो मुझे इस तरह देख रहा है जैसे इसे खाकर मैं इस पर कोई उपकार कर रहा हूं। अवश्य ही यह सर्प नहीं है, निश्चित ही यह कोई सज्जन व्यक्ति है। अब मैं इसे नहीं खाऊंगा।”</p><p>गरुड़ ऐसा सोच ही रहा था कि जीमूतवाहन बोला–रुक क्यों गए पक्षिराज। मुझे खाओ और अपनी क्षुधा शांत करो। अभी तो मेरे शरीर का काफी हिस्सा शेष है।</p><p>यह सुनकर गरुड़ को बहुत आश्चर्य हुआ। वह बोला, “हे महात्मन, कौन हैं आप? सर्प तो आप हो ही नहीं सकते, फिर आप कौन हैं? कृपा करके मुझे अपना परिचय दें।”</p><p>जीमूतवाहन ने उत्तर में कहा, “यह तुम्हारा कैसा प्रश्न है गरुड़? मैं तुम्हारा भक्ष्य हूं और कुछ भी नहीं। अतः निर्मम होकर मेरा भक्षण करो।”</p><p>जीमूतवाहन जब गरुड़ से यह बातें कर रहा था, उसी समय शंखचूड़ उन्हें खोजता हुआ वहां आ पहुंचा। उसने दूर से ही गुहार लगाई, “रुको विनता-पुत्र। इसे खाकर कलंक के भागी मत बनो। यह तुम्हारा भक्ष्य नहीं है, तुम्हारा भक्ष्य तो मैं हूँ, एक नागपुत्र।” यह कहता हुआ वह दौड़कर वहां पहुंचा और उन दोनों के बीच खड़ा हो गया। गरुड़ को चक्कर में पड़ा देखकर शंखचूड़ ने पुनः कहा, “किसी भ्रम में मत पड़ो विनतापुत्र। तुम जिसे अपना भक्ष्य समझकर उठा लाए हो, वह तो एक महान आत्मा, महान परोपकारी, विद्याधरों का राजा जीमूतवाहन है। तुम्हारा असली शिकार तो मैं हूँ। यह देखो मेरी दो जुबानें और मेरा फन&#8230;।” ऐसा कहकर शंखचूड़ ने अपनी दोनों जुबानें और अपना फन उसे दिखाया।</p><p>जब शंखचूड़ गरुड़ को अपना फन दिखा रहा था, ठीक उसी समय जीमूतवाहन की पत्नी और उसके माता-पिता भी वहां आ पहुंचे और जीमूतवाहन के क्षत-विक्षत शरीर को देखकर हाहाकार करने लगे।</p><p>यह सब जानकर गरुड़ को भारी पश्चाताप हुआ। वह अपने मन में सोचने लगा कि “हाय! मैंने भ्रम में पड़कर बोधिसत्व के इस अंश को कैसे खा लिया? यह तो दूसरों को प्राण देने वाला वही जीमूतवाहन है जिसका यश तीनों लोकों में फैला हुआ है। अतः अब यदि इसकी मृत्यु हो गई तो मुझ पापी को अग्नि में प्रवेश करना पड़ेगा, क्योंकि अधर्म रूपी विष-वृक्ष का फल पककर भला मीठा कैसे हो सकता है?”</p><p>गरुड़ जब इस प्रकार पश्चाताप कर रहा था, तभी जीमूतवाहन ने अपने माता-पिता एवं पत्नी की ओर देखा। एकाएक उसका शरीर जोर से कांपा और उसके प्राण पखेरू उड़ गए।</p><p>अपने पुत्र को मृत समझकर जीमूतवाहन के माता-पिता आर्तनाद करने लगे। शंखचूड़ भी स्वयं को बार-बार कोसने लगा कि उसी के कारण इस महात्मा की जान गई। उसकी पत्नी मलयवती आंखों में आंसू भरकर आकाश की ओर देखती हुई उस <a
href="/mahakali-chalisa/">माता अम्बिका</a> को उलाहना देने लगी जिसने प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया था। वह बोली, “हे देवी, उस समय तो आपने मुझे यही वरदान दिया था कि तुम्हारा पति विद्याधरों का चक्रवती राजा होगा। फिर अब आपका वह वरदान असत्य कैसे हो गया, मां!”</p><p>मलयवती जब बार-बार ऐसा कहकर रुदन कर रही थी, तभी वहां प्रकाश-सा फैला और साक्षात् देवी अम्बिका वहां प्रकट हो गई। मां अम्बिका ने कहा, “बेटी, मेरी बात झूठी नहीं है। लो मैं तुम्हारे पति को पुनः जीवित किए देती हूं।” ऐसा कहकर मां अम्बिका ने अपने कमंडल के अमृत से जीमूतवाहन के अस्थिपंजर को सींच दिया।</p><p>जीमूतवाहन जीवित हो उठा, उसके कटे-फटे अंग पुनः जुड़ गए और वह पहले से भी अधिक सुंदर व कांतिमान बन गया। जीमूतवाहन ने तब देवी मां को प्रणाम किया। औरों ने भी उसका अनुसरण किया। तब देवी मां ने उससे कहा, “&#8217;पुत्र जीमूतवाहन, मैं तुम्हारे देहदान से परम संतुष्ट हूं इसलिए अपने हाथों से मैं तुम्हारा चक्रवर्ती पद पर अभिषेक करती हूं। तुम एक कल्प तक विद्याधरों पर राज्य करोगे।”</p><p>यह कहकर देवी ने कलश के जल से जीमूतवाहन का अभिषेक किया। फिर वह अन्तर्ध्यान हो गईं।</p><p>उसी समय वहां फूलों की वर्षा हुई और आकाश में उपस्थित देवताओं की दुन्दभियां बजने लगीं।</p><p>अब गरुड़ ने विनीत होकर जीमूतवाहन से कहा, “हे चक्रवर्ती, मैं आपके अपूर्व पराक्रम से बहुत प्रसन्न हूं। तुमने जो कुछ किया है, वह तीनों लोकों को अचरज में डालने वाला है। इस कृत्य से तुमने अपना नाम ब्रह्मांड की भित्ति पर लिख दिया है। अतः आप मुझे आज्ञा दीजिए और मेरे द्वारा कोई वर प्राप्त कीजिए।”</p><p>इस पर जीमूतवाहन ने कहा, “हे पक्षिराज! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो आप वचन दीजिए कि आज से फिर आप सर्पों का भक्षण न करेंगे। साथ ही ये भी कि जिन सर्पों को आप खा चुके हैं और जिनकी हड्डियां ही शेष रही हैं, उन्हें भी पुनः जीवनदान देंगे।” तब गरुड़ ने ऐसा ही वचन दिया। साथ ही मृत सर्पों को भी फिर से जीवित कर दिया।</p><p>गौरी की कृपा से सभी विद्याधरों ने जीमूतवाहन के इस अद्भुत कृत्य की बात जान ली। कुछ ही देर में वे सभी राजा वहां आ पहुंचे। उन्होंने जीमूतवाहन के चरणों में झुककर प्रणाम किया। जीमूतवाहन ने जब गरुड़ को विदा कर दिया, तब वे उसके संबंधियों और मित्रों सहित उसे हिमालय पर्वत पर ले गए, जहां पार्वती ने अपने हाथों अभिषेक करके उसे चक्रवर्ती का पद दिया।</p><p>जीमूतवाहन ने अपने माता-पिता, मित्रावसु, मलयवती तथा घर जाकर लौटे हुए शंखचूड़ के साथ रहते हुए बहुत दिनों तक चक्रवर्ती सम्राट का पद संभाला। उसका साम्राज्य उन रत्नों से भरपूर था, जिन्हें उसने अपने अलौकिक कार्यों द्वारा अद्भुत रूप से प्राप्त किया था।</p><p>बेताल ने यह अत्यंत अद्भुत कथा सुनाकर राजा विक्रमादित्य से पूछा, “राजन, अब तुम यह बताओ कि उन दोनों में अधिक पराक्रमी शंखचूड़ था या जीमूतवाहन? यदि तुम जानते हुए भी इस बात का उत्तर न दोगे तो तुम्हारा सिर खंड-खंड हो जाएगा।”</p><p>बेताल की यह बात सुनकर शाप के भय से राजा विक्रमादित्य ने मौन त्याग दिया और उद्वेग-रहित होकर कहा, “बेताल, जीमूतवाहन ने जो कुछ किया, उसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है क्योंकि उसे अनेक जन्मों की सिद्धियां प्राप्त थीं। सराहने योग्य तो शंखचूड़ ही है। उसके शत्रु को किसी और ने अपना शरीर अर्पित कर दिया था और गरुड़ उसे लेकर दूर चला गया था। फिर भी वह भागा-भागा उनके पीछे वहां गया और उसने हठपूर्वक अपना शरीर प्रस्तुत किया।”</p><p>राजा का यह सटीक उत्तर सुनकर बेताल उसके कंधे से उतरकर फिर उसी शिंशपा-वृक्ष की ओर उड़ गया। राजा भी उसे पुनः लाने के लिए उसके पीछे-पीछे दौड़ गया।</p><p> राजा विक्रमादित्य बेताल को लाने के लिए पुनः शिंशपा वृक्ष के नीचे पहुँच गया। उसने बेताल को उतारकर अपने कंधे पर डाला और चलना शुरू किया। बेताल ने राजा विक्रम को फिर से यह कहानी सुनानी शुरू की – <a
href="/vikram-betal-yashodhan-baldhar-kahani-hindi/">यशोधन और बलधर में कौन अधिक चरित्रवान?</a></p><pre class="wp-block-code"><code><iframe sandbox="allow-popups allow-scripts allow-modals allow-forms allow-same-origin" style="width:120px;height:240px;" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" frameborder="0" src="//ws-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?ServiceVersion=20070822&#038;OneJS=1&#038;Operation=GetAdHtml&#038;MarketPlace=IN&#038;source=ss&#038;ref=as_ss_li_til&#038;ad_type=product_link&#038;tracking_id=hindpath-21&#038;language=en_IN&#038;marketplace=amazon&#038;region=IN&#038;placement=8186253513&#038;asins=8186253513&#038;linkId=c4c5263f71f7f58342ece29947cb985d&#038;show_border=true&#038;link_opens_in_new_window=true"></iframe></code></pre><p>The post <a
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