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><channel><title>Garud Archives - हिंदी पथ</title> <atom:link href="https://hindipath.com/tag/garud/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" /><link>https://hindipath.com/tag/garud/</link> <description>हिंदी का संसार</description> <lastBuildDate>Fri, 01 Sep 2023 07:03:01 +0000</lastBuildDate> <language>en-US</language> <sy:updatePeriod> hourly </sy:updatePeriod> <sy:updateFrequency> 1 </sy:updateFrequency> <generator>https://wordpress.org/?v=6.3.13</generator><image> <url>https://hindipath.com/wp-content/uploads/2019/09/HindiPath-Site-Icon-New.png</url><title>Garud Archives - हिंदी पथ</title><link>https://hindipath.com/tag/garud/</link> <width>32</width> <height>32</height> </image> <item><title>सर्पों की मूर्च्छा – महाभारत का पचीसवाँ अध्याय (आस्तीक पर्व)</title><link>https://hindipath.com/sarpo-ki-murchha-chapter-25-astik-parv-mahabharat-hindi/</link> <comments>https://hindipath.com/sarpo-ki-murchha-chapter-25-astik-parv-mahabharat-hindi/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Thu, 28 Oct 2021 12:28:36 +0000</pubDate> <category><![CDATA[ग्रंथ]]></category> <category><![CDATA[धर्म]]></category> <category><![CDATA[Garud]]></category> <category><![CDATA[Sarp]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=8997</guid><description><![CDATA[<p>&#8220;सर्पों की मूर्च्छा&#8221; नामक यह महाभारत कथा आदि पर्व के अन्तर्गत आस्तीक पर्व में आती है। कहानी पिछले अध्याय में</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/sarpo-ki-murchha-chapter-25-astik-parv-mahabharat-hindi/">सर्पों की मूर्च्छा – महाभारत का पचीसवाँ अध्याय (आस्तीक पर्व)</a> appeared first on <a
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class="wp-block-quote"><p>&#8220;सर्पों की मूर्च्छा&#8221; नामक यह महाभारत कथा <span
style="text-decoration: underline;"><a
href="/mahabharat-adi-parv-hindi/">आदि पर्व</a></span> के अन्तर्गत <a
href="/astik-parv-chapert-5-mahabharat-hindi/">आस्तीक पर्व</a> में आती है। कहानी <a
href="/surya-dev-ka-kop-chapter-24-astik-parv-mahabharat-hindi/">पिछले अध्याय में सूर्यदेव के कोप</a> के आगे शुरू होती है। इस अध्याय में सर्प गरुड की पीठ पर सवार हो जाते हैं। पीठ पर सवार सर्पों की मूर्च्छा का कारण सूर्य की तीक्ष्ण गर्मी है। पढ़ें सर्पों की मूर्च्छा की यह कथा और कर्द्रू द्वारा इन्द्र देव का स्तवन। महाभारत के अन्य अध्याय क्रमिक रूप से पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – <a
href="/mahabharat-katha-in-hindi/"><strong>महाभारत कथा</strong></a>।</p></blockquote><p>सौतिरुवाच<br><strong>ततः कामगमः पक्षी महावीर्यो महाबलः ⁠।<br>मातुरन्तिकमागच्छत् परं पारं महोदधेः ⁠।⁠।⁠ १ ⁠।⁠।<br><a
href="/tag/ugrashrava/">उग्रश्रवा जी</a> कहते हैं—</strong>शौनकादि महर्षियो! तदनन्तर इच्छानुसार गमन करने वाले महान् पराक्रमी तथा महाबली गरुड समुद्र के दूसरे पार अपनी माता के समीप आये ⁠।⁠।⁠ १ ⁠।⁠।</p><p><strong>यत्र सा विनता तस्मिन् पणितेन पराजिता ⁠।<br>अतीव दुःखसंतप्ता दासीभावमुपागता ⁠।⁠।⁠ २ ⁠।⁠।<br></strong>जहाँ उनकी <a
href="/tag/vinata/">माता विनता</a> बाजी हार जाने से दासी-भाव को प्राप्त हो अत्यन्त दुःख से संतप्त रहती थीं ⁠।⁠।⁠ २ ⁠।⁠।&nbsp;</p><p><strong>ततः कदाचिद् विनतां प्रणतां पुत्रसंनिधौ ⁠।<br>काले चाहूय वचनं कद्रूरिदमभाषत ⁠।⁠।⁠ ३ ⁠।⁠।<br></strong>एक दिन अपने पुत्र के समीप बैठी हुई विनय-शील विनता को किसी समय बुलाकर कद्रू ने यह बात कही ⁠।⁠।⁠ ३ ⁠।⁠।</p><p><strong>नागानामालयं भद्रे सुरम्यं चारुदर्शनम् ⁠।<br>समुद्रकुक्षावेकान्ते तत्र मां विनते नय ⁠।⁠।⁠ ४ ⁠।⁠।<br></strong>‘कल्याणी विनते! समुद्र के भीतर निर्जन प्रदेश में एक बहुत रमणीय तथा देखने में अत्यन्त मनोहर नागों का निवास स्थान है। तू वहाँ मुझे ले चल’ ⁠।⁠।⁠ ४ ⁠।⁠।</p><p><strong>ततः सुपर्णमाता तामवहत् सर्पमातरम् ⁠।<br>पन्नगान् गरुडश्चापि मातुर्वचनचोदितः ⁠।⁠।⁠ ५ ⁠।⁠।<br></strong>तब गरुड की माता विनता सर्पों की माता कद्रू को अपनी पीठ पर ढोने लगी। इधर माता की आज्ञा से गरुड भी सर्पों को अपनी पीठ पर चढ़ाकर ले चले ⁠।⁠।⁠ ५ ⁠।⁠।</p><p><strong>स सूर्यमभितो याति वैनतेयो विहंगमः ⁠।<br>सूर्यरश्मिप्रतप्ताश्च मूर्च्छिताः पन्नगाभवन् ⁠।⁠।⁠ ६ ⁠।⁠।<br></strong>पक्षिराज गरुड आकाश में सूर्य के निकट होकर चलने लगे। अतः सर्प सूर्य की किरणों से संतप्त हो मूर्च्छित हो गये ⁠।⁠।⁠ ६ ⁠।⁠।</p><p><strong>तदवस्थान् सुतान्‌ दृष्ट्वा कद्रूः शक्रमथास्तुवत् ⁠।<br>नमस्ते सर्वदेवेश नमस्ते बलसूदन ⁠।⁠।⁠ ७ ⁠।⁠।<br></strong>अपने पुत्रों को इस दशा में देखकर कद्रू इन्द्र की स्तुति करने लगी—‘सम्पूर्ण देवताओं के ईश्वर! तुम्हें नमस्कार है। बलसूदन! तुम्हें नमस्कार है ⁠।⁠।⁠ ७ ⁠।⁠।</p><p><strong>नमुचिघ्न नमस्तेऽस्तु सहस्राक्ष शचीपते ⁠।<br>सर्पाणां सूर्यतप्तानां वारिणा त्वं प्लवो भव ⁠।⁠।⁠ ८ ⁠।⁠।<br></strong>‘सहस्र नेत्रों वाले नमुचिनाशन! शचीपते! तुम्हें नमस्कार है। तुम <a
href="/surya-dev-mantra-katha-upay/">सूर्य के ताप से</a> संतप्त हुए सर्पों को जल से नहलाकर नौका की भाँति उनके रक्षक हो जाओ ⁠।⁠।⁠ ८ ⁠।⁠।</p><p><strong>त्वमेव परमं त्राणमस्माकममरोत्तम ⁠।<br>ईशो ह्यसि पयः स्रष्टुं त्वमनल्पं पुरन्दर ⁠।⁠।⁠ ९ ⁠।⁠।<br></strong>‘अमरोत्तम! तुम्हीं हमारे सबसे बड़े रक्षक हो ⁠। पुरन्दर! तुम अधिक-से-अधिक जल बरसाने की शक्ति रखते हो ⁠।⁠।⁠ ९&nbsp; ।⁠।</p><p><strong>त्वमेव मेघस्त्वं वायुस्त्वमग्निर्विद्युतोऽम्बरे ⁠।<br>त्वमभ्रगणविक्षेप्ता त्वामेवाहुर्महाघनम् ⁠।⁠।⁠ १० ⁠।⁠।</strong><br>‘तुम्हीं मेघ हो, तुम्हीं वायु हो और तुम्हीं आकाश में बिजली बनकर प्रकाशित होते हो। तुम्हीं बादलों को छिन्न-भिन्न करने वाले हो और विद्वान् पुरुष तुम्हें ही महामेघ कहते हैं ⁠।⁠।⁠ १० ⁠।⁠।</p><p><strong>त्वं वज्रमतुलं घोरं घोषवांस्त्वं बलाहकः ⁠।<br>स्रष्टा त्वमेव लोकानां संहर्ता चापराजितः ⁠।⁠।⁠ ११ ⁠।⁠।<br></strong>‘संसार में जिसकी कहीं तुलना नहीं है, वह भयानक वज्र तुम्हीं हो, तुम्हीं भयंकर गर्जना करने वाले बलाहक (प्रलयकालीन मेघ) हो। तुम्हीं सम्पूर्ण लोकों की सृष्टि और संहार करने वाले हो। तुम कभी परास्त नहीं होते ⁠।⁠।⁠ ११ ⁠।⁠।</p><p><strong>त्वं ज्योतिः सर्वभूतानां त्वमादित्यो विभावसुः ⁠।<br>त्वं महद्भूतमाश्चर्यं त्वं राजा त्वं सुरोत्तमः ⁠।⁠।⁠ १२ ⁠।⁠।<br></strong>‘तुम्हीं समस्त प्राणियों की ज्योति हो। सूर्य और <a
href="/tag/agni/">अग्नि</a> भी तुम्हीं हो। तुम आश्चर्यमय महान् भूत हो, तुम राजा हो और तुम देवताओं में सबसे श्रेष्ठ हो ⁠।⁠।⁠ १२ ⁠।⁠।</p><p><strong>त्वं विष्णुस्त्वं सहस्राक्षस्त्वं देवस्त्वं परायणम् ⁠।<br>त्वं सर्वममृतं देव त्वं सोमः परमार्चितः ⁠।⁠।⁠ १३ ⁠।⁠।<br></strong>‘तुम्हीं सर्वव्यापी विष्णु, सहस्रलोचन इन्द्र, द्युतिमान् देवता और सबके परम आश्रय हो। देव! तुम्हीं सब कुछ हो। तुम्हीं अमृत हो और तुम्हीं परमपूजित सोम हो ⁠।⁠।⁠ १३ ⁠।⁠।</p><p><strong>त्वं मुहूर्तस्तिथिस्त्वं च त्वं लवस्त्वं पुनः क्षणः ⁠।<br>शुक्लस्त्वं बहुलस्त्वं च कला काष्ठा त्रुटिस्तथा ⁠।<br>संवत्सरर्तवो मासा रजन्यश्च दिनानि च ⁠।⁠।⁠ १४ ⁠।⁠।<br></strong>‘तुम मुहूर्त हो, तुम्हीं तिथि हो, तुम्हीं लव तथा तुम्हीं क्षण हो। शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष भी तुम से भिन्न नहीं हैं। कला, काष्ठा और त्रुटि सब तुम्हारे ही स्वरूप हैं। संवत्सर, ऋतु, मास, रात्रि तथा दिन भी तुम्हीं हो ⁠।⁠।⁠ १४ ⁠।⁠।</p><p><strong>त्वमुत्तमा सगिरिवना वसुन्धरा<br>सभास्करं वितिमिरमम्बरं तथा ⁠।<br>महोदधिः सतिमितिमिंगिलस्तथा<br>महोर्मिमान् बहुमकरो झषाकुलः ⁠।⁠।⁠ १५ ⁠।⁠।<br></strong>‘तुम्हीं पर्वत और वनों सहित उत्तम वसुन्धरा हो और तुम्हीं अन्धकार रहित एवं सूर्य सहित आकाश हो। तिमि और तिमिंगिलों से भरपूर, बहुतेरे मगरों और मत्स्यों से व्याप्त तथा उत्ताल तरंगों से सुशोभित महासागर भी तुम्हीं हो ⁠।⁠।⁠ १५ ⁠।⁠।<br><br><strong>महायशास्त्वमिति सदाभिपूज्यसे<br>मनीषिभिर्मुदितमना महर्षिभिः ⁠।<br>अभिष्टुतः पिबसि च सोममध्वरे<br>वषट्कृतान्यपि च हवींषि भूतये ⁠।⁠।⁠ १६ ⁠।⁠।<br></strong>‘तुम महान् यशस्वी हो। ऐसा समझकर मनीषी पुरुष सदा तुम्हारी पूजा करते हैं। महर्षिगण निरन्तर तुम्हारा स्तवन करते हैं। तुम यजमान की अभीष्ट सिद्धि करने के लिये यज्ञ में मुदित मन से सोमरस पीते हो और वषट्कार पूर्वक समर्पित किये हुए हविष्य भी ग्रहण करते हो ⁠।⁠।⁠ १६ ⁠।⁠।</p><p><strong>त्वं विप्रैः सततमिहेज्यसे फलार्थं<br>वेदाङ्गेष्वतुलबलौघ गीयसे च ⁠।<br>त्वद्धेतोर्यजनपरायणा द्विजेन्द्रा<br>वेदाङ्गान्यभिगमयन्ति सर्वयत्नैः ⁠।⁠।⁠ १७ ⁠।⁠।<br></strong>‘इस जगत्‌ में अभीष्ट फल की प्राप्ति के लिये विप्रगण तुम्हारी पूजा करते हैं। अतुलित बल के भण्डार इन्द्र! वेदांगों में भी तुम्हारी ही महिमा का गान किया गया है। यज्ञ परायण श्रेष्ठ द्विज तुम्हारी प्राप्ति के लिये ही सर्वथा प्रयत्न करके वेदांगों का ज्ञान प्राप्त करते हैं (यहाँ कद्रू के द्वारा ईश्वर रूप से इन्द्र की स्तुति की गयी है)’ ⁠।⁠।⁠ १७ ⁠।⁠।</p><p
class="has-text-align-center"><strong>इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे पञ्चविंशोऽध्यायः ⁠।⁠।⁠ २५ ⁠।⁠।</strong><br>इस प्रकार श्री महाभारत आदिपर्व के अन्तर्गत आस्तीक पर्व में गरुड चरित्र विषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ⁠।⁠।⁠ २५ ⁠।⁠।</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=8994</guid><description><![CDATA[<p>&#8220;सूर्यदेव का कोप&#8221; नामक यह महाभारत कथा आदि पर्व के अन्तर्गत आस्तीक पर्व में आती है। यह कहानी पिछली कथा</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><em>&#8220;सूर्यदेव का कोप&#8221; नामक यह महाभारत कथा <span
style="text-decoration: underline;"><a
href="/mahabharat-adi-parv-hindi/">आदि पर्व</a></span> के अन्तर्गत <a
href="/astik-parv-chapert-5-mahabharat-hindi/">आस्तीक पर्व</a> में आती है। यह कहानी <a
href="/garud-ka-janm-chapter-23-astik-parv-mahabharat-hindi/">पिछली कथा</a> के आगे आरंभ होती है। पढ़ें क्यों आया भगवान भास्कर को क्रोध और किस तरह अरुण की सहायता से पृथ्वी की रक्षा हो सकी। पढ़ें <a
href="/surya-ashtakam-lyrics-in-hindi/">सूर्यदेव</a> का कोप नामक यह कथा हिंदी में। महाभारत के अन्य अध्याय क्रमिक रूप से पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – <a
href="/mahabharat-katha-in-hindi/"><strong>महाभारत कथा</strong></a>। </em></p><p>सौतिरुवाच<br><strong>स श्रुत्वाथात्मनो देहं सुपर्णः प्रेक्ष्य च स्वयम् ⁠।<br>शरीरप्रतिसंहारमात्मनः सम्प्रचक्रमे ॥⁠ १ ॥</strong><br><strong><a
href="/tag/ugrashrava/">उग्रश्रवा जी </a>कहते हैं—</strong>शौनकादि महर्षियो! देवताओं द्वारा की हुई स्तुति सुनकर गरुड जी ने स्वयं भी अपने शरीर की ओर दृष्टिपात किया और उसे संकुचित कर लेने की तैयारी करने लगे ॥⁠ १ ॥</p><p>सुपर्ण उवाच<br><strong>न मे सर्वाणि भूतानि विभियुर्देहदर्शनात् ⁠।<br>भीमरूपात् समुद्विग्नास्तस्मात् तेजस्तु संहरे ॥⁠ २ ॥<br>गरुड जी ने कहा—</strong>देवताओ! मेरे इस शरीर को देखने से संसार के समस्त प्राणी उस भयानक स्वरूप से उद्विग्न होकर डर न जायँ इसलिये मैं अपने तेज को समेट लेता हूँ ॥⁠ २ ॥</p><p>सौतिरुवाच<br><strong>ततः कामगमः पक्षी कामवीर्यो विहंगमः ⁠।<br>अरुणं चात्मनः पृष्ठमारोप्य स पितुर्गृहात् ॥⁠ ३ ॥<br>मातुरन्तिकमागच्छत् परं तीरं महोदधेः ⁠।<br>उग्रश्रवाजी कहते हैं—</strong>तदनन्तर इच्छानुसार चलने तथा रुचि के अनुसार पराक्रम प्रकट करने वाले पक्षी गरुड अपने भाई अरुण को पीठ पर चढ़ाकर पिता के घर से माता के घर से माता के समीप महासागर के दूसरे तट पर आये ॥⁠ ३ ॥<strong><br></strong><br><strong>तत्रारुणश्च निक्षिप्तो दिशं पूर्वां महाद्युतिः ⁠।⁠।⁠ ४ ⁠।⁠।</strong><br><strong>सूर्यस्तेजोभिरत्युग्रैर्लोकान् दग्धुमना यदा ⁠।<br></strong>जब <a
href="/surya-dev-mantra-katha-upay/">सूर्य</a> ने अपने भयंकर तेज के द्वारा सम्पूर्ण लोकों को दग्ध करने का विचार किया, उस समय गरुड जी महान् तेजस्वी अरुण को पुनः पूर्व दिशा में लाकर <a
href="/surya-bhagwan-ke-108-naam/">सूर्य</a> के समीप रख आये ॥⁠ ४ ॥</p><p>रुरुरुवाच<br><strong>किमर्थं भगवान् सूर्यो लोकान् दग्धुमनास्तदा ॥⁠ ५ ॥<br>किमस्यापहृतं देवैर्येनेमं मन्युराविशत् ⁠।</strong><br><strong>रुरु ने पूछा—</strong>पिता जी! <a
href="/surya-dev-ki-aarti/">भगवान् सूर्य</a> ने उस समय सम्पूर्ण लोकों को दग्ध कर डालने का विचार क्यों किया? देवताओं ने उनका क्या हड़प लिया था, जिससे उनके मन में क्रोध का संचार हो गया? ॥⁠ ५ ॥</p><p>प्रमतिरुवाच<br><strong>चन्द्रार्काभ्यां यदा राहुराख्यातो ह्यमृतं पिबन् ॥⁠ ६ ॥<br>वैरानुबन्धं कृतवांश्चन्द्रादित्यौ तदानघ ⁠।<br>वध्यमाने ग्रहेणाथ आदित्ये मन्युराविशत् ॥⁠ ७ ॥<br>प्रमति ने कहा—</strong>अनघ! जब राहु अमृत पी रहा था, उस समय <a
href="/chandra-dev-mantra-katha-upay/">चन्द्रमा</a> और <a
href="/surya-dev-mantra-katha-upay/">सूर्यदेव</a> ने उसका भेद बता दिया; इसीलिये उसने <a
href="/chandra-kavach/">चन्द्रमा</a> और सूर्य से भारी वैर बाँध लिया और उन्हें सताने लगा। राहु से पीड़ित होने पर सूर्य के मन में क्रोध का आवेश हुआ ॥⁠ ६-७ ॥</p><p><strong>सुरार्थाय समुत्पन्नो रोषो राहोस्तु मां प्रति ⁠।<br>बह्वनर्थकरं पापमेकोऽहं समवाप्नुयाम् ॥⁠ ८ ॥<br></strong>वे सोचने लगे, ‘देवताओं के हित के लिये ही मैंने <a
href="/rahu-dev-mantra-katha-upay/">राहु का भेद</a> खोला था जिससे मेरे प्रति राहु का रोष बढ़ गया। अब उसका अत्यन्त अनर्थकारी परिणाम दुःख के रूप में अकेले मुझे प्राप्त होता है ॥⁠ ८ ॥</p><p><strong>सहाय एव कार्येषु न च कृच्छ्रेषु दृश्यते ⁠।<br>पश्यन्ति ग्रस्यमानं मां सहन्ते वै दिवौकसः ॥⁠ ९ ॥<br></strong>‘संकट के अवसरों पर मुझे अपना कोई सहायक ही नहीं दिखायी देता। देवता लोग मुझे राहु से ग्रस्त होते देखते हैं तो भी चुपचाप सह लेते हैं ॥⁠ ९ ॥</p><p><strong>तस्माल्लोकविनाशार्थं ह्यवतिष्ठे न संशयः ⁠।<br>एवं कृतमतिः सूर्यो ह्यस्तमभ्यगमद् गिरिम् ॥⁠ १० ॥<br></strong>‘अतः सम्पूर्ण लोकों का विनाश करने के लिये निःसंदेह मैं अस्ताचल पर जाकर वहीं ठहर जाऊँगा।’ ऐसा निश्चय करके सूर्यदेव अस्ताचल को चले गये ॥⁠ १० ॥</p><p><strong>तस्माल्लोकविनाशाय संतापयत भास्करः ⁠।<br>ततो देवानुपागम्य प्रोचुरेवं महर्षयः ॥⁠ ११ ॥<br></strong>और वहीं से सूर्यदेव ने सम्पूर्ण जगत्‌ का विनाश करने के लिये सब को संताप देना आरम्भ किया। तब महर्षिगण देवताओं के पास जाकर इस प्रकार बोले— ॥⁠ ११ ॥</p><p><strong>अद्यार्धरात्रसमये सर्वलोकभयावहः ⁠।<br>उत्पत्स्यते महान् दाहस्त्रैलोक्यस्य विनाशनः ॥⁠ १२ ॥<br></strong>‘देवगण! आज आधी रात के समय सब लोकों को भयभीत करने वाला महान् दाह उत्पन्न होगा, जो तीनों लोकों का विनाश करने वाला हो सकता है’ ॥⁠ १२ ॥</p><p><strong>ततो देवाः सर्षिगणा उपगम्य पितामहम् ⁠।<br>अब्रुवन् किमिवेहाद्य महद् दाहकृतं भयम् ॥⁠ १३ ॥<br>न तावद् दृश्यते सूर्यः क्षयोऽयं प्रतिभाति च ⁠।<br>उदिते भगवन् भानौ कथमेतद् भविष्यति ॥⁠ १४ ॥<br></strong>तदनन्तर देवता ऋषियों को साथ ले <a
href="/brahma-chalisa-in-hindi/">ब्रह्मा जी</a> के पास जाकर बोले—‘भगवन्! आज यह कैसा महान् दाहजनित भय&nbsp; उपस्थित होना चाहता है? अभी सूर्य नहीं दिखायी देते तो भी ऐसी गरमी प्रतीत होती है मानो जगत्‌ का विनाश हो जायगा। फिर <a
href="/surya-chalisa-in-hindi/">सूर्योदय</a> होने पर गरमी कैसी तीव्र होगी, यह कौन कह सकता है?’ ॥⁠ १३-१४ ॥</p><p>पितामह उवाच<br><strong>एष लोकविनाशाय रविरुद्यन्तुमुद्यतः ⁠।</strong><strong><br></strong><strong>दृश्यन्नेव हि लोकान् स भस्मराशीकरिष्यति ॥⁠ १५ ॥</strong></p><p><strong>ब्रह्मा जी ने कहा—</strong>ये सूर्यदेव आज सम्पूर्ण लोकों का विनाश करने के लिये ही उद्यत होना चाहते हैं। जान पड़ता है, ये दृष्टि में आते ही सम्पूर्ण लोकों को भस्म कर देंगे ॥⁠ १५ ॥</p><p><strong>तस्य प्रतिविधानं च विहितं पूर्वमेव हि ⁠।<br>कश्यपस्य सुतो धीमानरुणेत्यभिविश्रुतः ॥⁠ १६ ॥<br></strong>किंतु उनके भीषण संताप से बचने का उपाय मैंने पहले से ही कर रखा है। महर्षि कश्यप के एक बुद्धिमान् पुत्र हैं, जो अरुण नाम से विख्यात हैं ॥⁠ १६ ॥</p><p><strong>महाकायो महातेजाः स स्थास्यति पुरो रवेः ⁠।<br>करिष्यति च सारथ्यं तेजश्चास्य हरिष्यति ॥⁠ १७ ॥<br>लोकानां स्वस्ति चैवं स्वाद् ऋषीणां च दिवौकसाम् ⁠।<br></strong>उनका शरीर विशाल है। वे महान् तेजस्वी हैं। वे ही सूर्य के आगे रथ पर बैठेंगे। उनके सारथि का कार्य करेंगे और उनके तेज का भी अपहरण करेंगे। ऐसा करने से सम्पूर्ण लोकों, <a
href="/tag/rishi/">ऋषि-महर्षियों</a> तथा देवताओं का भी कल्याण होगा ॥⁠ १७ ॥</p><p>प्रमतिरुवाच<br><strong>ततः पितामहाज्ञातः सर्वं चक्रे तदारुणः ॥⁠ १८ ॥<br>उदितश्चैव सविता ह्यरुणेन समावृतः ⁠।<br>एतत् ते सर्वमाख्यातं यत् सूर्यं मन्युराविशत् ॥⁠ १९ ॥<br></strong>प्रमति कहते हैं—तत्पश्चात् <a
href="/brahma-chalisa-in-hindi/">पितामह ब्रह्माजी </a>की आज्ञा से अरुण ने उस समय सब कार्य उसी प्रकार किया। <a
href="/adityahriday-stotra-lyrics-hindi-pdf/">सूर्य अरुण</a> से आवृत होकर उदित हुए। वत्स! सूर्य के मन में क्यों क्रोध का आवेश हुआ था, इस प्रश्न के उत्तर में मैंने ये सब बातें कही हैं ।⁠।⁠ १८-१९ ॥</p><p><strong>अरुणश्च यथैवास्य सारथ्यमकरोत् प्रभुः ⁠।<br>भूय एवापरं प्रश्नं शृणु पूर्वमुदाहृतम् ॥⁠ २० ॥<br></strong>शक्तिशाली अरुण ने सूर्य के सारथि का कार्य क्यों किया, यह बात भी इस प्रसंग में स्पष्ट हो गयी है। अब अपने पूर्व कथित दूसरे प्रश्न का पुनः उत्तर सुनो ॥⁠ २० ॥</p><p
class="has-text-align-center"><strong>इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥⁠ २४ ॥</strong><br>इस प्रकार श्री महाभारत आदिपर्व के अन्तर्गत आस्तीकपर्व में गरुड चरित्र विषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥⁠ २४ ॥</p><p>The post <a
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isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=8992</guid><description><![CDATA[<p>&#8220;गरुड का जन्म&#8221; नामक यह महाभारत कथा आदि पर्व के अन्तर्गत आस्तीक पर्व में आती है। पढ़ें समुद्र के दर्शन</p><p>The post <a
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rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><em>&#8220;गरुड का जन्म&#8221; नामक यह महाभारत कथा <a
href="/mahabharat-adi-parv-hindi/">आदि पर्व</a> के अन्तर्गत <a
href="/astik-parv-chapert-5-mahabharat-hindi/">आस्तीक पर्व</a> में आती है। पढ़ें <a
href="https://hindipath.com/samudra-darshan-ki-katha-chapter-22-astik-parv-mahabharat-hindi/">समुद्र के दर्शन</a> के पश्चात कद्रू की चाल से किस तरह विनता बाजी हार गयी तथा किस प्रकार महापराक्रमी गरुड का जन्म हुआ। साथ ही जानें कि किस तरह देवताओं और ऋषियों ने उन्हें शांत किया। पढ़ें गरुड का जन्म नामक यह कथा। महाभारत के अन्य अध्याय हिंदी में पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – <a
href="/mahabharat-katha-in-hindi/"><strong>महाभारत कथा</strong></a>। </em></p><p>सौतिरुवाच<br><strong>तं समुद्रमतिक्रम्य कद्रूर्विनतया सह ⁠।<br>न्यपतत् तुरगाभ्याशे नचिरादिव शीघ्रगा ⁠॥ १ ⁠॥<br>ततस्ते तं हयश्रेष्ठं ददृशाते महाजवम् ⁠।<br>शशाङ्ककिरणप्रख्यं कालवालमुभे तदा ⁠॥ २ ⁠॥</strong><br><strong><a
href="/tag/ugrashrava/">उग्रश्रवा जी </a>कहते हैं—</strong>शौनक! तदनन्तर शीघ्रगामिनी कद्रू विनता के साथ उस समुद्र को लाँघकर तुरंत ही उच्चैःश्रवा घोड़े के पास पहुँच गयीं। उस समय <a
href="/chandra-dev-mantra-katha-upay/">चन्द्रमा की किरणों</a> के समान श्वेत वर्ण वाले उस महान् वेगशाली श्रेष्ठ अश्व को उन दोनों ने काली पूँछ वाला देखा ⁠॥ १-२ ⁠॥</p><p><strong>निशम्य च बहून् बालान् कृष्णान् पुच्छसमाश्रितान् ⁠।<br>विषण्णरूपां विनतां कद्रूर्दास्ये न्ययोजयत् ⁠॥ ३ ⁠॥<br></strong>पूँछ के घनीभूत बालों को काले रंग का देखकर विनता विषाद की मूर्ति बन गयी और कद्रू ने उसे अपनी दासी के काम में लगा दिया ⁠॥ ३ ⁠॥</p><p><strong>ततः सा विनता तस्मिन् पणितेन पराजिता ⁠।<br>अभवद् दुःखसंतप्ता दासीभावं समास्थिता ⁠॥ ४ ⁠॥<br></strong>पहले की लगायी हुई बाजी हार कर विनता उस स्थान पर दुःख से संतप्त हो उठी और उसने दासीभाव स्वीकार कर लिया ⁠॥ ४ ⁠॥</p><p><strong>एतस्मिन्नन्तरे चापि गरुडः काल आगते ⁠।<br>विना मात्रा महातेजा विदार्याण्डमजायत ⁠॥ ५ ⁠॥<br></strong>इसी बीच में समय पूरा होने पर महातेजस्वी गरुड माता की सहायता के बिना ही अण्डा फोड़कर बाहर निकल आये ⁠॥ ५ ⁠॥</p><p><strong>महासत्त्वबलोपेतः सर्वा विद्योतयन् दिशः ⁠।<br>कामरूपः कामगमः कामवीर्यो विहंगमः ⁠॥ ६ ⁠॥<br></strong>वे महान् साहस और पराक्रम से सम्पन्न थे। अपने तेज से सम्पूर्ण दिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे। उनमें इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति थी। वे जहाँ जितनी जल्दी जाना चाहें जा सकते थे और अपनी रुचि के अनुसार पराक्रम दिखला सकते थे। उनका प्राकट्य आकाशचारी पक्षी के रूप में हुआ था ⁠॥ ६ ⁠॥</p><p><strong>अग्निराशिरिवोद्‌भासन् समिद्धोऽतिभयंकरः ⁠।<br>विद्युद्विस्पष्टपिङ्गाक्षो युगान्ताग्निसमप्रभः ⁠॥ ७ ⁠॥<br></strong>वे <a
href="/tag/agni/">प्रज्वलित अग्नि-पुंज</a> के समान उद्भासित होकर अत्यन्त भयंकर जान पड़ते थे। उनकी आँखें बिजली के समान चमकने वाली और पिंगल वर्ण की थीं। वे प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित एवं प्रकाशित हो रहे थे ⁠॥ ७ ⁠॥</p><p><strong>प्रवृद्धः सहसा पक्षी महाकायो नभोगतः ⁠।<br>घोरो घोरस्वनो रौद्रो वह्निरौर्व इवापरः ⁠॥ ८ ⁠॥<br></strong>उनका शरीर थोड़ी ही देर में बढ़कर विशाल हो गया। पक्षी गरुड आकाश में उड़ चले। वे स्वयं तो भयंकर थे ही, उनकी आवाज भी बड़ी भयानक थी। वे दूसरे बड़वानल की भाँति बड़े भीषण जान पड़ते थे ⁠॥ ८ ⁠॥</p><p><strong>तं दृष्ट्वा शरणं जग्मुर्देवाः सर्वे विभावसुम् ⁠।<br>प्रणिपत्याब्रुवंश्चैनमासीनं विश्वरूपिणम् ⁠॥ ९ ⁠॥<br></strong>उन्हें देखकर सब देवता विश्वरूपधारी अग्नि देव की शरण में गये और उन्हें प्रणाम करके बैठे हुए उन अग्नि देव से इस प्रकार बोले— ⁠॥ ९ ⁠॥</p><p><strong>अग्ने मा त्वं प्रवर्धिष्ठाः कच्चिन्नो न दिधक्षसि ⁠।<br>असौ हि राशिः सुमहान् समिद्धस्तव सर्पति ⁠॥ १० ⁠॥<br></strong>‘अग्ने! आप इस प्रकार न बढ़ें। आप हम लोगों को जलाकर भस्म तो नहीं कर डालना चाहते हैं? देखिये, वह आपका महान्, प्रज्वलित तेजःपुंज इधर ही फैलता आ रहा है’ ⁠॥ १० ⁠॥</p><p>अग्निरुवाच<br><strong>नैतदेवं यथा यूयं मन्यध्वमसुरार्दनाः ⁠।<br>गरुडो बलवानेष मम तुल्यश्च तेजसा ⁠॥ ११ ⁠॥</strong><br><strong>अग्नि देव ने कहा—</strong>असुर विनाशक देवताओ! तुम जैसा समझ रहे हो, वैसी बात नहीं है। ये महाबली गरुड हैं, जो तेज में मेरे ही तुल्य हैं ⁠॥ ११ ⁠॥</p><p><strong>जातः परमतेजस्वी विनतानन्दवर्धनः।<br>तेजोराशिमिमं दृष्ट्वा युष्मान् मोहः समाविशत् ⁠॥ १२ ⁠॥<br></strong><a
href="/tag/vinata/">विनता</a> का आनन्द बढ़ाने वाले ये परम तेजस्वी गरुड इसी रूप में उत्पन्न हुए हैं। तेज के पुंज रूप इन गरुड को देखकर ही तुम लोगों पर मोह छा गया है ⁠॥ १२ ⁠॥</p><p><strong>नागक्षयकरश्चैव काश्यपेयो महाबलः ⁠।<br>देवानां च हिते युक्तस्त्वहितो दैत्यरक्षसाम् ⁠॥ १३ ⁠॥<br></strong>कश्यपनन्दन महाबली गरुड <a
href="/tag/sarp/">नागों</a> के विनाशक, देवताओं के हितैषी और दैत्यों तथा राक्षसों के शत्रु हैं ⁠॥ १३ ⁠॥&nbsp;</p><p><strong>न भीः कार्या कथं चात्र पश्यध्वं सहिता मम ⁠।<br>एवमुक्तास्तदा गत्वा गरुडं वाग्भिरस्तुवन् ⁠॥ १४ ⁠॥<br>ते दूसदभ्युपेत्यैनं देवाः सर्षिगणास्तदा ⁠।<br></strong>इनसे किसी प्रकार का भय नहीं करना चाहिये। तुम मेरे साथ चलकर इनका दर्शन करो। अग्नि देव के ऐसा कहने पर उस समय देवताओं तथा <a
href="/tag/rishi/">ऋषियों</a> ने गरुड के पास जाकर अपनी वाणी द्वारा उनका इस प्रकार स्तवन किया (यहाँ परमात्मा के रूप में गरुड की स्तुति की गयी है) ⁠॥ १४ ⁠॥</p><p>देवा ऊचुः<br><strong>त्वमृषिस्त्वं महाभागस्त्वं देवः पतगेश्वरः ⁠॥ १५ ⁠॥<br>देवता बोले—</strong>प्रभो! आप मन्त्रद्रष्टा ऋषि हैं; आप ही महाभाग देवता तथा आप ही पतगेश्वर (पक्षियों तथा जीवों के स्वामी) हैं ⁠॥ १५ ⁠॥</p><p><strong>त्वं प्रभुस्तपनः सूर्यः परमेष्ठी प्रजापतिः ⁠।<br>त्वमिन्द्रस्त्वं हयमुखस्त्वं शर्वस्त्वं जगत्पतिः ⁠॥ १६ ⁠॥<br></strong>आप ही प्रभु, तपन, <a
href="/surya-dev-mantra-katha-upay/">सूर्य</a>, परमेष्ठी तथा प्रजापति हैं। आप ही इन्द्र हैं, आप ही हयग्रीव हैं, आप ही <a
href="/shiv-chalisa-lyrics-in-hindi-pdf/">शिव</a> हैं तथा आप ही जगत्‌ के स्वामी हैं ⁠॥ १६ ⁠॥</p><p><strong>त्वं मुखं पद्मजो विप्रस्त्वमग्निः पवनस्तथा ⁠।<br>त्वं हि धाता विधाता च त्वं विष्णुः सुरसत्तमः ⁠॥ १७ ⁠॥<br></strong>आप ही भगवान्‌ के मुख स्वरूप ब्राह्मण, <a
href="/brahma-chalisa-in-hindi/">पद्मयोनि ब्रह्मा</a> और विज्ञानवान् विप्र हैं, आप ही अग्नि तथा वायु हैं, आप ही धाता, विधाता और <a
href="/vishnu-chalisa-in-hindi/">देवश्रेष्ठ विष्णु</a> हैं ⁠॥ १७ ⁠॥</p><p><strong>त्वं महानभिभूः शश्वदमृतं त्वं महद् यशः ⁠।<br>त्वं प्रभास्त्वमभिप्रेतं त्वं नस्त्राणमनुत्तमम् ⁠॥ १८ ⁠॥<br></strong>आप ही महत्तत्त्व और अहंकार हैं। आप ही सनातन, अमृत और महान् यश हैं। आप ही प्रभा और आप ही अभीष्ट पदार्थ हैं। आप ही हम लोगों के सर्वोत्तम रक्षक हैं ⁠॥ १८ ⁠॥</p><p><strong>बलोर्मिमान् साधुरदीनसत्त्वः<br>समृद्धिमान् दुर्विषहस्त्वमेव ⁠।<br>त्वत्तः सृतं सर्वमहीनकीर्ते<br>ह्यनागतं चोपगतं च सर्वम् ⁠॥ १९ ⁠॥<br></strong>आप बल के सागर और साधु पुरुष हैं। आपमें उदार सत्त्वगुण विराजमान है। आप महान् ऐश्वर्यशाली हैं। युद्ध में आपके वेग को सह लेना सभी के लिये सर्वथा कठिन है। पुण्यश्लोक! यह सम्पूर्ण जगत् आप से ही प्रकट हुआ है। भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ आप ही हैं ⁠॥ १९ ⁠॥</p><p><strong>त्वमुत्तमः सर्वमिदं चराचरं<br>गभस्तिभिर्भानुरिवावभाससे ⁠।<br>समाक्षिपन् भानुमतः प्रभां मुहु-<br>स्त्वमन्तकः सर्वमिदं ध्रुवाध्रुवम् ⁠॥ २० ⁠॥<br></strong>आप उत्तम हैं। जैसे सूर्य अपनी किरणों से सबको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार आप इस सम्पूर्ण जगत्‌ को प्रकाशित करते हैं। आप ही सबका अन्त करने वाले काल हैं और बारम्बार सूर्य की प्रभा का उपसंहार करते हुए इस समस्त क्षर और अक्षर रूप जगत्‌ का संहार करते हैं ⁠॥ २० ⁠॥</p><p><strong>दिवाकरः परिकुपितो यथा दहेत्<br>प्रजास्तथा दहसि हुताशनप्रभ ⁠।<br>भयंकरः प्रलय इवाग्निरुत्थितो<br>विनाशयन् युगपरिवर्तनान्तकृत् ⁠॥ २१ ⁠॥<br></strong>अग्नि के समान प्रकाशित होने वाले देव! जैसे <span
style="text-decoration: underline;">सूर्य</span> क्रुद्ध होने पर सबको जला सकते हैं, उसी प्रकार आप भी कुपित होने पर सम्पूर्ण प्रजा को दग्ध कर डालते हैं। आप युगान्तकारी काल के भी काल हैं और प्रलयकाल में सबका विनाश करनेके लिये भयंकर संवर्तकाग्नि के रूप में प्रकट होते हैं ⁠॥ २१ ⁠॥</p><p><strong>खगेश्वरं शरणमुपागता वयं<br>महौजसं ज्वलनसमानवर्चसम् ⁠।<br>तडित्प्रभं वितिमिरमभ्रगोचरं<br>महाबलं गरुडमुपेत्य खेचरम् ⁠॥ २२ ⁠॥<br></strong>आप सम्पूर्ण पक्षियों एवं जीवों के अधीश्वर हैं। आप का ओज महान् है। आप अग्नि के समान तेजस्वी हैं। आप बिजली के समान प्रकाशित होते हैं। आपके द्वारा अज्ञान पुंज का निवारण होता है। आप आकाश में मेघों की भाँति विचरने वाले महापराक्रमी गरुड हैं। हम यहाँ आकर आपके शरणागत हो रहे हैं ⁠॥ २२ ⁠॥<br><br><strong>परावरं वरदमजय्यविक्रमं<br>तवौजसा सर्वमिदं प्रतापितम् ⁠।<br>जगत्प्रभो तप्तसुवर्णवर्चसा<br>त्वं पाहि सर्वांश्च सुरान् महात्मनः ⁠॥ २३ ⁠॥</strong><br>आप ही कार्य और कारण रूप हैं। आप से ही सबको वर मिलता है। आपका पराक्रम अजेय है। आपके तेज से यह सम्पूर्ण जगत् संतप्त हो उठा है। जगदीश्वर! आप तपाये हुए सुवर्ण के समान अपने दिव्य तेज से सम्पूर्ण देवताओं और महात्मा पुरुषों की रक्षा करें ⁠॥ २३ ⁠॥</p><p><strong>भयान्विता नभसि विमानगामिनो<br>विमानिता विपथगतिं प्रयान्ति ते ⁠।<br>ऋषेः सुतस्त्वमसि दयावतः प्रभो<br>महात्मनः खगवर कश्यपस्य ह ⁠॥ २४ ⁠॥<br></strong>पक्षिराज! प्रभो! विमान पर चलने वाले देवता आपके तेज से तिरस्कृत एवं भयभीत हो आकाश में पथभ्रष्ट हो जाते हैं। आप दयालु महात्मा महर्षि कश्यप के पुत्र हैं ⁠॥ २४ ⁠॥</p><p><strong>स मा क्रुधः कुरु जगतो दयां परां<br>त्वमीश्वरः प्रशममुपैहि पाहि नः ⁠।<br>महाशनिस्फुरितसमस्वनेन ते<br>दिशोऽम्बरं त्रिदिवमियं च मेदिनी ⁠॥ २५ ⁠॥<br>चलन्ति नः खग हृदयानि चानिशं<br>निगृह्यतां वपुरिदमग्निसंनिभम् ⁠।<br>तव द्युतिं कुपितकृतान्तसंनिभां<br>निशम्य नश्चलति मनोऽव्यवस्थितम् ⁠।<br>प्रसीद नः पतगपते प्रयाचतां<br>शिवश्च नो भव भगवन् सुखावहः ⁠॥ २६ ⁠॥<br></strong>प्रभो! आप कुपित न हों, सम्पूर्ण जगत्‌ पर उत्तम दया का विस्तार करें। आप ईश्वर हैं, अतः शान्ति धारण करें और हम सबकी रक्षा करें। महान् वज्र की गड़गड़ाहट के समान आपकी गर्जना से सम्पूर्ण दिशाएँ, आकाश, स्वर्ग तथा यह पृथ्वी सब-के-सब विचलित हो उठे हैं और हमारा हृदय भी निरन्तर काँपता रहता है। अतः खगश्रेष्ठ! आप अग्नि के समान तेजस्वी अपने इस भयंकर रूप को शान्त कीजिये। क्रोध में भरे हुए <a
href="/dharmraj-ji-ki-aarti/">यमराज</a> के समान आपकी उग्र कान्ति देखकर हमारा मन अस्थिर एवं चंचल हो जाता है। आप हम याचकों पर प्रसन्न होइये। भगवन्! आप हमारे लिये कल्याण स्वरूप और सुखदायक हो जाइये ⁠॥ २५-२६ ⁠॥</p><p><strong>एवं स्तुतः सुपर्णस्तु देवैः सर्षिगणैस्तदा ⁠।<br>तेजसः प्रतिसंहारमात्मनः स चकार ह ⁠॥ २७ ॥<br></strong>ऋषियों सहित देवताओं के इस प्रकार स्तुति करने पर उत्तम पंखों वाले गरुड ने उस समय अपने तेज को समेट लिया ⁠॥ २७ ⁠॥</p><p
class="has-text-align-center"><strong>इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे त्रयोविंशोऽध्यायः ⁠॥ २३ ⁠॥</strong><br>इस प्रकार श्री महाभारत आदिपर्व के अन्तर्गत आस्तीकपर्व में गरुड चरित्र विषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ⁠॥ २३ ⁠॥</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/garud-ka-janm-chapter-23-astik-parv-mahabharat-hindi/">गरुड का जन्म – महाभारत का तेईसवाँ अध्याय (आस्तीक पर्व)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></content:encoded> <wfw:commentRss>https://hindipath.com/garud-ka-janm-chapter-23-astik-parv-mahabharat-hindi/feed/</wfw:commentRss> <slash:comments>0</slash:comments> </item> <item><title>कश्यप के पुत्रों की उत्पत्ति – महाभारत का सोलहवाँ अध्याय (आस्तीक पर्व)</title><link>https://hindipath.com/kashyap-ke-putro-ki-utpatti-chapter-16-astik-parv-mahabharat-hindi/</link> <comments>https://hindipath.com/kashyap-ke-putro-ki-utpatti-chapter-16-astik-parv-mahabharat-hindi/#respond</comments> <dc:creator><![CDATA[सन्दीप शाह]]></dc:creator> <pubDate>Fri, 22 Oct 2021 12:20:29 +0000</pubDate> <category><![CDATA[ग्रंथ]]></category> <category><![CDATA[धर्म]]></category> <category><![CDATA[Arun]]></category> <category><![CDATA[Garud]]></category> <category><![CDATA[Kadru]]></category> <category><![CDATA[Kashyap]]></category> <category><![CDATA[Vinata]]></category> <guid
isPermaLink="false">https://hindipath.com/?p=8839</guid><description><![CDATA[<p>&#8220;कश्यप के पुत्रों की उत्पत्ति&#8221; नामक यह कथा महाभारत के आदि पर्व के अन्तर्गत आस्तीक पर्व में आती है। इसमें</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/kashyap-ke-putro-ki-utpatti-chapter-16-astik-parv-mahabharat-hindi/">कश्यप के पुत्रों की उत्पत्ति – महाभारत का सोलहवाँ अध्याय (आस्तीक पर्व)</a> appeared first on <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com">हिंदी पथ</a>.</p> ]]></description> <content:encoded><![CDATA[<p><em>&#8220;कश्यप के पुत्रों की उत्पत्ति&#8221; नामक यह कथा महाभारत के <a
href="/mahabharat-adi-parv-hindi/">आदि पर्व</a> के अन्तर्गत <a
href="/astik-parv-chapert-5-mahabharat-hindi/">आस्तीक पर्व</a> में आती है। इसमें <a
href="/astik-ka-janm-chapter-15-astik-parv-mahabharat-hindi/">पिछले अध्याय की कथा</a> को विस्तार दिया गया है। इस अध्याय में उनकी प्रथम पत्नी कद्रू से हज़ार नागों के पैदा होने और द्वितीय पत्नी विनता से अरुण व गरुड नामक दो पुत्रों की उत्पत्ति की कहानी है। कश्यप के पुत्रों की उत्पत्ति ही आगे चलकर जनमेजय के सर्प-यज्ञ की कथा से जुड़ती है। पढ़ें &#8220;कश्यप के पुत्रों की उत्पत्ति&#8221; कथा। शेष महाभारत पढ़ने के लिए कृपया यहाँ देखें – <a
href="/mahabharat-katha-in-hindi/"><strong>महाभारत की कथा</strong></a>।</em></p><p>शौनक उवाच<br><strong>सौते त्वं कथयस्वेमां विस्तरेण कथां पुनः ⁠।<br>आस्तीकस्य कवेः साधोः शुश्रूषा परमा हि नः॥⁠ १॥<br>शौनक जी बोले—</strong><a
href="/tag/ugrashrava/">सूतनन्दन</a>! आप ज्ञानी महात्मा <a
href="/tag/astik/">आस्तीक की इस कथा</a> को पुनः विस्तार के साथ कहिये। हमें उसे सुनने के लिये बड़ी उत्कण्ठा है॥⁠ १॥</p><p><strong>मधुरं कथ्यते सौम्य श्लक्ष्णाक्षरपदं त्वया ⁠।<br>प्रीयामहे भृशं तात पितेवेदं प्रभाषसे॥⁠ २॥<br></strong>सौम्य! आप बड़ी मधुर कथा कहते हैं। उसका एक-एक अक्षर और एक-एक पद कोमल है। तात! इसे सुनकर हमें बड़ी प्रसन्नता होती है। आप अपने पिता लोमहर्षण की भाँति ही प्रवचन कर रहे हैं॥⁠ २॥</p><p><strong>अस्मच्छुश्रूषणे नित्यं पिता हि निरतस्तव ⁠।<br>आचष्टैतद् यथाख्यानं पिता ते त्वं तथा वद॥⁠ ३॥<br></strong>आपके पिता सदा हम लोगों की सेवा में लगे रहते थे। उन्होंने इस उपाख्यान को जिस प्रकार कहा है, उसी रूप में आप भी कहिये॥⁠ ३॥</p><p>सौतिरुवाच<br><strong>आयुष्मन्निदमाख्यानमास्तीकं कथयामि ते ⁠।<br>यथाश्रुतं कथयतः सकाशाद् वै पितुर्मया॥⁠ ४॥<br>उग्रश्रवा जी ने कहा—</strong>आयुष्मन्! मैंने अपने कथा वाचक पिता जी के मुख से यह आस्तीक की कथा जिस रूप में सुनी है, उसी प्रकार आप से कहता हूँ॥⁠ ४॥</p><p><strong>पुरा देवयुगे ब्रह्मन् प्रजापतिसुते शुभे ⁠।<br>आस्तां भगिन्यौ रूपेण समुपेतेऽद्भुतेऽनघ॥⁠ ५॥<br>ते भार्ये कश्यपस्यास्तां कद्रूश्च विनता च ह ⁠।<br>प्रादात् ताभ्यां वरं प्रीतः प्रजापतिसमः पतिः॥⁠ ६॥<br>कश्यपो धर्मपत्नीभ्यां मुदा परमया युतः ⁠।<br>वरातिसर्गं श्रुत्वैवं कश्यपादुत्तमं च ते॥⁠ ७॥<br>हर्षादप्रतिमां प्रीतिं प्रापतुः स्म वरस्त्रियौ ⁠।<br>वव्रे कद्रूः सुतान् नागान् सहस्रं तुल्यवर्चसः॥⁠ ८॥<br></strong>ब्रह्मन्! पहले सत्ययुग में दक्ष प्रजापति की दो शुभ लक्षणा कन्याएँ थीं—कद्रू और विनता। वे दोनों बहिनें रूप-सौन्दर्य से सम्पन्न तथा अद्भुत थीं। अनघ! उन दोनों का विवाह महर्षि कश्यप जी के साथ हुआ था। एक दिन <a
href="/brahma-ji-ki-aarti/">प्रजापति ब्रह्मा जी</a> के समान शक्तिशाली पति महर्षि कश्यप ने अत्यन्त हर्ष में भरकर अपनी उन दोनों धर्म पत्नियों को प्रसन्नता पूर्वक वर देते हुए कहा—‘तुममें से जिसकी जो इच्छा हो वर माँग लो।’ इस प्रकार कश्यप जी से उत्तम वरदान मिलने की बात सुनकर प्रसन्नता के कारण उन दोनों सुन्दरी स्त्रियों को अनुपम आनन्द प्राप्त हुआ। कद्रू ने समान तेजस्वी एक हजार नागों को पुत्र रूप में पाने का वर माँगा॥⁠ ५—८॥</p><p><strong>द्वौ पुत्रौ विनता वव्रे कद्रूपुत्राधिकौ बले ⁠।<br>तेजसा वपुषा चैव विक्रमेणाधिकौ च तौ॥⁠ ९॥<br></strong>विनता ने बल, तेज, शरीर तथा पराक्रम में कद्रू के पुत्रों से श्रेष्ठ केवल दो ही पुत्र माँगे॥⁠ ९॥</p><p><strong>तस्यै भर्ता वरं प्रादादत्यर्थं पुत्रमीप्सितम् ⁠।<br>एवमस्त्विति तं चाह कश्यपं विनता तदा॥⁠ १०॥<br></strong>विनता को पतिदेव ने अत्यन्त अभीष्ट दो पुत्रों के होने का वरदान दे दिया। उस समय विनता ने कश्यपजी से ‘एवमस्तु‘ कहकर उनके दिये हुए वर को शिरोधार्य किया॥⁠ १०॥</p><p><strong>यथावत् प्रार्थितं लब्ध्वा वरं तुष्टाभवत् तदा ⁠।<br>कृतकृत्या तु विनता लब्ध्वा वीर्याधिकौ सुतौ॥⁠ ११॥<br></strong>अपनी <a
href="/bhakti-yog-prarthana-swami-vivekanand/">प्रार्थना</a> के अनुसार ठीक वर पाकर वह बहुत प्रसन्न हुई। कद्रू के पुत्रों से अधिक बलवान् और पराक्रमी—दो पुत्रों के होने का वर प्राप्त करके विनता अपने को कृतकृत्य मानने लगी॥⁠ ११॥</p><p><strong>कद्रूश्च लब्ध्वा पुत्राणां सहस्रं तुल्यवर्चसाम् ⁠।<br>धार्यौ प्रयत्नतो गर्भावित्युक्त्वा स महातपाः॥⁠ १२॥<br>ते भार्ये वरसंतुष्टे कश्यपो वनमाविशत् ⁠।<br></strong>समान तेजस्वी एक हजार पुत्र होने का वर पाकर कद्रू भी अपना मनोरथ सिद्ध हुआ समझने लगी। वरदान पाकर संतुष्ट हुई अपनी उन धर्म पत्नियों से यह कहकर कि ‘तुम दोनों यत्न पूर्वक अपने-अपने गर्भ की रक्षा करना’ महातपस्वी कश्यप जी वन में चले गये॥⁠ १२॥</p><p>सौतिरुवाच<br><strong>कालेन महता कद्रूरण्डानां दशतीर्दश॥⁠ १३॥<br>जनयामास विप्रेन्द्र द्वे चाण्डे विनता तदा ⁠।<br>उग्रश्रवा जी ने कहा—</strong>ब्रह्मन्! तदनन्तर दीर्घ काल के पश्चात् कद्रू ने एक हजार और विनता ने दो अण्डे दिये॥⁠ १३॥</p><p><strong>तयोरण्डानि निदधुः प्रहृष्टाः परिचारिकाः॥⁠ १४॥<br>सोपस्वेदेषु भाण्डेषु पञ्चवर्षशतानि च ⁠।<br>ततः पञ्चशते काले कद्रूपुत्रा विनिःसृताः॥⁠ १५॥<br>अण्डाभ्यां विनतायास्तु मिथुनं न व्यदृश्यत ⁠।<br></strong>दासियों ने अत्यन्त प्रसन्न होकर दोनों के अण्डों को गरम बर्तनों में रख दिया। वे अण्डे पाँच सौ वर्षों तक उन्हीं बर्तनों में पड़े रहे। तत्पश्चात् पाँच सौ वर्ष पूरे होने पर कद्रू के एक हजार पुत्र अण्डों को फोड़कर बाहर निकल आये; परंतु विनता के अण्डों से उसके दो बच्चे निकलते नहीं दिखायी दिये॥⁠ १४-१५॥<br><br><strong>ततः पुत्रार्थिनी देवी व्रीडिता च तपस्विनी॥⁠ १६॥</strong><br><strong>अण्डं बिभेद विनता तत्र पुत्रमपश्यत ⁠।<br>पूर्वार्धकायसम्पन्नमितरेणाप्रकाशता॥⁠ १७॥<br></strong>इससे पुत्रार्थिनी और तपस्विनी देवी विनता सौत के सामने लज्जित हो गयी। फिर उसने अपने हाथों से एक अण्डा फोड़ डाला। फूटने पर उस अण्डे में विनता ने अपने पुत्र को देखा, उसके शरीर का ऊपरी भाग पूर्ण रूप से विकसित एवं पुष्ट था, किंतु नीचे का आधा अंग अभी अधूरा रह गया था॥⁠ १६-१७॥<br><br><strong>स पुत्रः क्रोधसंरब्धः शशापैनामिति श्रुतिः ⁠।<br>योऽहमेवं कृतो मातस्त्वया लोभपरीतया॥⁠ १८॥<br>शरीरेणासमग्रेण तस्माद् दासी भविष्यसि ⁠।<br>पञ्चवर्षशतान्यस्या यया विस्पर्धसे सह॥⁠ १९॥<br></strong>सुना जाता है, उस पुत्र ने क्रोध के आवेश में आकर विनता को शाप दे दिया—‘माँ! तूने लोभ के वशीभूत होकर मुझे इस प्रकार अधूरे शरीर का बना दिया—मेरे समस्त अंगों को पूर्णतः विकसित एवं पुष्ट नहीं होने दिया; इसलिये जिस सौत के साथ तू लाग-डाँट रखती है, उसी की पाँच सौ वर्षों तक दासी बनी रहेगी॥⁠ १८-१९॥</p><p><strong>एष च त्वां सुतो मातर्दासीत्वान्मोचयिष्यति ⁠।<br>यद्येनमपि मातस्त्वं मामिवाण्डविभेदनात्॥⁠ २०॥<br>न करिष्यस्यनङ्गं वा व्यङ्गं वापि तपस्विनम् ⁠।<br></strong>‘और माँ! यह जो दूसरे अण्डे में तेरा पुत्र है, यही तुझे दासीभाव से छुटकारा दिलायेगा; किंतु माता! ऐसा तभी हो सकता है जब तू इस तपस्वी पुत्र को मेरी ही तरह अण्डा फोड़कर अंगहीन या अधूरे अंगों से युक्त न बना देगी॥⁠ २०॥</p><p><strong>प्रतिपालयितव्यस्ते जन्मकालोऽस्य धीरया॥⁠ २१॥<br>विशिष्टं बलमीप्सन्त्या पञ्चवर्षशतात् परः ⁠।<br></strong>‘इसलिये यदि तू इस बालक को विशेष बलवान् बनाना चाहती है तो पाँच सौ वर्ष के बाद तक तुझे धैर्य धारण करके इसके जन्म की प्रतीक्षा करनी चाहिये’॥⁠ २१॥</p><p><strong>एवं शप्त्वा ततः पुत्रो विनतामन्तरिक्षगः॥⁠ २२॥<br>अरुणो दृश्यते ब्रह्मन् प्रभातसमये सदा ⁠।<br>आदित्यरथमध्यास्ते सारथ्यं समकल्पयत्॥⁠ २३॥</strong><br>इस प्रकार विनता को शाप देकर वह बालक अरुण अन्तरिक्ष में उड़ गया। ब्रह्मन्! तभी से प्रातःकाल (प्राची दिशा में) सदा जो लाली दिखायी देती है, उसके रूप में विनता के पुत्र अरुण का ही दर्शन होता है। वह <a
href="/surya-dev-mantra-katha-upay/">सूर्य देव</a> के रथपर जा बैठा और उनके सारथि का काम सँभालने लगा॥⁠ २२-२३॥</p><p><strong>गरुडोऽपि यथाकालं जज्ञे पन्नगभोजनः ⁠।<br>स जातमात्रो विनतां परित्यज्य खमाविशत्॥⁠ २४॥<br>आदास्यन्नात्मनो भोज्यमन्नं विहितमस्य यत् ⁠।<br>विधात्रा भृगुशार्दूल क्षुधितः पतगेश्वरः॥⁠ २५॥<br></strong>तदनन्तर समय पूरा होने पर सर्प संहारक गरुड़ का जन्म हुआ। भृगुश्रेष्ठ! पक्षिराज गरुड जन्म लेते ही क्षुधा से व्याकुल हो गये और विधाता ने उनके लिये जो आहार नियत किया था, अपने उस भोज्य पदार्थ को प्राप्त करने के लिये माता विनता को छोड़कर आकाश में उड़ गये॥⁠ २४-२५॥</p><p
class="has-text-align-center"><strong>इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पादीनामुत्पत्तौ षोडशोऽध्यायः॥⁠ १६॥</strong><br>इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्व के अन्तर्गत आस्तीक पर्व में सर्प आदिकी उत्पत्ति से सम्बन्ध रखने वाला सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥⁠ १६॥</p><p>The post <a
rel="nofollow" href="https://hindipath.com/kashyap-ke-putro-ki-utpatti-chapter-16-astik-parv-mahabharat-hindi/">कश्यप के पुत्रों की उत्पत्ति – महाभारत का सोलहवाँ अध्याय (आस्तीक पर्व)</a> appeared first on <a
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