अकबर और बीरबल की जोड़ी – भूमिका

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प्राचीन काल के राजदरबारों में जहाँ सब प्रकार के गुणियों का आदर रहता था, वहाँ एकाध ऐसे भी हास्यरस कुशल कुशाग्रबुद्धि पुरुषरत्नों का प्रवेश रहता था जो समय-समय पर विलक्षण बुद्धि एवं वचनचातुरी से राजाओं को मोह लेते थे और अपनी वचनचातुरी से स्वामी को वश में कर लेते थे।

राजा बीरबल और बादशाह अकबर का ऐसा ही सम्बन्ध रहा है। अकबर और बीरबल की जोड़ी अपने आप में ख़ास थी। अकबर के दरबार में या यों कहिए कि अकबरी राजसभा के नौरत्नों में बीरबल कोहिनूर हीरा थे। लड़कपन से ही बीरबल अकबर के साथ थे और दोनों में ऐसा हँसी मज़ाक़ हुआ करता था, जैसा दो लैंगोटिये यारों में होता है।

बीरबल जी केवल हँसोड़ थे सो नहीं। वे अच्छे शूर, सामन्त, कवि, पण्डित और समाचातुर वीर-नर थे। बीरबल दानी भी बड़े थे और हाज़िरजवाबी में तो अपना सानी नहीं रखते थे। बादशाह अकबर बीरबल को प्राणों से भी अधिक प्रिय मानते थे और क्षण भर भी पृथक रहना नहीं चाहते थे। इसमें किंचित-मात्र सन्देह नहीं कि अकबर बीरबल के मज़ाक़ बड़े मौक़े मार्के के और गुदगुदाने वाले होते थे। खेद है कि इनके प्रचलित मज़ाक़ों में कुछ मज़ाक़ कल्पित सन्निवेशित कर दिये गये हैं। मुल्ला दोप्याजे का नाम भी कल्पित ही सिद्ध हुआ है।

राजा बीरबल को अकबर की आँखों से गिराने का व अकबर और बीरबल की जोड़ी तोड़ने का कई बार उनके प्रतिद्वन्द्वियों ने प्रयत्न किया, पर वे अपने कौशल से षड्यन्त्रकारियों को नीचा ही दिखाते रहे।

बीरबल की हाज़िरजवाबी ऐसी थी जिससे बादशा को भी सिर नीचा कर लेना पड़ता था। बीरबल को अकबर बहुत मानता था। स्वात और बाजोर के युद्ध में बीरबल के मारे जाने पर अकबर को घोर दुःख हुआ। कई रोज़ तक वह एकान्त में बैठकर रोया किया।

अकबर को यदि बीरबल-सा साथी न मिला होता, तो उसका जीवन नीरस हो जाता–ऐसी थी अकबर और बीरबल की जोड़ी।

हमारे इस संग्रह में बीरबल और अकबर के वे ही मज़ाक़ संग्रहीत हैं जो अधिक प्रचलित हैं और हास्यरस से भरे हुए हैं। आशा है कि इसके पाठकों को इससे कुछ मनोरंजन विशेष होगा। यदि ऐसा हुआ तो हम अपना श्रम सफल समझेंगे। हमने इसे कई प्रचलित प्रकाशित पुस्तकों से संग्रह किया है। सम्भव है कि हमारी संग्रहीत भाषा में अनेक अक्षम्य अशुद्धियाँ हो, अतएव पाठकवृन्द उन अशुद्धियों पर विशेष दृष्टि निक्षेप न करके हमारे प्रयास पर ही ध्यान देंगे और उन्हें सुधारकर ही पठन-पाठन करेंगे।

विनीत
लेखक

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