सच्चे-झूठे का भेद – अकबर-बीरबल की कहानी

“सच्चे-झूठे का भेद” बहुत छोटी, लेकिन शिक्षाप्रद कहानी है। यह पिछली कहानी के आगे बीरबल की फारस से वापसी के बाद शुरू होती है। इसमें अकबर की जिज्ञासा को शान्त कर बीरबल उसे सच्चे और झूठे का भेद समझाता है। बाक़ी कहानियाँ यहाँ पढ़ें – अकबर-बीरबल की कहानियां

अकबर और बीरबल में सिद्धान्त निरूपण हो रहा था। इसी के अंतर्गत बादशाह अकबर ने बीरबल से सच्चे-झूठे का भेद पूछा।

बीरबल ने उत्तर दिया, “पृथिवीनाथ, इन दोनों के मध्य उतना ही भेद है, जितना कि आँख और कानों में है।”

अकबर की समझ वहाँ तक न पहुँच सकी। इस वास्ते उसने बीरबल से फिर पूछा, “क्यों, ऐसा काहे को होता है?”

बीरबल ने उत्तर दिया, “पृथिवीनाथ! सुनिये, जो बात आँखों देखी रहती है, वह तो सच्ची होती है। लेकिन जो बात कान से सुनी जाती है, वह झूठी हो सकती है।”

बादशाह अकबर बीरबल के युक्तिसंगत और तर्कपूर्ण उत्तर से सन्तुष्ट हो गया।

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