अकबर का नशा और बीरबल

अकबर का नशा और बीरबल बड़ी ही रोचक कहानी है, जिसमें बीरबल अपनी सूझ-बूझ से अकबर को नशे की लत के नुक़सान समझाता है। अन्य कहानियाँ यहाँ पढ़ें – अकबर बीरबल की कहानियां

दरबार के समय में अकबर को गप्प लड़ाने का मौका नहीं मिलता था, इस कारण जनाने महल में ही गप लड़ा लिया करता था। इसी समय में आपस की गोष्टी भी हो जाया करती थी। यह बात सब पर विदित थी, जिस कारण बीरबल को जनाने महल में जाने की कोई मनाही नहीं थी।

जब वार्तालाप करके बादशाह संतुष्ट हो जाता तो एक ऐसी नशीली चीज का सेवन कर लेता, जिससे कुछ समय पश्चात उसका चेहरा बदल जाता और बातें भी और की तौर करने लगता था। बीरबल नित्य अकबर की ऐसी दशा देखा करता, परन्तु उसकी समझ में न आता कि दरअसल वह किस वस्तु का सेवन करता है। अकबर का नशा उसकी याद्दाश्त पर भी बुरा असर डालता था। ऐसी दशा में बादशाह अनेक भूलें भी कर डालता था।

एक दिन बीरबल के मन में उस वस्तु की जानकारी प्राप्त करने की सूझी। वह बीमारी का बहाना कर कई दिनों तक दरबार में नहीं आया। बादशाह ने एक दो दिन तो यह समझ कर कि साधारण बीमारी होगी, उसकी कुछ खोज खबर न ली। परन्तु जब सोचते-सोचते तीन चार दिनों का अरसा बीता और वह नहीं आया, तो उन्हें बीरबल को देखने की इच्छा हुई। वे अपने चन्द सिपाहियों के साथ बीरबल के मकान पर गये।

जब उसे बादशाह के आगमन की सूचना मिली तो झट दूसरे दरवाजे से होकर बाहर निकल गया और लोगों की आँख बचाकर सीधे दरबार में जा पहुँचा। गुप्त मार्ग से जनाने महल में पहुँचकर उस नशीली चीज की तलाश करने लगा। जब बाहर उसका सुराग़ न लगा, तो रखे हुए एक संदूक की चाभी की फिराक में पड़ा। देवात ताली (चाभी) मिल गई। वह एक कोने में अच्छी तरह छिपाकर रक्खी हुई थी। संदूक का ताला खोलकर उसके अन्दर की चीजों को देखा। एक तरफ कोने में एक बोतल रक्खी हुई मिली। उसे चुपके से बाहर निकालकर अपनी शाल के अन्दर छिपा लिया और द्रुत वेग से घर की तरफ राही हुआ।

बादशाह को उसके घर वालों से पूछने पर विदित हुआ, “थोड़ी देर हुआ दरबार की तरफ गये हैं।” यह सुनकर उसको कुछ चिन्ता सी हुई और बीरबल के जाने का कारण जानने के लिये व्याकुल हो उठा। मन में सोचा, “बिना किसी अनिवार्य कारण के बीरबल ऐसी दशा में नहीं जा सकता था। वह अपने साथियों सहित लौटने लगा। अभी दो चार सीढ़ी ही उतर कर गया था कि सामने से बीरबल आता हुआ दिखाई पड़ा। बीरबल मन-ही-मन सोचता हुआ आ रहा था कि अकबर के पूछने पर क्या उत्तर दूंगा। इसी बीच अकबर की दृष्टि उसपर जो पड़ी और वह वहीं रुक गया।

पास पहुँचकर अकबर ने पूछा, “तुम इस समय महल की तरफ़ क्यों गये थे और तुम्हारे बगल में यह क्या चीज है?” बीरबल ने कहा, “कुछ तो नहीं।” फिर भी बादशाह का शक बना ही रहा, क्योंकि उसकी कांख तले चदरे के भीतर से कोई चीज़ दिखाई पड़ रही थी।

अकबर ने दुबारा पूछा – “बीरबल! झूठ क्यों बोल रहा है। तुम्हारी कांख के भीतर कोई चीज़ अवश्य छिपी हुई है।” बीरबल ने कहा, “हाँ, वह तोता है।” बीरबल के ऐसे रूखे उत्तर से बादशाह को सन्तोष नहीं हुआ और क्रोधित होकर बोला, “तुम्हें आज इतना मजाक क्यों सूझ रहा है।” बीरबल अविलम्ब बोला, “पृथ्वीनाथ! अश्व है।”

बादशाह बड़ा हैरान हुआ और भौंह चढ़ाकर कहा, “मैं देखता हूँ कि आज तुम्हारा दिमाग़ आसमान पर चढ़ता जा रहा है।” बीरबल ने कहा, “नहीं… नहीं… हाथी है।” बादशाह ने कहा, “क्या तुमने भांग तो नहीं खाई है। ठीक-ठीक समझ कर उत्तर दो।” बीरबल कब चुप रहने वाला था, बोला-“गधा है, गधा।” बारंबार बीरबल के टालमटोल की बातें सुनकर बादशाह बहुत ही चिढ़ गया और पूछा, “क्या आज तुम पर मृत्यु तो नहीं सवार हो गई है, काँख में की छिपी वस्तु का नाम ठीक ठीक क्यों नहीं बतलाते हो?”

इस बार बीरबल ने साफ बतला दिया, “हुजूर! शराब है।” फिर अपनी बगल से बोतल निकालकर अकबर के हवाले किया। बीरबल जैसे धर्मपरायण ब्राह्मण के पास शराब की बोतल देखकर बादशाह को आश्चर्य हुआ और उसका कोप कुछ शान्त हो गया। वह बीरबल को अपने साथ जनाने महल में लिया ले गया। वहाँ जाकर देखा तो उसके कमरे की सारी चीजें इधर उधर बिखरी पड़ी हैं। सन्दूक का ताला भी खुला हुआ है। अकबर तुरंत ताड़ गया कि इसी को चुराने के लिये बीरबल अकेले में यहाँ आया था, परन्तु फिर भी इतने ही से उसे शान्ति न मिली। उसने विचारा कि यह तो हुई यहाँ की बात, रास्ते में बीरबल अंटसंट क्यों बतलाता था? तब वह बोला-“बीरबल! मालूम होता है आज तुम कुछ नशा खा गये हो। नहीं तो ऐसी ऊटपटांग बातें कभी न करते। तुम्हारी काँख तले शराब की बोतल मौजूद थी, फिर भी तुमने उसे बैल, गदहा आदि आदि कैसे बतलाया।”

बीरबल को अपना राज अकबर पर खोलने का मौका मिल गया और उसे इस ढंग से प्रगट करना प्रारम्भ किया, “पृथिवीनाथ! न तो मैं नशा खाये हूँ और न मेरी बुद्धि ही भ्रष्ट हुई है। मैंने जो कुछ भी कहा है वह चीज़ मेरी काँख तले थी।”

“अच्छा हुजूर, सुनिये – पहले पहल मैंने आपसे बतलाया था कि कुछ भी नहीं है, सो मद्यपान के प्रथम प्याले की बात थी। उस समय बात करने वाला कुछ भी नहीं देखता।

दूसरी बार मेरी जबान पर तोते का नाम आपने सुना होगा। इसका अभिप्राय यह था कि दूसरा प्याला पी लेने पर मनुष्य तोते के समान बकने लगता है।

फिर मैंने घोड़े का नाम लिया था। उसके मानी यह था कि तीसरा प्याला पी चुकने पर मद्यपी घोड़े के समान हिनहिनाना प्रारम्भ कर देता है।

चौथी बार हाथी बतलाया था। सो इस कारण कि चौथे प्याले के सेवन के पश्चात् मद्यपी मस्त हाथी की तरह झूमना प्रारम्भ करता है।

पांचवीं बार गधा बना देता है।

छठवें में मद्यपी नशे में गुप्त हो जाता है। यहाँ तक कि उसको अपने शरीर तक की भी सुधि-बुध नहीं रहती। यही कारण था कि अन्त में मैंने शराब का नाम लिया था।

एक बोतल में केवल छः प्याला शराब रहती है। प्रत्येक प्याला सेवन के पश्चात् मनुष्य की पृथक पृथक दशाएँ हो जाती हैं।”

बादशाह अकबर बीरबल की इन बातों को बड़े ध्यान पूर्वक सुन रहा था, कारण कि उसे इस बात का पहले ही से विश्वास था कि बीरबल जो कुछ भी कहे वा करेगा, उसके अच्छे के लिये ही। बीरबल का अभिप्राय भी अकबर का नशा छुड़ाना ही था। उसकी इस शुभाकांक्षा से अकबर बड़ा हर्षित हुआ और उसे उचित पुरस्कार देकर विदा किया।

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