याद है

कुछ दिनों की बात है,
मुझे ठीक से सब कुछ याद है।
रातों में माँ की झप्पी,
और स्कूल की मार याद है।

शाम का खेलना था ज़रूरी,
इसलिए होमवर्क छोड़ना याद है।
और स्कूल न जाने की ख़ातिर,
पेट में दर्द होना याद है।

पर आज पेट का दर्द हो न हो,
ऑफिस जाना ही होता है।
रात में नींद आए न आए,
माँ की याद आना तो शुरुआत है।

फिर आँसू ढेर बहें न बहें,
भविष्य का ख़याल है।
कल ऑफिस तो जाना ही है न,
इसलिए ज़बरदस्ती सोना भी एक काम है।

अब ज़िन्दगी में बहुत आगे निकल गए,
बदले बहुत से ख़याल हैं।
पर याद आते हैं वो पुराने दिन,
जब हम दुनियादारी से अनजान थे।

सुबह की चाय हाथ में लेते ही,
पापा का चिल्लाकर उठाना याद है।
घर से बाहर कदम रखते ही,
माँ की घबराई शकल याद है।

अब फिरसे वो दिन कहाँ आएँगे,
अब कौन हमें समझाएगा।
बहुत बड़े हो गए हम जल्दी से,
पर नसीहतें अब भी याद हैं।

सबकुछ बहुत अच्छा रहा,
पर धीरे धीरे कुछ छूटता गया।
सबकुछ है अब हाथ में,
पर अच्छे दिन सिर्फ़ एक याद हैं।

सुरभि भदौरिया

सात वर्ष की छोटी आयु से ही साहित्य में रुचि रखने वालीं सुरभि भदौरिया एक डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी चलाती हैं। अपने स्वर्गवासी दादा से प्राप्त साहित्यिक संस्कारों को पल्लवित करते हुए उन्होंने हिंदीपथ.कॉम की नींव डाली है, जिसका उद्देश्य हिन्दी की उत्तम सामग्री को जन-जन तक पहुँचाना है। सुरभि की दिलचस्पी का व्यापक दायरा काव्य, कहानी, नाटक, इतिहास, धर्म और उपन्यास आदि को समाहित किए हुए है। वे हिंदीपथ को निरन्तर नई ऊँचाइंयों पर पहुँचाने में सतत लगी हुई हैं।

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