56 रुपये ने बदला जीवन – पीएम पाण्डे

इस संस्मरण में प्रकाश मोहन पाण्डे ने अपने शुरुआती दिनों के संघर्षों और उस समय के माहौल का बड़ा ही रोचक चित्र खींचा है। साहित्य में उनका गहरा रुझान है तथा उन्होंने कई कहानियाँ भी लिखी हैं। पढ़ें और आनंद लें इस पठनीय संस्मरण का–

जब मेरी बड़ी बहन (अक्का) की शादी हुई, तब मैं आगरा कॉलेज में इंटर में पढ़ रहा था। उस समय आगरा कॉलेज में फ़स्ट ईयर और इंटर हुआ करता था। उस समय फ़ीस बहुत थी और मेरे पास फ़ीस देने के लिए पैसे नहीं थे। चार-पाँच महीने बाद फ़ीस जमा करनी थी तक़रीबन आठसौ-हज़ार रुपये, जो मेरे लिए काफ़ी ज़्यादा थी। इतने पैसे तो घर में किसी ने देखे भी नहीं थे। शायद वह पूरे साल की फ़ीस थी।

इसके बाद पढ़ाई से मेरा मन उचट गया। मैंने सोचा कि अब नहीं पढ़ना है। न फ़ीस थी देने को, न किताबें थीं पढ़ने को। बेलनगंज में लेन गौशाला से आगरा कॉलेज पैदल पढ़ने जाना होता था रोज़। बाक़ी सब साइकिल से आते थे। कपड़े केवल दो जोड़ी थे–एक पहनते थे और एक धोते थे। ग़रीबी की अवस्था थी। तो फिर सोचा कि पढ़ना ही छोड़ो अब।

इसके बाद शुरू हो गया आवारागर्दी का दौर। एक जगह होता था जूआ। उस समय बहुत-से लोगों के लिए जूआ मनोरंजन का साधन था। और तो कोई साधन नहीं हुआ करता था। जो जूआ कराता था वह उसपर नाल या कमीशन लेता था। जहाँ जूआ खेलते थे उसको फड़ कहते थे। फड़ पर जूआ चलता रहता था और चलाने वाला नाल काढ़ता रहता था। बंदे दिन भर लगे ही रहते थे।

मैं वहाँ सुबह पहुँच जाता था 8-9 बजे और शाम 6 बजे तक रहता। उन्हें हम जैसे लड़कों की ज़रूरत होती थी। बस यह सूचना देनी होती थी कि कहीं पुलिस तो नहीं आ रही है। मैं रोज़ जाकर वहाँ बैठ जाता था। शाम को अधन्ना-एकन्नी मिल जाया करती थी। एकन्नी जेब में डालकर ख़ुश हो घर आ जाया करता था। पुलिस देखी नहीं कि हम भागकर जाते थे–ओए, पुलिस आ गयी–तुरंत ही सब चंपत हो जाते थे। यह हिसाब-किताब था तब।

इस तरह जब मैं आवारागर्दी करने लगा तो माँ को हो गई चिन्ता। वह सोचने लगी कि लड़का गया अब तो हाथ से, दिनभर जुआरियों के संग बैठा रहता है। तब अपनी यह चिंता माँ ने मेरे जीजाजी को बताई।

जीजाजी बैंक में काम करते थे। टिपणिस करके बैंक में एक चीफ़ मैनेजर आए थे। वे जीजाजी को बहुत मानते थे। जीजाजी उसके स्टेनर थे। उस बखत मेरी उम्र साढ़े सोलह साल की रही होगी। ग़लती से सर्टिफ़िकेट में उम्र ज़्यादा लिखी हुई थी। इसलिए सर्टिफ़िकेट के हिसाब से मेरी उम्र साढ़े सत्रह थी। जीजाजी के कहने पर माँ ने मुझसे कहा कि तू जाकर चीफ़ मैनेजर से मिलकर आ।

पहले तो मैंने बहुत मना किया कि मैं नहीं जाऊंगा, मैं कहाँ…। चीफ़ मैनेजर का घर राम नगर में था। आगरा नगरपालिका के पीछे था वह इलाक़ा बाग़ फ़रज़ाना के पास। माँ जब बहुत पीछे पड़ी तो एक दिन जाना ही पड़ा। छोटा भाई प्रमोद भी मेरे साथ था। जीजाजी ने बढ़िया अंग्रेज़ी में एप्लीकेशन लिखी और मुझे दे दी। मैंने अपनी लिखावट में उसकी नक़ल उतार ली। मेरी राइटिंग उस समय काफ़ी अच्छी थी। अब मुझे जाकर वह एप्लीकेशन देनी थी।

सुबह-ही-सुबह 9 बजे हम वहाँ पहुँच गए। हम रहते थे एक साधारण छोटे-से घर में और चीफ़ मैनेजर का घर दिखने में महल जैसा था। वीआईपी इलाक़ा था वह। इतना बड़ा बंगला देखकर मैं घबरा गया। चीफ़ मैनेजर गाउन-वाउन पहने बाहर बग़ीचे में कुर्सी पर बैठा चाय पी रहा था। मैं और मेरा छोटा भाई दोनों डर रहे थे कि ये कहाँ आ गए यार।

डरते-डरते मैंने जेब में से एप्लीकेशन निकालकर चीफ़ मैनेजर को दी। उसने शुरू से आख़िर तक एप्लीकेशन पढ़ी और फिर मेरी ओर देखते हुए पूछा, “तुमने लिखी है?” सवाल सुनते ही मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। मुझे उस समय अंग्रेज़ी का आर ए टी रैट और सी ए टी कैट भी नहीं पता था।

मैं घबराते हुए बोला, “साहब, मैंने नहीं लिखी… मैंने नहीं लिखी है।”
“… तो किसने लिखी है?”
“यह तो पुराणिक साहब ने लिखी है, जो आपके साथ काम करते हैं।”
“कुछ हो, तेरी हैंड राइटिंग बहुत अच्छी है। बैंक में नौकरी करेगा? करना चाहता है?”
“सा’ब, मैं पढ़ना चाहता हूँ।”
“मैं तुझे बैंक में ऐसी जगह लगवा दूंगा कि रात में नौकरी करना और दिन में पढ़ लेना।”
मैंने ख़ुशी-ख़ुशी कहा, “हाँ जी, मैं बिल्कुल कर लूंगा।”

चेहरे पर मुस्कान लेकर मैं उन्हें नमस्ते कर घर चला आया। दूसरे दिन हमारे जीजाजी अपॉइंटमेंट लेटर ले आए।

इसके बाद रहा छः महीने का प्रोबेशन पीरिअड। लेकिन यूनिअन वालों ने ग़दर काटा–इतना छोटा लड़का रख लिया है, जिसकी दाढ़ी-मूँछें भी अभी नहीं आयी हैं। इसका तोड़ यह निकाला गया कि अभी यह लड़का साढ़े सत्रह का है, प्रोबेशन ख़त्म होते-होते अठारह का हो जाएगा। तब ही नौकरी पक्की होगी। टिपणिस साहब की बड़ी इज़्ज़त थी और सब उनसे डरते भी बहुत थे। उनकी यह बात कोई काट नहीं सका।

जब मैं बैंक में गया तो कोई मुझे देखकर ख़ुश नहीं था। मेरा जो मैनेजर था, वह भी बेहद नाख़ुश था कि कितना छोटा लड़का बैंक में रख लिया है। लेकिन वह कुछ कह नहीं सकता था। 18 फ़रवरी 1963 को मैं बैंक में लगा। मुझे बड़ी दिक़्क़त हुई पहले-पहल। ऐसा काम कभी किया तो था नहीं। जिसके नीचे मैं था, वह बहुत गाली दे–तुझे टोटल भी करना नहीं आता, तुझे कुछ भी नहीं आता, तू तो गधा है। मैं तेरे जीजा से कह दूंगा कि यह लड़का नहीं सीख सकता, बैंक में नौकरी नहीं कर सकता। उसने बहुत हड़काया एकदम।

तबियत तो मेरी बहुत हुई कि छोड़ दो इस नौकरी को। क्या करना नौकरी करके! लेकिन फिर आ गयी 28 तारीख़। यह वह दिन था जब मुझे तन्ख़्वाह मिली 56 रुपये। 56 रुपये मैंने पहले कभी ज़िंदगी में नहीं देखे थे। इतने पैसे जब देखे–यार! 56 रुपये… विश्वास ही नहीं हुआ पहले तो।

56 रुपये लेकर मैं घर पहुँचा और माँ को बताया कि 12 दिन की इतनी तन्ख़्वाह मिली है। माँ बोली कि जा और आज तू ख़ुद पर ख़र्च करके आ। हमने अपने दो दोस्त विनोद और विजय साथ लिए और निकले पैसे ख़र्च करने। विनोद तो अब इस दुनिया में नहीं है। तब मुझे मिठाई खाने का बहुत शौक़ था। एक-दो रुपये की पहले तो खाई मिठाई। जिस मिठाई वाले के यहाँ मैं खाने जाता था, वह बहुत बढ़िया मलाई के लड्डू देता था। एक-दो रुपये के लड्डू हम तीनों ने झक्क होकर खाए।

लड्डू-वड्डू खाकर मैंने दोस्तों से कहा, “यार! पहनने के लिए कपड़े नहीं है कुछ।” तब राजा की मण्डी में सिले-सिलाए कपड़े मिलते थे। तो 5 रुपये की एक बहुत बढ़िया शर्ट ख़रीद कर लाया हीरो स्टाइल की। 11 रुपये की ख़रीदी एक पैंट। 10 रुपये का लिया जूता। 27-28 रुपये ख़र्च कर दिए हम लोगों ने। तो भी हमारे पास 20-25 रुपये बच गए। मैंने सोचा, “यार! यह तो 56 रुपये ही ख़र्च नहीं हो पा रहे। जबकि पूरी तन्ख़्वाह है महीने की 156 रुपये। जब पूरे पैसे मिलेंगे तो कैसे ख़र्च होंगे!” उस दिन मैंने कसम खाई कि ज़िंदगी में बैंक की नौकरी नहीं छोड़ूंगा। कभी सोचा ही नहीं था कि इतने पैसे भी मिल सकते हैं।

अगले महीने मुझे मिले 156 रुपये। फिर तो मैं राजा बाबू हो गया। 100 रुपये माँ को दिए घर-ख़र्च चलाने के लिए। उस समय घर की भी बड़ी मुश्किल परिस्थितियाँ थीं। चार आने की आती थी रोज़ चीनी और दो पैसे की पत्ती वग़ैरह, तब जाकर कहीं चाय बनती थी घर में। सौ रुपये में तो फिर एक किलो चीनी, चाय का डिब्बा–सब घर में आ गया। स्टैंडर्ड ऊँचा हो गया। आटा-फाटा भी इकट्ठा लाने लगे।

उसके बाद मैं पंखा लेकर आया। पंखे में सोने के बारे में ज़िंदगी में कभी सोचा नहीं था। वैसे ही सोते आए थे। पानी डालकर फ़र्श साफ़ कर लेते थे और ठण्डे फ़र्श से चिपकर फट सो जाते थे। 150 रुपये में वह पंखा लिया था, जो अभी भी बिल्कुल ठीक चल रहा है। आज-तक उसमें ग्रीसिंग भी नहीं हुई है। शायद 150 या 120 रुपये का था–ठीक से याद नहीं। उषा कंपनी का था वह। पहले उषा के ही पंखे चलते थे। फिर लाए एक बहुत बढ़िया रेडियो। माँ को रेडियो सुनने का शौक़ था। विविध भारती सुनने के लिए वह दूसरे के यहाँ जाती थी। रेडियो ख़रीदकर बाहर उसका एंटीना लगाया गया। उस ज़माने में रेडियो के लिए भी बाहर या छत पर एंटीना लगवाना पड़ता था।

अब तो मज़े आ गए–घर में पंखा भी, रेडियो भी, पहनने को नई शर्ट भी। फिर ख़्याल आया कि एक साइकिल भी लेनी चाहिए। फिर मैं लेकर आया आरवी साइकिल 300 रुपये में। अब तो मैं साइकिल पर फर्राटे भरने लगा।

मोती कटरे में एक डीएवी इंटर कॉलेज हुआ करता था। अब पता नहीं कि है या नहीं। इसके बाद वहाँ से प्राइवेट फ़ॉर्म भरा और इंटर किया। वहाँ से पास होने के बाद आगरा कॉलेज में दाख़िला ले लिया बीए में। ग्रेजुएशन भी इसलिए किया कि उसके बाद दो इन्क्रीमेंट मिलते थे। तन्ख़्वाह बढ़ जाती थी। तब दो साल में ही ग्रेजुएशन पूरी हो जाती थी। ग्रेजुएशन करने के बाद क़रीब 50 रुपये तन्ख़्वाह और बढ़ गयी।

मैंने इजाज़त ले रखी थी दिन में पढ़ने के लिए। चीफ़ मैनेजर के तबादले के बाद मैनेजर ने मुझे उस पोज़ीशन से हटा दिया और यह सुविधा ख़त्म हो गयी। वह बोला, “अब तुम दिन में ही आया करो। पढ़ाई-वढ़ाई तुम्हारी बहुत हो गयी। अब तुम बीए भी हो गए।” लेकिन पढ़ाई जारी रखने का मन था। इसलिए फिर मॉर्निंग क्लास लेकर बीआर कॉलेज (अब आरबीएस कॉलेज) में एमए इकॉनोमिक्स में दाख़िला ले लिया। सुबह 7 से 10 जाना होता था पढ़ने के लिए।

मैं बढ़िया कर्मचारी था, इसलिए ज़रा पूछ होने लगी थी धीरे-धीरे। इसके अलावा थोड़ी नेतागिरी भी शुरू कर दी थी। शहर के दादा टाइप लोगों से भी जान-पहचान हो गयी थी। बैंक में लोग ज़रा घबराते थे कि बदमाशों से परिचय है। तो जब मैंने मैनेजर से अनुरोध किया कि फिर रात में शिफ़्ट कर दी जाए, तो वह तुरंत राज़ी हो गया। इसके बाद एमए फ़ाइनल ईयर किया 1969 में पूरी तरह सेंट जॉन्स कॉलेज से।

तो इस तरह जीजाजी की मदद, टिपणिस साहब की दरियादिली और ५६ रुपये की पहली तन्ख़्वाह ने पूरा जीवन बदल कर रख दिया।

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

2 thoughts on “56 रुपये ने बदला जीवन – पीएम पाण्डे

  • July 16, 2021 at 9:26 pm
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    भगवान करे तिपनिस जी जैसे लोग हर जगह हों जो एक-एक करके दुनिया ही बदल दें

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    • September 20, 2021 at 12:53 pm
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      सुरभि जी, टिप्पणी के लिए धन्यवाद। यही तो the power of one है। एक व्यक्ति कितने जीवनों को प्रभावित करके उनकी दिशा परिवर्तित कर सकता है। हमें अपने जीवन में यही दीप प्रज्वलित करना चाहिए, जिससे अनेक अन्य दीप जलें और जग का अंधियारा मिटे।

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