धर्मनाथ चालीसा – Bhagwan Dharmanatha Chalisa

धर्मनाथ चालीसा का नियमित पाठ चित्त को पवित्र तथा निष्पाप कर देता है। ऐसे ही चित्त में प्रभु-प्रसाद अवतरित होने की संभावना उत्पन्न होती है। संसार-सागर से पार ले जाने वाली शक्ति का नाम ही धर्मनाथ चालीसा है। जो इसका नित्य पाठ करता है, वह न केवल निष्कपटता को प्राप्त होता है बल्कि उसे अनंत सुख की भी प्राप्ति होती है। पढ़ें धर्मनाथ चालीसा–

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भगवान धर्मनाथ का चिह्न – वज्र-दंड

उत्तम क्षमा आदि दस धर्मी
प्रगटे मूर्तिमान श्रीधर्म॥

जग से हरण हरें सब अधर्म।
शाश्वत सुरव दें प्रभुवर धर्म

नगर रत्नपुर के शासक थे।
भूपति भानु प्रजापालक थे॥

महादेवी सुव्रता अभिन्न।
पुत्र – अभाव से रहतीं खिन्न॥

‘प्राचेतस’ मुनि अवधिलीन।
मात-पिता को धीरज दीन॥

“पुत्र तुम्हारे हों क्षेमकर।
जग में कहलायें तीर्थंकर॥

धीरज हुआ दम्पति-मन में।
साधु- वचन हों सत्य जगत में॥

‘मोह’ ‘सुरम्य’ विमान से तजकर।
जननी उदर बसे प्रभु आकर॥

तत्क्षण सब देवों के परिकर।
गर्भकल्याणक करें खुश होकर॥

तेरस माघ मास उजियारी।
जन्मे तीन ज्ञान के धारी॥

तीन भुवन द्युति छाई न्यारी।
सब ही जीवों को सुखकारी॥

माता को निद्रा में सुलाकर।
लिया शची ने गोद में आकर॥

मेरु पर अभिषेक कराया।
‘धर्मनाथ’ शुभ नाम धराया॥

देख शिशु-सौन्दर्य अपार।
किये इन्द्र ने नयन हजार॥

बीता बचपन यौवन आया।
अद्भुत आकर्षक तन पाया॥

पिता ने तब युवराज बनाया।
राज-काज उनको समझाया॥

चित्र श्रृंगारवती का लेकर।
दूत सभा में बैठा आकर॥

स्वयंवर हेतु निमन्त्रण देकर।
गया नाथ की स्वीकृति लेकर॥

मित्र प्रभाकर को संग लेकर।
कुण्डिनपुर को गए धर्म-वर॥

शृंगारवती ने वरा प्रभु को।
पुष्पक यान पे आए घर को॥

मात-पिता करें हार्दिक प्यार।
प्रजाजनों ने किया सत्कार॥

सर्वप्रिय था उनका शासन।
नीति सहित करते प्रजापालन॥

उल्कापात देखकर एक दिन।
भोग-विमुख हो गए श्री जिन॥

सुत ‘सुधर्म’ को सौंपा राज।
शिविका में प्रभु गए विराज॥

चलते संग सहस नृपराज।
गए शालवन में जिनराज॥

शुक्ल त्रयोदशी माघ महीना।
सन्ध्या समय मुनि पदवी गहीना॥

दो दिन रहे ध्यान में लीना,
दिव्य दीप्ति धरें वस्त्र विहीना।

तीसरे दिन हेतु आहार।
पाटलिपुत्र को हुआ विहार॥

अन्तराय बत्तीस निखार।
धन्यसेन नप दें आहार॥

मौन अवस्था रहती प्रभु की,
कठिनतपस्या एक वर्ष की॥

पूरणमासी पौष मास की,
अनुभूति हुई दिव्याभास की॥

चतुर्निकाय के सुरगणआये।
उत्सव ज्ञानकल्याण मनाये॥

समोशरण निर्माण करायें।
अन्तरिक्ष में प्रभु पधराये॥

निरक्षरी कल्याणी वाणी।
कर्णपुटों से पीतें प्राणी॥

“जीव जगत में जानो अनन्त।
पुद्गल तो है अनन्तानन्त॥

धर्म-अधर्म और नभ एक।
काल समेत द्रव्य षट् देख॥

रागमुक्त हो जाने रूप।
शिवसुख उसको मिले अनूप॥

सुन कर बहुत हुए व्रतधारी।
बहुतों ने जिन दीक्षाधारी॥

आर्यखण्ड में हआ विहार।
भूमण्डल में धर्म प्रचार॥

गढ़ सम्मेद गए आखिर में।
लीन हुए निज अन्तरंग में॥

शुक्लध्यान का हुआ प्रताप।
हुए अघाति-घात निष्पाप॥

नष्ट किए जग के सन्ताप।
मुक्तिमहल में पहुँचे आप॥

ज्येष्ठ चतुर्थी शुक्ल पक्षवर।
पूजा करें सुर, कूट सुदत्तवर॥

लक्षण ‘वज्रदण्ड’ शुभ जान।
हुआ धर्म से धर्म का ‘मान’॥

जो प्रति दिन प्रभु के गुण गाते।
‘अरुणा’ वे भी शिवसुख पाते॥

जाप बीज – ॐ ह्रीं अर्हं श्री धर्मनाथाय नमः

विदेशों में बसे कुछ हिंदू स्वजनों के आग्रह पर धर्मनाथ चालीसा (Dharmanatha Chalisa) को हम रोमन में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें आशा है कि वे इससे अवश्य लाभान्वित होंगे। पढ़ें धर्मनाथ चालीसा रोमन में–

Read Dharmanatha Chalisa

uttama kṣamā ādi dasa dharmī।
pragaṭe mūrtimāna śrīdharma॥

jaga se haraṇa hareṃ saba adharma।
śāśvata surava deṃ prabhuvara dharma॥

nagara ratnapura ke śāsaka the।
bhūpati bhānu prajāpālaka the॥

mahādevī suvratā abhinna।
putra – abhāva se rahatīṃ khinna॥

‘prācetasa’ muni avadhilīna।
māta-pitā ko dhīraja dīna॥

“putra tumhāre hoṃ kṣemakara।
jaga meṃ kahalāyeṃ tīrthaṃkara॥

dhīraja huā dampati-mana meṃ।
sādhu- vacana hoṃ satya jagata meṃ॥

‘moha’ ‘suramya’ vimāna se tajakara।
jananī udara base prabhu ākara॥

tatkṣaṇa saba devoṃ ke parikara।
garbhakalyāṇaka kareṃ khuśa hokara॥

terasa māgha māsa ujiyārī।
janme tīna jñāna ke dhārī॥

tīna bhuvana dyuti chāī nyārī।
saba hī jīvoṃ ko sukhakārī॥

mātā ko nidrā meṃ sulākara।
liyā śacī ne goda meṃ ākara॥

meru para abhiṣeka karāyā।
‘dharmanātha’ śubha nāma dharāyā॥

dekha śiśu-saundarya apāra।
kiye indra ne nayana hajāra॥

bītā bacapana yauvana āyā।
adbhuta ākarṣaka tana pāyā॥

pitā ne taba yuvarāja banāyā।
rāja-kāja unako samajhāyā॥

citra śrṛṃgāravatī kā lekara।
dūta sabhā meṃ baiṭhā ākara॥

svayaṃvara hetu nimantraṇa dekara।
gayā nātha kī svīkṛti lekara॥

mitra prabhākara ko saṃga lekara।
kuṇḍinapura ko gae dharma-vara॥

śrṛṃgāravatī ne varā prabhu ko।
puṣpaka yāna pe āe ghara ko॥

māta-pitā kareṃ hārdika pyāra।
prajājanoṃ ne kiyā satkāra॥

sarvapriya thā unakā śāsana।
nīti sahita karate prajāpālana॥

ulkāpāta dekhakara eka dina।
bhoga-vimukha ho gae śrī jina॥

suta ‘sudharma’ ko sauṃpā rāja।
śivikā meṃ prabhu gae virāja॥

calate saṃga sahasa nṛparāja।
gae śālavana meṃ jinarāja॥

śukla trayodaśī māgha mahīnā।
sandhyā samaya muni padavī gahīnā॥

do dina rahe dhyāna meṃ līnā,
divya dīpti dhareṃ vastra vihīnā।
tīsare dina hetu āhāra।
pāṭaliputra ko huā vihāra॥

antarāya battīsa nikhāra।
dhanyasena napa deṃ āhāra॥

mauna avasthā rahatī prabhu kī,
kaṭhinatapasyā eka varṣa kī॥

pūraṇamāsī pauṣa māsa kī,
anubhūti huī divyābhāsa kī॥

caturnikāya ke suragaṇaāye।
utsava jñānakalyāṇa manāye॥

samośaraṇa nirmāṇa karāyeṃ।
antarikṣa meṃ prabhu padharāye॥

nirakṣarī kalyāṇī vāṇī।
karṇapuṭoṃ se pīteṃ prāṇī॥

“jīva jagata meṃ jāno ananta।
pudgala to hai anantānanta॥

dharma-adharma aura nabha eka।
kāla sameta dravya ṣaṭ dekha॥

rāgamukta ho jāne rūpa।
śivasukha usako mile anūpa॥

suna kara bahuta hue vratadhārī।
bahutoṃ ne jina dīkṣādhārī॥

āryakhaṇḍa meṃ haā vihāra।
bhūmaṇḍala meṃ dharma pracāra॥

gaḍha़ sammeda gae ākhira meṃ।
līna hue nija antaraṃga meṃ॥

śukladhyāna kā huā pratāpa।
hue aghāti-ghāta niṣpāpa॥

naṣṭa kie jaga ke santāpa।
muktimahala meṃ pahu~ce āpa॥

jyeṣṭha caturthī śukla pakṣavara।
pūjā kareṃ sura, kūṭa sudattavara॥

lakṣaṇa ‘vajradaṇḍa’ śubha jāna।
huā dharma se dharma kā ‘māna’॥

jo prati dina prabhu ke guṇa gāte।
‘aruṇā’ ve bhī śivasūkha pāte॥

jāpa:- oṃ hrīṃ aha~ śrī dharmanāthāya namaḥ

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सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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