कैसें रहिबौ होय

“कैसें रहिबौ होय” स्व. श्री नवल सिंह भदौरिया “नवल” द्वारा ब्रज भाषा में रचित कविता है। इसमें घर के सौहार्द की ज़रुरत पर बल दिया गया है।

जब घर के घर में लरन लगैं तब कैसें रहिबौ होय।

कबहुँ भूल सौं खटकि जायतौ फिरि हँसि-हँसि बतरावैं,
मन में घृणा-द्वेष लैकें ना काहू सों सतरावैं।
अपनी अपनी जगह रहे नित काम करैं मिलि जुलि कैं,
मत भेदनि कौ करें निवारन पंचायत में खुलि कैं।

जब आपुस में ही डरन लगैं तब कैसे रहिबै होय।
जब घर के घर में लरन लगैं तब कैसें रहिबौ होय।

आगि कहूँ पै लगै आगि कौ लगिबौ नीको नाहीं
छप्पर जरै पड़ौसी कौ तौ अटा बचन कौ नाहीं।
मत फेंकौ चिनगारी काहू के छप्पर में भैया,
काहे की जरिजाय कमरिया काहू की जरै रजैया।

जब घर-आँगन ही वरन लगों जब कैसे रहिबौ होय।
जब घर के घर में लरन लगैं तब कैसें रहिबौ होय।

मन्दिर में सिबको हिस्सा है मस्जिद सब काहू की,
चर्च और गुरुद्वारे मूरति होय रंक ताहू की
बने एक ही माटी के सब फिर कैसौ झगड़ौ है,
एकु खून कौ रंग हमारौ काहे कौ रगड़ौ है।

जब अपनौ अपनौ करन लगैं तब कैसे रहिबौ होय?
जब घर के घर में लरन लगैं तब कैसें रहिबौ होय

सबसे बड़ी एकता अरु सद्भाव बनायें रहियो,
ईद-दिवाली मनै साथ होरी में हिलि मिलि गइयो।
नाहिं फूट में मजा, सजा हू ते जिय बहुत बुरी है,
गरौ काटिबे कूँ अपनौ ही जहर की बुझी छुरी है।

जब आपुस में ही मरन लगैं जब कैसे रहिबौ होय?
जब घर के घर में लरन लगै तब कैसे रहिबौ होय

राम-रहीम कछू कहि टेरौ वे अभिन्न है दोऊ
नाम अनेक एक साबुन के अनगिन कपड़ा धोऊ।
देश-प्रेम सबते ऊपर है अपने मन में मानौ
जननी-जन्म भूमि अपनी कौं बड़ी स्वर्ग ते जानौ ।

जब बाकी इज्जति हरन लगै तब कैसे रहिबो होय?
जब घर के घर में लरन लगैं तब कैसे रहिबौ होय।

स्व. श्री नवल सिंह भदौरिया हिंदी खड़ी बोली और ब्रज भाषा के जाने-माने कवि हैं। ब्रज भाषा के आधुनिक रचनाकारों में आपका नाम प्रमुख है। होलीपुरा में प्रवक्ता पद पर कार्य करते हुए उन्होंने गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, सवैया, कहानी, निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाकार्य किया और अपने समय के जाने-माने नाटककार भी रहे। उनकी रचनाएँ देश-विदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। हमारा प्रयास है कि हिंदीपथ के माध्यम से उनकी कालजयी कृतियाँ जन-जन तक पहुँच सकें और सभी उनसे लाभान्वित हों। संपूर्ण व्यक्तित्व व कृतित्व जानने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – श्री नवल सिंह भदौरिया का जीवन-परिचय

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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