कुछ ख़ास बदला नहीं है

कुछ ख़ास बदला नहीं है तेरे जाने के बाद,
चांद आज भी आसमान में ठहरा है!
आज भी उस रात जैसा ही अन्धेरा है
ये तारों की छाँव आज भी मुझे सुलाती है,
ये सन्नाटे की गूंज तेरा नाम लेकर जाती है!!!

यूँ तो रास्ते भी उस मोड़ पर जाते हैं,
जहाँ हम तुम रोज़ मिला करते थे!!!
वैसे तो दिन भी रोशन से ही हैं,
धूप की गर्मी भी उतनी ही तेज़ है!!
कुछ ख़ास बदला नहीं है तेरे जाने के बाद,

महफ़िलों की रौनक आज भी वैसी ही है,
सर्द हवाएँ भी मुझे एहसास वो ही दिलाती हैं,
मैं भी तो ज़िन्दा हूँ, साँस भी चल रही है
थोड़ा-बहुत मुस्कुरा भी लेता हूँ दिन भर में…
कुछ ख़ास बदला नहीं है तेरे जाने के बाद!!!

हाँ!! बस नींद नहीं आती है !!
जागता रहता हूँ सारी रात!!
एक सुकून की तलाश में!!!!
कुछ ख़ास बदला नहीं है तेरे जाने के बाद!!!

माहीन

अमेरिका में कार्यरत माहीन को बचपन से ही पढ़ने-लिखने का शौक़ रहा है। वे 16 साल की उम्र से ही कविताएँ लिख रही हैं। मूलतः आगरा की रहने वालीं माहीन अपने आस-पास की हर चीज़ को न सिर्फ़ गहराई से देखती हैं, बल्कि उनकी क़लम भी उसी गहराई से हर जज़्बे को बयान करने की क़ाबिलियत रखती है। हिंदीपथ पर आप उनकी लेखनी से रू-ब-रू होते रहेंगे।

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