वो इश्क़ है

यूँ तो जान देते हैं हज़ारों दिल हम पर
कोई सारी ज़िन्दगी साथ निभाए
“वो इश्क़ है”

कैसे यक़ीं दिलाएँ ज़माने को
कि तुझसे मिलने और तुममें मिलने का जो फ़र्क़ है
“वो इश्क़ है”

बात सजदे की होती तो झुका देते सर अपना हम भी
पर ख़ुदा से पहले जो तेरी याद आए
“वो इश्क़ है”

साथ रहकर रिश्ते निभाना तो एक आम बात है
तू हो किसी और का और हम तेरे हो जाएँ
“वो इश्क़ है”

माहीन

अमेरिका में कार्यरत माहीन को बचपन से ही पढ़ने-लिखने का शौक़ रहा है। वे 16 साल की उम्र से ही कविताएँ लिख रही हैं। मूलतः आगरा की रहने वालीं माहीन अपने आस-पास की हर चीज़ को न सिर्फ़ गहराई से देखती हैं, बल्कि उनकी क़लम भी उसी गहराई से हर जज़्बे को बयान करने की क़ाबिलियत रखती है। हिंदीपथ पर आप उनकी लेखनी से रू-ब-रू होते रहेंगे।

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