लक्ष्मण का जीवन परिचय

लक्ष्मण जी शेषावतार थे। किसी भी अवस्था में भगवान श्रीराम का वियोग इन्हें सह्य नहीं था। इसलिये ये सदैव छाया की भांति श्रीराम का ही अनुगमन करते थे। श्रीराम के चरणों की सेवा ही इनके जीवन का मुख्य व्रत था। श्री राम की तुलना में संसार के सभी सम्बन्ध इनके लिये गौण है। रामायण की कथा के अनुसार इनके लिये श्री राम ही माता-पिता, गुरु, भाई सब कुछ थे और उनकी आज्ञा का पालन ही इनका मुख्य धर्म था। इसलिये जब भगवान् श्री राम विश्वामित्र जी की यज्ञ रक्षा के लिये गये तो लक्ष्मणजी भी उनके साथ गये। रामायण मनका 108 में इस घटना का उल्लेख इस प्रकार है–

विश्वामित्र मुनीश्वर आए। दशरथ भूप से वचन सुनाए॥
संग में भेजे लक्ष्मण-राम। पतितपावन सीता-राम॥

भगवान श्री राम के प्रति इनके हृदय में अपार भक्तिभाव थी। जब सोने जाते थे तो ये उनका पैर दबाने और भगवान के बार-बार आग्रह करने पर ही स्वयं सोते तथा भगवान के जागने के पूर्व ही जग जाते थे। अबोध शिशु की भाँति इन्होंने प्रभु श्री राम के चरणों को ही दृढ़ता पूर्वक पकड़ लिया और भगवान ही इनकी अनन्य गति बन गये।

भगवान् श्रीराम के प्रति भी अपमान सूचक शब्द को ये कभी बरदाश्त नहीं करते थे। जब महाराज जनक ने धनुष के न टूटने के क्षोभ में धरती को वीर-विहीन कह दिया, तब भगवान के उपस्थित रहते हुए जनक जी का यह कथन श्री लक्ष्मण जी को बाण-जैसा लगा।

ये तत्काल कठोर शब्दों में जनकजी का प्रतिकार करते हुए बोले, “भगवान श्रीराम के विद्यमान रहते हुए जनक ने जिस अनुचित वाणी का प्रयोग किया है, वह मेरे हृदय में शूल की भाँति चुभ रही है। जिस सभा में रघुवंश का कोई भी वीर मौजूद हो, वहाँ इस प्रकार की बातें सुनना और कहना उनकी वीरता का अपमान है। यदि श्रीराम आदेश दें तो मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को गेंद की भांति उठा सकता हूँ, फिर जनक के इस सड़े धनुष की गिनती ही क्या है।” इसी प्रकार जब परशुराम जी ने धनुष तोड़ने वाले को ललकारा तो ये उनसे भी भिड़ गये।

भगवान राम के प्रति लक्ष्मण की अनन्य निष्ठा का उदाहरण भगवान के वनगमन के समय मिलता है। माता कैकेयी द्वारा पिता महाराज दशरथ से भरत जी के लिए राजगद्दी और राम के लिए वनवास का वर मांगने पर राम वन जाने के लिए तुरंत उद्यत हो गए। ये उस समय देह-गेह, सगे-सम्बन्धी माता सुमित्रा और नव विवाहिता पत्नी सबसे सम्बन्ध तोड़कर भगवान के साथ वन जाने के लिये तैयार हो जाते हैं। वन में ये निद्रा और शरीर के समस्त सुखों का परित्याग करके श्रीराम-जानकी की जी-जान से सेवा करते हैं। ये भगवान की सेवा में इतने मग्न हो जाते हैं कि माता-पिता, पत्नी, भाई तथा घर की तनिक भी सुधि नहीं करते।

श्रीलक्ष्मणजी ने अपने चौदह वर्ष के अखण्ड ब्रह्मचर्य और अद्भुत चरित्र बल पर लंका में मेघनाद-जैसे शक्तिशाली योद्धा पर विजय प्राप्त की। ये भगवान की कठोर-से-कठोर आज्ञा का पालन करने में भी कभी नहीं हिचकते। भगवान की आज्ञा होने पर आँसुओं को भीतर ही भीतर पीकर इन्होंने श्री जानकी जी को वन में छोड़ने में भी संकोच नहीं किया। इनका आत्मत्याग भी अनुपम है। जिस समय तापसवेशधारी काल की श्रीराम से वार्ता चल रही थी तो द्वारपाल के रूप में उस समय श्री लक्ष्मण ही उपस्थित थे। किसी को भीतर जाने की अनुमति नहीं थी। उसी समय दुर्वासा ऋषि का आगमन होता है और वे श्री राम का तत्काल दर्शन करने की इच्छा प्रकट करते हैं। दर्शन न होने पर वे शाप देकर सम्पूर्ण परिवार को भस्म करने की बात करते हैं। श्री लक्ष्मण जी ने अपने प्राणों की परवाह न करके उस समय दुर्वासा को श्रीराम से मिलाया और बदले में भगवान से परित्याग का दण्ड प्राप्त कर अद्भुत आत्मत्याग किया। श्री राम के अनन्य सेवक श्री लक्ष्मण धन्य हैं।

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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