अमृत ध्वनि छन्द

“अमृत ध्वनि छन्द” श्री नवल सिंह भदौरिया “नवल” द्वारा ब्रज भाषा में रचित भगवान शिव को समर्पित कविता है। आनंद लें–

बन्दहु शंकर पदकमल, रहहु सदा निरशंक
महाकाल करि हैं कृपा ढढ्ढरि किंकर रंक।
ढढ् ढढ् ढरि अति रंकक्कर पर
धध् धध् धरिधन
खोलन्नेत्र मनोभव जरिय
विलोकज्जन जन
डड् डड् डमरू, दद् दद् दमकत
मस्तक चन्दहु
झझ् झझ् झरि सरि गग् गग् गिरि पर
बम बम बन्दहु।
बन्दहुँ शंकर पद कमल


शिव-स्तुति
(1)

हर हर कहत परम पद दरसत
बरषत बरबर बरध चढ़तखन।
अघ-गन हरन चरन नर अरचन,
परसत हरषत करन अमल मन।
गरल असन तन भसम अमर कर,
लरजस लरकत रहत सरप फन।
मदन हनन त्रय नयन बसत बन,
जय जय हर हर रटत रहत जन॥


(2)

अधर चलत खन कनक घर धरत,
करतल थकत न करत करत कर।
नयन सकल अघदहत अगन सत,
चरन धरत यश अटल करत हर।
अकल अचल रज रजत तन लसत,
अजर अजय डर नसत गरल धर।
अग जग रचत, हरत रच रच कर,
जय जय हरहर, जय जय हर हर॥


बन्दहुँ ईशान, क्षेत्रपाल, मारकण्डेश्वर
बिलवेश्वर, नीलकण्ठ लोचन कपाल कौं।
बेरि बेरि नमन यमेश्वर, बटेश्वर कौं,
ध्यान धरि राखौं बद्रीनाथ, मुण्डमाल कौं।
कटि में बछम्बर दिगम्बर विश्वम्भर है,
गंगेश्वर, कुण्डेश्वर मैटो जग-जालकौं।
नन्दी की सवारी संग गिरिजा दुलारी,
लाज राखौ जू हमारी है, प्रणाम चन्द्र-भालकौं॥


आस लैकैं आयौ सुनि पाप-ताप हारी नाँउ,
देर ना लगइयो उद्धार के करन में।
भव के जंजालनि में उरझतु गयौ रोजु-
सुरझि न पायौ रह्यो पेट ही भरन में।
जप-तप, पूजा-पाठ, नाहीं सत्संग कियौ,
समय बितायौ धार धरन लरन में।
हा हा खाँउ विश्वनाथ, करियो सनाथ नाथ,
एक बेर अपनी लै लीजियो शरन में॥


शंकर, पुरारी, मदनारी अघहारी हर,
आस है, तिहारी, हारी बात सुनि लीजियो।
मैं अति पापी, कहैं इतनौ न काफी,
माफीदंड तौ गिनाऊँ, पाप सुनि मति खीजियो।
देवनि के देव, महादेव जानि आयौ पास,
मोसे अधमनि पैहू एक बेर रीझियो।
फँस्यौ भव सागर में नवल कौ न जोर चलै,
गंग सीस बारे मैरो बेड़ा पार कीजियो॥


मनुज-दजुन-देवगन हू न पावैं पार
जाकौ जस ऊजरौ दिगन्तनि में पूरौ है।
नूतन किरीटनि की देखि छवि मन्द होति,
ऐसौ ज्योतिवन्त जटा जूटनि को जूरौ है।
सीस-गंग तारि भव बूड़त उबारि लेति,
सद्य फल चारि देत कहिबे कौं धतूरौ है।
तीनि लोक सम्पदा हू समता करै न याकी,
ऐसौ अनमोल बाकी कुटिया कौ कूरौ है॥


याको नाम लेत खन भाजत हैं पाप-पुंज,
वे ही विश्वनाथ निज जन कौं उबारेंगे।
त्रिगुन, त्रिलोकी, त्रिपुरेश और त्रिशूलधर,
मेरे अघ औगुन पहार फारि डारेंगे।
काम-रिपु अंग संग व्याल और कपाल लिए-
जुगनि के ढेर दोष-दूषन पजारेंगे।
कितनों हू पापी होय, हर हर कहेंते नित्य-
बात ही की बात भवसागर ते तारेंगे।

स्व. श्री नवल सिंह भदौरिया हिंदी खड़ी बोली और ब्रज भाषा के जाने-माने कवि हैं। ब्रज भाषा के आधुनिक रचनाकारों में आपका नाम प्रमुख है। होलीपुरा में प्रवक्ता पद पर कार्य करते हुए उन्होंने गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, सवैया, कहानी, निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाकार्य किया और अपने समय के जाने-माने नाटककार भी रहे। उनकी रचनाएँ देश-विदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। हमारा प्रयास है कि हिंदीपथ के माध्यम से उनकी कालजयी कृतियाँ जन-जन तक पहुँच सकें और सभी उनसे लाभान्वित हों।

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