श्रीराधा

“श्रीराधा” स्व. श्री नवल सिंह भदौरिया कृत ब्रज भाषा की मधुर कविता है, जिसमें उन्होंने श्री राधा रानी का सुन्दर वर्णन किया है।

लाल गुलाब से कोऊ कहै नव-पत्र तमाल बतावत कोऊ।
कोऊ कहै मनि मानिक से, गुलमेंहदी गुमान गिरावत कोऊ।
कोऊ कहै नभचन्द औ कंज प्रबाल मिसाल जतावत कोऊ।
कोऊ कहै बृषभानुजा के गंगाजल से पग पावन दोऊ।


कंचन लता सी किधौं चाक चंचला सी बाल,
चन्द्र की कला सी विमला सी उजियारी है।
अंग-अंग में अनंग, चूनरी कुसुम्भ रंग,
चालहू मतंग संग ग्वालि भीर भारी है।
कंचुकि में चंदन सुअंजन हू आँखिन में,
याकी हँसी दाड़िम की छाती फारि डारी है,
कंज कलिका सी, मलिका सी रम्भा-मैनका की,
कलप-लता-सी वृषभानु की दुलारी है।


माँगि के ललाई कमनाई मंजुताई पद्म-
फूले ना समात गात झुमत घनेरे हैं।
लाल हू प्रबाल जिन्हें देखि-देखि लाल भए,
मंजुल मराल मन नित देत फेरे हैं।
दामिनी छटपटाति जाति छिपि मेघनि में,
देखे कहाँ ऐसे काहू दिन के उजेरे हैं
पाप संताप नापि जात गैल हू ‘नवल’
नीके चंद हूते लाड़िली के पग हेरे हैं।


चाहों नहिं धन-धाम, चाहों नहि मुक्ति-काम।
चाहों नहिं नाम-जस, अभिराम पाऊँ मैं ।
इन्द्रासन, ब्रह्मासन, शेषासन हू न चाहौं।
चाहों नहिं अमिरत मीठे फल खाऊँ मैं।
तीरथ अकारथ उतारत न पाप-ताप,
चाहों नहिं ज्ञान की कृपान हथियाऊँ मैं।
चाहौं नित्य नवल प्रबल अभिलाष एक,
पाँइनि में लोटि-लोटि राधे गुन गाऊँ मैं।

स्व. श्री नवल सिंह भदौरिया हिंदी खड़ी बोली और ब्रज भाषा के जाने-माने कवि हैं। ब्रज भाषा के आधुनिक रचनाकारों में आपका नाम प्रमुख है। होलीपुरा में प्रवक्ता पद पर कार्य करते हुए उन्होंने गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, सवैया, कहानी, निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाकार्य किया और अपने समय के जाने-माने नाटककार भी रहे। उनकी रचनाएँ देश-विदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। हमारा प्रयास है कि हिंदीपथ के माध्यम से उनकी कालजयी कृतियाँ जन-जन तक पहुँच सकें और सभी उनसे लाभान्वित हों।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: यह सामग्री सुरक्षित है !!