ज्ञानयोग पर तृतीय प्रवचन – स्वामी विवेकानंद

“ज्ञानयोग पर तृतीय प्रवचन” में स्वामी विवेकानंद त्याग का सही अर्थ समझाते हैं। साथ ही इस व्याख्यान में वे ज्ञानयोगी के लक्षणों पर चर्चा कर रहे हैं। पढ़ें “ज्ञानयोग पर तृतीय प्रवचन”। स्वामी विवेकानंद की प्रस्तुत पुस्तक के शेष प्रवचन पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – ज्ञानयोग पर प्रवचन

ज्ञान हमें शिक्षा देता है कि संसार को त्यागना चाहिए, किन्तु इसी कारण से उसे छोड़ना नहीं चाहिए। संन्यासी की सच्ची कसौटी है, संसार में रहना किन्तु संसार का न होना। त्याग की यह भावना सभी धर्मों में किसीन-किसी रूप में सामान्यतः रही है। ज्ञान का दावा है कि हम सभी को समान भाव से देखें – केवल ‘समत्व’ का ही दर्शन करें। निन्दा-स्तुति, भला बुरा और शीत-उष्ण सभी हमें समान रूप से ग्राह्य होना चाहिए। भारत में ऐसे अनेक महात्मा हैं जिनके विषय में यह अक्षरशः सत्य है। वे हिमालय के हिमाच्छादित शिखरों पर अथवा मरुभूमि की प्रवाहमयी बालुका पर पूर्ण विवस्त्र और तापमान के अन्तरों से पूर्ण अचेतन जैसे विचरण करते हैं।

सर्वप्रथम हमें देह रूप कुसंस्कार को त्यागना है। हम देह नहीं हैं। इसके बाद इस कुसंस्कार को त्यागना चाहिए कि हम मन हैं। हम मन नहीं हैं, यह केवल ‘रेशमी देह’ है, आत्मा का कोई अंश नहीं। लगभग सभी चीजों में लागू होनेवाले ‘देह’ शब्द में ऐसा कुछ निहित है जो सभी देहों में सामान्यतः विद्यमान है। यह ‘सत्ता’ है। हमारे शरीर उन विचारों के प्रतीक हैं जो उनके पीछे हैं और वे विचार भी अपने क्रम में अपने पीछे की किसी वस्तु के प्रतीक हैं, वही एक वास्तविक सत्ता है – हमारी आत्मा की आत्मा, विश्व की आत्मा, हमारे जीवन का जीवन, हमारी वास्तविक आत्मा। जब तक हममें विश्वास है कि हम ईश्वर से किंचित् भी भिन्न हैं, भय हमारे साथ रहता है।1 किन्तु एकत्व का ज्ञान हो जाता है तो भय नहीं रहता। हम डरें किससे? ज्ञानी केवल इच्छा-शक्ति से जगत् को मिथ्या बनाते हुए शरीर और मन से अतीत हो जाता है। इस प्रकार वह अविद्या का नाश करता है और वास्तविक आत्मा को जान लेता है। सुख और दुःख केवल इन्द्रियों में हैं, वे हमारे प्रकृत स्वरूप का स्पर्श नहीं कर सकते। आत्मा देश, काल और निमित्त से परे है और इसीलिए सीमातीत तथा सर्वव्यापी है।

ज्ञानी को सभी नाम-रूपों से छुटकारा पाना ही हैं। उसे सभी नियमों और शास्त्रों से परे होना है एवं स्वयं अपना शास्त्र बनना है। नाम-रूप के बन्धन से ही हम जीव भाव को प्राप्त होते और मरते हैं। तथापि ज्ञानी को कभी उसे निन्दनीय न समझना चाहिए, जो अब भी नाम-रूप के परे नहीं हो सका है। उसे कभी दूसरे के विषय में ऐसा सोचना भी न चाहिए कि ‘मैं तुझसे अधिक पवित्र हूँ ’

सच्चे ज्ञानयोगी के ये लक्षण हैं –

  1. वह ज्ञान के अतिरिक्त और कुछ कामना नहीं करता।
  2. उसकी सभी इन्द्रियाँ पूर्ण नियन्त्रण में रहती हैं, वह चुपचाप सभी कष्ट सहन कर लेता है। उन्मुक्त आकाश के नीचे नग्न वसुन्धरा पर उसकी शय्या हो या वह राजमहल में निवास करे, वह समानरूपेण सन्तुष्ट रहता है। वह किसी कष्ट का परिहार नहीं करता, वरन् उसे बरदास्त और सहन कर लेता है । वह आत्मा के अतिरिक्त और सभी वस्तु छोड़ देता है।
  3. वह जानता है कि एक ब्रह्म को छोड़कर अन्य सब मिथ्या है।
  4. उसे मुक्ति की तीव्र इच्छा होती है। प्रबल इच्छा-शक्ति द्वारा वह अपने मन को उच्चतर वस्तुओं पर दृढ़ रखता है और इस प्रकार शान्ति प्राप्त करता है। यदि हम शान्ति को प्राप्त न कर सकें तो हम पशुओं से किस प्रकार बढ़ कर हैं? वह (ज्ञानी) सब कुछ दूसरों के लिए, प्रभु के लिए करता है; वह सभी कर्मफलों का त्याग करता है और इहलौकिक तथा पारलौकिक फलों की आशा नहीं करता। हमारी आत्मा से अधिक विश्व हमें क्या दे सकता है? उस आत्मा को प्राप्त करने से हम ‘सब’ प्राप्त कर लेते हैं। वेदों की शिक्षा है कि आत्मा या सत्य एक अविभक्त सत् वस्तु है। वह मन, विचार या चेतना, जैसा कि हम उसे जानते हैं, इनसे भी परे है। सभी वस्तुएँ उसी से हैं। वह वही है, जिसके माध्यम से (अथवा जिसके कारण से) हम देखते, सुनते, अनुभव करते और सोचते हैं। विश्व का लक्ष्य ॐ या एकमात्र सत्ता से एकत्व प्राप्त करना है। ज्ञानी को सभी रूपों से मुक्त होना पड़ता है; न तो वह हिन्दू है, न बौद्ध, न ईसाई, अपितु वह तीनों ही है। जब सभी कर्मफलों का त्याग किया जाता है, प्रभु को अर्पित किया जाता है, तब किसी कर्म में बन्धन की शक्ति नहीं रह जाती। ज्ञानी अत्यंत बुद्धिवादी होता है, वह हर वस्तु अस्वीकार कर देता है। वह दिन-रात अपने से कहता है, “कोई आस्था नहीं है, कोई पवित्र शब्द नहीं है, स्वर्ग नहीं, धर्म नहीं, नरक नहीं, सम्प्रदाय नहीं, केवल आत्मा है।” सब कुछ निकाल देने पर जो नहीं छोड़ा जा सकता, वहाँ जब मनुष्य पहुँच जाता है तो केवल आत्मा रह जाती है। ज्ञानी किसी बात को स्वयंसिद्ध नहीं मानता; वह शुद्ध विवेक और इच्छा-शक्ति द्वारा विश्लेषण करता रहता है। और अन्ततः निर्वाण तक पहुँच जाता है, जो समस्त सापेक्षिकता की समाप्ति है। इस अवस्था का वर्णन या कल्पना मात्र तक सम्भव नहीं है। ज्ञान को कभी किसी पार्थिव फल से जाँचा नहीं जा सकता। उस गृध्र के समान न बनो, जो दृष्टि से परे उड़ता है, किन्तु जो सड़े मांस के एक टुकड़े को देखते ही नीचे झपटने को तैयार रहता है। शरीर स्वस्थ होने तथा दीर्घ जीवन या समृद्धि की कामना न करो; केवल मुक्त होने की इच्छा करो।

हम हैं सच्चिदानन्द। सत्ता विश्व का अन्तिम सामान्यीकरण है; अतः हमारा अस्तित्व है, हम यह जानते हैं, और आनन्द अमिश्रित सत्ता का स्वाभाविक परिणाम है। जब हम आनन्द के सिवा न तो कुछ माँगते हैं, न कुछ देते और न कुछ जानते हैं, तब कभी-कभी हमें परमानन्द का एक कण मिल जाता है। किन्तु वह आनन्द फिर चला जाता है और हम विश्व के दृश्य को अपने समक्ष चलते हुए देखते हैं और हम जानते हैं कि ‘वह उस ईश्वर पर किया हुआ एक पच्चीकारी का काम है जो सभी वस्तुओं की पृष्ठभूमि है।’ (ज्ञान के बाद) जब हम पृथ्वी पर पुनः लौटते हैं और निरपेक्ष परम को सापेक्ष रूप में देखते हैं, तब हम सच्चिदानन्द को ही त्रिमूर्ति – पिता, पुत्र, और पवित्र आत्मा के रूप में देखते हैं। सत् सर्जक तत्त्व; चित् परिचालक तत्त्व; आनन्द साक्षात्कारी तत्त्व जो हमें फिर उसी एकत्व के साथ सम्बद्ध करता है। कोई भी सत् को ज्ञान (चित्) के अतिरिक्त अन्य उपाय से नहीं जान सकता। तभी ईसा के इस कथन की गम्भीरता समझ में आती है – ‘पुत्र के सिवाय कोई परम पिता को नहीं देख सकता।’ वेदान्त की शिक्षा है कि निर्वाण अब और यहीं प्राप्त किया जा सकता है और उसकी प्राप्ति के लिए मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं करनी है। निर्वाण आत्मानुभूति है और एक बार, केवल एक ही क्षण के लिए यदि कोई इसको प्राप्त कर ले तो उसे पृथक् व्यक्तित्व रूप मृग-तृष्णा द्वारा भ्रमित नहीं किया जा सकता है। चक्षु होने पर तो हम मिथ्या को अवश्य देखेंगे, किन्तु हम यह भी जान लेंगे कि वह किसके लिए है – तब हम उसके यथार्थ स्वरूप को जान लेते हैं। केवल परदा (माया) ही है जो उस अपरिवर्तनशील आत्मा को छिपाये रखता है। जब परदा हट जाता है, हम उसके पीछे आत्मा को पा जाते हैं, पर सब परिवर्तन परदे में है। सन्त में परदा पतला होता है और मानो आत्मा का प्रकाश दिखायी देता है; किन्तु पापी लोगों में परदा मोटा होता है और वे इस सत्य को नहीं देख पाते कि आत्मा वहाँ भी है, जैसे कि सन्तों के पीछे।

केवल एकत्व में पहुँचकर ही सब तर्क समाप्त हो जाते हैं। इसलिए हम पहले विश्लेषण करते हैं, फिर संश्लेषण। विज्ञान के जगत् में एक आधार-शक्ति की खोज में दूसरी शक्तियाँ धीरे-धीरे संकीर्ण होती जाती हैं। जब भौतिक विज्ञान अन्तिम एकत्व को पूर्णतया समझ जाएगा तो वह एक अन्त पर जा पहुँचेगा, क्योंकि एकत्व प्राप्त करके हम विश्रान्ति या अन्तिम को पाते हैं। ज्ञान ही अन्तिम बात है।

सभी विज्ञानों में सर्वाधिक अनमोल विज्ञान, धर्म ने बहुत पहले ही उस अन्तिम एकत्व को खोज लिया था, जिसे प्राप्त करना ज्ञानयोग का लक्ष्य है। विश्व में केवल एक ही आत्मा है, अन्य निम्न स्तर की जीवात्माएँ उसकी अभिव्यक्ति मात्र हैं। लेकिन आत्मा अपनी सभी अभिव्यक्तियों से महतोमहीयान् है। सभी कुछ आत्मा अथवा ब्रह्म ही है। साधु, पापी, शेर, भेड़, हत्यारे भी यथार्थतः सिवा ब्रह्म के अन्य कुछ नहीं हो सकते। क्योंकि अन्य कुछ है ही नहीं। एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति – ‘सद्वस्तु एक है, ब्रह्मविद् उसे तरह-तरह से वर्णन करते हैं।’ इस ज्ञान से उच्चतर कुछ नहीं हो सकता और योग द्वारा लोगों के शुद्ध अन्तःकरण में वह ज्ञान अचानक ही स्फुरित होता है। कोई जितना ही अधिक योग और ज्ञान द्वारा शुद्ध और योग्य हो चुका है, उतना ही अनुभूति-स्फुरण स्पष्टतर होता है। ४००० वर्ष पूर्व इस योग का आविष्कार हुआ था, किन्तु अब तक भी यह ज्ञान मानव-जाति की सम्पत्ति नहीं हो सका है। अब भी यह कुछ व्यक्तियों की ही सम्पत्ति है।


  1. यदा ह्यैवेष एतस्मन्नुदरमन्तरं कुरुते ।
    अथ तस्य भयं भवति ॥
    तै. उप. २। ६॥

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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