पुत्र की सीख – जातक कथा

“पुत्र की सीख” महत्वपूर्ण जातक कथा है। इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि हमें अपने माता-पिता का सदैव सम्मान करना चाहिए। अन्य जातक कथाएँ पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – जातक कथाएं

The Tale Of An Intelligent Son: Jatak Katha In Hindi

तक्कल जातक की गाथा – [यहाँ कंद मूल नहीं है। पकाने योग्य कोई पदार्थ नहीं है। न कोई ऐसी चीज ही है जो कच्ची खाई जा सके। हे पिता! फिर मृत्यु के मुख के समान यह बड़ा गड्ढा यहाँ क्यों है, जिसकी कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती।]

वर्तमान कथा – पिता और पत्नी

जिस समय भगवान जेतवन में निवास करते थे उस समय श्रावस्ती के समीप एक गांव में एक अत्यन्त ग़रीब परिवार रहता था। तरुण पुत्र अपने माता-पिता की सेवा में लीन रहता था और मेहनत मजदूरी करके जो कुछ लाता था, उसी में सब की गुज़र होती थी। जब उसकी माँ का देहान्त हो गया तो वृद्ध पिता ने कहा, “बेटा, अब तो मुझे तेरे लिये एक बहू जल्दी ही ढूँढ़नी पड़ेगी।”

युवक के मना करने पर भी वृद्ध पिता ने उसका विवाह कर डाला। बहू घर में आ गई और कुछ दिन बड़े सुख से बीते। बहू को पिता की सेवा तत्परतापूर्वक करते देख पुत्र भी उससे स्नेह करने लगा।

धीरे-धीरे बहू ने रंग बदलना प्रारम्भ किया। अब वह ससुर की सेवा में लापरवाही करने लगी। कभी पानी अति गरम हो जाता, तो कभी अति ठंडा। कभी शाक में नमक होता ही नहीं और कभी इतना अधिक कि खाया न जा सके। घर में जगह-जगह थूककर वह अपने पति को ससुर की गन्दगी दिखाती थी। अंत में उसने एक दिन अपने पति से कहा कि इस घर में या तो आपके पिता जी ही रहेंगे या मैं ही रहूँगी। दोनों का रहना हो नही सकता।

पति ने कहा, “मेरे पिता जी वृद्ध हैं। उनके कहीं जाने का प्रश्न ही नहीं उठता है। तुम जवान हो, जहाँ चाहो जा सकती हो।” पति की इस बात ने उसकी आँखें खोल दी। उसने समझ लिया कि इस प्रकार मैं अपने पति को पिता के विरुद्ध आचरण करने के लिये तयार नहीं कर सकती।

अब उसका आचरण भी फिर से ठीक हो गया और परिवार में सुख के दिन लौट आए। उस स्त्री का पति जेतवन में भगवान बुद्ध के दर्शनों को आया करता था, वहीं उसने यह बात कही। भगवान ने कहा इस बार तो तूने पत्नी की बात नहीं मानी, परन्तु इससे पूर्व तू एक बार उन्हें जीवित ही गाड़ देने को तयार हो गया था। लोगों के जिज्ञासा करने पर तथागत ने पूर्व जन्म की “पुत्र की सीख” नामक कथा इस प्रकार कही–

अतीत कथा – पुत्र की पिता को सीख

जिस समय काशी में ब्रह्मदत्त राज्य करता था, उसी समय काशी के निकट एक ग्राम में वशिष्ठक नामक एक तरुण रहता था जो अपने माता पिता की सेवा में रत रहता था। उसकी माता का देहान्त हो जाने पर उसके पिता ने उसका विवाह कर दिया और बहू ने घर सम्हाल लिया।

कुछ दिन बाद इस बहू से वशिष्ठक को एक पुत्र उत्पन्न हुआ जो बहुत ही समझदार था। धीरे-धीरे बहू ससुर का काम करने से जी चुराने लगी। वृद्ध पुरुष न चल सकता था, न अपना कोई काम स्वयम् कर सकता था। उसे सभी कामों के लिये दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था। पत्नी ने धीरे-धीरे पति के कानों में विष भरना प्रारम्भ किया। यहां तक कि वह भी अपने पिता को एक मुसीबत समझकर उससे छूटने की बात सोचने लगा।

एक दिन पति-पत्नी ने परामर्श किया कि बुड्ढे को मरघट में ले जाकर एक गड्ढे में बन्द कर देंगे। शाम को ही यह घोषित कर दिया गया कि एक कर्जदार कर्ज नहीं देता है; सबेरे ही पिता जो को लेकर वशिष्ठक वहाँ जायगा, जिससे वह इनकार न कर सके। पिता ने सोचा कहीं मैं मर गया तो फिर रुपया उससे मिलना कठिन हो जायगा, अतएव राजी हो गया।

वशिष्ठक का पुत्र इस समय सात वर्ष का हो चुका था। उसने अपने माता-पिता की गुप्त बातें सुन ली थीं। सबेरे वह मचल गया और गाड़ी पर जा बैठा।

गाँव से बाहर विश्राम के लिये पिता को एक ओर बिठा कर वशिष्ठक पेड़ों की आड़ में जाकर गड्ढा खोदने लगा। जब गड्ढा खुद गया तो उसका पुत्र बाबा के पास से भागकर वहाँ जा पहुँचा। उसने उस गड्ढे को देखकर उपरोक्त गाथा कही – यहाँ कंद मूल नहीं है। पकाने योग्य कोई पदार्थ नहीं है। न कोई ऐसी चीज ही है जो कच्ची खाई जा सके। हे पिता! फिर मृत्यु के मुख के समान यह बड़ा गड्ढा यहाँ क्यों है, जिसकी कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती।

पिता ने कहा, “हे बेटा! तेरा बाबा अब बहुत बूढ़ा हो गया है। उससे चला-फिरा नहीं जाता। उसे बहुत कष्ट है। हम उसे इस गड्ढे में रख देंगे। मृत्यु के बिना उसके कष्ट दूर नहीं हो सकते।

पुत्र ने कहा, “हे पिता! मुझे तो यह काम ठीक नहीं मालूम होता। यह तो घोर पाप है। मनुष्य को मारकर गड्ढे में डालना, वह भी अपने ही पिता को। फिर भी यदि यही परंपरा अपने कुल की है तो लाइये फावड़ा, मैं भी आप के लिए एक गड्ढा अभी से तयार कर लूं।”

पुत्र की सीख सुनकर वशिष्ठक सन्नाटे में आ गया। उसे अपना पाप और उसके भयंकर परिणाम स्पष्ट दिखाई देने लगे। उसने बच्चे को हृदय से लगाकर कहा, “बेटा! तेरा उपकार कभी न भूलूंगा। तूने ठीक समय पर मुझे चेता दिया, नहीं तो जाने क्या हो जाता।”

घर आकर बालक ने अपने पिता को सलाह दी कि माँ यदि बाबा के साथ न रहना चाहे, तो इन्हें अलग रहने दीजिये। क्रोध में भरी वशिष्ठक की पत्नी पड़ोसी के घर जाकर रहने लगी।

कुछ दिन पश्चात् बालक ने पिता से कहा, “पिता जी! माँ को ठीक रास्ते पर लाना है।”

पिता ने कहा, “अब क्या करने को कहता है?”

“कल प्रातःकाल आप गाड़ी लेकर बाहर जायेंगे। गाँव में कह दीजिये कि घर में स्त्री के बिना बड़ी तकलीफ होती है, इसलिये पास के गाँव में एक रिश्तेदार के यहाँ सम्बन्ध करने जा रहा हूँ।”

बात वशिष्ठक को पत्नी के कान में पहुंची। वह घबड़ाई हुई पुत्र के पास आई और बोली, “बेटा, मेरी बात तू नहीं सुनेगा तो कौन सुनेगा?” पुत्र ने माँ की वन्दना की और कहा, “माँ! तू स्वयम् ही अपना अधिकार छोड़कर चली गई थी। आ क्यों नहीं जाती वापिस?” इस प्रकार पुत्र की सीख से उस परिवार में शान्ति फिर लौट आई।

बुद्ध बोले, “इस कथा में वशिष्ठक तो वही युवक था, पंरतु बालक मैं स्वयम् था।”

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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