मोती रत्न की कीमत व फायदे

मोती रत्न के अनेक नाम हैं। इसे मुक्ता, मौक्तिक, शुक्तिज, इन्दुरत्न, मोती आदि नामों से जाना जाता है। मोती को उर्दू-फ़ारसी में मुरवारीद और अंग्रेज़ी में Pearl कहा जाता है। आइए, जानते हैं कि मोती रत्न की कीमत क्या है।

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मोती रत्न की कीमत

आज-कल असली मोती बड़ी ही मुश्किल से प्राप्त होता है। मोती ने नाम पर प्रायः जो वस्तु प्राप्त होती है उसे विशुद्ध मोती कहना बहुत कठिन है। किंतु ऐसा भी नहीं है कि असली मोती बिल्कुल ही अप्राप्य है। असली मोती रत्न की कीमत की चर्चा की जाए तो 3 कैरेट का मोती एक हज़ार रुपये से तीन हज़ार रुपये के बीच मिल जाता है। वहीं 5 कैरेट के मोती की कीमत चार से पाँच हज़ार रुपये की है। यदि बात की जाए 7 कैरेट के मोती की, तो यह छः हज़ार रुपये तक के मूल्य में मिल जाता है।

यहाँ हम औसत कीमत की ही बात कर रहे हैं यानी कि औसत गुणवत्ता वाले रत्न की। किसी भी रत्न की गुणवत्ता जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, उसका मूल्य भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है। आपकी सुविधा के लिए असली मोती की कीमत की यह तालिका भी दी जा रही है–

वजन (कैरेट में)कीमत (रुपये में)
33,000
55,000
76,000

मोती की माला की कीमत

अब बात करते हैं कि मोती की माला की कीमत कितनी होती है। ज्योतिष शास्त्र में चन्द्र देव का रत्न है मोती। मोती की माला धारण करना न केवल चन्द्रमा को प्रसन्न करता है, बल्कि मन को भी सबल बनाता है। बहुत सारे लोग यह माला सौन्दर्य कारणों से भी पहनते हैं। छोटे मोती की माला की कीमत लगभग एक हज़ार रुपये के आस-पास होती है। इसे खरीदते समय अवश्य परख लें कि मोती असली है या नकली। 

पर्ल के भौतिक गुण

मोती रत्न की कीमत के बाद अब बात करते हैं इसके भौतिक गुणों के बारे में। वस्तुतः यह एक पत्थर नहीं है बल्कि एक जैविक रचना है। रासायनिक तत्त्व की दृष्टि से यह कैल्शियम कार्बोनिट है जिसका आपेक्षिक घनत्व 265 या 269 से लेकर 284 या 289 तक है। कठोरता–3 5-4 मोतियों के भीतर परतों की स्थिति लगभग समकेन्द्रिक तथा समान्तर, अपारदर्शक होती है। मोती रत्न के बारे में प्रसिद्ध है–

कदली, सीप, भुजगमुख स्वाति एक गुण तीन।
जैसी संगति बैठिये, तैसोई फल दीन॥

स्वाति नक्षत्र में बूंद से बनने की मान्यता

कहते हैं कि स्वाति नक्षत्र के उदय रहते बरसी बूंद जब घोंघे के खुले मुँह में समाती है तब वह मोती बन जाती है। वही बूंद केले मे जाकर कपूर और साँप के मुँह में पड़कर हलाहल विष बन जाती है। हमारे साहित्यिक तथा साधु-संत लोग न जाने कब से संगति के प्रभाव को समझाने मे स्वाति-बूंद का यह उदाहरण देते आये हैं। खारे समुद्र के वासी घोंघे के पेट में मोती बनता है–यह कहावत इस उद्देश्य को तो सुझाती ही है, पर साथ ही यह भी बताती है कि घोंघे के पेट में मोती सदा ही नहीं बनता–उसके बनने की भी एक खास घड़ी ही होती है। कब स्वाती नक्षत्र के उदय रहते पानी बरसेगा और कब घोंघे का मुँह खुलेगा कि उसमें वह बूंद समाये और मोती बनाये । बेचारे गोताखोर, बच्चे और 70 वर्ष तक के बूढ़े गोताखोर भी गोते लगा-लगा कर थक कर चकनाचूर हो जाते हैं। वे समुद्र की तलहटी में से हजारों सीपें निकालकर उन्हें खोलते हैं पर क्या सभी में से मोती निकलता है? नहीं, कदापि नहीं। सन्‌ 1947 में एक नौका नें 35,000 सीपें एकत्रित कीं परन्तु उनमें से केवल 19 मोती निकले। इन 19 में से भी केवल तीन ही मोती रत्न थे।

हम पहले बता आये है कि मानव ने “रत्न” नाम उस पदार्थ को दिया है जिसमें तीन गुण अवश्य हों–सौन्दर्य, टिकाऊपन और दुर्लभता। ये तीन गुण किसी रत्न में कम, किसी में अधिक पाये जाते है; पर पाये अवश्य जाते हैं। घोंघे के पेट में उत्पन्न होकर पालित-पोषित ‘मोती’ सुन्दर होने के साथ-साथ कितना दुर्लभ है, यह बात इसकी जन्म कथा से भली-भाँति स्पष्ट हो जाती है।

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मोती रत्न के निर्माण का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

आज के वैज्ञानिक भला इस बात को क्यों मानने लगे कि मोती का जन्म अचानक होता है। परन्तु इसकी दुर्लभता तो आँखों से साफ दिखायी दे रही थी। वैज्ञानिकों की मान्यता है कि घोंघे के पेट में कभी-कभी कोई विजातीय पदार्थ अचानक जा पैठता है। वह उसकी चुभन को अनुभव करता है। उसे निकालने की पूरी कोशिश करता है। कभी-कभी सफल भी हो जाता है। परन्तु जब सफल नहीं हो पाता तो उसको अपने ही अंगों से निकाले गये एक पदार्थ की तहें चढ़ा-चढ़ाकर ऐसा चिकना बना लेता है कि फिर उसको वह वस्तु चुभती नहीं, पीड़ा नही पहुँचाती।

घोंघे की सीप को खोलकर देखने वाले गोताखोर की आँखों को चौंधिया देने वाला यही पदार्थ तो ‘मोती रत्न’ है। घोंघे के पेट में जा पैठने वाला विजातीय पदार्थ कंकड़ का कोई कण, दूसरे पर पलने वाला कोई छोटा कीड़ा, सींग-सा कठोर कोई अकार्बनिक पदार्थ, कोई भी होना सम्भव है। परन्तु यह बड़े आश्चर्य की बात है कि वैज्ञानिकों ने मोतियों को काट कर देखा है परन्तु उन्हें आज तक भी कभी कोई ऐसा पदार्थ मोती में से मिला नहीं है। आयुर्वेद प्रकाश के टीकाकार का यह लिखना असंगत प्रतीत नहीं होता कि शुक्ति के ढकक्‍कन और कीट (घोंघे) की त्वचा के बीच स्वाती नक्षत्र के जल-बिन्दु जाने की कहावत और शास्त्रीय आधार अनन्तकाल से सुना जाता है और यह सत्य भी है। स्वाती नक्षत्र में बरसे जल-बिन्दुओं के प्रविष्ट होने से निर्मित मोतियों की आभा और आकृति सर्वोत्तम होती होगी यह निर्विवाद है।

बनावट

अ्रब आप यह ध्यान में लाने का यत्न कीजिये कि मोती कैसा होता है। मधुमक्खियों का छत्ता मधुकोष तो आपने देखा होगा, मधुछत्ता छः भुजाओं वाले मधु से भरे कोषों अथवा थैलियों का एक जाल होता है। सच्चे मोती का भी एक ढाँचा होता है। मोती बहुत ही महीन, समान्तर पक्तियों में क्रम से स्थापित, परतों का बना एक गोला होता है। इसकी प्रत्येक परत मे अनेक थैलियों की एक सुकुमार झिल्‍ली-युक्त जाली होती है। इस जाली का ढाँचा ‘कोनचायोलिन’  (Cochilion) नामक एक सींग-सरीखे पदार्थ का बना हुआ होता है। ढाँचे के बीच का खाली स्थान ‘ऐरेगोनाइट’ (Aragonite) नाम के पदार्थ के छोटे-छोटे रवों से भर जाता है। ‘ऐरेगोनाइट’ कैल्सियम कार्बनिट (Calcium Carbonate – चूने का कार्बोनिट) का एक रूप है। सच्चे मोतियों का यह ढाँचा इतना सूक्ष्म होता है कि शक्तिशाली सूक्ष्म दर्शक यंत्र से भी नहीं दिखायी देता। ऐरेगोनाइट के ये कोष मोती की प्रत्येक परत पर लम्बरूप में सीधे और नियमित रूप से लगे रहते हैं अर्थात्‌ जिस दिशा में पहिये के नाभि चक्र से निकलते हुए और लगे हुए होते हैं–वैसे ही ये छोटे-छोटे रवे मोती के केन्द्र से बिखरे हुए रहते हैं।

यदि किसी ने सच्चा मोती रत्न न भी देखा हो तो सामान्य सीपियाँ तो देखी ही होंगी। यह सीपी घोंघे का घर कहिये अ्रथवा उसका रक्षक कवच होता है। सीपी को भीतर से देखिये–यह इन्द्रधनुष के समान सतरंगी चमक देती है। यह सतरंगी चमक ही विशेष रूप से उत्कृष्ट होकर सीप में से मोती के चुरने का कारण बनती है। अभिप्राय यह है कि सीप का भीतरी अस्तर जिस पदार्थ का बना हुआ होता है, मोती की तहें भी उसी पदार्थ से बनती हैं। इसी पदार्थ  का नाम ‘नेकर’ (Nacre) या मुक्ता-माता (Mother of pearl) है। इस प्रकार सच्चा मोती चाँदी सी चमकवाला, एक केन्द्र के चारों ओर (संकेन्द्रिक) समानन्‍तर पर अवस्थित उक्त ‘नेकर’ की हजारो तहों का बना एक ठोस पदार्थ होता है। ये हजारो तहें कभी एक-साथ नहीं बनतीं, रुक-रुक कर जमती हैं। इसलिये इन पतली-पतली तहों के संगम स्थान से प्रकाश की गति रुकती है। उसकी गति में बाधा पड़ती है। इसका परिणाम यह है कि इस अपारदर्शी ठोस पदार्थ (सच्चे मोती रत्न) की इन सूक्ष्म परतों से टकराकर दर्शक की आँखों में आयी किरणें एक विशेष प्रकार की झिलमिल उत्पन्त कर देती हैं। मोती की यह विशेष चमक मौक्तिक आभा अथवा प्राच्य (Orient) आभा कहलाती है। मोती रत्न की उत्कृष्टता इसी आभा पर निर्भर करती है।

विचित्र किन्तु सत्य

देखी आपने प्रकृति की विचित्रता और दुर्बोध्यता! इसी को भगवान्‌ की लीला भी कह सकते हैं। वैज्ञानिक बताते हैं कि ईंधन के काम में आने वाला कोयला अथवा कार्बन पदार्थ और पेंसिल वाला सीसा ही शुद्ध रूप कार्बन हीरा होता है। और 90  प्रतिशत चूने के कार्बोनिट का बना मोती, सेलखडी से, चाक से, मूंगे, संगमरमर तथा शंख से कितना भिन्‍न है। ये सभी पदार्थ एक ही जाति के हैं, फिर भी इनके सामान्य भौतिक, रासायनिक, प्रकाशीय, औषधीय गुणों और प्रभावों में महान्‌ अन्तर है। यह सारा अन्तर इनकी संरचना, आकृति एवं जन्म स्रोत की विभिन्‍नता से ही तो है।

संसार भर के साहित्य मे प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद है। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में मोती का ‘कृशन’ नाम आया है। पिपरावा के स्तूप से प्राप्त शाक्यमुनि के अवशेषों में मोतियों के दाने मिले हैं। संस्कृत साहित्य के साहित्यिक, आयुर्वैदिक तथा ज्योतिष के ग्रन्थों में मुक्ता (मोती), मैक्तिक-हार, मुक्ता-जाल आदि का विस्तृत विवरण मिलता है। रोम के निवासी मोतियों का विशेष आदर करते थे। वहाँ विशेष पदाधिकारी व प्रतिष्ठित व्यक्तियों को मोती धारण करने का अधिकार प्राप्त था। प्लिनी के लेखानुसार मोती संसार का सबसे अधिक मूल्यवान पदार्थ था और भारतीय हीरे के बाद मोती को ही सब से अधिक मूल्यवान समझते थे।

सीप मोती

सच्चा मोती तो आजकल वैज्ञानिकों की दृष्टि में भी वही होता है जो घोंघे के पेट में की झिल्लीदार थैली (Cyst) में बनता है। मुक्‍ता माता (Nacre, नेकर) के बने इस सीप मोती की थैली घोंघे के कठोर बाह्य आवरण (Shell) से चिपकी नहीं रहती इसलिये यह निर्बाध रूप से थैली मे लुढ़कता-पुढ़कता पूरा गोल हो जाता है अथवा नाशपाती के आकार का बन जाता है।

वैज्ञानिकों का कथन है कि कभी-कभी घोंघे के भीतर घुसने वाला विजातीय पदार्थ, रेत का कण अ्रथवा कीट आदि घोंघे के ऊपर वाले सख्त आवरण (Shell) तथा उसकी भीतरी त्वचा अथवा आवरण (Mantle) के मध्य रह जाता है। उसके शरीर के नरम गुदगुदे उदर भाग में नहीं पहुँच पाता। इस अवस्था में भी मोती बनता है परन्तु वह सीप से चिपका रहने के कारण निर्बाध गति से लुढ़क-पुढ़क नहीं पाता और पूरा गोल नहीं बन पाता। ऐसा सीप मोती चपटा और बेडौल रह जाता है। इन्हे अंग्रेजी मे ‘बैरौक’ (Baroque) अथवा ‘छाला’ (Blister) मोती भी कहते है।

सच्चा मोती

खाने योग्य घोंघे के पेट में से भी एक सख्त गोली-सा पदार्थ मिलता है। यह प्रायः काला और चमक-रहित होता है। यह मोती रत्न नहीं है। फिर सच्चा मोती तो प्रायः खारे समुद्रजल की सीपों से ही मिलता है। नदी, झील आदि के मीठे जल की सीपी के मध्य भाग से मिलने वाला मोती सच्चा मोती नहीं होता। उसमें मुक्ता-माता अथवा मौक्तिक पदार्थ (Nacre, नेकर) ही नहीं होता। शंखो से मिलने वाले मोती भी ऐसे ही होते हैं। इनमें मुक्तामाता की एक दूसरे से मिली संकेन्द्रिक तहें ही नहीं होतीं। इसलिये इनमें मौक्तिक आभा का भी अभाव रहता है।

परन्तु कभी-कभी शंखों में निर्मित मोती गुलाबी रंग के और बड़े सुन्दर निकलते हैं–वे पर्याप्त मूल्य के होते हैं। इनकी सतह पर से आग की-सी लौ उठती दिखायी देती है (रिचार्ड टी लिड्डिकोट, कनिष्ठ)। सन्‌ 1857 में पेटसन स्थान के समीप से लगभग 93 ग्राम का एक ऐसा ही सुन्दर मोती मिला था और उसका नाम क्वीन–’मुक्तारानी’ रखा गया था।

श्रेष्ठ मोती रत्न के गुण

आधुनिक वैज्ञानिक सच्चे मोती के दो गुण गिनते हैं–पहला इसकी विशेष चमक अथवा विशेष उज्ज्वल, मौक्तिक अथवा प्राच्य (Orient) आभा और दूसरा इसके ऊपरी तल पर सुकुमार (मनोरम) सतरंगी (इन्द्रधनुषी) अभिनय।

भारतीय साहित्य में उत्तम मोती वह बताया है कि जिसको देखते ही मन प्रसन्‍त हो उठे (ह्लादि), जिसका रंग श्वेत हो, जो हल्का हो, जिसका गुरुत्व अधिक न हो, चिकना हो। जो चन्द्रमा की किरण के समान निर्मल हो, बड़ा हो, जल के तुल्य परछाई उत्पन्न करने वाला और गोल (सुडोल) हो। श्रेष्ठ मोती रत्न के ये नौ गुण हैं (आयुर्वेद प्रकाश अ० 5 श्लोक 94)। एक अन्य प्राचीन ग्रन्थ में उत्तम मोती के निम्न गुण लिखे हैं–

सुतारं च सुवृत्तं च, स्वच्छं च, निर्मलं तथा।
घनं, स्निग्ध सुच्छायं तथा (अ) स्फुटितमेव च  

इनको खूब भन से बेठा लीजिये। इस श्लोक के अनुसार श्रेष्ठ मोती रत्न तारे की-सी दीप्ति बिखेरता है (सुतारम्)। वह पूरा-पूरा गोल होता है (सुवृत्तम)। अच्छा मोती स्वच्छ, अत्यंत शुचि और मल-रहित होता है, ठोस होता है, चिकना होता है। उसमें छाया (परछाई) पड़ती है और अस्फुटित अर्थात्‌ कहीं भी चोट खाया नहीं होता है। उस पर किसी प्रकार की रेखायें नहीं होतीं। ‘छायास्तु त्रिविधा स्मृता मधु-सिता-श्रीखण्ड-खण्डश्रिय – आयुर्वेद प्रकाश-कार का कहना है कि श्रेष्ठ मोती में झाई तीन प्रकार की, शहद, मिश्री तथा चन्दन के टुकड़े सरीखी होती है।

मोती के दोष

मोतियों के अनेक प्रकार के दोष गिनाये गये हैं–इनमें से कुछ को ‘बड़ा’ और कुछ को छोटा दोष भी कहा गया है। आजकल के जौहरियों के अनुसार इन दोषो की गिनती इस प्रकार है–

  1. ऊपरी तल पर दरार अर्थात्‌ गरज होना अथवा मोती का फटा हुआ होना।
  2. सतह पर बारीक रेखाओं अथवा लहरों का होना।
  3. मोती के चारों ओर वलयाकार रेखा का होना–ऐसा प्रतीत होना कि दो टुकड़े-जुड़े हुए हों अर्थात्‌ गिडली।
  4. मोती का मस्से जैसा होना।
  5. मोती का रूखा अर्थात्‌ चमकरहित होना।
  6. चोभा (चेचक के दाग के समान)।
  7. छाले जैसा।
  8. धब्बा होना।
  9. मोती मटिया हो अर्थात्‌ उसके भीतर मिट्टी हो।
  10. म्यानी अथवा मगज मोती होना। ऐसे मोतियों का मध्य भाग काठ के समान और ऊपरी सतह झिल्‍ली के समान झीनी होती है। यह मोती सरलता से बिध जाते हैं। इन पर परतें कम होती हैं। इस कारण झीनी झिल्‍ली पर श्याम (काली) आभा होती है। इनमें कैल्शियम पदार्थ, मुक्तामाता पदार्थ, नहीं होता।

सीपी को छोड़ कर अन्य पदार्थों में उत्पन्त मोती

प्राचीन शास्त्रों के अनुसार मोती सीपी के अतिरिक्त दूसरे पदार्थों से भी मिलता है। इनके नाम हैं–

  1. हाथी का गण्डस्थल
  2. शंख
  3. मछली
  4. सुअर
  5. बाँस
  6. सर्प का मस्तिष्क
  7. बादल

गज आदि से उत्पतन्न मोतियों के लक्षण इन प्राचीन शास्त्रों मे बताये हैं। परंतु साथ ही यह भी कह दिया है कि ये मनुष्यों को कभी प्राप्त नहीं होते। मेघ से उत्पन्न मोती को तो देवता लोग आकाश में ही पकड़ लेते है। शास्त्रों में इनको इतना पवित्र माना गया है कि ये बीघने के अयोग्य माने गये हैं। आजकल केवल सीपी से निकले मोतियों का ही प्रचलन है और उनके गुण हम ऊपर लिख आये हैं। हाँ, शंख मोती को गरुड़ पुराण में चन्द्रमा के समान कांतिवाला, गोल और चमकीला बताया है। अलाउद्दीन के कोषगाराध्यक्ष मन्त्री ठक्कुर फेरू द्वारा रचित “रत्न परीक्षा” के अनुसार यह सफेद, हल्का और अरुण होता है। आरोग्य प्रकाश में इसको शुक्र तारे के समान कांतिवाला बताया है। आचार्य चाणक्य ने भी अर्थशास्त्र मे शुक्ति के साथ शंख को मोती की योनि बताया है। मोती की शेष योनियों को उन्होंने महत्त्व नहीं दिया है।

आजकल के वैज्ञानिक भी शंख-मोती का अस्तित्व मानते हैं। वे कहते है कि शंख के भीतर हलके नारंगी-लाल अथवा गुलाबी रंग के ठोस पदार्थ बन जाते हैं। यद्यपि वे मुक्ता-माता अथवा मुक्ता बनने वाले पदार्थ से रहित होते हैं। इनका विशेष लक्षण यह है कि इनके तल पर से प्रक्षिप्त होकर प्रकाश की किरणें एक विशेष प्रकार के नियमित नमूने-से बनाती हुई जाती दिखायी देती हैं।

कौन धारण करे?

मोती चन्द्र ग्रह का रत्न है। चन्द्रमा को ज्योतिष शास्त्र में मन का कारक माना जाता है। जीवन में सारी सफलता और प्रसन्नता का स्रोत मन ही तो है। जिसका मन नियंत्रण में है और मनोबल उच्च है, उसे संसार में धन-धान्य और यश सहज ही प्राप्त हो जाता है। जिस व्यक्ति की कुंडली में चन्द्र निर्बल हो अथवा जिसे अपना चन्द्रमा बलवान करना हो, उसे ज्योतिषी प्रायः मोती रत्न धारण करने की सलाह देते हैं। यह रत्न जलीय है। स्त्रियों के लिये विशेष उपयोगी बताया गया है। कुछ विद्वान तो यहाँ तक कहते हैं कि इसको केवल स्त्रियाँ ही धारण करें। यद्यपि यह मत सर्वमान्य नहीं है। इसको धारण करने वाली महिलाओं में लाज, लावण्य आदि स्त्रियोचित गुणों का विकास होता है। स्त्रियाँ मोतियों को चूड़ियों और बुन्दों मे जड़कर अथवा हार में गूंथ कर पहनती हैं।

चन्द्र कर्क राशि का स्वामी है। सूर्य कर्क राशि में 15 जुलाई से 14 अगस्त तक (पाश्चात्य गणना के अनुसार 22 जून से 22 जुलाई तक) रहता है। इस अवधि में उत्पन्न व्यक्तियों पर चन्द्र ग्रह का प्रभाव रहता है। अंक ज्योतिषियों के अनुसार इस अवधि में उत्पन्त व्यक्तियों का मूल अंक 2 माना गया है। जिन व्यक्तियों को अपने जन्म समय का ठीक ज्ञान न हो उन्हें अकं विज्ञान की विधि से नाम के अक्षरों के अंक गिनकर अपना मूल अंक निकाल लेना चाहिए। दो मूल अकं वालों को चन्द्र ग्रह के अशुभ प्रभाव से बचने के लिये मोती रत्न धारण करना चाहिए।

मोती रत्न धारण विधि

कम-से-कम 3 रत्ती का मोती पहना चाहिए। मोती को 15 जुलाई से 14 अगस्त तक के महीने में पड़ी 2, 11, 20 और 26 तारीखो में के सोमवार को शुल्क पक्ष में धारण करना चाहिए। कृष्णपक्ष में मोती का धारण निषिद्ध है। निम्नलिखित मंत्र पढ़कर इस रत्न को धारण करना चाहिए–

इमं देवा अ सपत्नं सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठाय महते जानराज्यायेद्रिंयस्येंद्रियाय।
इममुष्यै पुत्र ममुष्यैपुत्र विश एष वोनी
राजा सोमोस्माकं ब्राह्मणानां राजा॥

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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