व्यावहारिक जीवन में वेदान्त – द्वितीय भाग

Practical Vedanta (Part 2) in Hindi

यह स्वामी विवेकानंद की जानी-मानी कृति है। दरअस्ल, यह पुस्तक उनके चार व्याख्यानों का सङ्कलन है। पूर्ववर्ती व्याख्यान पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – व्यावहारिक जीवन में वेदान्त (प्रथम भाग)

(12 नवम्बर, 1896 ई० को लन्दन में दिया हुआ व्याख्यान)

मैं छान्दोग्य उपनिषद से, एक बालक को किस प्रकार ज्ञान प्राप्त हुआ, इस सम्बन्ध में एक अत्यन्त प्राचीन कहानी सुनाता हूँ। यद्यपि यह कहानी अनुत्कृष्ट शैली की है, फिर भी इसमें एक सार तत्त्व निहित है। एक छोटे बालक ने अपनी माता से कहा, “माँ, मैं वेद-शिक्षा पाने के लिये जाना चाहता हूँ, मेरे पिता का नाम और मेरा गोत्र क्या है, बताओ।” उसकी माँ विवाहिता स्त्री नहीं थी, और भारत में अविवाहित स्त्री की सन्तान जाति बहिष्कृत मानी जाती है–समाज उसे अंगीकार नहीं करता और उसे वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं होता। अतएव बेचारी माँ ने कहा, “मैंने अनेक व्यक्तियों की सेवा की है, उसी अवस्था में तुम्हारा जन्म हुआ, अतएव मैं तुम्हारे पिता का नाम एवं तुम्हारा गोत्र क्या है, यह नहीं जानती; इतना ही जानती हूँ कि मेरा नाम जबाला है और तुम्हारा सत्यकाम।” बालक एक ऋषि के पास गया और उसने उनसे प्रार्थना की कि वे उसे ब्रह्मचारी शिष्य के रूप में ग्रहण करें। तब उन्होंने उससे पूछा, “तुम्हारे पिता का नाम और तुम्हारा गोत्र क्या है?” बालक ने जो उसकी माँ ने कहा था वही दुहराया। यह सुनकर ऋषि ने तुरन्त ही कहा, “वत्स, एक ब्राह्मण के अतिरिक्त और कोई अपने संबंध में ऐसा लांछनकारी सत्य नहीं कह सकता था। तुम ब्राह्मण हो, मैं तुम्हें शिक्षा दूंगा। तुम सत्य से विचलित नहीं हुए।” यह कहकर वे उसे अपने निकट रखकर शिक्षा देने लगे।

अब हमें प्राचीन भारत में प्रचलित शिक्षा-पद्धतियों के कुछ दृष्टान्त अवगत होंगे। गुरु ने सत्यकाम को चार सौ क्षीण और दुर्बल गायें देकर कहा, “इन्हें लेकर तुम वन में चले जाओ, जब सब गायें एक हज़ार हो जायें, तब लौटकर चले आना।” उसने आज्ञा पालन की और वह गायें लेकर वन में चला गया। कई साल बाद इस झुण्ड में से एक प्रधान वृषभ ने सत्यकाम से कहा, “हम अब एक हज़ार हो गये हैं, हमें तुम अपने गुरु के पास ले चलो। मैं तुम्हें ब्रह्म के विषय में कुछ शिक्षा दूंगा।” सत्यकाम ने कहा, “कहिये प्रभु।” वृषभ ने कहा, “उत्तर दिशा ब्रह्म का एक अंश है; उसी प्रकार पूर्व दिशा, दक्षिण दिशा, पश्चिम दिशा भी उसके एक एक अंश हैं। चारों दिशाएँ ब्रह्म के चार अंश हैं। अब अग्नि तुम्हें और कुछ शिक्षा देंगे।” उस समय अग्नि की पूजा एक विशिष्ट प्रतीक-रूप में होती थी। प्रत्येक ब्रह्मचारी को अग्नि-चयन करके उसमें आहुति देनी पड़ती थी। अतः अगले दिन सत्यकाम ने अपने गुरु के घर की ओर प्रस्थान किया, और जब संध्या समय वह स्नानादि करके अग्नि में होम कर उसके निकट बैठ गया, तो उसे अग्नि से आती एक वाणी सुनायी पड़ी–”सत्यकाम !” सत्यकाम ने कहा, “प्रभो, आज्ञा!” (तुम लोगों को शायद याद हो कि बाइबल के प्राचीन व्यवस्थान में भी इसी प्रकार की एक कथा है। सेमुएल ने ऐसी ही एक अद्भुत वाणी सुनी थी)। अग्नि ने कहा, “मैं तुम्हें ब्रह्म के सम्बन्ध में कुछ शिक्षा देने आया हूँ। यह पृथ्वी ब्रह्म का एक अंश है, अन्तरिक्ष एक अंश है, स्वर्ग एक अंश है, समुद्र एक अंश है।” फिर अग्नि ने कहा, “अब एक पक्षी तुम्हें कुछ शिक्षा देगा।” सत्यकाम ने अपनी यात्रा जारी रखी, और अगले दिन जब वह सांध्य अग्निहोत्र कर चुका था, तब एक हंस उसके निकट आया और बोला, “मैं तुम्हें ब्रह्म के विषय में कुछ शिक्षा दूंगा। हे सत्यकाम, यह अग्नि जिसकी तुम उपासना करते हो, ब्रह्म का एक अंश है, सूर्य एक अंश है, चन्द्र एक अंश है, विद्युत् भी एक अंश है।” फिर हंस ने कहा, “अब मद्गु नामक एक पक्षी भी तुम्हें कुछ शिक्षा देगा।” निदान, एक दिन यह पक्षी आकर सत्यकाम से बोला, “मैं तुम्हें ब्रह्म के सम्बन्ध में कुछ शिक्षा दूंगा। ‘प्राण’ उसका एक अंश है, चक्षु एक अंश है, श्रवण एक अंश एवं मन एक अंश है।” तदन्तर बालक अपने गुरु के पास पहुँचा, गुरु ने उसे देखते ही कहा, “वत्स, तुम्हारा मुख ब्रह्मवेत्ता के समान चमक रहा है। तुम्हें किसने शिक्षा दी है।” सत्यकाम ने उत्तर दिया “मानवेतर प्राणियों ने, किन्तु मैं चाहता हूँ कि आप मुझे उपदेश दें। क्योंकि आप जैसे मनीषियों से मैंने सुन रखा है कि गुरु से प्राप्त ज्ञान ही श्रेयस की ओर ले जाता है।” तब ऋषि ने उसे उसी ज्ञान की शिक्षा दी, जो उसे देवताओं से प्राप्त हो चुका था, “अब कुछ भी शेष नहीं रहा।”

यहाँ यदि हम इन रूपकों को थोड़ी देर के लिए हटा दें कि वृष ने क्या सिखाया, अग्नि ने क्या सिखाया तथा अन्य सबने क्या सिखाया और केवल केन्द्रीय तत्त्व की ओर ध्यान दें, तो हमको तत्कालीन विचारधारा की दिशा का कुछ पता लग सकता है। हमें जिस महान् विचार का बीज यहाँ मिलता है, वह यह है कि ये सारी ध्वनियाँ हमारे अन्दर ही हैं। इन सत्यों को और अधिक समझने से अन्त में हम यही तत्त्व पायेंगे कि यह वाणी वास्तव में हम लोगों के हृदय में से ही उठी है। शिष्य सारे समय यही समझता रहा कि वह सत्य के सम्बन्ध में उपदेश सुन रहा है, किन्तु उसका ऐसा समझना ठीक नहीं है। उसने इन वाणियों को बाह्य जगत् से आती हुई समझा, लेकिन वे सदा उसीके अन्दर थीं। और भी एक तत्त्व इससे पाया जाता है, और वह है ब्रह्मज्ञान को व्यावहारिक बनाना। व्यावहारिक जीवन में धर्म से क्या पाया जा सकता है, जगत् इस खोज में सदा व्यस्त रहता है। और इन सब कथाओं में हम यह भी पाते है कि दिन-प्रतिदिन किस प्रकार यह सत्य व्यवहारोपयोगी बनता जा रहा था। शिष्य को जिन समस्त वस्तुओं के संसर्ग में आना पड़ता है, वे उन्हीं से ब्रह्मोपलब्धि करते है। अग्नि, जिसमें वे प्रतिदिन होम करते हैं, उसीमें वे ब्रह्म-साक्षात्कार कर रहे हैं। इसी प्रकार परिदृश्यमान् पृथ्वी को वे ब्रह्म के एक अंश रूप में अनुभव कर रहे हैं इत्यादि इत्यादि।

इसके बाद एक कहानी इन सत्यकाम के एक शिष्य उपकोशल कमलायन के सम्बन्ध में है। यह शिष्य सत्यकाम से शिक्षा प्राप्त करने के लिए उनके पास कुछ दिन रहा था। सत्यकाम कार्यवश कहीं बाहर गये। इससे शिष्य को बहुत कष्ट हुआ। जब गुरु-पत्नी ने उसके समीप आकर पूछा, “वत्स, तुम खाते क्यों नहीं?” तब बालक ने कहा, “मेरा मन कुछ ठीक नहीं है, इसलिए कुछ खाना नहीं चाहता।” इसी समय वह जिस अग्नि में हवन कर रहा था, उसमें से एक आवाज़ आयी, “प्राण ब्रह्म है, सुख ब्रह्म है, आकाश ब्रह्म है, तुम ब्रह्म को जानो।” तब उसने उत्तर दिया, “प्राण ब्रह्म है, यह मैं जानता हूँ, किन्तु वे आकाश और सुखस्वरूप हैं, यह मैं नहीं जानता।” तब अग्नि ने समझाया कि आकाश और सुख, इन दो शब्दों का अर्थ वस्तुतः एक ही है, यानी हृदय में निवास करनेवाला चिदाकाश (अथवा विशुद्ध बुद्धि)। इस प्रकार अग्नि ने प्राण और चिदाकाश के रूप में उसे ब्रह्म का उपदेश किया। तदुपरान्त अग्नि ने फिर उपदेश दिया–“यह पृथ्वी, यह अन्न, यह सूर्य जिसकी तुम उपासना करते हो, सब ब्रह्म के ही रूप हैं। जो पुरुष सूर्य में दिखलायी पड़ता है, वह मैं ही हूँ। जो यह जानते हैं और उस ब्रह्म का ध्यान करते हैं, उनके सब पाप नष्ट हो जाते हैं, वे दीर्घ जीवन प्राप्त करते और सुखी होते हैं। जो समस्त दिशाओं में वास करता है, मैं भी वही हूँ। जो इस प्राण में है, इस आकाश में है, स्वर्गसमूह और विद्युत में बसता है, मैं भी वही हूँ।” यहाँ भी हमें व्यवहारोपयोगी धर्म का उदाहरण मिलता है। अग्नि, सूर्य, चन्द्र आदि जिन-जिन वस्तुओं की वे उपासना करते थे, और वह वाणी जिससे वे परिचित थे, उन कथाओं का आधार है, जो उनकी व्याख्या करती है और उन्हें उच्चतर अर्थ प्रदान करती है। यही वेदान्त का सच्चा, व्यावहारिक पक्ष है। वेदान्त जगत् को उड़ा नहीं देता, उसकी व्याख्या करता है। वह व्यक्ति को उड़ा नही देता–उसकी व्याख्या करता है। वह व्यक्तित्व को मिटाता नहीं, वरन वास्तविक व्यक्तित्व का स्वरूप सामने रखकर उसकी व्याख्या कर देता है। वह यह नहीं कहता कि जगत् वृथा है और उसका अस्तित्व नहीं है, किन्तु कहता है, “जगत क्या है, यह समझो, जिससे वह तुम्हारा कोई अनिष्ट न कर सके।” उस वाणी ने उपकोशल से यह नहीं कहा था कि सूर्य, चन्द्र, विद्युत् अथवा और कुछ, जिसकी वे उपासना करते थे, वह एकदम भूल है, किन्तु यही कहा कि जो चैतन्य सूर्य, चन्द्र, विद्युत, अग्नि और पृथ्वी के भीतर है, वही उसके अन्दर भी है। अतएव उपकोशल की दृष्टि में सभी मानो रूपान्तरित हो गया! जो अग्नि पहले केवल हवन करने की जड़ अग्नि-मात्र थी, उसने एक नया रूप धारण कर लिया और वह ईश्वर हो गयी। पृथ्वी ने एक नया रूप धारण कर लिया, प्राण, सूर्य, चन्द्र, तारा, विद्युत सभी ने एक नया रूप धारण कर लिया, सब ब्रह्मभावापन्न हो गये और तभी उनका वास्तविक स्वरूप समझ में आया। वेदान्त का उद्देश्य ही इन सब वस्तुओं में भगवान का दर्शन करना है, उनका जो रूप आपाततः प्रतीत होता है, वह न देखकर उनको उनके प्रकृत स्वरूप में जानना है। तदन्तर उपनिषदों में एक दूसरा उपदेश है–“जो आँखों में चमक रहा है, वह ब्रह्म है; वह रमणीय और ज्योतिर्मय है। वह सम्पूर्ण जगत् में प्रकाशित हो रहा है।” यहाँ भाष्यकार कहता है, पवित्रात्मा पुरुषों की आँखों में जो एक विशेष प्रकार की ज्योति का आविर्भाव होता है, वह वास्तव में अन्तःस्थ सर्वव्यापी आत्मा की ही ज्योति है। वह ज्योति ही ग्रहों, सूर्य-चन्द्र और तारों में प्रकाशित हो रही है।

अब मैं तुम लोगों से जन्म-मृत्यु आदि के सम्बन्ध में इन प्राचीन उपनिषदों की कुछ अद्भुत कथाएँ कहूँगा। शायद ये तुमको अच्छी लगें। श्वेतकेतु पांचालराज के पास गया। राजा ने उससे पूछा, “क्या तुम जानते हो मृत्यु होने के पश्चात् मनुष्य कहाँ जाते हैं? क्या जानते हो कि वे किस प्रकार फिर लौट आते हैं? क्या जानते हो कि परलोक एकदम भर क्यों नहीं जाता?” बालक ने कहा, “नहीं, मैं यह सब नहीं जानता।” उसने अपने पिता से जाकर यही सब प्रश्न पूछे। पिता ने कहा, “इन सब प्रश्नों का ठीक ठीक उत्तर तो मुझे भी मालूम नहीं।” तब वह राजा के पास लौट गया। राजा ने कहा, “यह ज्ञान ब्राह्मणों के पास कभी नहीं रहा, केवल राजागण ही इसे जानते थे, और इसी ज्ञान के बल पर राजागण पृथ्वी पर शासन करते रहे हैं।” वह तब राजा के पास कुछ दिन रहा, क्योंकि राजा ने शिक्षा देने का वचन दिया। राजा ने कहा, “हे गौतम! परलोक अग्नि है। सूर्य ईंधन है। धूम्र किरणें हैं। दिन ज्वाला है। चन्द्रमा भस्म है। तारागण चिनगारियाँ हैं। इस अग्नि में देवता श्रद्धा की आहुति देते हैं, जिससे राजा सोम की उत्पत्ति होती है।” इसी प्रकार वह कहता गया, “तुम्हारी इस क्षुद्र अग्नि में होम करने का कोई प्रयोजन नहीं, सम्पूर्ण जगत् ही वह अग्नि है और दिन-रात उसमें होम हो रहा है। देवता, मनुष्य सभी दिन-रात उन्हीं की उपासना करते हैं। मनुष्य का शरीर ही अग्नि का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है।” हम यहाँ भी देखते हैं कि धर्म को व्यवहार में परिणत किया जा रहा है, ब्रह्म को हर वस्तु में देखा जा रहा है। इन सब रूपकों में यही एक तत्त्व निहित है कि आविष्कृत प्रतीक हितकारी और शुभ हो सकते हैं, किन्तु उनमें भी श्रेष्ठ प्रतीक पहले से ही विद्यमान हैं। यदि ईश्वरोपासना करने के लिए प्रतिमा आवश्यक है, तो उससे कहीं श्रेष्ठ मानव-प्रतिमा मौजूद ही है। यदि ईश्वरोपासना के लिए मन्दिर निर्माण करना चाहते हो, तो करो, किन्तु सोच लो कि उसने भी उच्चतर, उससे भी महान् मानव देह रूपी मन्दिर तो पहले से ही मौजूद है।

हम लोगों को याद रखना चाहिए कि वेद के दो भाग हैं–कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड। उपनिषदों के अभ्युदय-काल में कर्मकाण्ड इतना जटिल और विस्तार पूर्ण हो गया था कि उससे मुक्त होना असम्भव सा कार्य हो गया। उपनिषदों में कर्मकाण्ड बिल्कुल छोड़ दिया गया है ऐसा कहा जा सकता है, किन्तु धीरे-धीरे; और प्रत्येक कर्मकाण्ड के अन्दर एक उच्चतर अर्थगाम्भीर्य दिखाने की चेष्टा की गयी है। अत्यन्त प्राचीन काल में यह सब यज्ञादि कर्मकाण्ड प्रचलित थे, किन्तु उपनिषद् काल में ज्ञानियों का अभ्युदय हुआ। उन लोगों ने क्या किया? आधुनिक सुधारकों के समान उन लोगों ने यज्ञादि के विरुद्ध प्रचार करके उसे एकदम मिथ्या या पाखण्ड कहकर उड़ा देने की चेष्टा नहीं की, किन्तु उन्हींका उच्चतर तात्पर्य समझाकर लोगों को एक ग्रहण करने योग्य वस्तु दी। उन्होंने कहा, “अग्नि में हवन करो, बहुत अच्छी बात है, किन्तु इस पृथ्वी पर दिन रात हवन हो रहा है। यह क्षुद्र मन्दिर है, ठीक है, किन्तु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही हमारा मन्दिर है, हम कहीं भी उपासना कर सकते हैं। तुम लोग वेदी बनाते हो–किन्तु हम लोगों के मत में, जीवित, चेतन मनुष्य देह रुपी वेदी वर्तमान है और इस मनुष्य देह रूपी वेदी पर की गयी पूजा, दूसरी अचेतन, मृतजड़ प्रतीक की पूजा की अपेक्षा श्रेयस्कर है।

अब मैं एक विचित्र सिद्धांत की चर्चा करूँगा। मैं स्वयं ही उसका अधिकांश नहीं समझता। उपनिषद का यह अंश मैं पढ़ता हूँ, तुम लोग इसे कुछ समझ सको तो समझो। जो व्यक्ति ध्यान-बल से विशुद्धचित्त होकर ज्ञानलाभ कर चुका है, जब वह मरता है, तो पहले अर्चि, उसके बाद दिन, फिर क्रमशः शुक्लपक्ष में और उत्तरायण षष्णमास में जाता है; वहाँ से संवत्सर, संवत्सर से सूर्यलोक,और सूर्यलोक से चंद्रलोक,तथा चंद्रलोक से विद्युल्लोक में जाता है। वहाँ से एक दिव्य पुरुष उसे ब्रह्मलोक में ले जाते हैं। इसीका नाम देवयान है। जब साधु और ज्ञानियों की मृत्यु होती है, तो वे भी इसी मार्ग द्वारा जाते हैं। और फिर वापस नहीं आते। इन मास संवत्सर आदि शब्दों का क्या अर्थ है, यह कोई भी भली-भांति नहीं समझता। सभी अपने-अपने मस्तिष्क से कल्पित अर्थ लगाते रहते हैं। बहुत से लोग यह भी कहते हैं कि यह बेकार की बातें हैं। इन चंद्रलोक, सूर्यलोक में जाने का क्या अर्थ है? और यह दिव्यपुरुष आकर विद्युल्लोक से ब्रह्मलोक में ले जाता है, इसका क्या अर्थ है? हिन्दुओं में एक धारणा थी कि चंद्रलोक में जीवन है–इसके बाद हम लोग यह देखेंगे कि चंद्रलोक से पतित होकर मनुष्य पृथ्वी पर वापस आता है। जो ज्ञान प्राप्त नहीं करते हैं, किंतु इस जीवन में शुभ कर्म कर चुके हैं, वे जब मरते हैं तो पहले धूम्र में जाते हैं, फिर रात्रि में, तदन्तर कृष्ण-पक्ष फिर दक्षिणायन षष्णमास, और उसके बाद संवत्सर में से होकर वे पितृलोक में चले जाते हैं। वहां से आकाश में और फिर भी चंद्रलोक में गमन करते हैं। वहां देवताओं के खाद्य रूप होकर देवजन्म ग्रहण करते हैं। जब तक उनका पुण्य क्षय नहीं होता, तब तक वहीं रहते हैं। कर्मफल समाप्त होने पर फिर उन्हें पृथ्वी पर आना पड़ता है। वे पहले आकाश रूप में परिणत होते हैं, फिर वायु रूप में, फिर धूम्र, उसके बाद मेघ आदि के रूप में परिणत होकर अंत में, विष्टीकण का आश्रय लेकर पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं, वहां शस्यक्षेत्र में गिरकर शस्य-रूप में परिणत होकर मनुष्य के खाद्य रूप में परिगृहीत होते हैं और अंत में उनकी सन्तानादि बन जाते हैं। जिन लोगों ने खूब सत्कर्म किए थे, वे सद वंश में जन्म ग्रहण करते हैं और जिन लोगों ने अत्यंत असत कर्म किए थे, उनका अत्यंत नीच जन्म होता है, यहां तक कि उनको कभी-कभी पशु जन्म लेना पड़ता है। पशु बार-बार जन्म ग्रहण करते रहते हैं तथा बार-बार मृत्यु के मुंह में पड़ते रहते हैं। इसी कारण पृथ्वी ना तो एकदम सूनी होती है और ना परिपूर्ण ही।

हम लोग इससे भी कुछ विचार प्राप्त कर सकते हैं और बाद में शायद हम इसको अधिक समझ सकेंगे।अभी हम इसके अर्थ पर कुछ अटकल लगा सकते हैं। स्वर्ग में जाकर जीव फिर से किस प्रकार लौट आते हैं। इससे संबंध रखनेवाला अंश पहले अंश की अपेक्षा कुछ अधिक स्पष्ट प्रतीत होता है, किंतु इन सब उक्तियों का सार तत्व यही जान पड़ता है कि ब्रह्मानुभूति के बिना स्वगार्दी प्राप्ति स्थायी नहीं होती। ऐसे व्यक्ति जिन्हें अभी तक ब्रह्मानुभव नहीं हो सका, किंतु इस लोक में सत्कर्म कर चुके हैं और वह कर्म भी सकाम किया गया है, तो मृत्यु होने पर इधर-उधर अनेक स्थानों में घूम फिरकर स्वर्ग पहुंचते हैं और हम लोग जिस प्रकार पैदा होते हैं ठीक उसी प्रकार वे भी देवताओं की संतानरूप में पैदा होते हैं, और जितने दिन उनके शुभ कर्मफल की समाप्ति नहीं होती, इतने दिन वे वहां रहते हैं। इसीसे वेदांत का एक मूल तत्व यह पाया जाता है कि जिसका नाम रूप है, वही नश्वर है। अतएव स्वर्ग भी नश्वर होगा, क्योंकि उसका भी तो नाम-रूप है, अनंत स्वर्ग स्वविरोधी वाक्य मात्र है। जिस प्रकार यह पृथ्वी अनन्त नहीं हो सकती; क्योंकि जिस वस्तु का भी नाम-रूप है, उसीकी उत्पत्ति काल में है, स्थिती काल में है, विनाश काल में है। वेदान्त का यह स्थिर सिद्धांत है–अतएव अनन्त स्वर्ग की धारणा व्यर्थ है।

वेद के संहिता भाग में चिरंतन स्वर्ग का वर्णन है, जिस प्रकार मुसलमान और ईसाइयों के धर्म-ग्रंथों में है। मुसलमानों की स्वर्ग-धारणा और भी स्थूल है। वे लोग कहते हैं, स्वर्ग में बाग बगीचे हैं, उनके नीचे नदियां बह रही हैं। अरब वासियों के रेगिस्तान में जल एक बहुत ही वांछनीय पदार्थ है। इसीलिए मुसलमान सदा जलपूर्ण स्वर्ग की कल्पना करते हैं। मेरा जहाँ जन्म हुआ, वहां साल में छः महीने जल बरसता रहता है। मैं स्वर्ग को कल्पना में शायद शुष्क स्थान सोचूँगा, अंग्रेज भी यह सोचेंगे। संहिता का यह स्वर्ग अनंत है, वहां मृत व्यक्ति जाकर रहते हैं। वे लोग वहाँ सुंदर देह पाकर अपने पितृगण के साथ अत्यंत सुख सहित चिरकाल तक रहते हैं, वहाँ उनके माता-पिता, स्त्री-पुत्रादि आदि भी मिलते हैं। और वे बहुत कुछ यहीं के समान रहते हैं; हाँ, उनका जीवन अपेक्षाकृत अधिक सुखमय होता है। उन लोगों की स्वर्ग की धारणा भी यही है कि इस जीवन में सुखप्राप्ति में जो सब विघ्न-बाधाएं हैं, वे सब मिट जायेंगी, केवल इसका जो सुखमय अंश है, वही शेष रहेगा। स्वर्ग की यह धारणा हमें सुखकर भले ही प्रतीत हो, किंतु सुखकर और सत्य ये दोनों पूर्ण रूप से भिन्न वस्तुएं हैं। वास्तव में चरम सीमा पर पहुंचे बिना सत्य कभी सुखकर नहीं होता। मनुष्य का स्वभाव बड़ा रूढ़ीवादी है। मनुष्य कोई विशेष काम करता रहता है तो एक बार उसे शुरू करने पर फिर उसे छोड़ना उसके लिए बहुत कठिन हो जाता है। मन कोई नया विचार नहीं ग्रहण करता, क्योंकि वह बहुत कष्टकर होता है।

उपनिषदों में हमें पूर्वप्रचलित धारणाओं की तुलना में विराट अंतर अंतर मिलता है। उपनिषदों में कहा है, यह सब स्वर्ग जहां मनुष्य जाकर पितृगण के साथ रहता है, कभी नित्य नहीं हो सकता, क्योंकि नाम-रूपात्मक सभी वस्तुएं अनित्य हैं।

यदि स्वर्ग साकार है, तो काल के अनुसार उस स्वर्ग का अवश्य नाश होगा । हो सकता है, वह लाखों वर्ष रहे, किन्तु अन्त में ऐसा एक समय अवश्य आयेगा कि उसका नाश होगा, और अवश्य होगा। इसीके साथ एक और भी धारणा लोगों के मन में आयी और वह यह कि ये सब आत्माएँ दुबारा इसी पृथ्वी पर लौट आती हैं। स्वर्ग केवल उनके शुभ कर्मों के फलभोग का स्थान मात्र है, फलभोग शेष होने पर वे फिर पृथ्वी पर ही जन्म ग्रहण करती हैं। एक बात इसीसे स्पष्ट प्रतीत होती है कि मनुष्य को अत्यन्त प्राचीन काल से ही कार्य-कारण-विज्ञान विदित था। बाद में हम लोग देखेंगे कि हमारे दार्शनिकों ने इसी तत्व का वर्णन दर्शन तथा न्याय की भाषा में किया है, किन्तु इस स्थान में मानो एक शिशु की अस्पष्ट भाषा में इसे कहा गया है। इन ग्रन्थों का पाठ करते समय तुमको लगेगा कि ये सब तत्त्व आन्तरिक अनुभूति के फलस्वरूप हैं। यदि तुम यह पूछो कि ये सब कार्य रूप मे परिणत हो सकते हैं या नहीं, तो मैं कहूँगा कि पहले ये सब कार्य रूप में परिणत हुए हैं और बाद में दर्शन के रूप में आविर्भूत हुए हैं। तुमने देखा कि ये सब पहले अनुभूत हुए, बाद में लिखे गये। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड प्राचीन ऋषियों के साथ मानो बातें करता था। पक्षिगण उनसे बोलते, पशुगण भी उनसे बातचीत करते और चन्द्र-सूर्य से भी उनका सम्भाषण होता था। उन्होंने क्रमशः समस्त वस्तुओं का अनुभव किया और वे प्रकृति के अन्तस्तल में प्रविष्ट हो गये। उन्होंने सत्य की उपलब्धि चिन्तन अथवा तर्क द्वारा, या आजकल की प्रथा के अनुसार दूसरों के विचारों द्वारा रचित ग्रन्थों अथवा मैं आज जैसे उन्हींके एक ग्रन्थ को लेकर लम्बी-चौड़ी वक्तृता दे डालता हूँ, ऐसी वक्तृताओं द्वारा नहीं की थी, वरन् धैर्ययुक्त अनुसंधान और आविष्कार द्वारा की थी। इसकी सारस्वरूप पद्धति थी साधना–और चिरकाल तक वही रहेगी। धर्म सदैव एक व्यावहारिक विज्ञान रहा है; शास्त्र पर निर्भर रहनेवाला धर्म न कोई कभी हुआ है, न होगा। पहले साधना, उसके बाद ज्ञान। जीवगण यहाँ लौट आते हैं, यह धारणा मैं पहले से ही विद्यमान पाता हूँ। जो फल की कामना से कुछ सत्कर्म करते हैं, उन्हें उस सत्कर्म का फल प्राप्त होता है, किन्तु यह फल नित्य नहीं होता। कार्य-कारणवाद यहाँ बहुत सुन्दर रूप में वर्णित हुआ है, क्योंकि कहा गया है कि कार्य कारण के अनुसार ही होता है। जैसा कारण है, कार्य भी वैसा ही होगा; कारण जब अनित्य है, तो कार्य भी अनित्य है। कारण नित्य होने पर कार्य भी नित्य होगा। किन्तु सत्कर्म रूपी ये कारण ससीम हैं, अतएव उनका फल भी कभी असीम नहीं हो सकता।

इस तत्त्व का एक और पहलू देखने से यह भली भाँति समझ में आ जायगा कि जिस कारण चिरंतन स्वर्ग नहीं हो सकता, उसी कारण चिरंतन नरक भी नहीं हो सकता। मान लो, मैं एक बहुत दुष्ट आदमी हूँ और समस्त जीवन अन्याय पूर्ण कर्म करता रहा हूँ, तो भी यह सारा जीवन अनन्त जीवन के साथ तुलना करने पर कुछ भी नहीं है। यदि दण्ड अनन्त हो, तो इसका यह अर्थ होगा कि ससीम कारण से असीम फल की उत्पत्ति हुई। इस जीवन के ससीम कार्य रूप कारण द्वारा असीम फल की उत्पत्ति हुई। यह नहीं हो सकता। यदि यह मान लिया जाय कि समस्त जीवनपर्यन्त सत्कर्म करते रहने पर अनन्त स्वर्ग लाभ होता है, तो भी यह दोष बना रहेगा। किन्तु उन लोगों के लिए, जिन्होंने सत्य को जान लिया है, और भी एक तीसरा मार्ग है। मायावरण से बाहर निकलने का यही एकमात्र मार्ग है–“सत्य का अनुभव करना।” और सब उपनिषद्, यह सत्यानुभव किसे कहते है, यही समझाते है।

अच्छा बुरा कुछ ना देखो, सभी वस्तुएँ और सभी कार्य आत्मा से उत्पन्न होते हैं, यही विचार करो। आत्मा सभी में है। यही कहो कि जगत नामक कोई चीज नहीं है। बाह्य दृष्टि बंद करो; उसी प्रभु की स्वर्ग और नरक में, मृत्यु और जीवन में सर्वत्र उसी की उपलब्धि करो। मैंने पहले जो तुम्हें पढ़ कर सुनाया है, उसमें भी यही भाव है–यह पृथ्वी उसी भगवान का एक प्रतीक है, आकाश भी भगवान का एक दूसरा प्रतीक है, इत्यादि इत्यादि। यह सब ब्रह्म हैं। परंतु यह देखना पड़ेगा, अनुभव करना पड़ेगा, इस विषय की केवल आलोचना अथवा चिंता करने से कुछ नहीं होगा। मान लो, जब आत्मा ने जगत की प्रत्येक वस्तु का स्वरूप समझ लिया और उसे यह अनुभव होने लगा कि प्रत्येक वस्तु ही ब्रह्ममय है, तब वह स्वर्ग में जाय अथवा नरक में, या अन्यत्र और कहीं चली जाय, तो इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। मैं पृथ्वी पर जन्म लूँ अथवा स्वर्ग में जाऊँ, इसे कोई अंतर नहीं होता। मेरे लिए यह सब निरर्थक है, क्योंकि मेरे लिए सभी स्थान समान हैं, सभी स्थान भगवान के मंदिर हैं, सभी स्थान पवित्र हैं, कारण स्वर्ग, नरक अथवा अन्यत्र मैं केवल भगवत्सत्ता का ही अनुभव कर रहा हूँ। भला-बुरा अथवा जीवन-मरण मुझे कुछ नहीं दिखाई देते, एकमात्र ब्रह्म का अस्तित्व है। वेदान्त-मत में मनुष्य जब ऐसी अनुभूति प्राप्त कर लेता है, तब वह मुक्त हो जाता है और वेदान्त कहता है, केवल वही व्यक्ति संसार में रहने योग्य है, दूसरा नहीं। जो व्यक्ति जगत में केवल अशुभ देखता है, वह भला संसार में कैसे वास कर सकता है? उसका जीवन तो सर्वदा दुःखमय होगा। जो व्यक्ति यहाँ अनेकानेक विघ्न-बाधाओं तथा विपत्तियों को देखता है, मृत्यु देखता है,उसका जीवन तो दुःखमय तो होगा ही, परंतु जो व्यक्ति प्रत्येक वस्तु में उसी सत्यस्वरूप को देखता है, वही संसार में रहने योग्य है; वही यह कह सकता है कि मैं इस जीवन का उपभोग कर रहा हूँ, मैं इस जीवन में खूब सुखी हूँ। यहां मैं यह कह देना चाहता हूँ कि वेद में कहीं भी नरक का उल्लेख नहीं है। वेद के बहुत परवर्ती काल में रचित पुराणों में यह नरक-प्रसंग दिया गया है। वेद में सबसे बड़ा दण्ड है–पुनर्जन्म अर्थात इस जगत में एक बार और आना, यहां एक दूसरा अवतार पाना। हम देखते हैं कि पहले से ही यह निर्गुणभाव चलता आ रहा है। पुरस्कार और दण्ड का भाव बहुत ही जड़-भावनात्मक है और यह भाव केवल मनुष्य के सामान सगुण ईश्वरवाद में ही संभव है–जो ईश्वर हमारे समान एक को प्रेम करते हैं, दूसरे को नहीं। इस प्रकार की ईश्वर-धारणा के साथ ही पुरस्कार और दंड का भाव संगत हो सकता है। संहिताओं में ईश्वर का वर्णन इसी प्रकार दिया गया है। वहां इस धारणा के साथ भय भी मिला हुआ था, किंतु उपनिषदों में यह भय-भाव बिल्कुल नहीं मिलता; इसके साथ ही उपनिषदों में हम निर्गुण की धारणा पाते हैं–और प्रत्येक दशा में यह निर्गुण की धारणा ही विशेष कठिन होती है। मनुष्य सर्वदा ही सगुण से चिपका रहना चाहता है। बहुत बड़े-बड़े विचारक भी, कम से कम संसार जिन्हें बहुत बड़े विचारक मानता है, इस निर्गुण ईश्वर से सहमत नहीं हैं। किंतु देहधारी ईश्वर की कल्पना मुझे अत्यंत हास्यास्पद प्रतीत होती है। उच्चतर भाव कौन सा है–जीवित ईश्वर या मृत ईश्वर?–जिस ईश्वर को कोई देख नहीं सकता, जान नहीं पाता अथवा जो ईश्वर हमारे सम्मुख चारों ओर प्रकट एवं ज्ञात है?

निर्गुण ईश्वर जीवंत ईश्वर है, वह एक तत्व मात्र है। सगुण-निर्गुण के बीच में भेद यही है कि सगुण ईश्वर मानवविशेष मात्र है, निर्गुण ईश्वर है मनुष्य, पशु, देवता तथा कुछ और अधिक जो हम नहीं देख पाते हैं, क्योंकि सगुण निर्गुण के अंतर्गत है और निर्गुण सगुण व्यष्टि, समष्टि एवं उसके अतिरिक्त और भी बहुत कुछ है। “जिस प्रकार एक ही अग्नि जगत में भिन्न भिन्न रूप में प्रकाशित होती है और उसके अतिरिक्त भी अग्नि का अस्तित्व है, इसी प्रकार निर्गुण भी है।” हम जीवित ईश्वर की पूजा करना चाहते हैं। मैंने संपूर्ण जीवन ईश्वर के अतिरिक्त और कुछ नहीं देखा। तुमने भी नहीं देखा। इस कुर्सी को देखने से पहले तुम्हें ईश्वर को देखना पड़ता है, उसके बाद उसीमें और उसके माध्यम से कुर्सी को देखना पड़ता है। वह दिन-रात जगत में रहकर प्रतिक्षण ‘मैं हूं’ ‘मैं हूं’ कह रहा है। जिस क्षण तुम बोलते हो ‘मैं हूं’, उसी क्षण तुम उस सत्ता को जान रहे हो। तुम ईश्वर को कहा ढूंढने जाओगे। यदि तुम उसे अपने हृदय में, हर प्राणी में नहीं देख पाते? त्वं स्त्री पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी । त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः॥ “तुम स्त्री, तुम पुरुष, तुम कुमार, तुम कुमारी हो, तुम्हीं वृद्ध होकर लाठी के सहारे चल रहे हो, तुम ही संपूर्ण जगत में भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट हुए हो। तुम ही यह सब हो।” कितना अद्भुत “जीवित ईश्वर” है–संसार में वह ही एकमात्र सत्य है। यह धारणा अनेक लोगों को उस पारंपरिक ईश्वर से घोर विरोधात्मक लगती है, जो किसी विशेष स्थान में किसी पर्दे के पीछे छिपा बैठा है और जिसे कोई कभी नहीं देखा सकता। पुरोहित लोग हमें केवल यही आश्वासन देते हैं कि यदि हम लोग उनका अनुसरण करें, उनकी भर्त्सना सुनते रहें, और उनके द्वारा निर्दिष्ट लीक पर चलते रहें, तो मरते समय वे हमें एक मुक्ति पत्र देंगे और तब हम ईश्वर-दर्शन कर सकेंगे। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह सारा स्वर्गवाद इस अनर्गल पुरोहित-प्रपंच के विविध रूपों के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। निर्गुणवाद निस्सन्देह अनेक चीजें नष्ट कर डालता है; वह पुरोहितों, धर्मसंघों और मन्दिरों के हाथ से सारी व्यवसाय छीन लेता है। भारत में इस समय दुर्भिक्ष है, किन्तु वहाँ ऐसे बहुत से मन्दिर हैं, जिनमें से प्रत्येक में एक राजा को भी खरीद लेने योग्य बहुमूल्य रत्नों की राशि सुरक्षित है। यदि पुरोहित लोग इस निर्गुण ब्रह्म की शिक्षा दें, तो उनका व्यवसाय छिन जायगा। किन्तु हमें उसकी शिक्षा निःस्वार्थ भाव से, बिना पुरोहित-प्रपंच के देनी होगी। तुम भी ईश्वर, मैं भी वही–तब कौन किसकी आज्ञा पालन करे? कौन किसकी उपासना करे? तुम्हीं ईश्वर के सर्वश्रेष्ठ मन्दिर हो; मैं किसी मन्दिर, किसी प्रतिमा या किसी बाइबिल की उपासना न कर तुम्हारी ही उपासना करूंगा। लोग इतना परस्पर विरोधी विचार क्यों करते हैं? लोग कहते हैं, हम ठेठ प्रत्यक्षवादी हैं; ठीक बात है, किन्तु तुम्हारी उपासना करने की अपेक्षा और अधिक प्रत्यक्ष क्या हो सकता है? मैं तुम्हें देख रहा हूँ, तुम्हारा अनुभव कर रहा हूँ और जानता हूँ कि तुम ईश्वर हो। मुसलमान कहते हैं, अल्लाह के सिवाय और कोई ईश्वर नहीं है; किन्तु वेदान्त कहता है, ऐसा कुछ है ही नहीं जो ईश्वर न हो। यह सुनकर तुममें से बहुतों को भय हो सकता है, किन्तु तुम लोग धीरे धीरे यह समझ जाओगे। जीवित ईश्वर तुम लोगों के भीतर रहते हैं, तब भी तुम मन्दिर, गिरजाघर आदि बनाते हो और सब प्रकार की काल्पनिक झूठी चीज़ों में विश्वास करते हो। मनुष्य-देह में स्थित मानव-आत्मा ही एकमात्र उपास्य ईश्वर है। पशु भी भगवान के मन्दिर हैं, किन्तु मनुष्य ही सर्वश्रेष्ठ मन्दिर है–ताजमहल जैसा। यदि मैं उसकी उपासना नहीं कर सका, तो अन्य किसी भी मन्दिर से कुछ भी उपकार नहीं होगा। जिस क्षण मैं प्रत्येक मनुष्य देहरूपी मन्दिर में उपविष्ट ईश्वर की उपलब्धि कर सकूँगा, जिस क्षण मैं प्रत्येक मनुष्य के सम्मुख भक्तिभाव से खड़ा हो सकूँगा और वास्तव में उनमें ईश्वर देख सकूँगा, जिस क्षण मेरे अन्दर यह भाव आ जायगा, उसी क्षण मैं सम्पूर्ण बन्धनों से मुक्त हो जाऊँगा–बाँधनेवाले पदार्थ हट जायँगे और मैं मुक्त हो जाऊँगा।

यही सबसे अधिक व्यावहारिक उपासना है। मत-मतान्तर से इसका कोई प्रयोजन नहीं। किन्तु यह बात कहने से अनेक लोग डर जाते हैं। वे कहते हैं, यह ठीक नहीं है। उनके पितामह जनों ने उन्हें जो यह बतला दिया था कि स्वर्ग के किसी स्थान पर बैठे हुए एक ईश्वर ने किसी व्यक्ति से कहा–मैं ईश्वर हूँ और वे उसीके सम्बन्ध में बौद्धिक माथापच्ची किये चले आ रहे हैं। उसी समय से केवल मत-मतान्तरों की आलोचना ही चल रही हैं। उनके मत में यही व्यावहारिक बात है–और हम लोगों का मत व्यावहारिक नहीं है। वेदान्त कहता है, सब अपने अपने मार्ग पर चलें, कोई हरज नहीं, किन्तु मार्ग ही लक्ष्य नहीं है। किसी स्वर्गस्थ ईश्वर की उपासना करना आदि बुरा नहीं, किन्तु ये सब केवल सत्य की दिशा में सोपान मात्र हैं, साध्य सत्य नहीं। ये सब सुन्दर एवं शुभ हैं, इनमें कुछ अद्भुत भाव हैं, किन्तु वेदान्त पग पग पर कहता है, “बन्धु, तुम जिसकी अज्ञात कहकर उपासना करते हो, उसकी उपासना मैं तुम्हारे रूप में करता हूँ। जिसकी उपासना तुम अज्ञात कह कर करते हो और जिसकी खोज विश्व भर में कर रहे हो, वह सदैव तुम्हारे पास ही रहा है। तुम उसीमें जीवित हो, वह जगत् का नित्यसाक्षी है।” “सम्पूर्ण वेद जिसकी उपासना करते हैं, केवल यही नहीं, जो नित्य ‘मैं’ में सदा वर्तमान है, वह ही है; उसके होने से ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भी है। वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रकाश और प्राण है। यदि (वह) ‘मैं’ तुम्हारे भीतर न हो तो तुम सूर्य को भी न देख पाते, सभी कुछ तुम्हारे लिए अन्धकारमय जड़राशि–शून्य के समान प्रतीत होता। वह प्रकाशमान है, इसीलिए तुम जगत् को देख पाते हो।

इस विषय में साधारणतः एक प्रश्न पूछा जाता है और वह यह है कि इस विचार-धारा से बहुत गड़बड़ी हो जाने की सम्भावना है। हम सभी यह सोचेंगे कि मैं ईश्वर हूँ–जो कुछ मैं सोचता हूँ या करता हूँ वही अच्छा है क्योंकि ईश्वर को भला पाप क्या? इसका उत्तर यह है कि पहले यदि इस प्रकार की विपरीत व्याख्यारूप आशंका की सम्भावना मान भी ली जाय, तब भी क्या यह प्रमाणित किया जा सकता है कि दूसरे पक्ष में भी यही आशंका नहीं उत्पन्न होगी? लोग अपने से पृथक स्वर्गस्थित ईश्वर की उपासना करते हैं, उससे खूब डरते भी हैं। लोग भय से काँपते रहते हैं और सारा जीवन इसी प्रकार काँपते हुए काट देते है। तो क्या दुनिया ऐसा मान लेने पर भी पहले की अपेक्षा अधिक अच्छी हो गयी है? तुम भी दूसरे से यही पूछ रहे थे। विचार करो कि जो ईश्वर को सगुण मानकर उसकी उपासना करते हैं और जो उसे निर्गुण मानकर उसकी उपासना करते हैं, इन दोनों में से किसके सम्प्रदाय में संसार के बड़े बड़े महापुरुष हो गये हैं? महान् कर्मयोगी-महा चरित्रवान्! निश्चय ही ऐसे महापुरुष निर्गुण साधकों के बीच ही हुए हैं। भय से तुम नैतिकता के प्रस्फुटन की संभावना कैसे मान सकते हो? नहीं, कभी नहीं। “जहाँ एक दूसरे को देखता है, जहाँ एक दूसरे को सुनता है, वहीं माया है। जहाँ एक दूसरे को नहीं देखता, एक दूसरे को सुनता नहीं, जहाँ सर्व आत्ममय हो जाता है, वहाँ कौन किसे देखेगा, कौन किसे सुनेगा?” तब सभी ‘वह’ अथवा सभी ‘मैं’ हो जाता है। तब आत्मा पवित्र हो जाती है। तभी और केवल तभी हम प्रेम किसे कहते हैं, यह समझ सकते है। डर से क्या प्रेम हो सकता है? प्रेम की भित्ति है, स्वाधीनता। स्वाधीनता—मुक्तस्वभाव होने पर ही प्रेम होता है। जब हम लोग वास्तव में जगत् को स्नेह करना प्रारम्भ करते हैं, तभी विश्वबन्धुत्व का अर्थ समझते हैं—अन्यथा नहीं।

इसलिए यह कहना उचित नहीं है कि इस निर्गुण मत से समस्त संसार में भयानक पाप-धारा बह उठेगी, जैसे दूसरे मत से दुनिया कभी अन्याय की ओर गयी ही नहीं अथवा वह सारी दुनिया को रक्त से आप्लावित तथा मनुष्य को परस्पर टुकड़े टुकड़े कर डालनेवाली साम्प्रदायिकता की ओर कभी ले ही नही गया। वे कहते हैं, मेरा ईश्वर ही सर्वश्रेष्ठ है। इसका प्रमाण? आओ, हम दोनों लड़ लें–यही प्रमाण है। द्वैतवाद से यही गड़बड़ी सारी दुनिया में फैल गयी है। क्षुद्र और संकीर्ण रास्तों में न जाकर प्रशान्त उज्ज्वल दिन के प्रकाश में आओ। महान् अनन्त आत्मा संकीर्ण भावों में कैसे बँधी रह सकती है? हमारे सम्मुख यह प्रकाशमय ब्रह्माण्ड है, इसकी प्रत्येक वस्तु हमारी है। अपनी बाहें फैलाकर सम्पूर्ण जगत् का प्रेमालिंगन करने की चेष्टा करो। यदि कभी ऐसा करने की इच्छा हो, तभी समझो कि तुम्हें ईश्वर का अनुभव हुआ है।

बुद्धदेव के उपदेश का वह अंश तुमको स्मरण होगा कि वे किस प्रकार उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम, ऊपर, नीचे सर्वत्र ही प्रेम की भावना प्रवाहित कर देते थे, यहाँ तक कि चारों ओर वही महान् अनन्त प्रेम सम्पूर्ण विश्व में छा जाता था। इसी प्रकार जब तुम लोगों का भी यही भाव होगा, तब तुम्हारा भी यथार्थ व्यक्तित्व प्रकट होगा। तभी सम्पूर्ण जगत् एक व्यक्ति बन जायगा–क्षुद्र वस्तुओं की ओर फिर मन नहीं जायगा। इस अनन्त सुख के लिए छोटी छोटी वस्तुओं का परित्याग कर दो। इन सब क्षुद्र सुखों से तुम्हें क्या लाभ होगा? और वास्तव में तो तुम्हें इन छोटे छोटे सुखों को भी छोड़ना नहीं पड़ता, कारण, तुम लोगों को याद होगा कि सगुण निर्गुण के अन्तर्गत है, जो मैं पहले ही कह चुका हूँ। अतएव ईश्वर सगुण और निर्गुण दोनों ही है। मनुष्य-अनन्तस्वरूप निर्गुण मनुष्य भी अपने को सगुण रूप में, व्यक्ति रूप में देख रहा है; मानो हम अनन्तस्वरूप होकर भी अपने को क्षुद्र रूपों में सीमाबद्ध बना डालते हैं। वेदान्त कहता है असीमता ही हमारा सच्चा स्वरूप है, वह कभी लुप्त नहीं हो सकती, सदा रहेगी। किन्तु हम अपने कर्म द्वारा अपने को सीमाबद्ध कर डालते हैं और उसीने मानो हमारे गले में शृंखला डालकर हमें आबद्ध कर रखा है। शृंखला तोड़ डालो और मुक्त हो जाओ। नियम को पैरों तले कुचल डालो। मनुष्य के प्रकृतस्वरूप में कोई विधि नहीं, कोई दैव नहीं, कोई अदृष्ट नहीं। अनन्त में विधान या नियम कैसे रह सकते हैं? स्वाधीनता ही इसका मूलमन्त्र है, स्वाधीनता ही इसका स्वरूप है–इसका जन्मसिद्ध अधिकार है। पहले मुक्त बनो, तब फिर जितने व्यक्तित्व रखना चाहो, रखो। तब हम लोग रंगमंच पर अभिनेताओं के समान अभिनय करेंगे, जैसे अभिनेता भिखारी का अभिनय करता है। उसकी तुलना गलियों में भटकनेवाले वास्तविक भिखारी से करो। यद्यपि दृश्य दोनों ओर एक है, वर्णन करने में भी एक सा है, किन्तु दोनों में कितना भेद है! एक व्यक्ति भिक्षुक का अभिनय कर आनन्द ले रहा है, और दूसरा सचमुच दुःख-कष्ट से पीड़ित है। ऐसा भेद क्यों होता है? कारण, एक मुक्त है और दूसरा बद्ध। अभिनेता जानता है कि उसका यह भिखारीपन सत्य नहीं है, उसने यह केवल अभिनय के लिए स्वीकार किया है, किन्तु यथार्थ भिक्षुक जानता है कि यह उसकी चिरपरिचित अवस्था है, एवं उसकी इच्छा हो या न हो, उसे वह कष्ट सहना ही पड़ेगा। उसके लिए यह अभेद्य नियम के समान है और इसीलिए उसे कष्ट उठाना ही पड़ता है। हम जब तक अपने स्वरूप का ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक हम लोग केवल भिक्षुक हैं, प्रकृति के अन्तर्गत प्रत्येक वस्तु ने ही हमें दास बना रखा है। हम सम्पूर्ण जगत् में सहायता के लिए चीत्कार करते फिरते हैं—अन्त में काल्पनिक सत्ताओं से भी हम सहायता माँगते हैं, पर सहायता कभी नहीं मिलती; तो भी हम सोचते हैं कि इस बार सहायता मिलेगी। इस प्रकार हम सर्वदा आशा लगाये बैठ रहते हैं। बस, इसी बीच एक जीवन रोते, कलपते, आशा की लौ लगाये बीत जाता है, और फिर वही खेल चलने लगता है।

स्वाधीन होओ; किसी दूसरे से कुछ आशा न करो। मैं यह निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि यदि तुम अपने जीवन की अतीत घटनाएँ याद करो, तो देखोगे कि तुम सदैव व्यर्थ ही दूसरों से सहायता पाने की चेष्टा करते रहे, किन्तु कभी पा नहीं सके; जो कुछ सहायता मिली वह तुम्हारे अपने अन्दर से ही आयी थी। तुम स्वयं जिसके लिए चेष्टा करते हो, उसे ही फलरूप में पाते हो; तथापि कितना आश्चर्य है कि तुम सदैव ही दूसरे से सहायता की भीख माँगते रहते हो! धनियों की बैठक सदा भरी ही रहती है, किन्तु यदि ध्यान दो तो देखोगे, सदा वे ही लोग वहाँ दिखायी नहीं पड़ेंगे। वे लोग सदैव आशा लगाये रहते है कि धनियों के पास से कुछ माँग कर लायेंगे, किन्तु ऐसा कर नहीं पाते। हमारा जीवन भी उसी प्रकार का है, हम केवल आशाएँ किये चले जा रहे हैं, उनका अन्त नहीं। वेदान्त कहता है, इसी आशा का परित्याग करो। क्यों आशा करते हो? तुम्हारे पास सब कुछ है। तुम्हीं सब कुछ हो। तुम आत्मा हो, तुम सम्राट-स्वरूप हो, तुम भला किसकी आशा करते हो? यदि राजा पागल होकर अपने देश में ‘राजा कहाँ है’, ‘राजा कहाँ है’ कहकर खोजता फिरे, तो वह कभी राजा को नहीं पा सकता, क्योंकि वह स्वयं ही राजा है। वह अपने राज्य के प्रत्येक ग्राम में, प्रत्येक नगर में–यहाँ तक कि प्रत्येक घर में खोज करे, खूब रोए-चिल्लाए फिर भी राजा का पता नहीं लग सकता; क्योंकि वह व्यक्ति स्वयं ही राजा है। इसी प्रकार हम लोग यदि जान सकें कि हम ईश्वर हैं और इस अन्वेषणरूपी व्यर्थ चेष्टा को छोड़ सकें, तो बहुत ही अच्छा हो। इस प्रकार अपने को ईश्वरस्वरूप जान लेने पर ही हम सन्तुष्ट और सुखी हो सकते हैं। यह सब पागलों जैसी चेष्टा छोड़कर जगतरूपी मंच पर एक अभिनेता के समान कार्य करते चलो।

इस प्रकार की अवस्था आने से हम लोगों की सम्पूर्ण दृष्टि परिवर्तित हो जाती है। अनन्त कारागारस्वरूप न होकर यह जगत् खेलने का स्थान बन जाता है। प्रतियोगिता की जगह न बनकर यह भौरों के गुंजन से परिपूर्ण वसन्त काल का रूप धारण कर लेता है। पहले जो जगत् नरककुण्ड जैसा लगता था, वही अब स्वर्ग बन जाता है। बद्ध जीव की दृष्टि में यह एक महायंत्रणा का स्थान है, किन्तु मुक्त व्यक्ति की दृष्टि में यही स्वर्ग है; स्वर्ग अन्यत्र नहीं है। एक ही प्राण सर्वत्र विराजित है। पुनर्जन्म आदि जो कुछ है, सब यहीं होता है। देवतागण सब यही हैं–वे मनुष्य के आदर्श के अनुसार कल्पित हैं। देवताओं ने मनुष्यों को अपने आदर्श के अनुसार नहीं बनाया, किन्तु मनुष्यों ने ही देवताओं की सृष्टि की है। इन्द्र, वरुण और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के देवता सब यहीं हैं। तुम्हीं लोग अपने एक अंश को बाहर प्रक्षिप्त करते हो, किन्तु वास्तव में तुम्हीं असली वस्तु हो—तुम्हीं प्रकृत उपास्य देवता हो। यही वेदान्त का मत है और यही यथार्थ में व्यावहारिक है। मुक्त होने पर उन्मत्त होकर समाज त्याग करने और जंगलो अथवा गुफाओं में जाकर मर जाने की आवश्यकता नहीं। तुम जहां हो वहीं रहोगे, किन्तु भेद इतना ही होगा कि तुम सम्पूर्ण जगत् का रहस्य समझ जाओगे। पहले देखी हुई समस्त वस्तुएँ जैसी की तैसी ही रहेंगी, किन्तु उनका एक नवीन अर्थ समझने लगोगे। तुम अभी जगत् का स्वरूप नहीं जानते हो; केवल मुक्त होने पर ही इसका स्वरूप जान सकोगे। हम देखेंगे कि यह तथाकथित विधि, दैव या अदृष्ट हम लोगों की प्रकृति का एक अत्यन्त क्षुद्र अंश मात्र है। यह हम लोगों की प्रकृति का केवल एक पहलू मात्र है, दूसरी दिशा में मुक्ति सदा विद्यमान रही है और हम लोग शिकारी द्वारा पीछा किये गये खरगोश के समान मिट्टी में अपना सिर छिपाकर अपने को अशुभ से बचाने की चेष्टा करते रहे हैं।

हम भ्रमवश अपना स्वरूप भूलने की चेष्टा करते हैं, किन्तु वह एकदम भूला नहीं जा सकता–सदैव ही वह किसी न किसी रूप में हमारे सामने आता ही है। हम जिन देवता, ईश्वर आदि का अनुसन्धान करते हैं, बाह्य जगत् में स्वाधीनता पाने के लिए हम जो प्राणपण से चेष्टा करते रहते हैं, वह सब और कुछ नहीं हम लोगों की मुक्त प्रकृति ही मानो किसी न किसी रूप में अपने को प्रकाशित करने का यत्न कर रही है। कहाँ से यह आवाज़ आ रही है, यह जानने में हम लोगों ने भूल की है। हम लोग पहले सोचते हैं, यह आवाज़ अग्नि, सूर्य, चन्द्र, तारा अथवा किसी देवता से आती है–अन्त में हम लोग देखते हैं कि यह तो हम लोगों के अन्दर ही है। यह वही अनन्त वाणी अनन्त मुक्ति का समाचार देती है। यह संगीत अनन्त काल से चला आ रहा है। आत्म-संगीत का कुछ अंश इस नियमाबद्ध ब्रह्माण्ड, इस पृथ्वी के रूप में परिणत हुआ है, किन्तु यथार्थतः हम लोग आत्मस्वरूप हैं। और चिरकाल तक आत्मस्वरूप ही रहेंगे। एक शब्द में वेदान्त का आदर्श है–मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप में जानना, और उसका सन्देश है कि यदि तुम अपने भाई मनुष्य की, व्यक्त ईश्वर की, उपासना नहीं कर सकते तो उस ईश्वर की कल्पना कैसे कर सकोगे, जो अव्यक्त है?

क्या तुम लोगों को बाइबिल का वह कथन याद नहीं है, “यदि तुम अपने भाई को, जिसे तुम देख रहे हो, प्यार नहीं कर सकते, तो ईश्वर को, जिसे तुमने कभी नहीं देखा, भला कैसे प्यार कर सकोगे?” यदि तुम ईश्वर को मनुष्य के मुख में नहीं देख सकते, तो उसे मेघ अथवा अन्य किसी मृत जड़ पदार्थ में अथवा अपने मस्तिष्क की कल्पित कथाओं में कैसे देखोगे? जिस दिन से तुम नर-नारियों में ईश्वर देखने लगोगे, उसी दिन से मैं तुम्हें धार्मिक कहूँगा, और तभी तुम लोग समझोगे कि दाहिने गाल पर थप्पड़ मारने पर मारनेवाले के सामने बायाँ गाल फिराने का क्या अर्थ है। जब तुम मनुष्य को ईश्वररूप में देखोगे, तब सभी वस्तुओं को, यहाँ तक कि यदि तुम्हारे पास बाघ तक आ जाय, तो उसका भी तुम स्वागत करोगे । जो कुछ तुम्हारे पास आता है, वह सब अनन्त आनन्दमय प्रभु का भिन्न भिन्न रूप ही है–वे ही हमारे माता, पिता, बन्धु और सन्तान हैं। वे हमारी अपनी आत्मा ही हैं, जो हमारे साथ खेल रही है।

जिस तरह इस प्रकार मनुष्य के साथ हमारे सम्बन्धों को ईश्वरभावापन्न बनाया जा सकता है, उसी प्रकार ईश्वर से हमारा सम्बन्ध भी इनमें से कोई रूप ले सकता है और हम उसे अपना पिता, माता, मित्र, प्रियतम कुछ भी मान सकते हैं। भगवान् को पिता कहने की अपेक्षा एक और उच्चतर भाव है–उन्हें माता कहना। फिर इससे भी एक पवित्रतर भाव है–उन्हें ‘सखा’ कहना। उसकी अपेक्षा एक और श्रेष्ठ भाव है—उन्हें अपना प्रेमास्पद कहना। प्रेम और प्रेमास्पद में कुछ भेद न देखना ही सर्वोच्च भाव है। तुम लोगों को वह प्राचीन फ़ारसी कहानी याद होगी। एक प्रेमी ने आकर अपने प्रेमास्पद के घर का दरवाज़ा खट खटाया। प्रश्न हुआ, “कौन है?” वह बोला, “मैं”। द्वार नहीं खुला। दुबारा फिर उसने कहा, “मैं आया हूँ”, पर द्वार फिर भी न खुला। तीसरी बार वह फिर आया, प्रश्न हुआ, “कौन है?” तब उसने कहा, “प्रेमास्पद, मैं तुम हूँ”, तब द्वार खुल गया। भगवान् और हमारे बीच सम्बन्ध भी ठीक ऐसा ही है, वे सब में हैं। और वे ही सब कुछ हैं। प्रत्येक नर-नारी ही वही प्रत्यक्ष जीवन्त आनन्दमय एकमात्र ईश्वर है। कौन कहता है ईश्वर अज्ञात है, कौन कहता है उसे खोजना पड़ेगा? हमने उसे अनन्त काल के लिए पाया है। हम उसी में अनन्त काल तक रहते हैं वह सर्वत्र अनन्त काल के लिए ज्ञात है और वही अनन्त काल से उपासित हो रहा है।

एक और बात इसी प्रसंग में जाननी होगी। वेदान्त कहता है–दूसरे प्रकार की उपासनाएँ भी भ्रमात्मक नहीं हैं। यह कभी न भूलना चाहिए कि जो अनेक प्रकार के कर्मकाण्ड द्वारा भगवत्-उपासना करते हैं–हम इन कर्मों को चाहे कितना ही अनुपयोगी क्यों न मानें–वे लोग वास्तव में भ्रान्त नहीं हैं; क्योंकि लोग सत्य से सत्य की ओर, निम्नतर सत्य से उच्चतर सत्य की ओर आगे बढ़ते हैं। अन्धकार कहने से समझना चाहिए, स्वल्प प्रकाश; बुरा कहने से समझना चाहिए, थोड़ा अच्छा; अपवित्रता कहने से समझना चाहिए, स्वल्प पवित्रता।

अतएव हमें दूसरों को प्रेम और सहानुभूति की दृष्टि से देखना चाहिए। हम लोग जिस रास्ते पर चल आये हैं, वे भी उसी रास्ते से चल रहे हैं। यदि तुम वास्तव में मुक्त हो, तो तुम्हें अवश्य ही यह समझना चाहिए कि वे भी आगे-पीछे मुक्त होंगे। और जब तुम मुक्त ही हो गये, तो फिर जो अनित्य है, उसे तुम किस प्रकार देख पाओगे? यदि तुम वास्तव में पवित्र हो, तो तुम्हें अपवित्रता कैसे दिखायी दे सकती है? क्योंकि जो भीतर है, वही बाहर दीख पड़ता है। हमारे अन्दर यदि अपवित्रता न होती तो हम उसे बाहर कभी देख ही न पाते। वेदान्त की यह भी एक साधना है। आशा है, हम लोग सभी जीवन में इसको व्यवहार में लाने की चेष्टा करेंगे। इसका अभ्यास करने के लिए सारा जीवन पड़ा है, किन्तु इन सब विचारों की आलोचना से हमें यह ज्ञात हुआ है कि अशान्ति और असन्तोष के बदले हम शान्ति और सन्तोष के साथ कार्य करें; क्योंकि हमने जान लिया है कि सत्य हमारे अन्दर है–वह हमारा जन्मजात अधिकार है। हमारे लिए आवश्यक है, केवल उसको प्रकाशित करना, प्रत्यक्ष बनाना और अनुभव करना।

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