व्यावहारिक जीवन में वेदान्त – तृतीय भाग

Practical Vedanta (Part 3) in Hindi

वेदान्त की व्यावहारिक व्याख्या करती स्वामी जी की यह विख्यात कृति है। इस पुस्तक में वस्तुतः चार अध्याय हैं। स्वामी विवेकानंद का पिछला व्याख्यान पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – व्यावहारिक जीवन में वेदान्त (द्वितीय भाग)

(17 नवम्बर, 1896 ई० को लन्दन में दिया हुआ व्याख्यान)

छान्दोग्य उपनिषद में हम पढ़ते हैं कि देवर्षि नारद ने एक समय सनत्कुमार के पास आकर अनेक प्रश्न पूछे, जिनमें एक यह था कि वस्तुएँ जैसी हैं, क्या उसका कारण धर्म है? सनत्कुमार उन्हें सोपानारोहण न्याय के अनुसार धीरे-धीरे पृथ्वी आदि तत्वों से ले जाते हुए अन्त में आकाश तत्त्व पर जा पहुँचे। “आकाश तेज से भी श्रेष्ठ है, कारण, आकाश में ही चन्द्र, सूर्य, विद्युत, नक्षत्र आदि सभी कुछ वर्तमान हैं। आकाश में ही हम जीवन धारण करते हैं, आकाश में ही मरते है।” अब प्रश्न यह है कि क्या आकाश से भी कुछ श्रेष्ठ है? सनत्कुमार ने कहा, “प्राण आकाश से भी श्रेष्ठ है।” वेदान्त मत में यह प्राण ही जीवन का मूल तत्त्व है। आकाश के समान यह भी एक सर्वव्यापी तत्त्व है, और हमारे शरीर में अथवा अन्यत्र जो भी गति दिखायी पड़ती है, वह सभी प्राण का कार्य है। प्राण आकाश से भी श्रेष्ठ है। प्राण के द्वारा ही सभी वस्तुएँ जीवित रहती हैं, प्राण माता में, प्राण पिता में, प्राण भगिनी में, प्राण आचार्य में है, और प्राण ही ज्ञाता है।

मैं इसी उपनिषद् में से एक अंश और पढूंगा। श्वेतकेतु अपने पिता आरुणि से सत्य के सम्बन्ध में प्रश्न करता है। पिता ने उसे अनेक विषयों की शिक्षा देकर अन्त में कहा, “इन सब वस्तुओं का जो सूक्ष्म कारण है, उसीसे ये सब बनी हैं, यही सब कुछ है, यही सत्य है, हे श्वेतकेतु, तुम भी वही हो।” तदनन्तर उन्होंने अनेक उदाहरण दिये, “हे श्वेतकेतु, जिस प्रकार मधुमक्षिका विभिन्न पुष्पों से मधु संचय कर एकत्र करती है एवं ये विभिन्न मधुकण जिस प्रकार यह नहीं जानते कि वे किस वृक्ष और किस पुष्प से आये है, उसी प्रकार हम सब उसी सत् से आकर भी उसे भूल गये हैं। जो सब का सूक्ष्म सार-तत्त्व है, उसीमें समस्त सत्तावान् पदार्थों की आत्मा है। वही सत् है। वही आत्मा है, और हे श्वेतकेतु, तुम वही हो। जिस प्रकार विभिन्न नदियाँ समुद्र में मिल जाने के बाद नहीं जान पातीं कि वे कभी विभिन्न नदियाँ थीं, वैसे ही हम सब उसी सत्स्वरूप से आकर भी यह नहीं जानते कि हम वही हैं। हे श्वेतकेतु, तुम वही हो।” इस प्रकार पिता ने पुत्र को उपदेश दिया।

सम्पूर्ण ज्ञान-प्राप्ति के दो मूल सूत्र हैं। एक सूत्र तो यह है कि विशेष को सामान्य से और सामान्य को सर्वव्यापी तत्त्व की पृष्ठभूमि में जानना। दूसरा सूत्र यह है कि यदि किसी वस्तु की व्याख्या करनी हो तो, जहाँ तक हो सके, उसी वस्तु के स्वरूप से उसकी व्याख्या करना। पहले सूत्र के आधार पर हम देखते हैं कि हमारा सारा ज्ञान वास्तव में उच्च से उच्चतर होनेवाली वर्गीकरण मात्र है। जब कोई घटना अकेली घटती है, तो मानो हम असन्तुष्ट रहते हैं। जब यह दिखा दिया जाता है कि वही एक घटना बार बार घटती है, तब हम सन्तुष्ट होते हैं और उसे ‘नियम’ कहते हैं। जब हम एक पत्थर या सेब को जमीन पर गिरते देखते हैं, तब हम लोग असन्तुष्ट रहते हैं। किन्तु जब देखते हैं कि सभी सेब गिरते है, तो हम उसे गुरुत्वाकर्षण का नियम कहते हैं और सन्तुष्ट हो जाते हैं। हम विशेष से सामान्य का अनुमान करते हैं।

धर्म का अनुशीलन करने में हमें इसी वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग करना चाहिए। वही सिद्धान्त यहाँ भी लागू होता है, और तथ्य यह है कि इसी पद्धति का उपयोग सर्वदा होता आया है। इन उपनिषदों में भी, जिनका अनुवाद मैं तुमको सुनाता रहा हूँ, मुझे विशेष से सामान्य की ओर जाने का सिद्धान्त सर्वप्रथम मिलता है। हम इनमें देखते हैं कि किस प्रकार देवगण क्रमशः एक ही तत्त्व में विलीन हो जाते हैं, समग्र विश्व की धारणा में भी ये प्राचीन विचार क्रमशः उच्च से उच्चतर की ओर अग्रसर होते हैं–वे सूक्ष्म तत्त्वों से सूक्ष्मतर तथा अधिक व्यापक तत्त्वों की ओर बढ़ते हैं, इन विशेषों से अन्त में एक सर्वव्यापी आकाश तत्त्व प्राप्त कर लेते है, और वहाँ से भी आगे बढ़कर वे प्राण नामक सर्वव्यापिनी शक्ति में आ जाते हैं, और इन सभी में सर्वत्र यह सिद्धान्त विद्यमान रहता है कि कोई भी वस्तु अन्य सब वस्तुओं से अलग नहीं है। आकाश ही सूक्ष्मतर रूप में प्राण है और प्राण ही स्थूल बनकर आकाश होता है तथा आकाश स्थूल से स्थूलतर हो जाता है, इत्यादि इत्यादि।

सगुण ईश्वर का सामान्यीकरण भी इसी मूल सूत्र का एक अन्य उदाहरण है। हमने पहले ही देखा है कि सगुण ईश्वर के सामान्य भाव की प्राप्ति किस प्रकार हुई, और उसे सम्पूर्ण ज्ञान का समष्टि-स्वरूप समझा गया। किन्तु उसमें एक शंका उठती है कि यह तो पर्याप्त सामान्यीकरण नहीं हुआ! हमने प्राकृतिक घटनाओं की एक दिशा, अर्थात् ज्ञान की दिशा लेकर यह सामान्यीकरण किया और सगुण ईश्वर तक आ पहुँचे, किन्तु शेष प्रकृति तो छूट ही गयी। अतएव पहले तो यह सामान्यीकरण ही अपूर्ण हुआ; दूसरे, इसमें एक और भी अधूरापन है, जिसका सम्बन्ध दूसरे सूत्र से है। प्रत्येक वस्तु की उसके स्वरूप ही से व्याख्या करनी चाहिए। एक समय लोग सोचते थे कि जमीन पर सेब को कोई भूत खींच लेता है, किन्तु वास्तव में यह शक्ति गुरुत्वाकर्षण की है। और यद्यपि हम यह जानते हैं कि केवल यही इसकी सम्पूर्ण व्याख्या नहीं है, पर यह निश्चित है कि यह पहली व्याख्या से श्रेष्ठ है; कारण पहली व्याख्या वस्तु के बाहर एक कारण की स्थापना करती है, और दूसरी उसके स्वभाव से सिद्ध होती है। इस प्रकार हम लोगों के सारे ज्ञान के सम्बन्ध में जो व्याख्या वस्तु के स्वभाव से सिद्ध है, वह वैज्ञानिक है और जो व्याख्या वस्तु के बाहर स्थित कारण से सिद्ध होती है, वह अवैज्ञानिक है।

अतः जगत् के सृष्टिकर्ता के रूप में सगुण ईश्वर की व्याख्या की भी परीक्षा इस सूत्र से होनी चाहिए। यदि यह ईश्वर प्रकृति के बाहर है और प्रकृति के साथ उसका कोई सम्बन्ध नहीं है तथा यदि यह प्रकृति शून्य में से, उस ईश्वर की आज्ञा से बनती है, तब तो यह मत अत्यन्त अवैज्ञानिक हुआ, और यह प्रत्येक सगुण ईश्वरवादी धर्म का एक दुर्बल स्थल प्रत्येक युग में रहा है। ये दोनों दोष हमें सामान्यतः एकेश्वरवादी कहे जानेवाले सिद्धान्त से मिलते हैं, इसके अनुसार सगुण ईश्वर में मनुष्य के ही सारे गुण–परिमाण में बहुत गुने–होते हैं, इस ईश्वर ने जगत् की सृष्टि शून्य से अपने संकल्प द्वारा की, और वह जगत् से फिर भी पृथक् है। इसीसे ये दो कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं।

हम पहले ही कह चुके हैं कि एक तो यह पर्याप्त सामान्यीकरण नहीं है; दूसरे, यह वस्तु की स्वभावसिद्ध व्याख्या भी नहीं है। यह कार्य को कारण से भिन्न बताता है। किन्तु मनुष्य का सारा ज्ञान यही बतलाता है कि कार्य कारण का रूपान्तर मात्र है। आधुनिक विज्ञान के सम्पूर्ण आविष्कार इसी ओर संकेत करते हैं और सर्वत्र स्वीकृत विकासवाद का तात्पर्य भी यही है कि कार्य कारण का रूपान्तर मात्र है, कारण का ही पुनर्समायोजन है और कारण ही कार्य का रूप ले लेता है। आधुनिक वैज्ञानिक तो शून्य से सृष्टि-रचना के सिद्धान्त की हँसी उड़ाते हैं।

धर्म क्या पूर्वोक्त दोनों परीक्षाओं में सफल हो सकता है? यदि कोई धार्मिक सिद्धान्त इन दो परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो जाय, तो उसीको आधुनिक विचारशील मानस ग्राह्य मान सकेगा। यदि पुरोहित, चर्च अथवा किसी शास्त्र के प्रमाण के बल पर किसी मत में विश्वास करने के लिए कहा जाय, तो आजकल के लोग उसमें विश्वास नहीं कर सकते, इसका फल होगा–घोर अविश्वास। जो बाहर से देखने पर पूर्ण विश्वासी मालूम पड़ते हैं, वे अन्दर से देखने पर घोर अविश्वासी निकलते हैं। शेष लोग धर्म को एकदम छोड़ देते हैं, उससे दूर भागते हैं, उसे पुरोहितों का प्रपंच मात्र समझते हैं।

धर्म भी अब एक राष्ट्रीय रूप में अपगत हो गया है। “वह हमारे प्राचीन समाज का एक महान उत्तराधिकार है, अतएव उसे रहने दो।” लेकिन आज के मानव के पुरखे उसके प्रति जिस सच्ची आवश्यकता का अनुभव करते थे, वह नष्ट हो गयी। लोगों को अब यह बुद्धि-संगत नहीं जान पड़ता। इस प्रकार की सगुण ईश्वर और सृष्टि की धारणा, जिसे हर धर्म में एकेश्वरवाद कहते है, अब चल नहीं सकती। भारत में बौद्ध धर्म के प्रभाव से यह अधिक बढ़ा भी नहीं; और इसी विषय में बौद्धों ने प्राचीन काल में अपनी विजय-श्री उपलब्ध की थी। बौद्धों ने यह प्रमाणित कर दिखाया था कि यदि प्रकृति को अनन्त शक्तिसम्पन्न मान लिया जाय, और यदि प्रकृति अपने अभावों की पूर्ति स्वयं ही कर सकती है, तो प्रकृति के अतीत और भी कुछ है, यह मानना अनावश्यक है। आत्मा के अस्तित्व को मानने का भी कोई प्रयोजन नहीं है।

द्रव्य और गुण के विषय पर प्राचीन काल से ही वाद-विवाद चलता आ रहा है। इस समय भी वही प्राचीन अन्धविश्वास चला आ रहा है। मध्यकालीन यूरोप में, यहाँ तक कि, मुझे दुःख के साथ कहना पड़ता है, उसके बहुत दिनों बाद भी यही एक विशेष विचारणीय विषय था कि गुण द्रव्याश्रित है अथवा द्रव्य गुणाश्रित? लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई क्या जड़ पदार्थ नामक द्रव्यविशेष के आश्रित हैं? और इन गुणों के न रहने पर भी द्रव्य का अस्तित्व रहता है या नहीं? बौद्ध लोग कहते हैं कि इस प्रकार के किसी द्रव्य का अस्तित्व स्वीकार करने का कोई प्रयोजन नहीं है, केवल इन गुणों का ही अस्तित्व है। इन गुणों के अतिरिक्त तुम और कुछ नहीं देख पाते। अधिकांश आधुनिक अज्ञेयवादियों का भी यही मत है, क्योंकि इसी द्रव्य गुण-विचार को कुछ और ऊँचा ले जाओ तो यही विवाद व्यावहारिक और पारमार्थिक सत्ता का विवाद बन जाता है। हमारे सम्मुख यह दृश्य जगत्–नित्य परिणामशील जगत् है और इसीके साथ ऐसी कोई वस्तु है, जिसमें कभी परिणाम नही होता। कुछ लोग इन दो सत्ताओं को सत्य मानते है। किन्तु अन्य लोग अधिक प्रमाण के साथ कहते हैं कि हमें इन दोनों पदार्थों के मानने का कोई अधिकार नहीं, क्योंकि हम जो कुछ देखते है, अनुभव करते हैं अथवा सोचते है, वह केवल दृश्य जगत् है। दृश्य के अतिरिक्त अन्य किसी भी पदार्थ के मानने का तुम्हें अधिकार नहीं। इस तर्क का उत्तर कोई भी नहीं है। केवल वेदान्त का अद्वैतवाद ही हमें इसका उत्तर देता है। यह सत्य है कि एक ही वस्तु का अस्तित्व है और वह या तो पारमार्थिक है, या व्यावहारिक। वह दृश्य के रूप में प्रकाशित होती है। यह कहना ठीक नहीं कि सत्ताएँ दो हैं–एक परिणामशील वस्तु, और उसीके अन्दर अपरिणामी वस्तु। वरन् वही एक वस्तु है, जो परिणामशील प्रतीत होती है, लेकिन वास्तव में अपरिणामी है।

हम लोग देह, मन, आत्मा आदि को अनेक मान लेते हैं, किन्तु वास्तव में सत्ता एक ही है। वह एक ही वस्तु इन सब विविध रूपों में प्रतीत होती है। अद्वैतवादियों की चिरपरिचित उपमा रज्जु के ही सर्पाकार प्रतीत होने को लो। अन्धेरे से अथवा अन्य किसी कारणवश लोग रस्सी को ही साँप समझ लेते हैं, किन्तु ज्ञानोदय होने पर सर्प-भ्रम नष्ट हो जाता है और केवल रस्सी ही दिखायी पड़ती है। इस उदाहरण द्वारा हम यह भली भाँति समझ सकते हैं कि मन में जब सर्पज्ञान रहता है, तब रज्जुज्ञान नहीं रहता और जब रज्जुज्ञान रहता है, तब सर्पज्ञान नहीं टिकता। जब हम व्यावहारिक सत्ता देखते हैं, तब पारमार्थिक सत्ता नही रहती और जब हम उस अपरिणामी पारमार्थिक सत्ता को देखते हैं, तो निश्चय ही फिर व्यावहारिक सत्ता प्रतीत नहीं होती। अब हम प्रत्यक्षवादी और विज्ञानवादी (idealist)–इन दोनों के मत खूब स्पष्ट रूप से समझ रहे हैं। प्रत्यक्षवादी केवल व्यावहारिक सत्ता देखता है और विज्ञानवादी पारमार्थिक सत्ता देखने की चेष्टा करता है। प्रकृत विज्ञानवादियों के लिए, जो अपरिणामी सत्ता का अपरोक्ष ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं, फिर परिणामशील जगत् का अस्तित्व नहीं रह जाता। उन्हींको यह कहने का अधिकार है कि समस्त जगत मिथ्या है और परिणाम नामक कोई चीज़ नही है। किन्तु प्रत्यक्षवादी केवल परिणामशील की ओर ही दृष्टि रखते हैं। उनके लिए अपरिणामी सत्ता नाम की कोई वस्तु है ही नहीं, अतएव उन्हें जगत् को सत्य कहने का अधिकार है।
इस विचार का फल क्या हुआ? फल यही हुआ कि ईश्वर के विषय में सगुण धारणा करना ही पर्याप्त नहीं। हम लोगों की और भी उच्चतर धारणा अर्थात् निर्गुण की धारणा करनी चाहिए। यही तर्कसंगत सोपान है, जिस पर हम आगे बढ़ सकते हैं। उसके द्वारा सगुण धारणा नष्ट हो जायगी, ऐसी बात नहीं। हमने यह नहीं प्रमाणित किया कि सगुण ईश्वर नहीं है, वरन् हमने यही दिखाया है कि सगुण की व्याख्या के लिए हमें निर्गुण को स्वीकार करना ही पड़ेगा, क्योंकि निर्गुण सगुण की अपेक्षा अधिक व्यापक-सामान्य है। केवल निर्गुण ही असीम हो सकता है, सगुण ससीम है। इस प्रकार हम सगुण को सुरक्षित रखते हैं, उसे नष्ट नहीं करते। बहुधा हमें यह शंका होती है कि निर्गुण ईश्वर मानने पर सगुण भाव नष्ट हो जायगा, निर्गुण जीवात्मा मानने पर सगुण जीवात्मा का भाव नष्ट हो जायगा। किन्तु वेदान्त से वास्तव में व्यक्ति का विनाश न होकर उसकी सच्ची रक्षा होती है। हम उस अनन्त सामान्य से सम्बन्ध जोड़े बिना, यह सिद्ध किये बिना कि यह व्यक्ति वस्तुतः अनन्त है, व्यक्ति के अस्तित्व को किसी प्रकार भी प्रमाणित नहीं कर सकते। यदि हम व्यक्ति को सम्पूर्ण जगत् से पृथक् मानकर सोचने की चेष्टा करें, तो उसकी स्थिति क्षण भर के लिए भी नहीं हो सकती। ऐसी कोई वस्तु कभी हुई ही नहीं।

दूसरी बात यह है कि पूर्वोक्त द्वितीय तत्त्व के फलस्वरूप हम और भी साहसिक और दुर्बोध्य तत्त्व-विचार में पड़ जाते हैं। और वह इससे किंचित भी कम नहीं है कि यदि समस्त वस्तुओं की व्याख्या उनके स्वरूप से की जाय, तो यही निष्कर्ष निकलता है कि वही निर्गुण पुरुष–हमारा सर्वोच्च सामान्य हम लोगों के अन्दर ही है और वास्तव में हम वही हैं। हे श्वेतकेतो, तत्त्वमसि–तुम वही हो। तुम्हीं वह निर्गुण पुरुष हो, तुम्हीं वह ईश्वर हो, जिसे तुम समस्त जगत् में ढूंढ़ते फिरते हो, तुम स्वयं हो। किन्तु ‘तुम’ यहाँ ‘व्यक्ति’ के अर्थ में नहीं, वरन् निर्गुण के अर्थ में प्रयुक्त है। जिस मनुष्य को हम जानते हैं, जिसे हम व्यक्त देख रहे हैं, वह व्यष्टीकृत है, किन्तु उसकी वास्तविकता निर्गुण है। इस सगुण को हमें निर्गुण के द्वारा समझना होगा, विशेष को सामान्य के द्वारा जानना होगा। वह निर्गुण सत्ता ही सत्य है–वही मनुष्य की आत्मा है।

इस सम्बन्ध में अनेक प्रश्न उठेंगे। मैं क्रमशः उनका उत्तर देने की चेष्टा करूंगा। बहुत-सी कठिनाइयाँ भी उठेंगी, किन्तु उनकी मीमांसा करने के पहले, आओ, हम अद्वैतवाद की स्थिति समझ लेने का प्रयत्न करें। अद्वैतवाद कहता है कि व्यक्त जीवरूप में हम मानो अलग-अलग होकर रहते हैं, किन्तु वास्तव में हम सब एक ही सत्यस्वरूप हैं, और हम अपने को उससे जितना कम पृथक् समझेंगे उतना ही हमारा कल्याण होगा। इसके विपरीत हम लोग इस समष्टि से अपने को जितना अलग समझते हैं, उतना ही दुःखी होते हैं। इसी अद्वैतवादी सिद्धान्त से हमें नैतिकता का आधार मिलता है, और मेरा यह दावा है कि और किसी मत से हमें कोई भी नैतिकता नहीं मिलती। हम जानते हैं कि नैतिकता की सबसे पुरानी धारणा यह थी कि किसी पुरुषविशेष अथवा कुछ विशिष्ट पुरुषों की जो इच्छा हो, वही नैतिकता है। अब इसे मानने को कोई भी तैयार नहीं; क्योंकि वह आंशिक व्याख्या मात्र है। हिन्दू कहते हैं, अमुक कार्य करना ठीक नहीं, क्योंकि वेदों में उसका निषेध है, किन्तु ईसाई वेदों का प्रमाण क्यों मानेंगे? ईसाई लोग कहते हैं, यह मत करो, वह मत करो, क्योंकि बाइबिल में यह सब करना मना है। जो बाइबल नहीं मानते, वे इसका अनुसरण करने के लिए बाध्य नहीं हैं। अतः हम लोगों को एक ऐसा तत्त्व खोजना पड़ेगा, जो इन अनेक प्रकार के भावों का समन्वय कर सके। जैसे लाखों व्यक्ति सगुण सृष्टिकर्ता में विश्वास करने को तैयार हैं, वैसे ही इस दुनिया में हज़ारों ऐसे प्रतिभाशाली व्यक्ति भी हैं, जिन्हें ये सब धारणाएँ पर्याप्त नहीं जान पड़तीं, वे इससे कुछ ऊँची वस्तु चाहते हैं; और जब जब धर्म इन मनीषियों को अपने में समाहित कर सकने की सीमा तक उदार नहीं रहा, तब तब समाज के ये उज्ज्वलतम रत्न धर्म के बाहर ही रहे। और आज प्रधानतः यूरोप में यह जितना स्पष्ट देखा जाता है, उतना और कहीं भी नहीं।

इन प्रतिभाशाली व्यक्तियों को अपने में रखने के लिए धर्म को उदार भावापन्न होना अत्यन्त आवश्यक है। धर्म जो भी दावा करता है, तर्क की कसौटी पर उन सबकी परीक्षा करना आवश्यक है। धर्म यह दावा क्यों करता है कि वह तर्क द्वारा परीक्षित होना नहीं चाहता; यह कोई नहीं बतला सकता। तर्क के मानदण्ड के बिना किसी भी प्रकार का यथार्थ निर्णय धर्म के संबंध में भी नहीं दिया जा सकता। धर्म कुछ वीभत्स करने की आज्ञा दे सकता है। जैसे, इस्लाम मुसलमानों को विधर्मियों की हत्या करने की आज्ञा देता है। कुरान में स्पष्ट लिखा है, “यदि विधर्मी इस्लाम ग्रहण न करें, तो उन्हें मार डालो। उन्हें तलवार और आग के घाट उतार दो।” अब यदि हम किसी मुसलमान से कहें कि यह ग़लत है, तो वह स्वभावतः पूछेगा, “तुम कैसे जानते हो कि यह अच्छा है या बुरा? हमारा शास्त्र कहता है कि यह सत्कार्य है।” यदि तुम कहो कि हमारे शास्त्र प्राचीन हैं, तो बौद्ध लोग कहेंगे कि उनका शास्त्र तुम्हारे से भी पुराना है और हिन्दू कहेंगे कि उनका शास्त्र सभी की अपेक्षा प्राचीनतम है। अतएव शास्त्र की दुहाई देने से काम नहीं चल सकता। वह प्रतिमान कहाँ है, जिससे तुम अन्य सबकी तुलना कर सको? तुम कहोगे, ईसा का “शैलोपदेश” देखो; मुसलमान कहेंगे, “कुरान का नीतिशास्त्र” देखो। मुसलमान कहेंगे, इन दोनों में कौन श्रेष्ठ है, इसका निर्णय कौन करेगा, कौन मध्यस्थ बनेगा? बाइबल और कुरान में जब विवाद हो, तो यह निश्चय है कि उन दोनों में से तो कोई मध्यस्थ नहीं बन सकता। कोई स्वतंत्र व्यक्ति उनका मध्यस्थ हो तो अच्छा हो। यह कार्य किसी ग्रन्थ द्वारा नहीं हो सकता, किसी सार्वभौमिक तत्त्व द्वारा ही हो सकता है। बुद्धि से अधिक सार्वभौमिक पदार्थ और कोई नहीं है। कहा जाता है, बुद्धि पर्याप्त शक्ति-सम्पन्न नहीं है, इससे सत्य की प्राप्ति में सदैव सहायता नहीं मिलती। प्रायः वह भूलें करती है, अतः हमें किसी न किसी धर्मसंघ की प्रामाणिकता में विश्वास करना चाहिए। ऐसा मुझसे एकबार एक रोमन कैथलिक ने कहा था। किंतु मेरी समझ में यह युक्ति नहीं आयी। मैं कहूँगा कि यदि बुद्धि दुर्बल है, तो पुरोहित-सम्प्रदाय और भी दुर्बल होंगे। मैं उन लोगों की बात सुनने की अपेक्षा बुद्धि की बात सुनना अधिक पसन्द करूंगा, क्योंकि, बुद्धि में चाहे जितना दोष क्यों न हों, उससे कुछ न कुछ सत्यलाभ की सम्भावना तो है, किन्तु दूसरी ओर तो किसी सत्य को पाने की आशा ही नहीं है।

अतएव हम लोगों को बुद्धि का अनुसरण करना चाहिए और उन लोगों से सहानुभूति करनी चाहिए, जो बुद्धि का अनुसरण कर किसी विश्वास को अपना नहीं पाते। आप्त वचनों के आधार पर अंधों की तरह बीस लाख देवताओं में विश्वास करने की अपेक्षा बुद्धि का अनुसरण करके नास्तिक होना अच्छा है। हम चाहते हैं उन्नति, विकास और सत्य का साक्षात्कार। किसी मत का अवलम्बन करके ही मनुष्य आज तक कभी ऊँचा नहीं उठा। करोड़ों शास्त्र भी हम लोगों को पवित्र करने में सहायता नहीं कर सकते। कर सकने की शक्ति एकमात्र सत्य के साक्षात्कार में है, जो स्वयं हमारे भीतर है, और उसकी प्राप्ति विचार से होती है। मनुष्य विचार करे। मिट्टी का ढ़ेला कभी विचार नहीं कर सकता, वह सदा मिट्टी का ढ़ेला ही रह जाता है। मनुष्य की गरिमा उसकी विचारशीलता के कारण है, पशुओं से हम इसी बात में भिन्न हैं। मैं बुद्धि में विश्वास करता हूँ और बुद्धि का ही अनुसरण करता हूँ। केवल आप्त वचनों में विश्वास करने से क्या अनिष्ट होता है, यह मैं विशेष रूप से देख चुका हूँ, क्योंकि मैं जिस देश में पैदा हुआ हूँ, वहाँ आप्त वचनों में विश्वास करने की पराकाष्ठा है।

हिन्दू लोग विश्वास करते हैं कि वेदों से सृष्टि हुई है। उदाहरणार्थ एक गाय है, यह कैसे जाना? उत्तर है, ‘गो’ शब्द वेद में है, इसलिए। इसी प्रकार मनुष्य है, यह कैसे जाना? उत्तर आता है कि वेदों में मनुष्य शब्द आया है। यदि यह शब्द उनमें न होता, तो बाहर मनुष्य भी नहीं होता। वे यही कहते हैं। आप्त वचनों में विश्वास की पराकाष्ठा! मैंने इसका जिस प्रकार अध्ययन किया है, उस प्रकार इसका अध्ययन नहीं होता। कुछ परम तीक्ष्ण बुद्धि व्यक्तियों ने इसको लेकर कुछ अपूर्व दार्शनिक सिद्धांतों का जाल उसके आसपास बुन डाला है। उन्होंने उसके लिए युक्तियाँ दी हैं और वह एक परिपूर्ण दर्शन के रूप में प्रतिष्ठित है, और हज़ारों वर्षों से हज़ारों प्रखर बुद्धि विद्वान् इस सिद्धांत की पुष्टि में लगे रहे हैं। आप्त वचनों में विश्वास में जितनी शक्ति है उसमें खतरा भी उतना ही है। वह मनुष्य जाति की उन्नति रोक देता है। और हम लोगों को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि उन्नति करना ही हमारा लक्ष्य है। सम्पूर्ण आपेक्षिक सत्यानुसन्धान में भी सत्य की अपेक्षा हमारे मन की क्रियाशीलता ही अधिक आवश्यक है। वही हमारा जीवन है।

अद्वैत मत में यही गुण है कि सभी संभाव्य धार्मिक परिकल्पनाओं में वह सर्वाधिक बुद्धिसंगत है। अन्य सब परिकल्पनाएँ–ईश्वर की आंशिक और सगुण धारणाएँ युक्तियुक्त नहीं हैं। तथापि उसको यह गौरव प्राप्त है कि वह इन आंशिक धारणाओं को बहुतों के लिए आवश्यक स्वीकार करता है। अनेक लोग कहते रहते हैं कि यह सगुणवाद अबौद्धिक है। किन्तु वह है बड़ा सान्त्वना दायक। लोगों को धर्म तो सान्त्वना देनेवाला चाहिए, और हम लोग भी समझ सकते हैं कि उनके लिए इसकी ज़रूरत है। बहुत कम लोग सत्य का निर्मल प्रकाश सहन कर सकते हैं, उसके अनुसार जीवन बिताना तो बहुत दूर की बात है। अतएव इस सान्त्वना देनेवाले धर्म की भी आवश्यकता है; समय आने पर यही बहुतों को उच्चतर धर्मलाभ में सहायता करता है। उन अल्पबुद्धि लोगों के निर्माण के लिए, जिनका विचार-क्षेत्र अत्यंत संकुचित है, और जो विचार-जगत् में ऊँची उड़ानें भरने का साहस नहीं कर सकते, ऐसी छोटी छोटी वस्तुएँ आवश्यक हैं। उन लोगों के लिए छोटे छोटे देवताओं और प्रतीकों की धारणाएँ उत्तम और उपकारी हैं। किन्तु तुम्हें निर्गुणवाद भी समझना होगा, क्योंकि इस निर्गुणवाद के आलोक में ही अन्य सिद्धांतों को समझा जा सकता है। सगुणवाद को ही उदाहरणस्वरूप लो। जॉन स्टुअर्ट मिल ईश्वर का निर्गुणवाद समझते हैं और उसमें विश्वास भी करते हैं। वे कहते हैं, सगुण ईश्वर को प्रमाणित नहीं किया जा सकता, वह असंभव है। मैं इस विषय में उनके साथ एकमत हूँ; फिर भी, मैं कहता हूँ कि मनुष्य-बुद्धि से निर्गुण की जितनी दूर तक धारणा की जा सके, वही सगुण ईश्वर है। और वास्तव में निर्गुण की इन विभिन्न धारणाओं के सिवा यह जगत् है ही क्या? वह मानो हम लोगों के सामने एक खुली पुस्तक है, और प्रत्येक व्यक्ति अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार उसका पाठ कर रहा है और प्रत्येक को स्वयं ही उसका पाठ करना पड़ता है। सभी मनुष्यों की बुद्धि में कुछ बातें समान हैं। इसीलिए मानवता की बुद्धि को कुछ वस्तुएँ एकरूप सी जान पड़ती हैं। हम तुम दोनों ही एक कुर्सी देख रहे हैं। इससे यह प्रमाणित होता है कि हम दोनों के मन में कोई एक व्यापक घटक है। मान लो, दूसरे प्रकार की इन्द्रियों वाला कोई प्राणी आ जाय, वह हम लोगों की अनुभूत कुर्सी नहीं देखेगा, किन्तु जितने लोग एक ही प्रकार संरचित हैं, वे सब उन्हीं वस्तुओं को देखेंगे। अतएव स्वयं यह जगत् ही निरपेक्ष अपरिणामी पारमार्थिक सत्ता है, और व्यावहारिक सत्ता केवल उसके देखे हुए विविध रूप हैं। इसका कारण, पहले तो यह है कि व्यावहारिक सत्ता सदा ससीम होती है। हम जानते हैं कि हम जिस भी व्यावहारिक सत्ता को देखते, अनुभव करते अथवा विचार करते हैं, वह हमारे ज्ञान के द्वारा सीमित होती है, और सगुण ईश्वर के सम्बन्ध में हमारी जैसी धारणा है, उससे वह ईश्वर भी व्यावहारिक मात्र है। कार्य-कारण भाव केवल व्यावहारिक जगत् में ही सम्भव है और ईश्वर को जब मैं जगत् का कारण मानता हूँ, तो अवश्य ही उसे ससीम जैसा मानना पड़ेगा। किन्तु फिर भी वह वही निर्गुण ब्रह्म है। हम लोगों ने पहले ही देखा है कि यह जगत् भी हमारी बुद्धि द्वारा देखा गया वही निर्गुण ब्रह्म मात्र है। यथार्थ में जगत् वही निर्गुण पुरुष मात्र है और हम लोगों की बुद्धि द्वारा उसको नाम-रूप दिये गये हैं। इस मेज़ में जितना सत्य है, वह वही सत् है और इस मेज़ की आकृति तथा जो कुछ अन्य बातें हैं, वे सब समान मानव-बुद्धि द्वारा ऊपर से जोड़ी गयी हैं।

उदाहरणस्वरूप गति का विषय लो। व्यावहारिक सत्ता की वह नित्य सहचरी है। किन्तु वह सार्वभौमिक, पारमार्थिक सत्ता के विषय में प्रयुक्त नहीं हो सकती। प्रत्येक क्षुद्र कण, जगत् के अन्तर्गत प्रत्येक परमाणु, सदैव ही परिवर्तनशील तथा गतिशील है, किन्तु समष्टि रूप से जगत् पदार्थ अपरिणामी है, क्योंकि गति या परिणाम सापेक्षिक पदार्थ मात्र हैं। केवल गतिहीन पदार्थ के साथ तुलना करने पर ही हम गतिशील पदार्थ की बात सोच सकते हैं। गति समझने के लिए दोनों ही पदार्थ आवश्यक हैं। सम्पूर्ण जगत् की समष्टि एक इकाई के रूप में गतिशील नहीं हो सकती। किसके साथ वह गतिशील होगी? उसमें परिवर्तन होता है, यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि किसकी तुलना में उसका परिणाम हो सकेगा? अतएव वह समष्टि निरपेक्ष सत्ता ही है, किन्तु उसके भीतर का प्रत्येक अणु निरन्तर गतिशील और परिवर्तनशील है। वह परिणामी और साथ ही साथ अपरिणामी है, सगुण है और निर्गुण भी है। जगत्, गति एवं ईश्वर के सम्बन्ध में हम लोगों की यही धारणा है, और तत्वमसि का भी यही अर्थ है। इस प्रकार हम देखते हैं कि निर्गुण सगुण को उच्छिन्न करने, निरपेक्ष सापेक्ष को नष्ट करने के स्थान पर, हमारे हृदय और मस्तिष्क को पूर्ण संतोष प्रदान करने वाली उसकी व्याख्या मात्र करता है। सगुण ईश्वर तथा इस विश्व में जो कुछ है, सब हमारे मन के द्वारा उपलब्ध निर्गुण सत् ही है। अपने मन एवं तुच्छ व्यक्तित्व से रहित होने पर हम उस सत् के साथ एक हो जायँगे। तत्त्वमसि का यही अर्थ है। हमें अपना सच्चा स्वरूप–ब्रह्म जानना है।

ससीम, व्यक्ति मनुष्य अपना उत्पत्ति-स्थल भूल जाता है, और अपने को नितांत पृथक् समझने लगता है। व्यष्टीकृत और विभेदीकृत सत्ताओं के रूप में हम अपना स्वरूप भूल जाते हैं। अतः अद्वैतवाद हमें विभेदीकरण को त्याग देने की शिक्षा नहीं देता, वरन् उसके रूप को समझ लेने को कहता है। हम वस्तुतः वही अनन्त पुरुष हैं, हमारे व्यक्तित्व जल की उन धाराओं के सदृश हैं, जिनमें वह अनन्त सत्ता अपने को अभिव्यक्त कर रही है, और यह समग्र परिवर्तन-समष्टि, जिसे हम ‘क्रमविकास’ कहते हैं, अपनी अनंत शक्ति को व्यक्त करने में सचेष्ट,आत्मा के द्वारा संपादित होती है। किन्तु हम अनन्त के इस पार कहीं रुक नहीं सकते; हमारे आनंद और ज्ञान एवं शक्ति को अनंत होना ही है। अनन्त सता, अनन्त शक्ति, अनन्त आनन्द हमारे हैं। हम लोगों को उन्हें उपार्जित नहीं करना है, वे सब हममें हैं, हमें तो उन्हें केवल प्रकाशित मात्र करना है।

अद्वैतवाद से यही एक महासत्य प्राप्त होता है और इसको समझना बहुत कठिन है। मैं बचपन से देखता आ रहा हूँ कि सभी दुर्बलता की शिक्षा देते रहे हैं, जन्म से ही मैं सुनता आ रहा हूँ कि मैं दुर्बल हूँ। अब मेरे लिए अपने भीतर निहित शक्ति का ज्ञान कठिन हो गया है, किन्तु विश्लेषण और विचार द्वारा अपनी शक्ति का ज्ञान होता है, और फिर मैं उसे प्राप्त कर लेता हूँ। इस संसार में जितना भी ज्ञान है, वह कहाँ से आया? वह ज्ञान हमारे भीतर ही है। क्या बाहर कोई ज्ञान है? नहीं। ज्ञान कभी जड़ में नहीं था, वह सदा मनुष्य के भीतर ही था। किसी ने कभी भी ज्ञान की सृष्टि नहीं की। मनुष्य उसको भीतर से बाहर लाता है। वह वहीं वर्तमान है। यह जो एक कोस तक फैला हुआ विशाल वटवृक्ष है, वह सरसों के बीज के अष्टमांश के समान उस छोटे से बीज में ही था। उसी बीज में ऊर्जा की वह विपुल राशि सन्निहित थी। हम जानते है कि एक जीवाणु-कोष के भीतर विराट् बुद्धि अप्रकट रूप में विद्यमान है; फिर अनन्त शक्ति उसमें क्यों न रह सकेगी? हम जानते हैं यह सत्य है। विरोधाभासी लगने पर भी यह सत्य है। हम सभी एक जीवाणु-कोष से उत्पन्न हुए हैं। और हम लोगों में जो कुछ भी शक्ति है, वह उसीमें कुण्डलीरूप में बैठी थी। तुम लोग यह नहीं कह सकते कि वह खाद्य में से आयी है; ढेर की ढेर खाद्य सामग्नी लेकर एक पर्वत बना डालो, किन्तु देखोगे उसमें से कोई शक्ति नहीं निकलती। हम लोगों के भीतर शक्ति पहले से ही अव्यक्त भाव में निहित थी, और वह थी अवश्य। इसी प्रकार मनुष्य की आत्मा के भीतर अनन्त शक्ति भरी पड़ी है, मनुष्य को उसका ज्ञान हो या न हो। उसे केवल जानने की ही अपेक्षा है। धीरे धीरे मानो वह अनन्त शक्तिमान दैत्य जाग्रत होकर अपनी शक्ति का ज्ञान प्राप्त कर रहा है और जैसे जैसे वह सचेतन होता जाता है, वैसे वैसे एक के बाद एक उसके बन्धन टूटते जाते हैं, शृंखलाएँ छिन्न-भिन्न होती जाती हैं; और वह दिन अवश्य ही आयगा, जब वह अपनी अनंत शक्ति के पूर्ण ज्ञान के साथ अपने पैरों पर उठ खड़ा होगा। आओ, हम सब लोग उस महिमामयी निष्पत्ति को शीघ्र लाने में सहायता करें।

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