संत एकनाथ का जीवन परिचय

संत एकनाथ जी का जन्म विक्रम संवत् 1590 के लगभग पैठण में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री सूर्य नारायण तथा माता का नाम रुक्मिणी था। जन्म लेते ही इनके पिता का देहावसान हो गया तथा कुछ समय के बाद इनकी माताजी भी चल बसीं। इसलिये इनके पितामह चक्रपाणि के द्वारा इनका लालन-पालन हुआ। संत एकनाथ जी बचपन से ही बड़े बुद्धिमान् थे। रामायण, पुराण, महाभारत आदि का ज्ञान इन्होंने अल्पकाल में ही प्राप्त कर लिया। इनके गुरु का नाम श्री जनार्दन स्वामी था। गुरुकृपा से थोड़ी ही साधना से इन्हें दत्तात्रेय भगवान्‌ का दर्शन हुआ। एक नाथ जी ने देखा श्री गुरु ही दत्तात्रेय हैं और श्रीदत्तात्रेय ही गुरु हैं। उसके बाद इनके गुरु देव ने इन्हें भगवान श्री कृष्ण की उपासना की दीक्षा देकर शूलभञ्जन पर्वत पर रहकर तप करने की आज्ञा दी। कठोर तपस्या पूरी करके ये गुरुआश्रम पर लौट आये। तदनन्तर गुरु की आज्ञा से ये तीर्थ यात्रा के लिये निकल पड़े।

तीर्थ यात्रा पूरी करके संत एकनाथ जी अपनी जन्मभूमि पैठण लौट आये और दादा-दादी तथा गुरु के आदेश से विधिवत् गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया। इनकी धर्म पत्नी का नाम गिरिजा बाई था। वे बड़ी पति परायणा और आदर्श गृहिणी थीं। श्री एकनाथ जी का गृहस्थ जीवन अत्यन्त संयमित था। नित्य कथा-कीर्तन चलता रहता था। कथा कीर्तन के बाद सभी लोग इन्हीं के यहाँ भोजन करते थे। अन्न-दान और ज्ञान-दान दोनों इनके यहाँ निरन्तर चलता रहता था। इनके परिवारपर भगवत्कृपा की सदैव वर्षा होती रहती थी, इसलिये अभाव नाम की कोई चीज नहीं थी।

संत एकनाथ जी महाराज में अनेक सद्गुण भरे हुए थे। उनकी क्षमा तो अद्भुत थी। ये नित्य गोदावरी स्नान के लिये जाया करते थे। रास्ते में एक सराय थी, वहाँ एक मुसलमान रहता था। एकनाथ जी जब स्नान करके लौटते तो वह इनपर कुल्ला कर दिया करता था। इस तरह से इन्हें नित्य चार पाँच बार स्नान करना पड़ता था। एक दिन तो उसने दुष्टता की हद कर दी। उसने एकनाथ जी पर एक सौ आठ बार कुल्ला किया और एकनाथ जी को एक सौ आठ बार स्नान करना पड़ा, पर उनकी शान्ति ज्यों-की-त्यों बनी रही। अन्त में उसे अपने कुकृत्य पर पश्चात्ताप हुआ और वह श्री एकनाथ जी का भक्त बन गया।

श्री एकनाथ जी की भूतदया भी अद्भुत थी। एक बार ये प्रयाग से गंगा नदी का जल काँवर में भरकर श्री रामेश्वर तीर्थ जा रहे थे। रास्ते में प्यास से छटपटाता हुआ एक गधा मिला, संत एकनाथ जी ने काँवर का सारा गङ्गा-जल गधे को पिला दिया। साथियों के आपत्ति करने पर इन्होंने कहा, “भगवान रामेश्वर तो कण-कण में निवास करते हैं।”

उन्होंने गधे के रूप में मुझसे जल माँगा, इसलिये मैंने सारा जल रामेश्वर जी को ही चढ़ाया है। गधे के द्वारा पिया हुआ सारा जल सीधे रामेश्वरजी पर चढ़ गया। इस प्रकार की अनेक घटनाएँ श्री एकनाथ जी के जीवन में हुईं, जिससे इनके दिव्य-जीवन की झलकियाँ मिलती हैं। अपने आदर्श गृहस्थ जीवन और उपदेशों के द्वारा लोगों को आत्मकल्याणपथ का अनुगामी बनाकर विक्रम संवत् 1656 की चैत्र कृष्ण षष्ठी को संत एकनाथ जी ने अपनी देह-लीलाका संवरण किया। इनकी रचनाओंमें श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध की मराठी टीका, रुक्मिणी स्वयंवर, भावार्थ रामायण आदि प्रमुख हैं।

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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