राजयोग पर पंचम पाठ – स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद कृत योग-विषयक इस पुस्तक के शेष पाठ पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – राजयोग के छः पाठ

Rajyog Par Pancham Paath: Swami Vivekananda

प्रत्याहार और धारणा : भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है, “जो किसी भी रास्ते से मुझे खोजते हैं, वे मेरे ही समीप पहुँचेंगे। वे सभी मेरे पास पहुँचेंगे।” मन को समस्त विषयों से खींच लाकर एकत्र करते हुए किसी अभीष्ट विषय में एकाग्र करने की चेष्टा का ही नाम प्रत्याहार है। इसका प्रथम सोपान है मन को स्वच्छन्द गति से भटकने देना; उस पर नज़र रखो, देखो कि वह क्या चिन्तन करता है; स्वयं केवल साक्षी बनो। मन आत्मा नहीं है। वह केवल सूक्ष्मतर रूप लिये हुए जड़ ही है। हम उसके मालिक हैं और स्नायविक शक्तियों के द्वारा इच्छानुसार इसका उपयोग करना सीख सकते हैं।

जिसे हम मन कहते हैं, शरीर उसी का बाह्य रूप है। आत्मस्वरूप हम शरीर और मन दोनों से परे हैं। हम आत्मा हैं – नित्य, अविकारी, साक्षी। शरीर विचार-शक्ति का घनीभूत रूप है।

श्वास-क्रिया जब वाम रन्ध्र से हो, तब विश्राम का समय है; जब दक्षिण रन्ध्र से, तब कार्य का, और जब दोनों से हो, तब ध्यान का। जब हम शान्त हों और दोनों नासिक-रन्ध्रों से समान रूप से श्वास ले रहे हों, तब समझना चाहिए कि हम ध्यान की उपयुक्त स्थिति में हैं। पहले ही एकाग्रता के लिए प्रयत्न करने से कोई लाभ नहीं होता। विचारों का निरोध अपने आप होगा।

अँगूठे और तर्जनी से नासिका-रन्ध्रों को बंद करने का पर्याप्त अभ्यास कर लेने के पश्चात् हम केवल अपनी इच्छा-शक्ति द्वारा, विचार मात्र से ऐसा करने में समर्थ होंगे।

अब प्राणायाम में कुछ परिवर्तन करना होगा। यदि साधक को इष्ट-मन्त्र प्राप्त हुआ हो, तो रेचक और पूरक के समय उसे ॐ के बदले उस मन्त्र का जप करना चाहिए और कुम्भक के समय ‘हुम्’ मन्त्र का जप करना चाहिए।

‘हुं’कार के प्रत्येक जप के साथ अवरुद्ध श्वास का कुण्डलिनी के सिर के ऊपर ज़ोर से आघात करो और कल्पना करो कि ऐसा करने से वह जाग रही है। अपने को ईश्वर से एक समझो। कुछ समय बाद विचार अपने आगमन की सूचना देंगे और वे कैसे प्रारम्भ होते हैं, इस बात का हमें ज्ञान होगा। जिस प्रकार जागृत अवस्था में हम प्रत्यक्षतः किसी आदमी को आते हुए देखते हैं उसी प्रकार हम अपने आगामी विचार को पहले ही देख सकेंगे। इस सीढ़ी तक हम सभी पहुँच पाते हैं, जब कि हम अपने को अपने मन से अलग करना सीख लेते हैं तथा अपने को अलग और अपने विचार को अलग वस्तु के रूप में देखने लगते हैं। विचार तुम्हें पकड़ने न पाए, सदा उनसे दूर खड़े रहो, वे नष्ट हो जाएँगे।

इन पवित्र विचारों का अनुसरण करो; उनके साथ चलो और जब वे विलीन हो जाएँगे, तब तुम्हें सर्वशक्तिमान् भगवान् के चरणों के दर्शन होंगे। यह स्थिति ज्ञानातीत (अतिचेतन) अवस्था है। जब विचार विलीन हो जाएँ, तब उसी का अनुसरण करो और तुम भी विलीन हो जाओ।

तेजोमण्डल अन्तर्ज्योति के प्रतीक हैं और योगी उनका दर्शन कर सकते हैं। कभी कभी हमें किसी का मुख ऐसी ज्योति से मण्डित दिखाई देगा, जिसमें हम उसके चरित्र की झलक पा सकेंगे और उसके बारे में एक अचूक निष्कर्ष पर पहुँच सकेंगे। कभी हमें अपने इष्ट के दिव्य दर्शन हो सकते हैं और इस प्रतीक को आलम्बन बनाकर हम सरलतापूर्वक अपने मन को पूर्णरूपेण एकाग्र कर सकते हैं।

यद्यपि हम सभी इन्द्रियों की सहायता से कल्पना कर सकते हैं, तथापि अधिकतर हम आँखों का ही उपयोग करते हैं। कल्पना भी अर्ध-जड़ ही है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि बिना रूप के हम विचार नहीं कर सकते। चूँकि पशु भी विचार करते से प्रतीत होते हैं, किन्तु उनके पास शब्द नहीं है, अतः यह सम्भव है कि विचार और रूप के बीच में कोई अविच्छेद्य सम्बन्ध न हो।

योग में कल्पना को बना रहने दो, पर ध्यान रखो कि वह शुद्ध और पवित्र रहे। कल्पना-शक्ति की प्रक्रिया के सन्दर्भ में हमारी सब की अपनी अपनी अलग विशिष्टताएँ हैं। जो मार्ग तुम्हारे लिए सब से अधिक स्वाभाविक हो, उसी का अनुसरण करो; वही सरलतम मार्ग होगा।

हमारा वर्तमान जीवन अनेक पूर्व जन्मों के कर्मों का फल है। बौद्ध लोग कहते हैं, “एक से दूसरा दीप जलाया गया।” दीप भिन्न भिन्न है, प्रकाश एक ही है।

सदा प्रसन्न रहो, वीर बनो, नित्य स्नान करो और धैर्य, पवित्रता और लगन बनाये रखो। तभी तुम यथार्थतः योगी बनोगे। जल्दबाज़ी कदापि न करो और यदि उच्चतर शक्तियाँ प्रकट होती हैं, तो याद रखो कि वे तुम्हारे अपने मार्ग से भिन्न पगडण्डियाँ हैं। वे तुम्हें लुभाकर अपने मुख्य पथ से भ्रष्ट न कर पाएँ। उन्हें दूर कर दो और अपने एकमात्र लक्ष्य ईश्वर को दृढ़ता से पकड़े रहो। केवल अनन्त की चाह करो, जिसे पाकर हमें चिरन्तन शान्ति प्राप्त होगी। पूर्ण स्वरूप को प्राप्त करने पर फिर प्राप्त करने के लिए कुछ भी शेष नहीं रहता; हम सदा के लिए मुक्त और पूर्ण हो जाते हैं — पूर्ण सत्-चित्-आनन्द!

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