स्वामी विवेकानंद के पत्र – मेरी हेल्बॉयस्टर को लिखित (2 जून, 1897)

(स्वामी विवेकानंद का मेरी हेल्बॉयस्टर को लिखा गया पत्र)

अल्मोड़ा,
२ जून, १८९७

प्रिय मेरी,

मैं अपना बड़ा गप्पी पत्र, जिसके लिए वादा कर चुका हूँ, आरम्भ कर रहा हूँ। इसकी वृद्धि का पूरा इरादा है और यदि यह इसमें विफल होता है तो तुम्हारे ही कर्मों का दोष होगा। मुझे विश्वास है कि तुम्हारा स्वास्थ्य बहुत अच्छा होगा। मेरा स्वास्थ्य बहुत ज्यादा खराब रहा है; अब थोड़ा सुधर रहा है – आशा है, शीघ्र चंगा हो जाऊँगा।

लन्दन के कार्य का क्या हाल है? मुझे आशंका है कि वह चौपट हो रहा है। क्या तुम यदा-कदा लन्दन जाती हो? क्या स्टर्डी को नया बच्चा पैदा हुआ?

आजकल तो भारत का मैदानी प्रदेश आग सा तप रहा है। मैं वह गरमी बर्दाश्त नहीं कर सकता। इसलिए मैं इस पर्वतीय स्थान पर हूँ। मैदानों की अपेक्षा यह थोड़ा ठंडा है।

मैं एक सुन्दर बाग में रहता हूँ, जो अल्मोड़े के एक व्यापारी का है – बाग कई मील तक पहाड़ों और वनों को स्पर्श करता है। परसों रात में एक चीता यहाँ आ धमका और बाग में रखी गयी भेड़ों-बकरियों के झुंड से एक बकरा उठा ले गया। नौकरों का शोरगुल और रखवाली करने वाले तिब्बती कुत्तों का भूँकना बड़ा ही भयावह था। जब से मैं यहाँ ठहरा हूँ, तब से ये कुत्ते रात भर कुछ दूरी पर जंजीरों से बाँधकर रखे जाते हैं, ताकि उनके भूँकने की जोर की आवाज से मेरी नींद में बाधा न पड़े। इससे चीते का दाँव बैठ गया और उसे बढ़िया भोजन मिल गया – शायद हफ्तों बाद। इससे उसका खूब भला हो!

क्या तुम्हें कुमारी मूलर की याद है? वे यहाँ कुछ दिनों के लिए आयी हैं और जब उन्होंने चीते वाली घटना सुनी तो डर सी गयीं। लन्दन में सिझायी हुई खालों की बड़ी माँग जान पड़ती है और अन्य बातों की अपेक्षा इस कारण हमारे यहाँ के चीतों और बाघों पर विपत्ति उमड़ पड़ी है।

इस वक्त जब मैं तुम्हें पत्र लिख रहा हूँ, तब मेरे सम्मुख विशाल बर्फीली चोटियों की लम्बी लम्बी कतारें खड़ी दिखायी पड़ रही हैं, जो अपराह्न की तपोज्ज्वलता परावर्तित कर रही हैं। यहाँ से नाक की सीध में वे लगभग बीस मील दूर है और चक्करदार पहाड़ी मार्गों से जाने पर वे चालीस मील दूर पड़ेंगी।

मुझे आशा है कि काउन्टेस के पत्र में तुम्हारे अनुवादों का अच्छा स्वागत हुआ होगा। अपने यहाँ के कुछ देशी नरेशों के साथ इस उत्सव-काल में लन्दन आने का मेरा बड़ा मन था और बड़ा अच्छा अवसर भी मिला था, किन्तु मेरे चिकित्सकों ने इतनी जल्दी काम का जोखिम उठाने की अनुमति मुझे नहीं दी। क्योंकि यूरोप जाने का अर्थ है कार्य, है न? कार्य नहीं तो रोटी नहीं।

यहाँ गेरुआ वस्त्र काफी है और इससे पर्याप्त भोजन मुझे सुलभ हो जायेगा। जो हो, अति वांछनीय विश्राम ले रहा हूँ। आशा है, इससे मुझे लाभ होगा।

तुम्हारा कार्य कैसा हो रहा है? खुशी के साथ या अफसोस के साथ? क्या तुम पर्याप्त विश्राम करना पसंद नहीं करतीं – मान लो कुछ साल का विश्राम – और कोई काम न करना पड़े? सोना, खाना और कसरत करना; कसरत करना, खाना और सोना – यही आगे कुछ महीनों तक मैं करने जा रहा हूँ। श्री गुडविन मेरे साथ हैं। तुमको उन्हें भारतीय पोशाक में देखना चाहिए। मैं बहुत जल्द उनका मूड़ मुड़वाकर उन्हें पूरा संन्यासी बनाने जा रहा हूँ।

क्या तुम अब भी कुछ योगाभ्यास कर रही हो? क्या उससे तुम्हें कुछ लाभ मालूम पड़ता है? मुझे पता लगा है कि श्री मार्टिन का देहान्त हो गया। श्रीमती मार्टिन का क्या हाल है – क्या कभी-कभी उनसे मिलती हो?

क्या तुम कुमारी नोबल को जानती हो? कभी उनसे मिलती हो? यहाँ मेरे पत्र का अन्त होता है, क्योंकि भारी अंधड़ चल रहा है और लिखना असम्भव है। प्रिय मेरी, यह सब तुम्हारा कर्म-दोष है, क्योंकि मैं तो बहुत सी अद्भुत बातें लिखना चाहता था और तुम्हें ऐसी सुन्दर कहानियाँ सुनाना चाहता था; परन्तु उन्हें भविष्य के लिए मुझे स्थगित करना पड़ेगा और तुम्हें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

तुम्हारा सदैव प्रभुपदाश्रित,
विवेकानन्द

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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