स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी जोसेफिन मैक्लिऑड को लिखित (18 अप्रैल, 1900)

(स्वामी विवेकानंद का कुमारी जोसेफिन मैक्लिऑड को लिखा गया पत्र)

अलामेडा, कैलिफोर्निया,
१८ अप्रैल, १९००

प्रिय ‘जो’,

अभी मुझे तुम्हारा और श्रीमती बुल का आनन्ददायक पत्र मिला। मैं इसे लन्दन भेज रहा हूँ। यह जानकर कि श्रीमती लेगेट की तबीयत ठीक हो रही है मुझे अति हर्ष हुआ।

मुझे बड़ा दुःख है कि श्री लेगेट ने सभापति के पद का त्याग कर दिया है। अच्छा, कहीं मैं और झगड़ा न बढ़ा दूँ, इससे डर कर मैं चुप हूँ। तुम जानती हो कि मेरा तरीका बड़ा कठोर होता है और एक बार उत्तेजित होने से कदाचित् ‘अ’ को मैं बहुत कुछ कह जाऊँ, जो वह सहन न कर सके।

मैंने उन्हें केवल यह बतलाने को लिखा कि श्रीमती बुल के सम्बन्ध में उनके विचार सर्वथा अन्यायपूर्ण हैं।

कर्म करना हमेशा कठिन होता है। ‘जो’! मेरे लिए प्रार्थना करो कि मेरा काम सदा के लिए बन्द हो जाय और मेरे प्राण ‘माँ’ में लीन हो जायँ। अपना काम ‘माँ’ ही जानती हैं।

एक बार पुनः लन्दन आकर तुम आनन्दित होगी – वे पुराने मित्र – उन सबको मेरी कृतज्ञता और प्रेम कहना।

मैं स्वस्थ हूँ, मन से अत्यन्त स्वस्थ हूँ। मैं शारीरिक विश्राम की अपेक्षा आत्मविश्राम का अधिक अनुभव करता हूँ। संग्राम में जय-पराजय होती है। मैंने अपनी गठरी बना ली है और महा मुक्तिदाता की बाट जोह रहा हूँ।

शिव, हे शिव, मेरी नैया को पार लगा दे।’

‘जो’! यह न भूलना कि मैं वही बालक हूँ, जो निमग्न और विस्मित भाव से दक्षिणेश्वर में पंचवटी के नीचे बैठकर श्रीरामकृष्ण के अद्भुत वचनों को सुनता था। यही मेरा सच्चा स्वभाव है ; कर्म, उद्योग, परोपकार आदि ये सब ऊपरी बातें हैं। अब मैं फिर उनकी मधुर वाणी सुन रहा हूँ – वही चिर परिचित कंठस्वर जो मेरे अन्तःकरण को रोमाँचित कर देता था। बंधन टूट रहे हैं – प्रेम का दीपक बुझ रहा है। कर्म रसहीन हो रहा है। जीवन के प्रति आकर्षण भी मन से दूर हो गया है! अब केवल गुरू की मधुर गम्भीर पुकार ही सुनायी पड़ रही है – ‘मैं आया, – प्रभु मै आया।’ वे कह रहे हैं, ‘मृत को स्वयं ही दफनाने दो और तुम मेरे अनुगामी बनो।’ ‘मैं आता हूँ, मेरे प्राण-वल्लभ! मैं आता हूँ।’

हाँ, मैं आता हूँ। निर्वाण मेरे सामने है। उस शान्ति के अनन्त सागर का, जहाँ पानी की एक भी हिलोर नहीं है, न हवा की एक साँस – मैं कभी कभी उसका अनुभव करता हूँ।

मुझे हर्ष है कि मैंने जन्म लिया, हर्ष है कि मैने कष्ट उठाया, हर्ष है कि मैंने बड़ी बड़ी भूलें की, और हर्ष है कि निर्वाणरूपी शान्ति-सागर में विलीन होने जा रहा हूँ। ख़ुद के लिए मैं किसीको बन्धन में छोड़कर नहीं जा रहा हूँ, न मैं कोई बन्धन ले जा रहा हूँ। चाहे इस शरीर की मृत्यु से मुझे मुक्ति मिले, या शरीर के रहते हुए मुक्त हो जाऊँ, वह पहला मनुष्य चला गया, सदा के लिए चला गया और कभी वापस नहीं आयेगा।

शिक्षादाता, गुरू, नेता, आचार्य विवेकानन्द चला गया – है केवल वही बालक, प्रभु का चिरशिष्य, चिरपदाश्रित दास।

तुम समझती हो कि मैं ‘अ’ के कार्य में हस्तक्षेप क्यों नहीं करना चाहता। ‘जो’, मैं कौन हूँ किसीके काम में हस्तक्षेप करनेवाला? मैंने नेता का अपना स्थान बहुत दिनों से त्याग दिया – मुझे अब बोलने का अधिकार नहीं है। इस वर्ष के आरम्भ से मैंने भारत में कोई आदेश नहीं दिया। तुम यह जानती हो। तुमने और श्रीमती बुल ने अब तक मेरे लिए जो कुछ किया, उसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद। तुम लोगों का सर्वांगीण कल्याण हो। उनके इच्छाप्रवाह में मैं जब बह रहा था, मेरे जीवन के वे ही सबसे मधुर क्षण थे। मैं फिर बह रहा हूँ – ऊपर उज्ज्वल और उष्ण सूर्य है और चारों ओर वनस्पति की बहुलता – गर्मी में सब चीजें निस्तब्ध और शान्त हैं – अलसायी हुई गति से नदी के उष्ण हृदय-पट पर मैं बह रहा हूँ। यह अद्भुत निस्तब्धता, ऐसी निस्तब्धता जिससे विश्वास होता है कि यह भ्रम है – कहीं यह निस्तब्धता नष्ट न हो जाय, इस डर से मैं हाथ-पैर नहीं चलाता।

मेरे कर्म के पीछे महत्त्वाकांक्षा थी, प्रेम के पीछे व्यक्तित्व, पवित्रता के पीछे भय और मेरे पथ-प्रदर्शन के पीछे शक्ति की लालसा। वे अब लुप्त हो रहे हैं और मैं बह रहा हूँ। मैं आ रहा हूँ। माँ, मैं तुम्हारी स्नेहमयी गोद में आ रहा हूँ, जहाँ तुम ले जाओगी वहीं बहता हुआ मै आता हूँ; उस शब्दहीन अपरिचित और अद्भुत देश में; नाटक का पात्र होकर नहीं – दर्शक बन कर आ रहा हूँ।

अहा! कितनी शान्ति है! हृदय के अन्तःस्थल में मेरे विचार दूर से, बड़ी दूर से आते हुए मालूम होते हैं। वे निस्तेज, दूर के, धीमे स्वर में बोले हुए शब्द के समान जान पड़ते हैं और सब चीजों पर शान्ति छायी हुई है, मधुर, मधुमयी शान्ति – जैसे सोने से पहले दो-चार क्षण के लिए अनुभव होता है, जब सब चीजें दिखती हैं, पर छायामात्र विदित होती हैं – बिना डर के, बिना प्रेम के, और बिना भावना के। शान्ति, जो चित्र और मूर्तियों से घिरे हुए, अकेले में अनुभव होती है। – मैं आया,प्रभु, मैं आया।

बस यह संसार है – न सुन्दर, न भद्दा – भावहीन इन्द्रियजनित ज्ञान के समान। अरी ‘जो’,उस परमानन्द को कैसे कहूँ! सब वस्तुएँ सुन्दर और शिव हैं, सब वस्तुएँ मेरे लिए अपना व्यावहारिक सम्बन्ध खो रही हैं – जिसमें प्रथम मेरा शरीर है। ॐतत् सत्!

मुझे आशा है कि लन्दन और पेरिस में तुम सबके लिए बड़ी बड़ी बातें होंगी। नये आनन्द – मन और शरीर के नये लाभ।

तुम्हें और श्रीमती बुल को सदा की भाँति मेरा अनन्य स्नेह।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
विवेकानन्द

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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