स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी जोसेफिन मैक्लिऑड को लिखित (2 फरवरी, 1899)

(स्वामी विवेकानंद का कुमारी जोसेफिन मैक्लिऑड को लिखा गया पत्र)

मठ, बेलूड़
हावड़ा, बंगाल
२ फरवरी, १८९९

प्रिय ‘जो’,

तुम अब तक न्यूयार्क पहुँच गयी होगी और बहुत दिनों की अनुपस्थिति के बाद फिर अपने स्वजनों के बीच हो। इस यात्रा में भाग्य ने प्रति पद पर तुम्हारा साथ दिया है – यहाँ तक कि समुद्र भी शांत था और जहाज में अवांछित-साथियों का भी सर्वथा अभाव था। किन्तु मेरी अवस्था ठीक विपरीत रही। मुझे बहुत दुःख है कि मैं तुम्हारे साथ क्यों नहीं गया और न वैद्यनाथ के वायु परिवर्तन से ही कोई लाभ हुआ। मैं तो वहाँ मृतप्राय हो गया था। आठ दिनों तक दम घुटता रहा। मुझे उस अर्धमृतकावस्था में ही कलकत्ते लाया गया और यहाँ मैं पुनर्जीवन के लिए संघर्ष कर रहा हूँ।

डॉक्टर सरकार मेरा इलाज कर रहे हैं।

मैं अब पहले जैसा उदास नहीं हूँ। मैंने अपने भाग्य से समझौता कर लिया है। यह वर्ष हमारे लिए बहुत कठिन प्रतीत हो रहा है। माँ ही सब कुछ अच्छी तरह जानती हैं। योगानन्द, जो माँ के घर में रहता था, गत मास से बीमार है और समझो कि मृत्यु के द्वार पर ही है। माँ ही सब कुछ अच्छी तरह जानती है, मैं फिर से काम में जुट गया हूँ। हालाँकि स्वयं कुछ नहीं करता। अपने शिष्यों को भारत के कोने-कोने में फिर एकबार अलख जगाने भेजा है। सबसे बड़ी बात है – तुम जानती हो – कोष की कमी। अब तो तुम अमेरिका में हो, प्रिय जो – हमारे यहाँ के काम के लिए कुछ कोष एकत्र करके भेजो न!

मैं मार्च तक स्वास्थ्य लाभ कर लूँगा और अप्रैल तक यूरोप के लिए प्रस्थान कर दूँगा। फिर, सब कुछ माँ के हाथ में है।

मैंने जीवन में शारीरिक तथा मानसिक – दोनों कष्ट भोगे हैं। किन्तु मुझ पर माँ की असीम दया है। अपने प्राप्य से अधिक आनन्द और आशीर्वाद मैंने प्राप्त किया है। मैं माँ को असफल करने के लिए संघर्ष नहीं कर रहा हूँ, बल्कि इसलिए कि वह मुझे सदा संघर्ष में रत पायेंगी और लड़ाई के मैदान में ही मैं अंतिम साँस लूँगा।

मेरा प्यार और आशीर्वाद।

तुम्हारा,
विवेकानन्द

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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