स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी जोसेफिन मैक्लिऑड को लिखित (जून, 1895)

(स्वामी विवेकानंद का कुमारी जोसेफिन मैक्लिऑड को लिखा गया पत्र)

२१ पश्चिम ३४वाँ रास्ता,
न्यूयार्क,
जून, १८९५

प्रिय जो,

तुम्हें निविड़ अनुभूति हो रही है, निश्चय ही वह कई आवरण हटा होगी।

श्री लेगेट ने तुम्हारे फोनोग्राफ के विषय में बतलाया। मैंने उन्हें कुछ सिलीण्डर (cylinder) उपलब्ध करने को कहा है। किसीके फोनोग्राफ में उन सिलीण्डरों की सहायता से मैंने बात की। मैंने जो के पास उन्हें भेज देने को कहा, जिसके उत्तर में उसने कहा कि वह एक ख़रीद लेगा, ‘क्योंकि मै सदा जो के कहे अनुसार करता हूँ।’

मुझे प्रसन्नता है कि उसके स्वभाव में इतना कवित्व छुपा हुआ है। आज मैं गर्नसी के साथ रहने जा रहा हूँ, क्योंकि डॉक्टर मेरी देख-भाल कर आरोग्य करना चाहता है।…अन्य चीजों की परीक्षा करने के बाद डॉ० गर्नसी मेरी नाड़ी देख रहे थे, जब कि अचानक लैण्ड्सबर्ग, (जिसे घर आने से उसने मना कर दिया था) अन्दर आया और मुझे देखकर शीघ्र लौट गया। डॉ० गर्नसी खिलखिलाकर हँस पड़ा और कहा कि ऐसे समय पर आने के लिए उसे पुरस्कार देता, क्योंकि उसी समय रोग का कारण उसे मालूम हो गया था। इसके पूर्व मेरी नाड़ी एकदम नियमित थी, किन्तु लैण्डसबर्ग को देखते ही संवेगरहित हो गयी। निश्चय ही यह एक अधैर्य की अवस्था है। उसने मुझे डॉ० हेल्मर के इलाज में रहने के लिए जोर दिया। वह सोचता है कि हेल्मर से मुझे बहुत स्वास्थ्य लाभ होगा और अभी मुझे इसीकी आवश्यकता है। क्या वे उदार नहीं है?

आज शहर में ‘पवित्र गौ’ देखने की आशा करता हूँ। कुछ दिन और न्यूयार्क में होऊँगा। हेल्मर चाहते हैं कि चार सप्ताह तक प्रति सप्ताह तीन बार मेरा उपचार होना चाहिए, फिर अगले चार सप्ताह तक दो बार प्रति सप्ताह और तब मैं एकदम ठीक हो जाऊँगा। अगर मैं बोस्टन जाता हूँ, तो वह मेरी सिफारिश एक बहुत अच्छे उस्ताद (विशेषज्ञ) से कर देंगे। और उसे उक्त विषय पर सलाह भी देंगे।

मैंने लैण्ड्सबर्ग से कुछ प्रिय बातें कहीं और ऊपर माँ गर्नसी के पास चला गया, जिससे लैण्ड्सबर्ग परेशानी से बच जाय।

प्रभुपदाश्रित तुम्हारा,
विवेकानन्द

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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