स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी जोसेफिन मैक्लिऑड को लिखित (सितम्बर, 1895)

(स्वामी विवेकानंद का कुमारी जोसेफिन मैक्लिऑड को लिखा गया पत्र)

द्वारा ई. टी. स्टर्डी,
हाई व्यू,केवरशम,
रीडिंग, इंग्लैण्ड,
सितम्बर, १८९५

प्रिय जो जो,

तुम्हें समय पर नहीं लिखने के लिए सहस्र क्षमा-याचना। मैं सकुशल लंदन पहुँच गया। अपना मित्र मिल गया था। अतः मैं उसके निवास पर सकुशल हूँ। स्थान रमणीय है। उसकी पत्नी तो एक फरिश्ता है, और उसके जीवन में भारत भरा है। वह वहाँ वर्षों रहा – संन्यासियों से मिला-जुला, उनका खाना खाया इत्यादि; अतः तुम समझ सकती हो, मैं कितना प्रसन्न् हूँ। भारत से लौटे अवकाशप्राप्त बहुत से जनरलों से मुलाकात हुई, वे मेरे प्रति बहुत ही शिष्ट और विनीत हैं। प्रत्येक काले आदमी को नीग्रो समझने का अमेरिकनों का वह अद्भुत ज्ञान यहाँ नहीं है, ओर कोई भी सड़क पर टकटकी लगाकर मुझे नहीं देखता।

भारत के बाहर दूसरे किसी भी स्थान की अपेक्षा मुझे बहुत ही सुखद जैसा लगता है। ये अंग्रेज हमें जानते हैं और हम उन्हें। यहाँ शिक्षा और सभ्यता का स्तर बहुत ऊँचा है – यह एक बहुत बड़ा परिवर्तन ला देता है और इस प्रकार कई पीढ़ियों की शिक्षा से यह होता है।

क्या ‘जंगली कबूतर’ वापस आ गये हैं? प्रभु उन्हें तथा उनके स्वजनों को सदासर्वदा सुख दे। बच्चियाँ कैसी हैं? और अल्बर्टा तथा होलिस्टर? उन्हें मेरा असीम प्यार दो और तुम स्वयं भी उसे स्वीकार करो।

मेरा मित्र संस्कृत का विद्वान् है, अतः हम लोग शंकर के महान् भाष्यों पर काम करने में व्यस्त हैं। दर्शन और धर्म के अतिरिक्त यहाँ कुछ नहीं है, जो जो। अक्तूबर में मैं लंदन में व्याख्यान-पाठ का प्रबन्ध करने जा रहा हूँ।

प्यार और शुभ कामनाओं के साथ सदा सस्नेह,
विवेकानन्द

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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