स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (10 फरवरी, 1896)

(स्वामी विवेकानंद का कुमारी मेरी हेल को लिखा गया पत्र)

२२८ पश्चिम ३९वाँ रास्ता,
न्यूयार्क,
१० फरवरी, १८९६

प्रिय बहन,

मेरा पत्र तुम्हें अभी तक नहीं मिला – यह जानकर आश्चर्य हुआ। मैंने, तुम्हारा पत्र पाते ही जवाब दे दिया और इसके अलावा न्यूयार्क में दिये गये तीन भाषणों की कई पुस्तिकाएँ भी भेजी थीं। रविवासरीय भाषणों को अब ‘शीघ्र-लिपि’ में लिखकर छपाया जाता है। तीन भाषणों को मिलाकर दो पर्चे हुए हैं – जिनकी बहुत सी प्रतियाँ मैंने तुम्हें भेजी थीं। मैं न्यूयार्क में दो सप्ताह और रहूँगा, इसके बाद डिट्रॉएट जाऊँगा। फिर, एक या दो सप्ताह के लिए बोस्टन लौटूँगा।

लगातार काम करने के कारण मेरा स्वास्थ्य इस वर्ष बहुत टूट गया है। मैं बहुत घबरा रहा हूँ। इस जाड़े में एक भी रात मैं ठिकाने से नहीं सो पाया हूँ। मुझे लगता हैं, मैं काम तो खूब कर रहा हूँ, फिर भी इंग्लैण्ड में बहुत अधिक काम मेरी प्रतीक्षा कर रहा है।

मुझे यह झेलना ही पड़ेगा। और तब, मैं आशा करता हूँ कि भारत पहुँचकर – विश्राम लूँगा। जीवन भर मैने संसार की भलाई के लिए शक्ति के अनुसार चेष्टा की है – फल भगवान् के हाथ में है।

अब मैं विश्राम करना चाहता हूँ। आशा है, मुझे विश्राम मिलेगा और भारत के लोग मुझे छुट्टी देंगे। मैं कितना चाहता हूँ कि कई वर्षो तक गूँगा हो जाऊँ और एक शब्द भी न बोलूँ।

मैं संसार के इन झमेलों और संघर्ष के लिए नहीं बना था। वास्तव में मैं स्वप्नविलासी और आरामतलब हूँ। मैं जन्मजात आदर्शवादी हूँ, सिर्फ़ सपनों की दुनिया में रह सकता हूँ। वास्तविकता का स्पर्श मात्र मेरी दृष्टि घुँधली कर देता है और मुझे दुःखी बना देता है। तेरी इच्छा पूर्ण हो!

मैं तुम चारों बहनों का चिर कृतज्ञ हूँ। इस देश में मेरा जो कुछ भी है – सब तुम लोगों का है। भगवान् तुम्हारा सर्वदा मंगल करे और सुखी रखे। मैं जहाँ भी रहूँगा, तुम्हारी याद – प्यार तथा हार्दिक कृतज्ञता के साथ आती रहेगी। सारा जीवन ही सपनों की माला है। मेरी आकंाक्षा, जागते हुए स्वप्न देखते रहने की है। बस! मेरा प्यार – बहन जोसेफिन को भी।

तुम्हारा चिर स्नेही भाई,
विवेकानन्द

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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