स्वामी विवेकानंद के पत्र – कुमारी मेरी हेल को लिखित (9 जुलाई, 1897)

(स्वामी विवेकानंद का कुमारी मेरी हेल को लिखा गया पत्र)

अल्मोड़ा,
९ जुलाई, १८९७

प्रिय बहन,

तुम्हारे पत्र की पंक्तियों में जो निराशा का भाव झलक रहा है, उसे पढ़कर मुझे बड़ा दुःख हुआ। इसका कारण मैं समझता हूँ। तुम्हारी चेतावनी के लिए धन्यवाद, मैं उसका उद्देश्य भली भाँति समझ गया हूँ। मैंने राजा अजित सिंह के साथ इंग्लैण्ड जाने का प्रबन्ध किया था, पर डॉक्टरों की मनाही के कारण ऐसा न हो सका। मुझे यह सुनकर अत्यन्त हर्ष होगा कि हैरियट उनसे मिली। वे तुममें से किसी से भी मिलकर बहुत प्रसन्न होंगे।

मुझे अमेरिका के कई एक अखबारों की बहुत सी कटिंग मिलीं, जिनमें अमेरिका की नारियों के सम्बन्ध में मेरे विचारों की भीषण निन्दा की गयी है। मुझे यह अनोखी खबर भी दी गयी है कि मैं अपनी जाति से निकाल दिया गया हूँ! जैसे मेरी कोई जाति भी थी जिससे मैं निकाला जाऊँ! संन्यासी की जाति कैसी?

जातिच्युत होना तो दूर रहा, मेरे पश्चिमी देशों में जाने से यहाँ समुद्र-यात्रा के विरुद्ध जो भाव थे, वे बहुत कुछ दब गए। यदि मुझे जातिच्युत होना पड़ता तो साथ ही साथ भारत के आधे नरेशों और प्रायः सारे शिक्षित समुदाय को भी वैसा ही होना पड़ता। यह तो हुआ नहीं, उल्टे मेरे पूर्वाश्रम की जाति के एक विशिष्ट राजा ने मेरी अभ्यर्थना के लिए एक दावत की जिसमें उस जाति के अधिकांश बड़े-बड़े लोग उपस्थित थे। भारत में संन्यासी जिस किसी के साथ भोजन नहीं करते, क्योंकि देवताओं के लिए मनुष्यों के साथ खान-पान करना अमर्यादासूचक है। संन्यासी नारायण समझे जाते हैं, जबकि दूसरे केवल मनुष्य। प्रिय मेरी, अनेक राजाओं के वंशधरों ने इन पैरों को धोया, पोंछा और पूजा है, और देश के एक छोर से दूसरे छोर तक मेरा ऐसा सत्कार होता रहा, जो किसी को प्राप्त नहीं हुआ।

इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि जब मैं रास्तों में निकलता था, तब शान्तिरक्षा के लिए पुलिस की जरूरत पड़ती थी! जातिच्युत करना इसे ही कहते होंगे! हाँ, इससे पादरियों के हाथ के तोते अवश्य उड़ गए। यहाँ वे हैं ही कौन? कुछ भी नहीं। हमें उनके अस्तित्व की खबर ही नहीं रहती। बात यह हुई कि अपनी एक वक्तृता में मैंने इंग्लिश चर्च वाले सज्जनों को छोड़ बाकी कुल पादरियों तथा उनकी उत्पत्ति के बारे में कुछ कहा था। प्रसंगवश मुझे अमेरिका की अत्यन्त धार्मिक स्त्रियों और उनकी बुरी अफवाह फैलाने की शक्ति का भी उल्लेख करना पड़ा था। मेरे अमेरिका के कार्य को बिगाड़ने के लिए, इसी को पादरी लोग सारी अमेरिकन स्त्री जाति पर लांछन कहकर शोर मचा रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि अपने विरुद्ध जो कुछ भी कहा जाय, वह अमेरिकावासियों को पसन्द ही होगा। प्रिय मेरी, अगर मान भी लिया जाय कि मैंने अमेरिकनों के विरुद्ध सब तरह की कड़ी बातें कही हैं तो भी क्या वे हमारी माताओं और बहनों के बारे में कही गयी घृणित बातों के लक्षांश को भी चुका सकेंगी? ईसाई अमेरिकन नर-नारी हमें भारतीय बर्बर कहकर जो घृणा का भाव रखते हैं, क्या सात समुद्रों का जल भी उसे बहा देने में समर्थ होगा? और हमने उनका बिगाड़ा ही क्या है? अमेरिकावासी पहले अपनी समालोचना सुनकर धैर्य रखना सीखें, तब कहीं दूसरों की समालोचना करें। यह सर्वविदित मनोवैज्ञानिक सत्य है कि जो लोग दूसरों को गाली-गलौज करने में बड़े तत्पर रहते हैं, वे उनके द्वारा अपनी तनिक भी समालोचना सहन नहीं कर सकते। फिर उनका मैं कर्जदार थोड़े ही हूँ। तुम्हारे परिवार, श्रीमती बुल, लेगेट परिवार और दो-चार सहृदयजनों को छोड़ कौन मुझ पर मेहरबान रहा है? अपने विचारों को व्यावहारिक रूप देने में किसने मेरा हाथ बटाया? मुझे परिश्रम करते करते प्रायः मौत का सामना करना पड़ा है। मुझे अपनी सारी शक्तियाँ अमेरिका में खर्च करनी पड़ीं, केवल इसलिए कि वहाँ वाले अधिक उदार और आध्यात्मिक होना सीखें। इंग्लैण्ड में मैंने केवल छः ही महीने काम किया। वहाँ किसी ने मेरी निन्दा नहीं की, सिवा एक के और वह भी एक अमेरिकन स्त्री की करतूत थी, जिसे जानकर मेरे अंग्रेज मित्रों को तसल्ली मिली। दोष लगाना तो दूर रहा, इंग्लिश चर्च के अनेक अच्छे-अच्छे पादरी मेरे पक्के दोस्त बने और बिना माँगे मुझे अपने कार्य के लिए बहुत सहायता मिली तथा भविष्य में और अधिक मिलने की पूरी आशा है। वहाँ एक समिति मेरे कार्य की देखभाल कर रही है और उसके लिए धन इकट्ठा कर रही है। वहाँ के चार प्रतिष्ठित व्यक्ति मेरे काम में सहायता करने के लिए मेरे साथ भारत आए हैं। दर्जनों और तैयार थे और फिर जब मैं वहाँ जाऊँगा, सैकड़ों तैयार मिलेंगे।

प्रिय मेरी, मेरे लिए तुम्हें भय की कोई बात नहीं। अमेरिका के लोग बड़े हैं, केवल यूरोप के होटल वालों और करोड़पतियों तथा अपनी दृष्टि में। संसार बहुत बड़ा है, और अमेरिका वालों के रुष्ट हो जाने पर भी मेरे लिए कोई न कोई जगह जरूर रहेगी। कुछ भी हो, मुझे अपने कार्य से बड़ी प्रसन्नता है। मैंने कभी कोई मंसूबा नहीं बाँधा। चीजें जैसी सामने आती गयीं, मैं भी उनको वैसे ही स्वीकार करता गया। केवल एक चिन्ता मेरे मस्तिष्क में दहक रही थी – वह यह कि भारतीय जनता को ऊँचा उठाने वाले यंत्र को चालू कर दूँ और इस काम में मैं किसी हद तक सफल हो सका हूँ। तुम्हारा हृदय यह देखकर आनन्द से प्रफुल्लित हो जाता कि किस तरह मेरे लड़के दुर्भिक्ष, रोग और दुःख-दर्द के बीच काम कर रहे हैं – हैजे से पीड़ित पैरिया की चटाई के पास बैठे उसकी सेवा कर रहे हैं, भूखे चाण्डाल को खिला रहे हैं – और प्रभु मेरी और उन सबकी सहायता कर रहे हैं। मनुष्य क्या है? वे प्रेमास्पद प्रभु ही सदा मेरे साथ हैं – जब मैं अमेरिका में था, तब भी मेरे साथ थे और अब इंग्लैण्ड में था, तब भी। जब मैं भारत में दर-दर घूमता था और जहाँ मुझे कोई भी नहीं जानता था, तब भी वे प्रभु ही मेरे साथ रहे। लोग क्या कहते हैं, इसकी मुझे क्या परवाह! वे तो अबोध बालक हैं, वे उससे अधिक क्या जानेंगे? क्या? मैं जो कि आत्मा का साक्षात्कार कर चुका हूँ और सारे सांसारिक प्रपंचों की असारता जान चुका हूँ, क्या बच्चों की तोतली बोलियों से अपने मार्ग से हट जाऊँ? – मुझे देखने से क्या ऐसा लगता है?

मुझे अपने बारे में बहुत कुछ कहना पड़ा, क्योंकि मुझे तुमको कैफियत देनी थी। मैं जानता हूँ कि मेरा कार्य समाप्त हो चुका – अधिक से अधिक तीन या चार वर्ष आयु के और बचे हैं। मुझे अपनी मुक्ति की इच्छा अब बिल्कुल नहीं। सांसारिक भोग तो मैंने कभी चाहा ही नहीं। मुझे सिर्फ अपने यन्त्र को मजबूत और कार्योपयोगी देखना है और फिर निश्चित रूप से यह जानकर कि कम से कम भारत में मैंने मानवजाति के कल्याण का एक ऐसा यन्त्र स्थापित कर दिया है, जिसका कोई शक्ति नाश नहीं कर सकती, मैं सो जाऊँगा और आगे क्या होने वाला है, इसकी परवाह नहीं करूँगा। मेरी अभिलाषा है कि मैं बार-बार जन्म लूँ और हजारों दुःख भोगता रहूँ, ताकि मैं उस एकमात्र सम्पूर्ण आत्माओं के समष्टिरूप ईश्वर की पूजा कर सकूँ जिसकी सचमुच सत्ता है और जिसका मुझे विश्वास है। सबसे बढ़कर, सभी जातियों और वर्णों के पापी, तापी और दरिद्र रूपी ईश्वर ही मेरा विशेष उपास्य है।

‘जो तुम्हारे भीतर भी है और बाहर भी, जो सभी हाथों से काम करता है और सभी पैरों से चलता हैं, जिसका बाह्य शरीर तुम हो, उसी की उपासना करो और अन्य सब मूर्तियाँ तोड़ दो।’

‘जो ऊँचा है और नीचा है, परम साधु है और पापी भी, जो देवता है और कीट है, उस प्रत्यक्ष, ज्ञेय, सत्य, सर्वशक्तिमान ईश्वर की उपासना करो और अन्य सब मूर्तियाँ तोड़ दो।’

‘जिसमें न पूर्वजन्म घटित होता है न परजन्म; न मृत्यु न आवागमन; जिसमें हम सदा एक होकर रहे हैं, और रहेंगे, उसी ईश्वर की उपासना करो और अन्य सब मूर्तियाँ तोड़ दो।’

‘हे मूर्खों! जीते-जागते ईश्वर और जगत् में व्याप्त उसके अनन्त प्रतिबिम्बों को छोड़कर तुम काल्पनिक छाया के पीछे दौड़ रहे हो! उसी की – उस प्रत्यक्ष ईश्वर की – उपासना करो और अन्य सब मूर्तियाँ तोड़ दो।’

मेरा समय कम है। मुझे जो कुछ कहना है, सब साफ-साफ कह देना होगा – उससे किसी को पीड़ा हो या क्रोध, इसकी बिना परवाह किए हुए। इसलिए प्रिय मेरी, यदि मेरे मुँह से कुछ कड़ी बातें निकल पड़ें तो मत घबराना, क्योंकि मेरे पीछे जो शक्ति है वह विवेकानन्द नहीं, स्वयं ईश्वर है, और वही सबसे ठीक जानता है। यदि मैं संसार को खुश करने चला तो इससे संसार की हानि ही होगी। अधिकांश लोग जो कहते हैं वह गलत है, क्योंकि हम देखते हैं कि उनके नियन्त्रण से संसार की इतनी दुर्गति हो रही है। प्रत्येक नवीन विचार विरोध की सृष्टि अवश्य करेगा – सभ्य समाज में वह शिष्ट उपहास के रूप में लिया जायगा और बर्बर समाज में नीच चिल्लाहट और घृणित बदनामी के रूप में।

संसार के ये कीड़े भी एक दिन तनकर खड़े होंगे, ये बच्चे भी किसी दिन प्रकाश देख पाएँगे। अमेरिका वाले नये मद से मतवाले हैं। हमारे देश पर समृद्धि की सैकड़ों लहरें आयीं और गुजर-गुजर गयीं। हमने वह सबक सीखा है जिसे बच्चे अभी नहीं समझ सकते। यह सब झूठी दिखावट है। यह विकराल संसार माया है – इसे त्याग दो और सुखी हो। काम-कांचन की भावनाएँ त्याग दो। ये ही एकमात्र बन्धन हैं। विवाह, स्त्री-पुरुष का सम्बन्ध और धन – ये ही एकमात्र प्रत्यक्ष शैतान हैं। समस्त सांसारिक प्रेम देह से ही उपजते हैं। काम-कांचन को त्याग दो। इनके जाते ही आँखें खुल जाएँगी और आध्यात्मिक सत्य का साक्षात्कार हो जायेगा तभी आत्मा अपनी अनन्त शक्ति पुनः प्राप्त कर लेगी। मेरी तीव्र इच्छा थी कि हैरियेट से मिलने इंग्लैण्ड जाऊँ। मेरी सिर्फ एक इच्छा और है – मृत्यु के पहले तुम चारो बहनों से एक बार मिलना; मेरी यह इच्छा अवश्य ही पूर्ण होगी।

तुम्हारा चिर स्नेहाबद्ध,
विवेकानन्द

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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