स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्रीमती ओलि बुल को लिखित (7 मार्च, 1900)

(स्वामी विवेकानंद का श्रीमती ओलि बुल को लिखा गया पत्र)

१५०२, जोन्स स्ट्रीट,
सैन फ़्रांसिस्को,
७ मार्च, १९००

प्रिय धीरा माता,

आपका पत्र, जिसके साथ केवल सारदानन्द का एक पत्र तथा हिसाब-किताब का काग़ज भी संलग्न था, पहुँच गया। मेरे भारत छोड़ने के समय से लेकर अब तक के समाचारों से मैं आश्वस्त हो गया। हिसाब-किताब एवं ३०,००० रू० के ख़र्च के सम्बन्ध में आप जैसा उचित समझे वैसा करें।

प्रबन्ध का भार मैंने आपके ऊपर छोड़ दिया है, गुरूदेव सबसे अच्छा मार्ग सुझायेंगे। ३५,००० रूपये हैं; जिसमें ५,००० रू० ग़ंगा तट पर कुटी-निर्माण के लिए है, और सारदानन्द को लिखा है कि वह इसे अभी उपयोग में न लावे। मैं ५ हजार रूपये ले चुका हूँ। अब और अधिक नहीं लूँगा। मैंने इन ५,००० रू० में भारत में ही २,००० रू० या अधिक वापस कर दिया है। परन्तु ऐसा जान पड़ता है कि ब्रह्मानन्द ने ३५,००० रू० को सुरक्षित रख छोड़ने के लिए मेरे २,००० रू० का सहारा लिया; इसलिए इस आधार पर मैं ५,००० रू० और उन लोगों का ऋणी हूँ। मैंने सोचा था कि मैं यहाँ कैलिफोर्निया में रूपये एकत्र कर उन लोगों को चुपके से चुकता कर दूँगा। अब मैं आर्थिक दृष्टि से कैलिफोर्निया में पूर्णतया असफल हो चुका हूँ। यहाँ की परिस्थिति लॉस एंजिलिस से भी ख़राब है। लोग व्याख्यान के निःशुल्क होने पर झुण्ड के झुण्ड आते हैं ; लेकिन, जब कुछ देना पड़ता है, आनेवालों की संख्या बिल्कुल ही कम हो जाती है। इंग्लैण्ड में मुझे फिर भी कुछ आशा है। मई तक इंग्लैण्ड पहुँच जाना मेरे लिए आवश्यक है। सैन फ़्रासिस्को में व्यर्थ रहकर अपने स्वास्थ्य को बिगाड़ने से कोई लाभ नहीं। साथ ही, ‘जो’ के तमाम उत्साहों के बावजूद, चुम्बकीय रोग निवारक (magnetic healer) के द्वारा अब तक वास्तविक रूप से कोई फायदा नहीं हुआ, सिवाय मेरी छाती पर कुछ लाल धब्बों के, जो मलने के कारण उत्पन्न हो गये हैं। व्याख्यानमंचों का कार्य मेरे लिए असम्भव वस्तु है, और इस पर जिद करने का मतलब होता है अपने ‘अन्त’ को शीघ्रता से आमन्त्रित करना। यात्रा-ख़र्च के पूरा होते ही मैं यहाँ से शीघ्र रवाना हो जाऊँगा। मेरे पास ३०० डालर हैं, जिन्हें मैंने लॉस एंजिलिस में उपार्जित किया था। मैं आगामी सप्ताह में यहाँ व्याख्यान दूँगा और फिर व्याख्यान देना बन्द कर दूँगा। जहाँ तक रूपये एवं मठ का प्रश्न है, जितना ही जल्द इनसे मुक्ति मिले, उतना ही अच्छा।

आप जो कुछ भी करने की सलाह दें, मैं करने के लिए तैयार हूँ। आप मेरी वास्तविक माँ रहीं हैं। मेरे भारी बोझों में से एक बोझ अपने ऊपर ले रखा है – मेरा अभिप्राय अपनी ग़रीब बहन से है। मैं पूर्ण रूप से अपने को सन्तुष्ट पाता हूँ। जहाँ तक मेरी अपनी माँ का प्रश्न है, मैं उसके पास लौट रहा हूँ – अपने और उसके अन्तिम दिनों के लिए। मैंने १,००० डालर जो न्यूयार्क में रखे हैं, उससे ९ रू० महीने आयेगे; फिर उसके लिए थोड़ी सी जमीन ख़रीद ली है, जिससे ६ रू० प्रति माह मिल जायँगे; उसके पुराने मकान से समझिए कि ६ रू० मिल जायंगे। जिस मकान के संबंध में मुकदमा चल रहा है, उसको हिसाब में नहीं लेता; क्योंकि अभी तक उस पर कब्जा नही मिला है। मैं, मेरी माँ, मेरी मातामही एवँ मेरा भाई आसानी से २० रू० महीने में गुजारा कर लेंगे। यदि न्यूयार्कवाले १,००० डालर में बिना हाथ लगाये भारत-यात्रा के लिए ख़र्च पूरा हो जाये, तो मैं अभी रवाना हो जाऊँगा।

किसी तरह तीन-चार सौ डालर अर्जित कर लूँगा – ४०० डालर द्वितीय श्रेणी में यात्रा करने एवं कुछ सप्ताह लन्दन में ठहरने के लिए पर्याप्त है। अपने लिए कुछ और अधिक करने के लिए मैं आपसे नहीं कहता हूँ; मैं यह नहीं चाहता। आपने जो कुछ किया है वह बहुत अधिक है – सदैव ही उससे कहीं अधिक, जितने का मैं पात्र था। श्रीरामकृष्ण के कार्य में मेरा जो स्थान था, उसको मैंने आपको समर्पित कर दिया है। मैं उसके बाहर हूँ। यावज्जीवन मै अपनी बेचारी माँ के लिए यातना बना रहा। उसकी सारी जिन्दगी एक अविच्छिन्न आपत्तिस्वरूप रही। अगर सम्भव हो सका, तो मेरा यह अन्तिम प्रयास होगा कि उसे कुछ सुखी बनाऊँ। मैंने पहले से सुनिश्चित कर रखा है। मैं ‘माँ’ की सेवा सारे जीवन करता रहा। अब वह सम्पन्न हो चुका; अब मैं उनका काम नहीं कर सकता। उनको अन्य कार्यकर्ता ढूँढ़ने दीजिए – मैं तो हड़ताल कर रहा हूँ।

आप एक ऐसी मित्र रही हैं, जिसके लिए श्रीरामकृष्ण जीवन का लक्ष्य बन गये है – और आपमें मेरी आस्था का यही रहस्य है। दूसरे लोग व्यक्तिगत रूप से मुझसे स्नेह करते हैं। किन्तु वे यह नहीं जानते कि जिस वस्तु के लिए वे मुझसे प्रेम करते हैं, वह श्रीरामकृष्ण हैं; उनके बिना मैं एक निरर्थक स्वार्थपूर्ण भावनाओं का पिण्ड हूँ। अस्तु, यह दबाव भीषण है – यह सोचते रहना कि आगे क्या हो सकता है, यह चाहते रहना कि आगे क्या होना चाहिए। मैं उत्तरदायित्व के योग्य नहीं हूँ ; मुझमें एक अभाव पाया जाता है। मुझे अवश्य ही यह काम छोड़ देना चाहिए। अगर कार्य में जीवन न हो तो उसे मर जाने दो; अगर यह जीवन्त है, तो इसको मेरे जैसे अयोग्य कार्यकर्ताओं की आवश्यकता नहीं है।

अब मेरे नाम से सरकारी प्रतिभूतियों (सेक्योरिटी) के रूप में ३०,००० रू० हैं। अगर इनको अभी बेच दिया जाता है, तो युद्ध के कारण हम लोग बुरी तरह से घाटा उठायेंगे; फिर वहाँ बेचे बिना वे यहाँ कैसे भेजे जा सकते हैं। उनको वहाँ पर बेचने के लिए उन पर मेरा हस्ताक्षर करना आवश्यक है। मुझे विदित नहीं है कि यह सब कैसे सुलझाया जा सकता है। आप जैसा उचित समझें करें। इसी बीच यह आवश्यक है कि प्रत्येक वस्तु के लिए मैं आपके नाम एक वसीयतनामा लिख दूँ, उस परिस्थिति के लिए जब मैं अचानक मर जाऊँ। जितना शीघ्र हो सके वसीयत का एक प्रारूप आप मुझे भेज दें और मैं इसे सैन फ़्रांसिस्को या शिकागो में रजिस्टर्ड करा दूँगा; तब मेरी अन्तरात्मा निश्चिन्त हो जायगी। मैं यहाँ किसी वकील को नहीं जानता, नहीं तो मैंने इसे पूरा करवा लिया होता; फिर मेरे पास धन भी नहीं है। वसीयत तत्काल हो जानी चाहिए; न्यास एवं दूसरी वस्तुओं के लिए पर्याप्त समय है।

आपकी चिरसन्तान,
विवेकानन्द

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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