स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलसिंगा पेरूमल को लिखित (20 दिसम्बर, 1895)

(स्वामी विवेकानंद का श्री आलासिंगा पेरुमल को लिखा गया पत्र)

२२८ पश्चिम ३९वाँ रास्ता, न्यूयार्क,
२० दिसम्बर, १८९५

प्रिय आलासिंगा,

…धीरज रखो और मृत्युपर्यन्त विश्वासपात्र रहो। आपस में न लड़ो! रुपये-पैसे के व्यवहार में शुद्ध भाव रखो।…हम अभी महान् कार्य करेंगे।… जब तक तुममें ईमानदारी, भक्ति और विश्वास है, तब तक प्रत्येक कार्य में तुम्हें सफलता मिलेगी।

वैदिक सूक्त का अनुवाद करने में भाष्यकारों पर विशेष ध्यान दो; पाश्चात्य संस्कृत-विद्वानों की कुछ परवाह न करो। वे हमारे शास्त्रों की एक बात भी नहीं समझते। शुष्क शब्द-शास्त्रज्ञों के लिए धर्म और तत्त्वज्ञान नहीं है।… उदाहरणार्थ ऋग्वेद के शब्द अनीदवातम् का अनुवाद किया, ‘वह बिना साँस का जीवित रहा।’ यहाँ असल में मुख्य प्राण की ओर संकेत है और ‘अवातम्’ का मूल अर्थ है ‘अचल’ अर्थात् ‘स्पन्दनरहित’। भाष्यकारों के अनुसार यह उस अवस्था का वर्णन हैं, जिसमें विश्व-शक्ति या प्राण कल्प के आरम्भ होने से पहले रहता है (देखो, भाष्यकार)। हमारे ऋषियों के अनुसार अर्थ लगाओ, यूरोपियन विद्वानों के अनुसार नहीं। वे क्या समझते है?

…वीर और अभय बनो और मार्ग साफ हो जायगा।… याद रखो कि थियोसॉफिस्ट लोगों से तुम्हें कुछ काम नहीं है। यदि तुम सब मेरा साथ दोगे, और धीरज न छोड़ोगे, तो मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि हम अभी बड़े काम करेंगे। मेरे इंग्लैण्ड में महान् कार्य होंगे – धीरे धीरे। मुझे ऐसा मालूम होता है कि कभी कभी तुम साहस छोड़ देते हो तथा तुम्हें थियोसॉफिस्ट लोगों के जाल में फँसने का लोभ हो जाता है। याद रखो कि गुरू-भक्त विश्वविजयी होता है। यह इतिहास का एक प्रमाण है।… विश्वास मनुष्य को सिंह बना देता है। तुम्हें हमेशा याद रखना चाहिए कि मुझे कितना काम करना पड़ रहा है। कभी कभी मुझे दिन में दो या तीन व्याख्यान देने पड़ते हैं – इस तरह मैं विघ्न और बाधाओं से निकलता हूँ – मेहनत से; मेरी अपेक्षा कोई निर्बल आदमी मर गया होता।

…शक्ति और विश्वास के साथ लगे रहो। सत्यनिष्ठ, पवित्र और निर्मल रहो, तथा आपस में न लड़ो। हमारी जाति का रोग ईर्ष्या ही है। हमारे सब मित्रों को और तुम्हें मेरा प्यार –

विवेकानन्द

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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