स्वामी विवेकानंद के पत्र – ‘भारती’ की सम्पादिका श्रीमती सरला घोषाल को लिखित (6 अप्रैल, 1897)

(स्वामी विवेकानंद का श्रीमती सरला घोषाल को लिखा गया पत्र)
ॐ तत् सत्

रोज बैंक,
बर्दवान राजभवन,
दार्जिलिंग,
६ अप्रैल, १८९७

मान्यवर महोदया,

आपके द्वारा प्रेषित ‘भारती’ की प्रति पाकर बहुत अनुगृहीत हूँ। जिस उद्देश्य के लिए मैंने अपना नगण्य जीवन अर्पित कर दिया है, उसके लिए आप जैसी गुणज्ञ महिलाओं का साधुवाद पाकर मैं अपने को धन्य समझता हूँ।

इस जीवन-संग्राम में ऐसे विरले ही पुरुष हैं, जो नये भावों के प्रवर्तकों का समर्थन करें, महिलाओं की तो बात ही दूर है। हमारे अभागे देश में यह बात विशेष रूप से देखने में आती है। अतएव बंगाल की एक विदुषी नारी से साधुवाद मिलने का मूल्य सारे भारत के पुरुष वर्ग की तुमूल प्रशंसा ध्वनि से कहीं बढ़कर है।

भगवान् करें, इस देश में आप जैसी अनेक महिलाएँ जन्म लें और स्वदेश की उन्नति में अपने जीवन का उत्सर्ग करें।

‘भारती’ पत्रिका में आपने मेरे सम्बन्ध में जो लेख लिखा है, उसके विषय में मुझे कुछ कहना है जो यह है : भारत में मंगल के लिए ही पाश्चात्य देशों में धर्म प्रचार हुआ है और आगे भी होगा यह मेरी चिर धारणा है कि पश्चिमी देशों की सहायता के बिना हम लोगों का अभ्युत्थान नहीं हो सकेगा। इस देश में न तो गुणों का सम्मान है और न आर्थिक बल, और सर्वाधिक शोचनीय बात है कि व्यावहारिकता लेश मात्र नहीं है।

इस देश में साध्य तो अनेक हैं, किन्तु साधन नहीं। मस्तिष्क तो हैं, परन्तु हाथ नहीं। हम लोगों के पास वेदान्त मत हैं, लेकिन उसे कार्य रूप में परिणत करने की क्षमता नहीं है। हमारे ग्रन्थों में सार्वभौम साम्यवाद का सिद्धान्त है, किन्तु कार्यों में महा भेदवृत्ति है। महा निःस्वार्थ निष्काम कर्म भारत में ही प्रचारित हुआ, परन्तु हमारे कर्म अत्यन्त निर्मम और अत्यन्त हृदयहीन हुआ करते हैं और मांस-पिण्ड की अपनी इस काया को छोड़कर, अन्य किसी विषय में हम सोचते ही नहीं।

फिर भी प्रस्तुत अवस्था में ही हमें आगे बढ़ते चलना है, दूसरा कोई उपाय नहीं। भले-बुरे के निर्णय की शक्ति सब में हैं, किन्तु वीर तो वही है जो भ्रम-प्रमाद तथा दुःखपूर्ण संसार-तरंगों के आघात से अविचल रहकर एक हाथ से आँसू पोंछता है और दूसरे अकम्पित हाथ से उद्धार का मार्ग प्रदर्शित करता है! एक ओर प्राचीन पंथी जड़ पिण्ड जैसा समाज है और दूसरी ओर चपल, अधीर, आग उगलने वाले सुधारक वृन्द हैं; इन दोनों के बीच का मध्यम मार्ग ही कल्याणकारी है। मैंने जापान में सुना कि वहाँ कि लड़कियों को यह विश्वास है कि यदि उनकी गुड़ियों को हृदय से प्यार किया जाय तो वे जीवित हो उठेंगी। जापानी बालिका अपनी गुड़िया को कभी नहीं तोड़ती। हे महाभागे! मेरा भी विश्वास है कि यदि हतश्री, अभागे, निर्बुद्धि, पददलित, चिर बुभुक्षित, झगड़ालू और ईर्ष्यालु भारतवासियों को भी कोई हृदय से प्यार करने लगे तो भारत पुनः जाग्रत हो जायेगा। भारत तभी जागेगा जब विशाल हृदयवाले सैकड़ों स्त्री-पुरुष भोग-विलास और सुख की सभी इच्छाओं को विसर्जित कर मन, वचन और शरीर से उन करोड़ों भारतीयों के कल्याण के लिए सचेष्ट होंगे जो दरिद्रता तथा मूर्खता के अगाध सागर में निरन्तर नीचे डूबते जा रहे हैं। मैंने अपने जैसे क्षुद्र जीवन में अनुभव कर लिया है कि उत्तम लक्ष्य, निष्कपटता और अनन्त प्रेम से विश्व विजय की जा सकती है। ऐसे गुणों से सम्पन्न एक भी मनुष्य करोड़ों पाखण्डी एवं निर्दयी मनुष्यों की दुर्बुद्धि को नष्ट कर सकता है।

पाश्चात्य देशों में मेरा फिर जाना अभी अनिश्चित है। यदि जाऊँ तो यही समझिएगा कि भारत की भलाई के उद्देश्य से ही। इस देश में जन-बल कहाँ है? अर्थबल कहाँ है? पाश्चात्य देशों के अनेक स्त्री-पुरुष भारत के कल्याण के निमित्त अति नीच चाण्डाल आदि की सेवा भारतीय भाव से और भारतीय धर्म के माध्यम से करने के लिए तैयार हैं। देश में ऐसे कितने आदमी हैं? और आर्थिक बल!! मेरे स्वागत में जो व्यय हुआ, उसके लिए धन-संग्रह करने में कलकत्तावासियों ने मेरे व्याख्यान की व्यवस्था की और टिकट बेचा, फिर भी कमी रह गयी और खर्च चुकाने के लिए तीन सौ रुपये का एक बिल मेरे सामने पेश किया गया!! इसके लिए मैं किसी को दोष नहीं दे रहा हूँ और न किसी की निन्दा कर रहा हूँ, किन्तु मैं केवल यही बताना चाहता हूँ कि पश्चिमी देशों से जन-बल और धन-बल की सहायता मिले बिना हम लोगों का कल्याण होना असम्भव है। इति।

चिर कृतज्ञ तथा प्रभु से आपके कल्याण का आकांक्षी,

विवेकानन्द

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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